अध्याय 37 में से 57पृष्ठ 501–522
उमरा के नाम ख़ुतूत
मक्तोबात शरीफ़ में जिन उमरा के नाम ख़ुतूत हैं उन के नाम यह हैं (1)सय्यद फरीद(2)ख़ानख़ानां (3)ख़ान जहां (4)ख़्वाजा जहां (5)मिर्ज़ा मज़फ़र ख़ाँ (6)मिर्ज़ा बदी अल्ज़मां (7)कलेज ख़ाँ (8)जबारी ख़ाँ (9)मिर्ज़ा फतेह अल्लाह (10)दाराब ख़ाँ (11)फतेह ख़ान अफगान (12)शैख़ अब्द अलोहाब (13)मुमरीज़ ख़ाँ अफगान (14)सदर जहां (15)ख़ान आज़म (16)लाला बैग (17)सिकंदरखां लोदी (18)ख़िज़र ख़ाँ लोदी (19)बहादरख़ां (20)शैख़ सदरुद्दीन (21)जाफर बैग वगैरह।
उन में का हर एक, एक से बढ़ कर एक जाह वहशमत का मालिक था बाज़ उमरा के नाम कई कई मक्तूब हैं,शैख़ फरीद के नाम तो तक़रीबा उन्नीस मक्तोबात शरीफा हैं,आप इस बोर्य नशीं मर्द ख़ुदा की हिम्मत,जिद वजहद और इस का काम तो देखें मनक़ूल विमाक़ूल की आला
किताबों की तदरीस भी,अफ़ाज़ा अनिवार के लिए मुरीदों की बातिनी तरबीयत भी,सब के क़याम वतआम का बंदोबस्त और इंतजाम,कुव्वत तसर्फ़ से सब को मनाज़िल तै कराना, उन की सुनना और उलूम विमआरिफ़ उन्हें स्नाना,ज़िक्र विबादत की कसरत भी, इस के साथ साथ अहले कुफ्र की तरफ़ से जो कुछ जुल्म विस्तम हो रहे थे उन पर नज़र और उन के अज़ाला की को शिष्,राफ़िज़ियों और शीयों की तरफ़ से जो इस्लाम और अहले इस्लाम को जबरदस्त ख़तरात थे उन का मुकाबला भी,तसनीफ़ वतालीफ़ भी और दीन की ख़िदमत के लिए मुख़तलिफ़ असफार भी वगैरह वगैरह।
फिर मादी वसाइल का फ़ुक़दान अलग दर्द का सबब था यह सब एक इंसान से बहुत मुश्किल है मगर रब तआला जब काम लेना चाहताहै तो फ़र्द वाहिद से वह ले लेता है जो लाखों और सैकड़ों नहीं कर पाते हैं,काश! आज के उलमा वसूफ़िया आप को पढ़ते,क़रीब से देखते और आप के लायक तक़लीद कारनामों को अपनाते,बात कहां से कहां पहुँच गई चंद इक़तिबासात और मुलाहिजा फरमाएं।
शैख़ फरीद चूंकि सय्यद थे इस लिए उन्हें खिताब करते हुए फ़रमाते हैं:‘‘अज़ हक़ सुब्हानहू व तआला ख़्वास्ता मि आयेद कि बतूसल वजूद शरीफ़ आं सलाला अजाम अरकान शरीअत ग़रा वाहिकाम मिलित ज़हरा कुव्वत गिरंद वर्वाज पज़ीरिंद؎
कार एं अस्त वगैरह एं हिम्मा हेच’’
यानी बारगाह ख़ुदावंदी में दुआ है कि उन अहले बीत अजाम के वसीले से शरीअत ग़रा के अरकान और मिलित ज़हरा के अहकाम कुव्वत पकड़ें गे और रिवाज पाएं गे,काम तो बस यही है इस के अलावा सब हेच।
फिर अहले बीत की फ़ज़ीलत और यह कि आज भी निजात अहले बीत के सफ़ीना ही से हो सकती है बयान करने के बाद फ़रमाते हैं:
‘‘हिम्मत इलिया रा बतमाम बरआँ गुमारिंद कि एं सआदत उज़्मा रा बदस्त आरंद बानायत अल्लाह सुब्हानहू अज़ किस्म जाह विजलाल वाज़मत विशौकत हिम्मा मयस्सर अस्त बा वजूद शरफ़ ज़ाती अगर एं अलावा ब आं मंज़िम शव्द गोए सबक़त बचौगान सआदत अज़ हिम्मा पेश बुर्दा बाशिंद’’
यानी अपनी बुलंद हिम्मती को पूरे तौर पर इस पर मुक़रर करें कि इस सआदत उज़्मा को हासिल करें,अल्लाह सुब्हानहू व तआला की जानिब से जाह विजलाल और अज़मत विशौकत सब कुछ मयस्सर है शरफ़ ज़ाती के बा वजूद अगर यह इस के साथ मिल जाए तो सबक़त की गेंद सआदत के चौगान से सब से आगे ले जाने वाले हूँ गे।
एक दफ़ा आप को मालूम हुआ कि बादशाह की तरफ़ से चार उलमा की तक़र्री का हुक्म हुआ है,आप की मुजददाना फितरत ने फोरा इस खतरा का एहसास कर लिया कि अगर कहीं उलमा-ए सौ की तक़र्री हो गई तो सारी जिद वजहद बे कार हो जाए गी और दीन फिर तबाही के दहाने पर पहुँच जाए गा,आप ने फोरा शैख़ फरीद को ख़त लिखा और बादशाह की तारीफ़ की और इस खबर पर मुसर्रत का इज़हार फ़रमाया और लिखा कि माज़ी में उलमा-ए सौ के इख़तिलात और उन की दुनिया तलबी से इस्लाम और अहले इस्लाम को कण कण बिलाव M का शिकार होना पड़ा,फिर आप उन को राय देते हैं कि इस काम के लिए उलमा-ए आख़िरत ज़रूरी हैं अगर चार ऐसे देनदार उलमा मयस्सर न आ सकें बल्कि कोई एक ही मिले तो काफ़ी है,गिनती पूरी करने के लिए ज़रूरी नहीं कि जैसे मिल जाएँ भर लिए जाएँ,मक़सद एक से भी पूरा हो सकता है।
आप की बुलंद नज़र चूंकि जानती थी कि हुकूमत के लिए कैसे आलम की ज़रूरत है,अक्ल विदीन में कितना कामिल इंसान चाहिए और वैसे कामिल नहीं पाते हैं इस लिए हो सकता है ऐसे चार आलम न मिलें तो भी उन्हें राय देते हैं:
‘‘अगर उलमा-ए आख़िरत पैदा शव्द चह सआदत कि सोहबत अव कबरीयत अह्मर अस्त वागर पैदा नशोद बाद अज़ तामिल सही बेहतरीन एं जिंस रा इख्तियार कनंद मा ला यद्रक कल्ला ला यत्रक कल्ला’’
यानी अगर उलमा-ए आख़िरत मयस्सर आएं तो किया ही नेक बुख़ती है कि उन की सोहबत कबरीयत अह्मर (सोना)है और अगर मयस्सर न आएं तो इस जिंस से सब से बेहतर को इख्तियार करें जिस का सब नहीं पाया जा सकता है इस का सब छोड़ा नहीं जा सकता है।
आप को यह भी फ़िक्र रहती कि कहीं उन उमरा की मजलिसों में अहले बिद्दत वज़लालत उलमा का दखल न हो जाए और बाहम सोहबत की राहें कुशादा न हो जाएँ इस लिए वक्ता फ़वक़ता इस किस्म के ख़तरात का इज़हार फ़रमाया करते थे चनां चह एक मक्तूब में शैख़ फरीद को लिखते हैं:
‘‘एं फ़क़ीर अज़ सोहबत ग्रामी क्षमा दौर उफ़्तादा अस्त मालूम न दारद कि दर मजलिस शरीफ़ अज़ कदाम किस्म मर्दुम रा गुंजाइश अस्त वानेस ख़लवत विजलोत केस्त’’(मक्तूब 54 जिल्द 1)
यानी यह फ़क़ीर आप की सोहबत ग्रामी से दौर है मालूम नहीं कि मजलिस शरीफ़ में किस किस्म के लोगों की गुंजाइश है और ख़लवत विजलोत में साथी कौन है?
कुफ्र वाहिल कुफ्र का ग़लबा और इस्लाम वाहिल इस्लाम की ग़ुरबत वज़बों हाली और ज़ोफ़ वना तवानी बयान करने के बाद आप क़ुद्दिस सिर्रहू ख़ान आज़म को दीनी ख़िदमात के लिए आमादा वितियार करते हुए फ़रमाते हैं:
‘‘इमरोज़ वजूद शरीफ़ क्षमा रा मुग़्तनम मि शमरियम विमबारज़ दरें मार्का ज़ईफ़ विषकस्त ख़ूर्दा जुज़ क्षमा रा निमी दानियम हक़ सुब्हानहू व तआला मवेद विनासिर क्षमा बाद बहरमत उन्नबी व आला अलामजाद अलैहि वालैहिम अस्सलवात वालतसलीमात वालतहयात वालबरकात।’’
इस दौर में आप के वजूद मसाऊद को में गनीमत शुमार करता हूँ और इस कमजोर और शिकस्त ख़ूर्दा मार्के में तुम्हारे सिवा किसी को मुजाहिद नहीं जानता हूँ अल्लाह तआला आप की ताईद और मदद फ़रमाए गा।
जज़्बात से सरशार करने की मुजददाना फितरत आप देख रहे हैं फिर दीनी ख़िदमात का जुनून इस तरह पैदा करते हैं:
‘‘दर खबर वारद अस्त लिन यूमन अहदकम हत्ता यकाल उन्ह मजनून दरें वक़्त आन जुनून कि मबनाए आं फुरत ग़ैरत इस्लाम अस्त दर निहाद क्षमा महसूस अस्त अलहम्द लिल्लाह सुब्हानहू अला ज़ालिक’’
हदीस शरीफ़ में है कि तुम में से कोई मोमिन नहीं हो सकता है यहाँ तक कि उसे मजनूं कहा जाए,इस वक़्त में वह मजनूं कि जिस की बुनियाद ग़ैरत इस्लाम की ज्यादती है तुम्हारी फितरत में महसूस होती है।
अब जरा मुजद्दिदी कलम की जूलानी देखें फ़रमाते हैं:
‘‘इमरोज़ आं रोज़ अस्त कि अमल क़लील रा बाजर जज़ील बाअतिना तमाम कबूल मि फ़रमायंद,अज़ अस्हाब कहफ़ गैर अज़ हजरत अमल दीगर नुमायाँ नेस्त कि एं हिम्मा ऐतबार पैदा करदा अस्त,सिपाहियां दर वक़्त ग़लबा आदा अगर इंदिक तर्दद मि कनंद ऐतबार बसयार पैदा मि कनंदद बख़िलाफ़ दर वक़्त अमन वत्स्कैन आदा, वायुं जिहाद कौली कि इमरोज़ क्षमा रा मयस्सर शुदा अस्त जिहाद अकबर अस्त मुग़्तनम मि दानीद हल मिन मज़ेद बगुएद वायुं जिहाद गुफ़्तन रा ब अज़ जिहाद किश्तन दानीद’’
यानी आज का दिन वह दिन है कि थोड़े अमल को बड़े अज्र के इव्ज़ पूरी तवज्जो के साथ कबूल फरमाएं,अस्हाब कहफ़ से हजरत के अलावा दूसरा अमल ज़ाहिर नहीं है कि जिस ने यह ऐतबार पैदा कर लिया है,दुश्मनों के ग़लबा के वक़्त अगर सिपाही थोडी कोशिश करें तो बहुत ऐतबार रखती है इस के बुर खिलाफ़ दुश्मनों के अमन विस्कोन के वक़्त में,यह कौली जिहाद कि आज आप को मयस्सर हुआ है जिहाद अकबर है लिहाज़ा इस को गनीमत जानिए और ज्यादती के तालिब रहिये और इस कौली जिहाद को जंगी जिहाद से बेहतर शुमार कीजिए।
जो दूसरों से काम लेने के लिए उन के अंदर इतने जज़्बात पैदा कर रहा हैखुद इस के दिल में अहया दीन के लिए किया जज्बा होगा,दिल किस तरह तड़पता होगा,रूह को किस क़द्र बे चीनी होगी,रात वदन और सुबह विशाम किस बे चीनी में गुज़रते हूँ गे, तमन्ना तो
बहुत कुछ है और करने को जी तो बहुत चाहता है मगर:
‘‘इमसाल मा मर्दुम फ़िक़रा बे दस्त विपा अज़ीं दौलत महरूमियम؎
हनीया लार्बाब अलनईम नईमहा
वललाशिक अलमस्कीन मा यत्जरा
दादीम तरा अज़ गंज मकसूद निशां
गर मा नरसीदेम तो शायद बरसी
यानी हम जैसे फ़िक़रा बे दस्त विपा लोग इस दौलत से महरूम हैं, अस्हाब नेमत को उन की नेअमतें मुबारक हूँ और आशिक मिस्कीन के लिए रंज वग़म के घोंट,हम ने तुम्हें खजाना मकसूद का पता बता दिया अगर हम न पहुँचीं तो हो सकता है तुम ही पहुँच जाओ।
मक्तूब के आखिरी हिस्सा से मालूम होता है कि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू इस शहर में उन अय्याम में तशरीफ़ ले ग्ये थे जहां ख़ान आज़म थे वहीं से मक्तूब तहरीर फ़रमाकर उन्हें आमद की इत्तिला भी दी ग़ालिबा मुलाक़ात के मुतमन्नी थे मगर खिल कर कह न सके यह मालूम नहीं हो सिक्का कि इस सफर में मुलाक़ात हुई या नहीं? अपनी इस तवज्जो,मक्तूब नवीसी और उमरा से ताल्लुक की वजह भी ज़ाहिर फ़रमादी ताकि कोई यह न समझे कि इस ताल्लुक से कोई मादी मनफ़ात दरपेश है बल्कि सिर्फ़ इस्लाम और अहले इस्लाम के ग़लबा और इस की इज्जत और अहकाम कुफ्र वाहिल कुफ्र की बर्बादी विजिल्लत मकसूद है,फ़रमाते हैं कि हज़रत ख़्वाजा उबीद अल्लाह एहरार क़ुद्दिस अल्लाह सिर्रहू ने फ़रमाया कि अगर में शेखी करूँ(यानी मसंद मुशेख्त पर बैठ कर लोगों को सिर्फ़ मुरीद करूँ)तो कोई पीर आलम में मुरीद न पाए लेकिन मुझको दूसरा काम(सुपुर्द) फ़रमाया है और वह शरीअत की तरवेज और मिलित की ताईद है(इसी लिए)ला मुहाला बादशाहों की सोहबत में जाते थे और अपने तसर्फ़ से उन को मुतीअ करते थे और उन के वसीले से शरीअत की तरवेज फ़रमाते थे’’
ख़ान आज़म को अल्लाह तआला ने काफ़ी रोब विदबदबा और शौकत वहशमत अता फ़रमाई थी,और उन की बात बड़ी लायक तवज्जो समझी जाती थी,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू उन्हें याद दिलाते हैं कि आप की यह मक़बूलियत ,वजाहत और हशमत विशौकत किसी दुनयवी मन्सब की वजह से नहीं है बल्कि ख़ानवादा नक़्शबंदिया के अकाबिर क़ुद्दिस अल्लाह इसरारहम के साथ कलबी लगाव और मुहब्बत वाल्फत की वजह से है,अकाबिर से मुहब्बत का यह एहसान जता कर फिर ख़ान आज़म से इलतिमास करते हैं:
‘‘सई फ़रमायंद कि ला अकिल अहकाम कबीरा अहले कुफ्र कि दर अहले इस्लाम शिवई पैदा करदा इंद मुनहदिम विमंदिर्स गरदनद,अहले इस्लाम अज़ां मुनकरात महफूज़ मानन्द जज़ाकम अल्लाह सुब्हानहू इन्ना वाँ जमी उलमुस्लिमीन खेरालजज़ा’’
तर्जुमा: कोशिश फरमाएं कि कम अज़ कम अहले कुफ्र के बड़े अहकाम जो अहले इस्लाम में आम हो गए हैं ख़त्म हो जाएँ,अहले इस्लाम उन बुराइयों से महफूज़ रहीं अल्लाह सुब्हानहू व तआला आप को हमारी और तमाम मुसलमानों की तरफ़ से बेहतरीन जज़ा दे।
इस के बाद फ़रमाते हैं अकबरी दौर में अहले इस्लाम के साथ इनाद मफ़हूम होता था और इस सल्तनत जहांगीरी में बजाहिर वह इनाद नहीं है अगर है तो अदम इल्म की बुनियाद पर है,डर यह है कि इस जगह भी अंजाम कार इनाद तक पहुँचे और मुसलमानों पर मामला ज़्यादा तंग हो जाए‘‘तरस आँसुत कि मुबादा एं जा हम कार बानाद अंजामिद वबर मुसलमानां मामला तंग तर इफ़्तिद’’
शैख़ मुहम्मद इकराम पर आफ़ाक़ी तेवर:
आप देख रहे हैं कि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की नज़र ख़तरात पर किस तरह थी और क़ब्ल अज़ वक़्त इस के अज़ाला की तदबीर में लगे रहते थे,हैरत तो यह है कि तारीख नवीसी और तहक़ीक़ के दावेदारों को यह सब कुछ दिखाई नहीं दिया,शैख़ मुहम्मद इकराम जैसे लोगों की आंखों पर पट्टियां बंधी रह गईं,वह तिनके बटोर बटोर कर आशियाना बनाते रहे,जिस में तन्हा
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू न हूँ मिला अबदुलक़ादिर बदायूनी हलफ़िया बयान दे दे कर अकबरी इलहाद बयान करें तो शैख़ जी उसे मौसीक़ी वनग़मे करार दें,इस बे चारे मिला पर जगह जगह वह बुर्क गिराई है कि बयान से बाहर है,कसूर सिर्फ़ इतना है कि जिस अकबर से शैख़ जी को कलबी लगाव है इस की हिमाक़त वबद अकली और ज़हनी इलहाद को मिला साहिब ने बे नक़ाब कर दिया।
वही बातें हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू भी बयान करते हैं कि अकबरी फ़ित्नों ने इस्लाम और अहले इस्लाम को कण मुसीबतों से द्विचार करदिया था,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने मुतअद्दिद मक्तोबात और रिसाला इस्बात अलनबूत के दीबाचा में खिल के बयान फ़रमाया है मगर शैख़ जी मिला जी पर तो बुखार उतार गए अगर हज़रत मुजद्दिद पर उतारते तो उन्हें पता चल जाता कि आसमान पर थूकने का अंजाम किया होता है।
हक़ीक़त यह है कि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की मुजददाना बसीरत ने उमरा की तसख़ीर फ़रमाकर फिर रफ़्ता रफ़्ता जिस तरह जहांगीरी सल्तनत का रुख इस्लाम की तरफ़ मोड़ा है वह आप ही का हिस्सा था, उमरा की तसख़ीर से अवाम में जहांगीर की बे एतिदालियां बिलकुल बे असर हो कर रह गई थीं,सारे बड़े बड़े उमरा को आप ने इस तरह मुट्ठी में ले लिया था कि जहांगीर बिलकुल बे बस हो कर रह गया था।
जहांगीर में कोई मामूली बिगाड़ न था इस के बिगाड़ का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के विसाल से चंद साल क़ब्ल तक सजदा का रिवाज था,जिस के नतीजा में आप को कैद वबंद की मशक्कतें झेलना पड़ें,जहांगीर के हवाशी (साथ रहने वाले) इस वक़्त भी बहुत से उलमा-ए सौ थे जिन्हों ने हज़रत मुजद्दिद को क़त्ल कराने के लिए बहुत कुछ मुकर किए आखिर वह दाओ कैद वबंद की सूरत में ज़ाहिर हुआ,वही बिलआख़िर बादशाह की बे एतिदालयों के खातमा का सबब भी बना,इसी के ज़रिया आप को बादशाह के रूबरू कलिमा हक़ कहने का मौका मिला और अपने इल्म वामल,तक़्वा वतहारत और उलूम विमआरिफ़ से उसे ऐसा मुतास्सिर किया कि
बयान नहीं हो सकता है,आप एक कैदी की हैसियत से इस के साथ थे मगर इस मुजाहिद के आप जरा वार तो देखें,निडर पन और आला कलम अल्लाह की जसारत तो देखें आप को अंदाजा हो जाए गा कि हर मन्सब से दौर रह कर और कमाल अनुक़्ता अपना कर आप ने जिस तरह उमरा व वुज़रा वहकाम ओवर बिलआख़िर बादशाह को अपनी मुट्ठी में ले लिया वह हर एक से निराला तर्ज़ है।
अपने लिए कभी किसी मन्सब का इस्तेमाल किया न ही दौलत का,आखिर तक कमाल फक्र विद्रवेशी हाथों में रही और उमरा के वसीले से नहीं बल्कि शाही इताब के ज़रिया बादशाह तक पहुँच कर बादशाह को सच्चे इस्लाम से बालमशाफ़ा आशना किया और पूरे शाही खानदान को हमेशा के लिए अपनी गुलामी में दाखिल कर लिया।
बात चल रही थी उमरा वामाइदीन को दीनी ख़िदमात पर आमादा करने की लिहाज़ा इस सिलसिले में चंद इक़तिबास और मुलाहिजा फ़रमालें,सदर जहां जो कि जहांगीर के बचपन में तालीमी निगरां भी रहे थे अहद अकबरी में मामूली मन्सब के हामिल थे जहांगीर ने अपने दौर में उन को चार हजारी मन्सब पर फ़ाइज़ करदिया था,मक्तूब 149 में पहले तो उन्हें यह जेहन देते हैं कि शरीअत मुस्तफ़व्य की तरवेज और आदा दीन की तज़लील जब सेमुसलमानों ने सन्नी है बहुत खुश हैं इस पर अल्लाह इज़ विजल का शकर बजा लाते हैं फिर उन्हें यों उभारते हैं:
‘‘यकीन अस्त कि मुक़तदायान इस्लाम अज़ सादाद अजाम वालमए कराम दरख़िला विमलामक़सदी अज़दयाद अज़दाद एं दीन मतीन वितकमेल एं स्रात मुस्तक़ीम खोहहिंद बूद’’ यानी यकीन है कि इस्लाम के पेशवा सादाद अजाम और उलमा-ए कराम ख़लवत विजलोत में इस दीन मतीन की ज्यादती और इस स्रात मुस्तक़ीम की तकमील चाहें गे।
बादशाह को चूंकि इस वक़्त उलमा की तलब थी लिहाज़ा आप सदर जहां को बादशाह की इस बात पर एक तारीफ़ी जुमला इस्तेमाल करने के बाद बताते हैं कि उलमा-ए सौ ने अकबरी दौर में किया किया था सारा फसाद वबगाड़ उन का ही था,उन की ना ज़ेबा हरकतें बयान करने के बाद
उलमा-ए आख़िरत की फ़ज़ीलत बयान फ़रमाते हैं,फिर मक्तूब 195 के आगाज़ में बादशाह के उमूमी एहसानात और उन की वजह से आम्मा मख़लूक़ का बादशाहों से मुहब्बत का लगाव बयान फ़रमाते हैं और यह कि इस लगाव की वजह से बादशाह की खैर वस्लाह और शर वफसाद आम मख़लूक़ में फैलती है फिर एलिनास अला दीन मलूकहम के मक़ूले को बयान करने के बाद उन्हें यों जज़्बात ख़िदमात दीनी से सरशार करते हैं:
‘‘इकनों कि इंकलाब दौल बज़हूर पैवस्ता वसूरत इनाद अहले मिलल ब्रह्म शिकस्ता बुर अइम्मा इस्लाम अज़ सदूर अजाम वालमए कराम लाज़िम अस्त कि तमाम हिम्मत ख़ुद रा मसरूफ़ रिवाज शरीअत गुर्रा साख़ता दर बदायत अम्र अरकान इस्लाम मुनहदमा रा बुर पा साज़ंद कि दर तस्वीफ़ खैरियत ज़ाहिर निमी शव्द विदुलहाए गरीबां अज़ीं ताख़ीर दर इज़तिराब अस्त शिद्दतहाए क़र्न साबिक़ दर दिलहाए मुसलमानां मुतमकन अस्त मुबादा तलाफ़ी आन नशोद ग़ुरबत इस्लाम बत्तवील अंजामिद।’’
तर्जुमा: अब जब कि दौलतों का इंकलाब ज़ाहिर हुआ है और मिलित वालों के इनाद की तेजी टूट गई है अइम्मा इस्लाम बड़े बड़े सदूर (सदर की जमा) और उलमा-ए कराम पर लाज़िम है कि अपनी पूरी हिम्मत आगाज़ अम्र ही में ख़त्म शुदा अरकान इस्लाम को क़ायम करने में सिर्फ़ करें क्योंकि ताख़ीर में खैरियत ज़ाहिर नहीं होती है गरीबों के दिल इस ताख़ीर से बे चेन हैं,पहले जमाने की शिद्दतें मुसलमानों में बैठी हुई हैं कहीं उन की तलाफ़ी न हो और ग़ुरबत इस्लाम लंबी होजाए।
आप की बालिग नज़र हालात पर इतनी गहरी पकड़ रखती थी कि किस ढील से किया बुरे नताइज बुर आमद हो सकते हैं,जहांगीर की तख़्त नशीनी के बाद आप इतनी चुस्ती से काम ले रहे थे कि बस आप ही का हिस्सा है,आप को यह फ़िक्र खाये जा रही थी कि अगर कहीं ढील ढाल और तस्वीफ़ (टाल मटोल) से काम लिया गया तो मामला बिगड़ जाए गा,बादशाह की कम अहलीयत आप खूब जानते थे,अब अगर इस के हवारी सुस्त पड़ते तो हो सकता था कि फिर
इसी दुनिया दार उलमा के गिरोह को दखल हो जाता जिस ने अकबर को ज़लालत के नुकता आखिर तक पहुँचा दिया था,जहांगीर को इस मंज़िल तक पहुँचाना बहुत आसान था इस लिए कि बाप का नमूना सामने था और राह हमवार थी इस लिए आप क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं:
‘‘हर गाह बादशाहां रा गर्मी तरवेज सुन्नत सनेह मुस्तफ़व्य अला साहबहा अस्सलात वस्सलाम वालतहीत नबाशद विमुकुरबान ईशां नीज़ दरां बाब ख़ुदरा माफ़ दारणद वहयात चंद रोजा रा अजीज़ शमरंद कार बुर फ़िक़रा अहले इस्लाम बसयार तंग वतीरा ख़्वाहिद बूद अना लिल्लाह वाना इलिया राजावन,अज़ीज़े मि फ़रमायद؎
आँचा अज़ मिन गुम शुदा गर अज़ सुलीमाँ गुम शदे
हम सुलीमाँ हम परी हम अहरमन बिग्रेस्ती’’
तर्जुमा: जबकि बादशाहों को सुन्नत सनेह की गर्मी न हो और उन के मुक़रबीन भी अपने आप को इस मामला में माफ़ रखें और चंद रोजा ज़िन्दगी की क़द्र न करें तो फ़िक़राए अहले इस्लाम पर मामला बहुत तंग वतारीक हो जाए गा अना लिल्लाह वाना इलिया राजावन, एक बुजुर्ग फ़रमाते हैं: जो कुछ हम ने गुम किया है अगर सुलेमान से गुम हो जाता तो सुलेमान भी परी भी अहरमन भी रोते।
फिर इस्लाम की बर्बादी और अहले इस्लाम की जिल्लत वख़वारी की वजह से जो ख़ुद पर बीत रही थी उसे हज़रत फ़ातिमा रज़ि अल्लाह तआला अन्हा के इस शेअर से ताबीर फ़रमाते हैं؎
सब्लत अलै मसाइब लवान्न्हा
सब्लत अला इलाययाम सर्ण लियालिया
यानी जो मुसीबतें हम पर पड़ी हैं अगर वह दिनों पर पड़ जातें तो वह रात हो जाते।
फिर दौर अकबरी में जो शाइर मिट गए थे उन्हें में से काहियों और जजों का तक़र्र भी था आप इस की निशानदेही फ़रमाकर एक साहिब का नाम भी पेश करते हैं कि अगर मुनासिब समझें तो उन्हें शहर सरहिंद का क़ाज़ी मुक़रर फ़रमादें।
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के मक्तोबात से पता चलता है कि आप अरकान सल्तनत से
सिफारिश करके उलमा वस्ल्हा को नौकरियां भी दिलवाया करते थे,दरअसल यह भी आप की वसात नज़री का एक नमूना और दीन की अहम ख़िदमत थी,आप चाहतेथे कि नेक और सालिह उलमा के हाथ में अहकाम शरा का नफ़ाज़ आजाए ताकि दीन का सही काम जोर दार पैमाने पर हर जगह होने लगे।
आप पहले पढ़ चुके हैं कि जहांगीर के दौर में सब से जबरदस्त खतरा राफ़िज़ियों से था,यह लोग हुकूमत की नवाज़िशात से बड़े बड़े मंसबों पर फ़ाइज़ थे,यह फ़ित्ना कोई कम जान लेवा न था इस लिए आप जहां अकबरी दौर की फ़ित्ना सामान्यां बयान फ़रमाते हैं और महव शुदा अक़ाइद और अहकाम शरीअत की तरवेज वाशाअत पर उभारते हैं वहीं उन ख़ास ख़ास उमरा को अक़ाइद अहले सुन्नत की तरग़ीब और उन की तरवेज पर भी जोर देते हैं और इसी में निजात को मुनहसिर फ़रमाते हैं।
यह फ़िर्क़ा ज़ाला(अहले तश्यीय यानी रवाफ़िज़) बज़ाम ख़वेश अहले बीत की मुहब्बत का दाई है,सादाद कराम का नसबी ताल्लुक चूंकि इसी बुजुर्ग खानदान से है इसी लिए राफ़िज़ियों से क़ुरबत का इमकान बहुत ज़्यादा था इस का हम पहले तफ़सील से बयान कर चुके हैं,इसी खतरा की वजह से आप सादाद उमरा के नाम अक़ाइद अहले सुन्नत पर तफ़सीली मक्तोबात तहरीर फ़रमाते हैं,अहले बीत के ज़ाहिरी वबातिनी फ़ज़ाइल इस तौर पर बयान फ़रमाते हैं कि राफ़िज़ियों की भी अकलें दंग रह जाती हैं,मुहब्बत अहले बीत और उन की ख़िदमत इस तरह सुपुर्द कलम करते हैं कि राफ़िज़ी किया करे गा,आप दिखाते जाते हैं कि हम अहले सुन्नत से बढ़ कर कोई वाक़ई मुहब्बत किया करे गा और फिर राफ़िज़ियों का रद्द बलेग़ निहायत तफ़सील से फ़रमाते हैं,फिर उन्हें सादाद उमरा को उन के आबा कराम का वास्ता दे दे कर अक़ाइद अहले सुन्नत, दीन मतीन और सुन्नत सनेह की तरवेज वाशाअत पर उभारते हैं।
यह बातें आप को मुतअद्दिद मक्तोबात में मिलें गी इस का बयान आइंदा सफ़हात में कद
क़दरे तफ़सील से आये गा चंद इक़तिबास मुलाहिजा फरमाएं,सय्यद फरीद को मक्तूब 193 में अक़ाइद अहले सुन्नत का लाज़िम हो ना और शीयों का रद्द करने के बाद फ़रमाते हैं:
‘‘स्यादत पनाहा! मुकरमा! इमरोज़ इस्लाम बसयार गरीब अस्त जीतले कि इमरोज़ दर तक़वियत आं सिर्फ़ मि कनंद बकरोड़हा मि खरिंद ता कदाम शाहबाज़ रा बायं दौलत उज़्मा मुशर्रफ़ साज़ंद तरवेज दीन वितक़वियत मिलित दर हिम्मा वक़्त अज़ हर किस बौक़ूअ मि आयेद ज़ेबा अस्त वराना,अम्मा दरें वक़्त कि ग़ुरबत इस्लाम अस्त अज़ इमसाल क्षमा जवां मर्दान अहले बीत ज़ेबा तर वराना तर अस्त कि एं दौलत ख़ाना ज़ाद खानदान बुजुर्ग क्षमा अस्त अज़ क्षमा ज़ाती अस्त वा ज़दीगरां अर्जी।’’
तर्जुमा:स्यादत पनाह! मुकर्रम आज इस्लाम बहुत गरीब है जो पैसा कि आज इस की तक़वियत में खर्च करें करोड़ों के साथ खरीदें गे,देखते हैं कौन से शहबाज़ को इस अज़ीम दौलत से मुशर्रफ़ करते हैं!दीन की तरवेज और मिलित की तक़वियत हर वक़्त जिस से भी वाक़्य हो अच्छी है और खूब तर लेकिन इस वक़्त में कि इस्लाम की ग़ुरबत है तुम्हारे जैसे अहले बीत के जवां मुर्दों से बहुत अच्छी और खूब तर है यह दौलत तुम्हारे खानदान की ख़ाना ज़ाद है जो कि तुम्हारे लिए ज़ाती है और दूसरों के लिए अर्जी।
इस के बाद याद दिलाते हैं कि अगर चह शहज़ादगी की निस्बत सर्वर कोनेन ﷺ से आप को हासिल है लेकिन हक़ीक़त विरासत नबवी इस अम्र अज़ीम अलक़द्र की तहसील में है,इस के बाद आका ﷺ का यह इरशाद बयान फ़रमाते हैं कि सहाबा कराम रिज़वान अल्लाह अलैहिम अजमईन को मुखातिब करते हुए फ़रमाया था कि तुम ऐसे जमाने में मौजूद हो कि अवामिर वनवाही से अगर दसवां हिस्सा भी छोड़ू गे तो हलाक हो जाओगे और तुम्हारे बाद ऐसा गिरोह आये गा कि अगर दसवां हिस्सा भी उन से वक़ूअ में आये गा तो निजात पाएं गे फिर आप के अलफ़ाज़ यह हैं:
‘‘एं आन वक़्त अस्त वायुं गिरोह आन गिरोह؎
गोए तौफ़ीक़ वसआदत दरमियान अफ़्गंदा इंद
किस बमैदां निमी आयेद सवारां रा चह शद’’
यानी यह वही वक़्त है और यह गिरोह वही गिरोह है,तौफ़ीक़ और नेक बुख़ती की गेंद दरमियान में डाल दी है सवारों को किया हुआ कोई मैदान में नहीं आरहा है।
बादशाहों और उमरा वोज़रा के दरबार में उमूमा कुतुब दयनीय पढ़ी जाती थीं,मिसाइल वाहिकाम दयनीय सीखने का शौक था,आप क़ुद्दिस सिर्रहू को बराबर यह फ़िक्र रहा करती थी कि कहीं फ़ासद मज़ाहिब और बातिल अक़ाइद के हामिलियन मुसन्निफ़ीन की कुत्ता बें न पढ़ी जाएँ जो अक़ाइद वामाल के फसाद वबरबादी का सबब बिन जाएँ,इस जमाने में किताबें इतनी आम न थीं जितनी इस जमाने में हैं,इस लिए आप अपने मक्तोबात में नाफ़े किताबों के नाम लिख लिख कर भेजा करते थे और फ़ासदकताबों का रद्द फ़रमाया करते थे।
आप की बुलंदी नज़र का यह आलम था कि आप जानते थे कि इल्म कलाम में तहरीर शुदा कुतुब में जिस तरह मिसाइल जीर बहस आये हैं हो सकता है कि उन से सामे उलझ जाए और मसले की तहक़ीक़ वितशफ़ी न हो पाए और मुख़ालिफ़ की कोई बात जिम जाए इसी लिए अक़ाइद अहले सुन्नत पर मुश्तमिल आप ने उन उमरा के नाम तफ़सीली मक्तोबात तहरीर फ़रमाए हैं।
चनां चह ख़ान जहां जो कि बादशाह के मुक़रबीन ख़ास में से थेजहाँगीर उन पर काफ़ी एतिमाद करता था और बात मानता था हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू को उन की इसलाह का ख़ास ध्यान था,दफ्तर दोम में 15 सफ़हात पर मुश्तमिल अक़ाइद वामाल से मुताल्लिक़ निहायत जामा मक्तूब तहरीर फ़रमाया जिस में दीन के तमाम अहम मिसाइल बयान फ़रमाए,इसी तरह दीगर उमरा को तहरीर फ़रमाते आप जानते थे कि उन उमरा के लिए किस तरह की किताबों की ज़रूरत है,शैख़ फरीद को अक़ाइद के मुताल्लिक़ ज़रूरी बातें तहरीर करने के बाद फ़रमाते हैं:
‘‘उन अक़ाइद हुक्का की तसहीह के वास्ते इमाम उज्जल त्वरपश्ती का रिसाला बहुत मुनासिब है और
समझ के क़रीब है,ज़रूरी है कि मजलिस शरीफ़ में(इस का) ज़िक्र हुआ होगा लेकिन रिसाला मज़कूरा चूंकि इस्तिदलालात पर मबनी है और बहुत तूल वबस्त रखता है अगर ऐसा रिसाला हो जो कि खालिस मिसाइल को मुतज़िमन हो बेहतर और ज़्यादा मुनासिब होगा,दरें अस्ना हक़ीर के दिल में ख़याल आया कि इस बाब में रिसाला लिखे जो कि अक़ाइद अहले सुन्नत विजमाअत पर मुश्तमिल और मिसाइल अख़ज़ करने में आसान हो अगर मयस्सर हुआ तो लिख कर ख़िदमत में भेजे गा।’’
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की नज़र की वसात को आप देख रहे हैं बैक वक़्त इस मर्द हक़ आगाह को किया किया फ़िक्र थी औरकिया किया करना था आप इस से मक्तोबात की अहमियत का अंदाजा कर सकते हैं,उलमा के लिए कितना दर्स है कितनी इबरत है,आप ने तहरीर का यह ढंग किस मस्लिहत से अपनाया,आप चाहते तो मोटी मोटी कुत्ता बें तसनीफ़ फ़रमा सकते थे,दलायल वबराहीन के अंबार लगा सकते थे मगर चूंकि दीन की तबलीग़ मकसूद थी और हिक्मत के साथ मुखातिब के जेहन में बात को उतारदेना था,इसी लिए इख़तिसार के साथ हर ज़रूरी बात को कह जाते हैं,लब विलहजा की दुरुस्तगी और गुफ़्तगू की मतानित वसंजीदगी लफ़्ज़ लफ़्ज़ से फूटी पड़ती है,इस तरीके से आप चंद औराक़ में बहुत कुछ कह जाते हैं जिस के लिए बड़ी बड़ी कुत्ता बें दरकार होतीं।
छोटी छोटी बातों पर भी आप को कितनी नज़र हासिल थी जो कि ग़ायत दर्जा दीनी लग्न का नतीजा है,आप देखते कि फलां अमीर फलां ज़बान जानता है तो इस को इसी ज़बान की किताब की निशानदेही फ़रमाते,चनां चह शैख़ फरीद को टसहीह अक़ाइद के बाद कौन उलूम लाज़िम हैं उन को बयान करने के बाद उन के मुक़तज़ा पर अमल ज़रूरी करार देने के बाद फ़रमाते हैं:‘‘बाज़ी अज़ तलबा फ़रमायंद कि अज़ किताब फ़िक़्ह कि बाबारत फ़ारसी बूदा बाशद दर मजलिस ख़वांदा मि बाशिंद मसल मजमूआ ख़ानी वामद उलइस्लाम।’’
इस्लाम विकिफ़र दोनों एक दूसरे की ज़िद हैं,दोनों में किसी भी मरहला में किसी
भी किस्म का इत्तिहाद नहीं हो सकता है,इस्लाम वाहिल इस्लाम की इज्जत कुफ्र वाहिल कुफ्र की जिल्लत है,और कुफ्र वाहिल कुफ्र की इज्जत में इस्लाम और अहले इस्लाम की जिल्लत है,हज़रत मजद द क़ुद्दिस सिर्रहू जैसा इस्लाम का शैदाई और मुसलमानों का हमदर्द किस तरह कुफ्र और अहले कुफ्र के ग़लबा और इज्जत को बर्दाश्त कर ता,इस्लाम और अहले इस्लाम को अकबरी दौर में जो कुछ नुकसान पहुँचा वह उन्हें मुँह लगाने ही से पहुँचा है इसी लिए आप जगह जगह उन उमरा को कुफ्र वाहिल कुफ्र की ख़वारी विजिल्लत की रगबत दिलाते हैं,शैख़ फरीद को मक्तूब 193 में फ़रमाते हैं:
‘‘इज्जत इस्लाम वाहिल आन दर ख़वारी कुफ्र वाहिल कुफ्र मकसूद अज़ अख़ज़ जुज़्य ख़वारी कुफ़्फ़ार अस्त वाहांत ईशां हर क़द्र कि अहले कुफ्र दर इज्जत बाशिंद जिल्लत दर इस्लाम हमां क़द्र अस्त एं सर रिश्ता रा नेक बायद निगाह दाश्त वाक्सर मर्दुम एं सर रिश्ता रा गुम करदा इंद वाज़ शिवमी आं दीन रा बर्बाद दादा।’’
तर्जुमा:इस्लाम और अहले इस्लाम की इज्जत कुफ्र और अहले कुफ्र की ख़वारी में है,जुज़्य लेने से मकसूद कुफ़्फ़ार को ख़वार करना और उन की तौहीन करना है,जिस क़द्र कि अहले कुफ्र की इज्जत हो गी इसी क़द्र इस्लाम में जिल्लत है,इस सर रिश्ता को अच्छी तरह ध्यान में रखना चाहिए ,जबकि अक्सर लोगों ने इस सर रिश्ता को गुम कर रखा है और बदबख़ती से दीन को बर्बाद करदिया है।
फिर कुफ़्फ़ार के साथ जिहाद और उन पर शिद्दत वग़लज़त बायं तौर बयान फ़रमाते हैं:
‘‘क़ाल अल्लाह सुब्हानहू व तआला यजा यजुहा उन्नबीत जाहिदज़ अलकुफ़्फ़ार वालमुनाफ़क़ीन वागलज़ अलैहिम,जिहाद बा कुफ़्फ़ार वग़लज़त बुर ईशां अज़ जरूरीयात दीन अस्त।’’
अल्लाह सुब्हानहू व तआला ने फ़रमाया: ए नबी! कुफ़्फ़ार वुमुनाफ़क़ीन से जिहाद करू,काफ़िरों के साथ जिहाद और उन पर सख्ती जरूरीयात दीन में से है।
जहांगीर की इसलाह वितरबैत का काम चूंकि काफ़ी हद तक हो चुका था,और कुफ्र अहले कुफ्र से
कलबी लगाव बिलकुल ख़त्म हो चुका था यह इस्लाम के दर्दमंदों के ज़ख्मों पर बहुत बड़ा मरहम था,अब वह चाहते थे कि जब बादशाह पक्का मुसलमान है तो इस की हुकूमत में कुफ्री रसूम वादात क्यों जारी हैं? हां! जो कुफ्री रसूम वादात फैली हुई थीं उन के बारे में हो सकता है कि बादशाह को खबर न हो,नीज़ हसन ज़न का तक़ाज़ा भी यही था कि इस्लामी सल्तनत में कफ़रीय रसूम का जारी होना अदम इल्म की बना पर हो सकता है,लिहाज़ा आप मुसलमानों पर लाज़िम करार देते हैं कि बादशाह को उन रसूम से मतला करें क्योंकि उन का रफा इसी सूरत में हो सकता है कि बादशाह को इल्म हो,अब मसला यह था कि बादशाह तक हर एक की रसाई कैसे हो सकती है लिहाज़ा इस का तरीका बताते हैं कि वह उलमा-ए देनदार ही को कम अज़ कम मतला करदें,और कफ़रीय रसूम को मिटाने की कोशिश आप सिर्फ़ बादशाह ही तक महदूद नहीं रखते हैं बल्कि तमाम अवाम वख़वास,आलम वग़ैर आलम पर लाजिमी करार देते हो ए फ़रमाते हैं:
‘‘बकायाए रसूम कुफ्र कि दर क़र्न साबिक़ पैदा शुदा बूद दरें वक़्त कि बादशाह इस्लाम रा आं तवज्जो बाहुल कुफ्र निमांदा अस्त बसयार ग्रां अस्त,बुर मुसलमानां लाज़िम अस्त कि बादशाह इस्लाम रा अज़ ज़श्ती रसूम आं बद केशां आलाम बख्शंद विद्र दफा आन कोशंद,शायद बकायाए अनहा मबनी बाशदबर अदम इल्म बादशाह बज़श्ती आंहा अगर फ़ी अलजुमला गुंजाइश वक़्त याबंद बाज़े अज़ उलमा-ए अहले इस्लाम रा आलाम बख्शंद कि आमदा बुर शनाअत रसूम अहले कुफ्र।’’
तर्जुमा: कुफ्र की बकाया रस्में कि क़र्न साबिक़(दौर अकबरी) में पैदा हो गई थीं इस वक़्त में कि बादशाह इस्लाम को अहले कुफ्र की तरफ़ तवज्जो नहीं रही है बहुत ग्रां है,मुसलमानों पर लाज़िम है कि बादशाह इस्लाम को उन बद केशों की रस्मों की बुराई से मतला फरमाएं और उन के ख़त्म करने की कोशिश करें हो सकता है कि उन काफ़िरों की बकाया रसूम की जानकारी बादशाह को न हो,अगर कुछ वक़्त की गुंजाइश पाएं तो बाज़ उलमा-ए इस्लाम को इत्तिला दें कि वह अहले कुफ्र के रसूम की बुराई की खबर दें।
आप क़ुद्दिस सिर्रहू को हर हाल में कुफ्र वाहिल कुफ्र की जिल्लत वख़वारी मतलूब थी,आप चाहते थे कि उन का शीराज़ा मुंतशिर हो,उन की ताकत मुंतशिर हो क्योंकि इस में ही इस्लाम और अहले इस्लाम की इज्जत वताक़त है,उन ही अय्याम में गोबिंद मारा गया था और इस के हवारी भी फना के घाट उतरे थे,आप इस फेअल की मदह वस्ताइश करते हुए फ़रमाते हैं:
‘‘दरें वक़्त किश्तन काफ़िर लिएन गोबिंद व आल अव बसयार खूब वाक़्य शद,वबाइस शिकस्त अज़ीम बुर हनूद मर्दूद गश्त बह्र नियत कि किश्ता बाशिंद वबहर ग़रज़ी कि हलाक करदा ख़वारी कुफ़्फ़ार ख़ुद नकद वक़्त अहले इस्लाम अस्त,एं फ़क़ीर पेश अजांकि एं काफ़िर रा बक्शंद दर ख्वाब दीदा बूद कि बादशाह वक़्त कल्ला सर शिर्क रा शिकस्ता अस्त वालहक़ कि आं गब्बर रईस अहले शिर्क बूद वामाम अहले कुफ्र हज़लहम अल्लाह, व आं सर्वर दीन वदुनिया अलैहि अस्सलात वस्सलाम दर बाज़ अदीय ख़ुद अहले शिर्क रा बायं इबारत नफ़रें फर्मौदा इंद अललहम् शतित शिमलहम वफ़र्क़ जमाहम वखरब बनियान्हुम वख़्ज़हम अख़ज़ अजीज़ मुक़तदिर।’’
तर्जुमा: इस वक़्त काफ़िर लिएन गोबिंद और इस की औलाद का मारा जाना बहुत खूब वाक़्य हुआ और हनूद मर्दूद की बड़ी शिकस्त हुई,ख़्वाह किसी नियत और किसी ग़रज से इस को क़त्ल किया हो,बह्र हाल कुफ़्फ़ार की ख़वारी ख़ुद अहले इस्लाम के लिए नकद वक़्त है,इस फ़क़ीर ने इस काफ़िर के क़त्ल से पहले ख्वाब में देखा था कि बादशाह वक़्त ने शिर्क के सर की खोपड़ी को तोड़ा है,सही यह है कि वह काफ़िर अहले शिर्क का सरदार और अहले कुफ्र का पेशवा था ख़ज़लहम अल्लाह सुब्हानहू,और सर्वर दीन वदुनिया ﷺ ने अपनी बाज़ दुआओं में अहले शिर्क को इस इबारत के साथ लानत विनफ़रें फ़रमाई है: ए अल्लाह! तो उन की जमईयत को पुरा गंदा फ़रमा,और उन की जमात में तफ़र्क़ा डाल और उन के घरों को वीरान कर और उन को ऐसा पकड़ जैसे ग़ालिब ताक़तवर पकड़ता है!
कुफ्र वाहिल कुफ्र और काफ़िरों के माबूदों का बतलान बयान करते हुए मक्तूब 67 ज 2 में ख़ान जहां को मुखातिब करते हुए फ़रमाते हैं:
‘‘ता इज़हार हक़ीक़त इस्लाम नमूदा आयेद विबयान बतलान विष्णुआअत कुफ्र विकाफ्री मि करदा शव्द,कुफ्र ख़ुद ज़ाहिर अलबतलान सत हेच आकिली आं रा न पसंदद,दर बतलान आं रा बे तहाशी ज़ाहिर बायदसाख्त व आलाह बातिला ईशां रा बे तवक़्क़्फ़ नफ़ी बायद कुर्द, इलाह बरहक़ जल सुल्ताना बे तर्दद वबे शुबह ख़ालिक़ समावयित अस्त।’’
तर्जुमा:ताकि इस्लाम की हक़ीक़त ज़ाहिर की जा सके और कुफ्र विकाफ़िरों की शनाअत और बतलान को बयान किया जा सके,कुफ्र ख़ुद ज़ाहिर अलबतलान है कोई अक्लमंद उसे पसंद नहीं करे गा,इस के बतलान को बे तहाशा ज़ाहिर करना चाहिए और उन के बातिल ख़ुदाओं की बे तवक़्क़्फ़ नफ़ी करना चाहिए बुला शक विशुबा माबूद बरहक़ जल सुल्ताना आसमानों का पैदा करने वाला है।
इस के बाद आप ने तफ़सील से बुतों और माबूदइन बातिला की बे चारगी और दरमांदगी बयान फ़रमाई,फ़रमाते हैं:‘‘कभी सुना गया है कि काफ़िरों के बातिल माबूदों ने मच्छर को भी पैदा किया हो अगर चह सब इकट्ठे हो जाएँ और अगर मच्छर उन्हें काट ले और तकलीफ़ पहुँचाए तो अपनी हिफाज़त नहीं कर पाते हैं कजा यह कि दूसरों की हिफाज़त करें,अहले कुफ्र गोया इस अम्र(अपने माबूदों की दरमांदगी वाजिज़ी) की क़बाहत से वाकिफ़ हो गए इसी लिए यह कहते हैं कि यह माबूद हक़ सुबहानी की बारगाह में हमारे सिफारिशी हो M गे और हमें अल्लाह के नज़दीक करदें गे,बे अक्ल हैं उन्हें कहां से मालूम हो गया कि उन जमादात को सिफारिश की गुंजाइश होगी और हक़ सुब्हानहू व तआला शुरका की सिफारिश कि दर हक़ीक़त दुश्मनान दीन हैं अपने दुश्मनों के पुजारियों के हक़ में कबूल फ़रमाए गा!फिर एक मिसाल बयान फ़रमाके खूब खूब इस का रद्द फ़रमाया।’’
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की पूरी कोशिश यह थी कि यह उमरा व वुज़रा और अमाइदीन
सब के सब सच्चे मुसलमान, पके सन्नी और नेक इंसान बिन जाएँ,बादशाह के यही लोग क़रीब थे,आप जानते थे कि अगर यह सुधर ग्ये तो बादशाह सुधर जाए गा,नीज़ मुल्क उन ही के हवाला था जब यह राह मुस्तक़ीम पर गामज़न हूँ गे तो पूरी अवाम पर उन के असरात मुरत्तिब हूँ गे,इसी लिए उन पर बहुत खूब तवज्जो फ़रमाई और उन्ही बादशाह की तरबीयत के लिए भी उभारते थे,नूरजहां और दीगर शेई उमरा की वजह से बादशाह के शेई अक़ाइद के हामिल होजाने का बहुत कवी इमकान था,ख़ान जहां को चूंकि ग़ायत क़ुर्ब हासिल था इस लिए आप ने एक तवील मक्तूब दीन के महत्तम बालशान मिसाइल पर मुश्तमिल तहरीर फ़रमाया फिर आखिर में उन्हें ख़ुद याद दिलाया कि तुम किया कर सकते हो,और अल्लाह तआला के तुम पर किया एहसानात हैं? फ़रमाते हैं:
‘‘दौलते कि हज़रत हक़ सुब्हानहू व तआला क्षमा रा ब आं मुमताज़ साख़ता अस्त विमर्दुम अज़ां दौलत गाफिल इंद बल्कि नज़दीक अस्त कि क्षमा हम आं रा दर नियाबीद,आँसुत कि बादशाह वक़्त कि बहफ़्त पुश्त मुसलमान आमदा अस्त वाज़ अहले सुन्नत अस्त वहनफ़ी मजहब हर चंद चंद साल अस्त कि दरें अवान कि अवान क़ुर्ब कयामत अस्त वबाद अहद नुबुव्वत,बाज़ी अज़ तलबा उलूम बिश्वमी तमा कि नाशी अज़ ख़बस बातिन अस्त बामरा वसलातीन तक़र्ब जस्ता बरां खुशामद ईशां दर आमदनद विद्र दीन मतीन तश्कीकात नमोदनद शुबहा पैदा करदनद वसादा लौहान रा अज़ राह बरदनद।’’
तर्जुमा:जिस दौलत से अल्लाह सुब्हानहू व तआला ने आप को मुमताज़ किया है दूसरे लोग इस से गाफिल हैं बल्कि बहुत मुमकिन है कि आप भी इस को न जानते हूँ वह यह है कि बादशाह वक़्त सात पश्तों से मुसलमान है और अहले सुन्नत से है और हनफ़ी मजहब है,अगर चह चंद साल हुए कि इस वक़्त में कि क़ुर्ब कयामत और ज़माना नुबुव्वत से दूरी का वक़्त है बाज़ तालिबान उलूम तमा की नहूसत की वजह से जो कि बातिनी ख़बासत से पैदा है उमरा वसलातीन से क़ुरबत पैदा करके उन की खुशामद की राह से आये और दीन मतीन में
में शकूक डाले और शुबहात पैदा किए और सादा लोहों का रास्ता मारदिया।
फिर फ़रमाते हैं ऐसा अज़ीम उलशान बादशाह चूंकि अच्छी तरह आप की बात संता और कबूल करता है,कैसी दौलत है कि सराहतन या इशारतन कलिमा हक़ यानी कलिमा इस्लाम कि अहले सुन्नत विजमाअत शुक्रउल्लाह तआला सएहम के अक़ाइद के माफ़िक़ बादशाह के गोश् गुज़ार करें,फिर यों ताकीद करते हैं:
‘‘हर क़द्र कि गुंजाइश दानंद सखुन अहले हक़ रा अर्ज़ा दारीद बल्कि हमवारा मुत्रसद विमुंतजिर बाशीद कि तक़रीबे पैदा शव्द सखुन मजहब विमलत दरमियान आयेद’’
यानी जिस क़द्र गुंजाइश जानें अहले हक़ की बात पेश करें बल्कि हमेशा मुंतज़िर विमतलाशी रहीं कि जैसे मौका मिले मजहब विमलत की बात दरमियान में आ जाए।
फिर मक्तूब शरीफ़ के आखिर में बादशाह की इसलाह वितरबैत पर यों जोर देते हैं:
‘‘मालूम ईशां अस्त कि सुलतान कालरूह अस्त वसायरान कालजसद अगर रूह सालिह अस्त बदन सालिह विगर फ़ासद अस्त बदन फ़ासद सत पस दर इसलाह सुलतान को शेदन दर इसलाह जमी बनी आदिम को शेदन सत वासलाह दर इज़हार कलिमा इस्लाम अस्त बह्र रोष कि गुंजाइश वक़्त बाशद।’’
तर्जुमा: आप को मालूम है कि बादशाह रूह के मानन्द है और बाक़ी इनसाम जिसम की तरह अगर रूह दुरुस्त है बदन दुरुस्त है और अगर रूह खराब है बदन खराब,पस बादशाह की इसलाह में कोशिश करना तमाम बनी आदिम की इसलाह में कोशिश करना है,और इसलाह कलिमा इस्लाम केजाहिर करने में है वक़्त में जैसी गुंजाइश हो।
फिर मोतक़िदात अहले सुन्नत विजमाअत के लिए बादशाह के सिलसिले में यों जोर देते हैं:
‘‘वाज़ गुज़शत कलिमा इस्लाम अज़ मोतक़िदात अहले सुन्नत विजमाअत नीज़ गाह वबेगाह गोश् ज़िद बायद साख़त विरुद मजहब मुख़ालिफ़ बायद नमूद अगर एं दौलत मयस्सर गर्दद विरासत उज़्मा अज़ अंबिया अलैहिम
अस्सलवात वालतसलीमात बदस्त आयेद,शुमारा एं दौलत मुफ्त बदस्त आमदा अस्त क़द्र आं रा बदानंद ज़्यादा चह मुबालग़ा नुमायद हर चंद मुबालग़ा वाबराम एं जा मुस्तहसिन अस्त।’’
तर्जुमा:और अहले सुन्नत विजमाअत के अक़ाइद से कलिमा इस्लाम को वक़्त बे वक़्त गोश् गुजार करना चाहिए अगर यह दौलत मयस्सर हो जाए तो अंबिया अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात की विरासत उज़्मा हाथ आये गी और तुम को यह दौलत मुफ्त में हाथ आती है,इस की क़द्र जानें ज़्यादा किया मुबालग़ा करे हर चंद इस मक़ाम पर मुबालग़ा वासिरार अच्छा है।
फिर मक्तूब 54 दफ्तर सोम में उन्हें आगाह फ़रमाते हैं कि जो ताकत वक़्व्वत तुम्हें हासिल है अगर इस को दीनी ख़िदमात और शरीअत मुस्तफ़व्य अला मुसद्दिरहा अस्सलात वस्सलाम वालतहीत के बजा लाने के लिए इस्तेमाल करें तो यह अनबीए कराम अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात का काम होगा,हम जैसे फ़क़ीर अगर सालों जान खपाएं तब भी तुम्हारी गिर्द को भी नहीं पहुँच सकते हैं।
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू का एक कमाल यह भी है कि उन बड़े बड़े उमरा वामाइदीन के जाह विमन्सब के सामने कभी फक्र विद्रवेशी और तसव्वुफ़ वसलोक की तहक़ीर नहीं होने दी बल्कि हर मोड़ पर इस की अज़मत वबरतरी उन को बता ते हैं,इस से कई फायदे थे,एक तो तसव्वुफ़ वसलोक और रूहानियत को चार चांद लगे और सूफ़िया कराम का सर बुलंद रहा कि हमें जो दौलत ख़ालिक़ कायनात जल वाला ने अता फ़रमाई है इस के मुक़ाबिल उन दुनयवी कामयाबियों और ज़ाहिरी शान विशौकत की कोई हैसियत नहीं,लिहाज़ा इस से रूहानियत के हामिल अफराद के दिल दुनयवी जाह वहशमत की तरफ़ माइल होने से बच गए।
दोम यह कि उन अग़न्या को हर वक़्त इस चीज़ का एहसास रहता कि हम ख़्वाह कितने ही बड़े मन्सब के हामिल सही लेकिन हम अहले अल्लाह के मुहताज हैं,उन के कर्म और सहारे के बग़ैर हमारी किश्ती साहिल पर नहीं लग सकती है इस से उन उमरा वाग़निया का फ़िक़रा के साथ