अध्याय 5 में से 57पृष्ठ 78–88
फ़ित्ना रफ़्ज़ वितफ़जील
कैदों ने तो बुजुर्गों की मुक़रर की हुई सारी हदों पर छलांग लगा दी और वह कुछ कर दिखाया कि आज की कव्वालियों की महफ़िलें देख कर हर समझदार मातम कनां है,इस्लाम की धजियां बिखेर कर रख दें फिर भी सब से बड़ा क़ुर्ब इलाही का ज़रिया यही नाच गाना है।
(25) जुमा विजमाआत का तर्क,इबादत से अदम दिलचस्पी यह सिर्फ़ आज ही के सूफ़ियों का तरीका नहीं,ज़िक्र वफ़कर अपने मज़ऊम के मुताबिक ही ख़ुदा तक वस्ल का ज़रिया है बाक़ी कुछ नहीं इस की बना बहुत पहले पड़ चुकी थी ,फ़राइज़ वसंन में सस्ती विकाहली और अर्बईनात (चले) वरियाज़ात में मकसूद की तलाश विजस्तजू और इस का हुसूल पहले ही से ज़हनों में बसा हुआ है,फ़रमाते हैं:
''सूफ़िया ख़ाम ज़िक्र वफ़कर रा अज़ अहम महाम दानिस्ता दर अतियान फ़राइज़ वसंन मसा हिलात मि नमाईंद,वार्बईनात वरियाज़ात इख्तियार नमूदा तर्क जुमा विजमाआत मि कनंद''
यानी सूफ़िया ख़ाम ज़िक्र वफ़कर को सब से अहम जान कर फ़राइज़ वसंन की अदाएगी में सस्ती करते हैं और अर्बईनात(चिला कशी)वरियाज़ात इख्तियार करके जुमा और जमातें छोड़ते हैं।
इस जमाने के ख़ामकारों ने तो फरेब को नुकता आखिर तक पहुँचा दिया और तर्क जुमा विजमाआत पर ऐसा पर्दा डाला कि बड़े बड़े अय्यार विमकार हैरान विशषदर रह गए,सब को यही तास्सुर देते हैं कि उन की नमाज़ तो काबा में होती है भला ऐसी मुक़द्दस नमाज़ उन आम मस्जिदों और उन के इमामों के पीछे कहां हो सकती है,इसी लिए तो हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू को लिखना पड़ा:
''पैरान एं वक़्त अज़ ख़ुद बे खबर इंद ईमान रा अज़ कुफ्र जुदा निमी तवानंद कुर्द'' यानी इस जमाने के पीर अपने से बे खबर हैं ईमान को कुफ्र से जुदा नहीं कर सकते हैं।
(26)उन ख़ामकारों के लज़्ज़त नफ़्स का एक और रुख मुलाहिजा फरमाइये,जिस के
ज़रिया उन्हों ने हर खूबसूरत लड़के और लड़की और दीगर मुज़ाहिर जमेला को ताकने और देखने का बेहतरीन जवाज़ तलाश कर लियाथा और शहवात विजज़्बात की चिंगारियों को शोला बनाने वाली हर गज़ल और गाने को सुनने का नेक रास्ता तलाश कर लिया था:
''बाज़े अज़ सूफ़िया ब मुज़ाहिर जमेला वनग़मात मुस्तहसिंह गिरफ्तार इंद ब तख़ील आंका एं जमाल वहसन मुस्तआर अज़ कमालात हज़रत वाजिब उलवजूद तआला वितक़दस कि दरें मुज़ाहिर ज़ुहूर फर्मौदा अस्त वायुं गिरफ्तारी रा नेक विमुस्तहसिन अंगारिंद बल्कि राह वसूल तसोर मि नमाईंद''
तर्जुमा:बाज़ सोफी हसीन विजमेल सूरतों और नग़मा में गिरफ्तार हैं यह ख़याल करके कि यह हसन वजमाल हज़रत वाजिब उलवजूद के कमालात से मुस्तआर है कि उन सूरतों और पीकरों में इस ने ज़ुहूर फ़रमाया है ,इस की गिरफ्तारी नेक और अच्छा जानते हैं बल्कि राह वसूल तसोर करते हैं।
जब उन हसीनों को दीदार ख़ुदा तक पहुँचने का सबब और ज़रिया बना दिया गयाक्योंकि सब में वही ज़ाहिर है सब इस की तजलियाँ हैं तो अब किया था नफ़्स परस्ती विषहवत रानी की तमाम राहें कुशादा हो गईं हिजाबात और ग़ज़ बस्र के सारे अहकाम का खातमा कितने हसीन अंदाज़ में करदिया गया बल्कि यह तास्सुर दे दिया गया कि उन की वजह से निरे लोग मार्फत से महरूम हो गए वर्ना ना मालूम उन के ज़रिया कितनी आसानी से हर एक को मंज़िल इरफान हासिल हो जाती।
जरा उन का हाल देखिए सूफ़िया कराम के यहाँ उलमिजाज़ कंतरत उलहक़ीक़त याने मिजाज़ हक़ीक़त का पल है,आरिफ़ों ने उसे किसी मक़ाम के लिए कहा था मगर उन सूफ़िया ख़ाम ने अपनी हवस नफ़्स का इस से पूरा सामान मुहैया करलिया:
''अबलहान सूफ़िया ख़ाम माना एं इबारत रा न फ़हमीदा गलत करदा गिरफ्तारीहा बसूर जमेला पैदा कनंद वबाश्वा विलाल अनहा फ़रेफ़्ता गरदनद बतमा आंका आंरा वसीला वसूल बहक़ीक़त साज़ंद विमेराज हुसूल मतलूब नमाईंद''
तर्जुमा: कुछ बे वक़ूफ़ सूफ़िया ख़ाम ने इस इबारत के माना न समझे,गलत करके हसीन सूरतों के साथ लगाव पैदा किया और उन हसीनों के नाज़ नख़रों और अदाओं पर फ़रेफ़्ता हो गए,इस लालच में कि उन को हक़ीक़त तक वसूल का ज़रिया बनाएं और हुसूल मतलूब की मेराज हासिल करें।
कुछ अहमक़ तो उन हसीनों को ज़रिया वोसीला ही समझते रहे मगर उन में जो ज़्यादा मिन चले थे वह तो यहाँ तक पहुँच गए:
''जुमे अज़ीनहा हसन वजमाल एन सूरत रा हसन हक़ दानिस्ता जल शाना गिरफ्तारी ब अनहा गिरफ्तारी ब हक़ मि दानंद विमुशाहिदा आंहा रा मुशाहिदा हक़ मि अंगारिंद''
तर्जुमा:कुछ बे वक़ूफ़ों ने उन सूरतों के हसन वजमाल को हक़ का हसन वजमाल जाना जल शाना,उन के साथ गिरफ्तारी बईना हक़ के साथ गिरफ्तारी जानते हैं और उन का मुशाहिदा हक़ का मुशाहिदा समझते हैं'' अब ज़ाहिर है जब वह हसन निहां इस तरह अयाँ है तो फिर वादा फ़र्दा आखिर किस लिए है हैरानी होनी भी चाहिए थी:
''बाज़े अज़ीनहा गुफ़्ता इंद؎
इमरोज़ चों जमाल तो बे पर्दा ज़ाहिर अस्त
दर हैरतम कि वादा फ़र्दा बराए चीस्त
(मक्तूब 66 ज3)
आज के दिन जब तेरा जमाल बे पर्दा ज़ाहिर है तो में हैरान हूँ कि कल (आख़िरत) का वादा किस वास्ते है।
यह तो शरीअत के मुताल्लिक़ अक़ाइद वामाल थे जिन्हें हवस का निशाना बनाया जारहा था , कौन था जो उन की ज़बान पर लगाम लगाता,जबह विदस्तार के रोब से हर एक डरता था कि कहीं उन की बद दुआएं हलाक न कर दें,बातिन के ढोंग ने अवाम को बे वक़ूफ़ समझ कर
उन्हें खूब हलक़ा इरादत में समेटा,रह गए उलमा तो वह बे चारे करते ही किया उन की संता कौन था ,उन ही का डरथा तो उन का रास्ता यह कह कर साफ करदिया गया कि उलमा वसूफ़िया की कभी नहीं बनी,उन्हों ने मंसूर को दार पर चढ़वाया और सरमद को शहीद करवादिया।
आप देखते जाइये इस हजार साल में किया किया गया, सारे कमालात का हुसूल जिस शरीअत से सर्वर कौन विमकां ﷺ ने वाबस्ता फ़रमाया था इस के ख़िरमन पर इस तरह बिजलियाँ गिराई जारही थीं,फिर उन की गुफ़्तगू के लब विलहजे भी देखने के लायक हैं,उलमा तो बे चारे इस्तिदलाली मशहूर ही हैं मगर यह ख़ाम लोग किस अय्यारी से अपनी ख़ाहिशात नफ़्स की तकमील कर रहे थे और औलीए कामलियन की सकर विमस्ती में निकली हुई बातों के किस क़द्र नाजायज़ फायदे हासिल कर रहे थे मज़ेद कुछ आ गे आये गा अब उन की रूदाद को यहीं ख़त्म करते हैं।
फ़ित्ना रफ़्ज़ वितफ़जील:
हिंदोस्तान में जब इस्लाम आया तो यह इल्म व फजल और मजहब हक़ अहले सुन्नत विजमाअत का गहवारा रहा,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू अपने रिसाला रद्द शीया में हिंदोस्तान की इल्मी विमज़हबी तारीख बड़े मुख़्तसर अंदाज़ में यों तहरीर फ़रमाते हैं''लेकिन जिस वक़्त से हिंदोस्तान में इस्लाम ज़ाहिर हुआ है और बादशाहान इस्लाम ने ग़लबा पाया है और मशाइख़ अजाम वावलियाए कराम अतराफ़ विजवानब से तशरीफ़ लाये हैं मुआलिम दीनी और इस्लामी निशानात ज़माँ ज़माँ तरक्की और ज्यादती पर हैं और तमाम मुमालिक पर एक वजह से नहीं बल्कि कई वजूह से मज़ियत (ख़ुसूसीयत) वफ़ज़ीलत रखता है कि इस के तमाम बाशिंदे अहले इस्लाम से अक़ीदा हुक्का अहले सुन्नत विजमाअत पर हैं और अहले बिद्दत वज़लालत का कोई निशान उन में ज़ाहिर नहीं है,और पसंदीदा तरीका हनफ़ी रखते हैं,हत्ता कि अगर बिलफ़र्ज़ कोई शख्स जो कि मजहब शाफ़ई या हनबली रखता हो ढूँढें तो न पाएं और हर चंदे मज़ाहिब अहले हक़ के ह
हैं लेकिन ख़ाहिशात नफ़्स वबद्दत सेराह गुरेज प्रकारबन्द हैं"
इस के बाद आप हज़रत अमीर खुसरो रहमत अल्लाह अलैहि के चौदह शेअर फ़ारसी के नकल फ़रमाते हैं जिन में उन्हों ने निहायत दिलकश अंदाज़ में हिंदोस्तान की मजहबी विमली इस्लामी तारीख बयान फ़रमाई है,फिर फ़रमाते हैं:
''तक़रीबा पांच सौ साल इसी तरह वलताफ़त के रहे यहाँ तक कि ख़ाक़ान आज़म अब्द अल्लाह ख़ाँ के बाद कि शीयों ने इस दयार में ग़लबा विषयवा पैदा कर लिया था बाज़ मक़्तूल हुए और बाज़ दूसरे जिला वतन हो कर हिंदोस्तान आये और यहाँ के हाकिमों और बादशाहों से क़ुरबत पैदा की ,बाज़ नादानों को गड्ढे हुए मुक़द्दमात और मुलम्मा शुदा मुग़ालतात से गुमराह किया और हर चंद अक़लेम खुरासान में फ़ित्ना वफसाद सर्द पड़ गया और मुसलमानों ने इस की शरारत से छुटकारा हासिल किया लेकिन उन बद केशों के बुरे क़दम आने से दयार हिंद में मुसलमानों में बड़ा फ़ुतूर वाक़्य हुआ और फ़ित्ना पूरे तौर पर पैदा हुआ''
यह है मुख़्तसर तारीख इस फ़ित्ना शीया की जिस ने हिंदोस्तान की पर सुकून मजहबी फ़िज़ा को मसमूम करदिया फिर किया था उन इस्लाम के रहज़नों का सिलसिला ऐसा शुरू हो अ कि हर एक गोया हिंदोस्तान के लिए भूका बैठा था,उधर बद किस्मती से जब हुमायूँ ने 1540 में शेर शाह से शिकस्त खाई और काफ़ी दिनों तक वह संध और राजपूताना के रेगिस्तान में मारा मारा फिरता रहा यहीं उम्र कोट के मक़ाम पर ख़ाना बदोशी के अय्याम में अकबर पैदा हुआ,जब वह मायूस हो गया तो इस ने ईरान का रुख किया और वहाँ के बादशाह शाह तहमासिप सफ़वी ने खूब आओ भगत की,वहाँ हुमायूँ काफ़ी अरसा रहा फिर इस के तआवुन पर 1545 में कंधार फिर 1550 में काबुल फतेह करलिया और फिर 1555 में हिंदुस्ता न का रुख किया और दिहली, आग्रह पर काबिज हो गया।
हुमायूँ ने मदद वाआनत के लालच में शीयों से बहुत कुछ क़ुरबत इख्तियार कर ली
थी यहाँ तक कि बाज़ मुअर्रिख़ीन ने उसे शीया तक लिख दिया है बह्र कैफ़ सफ़वी ने जो मदद की इस की मन्नत शनासी में शीयों को खूब फ़रोग़ हासिल हुआ,बेशुमार उलमा,शोअरा,सिपाही और उमरा हिंदोस्तान में हुमायूँ के साथ दाखिल हुए,बाज़ मुअर्रिख़ीन लिखते हैं कि सफ़वी ने हुमायूँ की इमदाद ही इस शर्त पर की थी कि वह शीया अक़ाइद वामाल की तरवेज वाशाअत करे गा।
हुमायूँ के बाद उन की इस वक़्त बहुत आमद शुरू हुई जब शाह इस्माईल सानी ने 1576 में मजहब अहले सुन्नत विजमाअत इख्तियार कर लिया,अक़ाइद अहले सुन्नत के इस अर्जी फ़रोग़ ने उन की हयात की दुनिया तंग करदी तो उन्हें हिंदोस्तान ही अपना मावा विमलजा नज़र आया।
हुमायूँ के दौर हुकूमत में ज़्यादा तर अमल दखल शीयों का हो गया था ,यहाँ तक कि हुमायूँ का वजीर बैरम ख़ान ख़ुद शीया था,अकबर के दौर में सब से पहले शैख़ उलइस्लाम का ओहदा शैख़ गदाई ने संभाला यह ख़ुद शीया था ,इस तरह उन्हें अकबर के अहद में फ़ित्ना रफ़्ज़ वितशीय को फ़रोग़ देने का ज़बर दस्त मौका हाथ आज्ञा,फिर यह फ़ित्ना बढ़ता ही रहा यहाँ तक कि जहांगीर के अहद में पूरे शबाब पर पहुँच गया यहाँ तक कि तज़क जहांगीरी में नुरुद्दीन जहांगीर का यह एतराफ़ मौजूद है:
‘‘दर दौलत पादशाही मिन हाला दर दस्त एं सिलसिला अस्त पिदर दीवान कल,पसर वकील मुतअल्लिक़ दुख़तर हमराज़ विमसाहिब’’
यानी अब मेरी सारी बादशाही इसी सिलसिला(नूर जहां और इस के घर वालों) के हाथ में है,इस का बाप दीवान कल है और बेटा(नूर जहां का भाई आसिफ ख़ान)वकील मुतअल्लिक़ और बेटी(नूरजहां) हमराज़ वहम सोहबत।
शाही उमूर पर इस तरह तसल्लुत और कब्जा के बाद उन्हों ने किया कुछ नहीं किया मजहब
हक़ अहले सुन्नत विजमाअत को मिटाने में कोई कसर न उठा रखी थी,इस तबाह कण और हौलनाक मंज़र को देख कर हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू का कलेजा मुँह को आता था ग़ैरत इस्लामी और मुहब्बत दीनी वायुमानी के जोश ने रात वदन का सुकून छीन लिया था,ख़ुलफ़ा सलासा व हज़रत आयशा रिज़वान अल्लाह अलैहिम अजमईन से मुताल्लिक़ उन के मुख़्तसर अक़ाइद वंज़रियात बयान करने के बाद फ़रमाते हैं:
‘‘ एं फ़क़ीर हर चंददर मजालिस विमआरक मुशाफ़ह ब मुक़द्दमात माकूला वमनकूला रद्द आंहा कुर्द वबर गलतहाए सरीहा ईशान इत्तिला मि दाद अम्मा हमीयत इस्लाम वर्ग फ़ारूक़ीम ब एं क़द्र रद्द विल्जाम किफायत न कुर्द व शोरिश सीना बे कीना तश्फ़ी नियाफ़्त ब खातिर फ़ातिर करार याफत कि इज़हार मुफ़ासद ईशान वाबताल मुतालिब एं बद केशां ता जमाने कि दर कैद कुत्ता बुत विद्र।।। तहरीर न दर आयेद फायदा तमाम वंफा आम न बख्शद’’(रिसाला रद्द शीया)
तर्जुमा: इस फ़क़ीर ने हर चंद मजलिसों और मुनाज़रों में रूबरू माकूल वमनक़ूल मुक़द्दमात के ज़रिया उन का रद्द किया और उन की खुली हुई गलतियों पर इत्तिला दी मगर इस्लाम की हिमायत और मेरी रग फ़ारूक़ी ने इस क़द्र रद्द विल्जाम पर किफायत न की और बे कीना सीना के जोश ने तश्फ़ी न पाई तो मुंतशिर दिल ने ठान लिया कि उन के फ़सादाद का इज़हार और बद केशों के मुतालिब का अबताल जब तक कैद किताबत और महल तहरीर में नहीं आये गा इस वक़्त तक पूरा फायदा और आम नफा नहीं बख़्शे गा।
यह फ़ित्ना इतना जबरदस्त था कि जाहिल वनादान जहां अग़वा वाज़लाल के पर फरेब दामन में आरहे थे वहीं बड़े बड़े आबिद वज़ाहिद विमुत्तक़ी अहले इल्म भी यक गुना मुतास्सिर हो रहे थे ,क्योंकि यह फ़िर्क़ा आगाज़ ही से मो क़ा शनास रहा है और अय्यारी विमकारी में नुकता आखिर पर फ़ाइज़ रहा ,तक़िया उन का शआर रहा।
निहायत हो श्यारी से उन लोगों ने अपना काम किया, शाही खजानों के मुँह खोल
दिए थे ,जूद वाता के नाम पर लोगों को क़रीब करके अपनी अय्यारियों पर पर्दा डाल कर दाम फरेब में फांसते थे ,और जहां जैसा मौकेदेखते थे वेसी बोली बोलते थे, इस फ़ित्ना ने तफ़ज़ीलियत को जन्म दिया और निरे वह उलमा वस्ल्हा जो उन के अक़ाइद बातिला के हामिल तो न हो सके मगर हज़रत उसमान पर हज़रत अली की तफ़ज़ीलियत के कायल हो गए रज़ि अल्लाह तआला अन्हुमा।
इसी फ़ित्ने का असर है कि निरे सादाद शीया मजहब के पैरोकार हो गए क्योंकि बज़ाम ख़वेश हज़रत अली और उन की नस्ल पाक से सच्ची मुहब्बत के दावेदार यही थे ,हर शख्स को फ़ित्री तौर पर अपने बुजुर्गों से लगाव हो ता है,मेरे ख़याल में इसी चीज़ ने सादाद को उन से क़रीब किया और वह गलत फ़हमी का शिकार हो गए,आज इस दौर जहालत में में देख रहा हूँ कि यह वबा आम होती जा रही है अक्सर वह जगहें जहां इस फ़िर्क़ा ज़ाला से क़ुर्ब मकानी है वहाँ देखा जाता है कि कट्टर सन्नी हो कर भी हज़रत अमीर मुआवीया और उन के साथियों के बारे में तरह तरह की मोशगाफियाँ करके तौहीन वतन्क़ीस के मुर्तक़िब हो ते हैं,तफ़ज़ील अली रज़ि अल्लाह अन्हु का इज़हार करते हैं या कम अज़ कम एतिक़ाद रखते हैं।
अब जरा उन अक़ाइद वंज़रियात की एक मुख़्तसर फिहरिस्त भी देख लें जिन की तरवेज वाशाअत में शाही अमला के साथ साथ उन के बड़े बड़े गुरु और पीर मुग़ां और इल्म वफ़न और ज़हद वितक़्वा का ज़ाहिरी लुबादा ओढ़ कर ईमान वाक़ाइद हुक्का की नकब ज़नी कर रहे थेऔर छोटे बड़े सभी किश्त ज़ार हिंदोस्तान को तबाह वबरबाद करने के चक्र में थे।
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने उन्हें जमा करके उन्हें चौदह किस्मों में बयान किया है और उन के मुख़्तसर अक़ाइद भी हर फ़िरक़े के अलग अलग बयान किए हैं,उन्हें से ताइफा सबाईया का अक़ीदा यह है कि हज़रत अली ख़ुदा हैं और इब्न मुलजिम ने हज़रत अली को नहीं शहीद किया था बल्कि शैतान को क़त्ल किया जो कि हज़रत अली की सूरत में आया था,हज़रत अली
बादल में हैं बादलों में जो कड़क हो ती है यह उन्हें की आवाज़ है और बिजली जो चमकती है वह उन्हें का कोड़ा है यही वजह है कि इस फ़िर्क़ा के लोग जब बादल के गरजने की आवाज़ सुनते हैं तो कहते हैं इलेक् अस्सलाम या अमीर उलमोमिनीन!।
उन में से ताइफा कामलय के लोग सहाबा कराम रिज़वान अल्लाह अजमईन को काफ़िर कहते हैं इस वजह से कि उन्हों ने हज़रत अली की बीअत तर्क की और हज़रत अली की तकफ़ीर करते हैं कि उन्हों ने अपना हक़ तलब क्यों नहीं किया ?
उन ही से एक गिरोह तनासुख़ का कायल है और यह भी कहता है कि ख़ुदा की रूह ने सब से पहले हज़रत आदिम में हलूल किया इस के बाद हज़रत शीस और इसी तरह अनबीए कराम वाइमा अजाम में यहाँ तक कि यह सिलसिला हज़रत अली और उन की औलाद पर जा के ख़त्म हुआ,इस के बाद अबदुल्लाह में इस ने हलूल किया,यह गिरोह कयामत का ,मुनकर है और मुहरमात को हलाल जानता है।
उन ही में से एक ताइफा मंसूरीय है जो कहता है कि नुबुव्वत मुनक़ते नहीं हुई और जन्नत इस इमाम से इबारत है जिस की मुहब्बत के हम मामूर हैं और दोज़ख से मुराद वह शख्स हैजिस के बुग़ज़ का हमें हुक्म दिया गया है और मुहरमात से मुराद वह ताइफा है जिन के बुग़ज़ के हम मामूर हैं।
उन में से एक गिरोह कहता है कि जन्नत दुनिया की नेअमतें हैं और दुनिया के आलाम नार यानी दोज़ख हैं,दुनिया हर गज़ फ़ानी न हो गी और मुहरमात वितरक फ़राइज़ को यह लोग जायज़ विमबाह समझते हैं।
उन में एक फ़िर्क़ा इस्माईलीय है जो बातिन कुरआन का कायल है,ज़ाहिर से इंकार करतेहैं,उन का कहना है कि बातिन को ज़ाहिर के साथ वही निस्बत है जो मग़ज़ को छिलके से,और जो ज़ाहिर से इस्तिदलाल करते हैं वह इस अज़ाब का शिकार हैं जो अवामिर के बजा लाने
और नवाही से परहेज़ करने में है,मुहरमात को यह भी मुबाह कहते हैं,मुहम्मद महदी को रसूल ख़याल करते हैं,उन की असल दावत शराए वाहिकाम का अबताल है,अहकाम शरा में शकूक शुबहात पैदा करते हैं,हाइज़ा अव्रत पर रोज़ों की क़ज़ा क्यों है नमाज़ की क्यों नहीं?ग़ुस्ल मनी से क्यों वाजिब होता है पेशाब से क्यों नहीं होता,ऐसा क्यों है कि बाज़ नमाज़ चार, बाज़ तीन बाज़ दो रकात फर्ज़ हुईं?
इस तरह यह गिरोह शराए की फ़ासद तावीलात करता है मसला उन का कहना है कि वुज़ू से मुराद इमाम की मवालात और मुहब्बत है,नमाज़ से मुराद रसूल है और इस को आयत करीमा:
अन् अस्सलात तन्हा अन अलफ़्हशा वालमनकर
से साबित करते हैं,एहतिलाम से मुराद ना अहले के सामने राज़ को फ़ाश करना और ग़ुस्ल से तजदीद अहद मुराद है,ज़कात से नफ़्स का तज़किया मुराद है,काबा से मुराद नबी,बाब से अली,सफ़ा मुहम्मद,मरोह अली,सात चक्र तवाफ़ से अइम्मा सबा की मवालात मुराद लेते हैं,जन्नत से मुराद राहत अब्दान और दोज़ख से अब्दान का मशक्कतों का शिकार होना मुराद है।
ख़ुदा विंद क़ुद्दूस के बारे में यह अक़ीदा है कि वह न मौजूद है न मादूम,न आलम है न जाहिल,न कादर है न आजिज़ उलग़र्ज़ इसी तरह खुराफ़ात की बातें करते हैं।
उन में से एक फ़िर्क़ा ज़ैद्य है उन में तीन गिरोह हैं एक कहता है कि हज़रत अली की खिलाफत नस ख़फ़ी से साबित है यह गिरोह सहाबा कराम की तकफ़ीर करता है इस बुनियाद पर कि उन्हों ने हज़रत अली रज़ि अल्लाह अन्हु से बीअत तर्क की,दूसरा गिरोह अगर चह शेख़ीन क्रीमियन की तकफ़ीरोतफ़सीक़ नहीं करता है या आम सहाबा को काफ़िर नहीं कहता है लेकिन हज़रत उसमान वतलहा वज़बेर वायशा रज़ि अल्लाह अन्हुम की तकफ़ीर का कायल है।
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि इस जमाने के अक्सर ज़ैद्य मुक़ल्लिद हैं उसूल में उन का रुजू मोतज़िला की जानिब है और फ़ुरू में हज़रत इमाम आज़म अबूहनीफा
यह में ने चंद फ़िर्क़ों के वह अक़ाइद कलम बंद किए हैं जिन का आम तौर पर शीयों में इर्तिकाब है वर्ना उन लोगों ने ऐसे ऐसे गलत और फ़ासद अक़ाइद गड्ढे और बाज़ तो शिर्क की हद तक पहुँचे हुए हैं,अगरचे उन का बतलान ज़्यादा राइज होने की वजह से वह ज़्यादा राइज न हो सके।
फिर ढटाई की इन्तहा यह कि अपने वाज़िह उलफसाद और बेन अलाबताल अक़ाइद वामाल में इस्तिदलाल वास्तुशहाद ऐसे अंदाज़ में कुरआन वहदेस से करते थे कि अवाम तो अवाम पढ़े लिखे लोग तक धोका खा जाएँ,वाक़ा क़िरतास वगैरह से उमूर वाज़िह और रोशन हैं।
हक़ीक़त यह है कि अकबर के बातिल वफ़ासद खयालात ज़्यादा तर ऐसे थे जो ज़्यादा दिनों तक चलने वाले न थे अगरचे अपनी ज़लालत विगमरही का शिकार बुज़ूर सल्तनत बहुत से अवाम वख़वास को किया ,और उलमा-ए सौ का घनावना किरदार इस में कभी फ़रामोश नहीं किया जा सकताहै मगर जहांगीर के दौर में सब से ज़्यादा मजहब हक़ और ईमान को खतरा इसी फ़िर्क़ा शीया से हो गया था।