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Allama Afaque Ahmad Mujaddidiतजदीद अल्फ़ सानीइल्म अलीक़ीन, उएन अलीक़ीन, हक़ अलीक़ीन

अध्याय 57 में से 57पृष्ठ 777–783

इल्म अलीक़ीन, उएन अलीक़ीन, हक़ अलीक़ीन

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने उन तीनों के मानी तवस्सुत हाल में मक्तूब 277, जिल्द अव्वल में यों बयान फ़रमाई: ‘‘जान लो अर्शदक अल्लाह तआला कि इल्म अलीक़ीन ज़ात हक़ सुब्हानहू व तआला में उन निशायनों के देखने का नाम है जो अल्लाह तआला की कुदरत पर दलालत करती हैं और उन आयात के शहूद को सैर आफ़ाक़ी कहते हैं लेकिन ज़ाती शहूद वह सूर स्वाए सैर इंफ्सी के मुतस्व्वर नहीं है और वह सिर्फ़ नफ़्स सालिक में होता है। फिर मुंदरजा बाला तकरीर में मज़कूर शेअर को ज़िक्र करने के बाद लिखते हैं: ‘‘और वह जो कुछ वह अपने से बाहर मुशाहिदा करता है सब ज़ात पर आसार व दलायल के मुशाहिदों के क़बील से है न कि इस ज़ात इज़ सुल्ताना के मुशाहिदे से।

कुतुब अलमहफ़क़ीन सय्यद उलारफ़ैन, नासिर उद्दीन ख़्वाजा उबीद अल्लाह एहरार क़ुद्दिस सिर्रहू अलाक़दस ने फ़रमाया है कि ‘‘सैर दो किस्म पर है; सैर मुस्ततील, सैर मुस्तदीर। सैर मुस्ततील बाद दर बाद है और सैर मुस्तदीर क़ुर्ब दर क़ुर्ब। सैर मुस्ततील मकसूद को अपने दायरे के बाहर तलब करता है और सैर मुस्तदीर अपने गिर्द फिरना है और मकसूद को अपने से ढूँढना है।

पस जो तजल्लियात कि सूर हिस्सी व मिसाली में और इसी तरह पर्दा अनिवार में हूँ गी इल्म अलीक़ीन में दाखिल हैं। कोई भी सूरत हो और कोई भी नूर ज़ाहिर हो, रंगीन हो वह नूर, बे रंग मुतनाही हो वह नूर या गैर मुतनाही मुहीत कायनात हो या न हो।’’

और उएन अलीक़ीन शहूद हक़ का नाम है इस के बाद वह मालूम है इल्म यकीन के साथ और यह शहूद फ़नए सालिक को मुस्तलिज़्म है इस शहूद के ग़लबा में इस का तईन (वजूद व तशख़्स) पूरे तौर पर गुम हो जाता है और इस के दीदा शहूद में इस का असर इस से बाक़ी न रहे और अपने शहूद में फ़ानी मस्तहलक हो जाए इस ताइफा अलैहि क़ुद्दिस अल्लाह तआला इसरारहम के नज़दीक इस की ताबीर इदराक बसीत से की जाती है और मार्फत भी कहते हैं और इस इदराक में अवाम व ख़वास शरीक हैं।

लेकिन फ़र्क़ यह है कि ख़वास के लिए शहूद ख़ल्क़ शहूद हक़ जल व अला से मुज़ाहम नहीं है बल्कि इस के दीदा शहूद में अलावा हक़ जल व अला शहूद नहीं और अवाम के लिए मुज़ाहम है। लिहाज़ा इस शहूद से पूरी गफलत रखते हैं और इदराक से खबर नहीं रखते हैं।’’ और यह उएन अलीक़ीन इल्म अलीक़ीन का हिजाब है जिस तरह इल्म अलीक़ीन, उएन अलीक़ीन का हिजाब।

इस शहूद के तहक़्क़ के वक़्त मुकम्मल हैरत व नादानी है इल्म की इस जगह बिलकुल गुंजाइश नहीं है।

हक़ अलीक़ीन अल्लाह तआला के इस शहूद का नाम है जो तईन के इर्तिफ़ा और मुतय्यन के अज़महलाल के बाद होता है लेकिन आरिफ का यह शहूद हक़ तआला का हक़ के साथ है जल व अला, न कि इस आरिफ के साथ विलायहमल अताया उलमलिक ज़िला मुतायाह और यह शहूद बका बिल्लाह में कि बी यसमा व बी यबस्र (मुझी से संता और मुझी से देखता है) का मक़ाम से मुतस्व्वर हो सकता, कि सालिक को फ़नए मुतअल्लिक़ कि ज़ात व सिफ़ात हक़ सुब्हानहू व तआला की फना है के साथ तहक़्क़ के बाद है महज़ दीनी इनायत से अपने पास से वजूद बख्शता है

और सकर हाल व बे ख़ुदी से सहव व इफ़ाक़त में लाता है और इस वजूद को वजूद मोहूब हक्कानी कहते हैं इस मवतन में इल्म व उएन एक दूसरे का हिजाब नहीं हैं उएन शहूद में आलम है और उएन इल्म मुशाहिद और आरिफ का यही तईन है कि वह इस महल में इस तईन को उएन हक़ पाता है इज़ शाना न कि तईन कोनी क्यों कि इस का कोई असर इस के दीदा शहूद में बाक़ी नहीं रहा है। तफ़सील के लिए देखिए मक्तूब 277।

मक्तूब4, जिल्द दोम में इल्म अलीक़ीन के बारे में आप की जोलांगाह मुलाहिजा फरमाएं: इल्म अलीक़ीन शहूद आयात का नाम है जो इल्मी यकीन का फायदा दे, यह शहूद दर हक़ीक़त असर से मूसिर की तरफ़ इस्तिदलाल है, पस जो कुछ तजल्लियात व ज़हूरात से आफ़ाक़ व इनफ्स के आईनों में देखा जाता है सब इस्तिदलाल व असर बमोस्सर के क़बील से है अगरचे उन तजल्लियात को तजल्लियात ज़ातीय नाम दें और उन ज़हूरात के बे कैफ़ कहीं क्यों कि क्षे का ज़ुहूर आईना में असर का हुसूल है इस क्षे के आसार से न कि उएन इस क्षे का हुसूल ।

पस बतमामा सैर आफ़ाक़ी व इंफ्सी ने क़दम दायरा इल्म अलीक़ीन से बाहर नहीं खींचा और असर से मोस्सर तक इस्तिदलाल के अलावा इस का नसीब न होगा अल्लाह तबारक व तआला इरशाद फरमाता है:

سَنُرِیۡہِمْ اٰیٰتِنَا فِی الْاٰفَاقِ وَ فِیۡۤ اَنۡفُسِہِمْ حَتّٰی یَتَبَیَّنَ لَہُمْ اَنَّہُ الْحَقُّ

यानी अन्क़रीब हम उन को दिखाएं गे अपनी निशानियां अतराफ़ आलम में और उन की जानों में यहाँ तक कि ज़ाहिर हो जाए उन के लिए कि वही हक़ है।

दूसरों ने सेरआफ़ाक़ी को इल्म अलीक़ीन से जाना है और उएन अलीक़ीन और हक़ अलीक़ीन को सैर इंफ्सी में साबित किया है और इंफ्सी से बाहर सैर नहीं कही है।

आं ईशां नंद मिन चुनैनम या रब

जान लीजिए कि हज़रत हक़ सुब्हानहू बंदा से बंदा के ज़्यादा क़रीब तर है पस बंदा से हक़ जल व अला तक जानिब अक़्रबीयत में दूसरी सैर मुतखलिल है कि वसूल इस सैर

के क़ता से वाबस्ता है, यह तीसरी सैर भी दर हक़ीक़त इल्म अलीक़ीन को साबित करती है,हर चंद दायरा ज़लीयत से बाहर है लेकिन शाइबा ज़लीयत से पाक व मुबर्रा नहीं है क्यों असमा व सिफ़ात वाजिबी जल सुल्तान्हा दर हक़ीक़त हज़रत ज़ात तआला व तक़दस के ज़लाल हैं और जिस जगह ज़लीयत का शाइबा है आसार व आयात में दाखिल है पस सैर इल्म अलीक़ीन के तीन हिस्सों से एक सैर को इल्म अलीक़ीन के साथ मख़सूस किया है और इस की दूसरी सैर को उएन अलीक़ीन और हक़ अलीक़ीन के लिए मुहसिल (मुफीद) करार दिया है और तीसरी सैर के बारे में लब नहीं खोले हैं ताकि इल्म अलीक़ीन का दायरा तमाम हो उएन अलीक़ीन व हक़ अलीक़ीन अभी दर पेश है؏

कयास कण ज़ गुलिस्तान मिन बिहार मरा

और उएन उलक़ीन और हक़ अलीक़ीन के बारे में किया कहे और अगर कहे तो कौन समझे और कान पाए और किया पाए, यह मआरिफ़ दायरा विलायत से खारिज हैं अर्बाब विलायत उलमा-ए ज़वाहर की तरह उन के इदराक में आजिज़ और उन के इदराक से क़ासिर हैं यह उलूम मुश्कात अनिवार से माख़ूज़ हैं अला अरबाभा अस्सलात वस्सलाम व इलतहीत

अपने मख़दूम ज़ादे ख़्वाजा मुहम्मद अब्द अल्लाह क़ुद्दिस सिर्रहू को तहरीर फ़रमाते हैं: सूरत फना बयान करने के बाद, हक़ीक़त फना इस वक़्त मुतहक़्क़ होती है कि असमा व सिफ़ात और शेवन व एतबारात की कसरत भी मुकम्मल तौर पर नज़र से पोशीदा होगा और स्वाए ज़ात मुजर्रिद तआला की अहदेत के कोई चीज़ मलहूज़ व मंजूर न हो, तमामी सैर अली अल्लाह की हक़ीक़त इस जगह जलवा गर होती है और ज़लाल की गिरफ्तारी से पूरे तौर पर छुटकारा इसी मक़ाम में हासिल होता है इस वक़्त मामला असल उसूल से पड़ता है और दाल से मदलूल तक पहुँचाया जाता है और इल्म से उएन और गोश् से आगोश तक उरूज करता है और वस्ल उर्यां मुतहक़्क़ होता है व क़ज़ा व क़ज़ा सम क़ज़ा व क़ज़ा।(मक्तूब35, ज: 2)

बग़ैर रम्ज़ व इशारा और वह भी मुबहम और सर आस्तीन में कर के इस जगह के बारे में जब नहीं खोले जा सकते हैं।’’ हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के मक्तोबात में इस तरह की इस्लाहात बहुत हैं लेकिन इस दौर में अब असल तसव्वुफ़ से दिल चस्पी कहां है और कौन है जो समझे और गौर करे उलमा ख़ुद शरई इस्तिलाहात तक जानने की कोशिश नहीं करते हैं ज़िला माशा अल्लाह तसव्वुफ़ को तो वह इल्म लदनी समझ बैठे हैं और यह तसोर कर लिया है कि यह हासिल ही नहीं हो सकता है या कठिन बहुत है जब कि इस की तहसील निहायत अहम और ज़रूरी है। उन चंद मिसालों से हर पढ़ा लिखा और जानकार समझ सकता है कि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू को अल्लाह तआला ने किस क़द्र बह्र हक़ीक़त का शनावर बनाया था और उलूम व मआरिफ़, मुशाहिदा व मकाशफा और रूहानियत के उरूज व इर्तिक़ा में किस क़द्र बुलंदियां अता फ़रमाई थीं।

तसव्वुफ़ की इस्लाहात में से यह भी है कि आप ने औलीए कराम और बुज़ुर्गान दीन के जज़्ब व मस्ती के आलम में निकले हुए इसी तरह जो उन्हों ने अपने बुलंद मुक़ामात की तरफ़ इशारे फ़रमाए थे आम सूफ़िया कराम व उलमा-ए अजाम जिन की मुरादों से आजिज़ थे। हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने उन की मुरादात बयान फरमाएं और मुख़तलिफ़ तावीलात के मुहतमिल अक़्वाल की सही तावीलात बयान फरमाएं ऐसे ही अक़्वाल से ख़ाम सूफ़िया हज़ूज़ नफ़सान्य की तहसील कर रहे थे।

आप ने उन के सारे चूर दरवाजे बंद फ़रमा दिए। अगर में उन्ही बयान करूँ तो मक्तोबात से एक किताब की जिल्द तैयार हो जाए ई मगर यहाँ भी उज़्र वही है लिखों तो किस के लिए लिखों, हक़ीक़त यह है कि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के मक्तोबात में आप की शख्सियत की इतनी तस्वीरें बिखरी हुई हैं अगर उन सब को जमा कर दिया जाए और उन को सही पहुचंवा दिया जाए तभी हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू का कुछ पता मालूम

हो सकता है। अकबर व जहांगीर तक आप को महदूद कर के एक किस्म का जुल्म किया गया है।

सिलसिला नक़्श बंदेह:

नक़्श बंदेह सिलसिला की आप ने दो पहलू से तजदीद फ़रमाई। एक तो यह कि यह सिलसिला चों कि खालिस इत्तिबा सुन्नत पर मबनी था इस का सारा मुजाहिदा और रियाज़त, सुन्नत पर कामिल तरीके सेमुस्तक़िल मिज़ाजी के साथ अमल और हर मामले में मियाना रवी इख्तियार करना था। बुजुर्गों का मुशाहिदा है कि मुख़तलिफ़ आमाल व अफ़आल और रियाज़ात व मुजाहिदात के मुख़तलिफ़ अनिवार व अलवान और मुख़तलिफ़ कैफियात व वारदात हैं। सुन्नत पर सख्ती से अमल न तो हाल से मग़्लूब करता है, और न ही बजाहिर इस में कोई इमतियाज़ी शान होती है इस लिए इस की तरफ़ लोगों के क़ुलूब कम माइल हुए थे, कुछ नक़्श बंदी हज़रात ने दूसरों की देखा देखी बाज़ रसूम व बिदआत इस मुबारक सिलसिला में भी दाखिल कर दें थीं इस की वजह से इस में वह फ़ैज़ और बरकत भी न रही थी जो पहले थी। हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने उन तमाम रसूम व बिदआत से सिलसिला मुबारका को पाक कर दिया और ठीक बुनियादों पर खड़ा कर दिया जो इस की थीं।

दोम यह कि यह सिलसिला आप के ज़ुहूर से क़ब्ल सिर्फ़ चंद अज़कार व मुराक़बात तक महदूद था। आप ने कहां से कहां पहुँचा दिया। डाक्टर गुलाम मुस्तफ़ा ख़ान फ़रमाते हैं: सिलसिला आलीया नक़्श बंदेह जो हज़रत ख़्वाजा बाक़ी बिल्लाहरहमत अल्लाह अलैहि के जमाने तक लताइफ़ सबा; नफ़ी व इस्बात, तहलील लिसानी, मुराक़बा अहदेत, फिर मुराक़बात मुशारब, और मुराक़बा मईयत तक महदूद था, वह हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की बरकत से विलायत कुबरा, मुराक़बात कमालात नुबुव्वत व रिसालत व ओलो अलाज़म, मुराक़बा हक़ीक़त काबा, हक़ीक़त कुरआन, हक़ीक़त सला, माबूदीयत सर्फा, हक़ीक़त इब्राहीमी, हक़ीक़त मूसवी, हक़ीक़त मुहम्मदी, हक़ीक़त अहमदी, हुब्ब सर्फा और लातईन के मुक़ामात तक वाबस्ता हो गया है।

यह चीजें हज़रत मुजद्दिद अल्फ़ सानीरहमत अल्लाह अलैहि के तुफ़ैल में उन के वाबस्तगान तक पहुँची हुई हैं और उन के मुताल्लिक़ किसी नज़रियाती बहस व तमहीस का सवाल ही पैदा नहीं होता है।(रूद कौसर)

सिलसिला मुबारका की तजदीद का यह पहलू भी बहुत अहम है कि यह सिलसिला कम लोगों में और बहुत कम शहरों और मुल्कों में था मगर आप ने इस क़द्र फ़रोग़ दिया कि पूरे आलम में पहुँचा दिया और लोगों के दलों में इस क़द्र अज़मत पैदा कर दी कि बयान से बाहर है।