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अध्याय 26 में से 57पृष्ठ 362–373

हक़ीक़त बहिश्त

इस फ़क़ीर के नज़दीक हर शख्स की जन्नत इस असम इलाही के ज़ुहूर का नाम है कि इस शख्स का मुबदा तईन है और वह असम दरख्तों, मनबरों की सूरत में और हूर व कसूर (महलों) की सूरत में और वलिदान व ग़लमान के लिबास में ज़ुहूर फ़रमाया है और चनां चह असमाए इलाही जल सुल्ताना के असमा में तफ़ावुत है इलो और सफ़ुल के ऐतबार से और जामईयत व अदम जामईयत के ऐतबार से जिन्नात (जन्नतों) में भी इसी के अंदाजा से तफ़ावुत है अगर इस ज़िमन में शहूद व मुशाहिदा का ज़ुहूर साबित किया जाए तो मुस्तहसिन और ज़ेबा है और क्षे को इस के महल में रखना है, लेकिन इस जगह के गैर में इस किस्म की बातें इतलाक़ करना जुरात है और क्षे को इस के अपने महल में न रखना है। शायद कि सूफ़िया अलैहि ने ज्यादती मुहब्बत और कमाल इश्तियाक़ की वजह से कि मतलूब के साथ रखते हैं जिस क़द्र खुशबू मतलूब की उन की मुशाम जान में पहुँची गनीमत जानते हुए उन को सकर मुहब्बत के ग़लबा से उएन मतलूब व मकसूद जान लिया है और जो आशिकी कि नफ़्स मतलूब से चाहिए इस के साथ दरमियान लाये और हज़ूज़ हासिल किए और मुशाहिदा व मकाशफा साबित किया है एक बुजुर्ग कहते हैं؎

बबूए तो अज़ जाज हम मस्त व बे ख़ुद

ज़ हर सौ कि आवाज़ पाए बुर आयेद

हां इस किस्म के मामलात आशिक़ियों और मुहब्बत की बे आरामियों में जायज़ हैबल्कि मुस्तहसिन कि ख़ुदा के वास्ते है शौक लक़ाए मतलूब बे मसल की राह से है उन की खता हुक्म सवाब रखती है और उन का सकर सहव का हुक्म रखता है।

रवैत उखरवी:

अब आप दीदार इलाही जो आख़िरत में होगा इस के सिलसिले में हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू का कश्फ़ मुलाहिजा फरमाएं और आप की शान तजदीद देखें, फ़रमाते हैं ‘‘जानना चाहिए कि इस फ़क़ीर का मक्षुफ़ यह है कि हर जन्नती शख्स को दीदार भी जन्नत में इसी असम इलाही के अंदाजा से होगा जो कि इस शख्स के तईन व तशख़्स का मुबदा है और दरख्तों , नहरों और हूर व ग़लमान के लिबास में ज़ाहिर हुआ है इस मानी कर कि चंदगाह के बाद कर्म ख़ुदावंदी जल शाना से यह दरख्त व नहरें व गैरह्मा कि इस असम मुक़द्दस के मुज़ाहिर रहे हैं एक वक़्त में ऐंक का हुक्म पैदा करें गे और इस शख्स के लिए दीदार बे कैफ़ की दौलत का वसीला बनें गे और फिर हालत असली में आजाऐं गे और इस शख्स को अपने साथ मशगूल रखें गे इसी तरह अब्द अलआबाद तक होता रहेगा। तजल्ली ज़ाती बर्क़ी की तरह कि इस दुनिया में साबित की है कि हज़रत ज़ात जल शाना की तजल्ली इस दौलत के लायक लोगों के लिए हमेशा असमा व सिफ़ात के पर्दे में है लेकिन चंद गाह के बाद थोड़े जमाने के लिए उन असमा व सिफ़ात का पर्दा उठेगा और हज़रत ज़ात बे पर्दा असमा व सिफ़ात मुतजली होगी और चों कि वह असम इलाही जल सुल्ताना हज़रत ज़ात के एतबारात से एक ऐतबार है, नाचार हर शख्स की रवैत का मुताल्लिक़ वही ऐतबार ज़ाती होगा जो कि इस शख्स का रब है।

तदक़ीक़ अनीक़:

एतबारात पर कुछ तहक़ीक़ फ़रमाकर फिर वजूद आरिफ पर कलाम फ़रमाकर मौजूदात के तीन मर्तबे यों बयान फ़रमाते हैं ‘‘पस मौजूदात के तीन मर्तबे पैदा हुए। मर्तबा

वहम जो कि इस दुनिया के अक्सर अफराद का नसीब है, तमाम अनबीए कराम अलैहिम अस्सलवात व इलतसलीमात कि इस मर्तबा से बाहर हैं और इसी तरह मलाइका कराम अला नबीना व अलैहिम अस्सलवात व इलतसलीमात कि उन का वजूद निशा आख़िरत के वजूद के मुनासिब है और बहुत कम औलीए कराम भी इस दौलत से मुशर्रफ़ हुए हैं और वहम से नफ़्स अम्र के साथ मुल्हिक़ हो गए हैं।

मर्तबा दोम नफ़्स अम्र है कि सिफ़ात व अफ़आल वाजिबी जल शाना इस जगह साबित हैं और मलाइका कराम भी इस मर्तबा में मौजूद हैं निशा आख़िरत का वजूद भी इस मर्तबा में साबित है और इसी तरह अंबिया और ओलिया से अकिल भी इस मर्तबा तक पहुँचे हैं अलैहिम व अला इत्तिबाहम अस्सलवात व इलतसलीमात इस क़द्र है कि सिफ़ात वाजिबी जल शाना इस मक़ाम के मरकज़ में हैं कि इस का जुज़ु अशरफ हैऔर बाक़ी मौजूदात हसब इस्तिदाद इस मरकज़ के अतराफ़ व जवानब में।

मर्तबा सोम खारिज है और मौजूद इस जगह में वाजिब उलवजूद तआला व तक़दस की ज़ात व सिफ़ात समानिया अगर फ़र्क़ है तो बाइतबार मरकज़ और गैर मरकज़ है कि अशरफ बारगाह अक़्दस के ज़्यादा मुनासिब है।’’

सवाल:मर्तबा वहम से मर्तबा नफ़्स अम्र तक जाने में कौन सी फ़ज़ीलत रखता है और कौन सा क़ुर्ब इस से मरबूत है?

जवाब: हर खैर व कमाल और हसन वजमाल का मंशा वजूद है और वजूद को हर चंद कुव्वत व इस्तिक़रार ज़्यादा पैदा होगी और उन सिफ़ात का ज़ुहूर कामिल तर आएगा और शक नहीं है कि वजूद नफ़्स अमरी वजूद वहमी से ज़्यादा कवी और ज़्यादा साबित है पस ला मुहाला खैर व कमाल इस में तमाम तर और कामिल तर होगा और क़ुर्ब में किया कलाम है कि अल्लाह तआला के सिफ़ात अफ़आल (सिफ़ात फाल्या जैसे अहया व अमातत वगैरह) के मर्तबा में मौजूद हुआ है और ख़ालक़ीत व

रज़ाक़ीयत की सिफ़ात के साथ हक़ हमसाइगी पैदा किया है।

जानना चाहिए कि अदम का सबूत और इसी तरह उन कमालात का सबूत कि उन में शाइबा अदम मलहूज़ है अगरचे कमालात सिफ़ातीय से हो सब मर्तबा हस व वहम में है और जब तक अदम से बिलकुल पाक नहीं होगा और अदम का उएन व असर ज़ाइल नहीं होगा मर्तबा नफ़्स अम्र तक वसूल के लायक नहीं होगा अगरचे वहमी सबूत में दर्जे हैं अदम की कुव्वत व ज़ोफ़ के ऐतबार से जिस क़द्र अदम ज़्यादा कवी होगा मर्तबा वहम की गिरफ्तारी ज़्यादा तमाम होगी और जब ज़ईफ़ तर होगा गिरफ्तारी कम तर होगी। बहुत से ओलिया कि सैर व सुलूक की वजह से मुरातिब अदम से गुज़र गए हैं और उन में अदम के कुछ असर के सिवा बाक़ी नहीं रहा है जब तक वह असर बाक़ी है मर्तबा नफ़्स अम्र में दाखिल नहीं हो सकते हैं। हां मर्तबा वहम से गुज़र कर इस के इंतिहाई नुकता तक पहुँचते हैं और मर्तबा नफ़्स अम्र के नजारा करने वालों से हो जाते हैं और इस मक़ाम से नसीब हासिल करते हैं।

महसूस होता है कि अनबीए कराम व मलाइका अजाम अलैहिम अस्सलवात इलतसलीमात फ़र्क़ दर्जात के लिहाज से और इसी तरह अंबिया के बाज़ मुतबईन अगरचे बहुत कम हूँ मर्तबा नफ़्स अम्र के मक़ाम की इन्तहा तक पहुँचे हैं और हर एक के लिए इस जगह अला तफ़ावुत उलदर्जात एक ख़ास मवतन और अलाहदा मक़ाम है।

क़ुरआनी हुरूफ़ की अनोखी तहक़ीक़:

हुरूफ़ व कलिमात क़ुरआनी भी इस जगह मशहूद होते हैं और ज़ाहिर होता है कि उन का मक़ाम अंबिया के मक़ाम के उपर है अलैहिम अस्सलवात व इलतसलीमात। गोया इस मक़ाम से खारिज हैं और मक़ाम फ़ौक़ तक न पहुँच कर दरमियान बर्ज़ख़ होकर इक़ामत की है कि मक़ाम फ़ौक़ ज़ात व सिफ़ात मुक़द्दसा हज़रत वाजिब उलवजूद तआला के साथ मख़सूस है और खारिज में इस के सिवा मौजूद नहीं और यह हुरूफ़ व कलिमात चों कि हदूस के दाग रखते हैं (इस लिए) इस

मक़ाम के वसूल की काबिलियत नहीं रखते हैं, लेकिन इस मर्तबा के तमाम मौजूदात से पेश क़दम हैं और पंजा अपने मदलूलात (मआनी व मुरादात) के दामन में मार रहे और जिन बुजुर्गों ने कि मर्तबा नफ़्स अम्र के मन्तहा में इक़ामत की है मर्तबा फ़ौक़ के नजारोह करने वालों से हैं और कमाल मुहब्बत व लगाव में नरगिस की तरह मुकम्मल आंख होकर इस जनाब मुक़द्दस के निगरां हैं।

अजब मामला है कि यही बुज़ुर्गवार इस त्वतन व इक़ामत के बावजूद बहकम उलमर मा मिन अहब अपने महबूब के साथ मजहूल अलकिफी मईयत रखते हैं और इस के साथ बे ख़ुद हैं और बे इत्तिहाद और बे असनैनीत अपने मतलूब के साथ मानूस व मालूफ़ हैं। इसी दरमियान क़ुरआनी हुरूफ़ व कलिमात की मईयत इस मर्तबा मुक़द्दसा के साथ मुलाहिजा की गई मालूम हुआ कि इस मईयत को दूसरों की मईयत के साथ कोई निस्बत नहीं है, यह मईयत बहुत बुलंद है, कुछ भी इदराक में नहीं आती है कि अबतन बतून से वाबस्ता है, फ़हम मख़लूक़ की इस जह किया गुंजाइश है उलक़ुरआन कलाम अल्लाह गैर मख़लूक़ आया है। उन हुरूफ़ व कलिमात की बुलंदी शान से मालूम होता है कि कलाम नफ़सी में यही हुरूफ़ व कलिमात हैं। चनां चह क़ाज़ी अज़द ने इस की तहक़ीक़ की है और बे तक़दीम व ताख़ीर उन्ही को कलाम नफ़सी क़दीम कहा है और उन की तक़दीम व ताख़ीर को उन के आला हादसा (ज़बान) की तरफ़ आइद किया है।

सवाल:अगर यही हुरूफ़ व कलिमात कलाम नफ़सी हूँ गे तो चाहिए कि मर्तबा खारिज में दाखिल हूँ और साबिक़ में गुज़रा कि इस मक़ाम में दाखिल नहीं हैं, इस की वजह किया है?

जवाब: यह हुरूफ़ विकलिमात चों कि ज़हनों में तक़दीम व ताख़ीर के साथ मज़कूर होते हैं। इस मुलाहिजा की वजह से लामुहाला नज़र कशफ़ी में मर्तबा खारिज में उन का अदम दख़ूल मालूम होता है और जब दुबारा तक़दीम व ताख़ीर के मुलाहिजा के बग़ैर देखा गया तो मशहूद हुआ कि दाखिल हैं और अपनी असल से मुल्हिक़, बल्कि मुत्तहिद हैं तो उन की मईयत दूसरों की

मईयत के साथ किया निस्बत रखेगी कि इस जगह इत्तिहाद है और दूसरों की मईयत में इत्तिहाद गुंजाइश नहीं रखता है।

सुबहान अल्लाह यही क़ुरआनी कलिमात व हुरूफ़ चों कि कलाम क़दीम सुबहानी थे उन का ज़ुहूर इस दुनिया में बाक़ी सिफ़ात क़दीमा के बरख़िलाफ़ बिजनस ख़ुद होगा कि हुरूफ़ व कलिमात इस तक़दीम पर नफ़्स कलाम क़दीम हैं और इस के रुपोश बजुज़ अर्जी क़दीम व ताख़ीर के कि आला तकल्लुम के कसूर की राह से आई है नहीं होगी। पस सारी अश्या में क़रीब तरिन बारगाह इलाही से कुरआन मजीद होगा और इस की सिफ़ात वाजिबी जल सुल्ताना के ज़ाहिर तरिन भी वही कि ज़लीयत की गिर्द इस तक नहीं पहुँची है और तक़दीम व ताख़ीर के खस व ख़ाशाक को महजूबों की आंख में डाल कर अपनी असालित के साथ आलम ज़लाल में जलवा गर हुआ है। लिहाज़ा इबादात में अफ़ज़ल तिलावत कुरआन मजीद हुई और इस की शफ़ाअत दूसरों की शफ़ाअत में मकबूल तरिन हुई किया मलिका मुक़र्रब की शफ़ाअत किया नबी मरसूल की शफ़ाअत? जो नताइज व समरात कि तिलावत क़ुरआनी पर मुरत्तिब होते हैं उन की किया तफ़सील हो सके बहुत ऐसा है कि तिलावत करने वाले को उठा कर उन दर्जात पर ले जाए कि बाल की इस जगह गुंजाइश मुतस्व्वर न हो।

सवाल: आया आयात क़ुरआनी कलिमात व हुरूफ़ अ स दौलत से मख़सूस होते हैं या बाक़ी नाज़िल शुदा कुतुब के हुरूफ़ व कलिमात भी क़ुरआनी कलिमात व हुरूफ़ के साथ इस दौलत में शिरकत रखते हैं और सब कलाम क़दीम नफ़सी हैं।

जवाब: सब को इस दौलत में शिरकत है। इस क़द्र फ़र्क़ कशफ़ी नज़र में मुतमल्लिल होता है कि कुरआन मजीद गोया दायरा का मरकज़ है और बाक़ी नाज़िल शुदा कुतुब बल्कि तमाम वह जो अज़ल से अब्द तक तकल्लुम वाक़्य होगा। सब गोया इस दायरा का मुहीत है। पस कुरआन सब की असल हुआ और जमी कुतुब में अशरफ बना क्यों कि मरकज़ अजज़ाए दायरा का अशरफ है और दायरा के तमाम नकलों की असल गोया तमाम नुक्ते इस की तफ़सील हैं और वह सब का इजमाल, अल्लाह तआला ने

इस की शान में फ़रमाया:

وَ اِنَّہٗ لَفِیۡ زُبُرِ الْاَوَّلِیۡنَ (الشعرا:۲۶؍۱۹۶)

तर्जुमा: और बेशक इस का चर्चा अगली किताबों में है।’’

कलाम इलाही का मसला इल्म कलाम के निहायत अहम और मार्क अलारा मिसाइल से है। बाज़ों ने तो इल्म कलाम की वजह तसमीया ही यह बयान की कि इस के मिसाइल में कलाम इलाही भी जो निहायत अहमियत का हामिल है इस लिए इस इल्म को कलाम कहने लगे कलाम इलाही के सिलसिले में किया किया बहसें वजूद में आएं वर्क के वर्क मुख़ालिफ़ीन ने स्याह कर डाले, निरे उलमा-ए हक़ शहीद हुए, सजाएं पाएं। ख़ुद उलमा-ए हक़ अहले सुन्नत के माबैन भी इख़तिलाफ़ात हो गए, नज़र व इस्तिदलाल के ज़रिया जो कुछ जिस की समझ में आया कह गया, कोई हक़ से कोसों दौर, कोई क़रीब। कोई बहुत क़रीब नज़र आता है। इस सिलसिले में अगर अपने प्राए के अक़्वाल व मज़ाहिब हम नकल करते तो आप अंदाजा लगा लेते कि ऐसे ऐसे इल्म वफ़न और अक्ल व खुर्द के हामिलों का जब यह हाल है तो एक आम आदमी तो कजा ख़ास भी किस मंज़िल पर पहुँच जाए जहां क़ल्ब को सुकून और अंशराह सदर हासिल हो जाए यह बहुत मुश्किल है मगर यह कि ख़ुदावंदी मदद यारी फ़रमाए ।

ऐसी मुंतशिर फ़िज़ा में जहां आदमी किसी नतीजा तक पहुँचने के बजाए तज़बज़ब का शिकार हो जाए। हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के यह बातिनी मुशाहदात जहां आप की दिक्कत नज़र की बड़ी दलील हैं वहीं अहले इस्लाम के लिए इतमीनान क़ल्ब और ईमान की पुख्तगी का बहुत बड़ा ज़रिया हैं। आप ने जिस पर ख़तर माहौल में इतमीनान की शाहराह लोगों को अता की वह अल्लाह पाक की बड़ी नेमत थी। हर तबके का इंसान निहायत आसानी के साथ मंज़िल मकसूद का पता लगा सकता है और अज़आन व ईक़ान की दौलत से माला माल हो सकता है।

आप क़ुद्दिस सिर्रहू अल्लाह तआला की एक अज़ीम निशानी और निशान मंज़िल थे। कुरआन व

सुन्नत के ज़ाहिरी अलफ़ाज़ व मआनी से बहुत से धोका खा गए ख़ास कर इलाहयात में और मुआद में क्यों कि यह वह उमूर थे जहां सिर्फ़ किसी फन में कामयाबी या अक्ल की रहबरी कारामद नहीं हो सकती थी। बिलआख़िर इख़तिलाफ़ात शुरू हुए और रफ़्ता रफ़्ता मुनाज़रात व मुबाहिसात का एक अंबार लग गया। बात सुलझने के बजाए उलझती चली गई। इस दौर में ऐसे दाना व बीना की ज़रूरत थी जो हक़ायक़ पर भरपूर इत्तिला रखता हो और बजाए नज़र व इस्तिदलाल के मुशाहदात से हक़ को हक़ और बातिल को बातिल कहे। हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के मआरिफ़ इस क़द्र बुलंद होते हुए भी क़ल्ब को कितने भाते हैं यह मामूली गौर व फ़िक्र से इंसान समझ सकता है। अब तक में ने इस बात में जितने भी मिसाइल ज़िक्र किए हैं वह दीन के निहायत अहम मिसाइल हैं जिन से ईमान का निहायत गहरा ताल्लुक है, मामूली तजावुज़ भी इंसान को गहरे गड्ढे में डाल देता है। उन इक़तिबासात में नयी नयी तहक़ीक़ात भी हैं, मुशाहदात भी हैं और कुरआन व सुन्नत की ताईदात भी। यह रंग हर जगह आप को इस इंसान के कलाम में मिलेगी जिसे दुनिया मुजद्दिद अल्फ़ सानी के नाम से जानती पहचानती है।

हक़ायक़ मुम्किनात:

इस सिलसिले में हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की तहक़ीक़ अनीक़ गोश् होश के साथ मुलाहिजा फरमाएं, फ़रमाते हैं ‘‘मुम्किनात का ख़ल्क़ व नमूद व वजूद मर्तबा वहम व हस में है कि अतिक़ान (मजबूती) पाई है। कान अल्लाह व लिम यकन मआ शे (अल्लाह तआला था और इस के साथ कोई चीज़ न थी) और जब चाहा कि अपने पोशीदा कमालात को ज़ाहिर करे असमाए इलाही जल सुल्ताना से हर असम ने मुज़ाहिर से एक मज़हर तलब फ़रमाया ताकि अपने कमालात को इस मज़हर में जलवा फ़रमाए और वजूद व तवाबा वजूद की मज़हरीयत का काबिल स्वाए अदम कोई नहीं है क्यों कि मज़हर और क्षे का आईना क्षे का मुबायन और मका बल है और वजूद का मुबायन और मुक़ाबिल

सिर्फ़ अदम है। पस हक़ सुब्हानहू व तआला ने अपनी कमाल कुदरत से आलम अदम में असमा से हर असम के लिए मुज़ाहिर से एक मज़हर का तईन फ़रमाया और जब चाहा और जिस तौर चाहा इस को मर्तबा हस व वहम में पैदा फ़रमाया।

ख़ल्क़ अलाशीयाय मति शा व कमा शा (अल्लाह ने चीजों को जब चाहा और जैसे चाहा पैदा फ़रमाया) और अब्दी मामला इस से वाबस्ता फ़रमाया। जानना चाहिए कि अदम ख़ारिजी के मुनाफ़ी सबूत ख़ारिजी है। वह सबूत नहीं जो कि मर्तबा हस व वहम में सबूत पैदा करे और ख़ुदावंद जल सुल्ताना की कारीगरी से अतिक़ान व रसूख (मजबूती व पुख्तगी) इस जगह इस को हासिल हुआ और इस मर्तबा में बितरीक़ इनाकास व ज़लीयत ही, आलम, कादर, मुरीद, बीना व क्षणवा (सुनने वाला) और गोया हो और मर्तबा खारिज में इस का कोई नाम व निशान न हो और खारिज में स्वाए ज़ात व सिफ़ात वाजिबी जल सुल्ताना के कोई चीज़ साबित व मौजूद न हो और इस मानी कर कहा जा सकता है अलान कमा कान (इस वक़्त वैसा ही है जैसा पहले था)

इस की मिसाल नुकता जौवाला और दायरा मोहूमा की मिसाल है कि मौजूद सिर्फ़ वही नुकता है और दायरा खारिज में मादूम है और कोई नाम व निशान खारिज में नहीं रखता है इस के बावजूद इस दायरा ने मर्तबा हस व वहम में एक सबूत पैदा किया है और इस मर्तबा में बितरीक़ ज़लीयत अनारत व अशराक़ (रोशनी व दरख़शिंदगी) इस को हासिल है। इस तहक़ीक़ से उन मुक़द्दमात से इस्तिग़ना हासिल हो जाएगा जो कि हज़रत शैख़ मुही उद्दीन और उन के मुतबईन ने आलम की तक्वीन में (बयान) फ़रमाए हैं और तंज़िलात ख़मसा बयान किए और इल्मी व ख़ारिजी तैनात क़ायम किए और हक़ायक़ व आयान साबिता को इल्म वाजिबी जल सुल्ताना के मर्तबा में साबित किया और उन के अकूस को खारिज में कि ज़ाहिर वजूद है साबित रखा और उन के आसार को ख़ारिजी नाम दिया जैसा कि इस शख्स पर मख़फ़ी नहीं जो इंसाफ पसंद नाज़िर है और उन के कलाम में उन की इस्तिलाहात पर मतला है और इस तहक़ीक़ से मालूम हो गया कि कोई चीज़ खारिज में हक़ जल

जल व अला के सिवा मौजूद नहीं है किया आयान (ज़ुआत) किया आसार आयान बल्कि उन का सबूत हस व वहम के मर्तबा में है और किसी किस्म का महज़ूर लाज़िम नहीं है क्यों कि यह(आलम) ऐसा मौहूम नहीं कि वहम की तराश से सबूत पैदा किया है कि वहम के इर्तिफ़ा से मुर्तफ़ा हो जाए बल्कि इस का सबूत ख़ुदावंदी जल शाना की दस्तकारी से मर्तबा वहम में है और सबात व तक़र्र और अतिक़ान व इस्तिहकाम इस मर्तबा में रखता है व सना अल्लाह अलज़ी उत्तक़्न कुल शे (अल्लाह की कारीगरी हर चीज़ से मजबूत है)

इस बयान से वाज़िह हो गया कि हक़ायक़ मुम्किनात अदमात हैं कि इल्म वाजिबी के ख़ाना में तमीज़ व तईन पैदा किया है और ख़ुदावंदी जल सुल्ताना की दस्तकारी से दुबारा मर्तबा हस व वहम में साबित हुए उन में के बाज़ असमाए इलाही जल शाना के आईने हुए और इस मर्तबा में बहकम ज़लीयत व इनाकास ही, आलम, कादर, मुरीद और बीना व क्षणवा (सुनने वाला) व गोया हुए जब कि शैख़ और उन के मुतबईन की तहक़ीक़ के मुताबिक हक़ायक़ मुम्किनात असमाए इलाही जल सुल्ताना की इल्मी सूरतों हैं कि एक तंज़िलात ख़मसा से हज़रत वजूद है। खुलासा यह कि इस फ़क़ीर की समझ के मुताबिक हक़ायक़ मुम्किनात अदमात और हज़रत शैख़ के नज़दीक वजूदात मुतंज़िला और हज़रत शैख़ ने नमूद व कसरत को खारिज में साबित किया है और कहा है कि इल्मी सूरतों मुतकसरा कि हक़ायक़ मुम्किनात हैं और उन की ताबीर आयान साबिता से की है ज़ाहिर वजूद तआला के आईना में कि इस के सिवा खारिज में कोई मौजूद नहीं है मुनाकिस होकर खारिज में नमूद पैदा की है और दिखाते हैं कि खारिज में हैं और दर हक़ीक़त अलावा एक ज़ात तआला के खारिज में कोई मौजूद नहीं है। हज़रत शैख़ फ़रमाते हैं कि इल्मी सूरतों से हर एक को औकात से किसी वक़्त में ज़ाहिर वजूद के साथ कि आईना की तरह है उन सूरतों के लिए निस्बत मजहूल अलकिफी पैदा होती है जो कि खारिज में उन की नुमाइंदगी का सबब होती है और शैख़ कहते हैं कि यह निस्बत

मजहूल अलकिफियत किसी एक को मालूम नहीं है हत्ताई कि अंबिया को भी इस राज़ की इत्तिला नहीं दी है अलैहिम अस्सलवात व इलतसलीमात और उन सूरतों को खारिज में इस निस्बत मजहूल अलकिफियत के हुसूल के बाद ज़ाहिर करने को ख़ल्क़ कहा है और अश्या की ईजाद जाना।

और इस तहक़ीक़ साबिक़ से कि यह फ़क़ीर (हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू) राह याब हुआ है अश्या का जिस तरह खारिज में कोई वजूद नहीं (इसी तरह) उन की नमूद (ज़ुहूर) भी ख़ाना खारिज में अपनी इसी बे रंगी के साथ है न गैर का इस में वजूद है न नमूद, अगर नमूद है उन का तो मर्तबा वहम में है। खुलासा यह कि नमूद और सबूत उन का एक मर्तबा में है ऐसा नहीं कि उन कानमोद किसी जगह है और उन का सबूत दूसरी जगह मिसाल के तौर पर दायरा मोहूमा जो कि नुकता जौवाला से पैदा है जिस तरह इस का सबूत मर्तबा वहम में है इसी तरह इस का नमूद भी इसी मर्तबा में है क्यों कि उन का इर्तिसाम वहम में है न कि खारिज में और नमूद (ज़ुहूर) भी इसी मर्तबा में है क्यों कि खारिज में इस का कोई निशान नहीं है ताकि नमूदार हो ज़्यादा से ज़्यादा यह कि नमूद वहमी को नमूद ख़ारिजी समझ लें जैसे कि मिसाली सूरतों को आलम मिसाल में बेदारी में बातिनी एहसास से देखें और ख़याल कर लें कि उन सूरतों को आलम शहादत और हस ज़ाहिरी में देखें इस किस्म का इशतिबाह बहुत वाक़्य होता है कि एक मर्तबा को दूसरे के साथ मुश्तबा पाते हैं और एक का हुक्म दूसरे पर लगाते हैं। पस जिस मसला में हम गुफ़्तगू कर रहे हैं वह दायरा मोहूमा कि ख़याल में मुंतक़िश हुआ है चश्म ख़याल से इस मर्तबा में कि मुंतक़िश है देखें और ख़याल करें कि इस दायरा को चश्म सर से खारिज में देखें ऐसा नहीं है क्यों कि खारिज में कि नुकता जौवाला का महल है कोई नाम व निशान नहीं है ताकि देखा जाए और सूरत का खारिज में न सबूत है और न नमूद बल्कि इस का सबूत व नमूद दोनों मर्तबा ख़याल में हैं, वाल्लाह सुब्हानहू आलम।

पस वह कि शैख़ क़ुद्दिस सिर्रहू ने खारिज जाना है और अश्या को इस में बितरीक़ इनाकास नमूद साबित किया है वह खारिज नहीं है मर्तबा वहम खारिज इस से विरा है और खारिज मुतवहम होता है खारिज इस से विरा है कि हमारे शहूद व एहसास से बरतर है जो कुछ हमारा मशहूद व महसूस व माकूल व मुतख़ील है सब दायरा वहम में दाखिल है मौजूद ख़ारिजी जल सुल्ताना हमारी फहमों के मावरए विरा है आईना दारी इस जगह किया गुंजाइश रखती है और कौन सी सूरत है कि इस में वह हज़रत सुब्हानहू मुनाकिस होआईने और सूरतों सब मुरातिब ज़लाल में हैं कि मर्तबा वहम व हस के दायरा से ताल्लुक रखता है।

رَبَّنَآ اٰتِنَا مِنۡ لَّدُنۡكَ رَحْمَۃً وَّھَیِّئْ لَنَا مِنْ اَمْرِنَا رَشَدًا (الکہف:۱۸؍۱۰)

तर्जुमा: ए हमारे रब हमें अपने पास से रहमत दे और हमारे काम में हमारे लिए राह याबी के सामान कर ।’’