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Allama Afaque Ahmad Mujaddidiतजदीद अल्फ़ सानीहज़रत मीर मुहम्मद नोमान साहिब

अध्याय 36 में से 57पृष्ठ 489–501

हज़रत मीर मुहम्मद नोमान साहिब

अपने ख़लीफ़ा हज़रत मीर मुहम्मद नोमान क़ुद्दिस सिर्रहू को हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने खिलाफत दे कर ख़िदमत वाहियाए सुन्नत के लिए बुरहानपुर भेजा,तीसरी मर्तबा हज़रत मीर को इस दयार में कितनी बड़ी कामयाबी मिली और किस क़द्र लोगों का रुजू हुआ,मुजद्दिदी कमालात से कैसे सीने रोशन हुए,अल्लामा बदरुद्दीन सरहंदी रहमत अल्लाह अलैहि फ़रमाते हैं:

‘‘हज़रत मुजद्दिद के हुक्म की तामील में बुरहानपुर गए वहाँ आप को मक़बूलियत अज़ीम हासिल हुई और इस क़द्र आप के तसर्फ़ और सोहबत का असर हुआ कि इस की तफ़सील लिखने के लिए एक इलियाहदा किताब की ज़रूरत होगी फ़क़ीर वामीर और अहले गफलत या अहले हुज़ूर पर आप की सोहबत वितसिर्फ़ के असर से इस क़द्र जज़्ब विमस्ती का ग़लबा हुआ कि वह लोग अपने कपड़े फाड़ देते थे और मुर्ग़ बिस्मिल की तरह जमीन पर तड़पते थे और कभी कभी तीस चालीस आदमी एकबारगी होश खो बैठते और जमीन पर गर पड़ते बल्कि देखने वालों में से भी सूफ़िया के मुनकर (ग़ालिबन) भी मोतक़िदों की तरह मदहोशी और बे ख़ुदी से जमीन पर लौटते थे और तड़पते थे मीर साहिब के तसर्फ़ात इस हद तक हुए कि दूसरे मशाइख़ के मुरीद

भी जो इस शहर में थे बे इख्तियार हो कर उन के हलक़ा इरादत में दाखिल हो गए और बहुत से फ़ासिक़ भी इसलाह पज़ीर हो गए और बहुत से होश वाले बे ख़ुदी और जज़्ब से सरशार हो गए’’कुछ आगे चल कर फ़रमाते हैं:

‘‘चूंकि मीर साहिब को हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के साथ आप के अस्हाब में सब से ज़्यादा इश्क विमहबत का इमतियाज़ हासिल था इस लिए उन की शहरत विमक़बूलियत न सिर्फ़ हिंदोस्तान में बल्कि रुबा मस्कून में सूरज की तरह हो गई थी,मुरीदों की कसरत इस दर्जा थी कि बाज़ दुश्मनों ने सुलतान वक़्त(जहांगीर) तक यह बात पहुँचाई कि आप के मुल्क की सरहद बुरहानपुर के शहर में एक दरवेश है जो ख़ुद को हज़रत मीर कहलाता है और इस के मुरीद एक लाख अज़बकी सवार हैं’’(मज़ेद तफ़सील के लिए देखिए हज़रात अलक़ुद्स जिल्द दोम,हालात हज़रत मीर)

हज़रत शैख़ बदी उद्दीन:

हज़रत शैख़ बदी उद्दीन सहारनपुरी रहमत अल्लाह अलैहि को आग्रह भेजा गया मौलाना नूर बख्श फ़रमाते हैं:

‘‘शैख़ को सुलतान हिंद जहांगीर के लश्कर की खिलाफत दे कर बग़रज़ इशाअत तरीका आग्रह में भेजा जहां इस सिलसिला आलीया का कोई ख़लीफ़ा न था और उसे ताकीद करदी कि मुस्तक़िल मिजाज रहना और हमारी इजाजत के बग़ैर वहाँ से न आना,चनां चह शैख़ साहिब लश्कर सुल्तानी में तशरीफ़ ले गए और वहाँ उन को क़बूलीयत आम्मा नसीब हुई,अरकान सल्तनत में से ख़ानख़ानां,आज़म ख़ाँ,ख़ान जहां लोधी,सिकंदर ख़ाँ,सय्यद सदर जहां,इस्लाम ख़ाँ और महाबत ख़ाँ वगैरह दाखिल सिलसिला हो गए और मजलिस हलक़ा गरम होने लगी।’’

यह बात जेहन नशीन रहे कि उन बुजुर्गों की बीअत वारादत आज के पैरों की तरह नहीं थी जो कि सिर्फ़ हलक़ा बढ़ाने के चक्र में रहते हैं उन की इसलाह से कोई

ग़रज नहीं रखते हैं, वहाँ ज़ाहिरी पाबंदियां तो लाज़िम थीं इस के साथ साथ इसलाह क़ल्ब की तमाम तर कोशिशें अपनाई जाती थीं,तवज्ज्हात के ज़रिया क़ुलूब वाज़हान की सफ़ाई की जाती थी और आम तौर पर हर मुरीद एक नेक मुसलमान हो जाता था,बीअत इत्तिबा सुन्नत पैदा करने का अहम ज़रिया थी और अवाम की इसलाह का इस से पुख्ता कोई और तरीका कार नहीं हो सकता था।

यह थी वह मुनज़्ज़म जिद वजहद और कोशिश जो अहयाए सुन्नत और अमातत बिद्दत के लिए की गई,जिन अफराद को हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने सर जमीन सरहिंद पर बैठ कर तैयार किया था उन्हों ने आप की हयात और बाद हयात आप के तजदीदी फ़ैज़ान को किस तरह हर हर मुल्क,हर हर सूबे और क़र्या विशहर में फैलाया और आम किया इस का मुख़्तसर खाका आप ने समाअत फ़रमाया,तारीख आलम में कहीं इस की मिसाल नहीं मिल सकती है कि किसी नबी के दीवाने और शैदाई ने अपने नबी के कमालात और उन के बयान करदा अहकाम विश्राय को इस तरह मुनज़्ज़म तौर पर तन तन्हा आम करदिया हो؎

एं सआदत बुज़ूर बाजू नेस्त

तजदीद शरीअत:

हज़रत मुजददक़दस सिर्रहू का ज़ुहूर और वजूद जिस भया निक दौरमें हुआ है वह उसे आप क़दरे तफ़सील से पढ़ चुके हैं,ऐसे भया निक दौर में तजदीद का काम अंजाम देने के लिए ख़ुदा विंद क़ुद्दूस ने आप को ता हरी व बा तनी औसाफ़ व ख़स्सा ल के साथ आरास्ता कर के इस काम के लिए मुक़रर फ़रमा या यह भी आप पढ़ चुके,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने तन तन्हा ऐसे हो लना क वक़्त में तजदीद का फ़रीज़ा नहा यत का मयाब तरीके से अंजाम दिया उसे भी आप ने पढ़ा,अब मुख़तलिफ़ शोबों पर आप के तजदीदी का रना मों की एक झलक मिला हज़ा फ़रमा ईं।

इस दौर की ता रेख पर आप एक बा र फिर से नज़र डॉ लें तो आप को महसूस हो गा कि अक़ाइद हुक्का ख़ास कर इलाहयात व निबवात के कण अहम और बनिया दी अक़ाइद को मुतज़लज़ल किया जा रहा था,उन हमला आवरों में अकबर के हवारी उलमा-ए सौ भी थे और रवाफ़िज़ भी नीज़ सूफ़िया ख़ाम भी,फलसफा ने तहक़ीक़ात व तदकीक़ात के नाम से शकूक व शुबहात के दरवाजे अलग खोल रखे थे।

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के सामने चारों तरफ़ दुश्मनान दीन ने जिंग के महाज़ खोल रखे थे,आप ने बड़ी संजीदगी के साथ हालात का जा ज़ा लिया और तमाम बुनियादी अक़ाइद को दलों में उतारने और अज़आन व ईक़ान की दौलत अता कर ने का एक अनु खा और निराला तरीका निका ला,आप ने अक़ाइद की तरवेज व इशाअत में एक निराला ढंग यह निका ला कि आम मुतकल्लिमैन की रोष से हट कर अक़ाइद हुक्का को निहायत माकूल अंदाज़ में पुख्ता दलायल के साथ लो गों के साम ने पेश कर ना शुरू कर दिया,क़ारी व ना ज़र को फ़लसफ़ियात की तग व दो में उलझने से बचा या,कुरआन व सुन्नत से इस्बात फिर कश्फ़ व इलहाम सरीह से ता ईद के साथ अक़ाइद कहीं मुख़्तसर तो कहीं तवील मक्तोबात के ज़रिया भेजे,अंदाज़ तहरीर व तकरीरातना निराला कि बात दिल में उतरती चली जा ए और क़ारी को क़दम विदम पर सुकून व इतमीनान का सामान मुहैया हो ता रहे।

आप ने शरीअत के अक़ाइद वामाल को किस क़द्र रिवाज दिया यह आप पढ़ चुके,बीअत व इरादत ऐसा पर कशिश और मजबूत रा सता है जिस के ज़रिया वाबस्ता हो ने वाला फ़र्द हर तरह से अपने रहबर के फरमान पर अमल कर ता रहता है आप ने वही इख्तियार किया और अपनी अनु खी शख्सियत से लोगों को मुतास्सिर किया परवरदिगार ने लो गों के दलों में आप की मुहब्बत डाली और फौज दर फौज लोग आप की तरफ़ आना शुरू हो ए,आप ने आने वालों के ज़ाहिर वबातिन की इसलाह कर के अक़ाइद हुक्का ,आमाल सालहा और अहयाए सुन्नत के लिए उन्हें मुल्क और बैरून मुल्क भेजना शुरू किया इस तरह रफ़्ता रफ़्ता इसलाह व तजदीद का काम हर मुल्क में और

ख़ास कर हिंदोस्तान में बड़ी तेजी के साथ शुरू हो गया।

हिंदोस्तान में आप ख़ुद मो जूद थे,बैरून हिंद अपने ख़ुलफ़ा को भेजा जिन्हों ने अपने अमल व किरदार और तसव्वुफ़ व रूहानियत के ज़रिया अक़ाइद के सिलसिले में अज़आन व यकीन के साथ अक़ाइद की तरवेज व इशाअत की,यह वह का मयाब तरीका था जिसे नोक कलम बयान नहीं कर सकती है,जिस क़द्र कसरत से यह का म इस तरीका से हुआ और मुसलसल कई सदी तक रहा यह अपनी मिसाल आप है,हर किस्म की तजदीद में आप का यह ख़ास अंसर है कि आप नयासे मुनज़्ज़म तरीके से रिवाज दिया और लो गों को आमिल बना या।

दोम आप ने उन तमाम फ़िर्क़ों का मुकाबला तहरीर के ज़रिया भी किया जो इस्लाम व सुन्नत और मजहब अहले सुन्नत को मिटाना चा हते थे ,हम पहले लिख चुके हैं कि यहा M भी आप ने आम मुतकल्लिमैन से अलग थलग रास्ता इख्तियार किया,जिन्हों ने आप के मक्तोबात का मता ला किया है वह जा नते हैं कि आप अपनी बा त को इस अंदाज़ और लब व लहजा में कहते हैं कि ज़ी इल्म हो तो उसे भी लुत्फ़ आता है और आम आदमी हो तो वह भी ब आसानी समझ लेता है।

आप दलायल व ब्राहीन और कैल व क़ाल की नीर नग्यों में क़ारी को उलझा ते नहीं हैं,फ़लसफ़ियात की तश्कीकात सामने नहीं ला ते हैं,अगर कहीं मुख़ालिफ़ीन के बा तल अक़ाइद भी ज़िक्र करते हैं तो इस तरह कि आम पढ़ने वाला भी उन की क़बाहत व बतलान महसूस कर लेता है।

इस वक़्त जितने भी गिरोह और फ़िरक़े इस्लाम व सुन्नत को निशाना बना ए हो ए थे आप ने सभी को नंगा करदिया,आप ने तमाम अहम अहम मिसाइल पर नहा यत तफ़सील से कलम उठाया और बुनियादी उमूर पर इस क़द्र तो जह मुनातफ़ फ़रमाई की बयान से बा हर है,अक़ाइद के सिलसिले में इस दौर में सब से ज़्यादा हमले इलाहयात पर थे फिर निबवात और सहाबा कराम पर,आप ने उन मौज़ूआत पर इस विद्र लिखा है कि सब को जमा करदिया जा ए तो हर मौज़ू पर एक

किताब जमा हो जा ए,आप का निशाना हुकूमत व अहले हुकूमत भी थे और अवाम व ख़वास भी यानी उलमा व सूफ़िया भी।

आप हर मैदान के ग़ाज़ी थे,उलमा की सफ़ में बड़े आलम,सूफ़िया में बहुत बड़े सोफी,अक्ल व खुर्द में तो इतना बुलंद मक़ाम था कि बड़े बड़े सुरंगों थे,सुबह व शाम ज़िक्र व फ़िक्र और मुराक़बात के ज़रिया इसलाह नफ़ूस और तज़किया व तसफ़ीया का काम,दर्स व तदरीस और तहरीर व तकरीर के ज़रिया अक़ाइद व आमाल और दीगर कमालात का अहक़ाक़ और बीअत व इरादत के ज़रिया इशाअत व तरवेज उलग़र्ज़ एक अजीब मंज़र था,अब आप जरा तफ़सील से पढ़ लें कि आप ने यह चो मक्खी लड़ाई कैसे लड़ी है और हक़ का परचम कैसे लहरा या और बा तल का मुँह कैसे का ला किया ?

आप हालात पढ़ चुके हैं कि इलाहयात व निबवात पर फलसफा की तरफ़ से यू रश थी,सूफ़िया ख़ाम ने भी इस सिलसिला में बड़ी को ता हियां बरती थीं,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के कलाम से आप पढ़ चुके कि नुबुव्वत को मशकूक किया जा रहा था,हुज़ूर सर्वर को नैन ﷺ के मुबा रुक ना मों पा पा बिंदिया M आइद हो रही थीं,खुले दरबार में हनूद इस्लाम और मुसलमानों के लिए दिल आजार बा तें कर ते हत्ता कि सर्वर कौन व मकां ﷺ की तो हीन कर ते,मस्जिदें ढाते,कुफ्र व का फ़िरों को किस क़द्र छूट और दिलेरी हासिल हो गई थी यह हर वह शख्स जा नता है जिस ने इस दौर को पढ़ा है।

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने मज़कूरा बा ला राक़ाइद बा तला को अफराद सालिह के ज़रिया जहां दफन किया वहीं तहरीर व तकरीर के ज़रिया भी तमाम गलत अक़ाइद व आमाल का पर्दा फ़ाश किया।

आप ने एक तरफ़ उमरा से रवाबित पैदा किए और उन्हें मुतास्सिर किया हत्ता कि अक्सर तो हलक़ा इरादत में दाखिल हो ग्ये थे या क़रीब क़रीब सब ही आप की बुलंदू बाला शख्सियत व अज़मत के मोतक़िद थे।हुकूमत की लगाम उमरा के हाथ में थी,आप ने कितनी दिलेरी

के साथ कुफ्र और काफ़िरों के खिलाफ़ आवाज़ उठाई यह आप पढ़ें गे,उन उमरा को हर वक़्त हर मुन्ना सब तदबीर से इस्लाम व सुन्नत की अशा अत के लिए जज़्बात से सर क्षार फ़रमा या करते थे।

दो सुरी तरफ़ रवाफ़िज़ के असर व रसूख से जहा नगिरी दौर में मजहब अहले सुन्नत को सख्त ख़तरात ला हक़ हो ग्ये थे,उलग़र्ज़ उमरा व वुज़रा को आप ने इस तरह सुधा रा और उन से हुकूमत का रुख सही इस्लामी ख़ुतूत पर क़ायम कर ने का काम लिया और अवामी सतह पर आप ने इसलाह अक़ाइद व आमाल के लिए आप ने मुबलग़ों और दा इयों की वह बड़ी जमार तिया र की जो उलूम ज़ाहिरी व बा तनी दो नों के हामिल थे,इस तरह आप ने दो तरफा का म शुरू किया और उन तमाम रहबरों की रहबरी की पोल खोल दी जूदीन के नाम पर अपने पेट भर रहे थे।

शरीअत के हर बनिया दी और अहम मसले पर आप ने तो जह दी और हर तरह से शरीअत की ता ईद व तौसीक़ की और तमाम का मिया बियों का मदार शरीअत पर अमल करार दिया।

अब हम चंद इक़तिबा सात सुपुर्द कलम करते हैं जिन से आप देखें गे कि इस मर्द मजा हद ने कैसी जिंग लड़ी है और किस तरह हर मैदान में बा तल को पछाड़ा है?

उमरा के नाम ख़ुतूत:

(1)उमरा वाराकीन में सब से ज़्यादा शैख़ फरीद,ख़ानख़ानां के नाम मक्तोबात हैं,अगरचे जहांगीरी दरबार के तमामी उमरा के नाम आप ने ख़ुतूत भेजे हैं और मौका विमहल के लिहाज से उन्हें खूब इस्तेमाल किया है,जिस वक़्त जहांगीर की तख़्त नशीनी हुई आप ने दरबार के एक अमीर लाला बैग को उभारा कि अभी निया निया मामला हैआग़ाज़ ही से अगर बादशाह सुधर गया तो कितना बड़ा काम हो जाए गा,इस्लाम की ज़बूँ हाली बयान करने के बाद फ़रमाते हैं:

‘‘दर इबतिदाए पादशाहत अगर मुसलमानी रिवाज याफत विमुसलमानां ऐतबार पैदा करदनद फ़बहा वागर अयाज़ा बिल्लाह सुब्हानहू दर तवक़्क़्फ़ उफ़्ताद कार बुर मुसलमानां बसयार मुश्किल ख़्वाहिद शद अलग़यास,अलग़यास सम अलग़यास’’(मक्तूब 81 ज 1)

तर्जुमा: बादशाहत के शुरू में अगर मुसलमानी ने रिवाज पालिया और मुसलमानों ने ऐतबार पैदा करलिया तो किया कहना,अगर अयाज़ बिल्लाह सुब्हानहू तवक़्क़्फ़(रुकावट पड़गई या ताख़ीर हो गई) तो काम मुसलमानों पर बहुत मुश्किल हो जाए गा,फरियाद! फरियाद! फरियाद!

आप देख रहे हैं कि हालात पर आप को कितनी गहरी नज़र हासिल थी नीज़ कुफ्र वाहिल कुफ्र के रिवाज वग़लबा ने हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू को किस क़द्र मजरूह करदिया था ,किस तरह फरियाद कर रहे हैं,दिल के फफोले किस तरह जल रहे हैं आखिर में कितने जोश वख़रोश से फ़रमाते हैं:

(2)‘‘ताकदाम साहिब दौलत बायं सआदत मस्तसाद गर्दद विकदाम शाहबाज़ बायं दौलत दस्त बुर्द नुमायद’’यानी कौन दौलत मंद इस सआदत के लिए तैयार होता है और कौन शहबाज़ इस दौलत की सबक़त ले जाता है।

(3)शैख़ फरीद जिन के नाम हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के सब से ज़्यादा मक्तोबात हैं खुश किस्मती से उन्हें जहांगीरी दरबार में काफ़ी बड़ा मन्सब और जहांगीर से काफ़ी क़ुर्ब हासिल हो गया था,बादशाह उन पर बहुत एतिमाद करता था,आप क़ुद्दिस सिर्रहू ने उन के मक़ाम विमन्सब से खूब खूब फायदा उठाया हर तरह से उन्हें दीनी कामों के लिए आमादा किया और तरह तरह की नसीहत फ़रमाकर इस्लाम वाहिल इस्लाम की इमदाद वाआनत के लिए उन्हें मैदान में उतारा।

मक्तूब 47 में फ़रमाते हैं जिस वक़्त जहांगीर तख़्त नशीन हुआ और यह खबर आम हुई तो फोरा शैख़ को एक तवील मक्तूब तहरीर फ़रमाते हैं जिस में अकबरी दौर की

ज्यादतियां,अहले इस्लाम पर जुल्म विस्तम और इस्लाम की ज़बूँ हाली,उलमा-ए सौ और सूफ़िया ख़ाम की बे एतिदालियां इजमाला ज़िक्र करते हैं,आगाज़ में यों नसीहत फ़रमाते हैं:

‘‘बादशाह आलम की निस्बत, दिल के मानन्द है बदन की बनिस्बत कि अगर दिल सालिह है तो बदन सालिह और अगर फ़ासद है तो फ़ासद बादशाह की सलाह आलम की सलाह है और इस का फसाद आलम का फसाद’’ फिर कुछ स्तर बाद फ़रमाते हैं:

‘‘इमरोज़ कि नवेद ज़वाल माने दौलत इस्लाम वबशारत जुलूस बादशाह इस्लाम बगोश ख़ास वेआम रसीदा अहले इस्लाम बुर ख़ुद लाज़िम दानिस्तुंद कि मुमद विमुआवन बादशाह बाशिंद वबर तरवेज शरीअत वितक़वियत मिलित दलालत नमाईंद एं इमदाद वितक़वियत ख़्वाह बज़बान मयस्सर शव्द ख़्वाह बदस्त’’

तर्जुमा: आज के दिन कि दौलत इस्लाम के माने के ज़वाल की खुशखबरी और बादशाह इस्लाम के जुलूस की बशारत आम विख़ास के कान पहुँची है अहले इस्लाम अपने उपर लाज़िम करलें कि बादशाह के मददगार विमुआवन हूँ गे और शरीअत की तरवेज और मिलित की तक़वियत पर दलालत करें गे यह इमदाद वितक़वियत ख़्वाह ज़बान से मयस्सर हो या हाथ से।

फिर इमदादवाआनत की सब से बेहतर और फायदा मंद सूरत ज़िक्र फ़रमाते हैं‘‘साबिक़ तरिन दौलत मदद तबीयन मिसाइल शरएहि अस्त वाज़िहार अक़ाइद कलामीया बुर तबक़ किताब वसंत वाजमा उम्मत’’यानी मुददों में साबिक़ तरिन दौलत मिसाइल शरएहि को बयान करना और किताब वसंत और इजमा उम्मत के मुताबिक अक़ाइद कलामीया का इज़हार है।

(4)चूंकि ऐसे वक़्त में मौका परस्त अहले बिद्दत वज़लालत उमूमा फायदा उठा ले जाते हैं और तमिलक वचापलूसी की वजह से उमूमन इक़तिदार हासिल कर लेते हैं जिन से फिर दीन का वही हश्र होता जो अकबर के दौर में हुआ, इसी लिए कितनी बुर वक़्त तंबीया फ़रमाते हैं‘‘ता मुबतदिई वज़ाली दरमियान आमदा अज़राह नबुरद विकार बफसाद न अंजामिद’’ताकि कोई बिद्दती और गुमराह दरमियान में आकर राह से भटका न दे और अंजाम कार फसाद तक न पहुँचे।

(5)फिर उलमा-ए हक़ की निशानदेही फ़रमाते हैं और उलमा-ए सौ की क़बाहतें और बुराइयां और उन के हाथों दीन की तबाही वबरबादी बयान फ़रमाकर इमदाद वाआनत के लिए किस तरह चुस्त और तेज करते हैं:

‘‘अगर किसे बा वजूद इस्तिताअत इमदाद हर किस्म मुददे कि बाशद तक़सीर नुमायद विद्र कारखाना इस्लाम फतूरे वाक़्य शव्द आन मक़सर मुआतब गर्दद’’यानी मदद की इस्तिताअत रखते हुए किसी किस्म की मदद हो और कोई न करे जिस की वजह से इस्लाम में फ़ुतूर वाक़्य हो जाए तो वह कमी करने वाला इताब का शिकार होगा।

(6)फिर ख़ुद जो कर सकते थे और किया तमन्ना थी, इस का इज़हार यों फ़रमाते हैं और मुखातिब को जज़्बात से सरशार फ़रमाते हैं:‘‘बिना अला ज़ालिक एन फ़क़ीर क़लील अलबज़ाअत नीज़ मि ख़्वाहिद कि ख़ुद रा दर जरगा ममदान दौलत इस्लाम अंदाज़द वदरें बाब दस्त विपाए बुज़्नद बहकम मिन कसर स्वादहम फहू मुंहम युहतमिल कि एं बे इस्तिताअत रा दाखिल आं जमाआ कराम साज़ंद’’

तर्जुमा: इसी बुनियाद पर यह फ़क़ीर थोडी पूँजी वाला भी चाहता है कि ख़ुद को दौलत इस्लाम की मदद करने वालों में डाल दे और इस सिलसिले में हाथ पाऊं मारे बहकम‘‘जिस ने उन की जमात बढ़ाई वह उन्हें में से है’’एहतिमाल है कि इस बे इस्तिताअत को इस जमात कराम में दाखिल कर लें।

फिर उन्हें सय्यद फरीद को जो क़ुर्ब विमंजिलत और ताकत वक़्व्वत हासिल हुई थी इस से फायदा उठाने की यों इल्तिजा करते हैं:

(7)‘‘विमुतवक़्क़े अज़ जनाब शरफ़ ईशां आँसुत कि चों इस्तिताअत वक्रब बादशाह बुर वजह उत्तम ईशां रा हक़ सुब्हानहू व तआला मयस्सर साख़ता अस्त दर ख़िला विमला दर तरवेज शरीअत मुहम्मदी अलैहि वाला आला मिन अस्सलात अफ़ज़लहा वमन इलतसलीमात अकमल्हा को शंद विमुसलमानां रा अज़ ग़ुरबत बुर आरंद’’

तर्जुमा: आप के शरफ़ से उम्मीद यह है कि चूंकि बादशाह का क़ुर्ब और इस्तिताअत पूरे तौर पर हक़ सुब्हानहू व तआला ने आप को मयस्सर की है लिहाज़ा ख़लवत विजलोत में शरीअत मुहम्मदी की तरवेज वाशाअत के लिए कोशिश करें और मुसलमानों को ग़ुरबत से निकालें।

आप देख रहे हैं कि इस्लाम और अहले इस्लाम के तुईं दिल की गहराइयों में कितना दर्द था,किस तरह दीवाना वार शरीअत मुहम्मदिया अला मुसद्दिरहा अस्सलात वस्सलाम की तरवेज वाशाअत के लिए कोशां थे।

मक्तोबात शरीफ़ से मालूम होता है कि महज़ ख़ुतूत के ज़रिया ही नहीं बल्कि सल्तनत का रुख इस्लाम और अहले इस्लाम की इज्जत वारोज और कुफ्र वाहिल कुफ्र की ख़वारी विजिल्लत के लिए आप उन अमाइदीन व अराकीन से मुलाकातें भी किया करते थे,चनां चह इसी मक्तूब में ज़िमनन फ़रमाते हैं:

‘‘उम्मीद अस्त कि दरें नज़दीकी इंशा अल्लाह उलअज़ीज़ बशरफ़ हुज़ूर मुशर्रफ़ गर्दद’’ (उम्मीद है कि उन शा अल्लाह जिल्द ही हुज़ूरी के शरफ़ से मुशर्रफ़ हूँ गा)

उन मुलाकातों में हालात पर काबू पाने के लिए किया किया मशविरे देते थे और तन्हाइयों में किस किस तरह से उन्हें बादशाह को मुकम्मल इस्लाम की तरफ़ मोड़ने और उसे ख़िदमत इस्लाम पर आमादा करने के लिए आप किया किया उन उमरा को हिदायत दिया करते थे इस की तफ़सील मालूम तो न हो सकी मगर इतना जरूर है कि इस बिगड़े मा हौल में बह्र हाल हालात ऐसे थे कि हर बात को ख़ुतूत के ज़रिया नहीं कहा जा सकता था।

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की वह बालिग नज़री ही थी कि जिस ने थोड़े अर्से में धारे का रुख मोड़ दिया,आप की मुजददाना सलाहीयतें समझने के लिए बड़ी गहरी नज़र की ज़रूरत है,इतना बड़ा काम यों ही आसानी से नहीं हो गया इस की तफ़सीलात आज हमारे

सामने नहीं हैं लेकिन उन इशारों से हम समझ सकते हैं।

शायद तारीख आलम में ऐसा इंसान नज़र आये जिस ने हुकूमत के हर ओहदे से अपने आप को अलाहदा भी रखा और सब को ताबे भी बना लिया,आप उन मक्तोबात को पढ़ें गे जो अमाइदीन सल्तनत के नाम लिखे गए हैं तो मालूम हो गा कि इस निडर मुजाहिद ने उन उमरा वामाइदीन को क़दम क़दम पर तरवेज वाशाअत दीन के लिए उभारा ,उन की गलतियों पर उन्हें मुतनब्बा करने में कभी कोताही न बरती न कभी उन का जाह विमन्सब माने इज़हार हक़ हो सिक्का,हर अमीर के दरबार की खबर थी,हर एक की देनदारी से वाक़फ़ीयत थी,उन का तज़किया नफ़्स भी फ़रमाते थे,ख़ौफ़ आख़िरत वदुनिया से बे ताल्लुक़ी और अल्लाह अज़्ज़ व जल्ल की रगबत भी दिलाते थे,उन की दौलत वस्रोत और जाह विमन्सब से दीन के कण शोबों में किया मदद हो सकती है इस की रहनुमाई भी फ़रमाते थे।

आम तौर पर यह सब चीजें इंसान को दुनिया दार और गुनह गार बना देती हैं मगर आप क़ुद्दिस सिर्रहू ने उन पर इतना अज़ीम एहसान फ़रमाया कि जो चीजें बिगड़ने का सबब बनती थीं उन को आख़िरत के हुसूल का ज़रिया बनादिया,ग़रज़कि आप दोहरा काम कर रहे थे,एक तो ख़ुद उन्हें नेक बनाकर नेकियों के ज़ख़ीरे जमा करने की राहें बता रहे थे,दूसरे उन के ज़रिया इस्लाम और अहले इस्लाम को कार ग़ुरबत विमजिलित से निकाल कर इज्जत की शाहराह अता फ़रमारहे थे।

आप की ज़ात में इबरत ही इबरत है जिस हिम्मा जहती और हिम्मा गिरी का ज़ुहूर आप से हुआ बड़े से बड़े ओहदेदार और मन्सब की तहसील के मवाक़े आप के हाथ में थे,दौलत वस्रोत जमा करने का बड़ा से बड़ा ज़रिया आप को हासिल था इस के बावजूद ग़ुरबत वाफ़्लास की ज़िन्दगी गुजार कर और हर मन्सब से ला ताल्लुक रह कर अपने नबी मुकर्रम ﷺ की हक़ीक़ी सुन्नत पर अमल करके जहां आप यह दिखा रहे थे कि दुनिये दिनी (घटिया दुनिया)

इस लायक नहीं कि इस के ख़ालिक़ को छोड़ कर इस को अपना या जाए,या मुहब्बत यह नहीं चाहती कि महबूब हक़ीक़ी के मासवा से ताल्लुक ज़ाहिर पैदा किया जाए वहीं उन उमरा से रवाबित वितालक़ात पैदा करके यह भी दिखा रहे थे कि तसव्वुफ़ या कमाल उन से बे ताल्लुक रहना नहीं है,अम्र मारूफ़ और नही मुनकर सिर्फ़ गरीबों के लिए नहीं है बल्कि यह लोग ज़्यादा मुहताज हैं,उन के पास बिगड़ने के असबाब ज़्यादा हैं,लिहाज़ा उन्हें संभालने की भी ज़्यादा ज़रूरत है,दीनी हमदर्दी के यह बहुत मुस्तहिक़ हैं,दीनी ख़िदमात के लिए जहां ग़ुरबा का तन काम आ सकता है वहीं उमरा का धन भी इस्तेमाल किया जा सकता है,कहीं तन ज़रूरी है तो कहीं धन ज़रूरी है।

मगर यह हर किस विनाक्स का काम नहीं इस के लिए बड़ा दिल चाहिए,बड़े जिगर की ज़रूरत है बग़ैर ताईद इलाही यह दौलत मयस्सर नहीं आ सकती है,हैरत तो यह है कि इतने इख़तिलात के बा वजूद शख्सियत इस क़द्र बे दाग थी कि किसी भी मरहला में कोई मुख़ालिफ़ तक यह न कह सिक्का कि आप की यह तग विद्व हुसूल मन्सब वजाह के लिए है।