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Allama Afaque Ahmad Mujaddidiतजदीद अल्फ़ सानीहक़ीक़त मुहम्मदी व हक़ीक़त अहमदी

अध्याय 32 में से 57पृष्ठ 433–453

हक़ीक़त मुहम्मदी व हक़ीक़त अहमदी

(1)मक्तूब 209 जिल्द अव्वल में मुबदा विमाद की एक इबारत का हल पेश करते हो ए फ़रमाया सर्वर कौन विमकां ﷺ भी आलम ख़ल्क़ और आलम अम्र के अजज़ा से मुरक्कब पैदा किए गए थे जो असम इलाही आप ﷺ के आलम ख़ल्क़ की परवरिश करता है और रब है वह शान‘‘अलालीम’’ है और जो आलम अम्र का मुरब्बी है वह इस से उपर का मर्तबा है,हक़ीक़त मुहम्मदी शान अलालीम से इबारत है और हक़ीक़त अहमदी इस माना से इबारत है जो शान अलालीम का मुबदा है और इस के फ़ौक़ में है।

इस के बाद फ़रमाते हैं: ‘‘जो नुबुव्वत हज़रत आदिम अला नबीना वालैय अस्सलात वालतसलैम की पैदाइश से पहले इस सर्वर(कोनेन) ﷺ कोहासिल थी और आप ﷺ ने जिस मर्तबा की खबर दी और फ़रमाया‘‘किन्नत नबिया वा अआ दम बेन उल्मा वालतेन’’वह हक़ीक़त अहमदी के ऐतबार से थी कि आलम अम्र से ताल्लुक रखती है और इसी ऐतबार से हज़रत ईसा अला नबीना

वालैय अस्सलात वालतसलैम ने कि कलम अल्लाह थे और आलम अम्र से ज़्यादा मुनासबत रखते थे इस सर्वर ﷺ की तशरीफ़ आवरी की बशारत असम अहमद से दी और फ़रमाया:‘‘विंबशरा बरसूल या ती मिन बादी असमा अहमद’’और जो नुबुव्वत निशा अंसरी(दुनिया)से ताल्लुक रखती है बाइतबार हक़ीक़त मुहम्मदी के नहीं है बल्कि दोनों हक़ीक़तों के ऐतबार से है और आप का परवरिश कनुंदा(रब) इस मर्तबा में वही शान(अलालीम)और इस शान का मुबदा(यानी जो अलालीम के फ़ौक़ में है)इसी लिए इस मर्तबा की दावत(यानी दुनिया में)ज़्यादा ताम है मर्तबा साबिक़ की दावत से क्योंकि इस मर्तबा में आप की दावत आलम अम्र के साथ मख़सूस है और आप की तरबीयत रूहानियों(साकिनान आलम अर्वाह )पर मकसूर थी और इस मर्तबा में आप की दावत ख़ल्क़ और अम्र (दोनों)को शामिल है और आप की तरबीयत अजसाम वार्वाह पर मुश्तमिल है,ज़्यादा से ज़्यादा(यह कहा जा सकता है)यह कि इस दुनिया में आप के निशात अंसरी को आप के निशात मुल्की परग़ालिब किया है अलैहि वाला अआला अस्सलात वस्सलाम ताकि ख़लाइक़ से मुनासबत ज़्यादा पैदा हो जो कि इफ़ादा वास्तुफ़ादा का सबब है क्योंकि ख़लाइक़ में जानिब बशरियत ग़ालिब है,हज़रत हक़ सुब्हानहू व तआला अपने हबीब ﷺ को बड़ी ताकीद के साथ इज़हार बशरियत का हुक्म फरमाता है,जैसा कि अल्लाह तआला ने फ़रमाया:‘‘क़ुल अनुमा अना बशरٌ मुसलकम यूहा इलिया’’ यह बशरियत की ताकीद के वास्ते है।

और इस दुनिया से इंतकाल फरमाने के बाद आप अलैहि अस्सलात वस्सलाम की जानिब रूहानियत ग़ालिब आगई और बश्री मुनासबत का रुख कमी की तरफ़ हो गया और दावत की नूरानियत ने तफ़ावुत पैदा किया,बाज़ सहाबा कराम फ़रमाते हैं कि अभी हम सर्वर कोनेन ﷺ के दफन से फ़ारिग़ भी न हुए थे कि अपने दलों में फ़र्क़ और तफ़ावुत महसूस किया (इस की तफ़सील तिरमिज़ी शरीफ़ में है।और फ़र्क़ क्यों न महसूस करते)कि ईमान शहवदी ग़ैबी से तब्दील हो गया और मामला आगोश से गोश्(कान)की तरफ़ खिंच गया और देखने

से सुनने की जानिब आज्ञा,और आप ﷺ की रहलत के जमाने से जब हजार साल गुज़र गए तो इतनी लंबी मुद्दत और तवील जमाने में जानिब रूहानियत इस तौर पर ग़ालिब आई कि जानिब बशरियत को मुकम्मल तौर पर अपने रंग में रंगीन कर लिया और आलम ख़ल्क़ को आलम अम्र के रंग में रंग लिया’’ फिर कुछ स्तर बाद फ़रमाते हैं:

‘‘इस जगह से है जो अगले शराए से नकल करते हैं कि अनबया कराम में से ओलवालाज़म पैगम्बर के इर्तिहाल के एक हजार साल के बाद रसल अजाम मबऊस होते थे कि इस पैगमर(ओलवालाज़म) की शरीअत की तक़वियत फ़रमाते थे और कलिमा हक़ बुलंद करते,जब उन की शरीअत का दौरे ख़त्म हो जाता तो दूसरे पैगम्बर ओलवालाज़म मबऊस होते थे और अपनी शरीअत की तजदीद फ़रमाते थे और ख़ातिम अलर्सल अलैहि वालैहिम अस्सलवात वालतसलीमात की शरीअत चूंकि नस्ख़ वितब्दील से महफूज़ है इसी लिए आप की उम्मत के उलमा को अनबया का हुक्म दे कर शरीअत की तक़वियत और मिलित की ताईद का काम उलमा को सौंप दिया इस के बावजूद एक पैगम्बर ओलवालाज़म(हज़रत ईसा अलैहि अस्सलाम) को आप का मुताबे बना कर आप की शरीअत की तरवेज फ़रमाई है,अल्लाह तआला फरमाता है:अन्ना नहन नज़लना अलज़कर वाना ला लिहाफ़ितून’’

मालूम होना चाहिए कि हज़रत ख़ातिम अलर्सल ﷺ के इर्तिहाल के एक हजार साल बाद आप की उम्मत के जो ओलिया ज़ाहिर हूँ गे वह हर चंद अकिल हूँ गे मगर अकमल हो M गे ताकि इस शरीअत की तक़वियत उत्तम तौर पर कर सकें,हज़रत महदी कि ख़ातिम अलर्सल ﷺ ने जिन के क़दम मुबारक (आने) की बशारत फ़रमाई है हजार साल बाद वजूद में आएं गे और हज़रत ईसा अला नबीना वालैय अस्सलात वस्सलाम ख़ुद भी हजार साल बाद नुज़ूल फरमाएं गे’’

फिर आप ने हदीस शरीफ़‘‘लिम यद्रेआ ओलहम खैर उम अआखरहम’’(नहीं जाना जा सकता

है कि इस का अव्वल बेहतर है या आखिर)की नफीस तशरीह फ़रमाई है जिस का खुलासा यह कि इस दौर के औलीए कराम के कमालात सहाबा कराम के कमालात के अगरचे उएन न हूँ गे मगर मुशाबहत बहुत हो गी,आम लोग फ़र्क़ नहीं कर सकते हैं चूंकि आक़ाए कायनात ﷺ दोनों का फ़र्क़ अच्छी तरह जानते थे इस लिए आप ﷺ ने ‘‘ला उदरी’’नहीं फ़रमाया यानी में भी नहीं जानता बल्कि ‘‘ला यद्रा’’ फ़रमाया यानी जाना नहीं जा सकता है,चूंकि आप यकीन से जानते थे इस लिए फ़रमाया:‘‘खैर उलक़ुरून कर्नी’’यानी सारे ज़मानों से बेहतर मेरा ज़माना है,आप का ज़माना सहाबा कराम रिज़वान अल्लाह अलैहिम अजमईन को भी शामिल है।

मज़कूरा मक्तूब हक़ायक़ से निहायत पर है में ने मौज़ू से मुताल्लिक़ मुख़्तसरा तर्जुमा पेश करदिया है,मक्तूब शरीफ़ का यह तवील इक़तिबास सब की ताईद कर रहा है,इस मक्तूब में आप ने सराहत की है कि हजार साल के अरसा में हक़ीक़त मुहम्मदिया उरूज फ़रमाकर हक़ीक़त अहमदी के मक़ाम तक पहुँच गई यह अहम मक्षुफ़ तमाम इदराकात से बाला था इस लिए इस की तफ़सील इस मक्तूब में फ़रमाई वर्ना असल मक्षुफ़ मुबदा विमाद में मज़कू रहे।

(2)कमालात नुबुव्वत के सिलसिले में फ़रमाते हैं कि मन्सब नुबुव्वत अगर चह ख़ातिम अलर्सल ﷺ पर ख़त्म हो गया लेकिन इस के कमालात से कामिल पैरोकारों को हिस्सा मिलता रहे गा इस के बाद फ़रमाते हैं:

‘‘एं कमालात दर तबका सहाबा बेशतर अस्त विद्र ताबईन वतबा ताबईन नीज़ एं दौलत बुर सबील किल्लत सरायत करदा अस्त बाद अजान रो ब इस्तितार आवर्दा अस्त वग़लबा कमालात विलायत ज़ुली जलवा गर गश्ता अस्त अम्मा उम्मीद अस्त कि बाद अज़ मुज़ी अल्फ़ एं दौलत अज़ सर ताजे गर्दद वग़लबा शिवा पैदा कंद विकमालात असली रो बज़हूर आरंद वज़ली इस्तितार पैदा कनंद’’

तर्जुमा:यह कमालात सहाबा कराम के तबका में ज़्यादा हैं और ताबईन वतबा ताबईन में

भी यह दौलत कमी के साथ सरायत किए हुए हैं,इस के बाद रुख पोशीदगी की तरफ़ हो गया है और विलायत ज़ुली के कमालात जलवा गर हुए हैं लेकिन उम्मीद है कि हज़ारसाल गुजरने के बाद यह दौलत नये सरे से ताजे होगी और ग़लबा शिवा पैदा करे गी(फैले गी) और कमालात असली ज़ाहिर हूँ गे और ज़ुली छिप जाएँ गे।

(3)मक्तूब 234 जिल्द अव्वल में काफ़ी इसरार विमआरिफ़ बयान करने के बाद फ़रमाते हैं:

‘‘ए फ़रज़न्द! यह वह वक़्त है कि पहली उम्मतों में इस तौर में कि वक़्त ज़ुल्मत से पर है ओलवालाज़म पैगम्बर मबऊस होते थे और शरीअत जदीदा का अहया फ़रमाते थे इस उम्मत में कि खैर अलामम है इस के पैगम्बर ख़ातिम अलर्सल ﷺ ने उलमा को बनी इसराईल के अनबया का दर्जा दिया है और अंबिया के वजूद से वजूद उलमा पर किफायत फ़रमाई है इसी लिए हर सदी के सरे पर इस उम्मत के उलमा से एक मुजद्दिद मुतय्यन होता है जो कि अहयाए शरीअत फरमाता है ख़ास कर एक हजार (साल)गुजरने के बाद कि पहली उम्मतों में पैगम्बर ओलवालाज़म की बिअसत का वक़्त है ऐसे वक़्त में हर पैगम्बर पर इकतिफ़ा नहीं किया है इस दौर में इस वक़्त आलम ताम उलमार्फत आरिफ दरकार है कि पहली उम्मतों के ओलवालाज़म का क़ायम मक़ाम हो’’आप के ख़ास आखिरी अलफ़ाज़ यह हैं‘‘दरें तौर वक़्त आलम आरिफ़े ताम उलमार्फत दरकार अस्त कि क़ायम मक़ाम औली अलाज़म उमम साबिक़ा बाशद’’

(4)मक्तूब 261 जिल्द अव्वल में इसरार बल्कि मआरिफ़ नमाज़ बयान करने के बाद फ़रमाते हैं:

‘‘जान लो! अक्लमंद के लिए इशारा काफ़ी , यह वह कमाल है जो हजार साल बाद वजूद में आया है और ऐसी आख़रीत है जो अवलीयत के रंग में ज़ाहिर हुई,शायद इसी वजह से(सर्वर कोनेन ﷺने) फ़रमाया ओलहम खैर उम आख़िरहम(यानी उन का अव्वल बेहतर है या आखिर)’’

तिरमिज़ी शरीफ़ में बरवायत हज़रत इंस पूरी हदीस यों है‘‘मसल उम्मती मसल उलमुतर ला यद्रा ओला खैर उम आखिरा’’हज़रत ने इसी हदीस की तरफ़ इशारा फ़रमाया है।

आप ﷺ ने यह नहीं फ़रमाया ओलहम खैर उम औसतहम इस लिए कि अव्वल को आखिर से मुनासबत ज़्यादा देखी कि तर्दद का महल हुई।

और दूसरी हदीस में प्यारे आका ﷺ ने फ़रमाया कि इस उम्मत का बेहतरीन अव्वल है या आखिर और इस का दरमियान तेरह (तारीक) है’’ हां इस उम्मत के मताख़रीन में अगरचे निस्बत की बुलंदी है लेकिन क़लील बल्कि अकिल है और इस उम्मत के मुतवस्सितीन में हर चंद इस बुलंदी के साथ निस्बत नहीं है लेकिन कसीर बल्कि अक्सर है विलकुल वजह कमी विकिफी (और हर एक के लिए कमीत विकिफ़ियत के ऐतबार से एक जिहत है) लेकिन इस निस्बत की अक़ल्लीयत ने मताख़रीन को बुलंद दर्जात पर पहुँचा दिया और साबिक़ीन से मुनासबत दे दी और बशारत देते हुए आक़ाए क्रीम ﷺ ने फ़रमाया:

‘‘उलइस्लाम बदा गरीबा वसीउद कमा बदा फ़ितूबा ललग़रबा ’’(सुबहान अल्लाह जेहन रसा की परवाज़ देखें हदीस पाक के वह माना अख़ज़ किए कि तबीअत अश अश कर उठी)

इस उम्मत की आख़रीत का शुरू हजार दोम के आगाज़ से है नबी क्रीम ﷺ के इर्तिहाल से(यानी विसाल अक़्दस के एक हजार साल गुजरने के बाद दूसरा हजारा शुरू हुआ) क्योंकि एक हजार को उमूर की तग़ईर में अज़ीम खासियत और इश्याय की तब्दील में कवी तासीर है और चूंकि इस उम्मत में नस्ख़ वितबदीली नहीं है(इस लिए)लामुहाला अगलों की निस्बत इसी ताजगी विताबानी के साथ पिछलों में जलवा गर हुई है और शरीअत की ताईद विमलत की तजदीद अल्फ़ सानी (हज़ारा दोम)में फ़रमाई है और इस चीज़ पर आदिल गवाह हज़रत ईसा अला नबीना वालैय अस्सलात वस्सलाम और हज़रत महदी अलैहि इलरिज़्वान हैं؎

फ़ैज़ रूह अलक़ुद्स अगर बाज़ मदद फ़रमायद

दीगरां हम बिकिनंद आँचा मसीहा मि कुर्द

(यानी अगर रूह अलक़ुद्स का फ़ैज़ फिर से मदद फ़रमाए तो दूसरे भी वही कर सकते हैं जो मसीहा ने किया )

ए बिरादर! आज यह बात अक्सर मख़लूक़ प्रभारी है और उन की समझ से दौर है लेकिन अगर इंसाफ से काम लें और एक दूसरे के उलूम विमआरिफ़ का तक़ाबुल विमवाज़ना करें और अहवाल की सेहत और फसाद ,उलूम शरएहि की मुताबिक़त और अदम मुताबिक़त के साथ मुलाहिजा करें और शरीअत विनबूत की ताज़ीम वितौक़ीर को देखें कि किस में ज़्यादा है तो शायद इस्तबआद से बाहर आएं।

देखें कि फ़क़ीर ने अपनी कुतुब वर्साइल में लिखा है कि तरीक़त वहक़ीक़त शरीअत की ख़ादिम हैं,नुबुव्वत विलायत से अफ़ज़ल है अगरचे इस नबी की विलायत हो और लिखा कि कमालात विलायत को कमालात नुबुव्वत से कोई मिक़दार नहीं है काश कि क़तरा का हुक्म रखते दरयाय मुहीत(समंदर) की ब निस्बत और इस के मसल बहुत लिखा ख़ास कर इस मक्तूब में जो मेरे फ़रज़न्द के नाम है(यानी मक्तूब 260 बनाम हज़रत ख़्वाजा मुहम्मद सादिक क़ुद्दिस सिर्रहू)यह तरीका के बयान में लिखा है इस जगह मुलाहिजा फरमाएं ,इस गुफ़्तगू से मकसूद हक़ सुब्हानहू की अज़मत का इज़हार,इस तरीका के तालिबों को रगबत दिलाना है न कि दूसरों पर अपनी फ़ज़ीलत देना अल्लाह अज़्ज़ व जल्ल की मार्फत इस शख्स पर हराम है जो कि अपने आप को काफ़िर फिरंग से बेहतर जाने कजा यह कि अकाबिर दीन से।’

तहदीस नेमत के तौर पर जोकुछ उन इक़तिबासात में मज़कूर है वह तजदीद अल्फ़ सानी की हक़ीक़त समझने के लिए बहुत काफ़ी है,क़ुर्ब वोलायत एक बातिनी अम्र है इस को समझने के लिए बातिनी निगाह की ज़रूरत है,कौन किस मर्तबा पर फ़ाइज़ है,बुलंदी मर्तबत

के लिहाज से बुलंदी नज़र की ज़रूरत होती है,अकली विल्मी पैमानों से उसे नापा नहीं जा सकता है,आम अक़ूल वाज़हान के पास यह दौलत है ही नहीं और न ही उन के यहाँ मयार कश्फ़ विकरामत और मुशाहिदा वितसिर्फ़ है।

बड़े बड़े मुजाहिदात में जो ज़ाहिर में मुजाहिदात हैं उलमा विबुजुर्गों की शहादतें अपने अपने पैमानों और इल्म वादराक के लिहाज से हैं,इस में अकीदत व मुहब्बत को बहुत दखल रहा है,सिलसिला से वाबस्तगी ने उमूमा नजरों को तंग करदिया उन्हों ने वाबस्ता सिलसिला के मशाइख़ को निहायत अकीदत से देखा जबकि दीगर मशाइख़ को पढ़ने की ज़्यादा तौफ़ीक़ न हुई,हक़ीक़त को पढ़ने और परखने से काम बहुत कम रखा लिहाज़ा दूसरों के कमालात से खाली अलज़हन रहे जेहन वफ़कर का मरकज़ वही बुजुर्ग रहे जिन से अकीदत विमहबत का रिश्ता है इसी लिए हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू को किसी ने कसीर अलद्दावी (बहुत ज़्यादा दावे करने वाला) कह दिया किसी ने कुछ किसी ने कुछ।।।

मगर तजदीद अल्फ़ सानी आप को मिन जानिब अल्लाह अता हुई थी,आप मुजद्दिद अल्फ़ सानी से ऐसे मशहूर हुए कि निरे नाम तक भूल गए यह गोया ख़ुदा की तरफ़ से इशारा है कि हम ने उन्हें मुजद्दिद अल्फ़ सानी बनाया है,उन्हों ने तजदीद अल्फ़ सानी की है ख़्वाह तुम्हारे नाक़िस जेहन समझ पाएं या न।

एक इस्तबआद यह भी था कि इस दौर में ऐसे ऐसे वली कैसे हो सकते हैं यही फ़िक्र की बुनियादी गलती थी, काश! वह समझते कि ऐसे दौर में तो ऐसे नफ़ूस क़ुदसिया की ज़रूरत होती है।

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की मुक़द्दस ज़ात से फ़्यूज़ात वबरकात और हक़ायक़ विकमालात के जो दरिया बहे और अपनी ताजगी के साथ फिर से जो निसबतें जलवा गर हुईं उन्हें का असर है कि आप के नसबी व रूहानी फ़र्रज़िंदों ने जो तरक़्क़ीयां की हैं और जैसे जैसे कमालात और

मआरिफ़ वहक़ायक़ का इज़हार फ़रमाया और हर तरह के वह तसर्फ़ विकरामात और मुशाहदात विमक्शफ़ात भी दिखा दिए जो पुराने बुजुर्गों से मनक़ूल हैं यह गोया हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की तरफ़ से ऐलान था कि जो कुछ हम ने कहा है वह दूसरों को अता भी करदिया है,जो हम ने देखा है वह लाखों और करोड़ों को दिखा भी दिया है,तुम कहां तक इंकार करोगे?

नीज़ जो तुम शरीअत से हट कर रियाज़ात विमुजाहिदात और नग़मा वसरोद में तलाश करते हो और शरीअत को जिस के लिए काफ़ी नहीं समझते हो इस से कहीं ज़्यादा हम ने शरीअत वसंत को कलेजे से लगा कर हासिल कर लिया और दिखा दिया है कि सर्वर कोनेन ﷺ ने जो कुछ हमारे लिए ज़ाबता हयात संन व वाजिबात और फ़राइज़ वगैरह की सूरत में मुक़रर फ़रमाया है जुमला कमालात की तहसील के लिए वही काफ़ी है,इसी से सब कुछ मिले गा,इस से हट कर वही है जो शैख़ सादी रहमत अल्लाह अलैहि ने फ़रमाया है؎

खिलाफ़ पयम्बर किसे रह गज़ीद

बमंज़िल न हरगिज़ ख़्वाहिद रसीद

बड़ा से बड़ा कमाल,बड़ी से बड़ी करामत,बड़ा से बड़ा मुशाहिदा सिर्फ़ अ वर सिर्फ़ इत्तिबा सुन्नत से हासिल हो सकता है,शरीअत वह कमाल है जो बुलंद ई वरीअत की इस मंज़िल से फ़ाइज़ होता है जो बश्री उरूज वार्तिक़ा का नुकता आखिर कही जा सकती है इस के मासवा जो भी मक्षुफ़ विमशहूद होगा वह हक़ीक़त तक नारसाई की दलील है।

बुलंदियां शरीअत के दामन में,रफातें शरीअत की झोली में और फ़लाह दारेन शरीअत की अता है,अब आइंदा सफ़हात में आप शरीअत विनबूत की ताज़ीम वितौक़ीर और मिलित की ताईद वितक़वियत,कमालात और निसबतों का अहया और तजदीद पढ़ें गे मालूम हो जाए गाका जो कुछ हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने उन इक़तिबासात में फ़रमाया है आप की

ख़िदमात इस से भी ज़्यादा हैं,बुलंदियां आप के कैसे बोसे लेती हैं,रफातें किस तरह आप पर निसार होती हैं और बिहारें किस तरह ख़िज़ां रसीदा को चमन ज़ार बनाती हैं?

(5)मक्तूब 4 दफ्तर दोम में आप ने इल्म अलीक़ीन और उएन अलीक़ीन और हक़ अलीक़ीन के बारे में साबित फ़रमाया है कि सूफ़िया ने उन के ताल्लुक से जो बयान फ़रमाया है वह दर हक़ीक़त इल्म अलीक़ीन के तीन हिस्सों से दो हिस्सा है अभी एक हिस्सा तो इल्म अलीक़ीन ही का दर पेश है उएन अलीक़ीन और हक़ अलीक़ीन तो बहुत बाद की बात हैं,इसी मक्तूब ग्रामी में आखिर में फ़रमाते हैं:

‘‘यह मआरिफ़ दायरा विलायत से खारिज हैं,अर्बाब विलायत उलमा-ए ज़वाहर की तरह उन के इदराक से आजिज़ हैं और उन के पाने में कोताह दस्त हैं यह उलूम मुश्का नुबुव्वत के अनिवार से हासिल किए ग्ये हैं अला अरबाबहा अस्सलात वालतहीत, कि तजदीद अल्फ़ सानी की तबईत व विरासत के तौर पर ताजे हुए हैं और ताजगी के साथ ज़ुहूर पाए हैं,उन उलूम विमआरिफ़ का मालिक इस अल्फ़ (हजार दोम) का मुजद्दिद है आखिरी अलफ़ाज़ बईना यह हैं।’’

‘‘कमाला यख़फ़ा अली अलनाज़रीन फ़ी इलूमा व मआरफ़ा उलती तताल्लुक़ बिलज़ात वालसिफ़ात वालाफ़आल व तितलब्स बा लाहवाल वाल्मुआजीद वाल्तजल्लियात वालज़हूरात फ़ेइलमोन अन् हाओ ला उलमारफ़ वाललूम विरा अलालमा व वरा मआरिफ़ उलावलिया बल उलूम हाओ ला बालनसब अला तलक उलउलूम क़शर वितलक उलमारफ़ लब ज़ालिक अलक़शर वाल्लाह सुब्हानहू उलहादी’’

यानी जैसा कि उन हज़रात पर मख़फ़ी नहीं जिन्हों ने हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के उन उलूम विमआरिफ़ में गौर किया है जिन का ताल्लुक अल्लाह तआला की ज़ात वस्फ़ात और अफ़आल व अहवाल विमवाजीद और तजल्लियात वज़होरात से वाबस्ता है कि यह उलूम विमआरिफ़ उलमा और ओलिया के मआरिफ़ से परे हैं बल्कि उलमा वावलिया के उलूम और हज़रत मुजद्दिद के मज़कूरा मआरिफ़ में छिलके और मग़ज़ की निस्बत है।

(6)तजदीद अल्फ़ सानी एक बड़ी ख़ास अता वह है जो आप ने मक्तूब 6 दफ्तर दोम में बयान फ़रमाया,चूंकि वह मंज़िल ऐसी थी जो आप को तजदीद अल्फ़ सानी की तजदीद के सिलसिले में अता हुई थी और आप से पहले वह मख़सूस दौलत किसी वली को नहीं मिली,आप क़ुद्दिस सिर्रहू ने रम्ज़ वाषारे के ज़रिया से उसे बयान किया जो बाज़ अहले इल्म के लिए मुखालफत का सबब बिन गई,हम पहले मक्तूब 6 की इबतिदाई असल इबारत नकल करते हैं इस के बाद इस की तो ज़ीह वतशरीह में बाज़ मुहक़्क़ीन के अक़्वाल नकल करें गे,आप क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं:

‘‘अंगारम कि मकसूद अज़ आफ़रीनश मिन आँसुत कि विलायत मुहम्मदी बोलायत इब्राहीमी अलेहमा अस्सलवात वालतसलीमात मंसबग़ गर्दद वहसन मुल्लाहत एं विलायत बाजमाल सबाहत आं विलायत मुमतजिज शव्द विरुद फ़ी अलहदीस अख़ी यूसुफ असुबह वाना अमलेह व बायं अंस्बाग वामतिज़ाज मक़ाम महबूबीयत मुहम्मदिया बदरजा इलिया रसद।’’

तर्जुमा:में समझता हूँ कि मेरी पैदाइश से मकसूद यह है कि विलायत मुहम्मदी विलायत इब्राहीमी से रंगीन हो और इस विलायत का हसन मुल्लाहत विलायत के इजमाल सबाहत से मिल जाए,हदीस शरीफ़ में आया है कि मेरे भाई यूसुफ में सबाहत और मुझ में मुल्लाहत है और इस अंस्बाग(रंगीनी)वामतिज़ाज(आमेज़िश) से महबूबीयत मुहम्मदिया का मक़ाम दर्जा इलिया को पहुँच जाए।

हज़रत ख़्वाजा मुहम्मद हाशिम क़ुद्दिस सिर्रहू ने इस इबारत की तशरीह चाहि थी,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने मक्तूब 97 दफ्तर दोम में इस की मुकम्मल वज़ाहत फ़रमाई है और ग़ालिबा मक्तूब 94व95 दफ्तर सोम में इसी मक़ाम को निहायत तफ़सील से बयान फ़रमाया है,में इस इबारत के ताल्लुक सेहज़रत मौलाना ज़ैद फ़ारूक़ी का बयान नकल कर देता हूँ,जिस से काफ़ी हद तक बात समझ में आजाए गी,फ़रमाते हैं:

‘‘इजमाल सबाहत से इशारा इस ज़िमनी इत्तिबा मिलित इब्राहीमी की तरफ़ है जो आयत‘‘अतबा मिल इब्राहिम हनीफा’’से मुस्तफ़ाद है ’’फिर तक़रीबा एक सफ़ा के बाद फ़रमाते हैं:‘‘हज़रत क़ाज़ी सना अल्लाह पानी पत्ति क़ुद्दिस सिर्रहू ने अपने रिसाला में लिखा है कि कौला अंगारम ।।अलख हज़रत मुजद्दिद ने जो यह बात कही कि में समझता हूँ कि मेरी पैदाइश का मतलब यह है,तो इस का खुलासा यह है कि सरदार दो आलम ﷺ के कमाल मुताबेत की वजह से मुझ को मता बाअत इब्राहिम अलैहि अस्सलाम का शरफ़ भी इनायत किया है जो कि अतबा मिल इब्राहिम के ज़िमन में मो जूद है,अल्लाह तआला ने मुझ को दोनों अस्हाब शरीअत के कमालात से इस हैसियत से मुस्तफ़ीद किया है जैसा कि ख़ादिम ज़ुल्ला बरदार(किसी का बचा हुआ खाने वाला) मुस्तफ़ीद हुआ करता है,यह सूरत इस्तिफ़ादा ओलिया में किसी को नसीब नहीं हुई है,आप का इरशाद इज़हार शकर की बना पर है और अगर इस को इफ्तिख़ार पर महमूल कर किया जाए तब भी कोई मज़ाइक़ा नहीं है क्योंकि औलिया पेशेन से अल्लाह के फजल पर बकसरत इफ्तिख़ार साबित है।।अलख और आप ने मिसाल में हज़रत ग़ौस आज़म का कौल‘‘कदमी अली रकब कल वली अल्लाह’’लिखा है।’’

(ख़याल रहे कि में ने यहाँ सिर्फ़ तर्जुमा लिखा है फ़ारसी इबारत असल किताब में मौजूद है)

ख़लत इब्राहीमी की विलायत और महबूबीयत मुहम्मदी की विलायत के इमतिज़ाज और इख़तिलात के सिलसिले में हज़रत शाह अब्द उलअज़ीज़ क़ुद्दिस सिर्रहू ने पर अज़ हक़ायक़ मज़मून लिखा है,जेल के सुतूर में इस का खुलासा पेश किया जाता है।

‘‘विलायत ख़लत के अलावा दूसरी विलायतों का बयान शारा ने किया है चाहे वह बयान सराहत के साथ हुआ हो चाहे किनाया और इशारे से,जैसे विलायत मुहब्बत है इस का पता यहबहम व यहबूनाम और यहब अल्लाह वर्सोलह और यहबा अल्लाह वर्सोलह से और विलायत रज़ा का पता

रज़ि अल्लाह अन्हुम वर्ज़्वा अन्हु और लकद रज़ि अल्लाह अन उलमोमिनीन अज़ यबायओनिक तहत अलिशजरत से पता चलता है लेकिन विलायत ख़लत का पता किसी जगह से नहीं मिलता है।

हज़रात सहाबा और ताबईन और उन के बाद हज़रत जुनेद बग़दादी और मशाइख़ कादरिया व चिश्तिया के जमाने तक विलायत ख़लत के अलावा दूसरी विलायतों के ज़रिया कमालात हासिल किए जाते थे और उन विलायतों से कमालात हासिल करने के तरीके किताबों में मुदव्वन व मुरत्तिब और मुबूब हुए,हज़रत मुजद्दिद से पहले तरीका नक़्शबंदिया की राह मुहब्बत व महबूबीयत थी,ज़िक्र जहर व वज्द व शौक उन का मशग़ला था,हज़रत अब्द अलख़ालिक़ इस तरीका के बानी हैं उन को ख़िज़र ने ज़िक्र ख़फ़ी की तालीम दी हज़रत ख़्वाजा बहा उद्दीन नक़्शबंद बुखारी ने इस तरीके की आबयारी की और वह बार आवर हुआ,हज़रत ख़्वाजा नासिरुद्दीन उबीद अल्लाह एहरार के जमाने में उलूम तौहीद का इमतिज़ाज हुआ यानी जनाब शैख़ अकबर के बयान करदा उलूम इस तरीके में भी राइज हो गए और इस इमतिज़ाज ने ऐसा रंग पैदा किया कि उलूम तौहीद का ग़लबा हो गया।

अब हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू का ज़माना आयाआप ने उन तमाम उलूम को बतून अलबतून में पहुँचाया यानी इस को छोड़ा और अपने चाक सीना से महबूब तक पहुँचने का ऐसा रास्ता निकाला कि शौक वोज्द एक तरफ़ रह ग्ये और मदार कार क़ल्ब,रूह,सर,ख़फ़ी,अख़फ़ा और अनासिर पर हुआ यहाँ तक कि बातिन से अनिवार उठ उठ कर फिर बातिन पर गिरने लगे ता आं कि मक़ाम ख़लत ने जलवा दिखाया।

मुहब्बत आशिकी है और महबूबीयत माशूकी और ख़लत दोस्ती व यारी, आशिकी में आह व नाला व बे ताबी और सर फोड़ना है,माशूकी में नाज़ व दुलार और फख्र विम्बाहात और ख़लत में सोहबत व सरगोशी और राज़ विनियाज़ अज़ जानबीन,यह है इजमाल सबाहत ख़लत और अगर कोई तफ़सील चाहता है तो हज़रात मुजद्दिदय की सोहबत चंद साल इख्तियार करे और फिर बितरीक़ वजदान ख़ुद मुलाहिजा

करे और देख ले कि विलायत मुहम्मदी का हसन मुल्लाहत विलायत इब्राहीमी के जमाल सबाहत से किस तरह मिला है और इस की आमेज़िश से महबूबीयत मुहम्मदिया का मक़ाम किस दर्जा इलिया को पहुँचा है।’’

राह विलायत ख़लत का बयान एक हजार साल से किसी ने नहीं किया था यह मक़ाम सरदार दोआलम ﷺ के जो हर शरीफ़ में मकनून व मख़ज़ून था,अल्लाह तआला ने हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की ज़ात को इस मक़ाम के ज़ुहूर का मंशा बनाया और आप के तुफ़ैल हज़ारहा तालिबान हक़ इस राह से मुस्तफ़ीद हुए।।।

अजब तर यह है कि सालहा साल हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने इस तरीका और इस राह से तालिबान हक़ की रहबरी की और फिर हज़रत सिकंदर फ़रज़न्द पसर हज़रत कमाल कैथली सरहिंद आये और सर हलक़ा तरीका महबूबीयत हज़रत ग़ौस समदानी सय्यदना अब्द उलक़ादिर जैलानी का मुबारक ख़िरक़ा आप को पहनाया,इस तरह आप अज़ राह ख़लत मक़ाम महबूबीयत को पहुँचे,परवरदिगार आलम अपने ख़ास बंदों से ऐसे अजीब मामलात करता है,अजीब तर मामला यह है जो इस ने अपने महबूब ﷺ के साथ किया है कि इबतिदाए कार मक़ाम इब्राहीमी से हुई जब कि आप ने हिज्र अस्वद को इस के मक़ाम पर रखा फिर आप मदीना मुनव्वरा तशरीफ़ ले ग्ये और आप ने यहूद वंसारा से जिहाद किया और आप को मक़ाम मो सवी और मक़ाम ईसवी इनायत हुआ उन दोनों मुक़ामों का आगाज़ अज़ वक़्त इसरा ब सोये बीत उलमुक़द्दस हो चुका था और ग़ज़वा तबूक में इस में तज़ाइफ़ वितज़ायद हुआ और हजनालविदा में फिर कमाल इब्राहीमी से मुशर्रफ़ हुए और इस तरह अलनहाय ही एलर्जू अला अलबदाय मुतहक़्क़ हुआ यानी इब्तिदा सैर सालिक की जहां से होती है जब लौट कर फिर इसी मक़ाम पर आजा ता है तो सैर की इन्तहा हो जाती है।’’(हज़रत मुजद्दिद और उन के ना कद्दीन,अज़। फ़ारूक़ी साहिब)

सिराज उलहिंद हज़रत शाह अब्द उलअज़ीज़महद्दिस देहलवी क़ुद्दिस सिर्रहू का बयान आप ने पढ़ा

और बार बार पढ़िए कि शाह साहिब ने किस क़द्र दकीक़ मार्फत को आसान कर दिया और हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के तजदीदी कमालात जिन की वजह से आप हज़ारा दोम के मुजद्दिद हुए कितनी वज़ाहत के साथ बयान फ़रमादिया,हज़रत शाह साहिब क़ुद्दिस सिर्रहू के मुबारक कलाम में ख़ुद उन की बुलंद पाया शख्सियत जहां जलवा गर है वहीं मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के मख़सूस कमालात और उन की निस्बत के ख़साइस भी जलवा गर हैं।

इस कमाल की गहराई में आप उतरें तो आप को पता लग जाए गा कि हज़ारा दोम में पहुँचते पहुँचते इंसानी इस्तिदाद किस मंज़िल पर आ गई थी रफ़्ता रफ़्ता औलीए का मिलियन कम होते जा रहे थे,बड़े और बुलंद मुक़ामात तक वसूल किस क़द्र मुश्किल होता जा रहा था,क़ुर्ब ख़ास की दौलतों से महरूमी बढती जा रही थी,हुज़ूर सर्वर को नैन ﷺ के मख़सूस और बुलंद पाया कमालात तक वसूल निहायत दुश्वार होता जा रहा था,रहमत इलाही को अपने बंदों की ज़ईफी व ना तवानी प्रतिरस आयालिहाजा हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू को पैदा फ़रमा कर हसन मुल्लाहत के साथ इजमाल सबाहत के अंस्बाग वामतिज़ाज ने किया गुल खिलाए कि बिहारों पर बिहार आ गई,फिर से मार्फत व क़ुर्ब ख़ास का दौर जाम आ गया और दलों के पैमाने शराब मार्फत से छलकने लगे,रूहानियत का दौर दौरे हुआ और हक़ की शुवाएं तेज तर हो गईं और फिर से वह सारे कमालात जलवा दिखाने लगे जो एक दौर इबतिदाई सदी तक रह कर रुपोश हो गए थे।

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने बड़े लतीफ़ और दकीक़ इशारों में अपने मख़सूस कमालात बयान फ़रमाए और मुल्लाहत वस्बाहत को और उन के कमालात के दरमियान फ़र्क़ बताया है,चंद इशारे में भी सुपुर्द कलम करता हूँ:

कुरआन पाक में अल्लाह तआला ने अपने महबूब ﷺ को मिलित इब्राहीमी की इत्तिबा व पैरवी का हुक्म दिया और सरकार अलैहि अस्सलात वस्सलाम ने दुरूद इब्राहीमी में अपनी उम्मत को तालीम दी

है कि वह अपने नबी ﷺ के लिए इसी तरह सलवात व बरकात माँगें जो हज़रत इब्राहिम अला नबीना व अलैहि अस्सलात वस्सलाम के लिए थीं,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि शायद इस से मकसूद इसी दौलत उज़्मा का हुसूल है और यही ग़रज मतलूब है,अब आप सुनें कि मुल्लाहत वस्बाहत में किया फ़र्क़ है?

आप क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि यह दोनों हसन ज़ात तआला की मुखबिर हैं सिफ़ात की आ मेज़िश के बग़ैर लेकिन हसन सिफ़ात व अफ़आल व आसार सब का सब हसन सबाहत से मुस्तफ़ाद है कि कसीर अलबरकत है,हसन मुल्लाहत हज़रत इजमाल के ज़्यादा मुनासिब है गोया मुल्लाहत मर कज़ है हसन(मुतअल्लिक़) के लिए और सबाहत इस मर कज़ का दायरा।।।

यह भी ध्यान रहे कि हज़रत ज़ात में बिसातत भी है और वसात भी अगरचे यह बिसातत व वसात हमारी अक्ल के विरा है और यह दोनों एक दूसरे से मुमताज़ भी तो मुल्लाहत व सबाहत भी एक दूसरी से मुमताज़ और जुदा हो M गी,नीज़ उन दोनों के कमालात भी एक दूसरे से मुमताज़ हो M गे।

अब जबकि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू का दौर आया तो हसन मुल्लाहत और हसन सबाहत का इमतिज़ाज हुआ और मिलित इब्राहीमी की पैरवी के हुक्म और सलवात व बरकात मज़कूरा की तलब से मकसूद था लिहाज़ा अब हजार साल पूरे हो ए और अल्लाह तआला ने हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू को सबब बना दिया और फिर आप क़ुद्दिस सिर्रहू के अलफ़ाज़ में‘‘व आँचा मकसूद अज़ आ फ्रेंश ख़ुद मि दानिस्तम मालूम शद कि बहसूल पैवस्त व मसऊल हजार साला बाजाब्त करीन गश्त।’’

फिर इस के बाद हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की नोक कलम से यह इबारत निकली है ‘‘अलहम्द लिल्लाह अलज़ी जालनी सल बेन अलबहरीन व मस्लिहा बेन अल्फ़इतेन।।।अलख’’ उलमा ने इस इबारत में दो चीजें ख़ास तौर से बयान फ़रमाई हैं एक तो यह कि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के वजूद मसाऊद से दरियाए शरीअत और दरियाए तरीक़त में मिलाप

हो गया।

जिन्हों ने आप को गहराई से पढ़ा है वह जा नते हैं कि तरीक़त व तसव्वुफ़ में कहां कहां से किया किया आज्ञा था और आप ने सारी आला शों से पाक फ़रमा कर खालिस शरई तसव्वुफ़ बना दिया गोया शरीअत के क़वानीन व ज़वाबत ही सिर्फ़ तसव्वुफ़ हैं इस से हट कर कुछ नहीं।

दोम उलमा व सूफ़िया के मा बेन अक़ाइद व आमाल में एक ख़ास जिंग छिड़ गई थी और यह आज तक कहा जाता है कि उलमा और सूफ़िया में कभी नहीं बनी,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने दोनों को बाहम इतना खींचा और एक दूसरे से क़रीब किया कि दोनों गो या एक ही चीज़ हो गए,जो आलम है वह सोफी और जो सोफी है वह आलम,यह दोनों नुक्ते अपनी जगह बजा हैं और इबारत मज़कूरा में दोनों की तरफ़ पूरा पूरा इशारा है और यह भी तजदीद अल्फ़ सानी की ज़ बर्दस्त अता है लेकिन इस मक्तूब ग्रामी में पहली मर्तबा यह इबारत जिस मौका व महल पर नोक कलम से निकली है वह इस बात की साफ ग़म्माज़ी करती है कि दो दरियाओं को मिलाने में दरयाय हसन मुल्लाहत और हसन सबाहत का अंस्बाग और इमतिज़ाज भी है फ़िल्ला अलहम्द।

अब आप के वजूद मसाऊद से उम्मत पर कमालात मुमतज़िजा के दरवाजे खिल ग्ये और कम वक़्त में एक साथ उन दोनों दौलतों से हिस्सा हासिल होने लगा,फ़ुस्बहान अल्लाह व बहमदा।

मामला मज़कूरा तो आप के वजूद मसाऊद से वाबस्ता ही था इस के अलावा आप के सुपुर्द एक दूसरा भी अज़ीम का रख़ाना सौंपा गया है और वह है किया? मक्तूब की आखिरी स्तर से पता चलता है कि वह कारखाना दीगर अज़ीम आप के ज़ुहूर मुक़द्दस से कमालात नुबुव्वत वरिसालत व ओलिवा लाज़म वगैरह का ज़ुहूर है जो कि सरकार अलैहि अस्सलात वस्सलाम के दुनिया से तशरीफ़ ले जाने के बाद बकौल हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ताबईन और तबा ताबईन तक चला है और इस

के बाद रुपोश हो गया ,आप तारीख का बालतफ़सील मुताला कर लें और साफ़िया कराम के बयान करदा कमालात पढ़ लें कमालात नुबुव्वत वगैरह का कहीं पता नहीं मिले गा बल्कि सिर्फ़ कमालात विलायत की जलवा गिरी नज़र आये गी।

यह हैं आप के ज़ुहूर वजूद से मकसूद का नात को अता करना जो अल्फ़ सानी के साथ मख़सूस हैं,आप क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं मेरी पैदाइश से मकसूद ख़ल्क़ का इरशाद व तकमील नहीं है मामला दीगर और कारखाना दीगर है इस ज़िमन में जो भी मुन्ना सबत रखे गा फ़ैज़ पाए गा वर्ना नहीं तकमील व इरशाद का मामला इस का रख़ाना की निस्बत मत्रूह फ़ी अलतरीक़(रास्ता में पड़ी हो ई चीज़) अम्र की तरह है,अनबीए कराम अलैहिम अस्सलवात वा लतसलीमात की दावत उन के बा तनी मामलात के बनिस्बत यही हुक्म रखती है’’

आप देख रहे हैं कि मख़लूक़ की रहबरी व हिदायत हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के लिए एक ज़िमनी चीज़ थी यह तो आप की कुव्वत व ताकत के लिहाज है इतना बड़ा का म हो गया जो ज़ाहिरा तजदीद का सबब बना वर्ना दर हक़ीक़त तजदीद अल्फ़ सानी आप क़ुद्दिस सिर्रहू के इसी किस्म के कमालात हैं जो आप के ज़रिया उम्मत को मिले हैं और मिल रहे हैं।

आज आप को रहलत किए हुए कई सदीयां गुज़र गई हैं अब कोई बताये कि आप के बाद वही कमालात जलवा गर हो रहे हैं जो आप ने दिए हैं या उन सदियों में कोई और भी ऐसा आया है जो ता ज़ह कमालात दे गया हो? और जो कुछ सदीयां बा क़ि रह गई हैं उन में आने वाली नस्लें देख लें गी अऔर मालूम हो जाए गा कि जिस तजदीद को तजदीद अल्फ़ सानी कहा जा रहा है वह कुछ और ही है ,हम ने तजदीद अल्फ़ सानी की तरफ़ इशारे कर दिए हैं आप मज़ेद तफ़सील आइंदा औराक़ में पढ़ें गे नीज़ जो रूहानी कमालात के जीर अनवान हम कमालात सुपुर्द कर चुके हैं वह अक्सर तजदीद अल्फ़ सानी के बहुत बड़े अतयात हैं।

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की तजदीद जहां इस हैसियत से मुमताज़ है कि आप हज़ारा

दोम के मुजद्दिद थे जैसा कि हम बयान कर चुके हैं और आगे करें गे भी,और तजदीदी ख़िदमात जो हज़ारा दोम में आप की मुक़द्दस ज़ात से वजूद में आई हैं और जिन कमालात का ज़ुहूर हुआ है और अवाइल की निसबतों को जलवा दिया है कोई भी गौर करे कि आज उन अतयात का ताल्लुक सदी से नहीं है बल्कि यह फ़्यूज़ात व बरकात और उलूम व मआरिफ़ इस वक़्त तक के लिए हैं जब तक इस हज़ारा दोम में हज़रत इमाम महदी अलैहि इलरिज़्वान का ज़ुहूर मसाऊद नहीं हो ता है।

आप की तसरेहात मौजूद हैं कि आप के उलूम व मआरिफ़ हज़रत इमाम महदी अलैहि इलरिज़्वान के सामने पेश हूँ गे,जिस ने भी आप को पढ़ा है वह जानता है कि जो कुछ भी बयान किया गया है इस में जरा भी मुबा लग़ा नहीं है,जो लोग गलत फ़हमियों का शिकार हैं वह दर असल अदम इल्म की वजह से या फिर तास्सुब वानाद की वजह से,मगर इस से आप के कमालात पर कोई पर्दा पड़ने वाला नहीं है और न ही इस से आप की अज़मत व रफात पर कोई आंच आने वाली है।

आप की तजदीद की यह भी इमतियाज़ी शान है कि दीन के तमाम अहम शोबों अक़ाइद व आमाल और ज़ाहिरी व बातिनी कमालात पर हावी है,जब कि इस से पहले की तजदीदें ज़्यादा तर किसी एक शोबे से ताल्लुक रखती थीं,नीज़ आप की तजदीद का यह भी ख़ुसूसी निशान है कि आप को बालित्तिफ़ाक़ सभी मुजद्दिद मानते हैं और वस्फ़ मुजद्दिदेत ही के साथ आप आलम में मशहूर हुए हत्ता कि बहुत से लोग आप को मुजद्दिद अल्फ़ सानी ही के नाम से पहचानते हैं वह आप का असली नाम तक नहीं जानते हैं,यह सब कुछ मिंजानिब अल्लाह हुआ।

पहले के मुजदुद्दीन की तजदीद आज निरे ख़वास तक को नहीं मालूम हो सकी और न सब की इत्तिफ़ाक़ी चीज़ हो सकी,किसी ने किसी को मुजद्दिद माना तो किसी ने किसी को।

यह भी आप की ख़ुसुसीआत से है कि आप की तजदीद इल्हामी थी और आप इस के

इज़हार पर मा मोर थे,हज़रत ख़्वाजा मुहम्मद हा शम कुशमी रहमत अल्लाह अलैहि ने इस मक़ाम पर बड़ी लतीफ़ बात तहरीर फ़रमाई है जिस का खुलासा यह है कि आप को कई मर्तबा तजदीद अल्फ़ सानी का इलहाम हुआ और इस के इज़हार का हुक्म मिला फिर आप ने इस का इज़हार फ़रमाया,हज़रत ख़्वाजा हाशिम के दिल में ख़याल आया कि अगर उलमा-ए वक़्त से बड़े उलमा भी आप की तजदीद अल्फ़ को तसलीम कर लेते तो बड़ी ता ईद होती,इसी ख़याल के साथ एक दिन हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की ख़िदमत बा बरकत में हाजिर हुए,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने उन से मुखातिब हो कर फ़रमाया कि मौलाना अब्द अलहकीम स्यालकोटी ने कि उलूम अक्लिया व नक़लय और बुलंद तसानीफ़ में उन जैसा इस वक़्त हिंदोस्तान में नज़र नहीं आता है,मेरे पास ख़त भेजा है और तबस्सुम करते हो ए फ़रमाया,उन तारीफ़ी कलिमात से एक यह था‘‘मुजद्दिद अलालफ़ एलिसानी।’’

ख़्वाजा मुहम्मद हा शम क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि पो शीदा न रहे कि उन मौलाना मज़कूर(अब्द अलहकीम साहिब स्यालकोटी)ने एक रात वाक़ा में हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू को देखा था कि आप मौलाना पर आयत‘‘क़ुल अल्लाह सम ज़रहम’’पढ़ रहे हैं,इस वाक़ा को देखने के बाद हज़रत मौलाना साहिब हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की ख़िदमत में हाजिर हो ए,तालीम पाई और मुख़लिसान हक़ीक़ी से हो गए,पस ज़ा हरी मिला कात से पहले मौलाना कहते थे कि हज़रत मुजद्दिद का अवैसी हूँ,हज़रत ख़्वाजा फ़रमाते हैं कि इस मर्तबा यानी तजदीद अल्फ़ वाला अगर उन ख़साइस से नवाजा जाए तो ताजब ख़ेज़ को ई बात नहीं।(देखिए बरकात अहमदिया स:175,176)

आप के अज़ीम कमालात से यह भी है कि आप का ज़ाहिरी व बातिनी फ़ैज़ान इस क़द्र आम हुआ कि को ई मुल्क और सूबा नहीं बचा जहां फ़ैज़ न पहुँचा,नीज़ बड़े बड़े फुक़हा व मुहद्दिसीन,मुफ़स्सिरीन,मुतकल्लिमैन और बड़े बड़े मंतक़ी और फ़लसफ़ी आप के कमालात से बहरा वर हो ए और आप के हलक़ा इरादत में बालवासता या बुला वास्ता दाखिल हो ए।

बा त काफ़ी तवील हो गई चूंकि तजदीद के सिलसिले में किया स आराईयां और को ता हियां बहुत हो गई हैं इस लिए तफ़सील से गुफ़्तगू करना पड़ी हमें उम्मीद है कि हर नाज़िर मुंसिफ़ तजदीद को समझ सकता है और तजदीद माइत व तजदीद अल्फ़ का फ़र्क़ महसूस कर सकता है अब हम चंद अहम गो शों पर तजदीद अल्फ़ सानी की ख़िदमात का जायजा लें गे और तारीख की रोशनी में आप क़ुद्दिस सिर्रहू कयाहम तजदीदी कार नामों कोसपुर्द कलम करें गे जिस से जहां आप के तजदीदी कार नामे सामने आएं गे वहीं लोगों को काम की राहें भी मालूम होंगी और पता चल जाएगा कि जब प्रवर दिगार काम लेना चाहता है तो एक से भी वह ले लेता है जो हजारों मिल कर नहीं कर पाते हैं।