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Allama Afaque Ahmad Mujaddidiतजदीद अल्फ़ सानीसिलसिला नक़्श बंदेह

अध्याय 19 में से 57पृष्ठ 277–289

सिलसिला नक़्श बंदेह

नक़्श बंदेह सिलसिला की आप ने दो पहलू से तजदीद फ़रमाई। एक तो यह कि यह सिलसिला चों कि खालिस इत्तिबा सुन्नत पर मबनी था इस का सारा मुजाहिदा और रियाज़त, सुन्नत पर कामिल तरीके

सेमुस्तक़िल मिज़ाजी के साथ अमल और हर मामले में मियाना रवी इख्तियार करना था। बुजुर्गों का मुशाहिदा है कि मुख़तलिफ़ आमाल व अफ़आल और रियाज़ात व मुजाहिदात के मुख़तलिफ़ अनिवार व अलवान और मुख़तलिफ़ कैफियात व वारदात हैं। सुन्नत पर सख्ती से अमल न तो हाल से मग़्लूब करता है, और न ही बजाहिर इस में कोई इमतियाज़ी शान होती है इस लिए इस की तरफ़ लोगों के क़ुलूब कम माइल हुए थे, कुछ नक़्श बंदी हज़रात ने दूसरों की देखा देखी बाज़ रसूम व बिदआत इस मुबारक सिलसिला में भी दाखिल कर दें थीं इस की वजह से इस में वह फ़ैज़ और बरकत भी न रही थी जो पहले थी। हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने उन तमाम रसूम व बिदआत से सिलसिला मुबारका को पाक कर दिया और ठीक बुनियादों पर खड़ा कर दिया जो इस की थीं।

दोम यह कि यह सिलसिला आप के ज़ुहूर से क़ब्ल सिर्फ़ चंद अज़कार व मुराक़बात तक महदूद था। आप ने कहां से कहां पहुँचा दिया। डाक्टर गुलाम मुस्तफ़ा ख़ान फ़रमाते हैं: सिलसिला आलीया नक़्श बंदेह जो हज़रत ख़्वाजा बाक़ी बिल्लाहरहमत अल्लाह अलैहि के जमाने तक लताइफ़ सबा; नफ़ी व इस्बात, तहलील लिसानी, मुराक़बा अहदेत, फिर मुराक़बात मुशारब, और मुराक़बा मईयत तक महदूद था, वह हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की बरकत से विलायत कुबरा, मुराक़बात कमालात नुबुव्वत व रिसालत व ओलो अलाज़म, मुराक़बा हक़ीक़त काबा, हक़ीक़त कुरआन, हक़ीक़त सला, माबूदीयत सर्फा, हक़ीक़त इब्राहीमी, हक़ीक़त मूसवी, हक़ीक़त मुहम्मदी, हक़ीक़त अहमदी, हुब्ब सर्फा और लातईन के मुक़ामात तक वाबस्ता हो गया है।

यह चीजें हज़रत मुजद्दिद अल्फ़ सानीरहमत अल्लाह अलैहि के तुफ़ैल में उन के वाबस्तगान तक पहुँची हुई हैं और उन के मुताल्लिक़ किसी नज़रियाती बहस व तमहीस का सवाल ही पैदा नहीं होता है।(रूद कौसर)

सिलसिला मुबारका की तजदीद का यह पहलू भी बहुत अहम है कि यह सिलसिला कम लोगों में और बहुत कम शहरों और मुल्कों में था मगर आप ने इस क़द्र फ़रोग़ दिया कि पूरे आलम में पहुँचा दिया और

लोगों के दलों में इस क़द्र अज़मत पैदा कर दी कि बयान से बाहर है।

हक़ायक़ पर इत्तिला:

अश्या की हक़ीक़तों तक पहुँच जानाऔर हर एक की खासियत जान लेना यह बहुत बड़ा कमाल है। बाज़ बुजुर्गों ने हुज़ूर सर्वर कोनेन ﷺ की यह दुआ नकल फ़रमाई है:

अललहम् अरना अलाशीयाय कमा ही (ए अल्लाह हमें चीजें दिखा जैसी कि वह हैं)

अक़ाइद व आमाल या दीगर उमूर में इंसान राह रास्त से आम तौर पर हटता है हक़ीक़त का पता न होने की वजह से, दुनिया में जितने गुमराह फ़िरक़े हुए अक़ाइद व आमाल में नयी राहें पैदा कीं वह सिर्फ़ मुआले की तह और हक़ीक़त तक न पहुँचने ही का नतीजा है। आप जब तक किसी क्षे की हक़ीक़त तक नहीं पहुँचीं गे इस वक़्त तक इस के बारे में सही राए और सही नज़रिया क़ायम नहीं कर सकते हैं।

जिन उलमा व मशाइख़ में एतिक़ाद व अमल की जो खराबियां पैदा हुईं उन का अक्सरी सबब यही है कि वह हक़ायक़ तक नहीं पहुँच सके। हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के दौर में अक़ाइद व आमाल की खराबियों को आप एक हद तक पढ़ चुके उलमा और सूफ़िया से जो कुछ भी कोताहियां हुईं वह इसी बुनियाद पर कि वह हक़ायक़ से नाआशना थे। सूफ़िया अस्नए राह में पेश आने वाले उमूर व खयालात को तरतीब देते रहे, रफ़्ता रफ़्ता एक अंबार जमा हो गया और अक़ाइद में इस हद तक उमूर जमा हो गए कि अक़ाइद सूफ़िया के नाम से बाज़ाबता तहरीर होने लगे, आमाल में जो कुछ हुआ उसे आप तजदीद तसव्वुफ़ में पढ़ें गे, जिन उलमा पर फलसफा का रंग ग़ालिब हुआ और अकलियत को दखल देने लगे, वह राह रास्त से हटने लगे और बिलआख़िर ग्रे तो कोसों दौर जा पड़े। दौर अकबरी आप एक मर्तबा फिर पढ़ लें और फिर आप सोचें किया ऐसे हालात में ऐसे मर्द मुजाहिद की ज़रूरत नहीं जो एक तरफ़ रमूज़ शरीअत का बेहतरीन शनावर हो और दूसरी तरफ़ हक़ायक़ व मआरिफ़ में, रूहानी उरूज व इर्तिक़ा में, कश्फ़ व मुशाहिदा में न

नुकता आखिर पर पहुँचा हुआ हो ताकि जो कुछ दूसरों ने बयान किया इस की भी पूरी खबर रखता हो कि कहां से बयान किया और किया बयान किया, जहां जहां से दूसरे गुजरे थे यह भी गुजरे, जो दूसरों ने देखा हो यह भी अच्छी तरह देखे और इस मुसाफ़त की आखिरी मंज़िल पर पहुँच कर पूरे रास्ते के नशेब व फ़राज़ बयान कर दे, दुनिया को ऐसी ही रहबरी की ज़रूरत थी और वह मालिक रहमत जल व अला ने ग़ायत कर्म से इनायत फ़रमाया जिस ने विलायत व नुबुव्वत की सारी शाहराहें लोगों के सामने रख दें, तमाम मराहिल व मनाज़िल की कैफियात बयान कर दें, हर दकीक़ से दकीक़ चीज़ को भी देख लिया, दूसरों ने जो कुछ बयान किया था इस से सिवा बयान कर दिया और लोगों को दिखा दिया कि इस तवील राह में किया किया गुल खिलते हैं और अंजाम किया होता है। हम चंद हक़ायक़ आप के सामने रखते हैं जिस से आप को हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की समझ की रसाई मालूम होसकेगी।

आप के रब ने आप को हक़ायक़ पर इत्तिला इस क़द्र अता फ़रमाई थी कि बहुत कम लोगों को नसीब हुई होगी, हम यहाँ ‘तजदीद हक़ायक़ व इसरार’ के अनवान के तहत कुछ सुपुर्द कलम करते हैं ताकि आप की तजदीद का यह गोशा भी बिलकुल अजनबी न रह जाए।

तजदीद हक़ायक़ व इसरार

आप क़ुद्दिस सिर्रहू के बयान करदा हक़ायक़ व मआरिफ़ सुनने से क़ब्ल चंद निहायत अहम उमूर

जेहन नशीन कर लें:

कमालात का इज़हार:

हुज़ूर सर्वर कोनेन ﷺ जामा जमी कमालात इलाहीह हैं जैसा कि आप पढ़ चुके, इसी तरह आप को अल्लाह तआला ने उलूम अव्वलीन व आख़रीन अता फ़रमाए हैं। आप फ़रमाते हैं: अवतीत इल्म उलअव्वलीन व इलाख़रीन

आप हर वस्फ़ में अव्वल, बल्कि यों कह लीजिए कि कायनात में जितने भी अस्हाब कमाल आये, वह सारे कमालात जो उन्हें दिए गए वह सब आप के कमालात की तफ़सील थे। आप रोज़ अव्वल से अल्लाह इज़ विजल के ख़लीफ़ा मुतअल्लिक़ हैं और रोज़ आखिर तक रहीं गे। आप के कमालात व उलूम व खिलाफत का इज़हार पहले अनबीए कराम अलैहि व अलैहिम अस्सलवात व इलतसलीमात के ज़रिया होता रहा और आप के बाद आप के जानशीन व नाइबेन आप की उम्मत के उलमा व सुलहा व ओलिया हुए। हर दौर में उन उलमा व मशाइख़ ने बक़दर इस्तिदाद व ज़र्फ़ कमालात हासिल किए और हसब मौका उन का इज़हार किया।

कुछ उलमा उलूम ज़ाहिरी की नशर व इशाअत में मसरूफ़ व मशगूल हुए और कुरआन व सुन्नत से वह उलूम और अहकाम और उन के इसरार व उसूल व फ़ुरू मुस्तनबुत कर के उम्मत तक पहुँचाए कि सब पर सबक़त ले गए, फिर उन में कुछ वह थे जो अक़ाइद व कलाम की तरफ़ मुतवज्जा, कुछ अहकाम व मिसाइल की तरफ़, हदीस व कुरआन की शरह व तफसीर की तरफ़, कुछ दीगर उलूम व फ़नून की तरफ़ और उलूम बातिनी को ओलिया व मशाइख़ ने बक़दर ज़र्फ़ व इस्तिदाद हासिल किया और उम्मत पर हसब मौका बयान किया, उन मशाइख़ व औलीए कराम ने ख़ुद अपने फ़ज़ाइल व मनाक़िब और मनासिब व मुरातिब भी बयान किए और इसरार व मआरिफ़ भी । अगर इस की तफ़सील की जाए तो बात काफ़ी तवील हो जायेगी।

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के दौर में अकलियत की आमेज़िश और बाहमी इख़तिलाफ़ और

सूफ़िया का कशफ़ी ख़लाओं की वजह सेहक़ाइद में जो तज़बज़ब पैदा हो गया । ग़लबा सकर में बाज़ बुजुर्गों से जो अक़्वाल सादर हो गए उन से ख़ाम सूफ़िया जो शरीअत को बे ऐतबार साबित कर रहे थे। हज़रत शैख़ इब्न अलारबी ने अस्नए राह के मक्शफ़ात को जिस कसरत से बयान कर दिया था और लोगों ने उन की सही मुराद तक रसाई न होने की वजह से जो धोके खाये उन सब की वजह से इस दौर का तक़ाज़ा यही था कि आप के ज़रिया सही कमालात मंसा शहूद पर जलवा गर हूँ, शरीअत पर एतिमाद पुख्ता और मजबूत हो, नुबुव्वत व विलायत की क़दरें दलों में बैठें। अकबरी इलहाद ने इस्लाम को जिस तज़बज़ब का शिकार कर दिया था वह दौर हो और यकीन की शाहराह लोगों को हाथ आये, बातिन से मुताल्लिक़ उलूम हुक्का जलवा गर हूँ, यही सब उमूर थे। इस के अलावा बहुत हिकमतें थीं जिन की वजह से कसरत से हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू से कमालात का ज़ुहूर हुआ और ऐसे ऐसे हक़ायक़ व मआरिफ़ का ज़ुहूर हुआ जिन्हें आप देखें गे कि शरीअत के उएन मुताबिक, शरीअत के मउईद, यकीन व एतिमाद को पुख्ता करने वाले थे जिन की नज़ीर आप को किसी किताब में नहीं मिलेगी। यह आप की जबरदस्त तजदीद की बेन दलील हैं।

इक़साम हक़ायक़ व इसरार:

हज़रत अल्लामा बदर उद्दीन क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं: ‘‘वाज़िह हो कि मुबदा फ़य्याज़ से जो कुछ मआरिफ़ व इसरार हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के बातिन शरीफ़ में वारद होते थे उन की कई किस्में हैं:

1।एक किस्म तो वह है कि आप उन को दिल से ज़बान तक नहीं लाये और रम्ज़ व इशारे से भी कभी ज़ाहिर नहीं किया, मसलन हुरूफ़ मुक़तआत और मुतशाबहात क़ुरआनी की तावेल जो आप पर मुनकशिफ़ हुई थी।

2। दूसरी किस्म वह हैं कि उन का इज़हार सिर्फ़ अपने साहिब ज़ादों सेखास तौर पर

किया और दूसरों को इस में शरीक नहीं फ़रमाया और तहरीर भी नहीं फ़रमाया।

3।तीसरी किस्म के मआरिफ़ वह हैं जिन को आप ने उन मुरीदों से जो कामलियन अस्हाब में से थे बयान फ़रमाया और उन के इज़हारके वक़्त ख़लवत होती थी और दरवाजा बंद कर लिया जाता था और अगर इत्तिफ़ाक़न कोई और शख्स आजाता तो आप सुकूत फ़रमाते और रवे सखुन को बदल देते और बक़ीया इसरार को किसी दूसरे वक़्त बयान फ़रमाते कि हर शख्स उन का इदराक न कर सके।

4।चौथी किस्म यह है कि साइल कुछ दरयाफ्त करता तो आम फायदे के लिए (उमूमन व शमूलन) तहरीर फ़रमादेते। आप के रिसाले मक्तोबात जो तीन दफ्तरों में हैं और बड़ी बरकतों वाले हैं इसी चौथी किस्म पर मुश्तमिल हैं और उन में से हर मार्फत दिल के बीमारों के लिए शिफा और महजोरों के लिए विसाल है।

आप के रसाइल व मक्तोबात की तफ़सील लिखने के बाद फ़रमाते हैं: उन में मुतालिब की बारीकी, इबारतों की मुश्किलात, तहक़ीक़ इसरार और तदक़ीक़ रमूज़ इस दर्जा हैं कि उन से आप की शान की बुलंदी और दर्जात की अज़मत का अंदाजा होता है और आप की करामत व बुज़ुर्गी का पता चलता है।

तहरीर हक़ायक़ का तरीका:

साहिब हज़रात अलक़ुद्स फ़रमाते हैं: हक़ायक़ की तहरीर व तकरीर में आप का तरीका यह था कि जब तक उन उलूम के माख़ज़ से मतला न हो जाते आप उन का तज़किरा हरगिज़ न फ़रमाते और जब तक कोई बात (तहक़ीक़ के साथ) मुनकशिफ़ न हो जाती उसे बयान न फ़रमाते। चनां चह बाज़ मुख़लिसीन आप से अक्सर ख़िज़र व इलियास अलेहमा अस्सलाम के मुताल्लिक़ दरयाफ्त करते तो आप सुकूत फ़रमाते। एक मुद्दत के बाद जब उन दोनों बर्गुज़ीदा बुजुर्गों से मुलाक़ात हो गई तो इस वक़्त उन सवाल करने वालों को जवाबात तहरीर

फ़रमाते। इसी तरह बाज़ अहबाब आप से हज़रत यूसुफ के साथ हज़रत याकूब (अलेहमा अस्सलाम) की मुहब्बत का सबब दरयाफ्त किया करते थे तो आप खामोश रहते और मालूमात बहम न पहुँचाते, लेकिन जब अल्लाह पाक की तरफ़ से इस मुअम्मे का हल मालूम हो गया तो आप ने बयान फ़रमाया और तहरीर फ़रमा दिया और साइल को भी वह इसरार लिख भेजे।

बाज़ मुहर्रमान इसरार ने क़िस्सा अलनहल के इसरार फरयाफ़्त किए जो एक मक्तूब में दर्ज हैं और जिस फ़ाज़िल के नाम वह मक्तूब लिखा गया है वह दुनिया वालों में फंसा हुआ है और ख़ौफ़ था कि बीमार दिल वालों की जमात में वह बात बाइस शोरिश न हो जाए (तो आप खामोश हो गए) फिर आप ने यह शेअर पढ़ा؎

या रब इस ग़ुन्चा ख़ंदां को तो वापस ले ले

कहीं हसाद चमन की न नज़र लग जाए

आप की तवज्जो की बरकत से और अल्लाह पाक की बारगाह में हवाला कर देने से फिर इस मामले ने सर न उठाया और कोई शख्स न समझ सिक्का।

बसा औकात ऐसा होता कि बाज़ अकाबिर के ऐसे अक़्वाल जो बज़ाहिरमाफ़िक़ शरीअत न होते थे और मुल्हिदाना तुयन्त वाले लोग उन अक़्वाल को तकासल की दस्तावेज़ बनाए हुए थे, आप जीर बहस लाते और उन की सही तावेल, मुआफ़िक़त शरीअत में फ़रमा देते या अगर तवज्जो में ज़ाहिर होता कि वह कौल ग़लबा फ़िक्र व हाल की वजह से ज़बान से निकल गया था या इस में ख़ताए कशफ़ी हुई है तो आप इसी तरह उन का इज़हार फ़रमा देते थे, लेकिन आप ख़ताए कशफ़ी को ख़ताए इजतिहादी की तरह काबिल तक़लीद करार नहीं देते थे और अगर कम इल्म और नाक़िस फ़हम वाले लोग इस के इस्बात में शिद्दत करते होते तो फिर आप हमीयत इस्लाम और ग़ैरत मोमिनाना और हुज़ूर अनवर ﷺ की कमाल मुताबेत की वजह से इस का रद्द तहरीर फ़रमाते। चनां चह आप ने विराए इनफ्स व आफ़ाक़ के सिलसिले में जो कुछ लिखा है वह इसी

नौईयत का है और इसी तरह की वह तहरीर है जो आप ने सय्यद अलताइफारहमत अल्लाह अलैहि के इस कलाम की तशरीह में लिखी है कि ‘‘हादस जब क़दीम से मुत्तसिल हो जाता है तो इस में हदूस का असर बाक़ी नहीं रहता है।’’

मआरिफ़ की बुलंदी:

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू अपने इसरार व मआरिफ़ के बारे में फ़रमाते हैं कि ‘‘यह मआरिफ़ जो तहरीर में आगये हैं (अल्लाह पाक की रहमत से) उम्मीद है कि सब इल्हामात रहमानी हैं कि इस में शैतानी वस्वसों के शाइबे की भी मुतअल्लिक़ मजाल नहीं। दलील इस की यह है कि फ़क़ीर ने जब उन उलूम की तहरीर का इरादा किया तो में ने बारगाह ख़ुदावंदी में इल्तिजा पेश की, देखा कि मलाइका कराम (अला नबीना व अलैहिम अस्सलाम) इस मक़ाम से शैतान को दफा कर रहे हैं और इस के क़रीब भी उन को आने का मौका नहीं देते।

तहरीर मआरिफ़ का सबब:

चों कि नेअमतों का इज़हार करना भी बहुत अज़ीम खूबियों में से है। अकाबिरीन ने इस नेमत के इज़हार की जुरात की। अल्लाह पाक से उम्मीद करता हूँ कि यह चीज़ अजब व तकबर से दौर रहे और अजब की गुंजाइश भी न रहे कि अल्लाह पाक की इनायत से अपनी बुराई और खामी हर वक़्त पेश नज़र है। एक सबब यह भी तहरीर मआरिफ़ का है ‘‘कि इस तरह बार वजूद से आराम पासकीं (तबीअत भी बहल जायेगी) चनां चह आप ने लिखा है कि एक जमात ने बार वजूद से तस्कीन के लिए समाव व रक़्स को इख्तियार कर लिया और एक जमात ने ख़ुद को तसानीफ़ में मसरूफ़ कर लिया और इस तरह ख़ुद का बार हल्का कर लिया।

और उन इसरार को कलम बंद करने की एक वजह यह भी हो सकती है कि आप पर ज़ाहिर कर दिया गया था कि आप की मर्क़ूमात हज़रत इमाम महदीअलैहि अस्सलाम की नज़र से भी गुज़रें गी और उन के नज़दीक भी मकबूल हूँ गी इस लिए आप ने बहुत लिखा है। आप फ़रमाते हैं:

‘‘उलूम व मआरिफ़ (इल्हाम्य) बहुत अज़ीम निशानियों में से हैं और ख़वारिक़ में बहुत बुलंद मक़ाम रखते हैं इस लिए मोजिज़ा क़ुरआनी तमाम मोजज़ात से ज़्यादा कवी और पायदार हुआ। आंखें खोल कर देखो कि यह तमाम उलूम व मआरिफ़ जो उबर नेसां की तरह बरस रहे हैं वह कहां से आते हैं? यह उलूम जो इस कसरत से हैं और बाल बराबर भी उलूम शरएहि से इन्हिराफ़ की गुंजाइश नहीं रखते अपने अंदर सेहत की ख़ास निशानी रखते हैं। हमारे हज़रत ख़्वाजा (बाक़ी बिल्लाह) क़ुद्दिस सिर्रहू ने लिखा है कि तुम्हारे तमाम उलूम सही हैं।’’(हज़रात अलक़ुद्स)

आप के बयान करदा उलूम व मआरिफ़ में कहीं कहीं बजाहिर नाज़िर को इख़तिलाफ़ और तनावुज़ नज़र आएगा। यह ऐसा ही है जैसे उलमा की तहक़ीक़ कभी कभी बदल जाया करती है। आप क़ुद्दिस सिर्रहू ख़ुद फ़रमाते हैं: ‘‘अगर उलूम व मआरिफ़ के बयान करने में कि वह अहवाल व मुआजीद के तर्जुमान हैं कहीं कोई तनावुज़ या इख़तिलाफ़ मालूम हो तोउसे औकात के मुख़तलिफ़ होने पर और हालात व कैफियात के जुदागाना होने परमहमूल करना चाहिए क्यों कि हर वक़्त अहवाल व मुआजीद भी मुख़तलिफ़ होते हैं और हर मक़ाम में उलूम व मआरिफ़ भी जुदागाना हुआ करते हैं। पस सही यह है कि उन में तनावुज़ या इख़तिलाफ़ नहीं होता। उन की मिसाल अहकाम शरएहि की तरह है कि वह मंसूख़ और तब्दील होने के बाद मुतनाक़ज़ नज़र आते हैं, लेकिन जब औकात और हालात के इंकलाब पर नज़र की जाती है तो वह तनावुज़ और इख़तिलाफ़ रफा हो जाता है और इस में अल्लाह तआला की बड़ी हिकमतें और मस्लिहतें हैं, पस शक करने वालों में से न हो।’’(हज़रात अलक़ुद्स)

अब आप चंद मआरिफ़ व हक़ायक़ समाअत फरमाएं जिन से ईमान को जिला, अक्ल को नूर और क़ल्ब को सर्वर हासिल होगा और उलूम की दौलत से मालामाल हूँ गे, अगर कहीं कुछ इशतिबाह रह जाए तो इसी मक्तूब की तरफ़ रुजू करें जिस से में ने इक़तिबास किया

है।

हक़ीक़त बारी तआला:

मक्तूब अव्वल जिल्द दोम में आगाज़ करते हुए यों तआरुफ़ फ़रमाते हैं:

‘‘अलहम्द लिल्लाह अलज़ी जाल अलामकान मराआ त ललोजोब वसीरा लअदम मज़हरा ललवजूद,वाल्वजूब वाल्वजूद व ऎ न काना सफ़तई कमाल ला सुब्हानहू फहू तआला विराइहुमा बल वरा जमी उलास्मा वालसिफ़ात व वरा जमी उलशेविन वाल्तबारात व वरा अलज़हूर वालबतून व वरा अलबरूज़ वालकमोन व वरा इल्तिजल्लियात वालज़हूरात व वरा कल मौसूल विमफ़सूल व वरा अलमुशाहदात वा लिमकाशफ़ात व वरा कल महसूस व माकूल व वरा कल माकूल व वरा कल मो होम विमतख़ील फहू सुब्हानहू वरा अलवरा सम वरा अलवरा सम वरा अलवरा’’

चुगोयम बातो अज़ मुर्गे निशाना

कि बा अन्क़ा बूद हम आशियाना

ज़ोअन्क़ा हस्त नामे पेश मर्दुम

ज़मुर्ग़ मिन बूद आं नाम हम गुम

यानी तमाम खूबियां इस अल्लाह के लिए जिस ने इमकान को वजूब का आईना बनाया और अदम को वजूद का मज़हर किया,और वजूब व वजूद अगर चह अल्लाह तआला की सिफ़ात कमाल हैं,पस अल्लाह तआला उन दोनों से विरा बल्कि तमाम असमा वस्फ़ात से विरा,जमी शिवनात और एतबारात से विरा और ज़ुहूर वबतून से विरा,बरोज़ विकिमोन से विरा,तजल्लियात वज़होरात से विरा,हर मौसूल विमफ़सूल से विरा,मुशाहदात और मकाशफ़ात से विरा,हर महसूस विमाकल से विरा और हर मौहूम विमतख़ील से विरा तो वह सुब्हानहू वरा अलोरा है,फिर वरा अलोरा और फिर वरा अलवरा।

वाक़ा:

लुत्फ़ की बात यह कि एक बार कैम तरीका अहमदिया हज़रत मिर्ज़ा जानजानां शहीद देहलवी

रहमत अल्लाह अलैहि आक़ाए का नात ﷺ के जमाल जहां आरा से मुशर्रफ़ हुए,फ़रमाते हैं में ने अर्ज़ किया: हुज़ूर! हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के बारे में किया फ़रमाते हैं? आप ﷺ ने फ़रमाया: उन जैसा मेरी उम्मत में दीगर कौन है?(मसल ईशां दर उम्मत मिन दीगर केस्त?) में ने अर्ज़ किया: या रसूल अल्लाह! उन के मक्तोबात नज़र मुबारक से गुजरे हैं? फ़रमाया : अगर कुछ याद हो तो पढ़ो! बंदा ने आप के मक्तोबात की यह इबारत कि उन्ह तआला वरा अलवरा सम वरा अलवरा पढ़ी,आका अलैहि अस्सलात वस्सलाम ने बहुत पसंद की और लुत्फ़ अंदोज़ हुए,फ़रमाया:फिर पढ़ो! में ने फिर यह इबारत अर्ज़ की,आप ने पहले से ज़्यादा तारीफ़ फ़रमाई,यह हालत देर तक रही।(मुक़ामात मज़हरीय स:59)

मक्तूब 22 जिल्द 3 में फ़रमाते हैं:

‘‘हज़रत हक़ सुब्हानहू व तआला नफ़्स वजूद में और तवाबा वजूद के तमाम कमालात हयात,इल्म,कुदरत,समा,बस्र,इरादा,कलाम और तक्वीन में अपनी ज़ात अक़्दस के साथ काफ़ी है और उन कमालात के हुसूल में सिफ़ात ज़ायदा का मुहताज नहीं है,हर चंद सिफ़ात कामला ज़ायदा भी इस के लिए साबित हैं,पस अल्लाह तआला जिस तरह अपनी ज़ात अक़्दस के साथ मौजूद है न कि वजूद से,इसी तरह अपनी ज़ात से ज़िंदा है न कि हयात से कि इस की सिफ़त है और अपनी ज़ात से दाना है न कि सिफ़त इल्म से और अपनी ज़ात से बीना है न कि सिफ़त बस्र से और अपनी ज़ात से सुनने वाला है न कि सिफ़त समा से और अपनी ज़ात से तवाना है न कि सिफ़त कुदरत से और अपनी ज़ात से इरादा करने वालाहे न कि सिफ़त इरादा से और अपनी ज़ात से गोया और कलाम करने वाला है न कि सिफ़त कलाम से और अपनी ज़ात से ईजाद कायनात का मुबदा है न कि सिफ़त तक्वीन से।’’

इस्बात सिफ़ात ज़रूरी क्यों:

यहाँ हर कोई सवाल कर सकता था कि कि जब अल्लाह तआला की ज़ात तमाम कमालात के हुसूल में काफ़ी है तो फिर सिफ़ात क्यों साबित की जाती हैं,जिस से तादद कदमा का कौल लाज़िम आता है इसी लिए फिलासफा और मोतज़िला ने ज़ात पर इकतिफ़ा किया और वजूद तादद कदमा से ग्रेख़्ता रहे जिस की वजह से नफ़ी सिफ़ात के कायल हो ग्ये।

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू जवाब में फ़रमाते हैं कि हज़रत ज़ात तआला वितक़दस हर चंद हुसूल कमालात में काफ़ी है लेकिन इश्याय की तक्वीन और तख़लीक़ में सिफ़ात ज़ायदा से चारा नहीं क्योंकि अल्लाह तआला की ज़ात ग़ायत दर्जा पाकी और तक़दस में है और इंतिहाई दर्जा अज़मत विजलाल विकिबरियाई में कमाल गुना इस के लिए साबित है और इस को अश्या के साथ मुकम्मल बे मुनासबती है अन् अल्लाह ग़नीमٌ अन उलआलमैन और हिक्मत के मुक़तज़ा और आदत के मुआफ़िक़त की वजह से इफ़ादा वास्तफ़ाज़ा में मुस्तफ़ीद विमुस्तफ़ीज़ के साथ मुनासबत से चारा नहीं था।

सिफ़ात ही में जिन्हों ने एक दर्जा तंज़िल फ़रमाकर ज़लीयत पैदा कर ली है और अश्या के साथ मुनासबत अगर चह किसी दर्जा कर हासिल करली है अगर सिफ़ात का तवस्सुत हाइल न होता,अश्या से किसी श का हुसूल मुतस्व्वर न होता क्योंकि अनिवार हज़रत ज़ात तआला वितक़दस के शुवाओं के ग़लबात में अश्या को सिवाए हलाकत वफ़ना और इन्हिराफ़ वानदाम के कोई नसीब नहीं है।

वह लोग फ़िक्र से आरी हैं जो सिफ़ात को साबित नहीं करते हैं और अश्या के ईजाद को ज़ात बहत जल सुल्ताना के साथ मंसूब करते हैं’’ इसी मक्तूब मुबारक में इस मौज़ू से मुताल्लिक़ निहायत फ़ाज़िलाना बहसें हैं मगर निहायत दकीक़ होने की वजह से में ने बस उन्हें पर इकतिफ़ा किया है।