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Allama Afaque Ahmad Mujaddidiतजदीद अल्फ़ सानीहदीस तजदीद और इस की तख़रीज

अध्याय 29 में से 57पृष्ठ 393–409

हदीस तजदीद और इस की तख़रीज

हुज़ूर सर्वर कोनेन ﷺ का इरशाद ग्रामी है:‘‘उन अल्लाह इज़ विजल यबास लिहाज़ा अलाम अला रास कल माइत सन् मिन यजदद लहा दीन्हा’’ यानी अल्लाह अज़्ज़ व जल्ल हर सौ साल के सरे पर किसी ऐसे को भेजे गा जो इस के दीन को निया और ताजे करे गा।

अबू दाऊद ने बाब मा युज़िक्र फ़ी क़र्न अलमाय में रिवायत किया है हाकिम ने भी उसे अपनी मुस्तदरक में रिवायत किया है,मुश्का में अबू दाऊद के हवाला से किताब अलालम फसल दोम में ज़िक्र किया है,हज़रत मिला अली क़ारी अलैहि रहमत अलबारी ने मरक़ा शरह मुश्का में मज़कूरा बाला कुतुब के अलावा तबरानी की मुअज्जम औसत का भी हवाला दिया है और इस की संद वर्जाल के बारे में फ़रमाया है कि इस की संद सही है और इस के सभी रिजाल सका(काबिल एतिमाद) हैं इस के अलावा भी दीगर कुतुब अहादीस में इस को ज़िक्र किया गया है।

तजदीद का मफ़हूम हदीस की रोशनी में:

मुजद्दिद या तजदीद की इस्तिलाह इसी हदीस बाला से ली गई है,हज़रत मिला अली क़ारी अलैहि रहमत अलबारी ने इस हदीस के बयान में हज़रत इब्न अब्बास रज़ि अल्लाह तआला अन्हुमा का यह कौल भी नकल फ़रमाया कि‘‘ऐसा कोई साल न गुजरेगा जिस में लोग किसी बिद्दत को राइज और किसी सुन्नत को ज़ाए न करें यहाँ तक कि सुनतीं ख़त्म और बिद्दतें राइज हो जा ईं गी’’ मुश्का में हदीस मज़कूरा बाला के बाद हज़रत इब्राहिम के हवाले से सरकार अलैहि अस्सलात वस्सलाम का यह इरशाद ग्रामी भी नकल किया गया है:

‘‘युहमल हाज़ा अलालम मिन कल ख़लफ़ अदूला युनिफोन अन्हु तहरीफ़ अलगालियन व इंतहाल अलम्बतलेन वतावेल अलजाहिलेन’’(बेहक़ी)यानी इस इल्म को(जो कुरआन वहदेस का

इल्म है)आदिल(और सका अफराद)अपने इस्लाफ़(के जा नशीनों)से हासिल करके ग़ुलू करने वालों की तहरीफ़ात,बातिल प्रस्तों के गलत दुआवी और जा हलों की तावीलात का इंतफा करें गे।

हज़रत शाह वली अल्लाह मुहद्दिस देहलवी रहमत अल्लाह अलैहि ने हज अल्लाह अलबालग़ा में उन दोनों हदीसों के साथ यह हदीस भी ज़िक्र फ़रमाई है कि हुज़ूर ﷺ इरशाद फ़रमाते हैं:‘‘ला तजतमा हाज़ा अलाम अली अलज़लाल’’ यानी यह उम्मत गुमराही पर जमा नहीं होगी।

उन मुहद्दिसीन और दीगर बुजुर्गों के बयान से यह मालूम होता है कि दूसरी वाली हदीस पहली हदीस की शरह है और पहली हदीस इस आखिरी हदीस यानी यह उम्मत कभी गुमराही पर मुजतमा और मुत्तफ़िक़ न होगी,कुरआन पाक ने ख़ुद फ़रमाया:

اِنَّا نَحْنُ نَزَّلْنَا الذِّکْرَ وَ اِنَّا لَہٗ لَحٰفِظُوۡنَ ﴿۹﴾

’’ यानी हम ने ज़िक्र(कुरआन) उतारा और हम ही इस के मुहाफ़िज़ हैं।

उन तमाम बातों को जेहन में रखने से तजदीद की हिक्मत व मस्लिहत भी समझ में आजाती है और मुजद्दिद के काम भी मालूम हो जाते हैं,अल्लाह तआला ने जिस हिफाज़त का वादा फ़रमाया इस का इस आलम असबाब में यह इंतजाम फ़रमाया कि एक तो अपने कर्म से इस उम्मत को इस अज़मत से सरफ़राज़ फ़रमादिया कि कभी भी पूरी उम्मत गुमरही वज़लालत पर जमा नहीं होगी,इस दुनिया में कभी भी ऐसा नहीं होगा कि उम्मत का हर फ़र्द गुमराह हो जाए बल्कि हर दौर में हक़ पर अफराद क़ायम रहीं गे।

गुमराह और बद दीन लोग तीन तरह से हक़ पर पर्दा डालें गे एक तो ग़ुलू करने वाले तहरीफ़ात करके दोम बातिल लोग गलत दुआवी करके सोम जाहिल लोग बे जा तावीलात करके यह सब अपने अपने फ़ासद मज़ऊमात विख़्यालात और बातिल नज़रियात वाक़ाइद को कुरआन वसंत ही से साबित करें गे जिस से हक़ कमजोर और मुश्तबा होने लगे गा तो

अल्लाह तआला ऐसे बंदे पैदा फ़रमाए गा जो उन बातिल पर सतों की इस किस्म की तमाम को शिशों को ना काम बनाते रहीं गे और हक़ की मुर्दा रगों में खून दौड़ाते रहीं गे जिस से दीन को नयी ज़िन्दगी और जवानी मिलती रहे गी और हक़ पूरे कर वफ़र के साथ जलवा गर रहे गा,हक़ और बातिल के सारे इशतिबाहात ख़त्म होते रहीं गे और हक़ इस क़द्र वाज़िह होता रहे गा कि सआदत अज़ली जिन की यावर विमददगार होगी वह हक़ को ब आसानी यकीन के साथ पहचानते रहीं गे और हक़ वबातिल के दरमियान पूरा पूरा ख़त इमतियाज़ खींचते रहीं गे।

यहाँ यह बात भी ध्यान में रहे कि दीन एक मुकम्मल निजाम हयात है,इस के मुख़तलिफ़ शोबे हैं और हर शोबे के जुदा गाना अहकाम वुज़ूइबत हैं,इस पर अमल करने से ज़ाहिर की भी ततहीर होती है और बातिन की भी,हदीस शरीफ़ से साफ तौर पर मालूम होता है कि दीन का ज़ाहिर भी है और बातिन भी,यह अफराद को जिस तरह बुरे आमाल वाख़लाक़ से बचाता है और ख़ुदा की बारगाह से दौर करने वाले अफ़आल से महफूज़ रखता है वहीं बातिनी तज़किया वततहीर करके ख़ुदावंद क़ुद्दूस के हक़ीक़ी और ख़ुसूसी जलुओं से भी मालामाल करता है।

नीज़ यह बात भी तारीख से अयाँ है कि बातिल पर सतों के हमले मुख़तलिफ़ उद्वार में मुख़तलिफ़ हिस्सों पर हुए हैं,कभी हुकूमत विसियासत पर कभी अक़ाइद वजात वस्फ़ात वगैरह पर ,कभी अमल पर कभी रूहानी तज़किया वततहीर पर,हक़ का कोई गोशा या शोबा एक दिन या एक माह या एक महीना में मुकम्मल तौर पर मुज़्महिल नहीं हो जाता है,बल्कि रफ़्ता रफ़्ता फ़सादाद फैलते हैं,फ़ित्ने जन्म लेते हैं और एक सदी तक बढ़ते बढ़ते वह फ़ित्ने अपनी एक ताकत बना लेते हैं और हक़ पर ग़ालिब आने के आसार शुरू हो जाते हैं।

ऐसा भी होता है कि कभी एक शोबा कभी कई एक,कभी ज़ाहिर और कभी ज़ाहिर वबातिन दोनों कमजोर पड़ने लगते हैं ऐसे आलम में परवरदिगार आलम उन ताकतवरों को पैदा करता है

जिन की ज़रूरत होती है और उन्हें पूरे तौर पर इस काम की तरफ़ मुतवज्जा कर देता है,वह हक़ के जलवे इस क़द्र आम कर देते हैं और ऐसी रौनक बख्श देते हैं कि अहले सआदत के क़ल्ब विजगर मामूर और पर नूर हो जाते हैं।

यह है तजदीद और मुजदुद्दीन का इजमाली बयान जो अहादीस की रोशनी में हमारे सामने आता है,हक़ीक़त यह है कि दीन के ज़ाहिर वबातिन की तजदीद अपने अंदर इस क़द्र वसात रखती है कि इस पर काफ़ी तफ़सीली गुफ़्तगू की ज़रूरत है,अहादीस,अक़्वाल उलमा और बुज़ुर्गान दीन के इर्शादात की रोशनी में जो कुछ इस वक़्त हमारी फ़हम क़ासिर में आया है में उसे सुपुर्द कलम करता हूँ ताकि यह गोशा अच्छी तरह वाज़िह हो जाए और आगाज़ में मज़कूरा बा ला सवालात का शाफ़ी जवाब हाथ आजाए। वबिल्लाह इलतूफ़ीक़

ज़रूरी उमूर:

तजदीद की हक़ीक़त और इस का सही मफ़हूम समझने के लिए पहले चंद उमूर जेहन में महफूज़ कर लीजिए:

(1)सर्वर कौन विमकां ﷺ जामा जमी कमालात इलाहीह हैं उम्मत में जो भी कमालात इलाहीह हैं, उम्मत में जो भी कमालात ज़ाहिर हुए और जो उलूम विमआरिफ़ उलमा वारफा को हासिल हुए या हूँ गे सब आप के कमालात का परतो और अक्स हैं सब का मंबा विमख़ज़न आप ﷺ की ज़ात मुबारका है फिर आप के कमालात कुछ वह हैं जिन का ताल्लुक ज़ाहिर से है और कुछ वह हैं जिन का ताल्लुक बातिन से है।

(2)आप ﷺ के वह कमालात जिन से उम्मत को हिस्सा हासिल होता है और उम्मत को इत्तिबा विपैरवी की दौलत हासिल हो सकती है इस के सात दर्जे हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के मक्तोबात शरीफ़ से माख़ूज़ हो सकते हैं।

अव्वल:वह औसाफ़ विकमालात जिन का ताल्लुक ज़ाहिर के अमल और क़ल्ब की तस्दीक से

है जिन को कुरआन वसंत में बयान फ़रमाया गया है,दर्जा विलायत पर पहुँचने और इतमीनान नफ़्स की मंज़िल से पहले जिन अहकाम विश्राय और अक़ाइद से वाबस्तगी होती है,उलमा-ए ज़ाहिर वाबाद(इबादत करने वाले) और ज़ाहिदीन जो इतमीनान क़ल्ब की मंज़िल तक न पहुँचे हूँ उन सब को हसब अमल उन्हें कमालात से हिस्सा मिला है,उन में जितना ज़्यादा जो अहकाम शरा और अक़ाइद सहीहा से आरास्ता है इतना ही वह फ़ैज़याब और साहिब कमाल है।

दोम: आप ﷺ के वह अक़्वाल वाफ़आल हैं जो बातिन से ताल्लुक रखते हैं अख़लाक़ की तहजीब और सिफ़ात रज़ीला का दफा और अमराज़ बातिनीय वालल मानवीय का अज़ाला जोकि मक़ाम तरीक़त से ताल्लुक रखते हैं इस दर्जा के कमालात उन अर्बाब सुलूक के साथ मख़सूस हैं जिन्हों ने तरीका सूफ़िया को शैख़ कामिल से हासिल किया हो और सैर अला अल्लाह के सहराओं और पर ख़तर वादियों को तै कर चुके हूँ।

सोम:सर्वर कोनेन ﷺ के वह अहवाल वाज़्वाक़ विमवाजीद हैं जो कि विलायत खासा से ताल्लुक रखते हैं इस दर्जा के कमालात उन अर्बाब विलायत के साथ मख़सूस हैं जो मजज़ूब सालिक या सालिक मजज़ूब हूँ,जब मर्तबा विलायत को मुकम्मल तै कर लिया गया तो नफ़्स मुतमइना हो गया इस के बाद चौथा दर्जा शुरू होता है।

दर्जा चहारम:यह उलमा रासख़ीन के साथ मख़सूस है इस दर्जा में और पहले दर्जा में फ़र्क़ यह है कि इस मरहला में अमल वात्तिबा सूरता होती है और इस दर्जा में हक़ीकता इस की तफ़सील बस्त चाहती है जो फिर किसी मक़ाम पर की जाए गी,औलीए कराम को अगरचे तमकीन के बाद एक किस्म का इतमीनान हासिल होजाता है मगर मुकम्मल इतमीनान कमालात नुबुव्वत में हासिल होता है इस दर्जा के कमालात से किताब वसंत के मुतशाबहात की तावीलात और मुक़तआत क़ुरआनी के इसरार वरमोज़ हैं, यहाँ इसरार वरमोज़ से मुराद वह तावीलात नहीं हैं जिन का ताल्लुक इल्म ज़ाहिर से है जैसे यद की तावेल कुदरत से और वजह की ज़ात से यह

इसरार व रमूज़ दरअसल मामलात हैं जो उन मुतशाबहात विमक़तात से मुताल्लिक़ हैं उन की तफ़सील के लिए दूसरा मक़ाम है:

दर्जा पंजिम: में आप ﷺ के वह कमालात हैं जिन के हुसूल में इल्म वामल को कोई दखल नहीं उन का हुसूल महज़ फजल ख़ुदावंदी और इनायत एज़दी पर है यह दर्जा निहायत बुलंद है इस से पहले वाले दर्जात को इस दर्जा से कोई लगाव और ताल्लुक नहीं,इस दर्जा के कमालात बालासालित अनबीए कराम अलैहिम अस्सलाम को हासिल होते हैं उन की तबईत वोरासत में जिस को ख़ुदा चाहे उन से नवाज़े।

दर्जा शुशम: में वह कमालात हैं जो महबूब कोनेन ﷺ के मक़ाम महबूबीयत के साथ मख़सूस हैं इस दर्जा में भी इल्म वामल को कोई दखल नहीं महज़ मुहब्बत के साथ यह कमालात मख़सूस हैं जो कि तफ़ज़ल वाहसान से भी बाला है इस दर्जा के कमालात अकिल क़लील बहुत ख़ास बंदों को हासिल होते हैं,ख़याल रहे कि पहले के अलावा बाक़ी पांच दर्जात का ताल्लुक उरूज के मुक़ामात से है उन का हुसूल सऊद से वाबस्ता है।

दर्जा हफ़तुम: में वह कमालात हैं जो हबूत विन्ज़ूल से ताल्लुक रखते हैं यह दर्जा तमाम दर्जा साबिक़ा का जामा है,मालूम होना चाहिए कि में ने निहायत इख़तिसार के साथ कमालात के सात दर्जे बयान करदिए तफ़सील के लिए मक्तूब 54 जिल्द दोम की तरफ़ रुजू करें नीज़ में ने हर दर्जा के कमालात की कोई तफ़सील नहीं बयान की क्योंकि वह बस्त चाहती है इस के लिए हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू और उन के फ़रज़न्द हज़रत ख़्वाजा मुहम्मद मासूम और हज़रत शाह गुलाम अली क़ुद्दिस अल्लाह तआला इसरारहम के मक्तोबात की तरफ़ रुजू किया जाए नीज़ मज़कूरा तफ़सील को अगर इजमाल में लाना चाहें तो यों भी कह सकते हैं कि कमालात दोकस्म के हैं ज़ाहिरी वबातिनी अव्वल में इल्मी वामली वेतिक़ादी और दोम में बाक़ी सब दर्जात।

(3)इस उम्मत मरहूमा में आप ﷺ के कमालात मुख़तलिफ़ ज़मानों में मुख़तलिफ़ ज़ाहिर हुए और हो रहे हैं और होते रहीं गे,हज़रत शाह गुलाम अली देहलवी क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं"हुज़ूर ﷺ के अफ़ाज़ात से जो कमाल सहाबा कराम रिज़वान अल्लाह अलैहिम अजमईन के दलों पर चमका इस ने सहाबा कराम को क़ुर्ब इलाही सुब्हानहू के इंतिहाई दर्जा पर पहुँचा दिया और वह (कमाल)तजलीय ज़ातीय दाइमा है पस वह लोग नेकी वाहसान वीक़ीन व मुहब्बत और हज़रत हक़ सुब्हानहू की मार्फत के आला दर्जा पर पहुँचे और दुनिया से आराज़ ,आख़िरत की तरफ़ तवज्जो और संन हुदा बल्कि आका अलैहि अस्सलाम की संन आदीया को अपनी पसंदीदा आदत बना लिया और नमाज़ को बितरीक़ मस्नून कि मोमिन की मेराज है और तिलावत कुरआन मजीद और अज़कार मासूरा से फायदे हासिल किए ,वतन विमलक और इमलाक को छोड़ा और काफ़िरों के साथ जिहाद और जंगों और ख़ुदा की राह में शहादत की आरज़ू रखते थे,निस्बत सनेह और तमानीयत की वजह से हालत यह थी कि गोया उन के सुरों पर परिंदे बैठे हैं और कमाल ख़ुज़ू की वजह से गोया अल्लाह तआला को माथे की आंख से देखते थे कहते थे

‘‘कना नत्रा अल्लाह हा हना’’

औलिया कराम को ज़ियाई शहूद होता है और सर्वर कोनेन ﷺ के मुशाहिदा क़व्य के इनाकास की वजह से सहाबा कराम को गोया रवैत उएन है और यह उन के वजूह फजल से है औलिया उम्मत पर, राह ख़ुदा में कमाल मजा हदात,तर्क दुनिया और रगबत आख़िरत की वजह से वह अपने से बे खबर थे मर्तबा एहसान का कमाल और उन हालात की लताफ़त वस्फा जिन से दस्त इदराक कोताह है उन का सरमाया था और फना वबका वास्तुग़राक़ और बेखुदी और इसरार तौहीद वजूदी और कसरत ख़वारिक़ उन अकाबिर से मनक़ूल नहीं हैं फिर ताजदार मदीना ﷺ के क़ल्ब पाक से ताल्लुक रखने वाला कमाल अल्लाह तआला ने उम्मत में ज़ाहिर फ़रमाया, इस कमाल के काबिल अकाबिर सूफ़िया मसल हज़रत ज़ुलनून मिस्री,हज़रत बायज़ीद बस्तामी वहज़रत

जुनेद बग़दादी और उन जैसे बुजुर्ग हुए रहमत अल्लाह अलैहिम अजमईन इस कमाल के मुक़तज़ियात,ज़ौक़ विश्वक,इस्तिग़राक़ वबे ख़ुदी,आह वनाला,इसरार तौहीद,अशआर वनगमा का सुनना ,वज्द वरक़्स,हसन वजमाल की तरफ़ मेलान,कम खाना,कम सोना वगैरह हैं और हक़ सुब्हानहू के मशहूद में मुतहय्यर होना ,सकर विमस्ती,फना वबका और आलम को वजूद हक़ और इस के तवाबा का मज़हर पाना इस कमाल के मआरिफ़ से है।

यह कमाल इसरार कलबी से है इस जगह में तजल्लियात अफ़आलीया वस्फ़ातीय ज़ाहिर होती हैं और इस ज़ौक़ विश्वक कलबी और नूर तौहीद को देखने से हर तरफ़ अंजुमनें आरास्ता होती हैं और वलवला वतनतुना,शोरिश विगरमी और दिल की बे ताबी दुनिया में पैदा हुई है।

फिर मुहब्बत वाल्फत के आसार वनताइज की निहायत हसीन और अनोखी तस्वीर खींचने के बाद फ़रमाते हैं: ‘‘लेकिन अस्हाब कराम का तरीका कि सफ़ा मर्तबा एहसान और इक़तिसार अज़कार मासूरा था नापैद होगया ,उन्हें हालात कलबी ने विलायत को नुबुव्वत पर फ़ज़ीलत दी कि विलायत में तवज्जो और रुख हक़ की तरफ़ है और नुबुव्वत में तवज्जो ख़ल्क़ की जानिब’’ मज़ेद तफ़सील के लिए मक्तूब 92 मुलाहिजा हो।

(4)कुरआन मजीदतमाम अहकाम विश्राय का जामा है हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं: ‘‘कुरआन मजीद जमी अहकाम शरएहि का जामा है बल्कि तमाम शराए साबिक़ा का जामा है ज़्यादा से ज़्यादा यह कि बाज़ अहकाम इस शरीअत में इस किस्म के हैं जो इबारत अलंस,इशारत अलंस,दलाल अलंस और इक़तिज़ा अलंस से मफ़हूम होते हैं अहले लुग़त के अवाम वख़वास इस फ़हम में बराबर हैं और दूसरी किस्म के वह अहकाम हैं जो इस्तिंबात वाजतिहाद के वास्ते से मफ़हूम होते हैं यह फ़हम अइम्मा मुज्तहिदयन के साथ मख़सूस है।

तीसरी किस्म के वह अहकाम हैं जिन के फ़हम में ताकत बश्री आजिज़ है जब तक अहकाम नाज़िल फरमाने वाले जल जलाला की जानिब से आलाम(खबर देना) हासिल न हो उन का फ़हम

मुतस्व्वर नहीं हो सकता है यह आलाम रसूल अकर्म ﷺ के साथ मख़सूस है रसूल अकर्म ﷺ के अलावा किसी को यह आलाम हासिल नहीं,यह अहकाम हर चंद किताब से माख़ूज़ हैं लेकिन उन अहकाम के मज़हर रसूल अल्लाह ﷺ हैं (इस लिए ) ला मुहाला उन अहकाम को सुन्नत की तरफ़ मंसूब रखा है क्योंकि उन को ज़ाहिर करने वाली निस्बत है (यह ऐसे ही है)जैसे अहकाम इजतिहाद्य को कयास की तरफ़ मंसूब करते हैं इस ऐतबार से कि उन अहकाम का मज़हर कयास है तो सुन्नत विकियास दोनों अहकाम के मज़हर हुए अगरचे उन दोनों मज़हरों में बहुत फ़र्क़ है कि एक का एतिमाद राए पर है जो कि खता की गुंजाइश रखती है और दूसरा हक़ जल वाला के आलाम से मवेद है कि इस जगह खता की गुंजाइश नहीं।

दूसरी किस्म(सुन्नत)असल(कुरआन)से कमाल मुशाबहत रखती है गोया मुसबत अहकाम है हर चंद दर हक़ीक़त तमाम अहकाम की मुसबत वही किताब अजीज़ है,उलग़र्ज़ अहकाम शरएहि के इस्बात में मोतबर किताब वसंत हैं और मुज्तहिदयन का कयास और इजमा उम्मत भी अहकाम को साबित करते हैं,यही चार दलायल हैं उन के बाद कोई दलील अहकाम शरएहि की मुसबत नहीं हो सकती।(यहाँ तक में ने मक्तूब 55जिल्द दोम का मुतअद्दिद मुक़ामात से गोया लफ़्ज़ी तर्जा नकल किया है)

(5)अहकाम शरएहि के अलावा दीगर उलूम विमआरिफ़ हैं जिन से अहले अल्लाह मख़सूस होते हैं,अगरचे यह मआरिफ़ भी उन्हें अहकाम केसमरात वनताइज हैं लिहाज़ा यह बात भी जायज़ है कि ख़वास अहले अल्लाह ज़ात बारी तआला वस्फ़ात वाफ़आल के मआरिफ़ में उन इसरार वरमोज़ का इदराक वफ़हम हासिल करें जिन से ज़ाहिर शरीअत खामोश और साकित है और हरकात विसकनात में अल्लाह तआला का इज़न वादम इज़न पाएं और मर्जी वग़ैर मर्जी जान लें।

बसा औकात ऐसा भी हो सकता है कि बाज़ औकात में बाज़ इबादत नाफ़िला की अदाएगी में मर्जी के बजाए गैर मर्जी मौला पाएं और इस के तर्क के माज़ून हूँ,कभी

नींद को बेदारी से बेहतर समझें,अहकाम शरएहि औकात से मौक़त हैं और अहकाम इल्हाम्य हिम्मा वक़्त साबित हैं और चूंकि उन बुजुर्गों के हरकात विसकनात अल्लाह तआला के इज़न वाजाजत से मरबूत हैं नाचार दूसरों के नवाफ़िल भी उन के फ़राइज़ हूँ गे मसलन एक फेअल एक शख्स की निस्बत बहकम शरीअत नफ़ल है वही दूसरे शख्स की ब निस्बत फर्ज़ पस दीगर लोग कभी नवाफ़िल अदा करते हैं और कभी उमूर मुबाहा के मुर्तक़िब होते हैं और यह बुज़ुर्गवार चूंकि काम मौला तआला के इज़न वाजाजत और हुक्म से रखते हैं इसी लिए सब फ़राइज़ से अदा होता है।

दूसरों का मुस्तहब विमबाह उन का फर्ज़ है,इस से उन बुजुर्गों की बुलंदी शान तसोर करनी चाहिए,उलमा-ए ज़वाहर ग़ैबी खबरों को अनबीए कराम अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात की खबरों के साथ मख़सूस समझते हैं और दूसरों को उन चीजों में शिरकत नहीं देते हैं, यह बात विरासत के मुनाफ़ी है और बहुत से उलूम विमआरिफ़ सहीहा जो कि दीन मतीन से ताल्लुक रखते हैं,की नफ़ी करते हैं,हां! अहकाम शरएहि जो अदला अर्बा से मरबूत हैं उन में इलहाम की गुंजाइश नहीं है लेकिन उमूर दयनीय अहकाम शरएहि के अलावा बहुत हैं कि जिन में पाँचवीं असल इलहाम है।

अब रह गया यह सवाल कि जब दीन किताब वसंत से कामिल हो चुका तो कमाल के बाद इलहाम की किया ज़रूरत है और किया नुकसान और कमी रह गई थी जिस की तकमील इलहाम से की जाए तो इस का जवाब यह है कि इलहाम कमालालत ज़ायदा का मुसबत नहीं है बल्कि पोशीदा उमूर और दीन के मख़फ़ी कमालात का मज़हर है जिस तरह इजतिहाद मज़हर अहकाम है इसी तरह इलहाम उन दक़ायक़ वासरार का मज़हर है जिन से अक्सर लोगों का इदराक क़ासिर और फ़हम कोताह है।

हर चंद इलहाम वाजतिहाद में फ़र्क़ वाज़िह है कि इजतिहाद राए की तरफ़ मंसूब और यह इलहाम ख़ालिक़ इज़ विजल की तरफ़ तो इलहाम ने एक किस्म की असालित पैदा करली जो कि इजतिहाद

में नहीं है ,इलहाम आलाम नबी के मुशाबेह है जो कि माख़ज़ सुन्नत है जैसा कि गुज़रज्ञा और यह इलहाम ज़नी है और वह आलाम इल्म क़तई।(माख़ूज़ अज़ मक्तूब 55 जिल्द दोम मक्तोबात शरीफ़)

(6)इस्तिदाद वस्लाहीयत,फ़हम वादराक,इल्म वामल ,इजतिहाद वास्तुंबात और सआदत विश्क़ावत वगैरह में इस हकीम मुतअल्लिक़ जल वाला ने लोगों को मुख़तलिफ़ तबक़ात विमरातिब पर पैदा फ़रमाया और तकसीम अज़ली ने सब को जुदा जुदा मुरातिब विमुक़ामात और इज़हार कमालात में मुख़तलिफ़ मनाज़िल अता फ़रमाए यही वजह है कि कुरआन वसंत के ज़ाहिरोबातिन और बह्र ज़ख़ार से उलूम विमआनी ,अहकाम विश्राय,मआरिफ़ वहक़ायक़,इबरत विनसीहत और ख़ौफ़ वख़शीयत वगैरह औसाफ़ वफ़ज़ाइल हासिल करने में लोग मुख़तलिफ़ हैं,मुज्तहिदयन का फ़र्क़ मुरातिब हमारे सामने है, अहकाम विमिसाइल के इस्तिंबात में उन के कसीर इख़तिलाफ़ात दावा मज़कूरा की बेन दलील हैं,कोई उलूम वफ़नून के अख़ज़ में इतना आगे है कि इस के इदराक वफ़हम को बड़े बड़े न पा सके ,और बुलंदी माख़ज़ से कोताह दस्ती की वजह से मोतरिज़ हो बैठे कुछ का कुछ कहने और बिकने लगे जैसे सिराज अल्लामा इमाम अलाइम्मा हज़रत इमाम आज़म अबू हनीफा क़ुद्दिस सिर्रहू।

इसी कुरआन वसंत के ज़ाहिरी मआनी विमफ़ाहीम तक बाज़ उलमा की रसाई होती है और इसी से बाज़ उन से बढ़ कर मिसाइल वाहिकाम की तहक़ीक़ वतदक़ीक़ फ़रमाते हैं और कुछ आगे बढ़ते हैं तो इसी बह्र ज़ख़ार से वह गोहर आबदार और लाल वजवाहर निकाल कर लाते हैं जिन से जमाने की जरूरतें पूरी होती हैं और लोग जदीद मिसाइल वाहिकाम की दौलतों से मालामाल होते हैं,यह ग़ोता ज़िन भी अपनी अपनी ताकत वक़्व्वत के ऐतबार से मुख़तलिफ़ किस्म के मोती पाते हैं, कुछ और बढ़ते हैं जो इसी से मआरिफ़ वहक़ायक़ के गुंजेने पाते हैं, कुछ ऐसे भी होते हैं जो इसरार व रमूज़ और मआनी विमुतालिब के मुक़तआत विमतशाबहात में दरिया तलाश कर लेते हैं, यह हिदायत व रशद के हामिलों का हाल है जो कि

इस को सन कर धाड़ें मार मार कर रोते हैं,ख़ौफ़ वख़शीयत से क़ुलूब काँपते हैं और बदन लरज़ते हैं और रोंगटे खडे हो जाते हैं,इसी की तिलावत करने वाले कुछ ऐसे भी होते हैं जिन से पानी की मौजें रुक जाती हैं,धारें ठहर जाती हैं,वहवश वतेवर और हैवानात विदरिंदे भी मदहोश हो ए बग़ैर नहीं रह पाते हैं।

और इस को सन कर निरे भटकते भी हैं गुमराह भी होते हैं,इसी से इस्तिदलाल करके काफ़िर विमुर्तद भी होते हैं,तुग़्यान वसरक्षी में तेज से तेज तर होते चले जाते हैं उलग़र्ज़ इस गुलस्तां से कोई इल्म वामल ,फजल वारफान और तक़्वा वतहारत के फूल चिंता है और एतिक़ाद वामल की सही रोशनी हासिल करके अब्दी निजात और सरमदी फ़ुतूहात का सामान मुहैया करता है तो किसी को तुग़्यान वसरक्षी के सिवा कुछ हाथ नहीं आता है।

अक़ाइद वामाल में लोग जिस क़द्र भटके और कम या ज़्यादा ज़लालत विगमरही का शिकार हुए सब इस्लामी फ़िर्क़ों नेअपना माख़ज़ कुरआन वसंत ही को बनाया,मगर रशद व्हिदायत और गुमरही वज़लालत और उन के मुख़तलिफ़ दर्जात के हामिल इंसानों की एक तवील फिहरिस्त हमारे सामने है जिन्हों ने सआदत अज़ली और शिक़ावत के ऐतबार से मुख़तलिफ़ हिस्से हासिल किए।

(7)हिक्मत इलाहीह और मशीयत अज़ली का तक़ाज़ा यह हुआ कि ज़ाहिरी वबातिनी फ़्यूज़ात वबरकात और हक़ायक़ विकमालात को मुख़तलिफ़ औकात वाज़मान के साथ मौक़त फ़रमाए और मुख़तलिफ़ अश्ख़ास वाफ़राद के ज़रिया उन्हें मंसा शहूद पर जलवा गर फ़रमाए, जिस जमाने के लोगों को जैसी जरूरतें आएं जैसी उन की सलाहतें हूँ इसी तरह की इनायात से उन्हें नवाजा जाए और उन के ज़ाहिर वबातिन की तकमील की जाए।

फिर मंशा इलाही सब ज़मानों में सब के साथ रशद व्हिदायत का न था बल्कि हमेशा हक़ के साथ बातिल,सही के साथ फ़ासद लगा रहा,एक तरफ़ दायान हक़ की दावत कबूल

करने वाले थे तो दूसरी तरफ़ अहले बातिल की बातिल बातों पर लब्बैक कहने वाले भी थे, सच कहा है किसी ने؎

सतेज़ा कार रहा है अज़ल से ता इमरोज़

चिराग मुस्तफ़ा से शरार बो लहबी

अहले बातिल का काम हमेशा हक़ को दबानाऔर नूर हक़ को बुझाना रहा कभी मादी ताकतों के ज़रिया तो कभी हक़ में बातिल की तख़लीत करके।कभी मआनी हुक्का विमुतालिब सादक़ा में गलत तावीलात और नसोस व आयात में तहरीफ़ वितब्दील करके यह तहरीफ़ वितब्दील और तख़लीत वतलबीस कभी ऐसी होती है जिसे अदना तामिल और मामूली गौर वफ़कर से समझा जा सकता था और कभी इतनी गहरी कि जिस के लिए दकीक़ नज़र की ज़रूरत दरकार होती।

नीज़ बातिल कभी कुछ होता कभी कुछ कभी बहुत बड़ी ताकत का मालिक होता ,ज़ाहिर है जिस जमाने में बातिल जिस कुव्वत का हामिल होता इस के लिए ऐसे ही ताक़तवर हक़ परस्त की ज़रूरत होती,मालिक रहमत जल वाला उन्हें असलहों से लेस वैसे ही मुजाहिद पैदा फरमाता है। मुख़्तसर यह कि तकमील नफ़ूस और अहक़ाक़ हक़ वाबताल बातिल के लिए जैसे जैसे मुक़द्दस नफ़ूस और मुजाहिदों की ज़रूरत पड़ी हर जमाने को ऐसे जितने अफराद की ज़रूरत पड़ी इसी क़द्र वह अपने बंदों में ऐसे अफराद भेज कर रहमतें और एहसानात फरमाता रहा।

पहले यह काम हसब ज़रूरत अनबीए कराम अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात अंजाम देते रहे,जिन जिन शहरों,सूबों,मुल्कों और ज़मानों में जैसी कुव्वतों के हामिल उन मुक़द्दस नफ़ूस की अहले ज़माना को ज़रूरत होती रही यह तशरीफ़ लाते रहे,मुख़तलिफ़ क़ौमों और अफराद को उन के तहज़ीबी वितमदनी इर्तिक़ा के ऐतबार से जैसे जैसे अहकाम विमिसाइल की ज़रूरत पड़ती रही यह देते रहे,उन की सलाहीयतों और इस्तिदादों के लिहाज से उन की तकमील करते रहे यही वजह है कि कभी नबी तशरीफ़ लाये तो कभी वह तशरीफ़ लाये जो

नुबुव्वत के साथ साथ रिसालत के भी हामिल थे फिर रसूलों में कभी कभी ओलवालाज़म रसल तशरीफ़ लाये फिर कभी कितने आये कभी कितने आये मुख़तलिफ़ सहीफ़े और कुतुब समावय लाये और सब के आखिर में ख़ातिम अलानबया मुहम्मद रसूल अल्लाह ﷺ को सारे औसाफ़ हमीदा वख़साइल महमूदा का जामा बना कर दुनिया वालों को अता फ़रमादिया जो तमाम कमालात साबिक़ा के जामा और जदीद मआरिफ़ व हक़ायक़ और कमालात वफ़ज़ाइल के हामिल बिन कर तशरीफ़ लाये और किताब आसमानी का नुस्खा जामिआ साथ लाये,अब आप के बाद किसी जदीद नबी का इमकान न था और न ही कुरआन मजीद के बाद किसी सहीफ़े विकिताब की ज़रूरत थी क्योंकि इस में सब कुछ था सब ज़मानों और सब मुल्कों और सब क़ौमों के लिए था।

मगर जिस जमाने में आप ﷺ ने ज़ुहूर पर नूर फ़रमाया, जिस मुल्क वकोम में ज़ुहूर फ़रमाया तन्हा वह इस के हामिल न थे कि तमाम कमालात उन पर अयाँ कर दिए जा ईं,कुरआन वसंत से सारे हिजाबात उठा दिए जाएँ बल्कि उन्हें अपनी मौजूदा तहजीब वितमदन और ततमीम वितकमेल के लिए जो कुछ चाहिए था अपनी बुलंद इस्तिदाद और सलाहीयत के ऐतबार से वह जो कुछ ले सकते थे उन्हें दिया गया और उन्हों ने लिया भी फिर किया था दम में काया पलट गई और वह कुछ का कुछ बिन गए।

अब आप ﷺ के बाद भी अभी दुनियावी तरक़्क़ीयात होना थीं नयी नयी ईजादात वाख़त्राआत होना थीं,तहज़ीबें बदलना थीं,आप की तालीमात और फ़्यूज़ वबरकात को मुख़तलिफ़ ज़मानों और मुख़तलिफ़ क़ौमों में पहुँचा ना था,हर एक को इस की ज़ाहिरी वबातिनी इस्तिदाद वस्लाहीयत के ऐतबार से ज़ाहिरी वबातिनी कमालात से नवाजना था ,बातिल की तख़लीत वतलबीस से मुकाबला करना था।

आप ﷺ के बुलंद वाज़ीम नूर ने बातिल को सर उठाने के काबिल न रखा था हर तरफ़ कुफ्र वज़लालत की तारीकियां छुट रही थीं,अक़ाइद वामाल की इसलाह हो रही थी

,आप ﷺ ने जिन को अपनी ज़ाहिरी हयात मुबारका में अपने नूर से मनोर किया था उन के बाज़वों की कुव्वत का मुकाबला करने का किसी में दम न था,क़ुलूब वाबदान में नूर के नफ़ुज़ ने वह जगह ही कहां छोड़ी थी जिस से शैतानी वस्वसों से अक़ाइद वामाल में कुछ खराबी पैदा हो सकती थी।

मगर जब आप ﷺ तशरीफ़ ले गए और आप के फ़ैज़ान नज़र के फ़ैज़ याफताह इस दुनिया से धीरे धीरे जाने लगे तो बातिल ने सर उठाना शुरू किया नूर कदा को ज़ुल्मत कदा बनाने की तैयारियां होने लगीं और अक़ाइद वामाल में कजी के दरवाजे खिलने लगे,वसावस शैतानी को दलों में दाखिल होने के लिए चूर दरवाजे हाथ आने लगे और हक़ के साथ बातिल की तलबीस वितख़लीत शुरू हो गई।

अब आप ﷺ के बाद किसी जदीद नबी का चूंकि इमकान ख़त्म होचुका था लिहाज़ा जो काम पहले उद्वार में अनबीए कराम अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात अंजाम देते रहे इस के लिए इस उम्मत के उल्मा को चुना गया और विरासत विनियाबत का ताज ज़रीं उन्हें अता फ़रमाया गया और कयामत तक के लिए रहमतों और बरकतों का दरवाजा ऐसे पाकीज़ा नफ़ूस के रूप में खोल दिया गया।

अब पहले के मुकाबले में आबादी भी बढ़ रही थी दुनिया जो मबगौज़ ख़ुदा है इस की तरक़्क़ीयां भी हो रही थीं,तहज़ीबें बदल रही थीं,हर बाद का दौर पहले के दौर से तेज तरक्की पर था मुख़तलिफ़ क़ौमों और ज़बानों के हामिल इंसानों और सईद विश्क़ी अफराद वाशख़ास के हाथों में कुरआन वसंत अरबी ज़बान में पहुँच रहे थे ,शैतानी चेले बढ़ते जा रहे थे और दुनयवी मुफ़ादात अयाँ से अयाँ तर होते जा रहे थे।

ऐसे हालात में मुख़तलिफ़ ज़मानों में मुख़तलिफ़ मुल्कों में कैसे कैसे कवी अफराद की ज़रूरत थी यह अल्लाह तआला और इस के रसूल ﷺ खूब जानते थे जो बातिल प्रस्तों

के वाज़ का मुकाबला वाज़ से तकरीर का तकरीर से,तहरीर का तहरीर से , क़ुलूब की ज़ुल्मतों का नूरानियत से करने का दम रखते,मैदान कारएज़ार में जिंग वजहाद से बातिल का मुँह फेर सकते जो ऐसी बारीक नज़र के हामिल होते कि बातिल किसी भी रूप में किसी भी जमाने में कितनी गहरी साजिश के साथ आता पहचान लेते और दफन कर देते।

जो जमाने के तक़ाज़ों और हालात के ऐतबार से उन तमाम माअनवी कुव्वतों और बातिनी कमालात के हामिल होते जिन से इस जमाने के लोगों के नफ़ूस की तकमील होती और उन की कुव्वत वास्तेदाद फेअल में तब्दीली होती,ऐसे अफराद हर दौर में अल्लाह तआला ने पैदा फ़रमाए,जब इजतिहाद वास्तुंबात और उसूल वावजा की तदवीन वितरतीब की ज़रूरत थी तो मुज्तहिदयन पैदा फ़रमाए,पंद व्वाज़ की ज़रूरत थी तो साहिरालबयान वाइजीन विमक़ररीन पैदा फ़रमाए और तसनीफ़ात वतालीफ़ात की ज़रूरत थी तो मुसन्निफ़ीन विमूलफ़ीन पैदा फ़रमाए।अहादीस की तदवीन वतन्क़ीह और फ़ासद से सही को जुदा करने की ज़रूरत थी तो मुहद्दिसीन पैदा फ़रमाए,अहकाम विश्राय के हुक्म वालल विमसाले और इसरार वरमोज़ की ज़रूरत थी तो हामिलान इसरार वरमोज़ पैदा फ़रमाए यह तो सब कुछ ज़ाहिर की तकमील के लिए हुआ।

क़ल्ब विनफ़स के तसफ़ीया वितज़किया,फजल विकमाल,वस्ल वारफान और दीगर माअनवी फ़्यूज़ात वबरकात के लिए मुख़तलिफ़ शोबों में मुख़तलिफ़ मुरातिब विमुक़ामात के हामिल अफराद जमाने को अता फ़रमाए जिस तरह साबिक़ा उद्वार में मुख़तलिफ़ अज़मान में अनबीए कराम वरसोलान अजाम वावलवालाज़म मर्सलीन अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात जमाने के हालात वितक़ाज़ों के ऐतबार से मुख़तलिफ़ कुव्वतों वताक़तों के हामिल मुक़ामात विमरातिब पर फ़ाइज़ तशरीफ़ लाते रहे इसी तरह इस उम्मत में अमली वेतिक़ादी ख़ामियों को दौर करने,राह रास्त पर क़ायम रखने और जदीद कमालात से आरास्ता करने और क़दीम कमालात को नयी ताजगी देने के लिए उलमा व वाइजीन फ़िक़हा विमुज्तहिदयन और सुलहा विकामलियन आते रहे हैं और आते रहीं

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