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Allama Afaque Ahmad Mujaddidiतजदीद अल्फ़ सानीतसव्वुफ़ वसूफ़िया

अध्याय 44 में से 57पृष्ठ 616–626

तसव्वुफ़ वसूफ़िया

रहा है इसी को लोग वसीअ अलख़लाक़ी कहते हैं मगर हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की नज़र में वह सारे उमूर थे जो आप ने पढ़े कि तसव्वुफ़ में योग्यत कैसे कैसे और किस क़द्र शामिल हो गई थी,और उन हिंदू पेशवाओं की क़द्र व अज़मत किस क़द्र दलों में बैठती जा रही थी? लिहाज़ा आप के तसव्वुफ़ की बुनियाद इस्लाम व कुफ्र के दरमियान मुकम्मल इमतियाज़ पर थी और नफरत पर थी और सख्त ताकीद थी कि हर मामला में उन से बचा जाए,इस सिलसिले में अगर आप हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू का मिजाज पढ़ें तो आप को बहुत ताजब हो गा।

इस्लाम जब ख़ास कर हिंदोस्तान में फिला फूला यहाँ के जोगी और ब्रह्मन अपने अपने तरीका के मुताबिक काफ़ी सख्त मुजाहिदात करते थे और उन्हें कश्फ़ भी होता था। जब उन मुशरिकीन से इख़तिलात हुआ ख़ास कर अकबर के दौर में हिंदू पेशवाओओं से रब्त व जब्त जब हद से बढ़ा तो उन सूफ़िया ने उन से इस सिलसिले में इस्तिफ़ादा शुरू किया और बहुत से तो उन की बुज़ुर्गी के कायल होने लगे। इस सिलसिले में आप मुख़्तसर तौर पर अकबर के दौर के हालात पढ़ चुके हैं, क़ुरबत का एक सबब अस्नए सुलूक की बाज़ कैफियात की भी दीन है। जहां कुफ्र व इस्लाम उन को एकसां नज़र आता है, देर व हरम में इमतियाज़ यह लोग मलादुओं का झगड़ा करार देते हैं।

यह मक़ाम जमा में पेश आता है। यह चीज़ इस्लाम के लिए किस क़द्र ज़हर थी इस का अंदाजा तो कुछ पढ़े लिखे ही कर सकते हैं। हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने कुफ्र और काफ़िरों की सख्त मुखालफत की और किसी मरहले में किसी तरह का इख़तिलात ग्वारा नहीं किया। इस को आज बहुत से लोग शिद्दत पसंदी समझते हैं लेकिन जो लोग इस्लाम और हुज़ूर ﷺ की ग़ैरत और मिजाज से वाकिफ़ हैं वह जानते हैं कि यह कितनी मोहलिक चीज़ है।

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के इस खालिस इस्लामी तसव्वुफ़ में आप अगर गौर करें गे तो आप को मालूम होगा कि इस में पैहम अमल की पाबंदी, शब् व रोज़ याद इलाही और एतिदाल व

तवस्सुत इख्तियार करना कोई मामूली मुजाहिदा नहीं है अगरचे अवाम की नज़र में चंद दिनों के चले और रोज़े बहुत बड़ी अहमियत के हामिल हैं। हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के तसव्वुफ़ में रियाकारी से दूरी और औकात का तोहफ़्ज़ इस क़द्र है कि बयान नहीं हो सकता है, ख़लवतों की नज़र जो औकात हो जाते थे ग़लबात का शिकार जो लम्हात हो जाते थे आप ने वह राह इख्तियार की कि इस मुजाहिदा में रूहानी तरक्की भी बेशतर थी। कुरआन व सुन्नत की तरवेज व इशाअत भी भरपूर अऔर इर्षादो तरबीयत ख़ल्क़ का अंसर भी बहुत ग़ालिब था मगर उन चीजों को हर एक कहां परख सकता है।

यह चीज़ भी जेहन में रखने की है कि अकबरी दौर में बिगड़े हुए उलमा व सूफ़िया ने जो इस्लाम व तसव्वुफ़ पेश किया था वह ऐसा था कि बहुत से लोगों के लिए बाइस तनफ़र बना हुआ था, इस्लामी क़दरें बे पनाह घट रही थीं। हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू खालिस इस्लाम और खालिस इस्लामी तसव्वुफ़, सहाबा कराम वाला तसव्वुफ़ लोगों के सामने पेश कर रहे थे। आप की तजदीद का यह अंसर हर जगह काबिल लिहाज है।

यह सब इजमाल था, अब हम आप के सामने तसव्वुफ़ व सूफ़िया की कुछ तफ़सील सुपुर्द कलम करते हैं जिस से आप को हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की ख़िदमात का सही अंदाजा हो सकेगा।

तसव्वुफ़ वसूफ़िया:

यह बात निहायत ही अहम है कि सूफ़िया कराम से जो गलतियां सरज़द हुईं और अक़ाइद वामाल पर जो असरात मुरत्तिब हुए इस की क़बाहतें विष्णुआअतें मेरी नज़र में सब से ज़्यादा नुकसान दह साबित हुईं,क्योंकि फलसफा विमंतिक़ और रवाफ़िज़ वख़वारज ने अगर चह इस्लामी अक़ाइद वामाल पर बहुत हमले किए लेकिन बातिल ऐसे लबादे में था कि जिसे आम तौर से पहचान लिया गया इस के बुर खिलाफ़ सूफ़िया ख़ाम से जो गलतियां हुईं वह ऐसी थीं कि जिन्हें पहचाना मुश्किल था,यहाँ गलत हक़ के लिबास में आया,कश्फ़ विषहूद के भेस में सूफ़ियाना

तर्ज़ वोज़ा में दाखिल हुआ इसी लिए इस की शिनाख्त निहायत दुश्वार हो गई बल्कि इसी को लोगों ने स्रात मुस्तक़ीम तसोर करलिया।

ख़याल रहे कि सूफ़िया में तीन जमातें थीं जिन्हें हम तफ़सील से बयान कर चुके एक वह जो इत्तिबा शरीअत से आरास्ता,तक़्वा वतहारत के हामिल,साहिब मुजाहिदात वरियाज़ात और अस्हाब कश्फ़ विषहूद थे इस जमात से जो गलतियां हुईं वह कशफ़ी थीं,इंसान को सुलूक बातिन में मुख़तलिफ़ मराहिल वुमनाज़िल से गुजरना पड़ता है,हर मंज़िल पर नये नये अनिवार वितजल्लियात और जुदा जुदा कैफियात वारद होती हैं,मुख़तलिफ़ अलनवा अहवाल विमवाजीद से दो चार होना पड़ता है ,असनाए राह के मामलात कभी खिलाफ़ शरा भी होते हैं,कभी ऐसे होते हैं कि हक़ायक़ असलिया के खिलाफ़ होते हैं यानी नुकता आखिर पर पहुँच कर जो हक़ायक़ रौनुमा होते हैं उन के खिलाफ़ होते हैं।

इस मुक़द्दस जमात में बड़े बड़े ख़ुदा रसीदा लोग हुए,ऐसी कैफीतें और उमूर क़रीब क़रीब हर सालिक पर वारद होते हैं,मगर उन हज़रात ने बातिन को बातिन ही रखा कभी कभी जब वह अपने काबू में न होते इस वक़्त उन से ऐसी चीजें सरज़द हो गईं जो बजाहिर खिलाफ़ शरा थीं।

अपने मक्शफ़ात को सब से कसरत और बा ज़ाबता तौर पर इस उम्मत में अगर किसी ने सब से पहले बयान किया तो वह हज़रत शैख़ मुही उद्दीन इब्न अलारबी क़ुद्दिस सिर्रहू थे जिन्हों ने उन उमूर को इल्मी रंग भी दिया,हज़रत शैख़ की बुज़ुर्गी वललाहीत चूंकि मशहूर थी और आप मकबूल इंसान थे इसी लिए हर दौर में अक्सरीयत ने आप को कबूल किया ,कुछ उलमा ने रद्द वक़्दह से भी काम लिया और हज़रत शैख़ को बहुत कुछ कह डाला जिस का हज़रत शैख़ के मोतक़िदीन ने दिफ़ा किया ,उन मोतक़िदीन में जो साहिब कलम वाल्म थे उन्हों ने शैख़ के मक्शफ़ात को आलिमाना अंदाज़ में साबित करने की कोशिश की और खूब इल्मी रंग दिया।

और जिन पर तसव्वुफ़ का ग़लबा था और वह अस्हाब कश्फ़ थे उन पर भी चूंकि वही अहवाल वारद होते थे जो शैख़ परिवारद हुवे और उन्हें भी उन ही कैफियात से वास्ता पड़ा इसी लिए जब उन्हों ने शैख़ के बयान करदा मक्शफ़ात के मुताबिक ही अपने मक्शफ़ात पाए और उन्हें भी वही अहवाल विमवाजीद हासिल हुए तो उन्हों ने उन की हक़्क़ानियत पर यकीन करलिया और उन्हें की तरवेज वाशाअत में लग गए,रफ़्ता रफ़्ता उलमा विमशाइख़ इतनी कसरत से जुड़ गए और मुख़तलिफ़ उद्वार और ज़मानों में उन्हें मुख़तलिफ़ इल्मी पैरायों में यों बयान किया गया कि वह मक्शफ़ात गोया उएन इस्लाम बल्कि असल इस्लाम बिन ग्ये,उन की मुखालफत करने वाले मतऊन विमलऊन करार पाए,बहुत से मुतवक़्क़्फ़ भी थे।

यह बात भी ध्यान में रखने की है कि सर्वर कोनेन ﷺ की गुफ़्तगू और हदीस जिस मंज़िल से थी,आप के सोहबत या फ़त्ह हज़रात पर आप का पर तो और अक्स वितजली पड़ी लिहाज़ा कुरआन वसंत में जो अक़ाइद वामाल सराह नहीं बयान किए ग्ये हैं उन के इस्तिंबात वास्तुख़राज में उन बुजुर्गों की रहनुमाई वही शरफ़ सोहबत करता रहा जिस की वजह से उन पर हक़ायक़ रोशन होते चले गए,ताबईन वतबा ताबईन में भी महबूब कोनेन ﷺ की निसबतें बहुत ग़ालिब रहीं जिस का असर उलमा-ए रब्बानियेन पर यह रहा कि अल्लाह तआला की तौफ़ीक़ से उन्हें अक़ाइद वामाल में सही इरफान हासिल होता रहा,उन में जो सिर्फ़ इल्म वफ़ज़ल वाले थे वह अपने नज़र वास्तुदलाल और जो इस के साथ साथ साहिब कश्फ़ विमुशाहिदा भी थे उन पर जो उमूर मुनकशिफ़ होते वह अहद नुबुव्वत से क़ुर्ब की वजह से नफ़्स अलामर के मुताबिक होते थे।

उलग़र्ज़ मशीयत इलाही मुक़तज़ी थी कि दीन के दोनों हिस्से अक़ाइद वामाल सही तौर पर मुरत्तिब विमंजब्त हो जाएँ तो यह काम वैसे ही हुआ और बिलआख़िर उलमा-ए अहले सुन्नत ने ताईद ग़ैबी से उन को पूरे तौर पर मुरत्तिब करलिया,फिर उन की हिफाज़त वस्यान्त के लिए हर दौर में

उलमा-ए हक़ पैदा होते रहे,अगर चह अहद नुबुव्वत से जो M जों दुनिया दौर होती चली गई नूर सुन्नत निकलता रहा और अक़ाइद वामाल में बिद्दतें जुड़ पकड़ती रहीं,मगर उलमा-ए हक़ हमेशा ज़ुल्मतों के पर्दे चाक करते रहे और हक़ को हक़ और बातिल को बातिल साबित करते रहे,अगर चह हर दौर में कमी आती रही।

ग़ैबी तौर पर एक ख़ास इंतजाम यह भी हुआ कि अहद नुबुव्वत से दूरी की वजह से जब सरकार मदीना ﷺ की निसबतों में अज़महलाल और कमज़ोरी पैदा होने लगी तो रफ़्ता रफ़्ता लोगों ने मुजाहिदात वरियाज़ात शुरू किए फिर धीरे धीरे एक जमात तैयार होगई जिन्हें सोफिया कराम कहा गया उन्हों ने बा ज़ाबता उसूल व ज़वाबत मंज़िबत किए और बड़े बड़े होश रब्बा मुजाहिदात किए जिन के नतीजे में मुख़तलिफ़ किस्म के अनिवार और हालात विकिफ़यात का उन पर वरूद होने लग्गाऔरपरवर्दिगार आलम की गोना गों तजलियाँ मुख़तलिफ़ अकूस विमुज़ाहिर में जलवा गर होने लगीं।

औलीए कराम के मुशाहदात इस बात पर शाहिद हैं कि मुख़तलिफ़ आमाल सालहा की कैफियात वानिवार भी मुख़तलिफ़ हैं और उन के सिलसिले में वारद होने वाले अहवाल विमवाजीद भी मुख़तलिफ़ हैं।

फिर उन बुजुर्गों पर जो मनाज़िल विमराहिल और हालात विकिफ़यात वारद विमनकशफ़ हुईं उन्हों ने उन के नाम और इस्तिलाहें भी मुक़रर करदें,और रफ़्ता रफ़्ता दीगर फ़नून मसला नहव वसिर्फ़ की तरह तसव्वुफ़ एक मुकम्मल फन बिन गया और इस की भी दो हैसियतें हो गईं एक इल्मी और दूसरे अमली।

मुख़तलिफ़ हालात वासबाब की वजह से उन बुजुर्गों में बहुत से लोग फ़र्क़ नहीं कर पाए,और हर इंसान का ज़र्फ़ और इस्तिदाद चूंकि जुदा जुदा है इस लिए कोई किसी मंज़िल पर तो कोई किसी मंज़िल पर पहुँचा,जो कि आखिरी मंज़िल पर न थे इस असनाए राह के मक्शफ़ात जिन में

अक्सर शरीअत से मुतसादिम थे लोगों ने उन को आखिरी मंज़िल समझ लिया और कैद तहरीर में ले आये।

जिन उलमा पर इल्मी रंग ग़ालिब था और उन बुजुर्गों से अकीदत वाहतराम का ताल्लुक था उन्हों ने उन के तक़दस की वजह से उन के अक़्वाल वाफ़आल में अच्छी ता वेलात कर लें जिन की वजह से एक फायदा तो यह हुआ कि अक़ाइद हुक्का महफूज़ रहे,उन उलमा ने असल उन अक़ाइद वामाल को करार दिया और मक्शफ़ात को ताबे रखा,दूसरा फायदा यह हुआ कि उन बुजुर्गों का तक़दस मलहूज़ रहा,यह बहुत सलामती का रास्ता था।

कुछ वह उलमा थे जिन पर उन बुजुर्गों की निस्बत वाकीदत के ग़लबा की वजह से तसव्वुफ़ का रंग ग़ालिब हो गया,उन्हों ने उन बुजुर्गों के मक्शफ़ात की ताईद में तरह तरह की इल्मी बहसें छेड़ दें और इल्मी रंग दे दिया बा लआख़र बहुत सी कुत्ता बें वजूद में आ गईं।

यहाँ यह चीज़ भी ध्यान में रखने की है कि जो ख़ास ख़ास ज़मानों में बड़े बड़े औलीए कराम हुए वह चूंकि सुलूक और बातिनी परवाज़ में आखिरी हदों तक पहुँच गए थे जहां मक्शफ़ात शरीअत के मुताबिक हो ते हैं,इस लिए उन की ज़बान से जो भी वजूद में आया इस की कोई ख़ास क़द्र नहीं की गई,क्योंकि आम उलमा-ए हक़ के बयान फर्मौदा उलूम उन के मुताबिक थे इस लिए कम ज़र्फ़ लोगों को कोई वजह इमतियाज़ नज़र नहीं आई,और जो मकाशफ़ात उलमा-ए हक़ के उलूम से मुतसादिम थे वह एक नयी चीज़ थे,फ़ित्रत ऐसी चीजों की तरफ़ मेलान होता है,लिहाज़ा उन्हें कबूल कर लिया गया और असास वबुनियाद बना दिया गया,चूंकि उन में एक किस्म का इमतियाज़ था,ख़ुसूसीयत थी।

उलग़र्ज़ यही वह असबाब वहालात थे जिन की वजह से मुख़तलिफ़ नाम वगैरह वजूद में आये,किसी का नाम शरीअत,किसी का तरीक़त,किसी का हक़ीक़त रखा गया और उन के अलावा दीगर इस्तिलाहात क़ायम हुईं।

सोफिया कराम में एक तो मुक़द्दस जमात वह थी जिस ने मुख़तलिफ़ हालात व वारदात के होते हुए भी शरीअत के दामन को मजबूती से थामे रखा और अपनी ताबीरात में भी उन का लिहाज रखा,मगर एक जमात ऐसी पैदा हो गई जिन्हों ने शरीअत,तरीक़त और हक़ीक़त में अजीब तरह के फ़र्क़ शुरू कर दिए और सूफ़िया कराम के मक्शफ़ात को ऐसे मआनी विमफा हेम पर महमूल किया जिस की वजह से आगे चल कर लोग इलहाद वजंदक़ा तक पहुँच गए और अहकाम शरा तक पर अमल को गैर ज़रूरी करार दे दिया गया,फिर रफ़्ता रफ़्ता ऐसे उमूर वजूद में आये कि बयान से कलम लरजता है।

पहला गिरोह जिस से मेरी मुराद वह सूफ़िया कराम हैं जिन्हों ने असनाए राह के मक्शफ़ात बयान किए और वह शरीअत के उसूल वुज़ूइबत से मुतसादिम थे मगर यह लोग अपने सिदक़ नियत वाख़िलास ,तक़्वा वतहारत,इल्म वफ़ज़ल विबुज़ुर्गी में मशहूर थे,उन के सरबराह अक्सर मिसाइल में हज़रत शैख़ मुही उद्दीन इब्न अलारबी क़ुद्दिस सिर्रहू हैं।

जिस बस्त वितफ़सील से उन्हों ने अपने मआरिफ़ वालोम बयान किए हैं शायद किसी ने बयान नहीं किए,उन के मआरिफ़ दो किस्म के थे,एक वह जिन से शरीअत साकित वख़ा मोश है,उन के इस किस्म के मआरिफ़ व उलूम आम तौर पर मकबूल हुए,दोम वह जो ज़ाहिर शरा से मुतसादिम थे,इस किस्म में उलमा मुख़तलिफ़ हो गए एक वह थे जो शख़्सियात को नज़रियात से पहचानते थे और खालिस इल्म का ग़लबा था उन्हों ने शैख़ की शिद्दत के साथ तरदीद की और बहुत कुछ कह डाला,और दूसरे वह थे जिन को शैख़ के साथ हसन ज़न था उन्हों ने शैख़ की अज़मत को मलहूज़ रखा और तावेल से काम लिया और कुछ ऐसे लोग भी थे जिन की इल्मी हैसियत कमजोर थी और उन्हों ने ज़ाहिर पर महमूल किया और उन की तरवेज वाशाअत की और तरह तरह फ़ासद खयालात पैदा किए जिन में बाज़ तो हद कुफ्र तक पहुँच गए।

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने शैख़ के दोनों किस्म के मआरिफ़ में इख़तिलाफ़ किया और

जो वाक़ई हैसियत थी वह ज़ाहिर फ़रमादी,हज़रत शैख़ के अलावा भी जिन बुजुर्गों से किसी सबब से अगर ऐसे अक़्वाल वाफ़आल सादर हुए जो शरीअत से मुतसादिम थे उन में अगर तावेल की गुंजाइश थी तो तावेल फ़रमादी अच्छे महम्मल पर महमूल फ़रमादिया और इस का सबब बयान फ़रमाकर उन की तरफ़ से उज़्र भी पेश करदिया,आप ने इस किस्म के सूफ़िया की इज्जत वहरमित का इस क़द्र लिहाज रखा है कि बयान से बाहर है।

आम तौर पर रद्द वक़्दह वालों का तरीका यह होता है कि गिरफ्त का अंदाज़ शख्सियतों की अज़मत को मजरूह कर देता है मगर आप का जुदा गाना ही तरीका है,गिरफ्त पर आते हैं तो कोई गोशा नहीं छोड़ते हैं मगर साथ ही साथ उन की बा अज़मत शख्सियत के माअनवी खद वख़ाल भी ज़ाहिर फ़रमाते रहते हैं ताकि क़ारी काबिल गिरफ्त बातों से धोका खा कर उन की तो हीन वतन्क़ीस का मुर्तक़िब न हो ने पाए और न ही उन की अज़मत के नुक़ूश उन के दलों से निकलने पाएं,यह सब कुछ आप बातफ़सील पढ़ें गे।

हां! दूसरे किस्म के सूफ़िया जो अमल में भी कमजोर और माअनवी खूबियों से आरी,महज़ तक़लीदन बुजुर्गों की काबिल गिरफ्त बातों को मानते और उन पर अमल करते उन के गलत मआनी विमफ़ाहीम पैदा करके अवाम को बहकाते और शरीअत को बे वक़ार साबित करते हैं ऐसे लोगों पर जब रग फ़ारूक़ी हरकत में आती है तो जलाल देखने लायक होता है।

यहाँ एक बात ख़ास तौर से ध्यान में रखने की है कि सूफ़िया कराम और बुजुर्गों से अवाम वख़वास का ताल्लुक उमूमा अकीदतमंदाना रहा है इस मुक़द्दस जमात के तक़दस और तक़्वा वतहारत और ख़ौफ़ वख़शीयत की वजह से लोगों को कलबी लगाव रहा है ,उन की बातिनी अज़मत के ख़ौफ़ से अहले हक़ ने हमेशा उन के सिलसिले में एहतियात का रवैया इख्तियार किया है इसी वजह से सूफ़िया कराम के यह मक्शफ़ात जो बजाहिर शरीअत से मुतसादिम थे

अगर चह उन उलमा में मकबूल न हुए जिन पर इल्मी रंग ग़ालिब था मगर जो सूफ़िया की जमात थी उन में बहुत मकबूल हुए।

फिर जिन पर नफ़्स का ग़लबा था और सूफ़िया के लिबास में थे मगर सोफी न थे और कम इल्म भी थे उन्हों ने महज़ नफ़्स की खातिर उन को बहुत उछाला और नरों ने तो ज़लालत विगमरही के दरवाजे खोल दिए,अवाम तो अवाम निरे ख़वास में भी यह लिया कत् नहीं होती है कि वह सच्चे सोफी को पहचान सकें फिर अवाम वख़वास का ताल्लुक भी वालहाना रहा इसी लिए सूफ़िया से दीन को जबरदस्त नुकसान पहुँचा और लोगों पर बुरे असरात मुरत्तिब हुए।

जिन उलमा को अकीदत का ताल्लुक था उन्हों ने ज़बान नहीं खोली और जिन्हों ने खोली तो वह बहुत कम थे और फिर हद से बढ़ ग्ये इस लिए अवाम ने उन की सन्नी भी नहीं और इस तरह रफ़्ता रफ़्ता यह बुराइयां पूरी इस्लामी दुनिया में आम हो गईं,फिर उन का ताल्लुक ज़ात वस्फ़ात बारी से भी था,नुबुव्वत वरिसालत से भी और इस के अलावा दीन के दीगर शोबों से भी।

हक़ीक़त यह है कि फलसफा,मंतिक़ और रवाफ़िज़ वख़वारज से अहले सुन्नत को इतना नुकसान नहीं पहुँचा जो उन से अक़ाइद वामाल में पहुँचा है,वहाँ बातिल इतना बे पर्दा था कि लोग ब आसानी पहुचा न गए जबकि यहाँ जबरदस्त हक़ का लबा दह ओढ़े हुए था,तजदीद अल्फ़ सानी का यह गोशा इतना अहम है कि सारी तजदीदें एक तरफ़ रख दी जाएँ तो उन सब पर यह तजदीद भारी साबित होगी ,यह वह बुराइयां थीं जो अल्फ़ अव्वल(हजार अव्वल) के इबतिदाई चंद सदियों के बाद फैलना शुरू हो ईं और रफ़्ता रफ़्ता जिन्हों ने पूरे आलम इस्लाम को अपनी लपेट में ले लिया और इस अंदाज़ विलिबास में लिया कि जिन के खिलाफ़ लब कुशाई मुश्किल हो गई।

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की तजदीद को दर असल अवाम तो अवाम अक्सर ख़वास ने भी नहीं समझा वर्ना वह जान लेते कि यह तजदीद मा है या तजदीद अल्फ़? यह सिर्फ़ हिंदोस्तान में

दीन की तजदीद है या पूरे आलम इस्लाम में? फिर यहाँ भी शान तजदीद की जलवा गिरी का अंदाज़ वही है कि एक बड़ा से बड़ा आरिफ जहां तक की खबर दे सकता है आप बातिनी मुशाहदात को इस से भी आगे बयान फ़रमाते चले जाते हैं,जो कुछ दूसरों ने उन मंजिलों और मरहलों के बारे में बयान किया जिन से वह गुजरे थे आप उन से कहीं ज़्यादा पर्दे उठाते चले जाते हैं फिर कमाल यह कि जगह जगह कुरआन वसंत से इस्तिदलाल,कश्फ़ वाल्हाम सरीह से ताईद आप का आम दस्तूर है।

अब हम क़दरे तफ़सील से इस बाब को बयान करते हैं ताकि क़ारईन देख लें कि जो कुछ उन तमहीदात में कहा गया है वह जोर कलम नहीं बल्कि हक़ वस्दाक़त का जबरदस्त शाहकार है,और हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू का जबरदस्त का रनामा भी।

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू का उसूल:

सब से पहले आप मक्शफ़ात के सिलसिले में हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू का उसूल समझ लें और वह तराजू जेहन में रखें जिस से आप अपने और प्राय के मक्शफ़ात तुला करते थे मक्तूब 256 जिल्द अव्वल में फ़रमाते हैं:

‘‘अज़ जुमला जरूरीयात तरीक़ सालिक एतिक़ाद सही अस्त कि उलमा-ए अहले सुन्नत आंरा अज़ किताब वसंत वासार सल्फ इस्तिंबात फर्मौदा इंद विकिताब वसंत रा महमूल दाश्तन बुर मआनी कि जमहूर उल्मा अहले सुन्नत विजमाअत आं मआनी रा अज़ां किताब वसंत फ़हमीदा इंद नीज़ जरूरयस्त।’’

तर्जुमा:तरीक़त के सालिक के लिए एतिक़ाद सही जरूरीयात से है कि उलमा-ए अहले सुन्नत ने उन को किताब वसंत और आसार सल्फ से इस्तिख़राज फ़रमाया है और किताब वसंत को उन मआनी पर महमूल रखना कि जिन पर जमहूर उलमा-ए अहले हक़ ने यानी उलमा-ए अहले सुन्नत विजमाअत ने उन मआनी को किताब वसंत से समझा है यह भी ज़रूरी है।

इस से मालूम हो अ कि सालिक सुलूक में क़दम रखते वक़्त अपना अक़ीदा उलमा-ए अहले सुन्नत के मुताबिक करे वर्ना सुलूक बे कार है,फिर कुरआन वसंत से इस्तिदलाल तो हर बातिल फ़िर्क़ा भी करता है और लोगों ने अपने अपने मज़ऊमात के मुताबिक नसोस को ढालने की कोशिश की है,इस सिलसिले में मोतबर सिर्फ़ वही राय और वही माना हूँ गे जो उलमा-ए अहले सुन्नत ने समझे हैं दूसरों की समझ का कोई ऐतबार न हो गा अगर चह वह सूफ़िया और विलायत के ताजदार ही क्यों न हूँ,फ़रमाते हैं:

‘‘वागर बिलफ़र्ज़ खिलाफ़ आन मआनी मफ़हूमा बक्शफ़ वाल्हाम उमरे ज़ाहिर शिवदानरा ऐतबार नबायद कुर्द वाज़ां इस्तिआज़ा बायद नमूद’’

यानी अगर उलमा-ए अहले सुन्नत के मुराद लिए हुवे मआनी के खिलाफ़ कश्फ़ वाल्हा म से कोई अम्र ज़ाहिर हो तो इस का ऐतबार नहीं करना चाहिए और इस से पनाह मांगनी चाहिए।

इस चीज़ को आप ने मुतअद्दिद मक्तोबात में बयान फ़रमाया और इसी कसौटी पर सब को परखा है,अब हम चंद मक्शफ़ात अहम अहम हज़रत शैख़ मुही उद्दीन इब्न अलारबी विदीगर औलीए कराम रहमत अल्लाह अलैहिम अजमईन के बयान करते हैं,हज़रत शैख़ के मक्शफ़ात के सिलसिले में आप क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं:

‘‘अक्सर मआरिफ़ कशफ़्या अव कि अज़ उलूम अहले सुन्नत जुदा उफ़्तादा अस्त अज़ सवाब दौर अस्त पस मुताबेत निकंद आं रा मगर किसे कि दिलश मरीज अस्त या मुक़ल्लिद सिर्फ़।’’ यानी शैख़ के अक्सर मआरिफ़ कशफ़्या जो कि अहले सुन्नत के उलूम से जुदा हुए वह सवाब से दौर हैं तो उन की पैरवी वही करे गा जिस का दिल मरीज है या वह जो खालिस मुक़ल्लिद है।