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Allama Afaque Ahmad Mujaddidiतजदीद अल्फ़ सानीख़लक़त मुहम्मदी

अध्याय 23 में से 57पृष्ठ 322–334

ख़लक़त मुहम्मदी

जानना चाहिए कि ख़लक़त मुहम्मदी बाक़ी अफराद इंसानी की पैदाइश की तरह नहीं है, बल्कि अफराद आलम से किसी फ़र्द की पैदाइश से मुनासबत नहीं रखती है कि आप निशा अंसरी के बावजूद नूर हक़ जल व अला से पैदा हुए हैं जैसा कि आप ‘‘ख़लक़त मिन नूर अल्लाह’’ में अल्लाह के नूर से पैदा किया गया और दूसरों को यह दौलत मयस्सर नहीं हुई है। इस दक़ीक़ा का बयान यह है कि मासबक़ गुज़र गया है कि हज़रत वाजिब उलवजूद जल सुल्ताना की सिफ़ात समानिया हक़ीकया हर

हर चंद दायरा वजूब में दाखिल हैं लेकिन इस एहतियाज के वास्ते से कि यह हज़रत ज़ात की मुहताज हैं उन में इमकान की बो साबित है और जब सिफ़ात हक़ीकया क़दीमा में इमकान की बो की गुंजाइश हुई तो वाजिब उलवजूद तआला की सिफ़ात इज़ाफिया में इमकान का सबूत बितरीक़ औला होगा और उन का क़दीम न होना उन के इमकान पर सब से बड़ी दलील होगा और कश्फ़ सरीह से मालूम हुआ है कि हुज़ूर सर्वर कोनेन ﷺ की पैदाइश इसी इमकान से नाशी है कि सिफ़ात इज़ाफिया से ताल्लुक रखता है न कि इस इमकान से जो कि बाक़ी मुम्किनात आलम में साबित है और जिस क़द्र गौर से मुम्किनात आलम के सहीफ़ा को मुताला किया जाता है सर्वर आलम का वजूद इस जगह मशहूद नहीं होता है बल्कि आप की ख़लक़त व इमकान का मंशा सिफ़ात इज़ाफिया का वजूद और उन का इमकान महसूस होता है और जब इस सर्वर अलैहि व अला आला अस्सलात व अस्सलाम का वजूद आलम मुम्किनात नहीं होगा बल्कि इस आलम के फ़ौक़ होगा लामुहाला इस का साया न होगा नीज़ आलम शहादत में शख्स का साया शख्स से लतीफ़ तर होता है औरजब उन से लतीफ़ तर आलम में नहीं तो उन के साया की किया सूरत है अलैहि व अला आला अस्सलवात व इलतसलीमात।

सुनो सुनो सिफ़त इल्म सिफ़ात हक़ीकया से है और मौजूद ख़ारिजी के दायरा में दाखिल है और जब इस सिफ़त को इज़ाफ़त आरिज़ होती है और इस इज़ाफ़त से तकसीम पाती है। मसलन इल्म इजमाली या इल्म तफ़सीली यह इस की किस्में सिफ़ात इज़ाफिया से हूँ गी और सबूत अलामरी के दायरा में दाखिल हूँ गी जो कि सिफ़ात इज़ाफिया का जाए करार है जैसा कि गुज़र गया और मशहूद होता है कि इल्म जुमली कि सिफ़ात इज़ाफिया से है वह नूर है कि निशा अंसरी (इस दुनिया में) असलाब (पश्तों) से कसीर रहमों (माओं के रहम) में हिक़मतों और मस्लहतों के मुक़तज़ा से सूरत इंसानी में कि अहसन तक़वीम (सब से बेहतरीन पैदाइश) है (इस नूर ने) ज़ुहूर किया है और मुहम्मद और अहमद नाम हुआ है।’’

अच्छी तरह सुनना चाहिए कि इस कैद इजमाली ने हर चंद इल्म मुतअल्लिक़ को मुक़य्यद कर दिया है और

हक़ीक़त से इज़ाफ़त में लाई है, लेकिन किसी किस्म की ज्यादती मुक़स्म में पैदा नहीं की है और किसी चीज़ ने उसे मुक़य्यद नहीं किया है क्यों कि इजमाल इल्म नफ़्स इल्म का नाम है न किसी ऐसे अम्र का जो इल्म के साथ मंज़िम हो इस के बुर खिलाफ़ तफ़सील इल्म कि जज़ईआत कसीरा का तक़ाज़ा करती है ताकि तफ़सील मुतस्व्वर हो अजब कैद है कि मज़हर इतलाक़ है और कितना अच्छा मुक़य्यद है कि उएन मुतअल्लिक़ है इसी किस्म की नाज़ुकी मुतअल्लिक़ इल्म में ज़ात आलम जल सुल्ताना की निस्बत मुलाहिजा करना चाहिए कि इल्म नफ़्स आलम व नफ़्स मालूम हो सकता है जैसा कि इल्म हुज़ूरी में साबित है बख़िलाफ़ दूसरी सिफ़ात के कि यह काबिलियत नहीं रखती हैं नहीं कह सकते हैं कि कुदरत उएन कादर और उएन मक़दूर है और इरादा उएन मुरीद और उएन मुराद है पस इल्म को ज़ात आलम के साथ एक किस्म का इत्तिहाद है और एक अज़महलाल (नीस्ती व नाबूदगी) है जो इस के गैर को हासिल नहीं है इस जगह अहमद का क़ुर्ब अहद के साथ दरयाफ्त करना चाहिए क्यों कि वह वास्ता कि दरमियान रखता है और वह सिफ़त इल्म है ऐसा अम्र है कि मतलूब से इत्तिहाद रखता है पस हिजाबत की इस जगह किया गुंजाइश।’’

और नीज़ इल्म के लिए ऐसा हसन ज़ाती है कि इस के गैर को सिफ़ात से यह हसन साबित नहीं है। लिहाज़ा इस फ़क़ीर के गुमान में सिफ़ात वाजिबी में सब से ज़्यादा महबूब हक़ जल व अला के नज़दीक सफ़ अलालम है और चों कि इस का हसन बे चुनी का शाइबा रखता है हस (कुव्वत एहसास) इस के इदराक में क़ासिर है, इदराक ताम इस हसन का मंशा आख़िरत से वाबस्ता है जो कि दीदार का मक़ाम है जब ख़ुदा इज़ विजल को देखें गे जमाल मुहम्मद को पाएं गे हर चंद इस दुनिया में ‘‘तिहाई हसन हज़रत यूसुफ को मुस्लिम है और बाक़ी तिहाई सब को तकसीम हुआ लेकिन इस निशा (आख़िरत) में हसन हसन मुहम्मदी है और जमाल जमाल मुहम्मदी है अलैहि अस्सलवात व इलतसलीमात कि महबूब ख़ुदावंद हैं जल सुल्ताना क्यों कर किसी दूसरे के हसन को आप के हसन में शराकत होगी कि आप का हसन मतलूब के साथ मुत्तहिद होने

की वजह से उएन मतलूब का हसन हैऔर दूसरे को चों कि इत्तिहाद नहीं है लिहाज़ा वह हसन नहीं है पस पैदाइश मुहम्मदी अलैहि व अला आला अस्सलात व अस्सलाम हदूस के बावजूद क़दम ज़ात की तरफ़ मुस्तनद हुई और आप का इमकान भी वजूब ज़ात की तरफ़ मनतही हुआ और आप का हसन हसन ज़ात हुआ कि गैर हसन का शाइबा इस में काइन (मौजूद) नहीं जब ऐसा है तो लामुहाला जमील मुतअल्लिक़ की मुहब्बत का मुताल्लिक़ हुआ और इस सुब्हानहू के महबूब हुए फ़ान अल्लाह जमील यहब अलजमाल

यहाँ एक सवाल पैदा होता था कि आयत करीमा:

یُّحِبُّہُمْ وَیُحِبُّوۡنَہٗۤ (المائدہ: ۵؍۵۴)

इस बात पर दलालत करती है कि अल्लाह तआला हुज़ूर महबूब कोनेन ﷺ के अलावा दीगर लोगों से भी मुहब्बत करता है। लिहाज़ा दूसरे भी महबूब हुए तो दूसरों में भी वह कमालात हूँ गे जो महबूबीयत की बुनियाद पर आप को हासिल हैं इस के जवाब में आप जरा मुजद्दिदी कलम की जोलांगी देखें फ़रमाते हैं।

इक़साम मुहब्बत:

मुहब्बत दो किस्म पर है एक मुहब्बत वह है जो मुहब् की ज़ात से ताल्लुक रखती है और एक मुहब्बत वह है कि इस की ज़ात के गैर से ताल्लुक रखती है पहली किस्म मुहब्बत ज़ाती है और इक़साम मुहब्बत में सब से आला है क्यों कि कोई शख्स किसी चीज़ को इस क़द्र नहीं चाहता है जितना कि ख़ुद को नीज़ मुहब्बत की यह किस्म सब से ज़्यादा मुहकम और ज़्यादा मजबूत है कि किसी आरिज़ के अर्ज़ से ज़वाल पज़ीर नहीं होती है नीज़ यह मुहब्बत जिस सेमुताल्लिक़ होती है वह महबूब सिर्फ़ है कि मुहब्बीत का शाइबा नहीं रखता है बख़िलाफ़ किस्म दोम के कि अर्जी है ज़वाल कबूल करती है और इस का जिस से ताल्लुक होगा वह हर चंद एक जिहत से महबूब है लेकिन मुतअद्दिद वजूह से मुहब्बीत भी रखता है और चों कि ख़ातिम अलर्सल अलैहि व अलैहिम अस्सलात व

इलतसलीमात का हसन व जमाल हज़रत ज़ात तआला के हसन व जमाल की तरफ़ मुस्तनद है जैसा कि गुज़र गया लामुहाला (इस लिए) नाचार किस्म अव्वल की मुहब्बत कि ज़ात जल शाना से मुताल्लिक़ है आप से मुताल्लिक़ होगी और ज़ात सुब्हानहू की तरह इस मुहब्बत के ताल्लुक की वजह से आप भी खालिस महबूब हूँ गे।’’

मतलब यह कि परवरदिगार जिस तरह अपनी ज़ात से मुहब्बत करता है और इस की ज़ात महबूब है इसी तरह अपने महबूब ﷺ से भी मुहब्बत करता है,आप फ़रमाते हैं: दूसरों को ऐसी दौलत मयस्सर नहीं होती है और हसन ज़ात से क़लील अलंसीब हैं (इस लिए) मुहब्बत की दूसरी किस्म उन से मुताल्लिक़ होगी और एक वजह से उन को महबूब बनायेगी महबूब मुतअल्लिक़ (यानी कामिल और मिन कल उलवजोह) आप हैं कि ज़ात मुहब् की तरह हमेशा महबूब हैं।

महसूस होता है कि इस किस्म का ग़लबा मुहब्बत कि हज़रत मूसा को हज़रत हक़ सुब्हानहू के साथ है और वह (हज़रत मूसा) इस मुहब्बत की वजह से मुहबीन की असल व सरदार होते हैं इसी तरह इफ़रात मुहब्बत हज़रत हक़ सुब्हानहू को हज़रत ख़ातिम अलर्सल ﷺ के साथ है हर चंद यह फ़क़ीर उन दोनों मुहब्बतों के दरिया में बहुत ग़ोता ज़नी करता है कि उन दोनों मुहब्बतों के दरमियान कुव्वत व ज़ोफ़ के लिहाज से फ़र्क़ करे और इस मुहब्बत को कि ख़ालिक़ को है मुहब्बत मख़लूक़ से शदीद तर पाए बहकम आयत करीमा:

فَاِنَّ حِزْبَ اللہِ ہُمُ الْغٰلِبُوۡنَ (المائدہ: ۵؍۵۶)

तर्जुमा: तो बे शक अल्लाह ही का गिरोह ग़ालिब है।’’

कुछ भी तफ़ावुत ज़ाहिर नहीं होता है गोया उन दोनों मुहब्बतों को मेज़ान अदालत में बराबर तुला है और बाल बराबर फ़र्क़ कम ज़्यादा तजवीज़ नहीं किया है।

इस के बाद हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने शैख़ मुही उद्दीन इब्न अलारबी और उन के

मुतबईन के मक्शफ़ात व तहक़ीक़ात के ऐतबार से एतराज़ात क़ायम किए जो काबिल दीद हैं मगर चों कि निहायत दकीक़ हैं इस लिए में ने छोड़ दिए, मकसूद वाज़िह है, उन्ही इक़तिबासात से एक सवाल और इस का जवाब आप भी गौर से पढ़ें और अपने नबी कोनेन ﷺ के कमालात को सन कर जिला बख़्शें।

सवाल यह है कि सूफ़िया कराम ने तमाम अफराद आलम को असमाए इलाही के मुज़ाहिर और जलवा गाहें माना है और हक़ायक़ अश्या उन्ही असमा को पाया है और अश्या को उन का ज़लाल जाना है। इस से मालूम हुआ कि तमाम आलम असमाए इलाही का ज़ुहूर है जल व अला और हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने बाज़ असमा के ज़ुहूर को हुज़ूर सर्वर कोनेन ﷺ की ख़लक़त के साथ ख़ास करार दिया है यानी ज़ुहूर असम इलाही सिर्फ़ आप की पैदाइश के साथ ख़ास है किसी और में असम इलाही का ज़ुहूर नहीं।

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं सूफ़िया के नज़दीक अश्या के हक़ायक़ आयान साबिता हैं जो कि असमाए इलाही की इल्मी सूरतों हैं ख़ुद असमाए इलाही नहीं, इस आलम को उन्ही इल्मी सूरतों का ज़ुहूर कहा है अगरचे मजाज़ी तौर पर असमा का ज़ुहूर भी कहीं बल्कि क्षे की इल्मी सूरत भी उन के नज़दीक इस क्षे का उएन है न कि इस क्षे की शबह व मिसाल और जो में ने इस सर्वर अलैहि व अला आला अस्सलात व अस्सलाम की ख़लक़त में कहा है वह नफ़्स असम इलाही का ज़ुहूर है जल सुल्ताना, न कि इस असम इलाही की इल्मी सूरत का ज़ुहूर, और नफ़्स क्षे और इस की इल्मी सूरत के दरमियान बहुत फ़र्क़ है , आग का तसोर करें तो इस की सूरत इलमीया में वह अशराक़ (चमक) व इज़ात कहां हैजो कि आग में थी इस की सूरत इलमीया शबह व मिसाल से ज़्यादा नहीं है, मंतक़ी लोग उसे पसंद करें या न करें बल्कि उएन आतिश कहीं लेकिन हमारा कश्फ़ सरीह ऐनीयत को झुटलाता है और आग की इल्मी सूरत स्वाए शबह व मिसाल के नहीं जो आग खारिज में मौजूद है।’’

फिर आप असमाए इलाही की इल्मी सूरतों और बईना असमाए इलाही जल शाना के ज़ुहूर के दरमियान यों फ़र्क़ बयान फ़रमाते हैं कि असमा की इल्मी सूर के ज़ुहूर का इमकान और उन का वजूद इमकान आलम के क़बील से है और वजूद आलम के क़बील से कि ख़ुदावंदी कारीगरी से मर्तबा वहम में इस ने सबात व तक़र्र पैदा कर लिया है और ख़लक़त मुहम्मदी अलैहि व अला आला अस्सलात व अस्सलाम में जो नफ़्स असम इलाही का ज़ुहूर है इस का इमकान, इमकान सिफ़ात इज़ाफ़ी के क़बील से है और उन का वजूद भी उन सिफ़ात के वजूद की तरह मर्तबा नफ़्स अम्र में साबित व मुक़रर है और हुज़ूर सर्वर कोनेन ﷺ के गैर कोई भी नज़र नहीं आता है कि नफ़्स असम इलाही का ज़ुहूर हो मगर कुरआन मजीद कि वह भी नफ़्स असम इलाही का ज़ुहूर है जल सुल्ताना जैसा कि इसी से उपर ज़िक्र पा चुका है ज़्यादा से ज़्यादा यह कि ज़ुहूर क़ुरआनी का मंशा सिफ़ात हक़ीकया से है और ज़ुहूर मुहम्मदी का मंशा सिफ़ात इज़ाफिया से (इस लिए) ला मुहाला कुरआन को क़दीम और गैर मख़लूक़ कहा है और इस को हादस व मख़लूक़।

नाम मुहम्मद व अहमद:

मक्तूब:96, ज:3/ में फ़रमाते हैं: हमारे पैगम्बर अलैहि व अला आला अस्सलात व अस्सलाम दो नामों से मौसूम हैं और आप के दोनों मुबारक नाम कुरआन मजीदमें मस्तूर हैं, फ़रमाया:

मुहम्मदٌ र्कसोۡल अल्ला (अलिफ़ता: 48/29)

और नीज़ बशारत रूह अल्लाह की हिकायत में फ़रमाया है:

असमाۤ अहमद (अलसफ़: 61/6)

उन दोनों मुबारक नामों में से हर एक की विलायत अलाहदा है, विलायत मुहम्मदी ﷺ हर चंदाप अलैहि अस्सलात व अस्सलाम के मक़ाम महबूबीयत से नाशी है, लेकिन इस जगह खालिस महबूबीयत मौजूद नहीं है (बल्कि निशा मुहब्बत का इख़तिलात भी रखती है अगरचे वह इख़तिलात बालासालित इस के लिए साबित नहीं लेकिन खालिस महबूबीयत के मक़ाम से

माने है और विलायत अहमदी खालिस महबूबीयत के मक़ाम से नाशी है कि मुहबीत की आमेज़िश नहीं रखती है और यह विलायत पहली विलायत से पेश क़दम है और एक अम्र मतलूब से नज़दीक तर है और मुहब् को मर्ग़ूब तर है क्यों कि महबूब हर चंद महबूबीयत में मुकम्मल तर होगा इस्तिग़ना व बे नियाज़ी इस की कामिल तर होगी और मुहब् की नज़र में ज़ेबातर आयेगी और रानात्र (ज़ेबातर) दिखाई देगी और मुहब् को अपनी तरफ़ ज़्यादा मंजज़िब करेगी और शेफ़्ता और ज़्यादा सरगशता करेगी؎

न तन्हा आफतम ज़ेबाई ओस्तबुलाए मिन ज़ नापरवाही ओस्त

(इस शेअर में) बुला से मुराद इफ़रात इश्क है जो कि आशिक का मतलूब है।

सुबहान अल्लाह, अहमद अजब बुलंद नाम है, कि कलिमा मुक़द्दसा ‘‘अहद’’ से मुरक्कब है और हलक़ा हर्फ़ मेम से कि इसरार इलाही के गुवामज़ (राज़ों) से है आलम बे चवन से ताल्लुक है और गुंजाइश नहीं रखता है आलम चवन में इस पिनहां राज़ की ताबीर हलक़ा मेम के गैर से की जा सके, अगर गुंजाइश रखता तो हक़ तआला इस से ताबीर फरमाता। अहद, अहद है कि ला शरीक ला है और हलक़ा मेम तौक़ उबूदीयत है कि बंदा को मौला से मुमताज़ किया है पस बंदा वही हलक़ा मेम है और लफ़्ज़ अहद इस की ताज़ीम के वास्ते आया है और इस का इज़हार इख़तिसास किया है अलैहि व अला आला अस्सलात व अलसलाम؎

चो नाम एं अस्त नाम आवर चह बाशद

हजार साल के बाद कि जिसे उमूर अजाम की तग़ैर में तासीर है इसी ने मामले को इस मक़ाम तक खींचा और विलायत मुहम्मदी विलायत अहमदी तक अंजाम पज़ीर हुई और दो तौक़ उबूदीयत से कारोबार एक तौक़ उबूदीयत तक पहुँचा और पहले वाले तौक़ (म) की जगह अल्फ़ कि इस के रब से इशारा है, मुतमकन हो गया यहाँ तक कि मुहम्मद अहमद हो गया अलैहि व अला आला अस्सलात व अस्सलाम।

................

।1 जब नाम का यह आलम है तो नाम वाले का किया आलम होगा।

इस का बयान यह है कि दो तौक़ उबूदीयत दो हलक़ा मेम से इबारत है कि असम मुबारक मुहम्मद में इंद्राज पाया है हो सकता है कि वह दो तौक़ आप के दो तईन की जानिब इशारा हूँ उन तीनों से एक तईन जसदी बश्री है और दोम तईन रूही मुल्की है और तईन जसदी में हर चंदारौज़ व हाल की वजह से फ़ुतूर हो गया हो और तईन रूही ने कुव्वत पकड़ी हो लेकिन इस तईन का असर बाक़ी रहा था हजार साल चाहिए थे ताकि वह असर भी ज़ाइल हो और इस तईन का कोई निशान न रहे और जब हजार साल आखिर आये और इस तईन (जसदी) से अक्सर नहीं रहा और एक तौक़ उबूदीयत उन दो तौकों से ख़त्म हो गया और इस को ज़वाल व फना आरिज़ हुई और अल्फ़ अलूहियत कि इस को बका बिल्लाह के रंग में कहा जा सकता है इस में बैठ गया नाचार मुहम्मद अहमद हो गया और विलायत मुहम्मदी विलायत अहमदी तक मुंतक़िल ह गई पस नाम हुआ दो तईन का और अहमद किनाया हुआ फ़क़त एक तईन का तो यह नाम हज़रत इतलाक़ से क़रीब तर हुआ और आलम से दौर तर।

सवाल: फना व बका कि मशाइख़ ने करार दी है और विलायत को इस से वाबस्ता किया है किस मानी कर है? और यह फना व बका कि तईन मुहम्मदी में कहा है किस मानी कर है?

जवाब: फना व बका कि विलायत जिस से वाबस्ता है वह फना व बका शहवदी है, अगर फना व ज़वाल है तो बाइतबार नज़र है और अगर बका व सबात है तो भी बाइतबार नज़र है। इस जगह सिफ़ात बश्री का इस्तितार (छपना) है ज़वाल नहीं और इस तईन (मुहम्मदी) की फना ऐसी नहीं है, बल्कि इस जगह सिफ़ात बश्री का ज़वाल वजूदी मुतहक़्क़ है और (तईन) जसदी से इन्ख़िला (खाली होना) रूही तक साबित है और जानिब बका में अ स जगह भी बंदा हर चंद हक़ नहीं हो जाता है और बंदगी से बाहर नहीं होता है लेकिन हक़ से नज़दीक तर जा पड़ता है और मईयत ज़्यादा पैदा करता है और ख़ुद से दौर तर हो कर बश्री अहकाम इस सेज़्यादा मस्लूब हो जाते हैं।

जानना चाहिए कि यह उरूज मुहम्मदी कि सिफ़ात बश्री के इंतफा सेवाबस्ता है हर चंद आप

अलैहि व अला आला अस्सलात व अस्सलाम के कारोबार को बालातर ले गया और ऊंची चोटी तक पहुँचा दिया और गैर व ग़ैरयत की कशमकश से छुटकारा दे दयालेकिन मामला आप के इमितियों पर तंग तर हो गया और आप का नूर हिदायत मुनासिब बशर के वास्ता से था कमतर हो गया और इस तवज्जो ने कि उन वापस मानदगान के हाल से थी किल्लत पैदा की और पूरे तौर पर क़िबला हक़ीक़ी की तरफ़ मुतवज्जा हो गई। अफसोस इस रिआया पर कि बादशाह उन के हाल की तरफ़ मुतवज्जा न हो और कली तौर पर अपने महबूब की तरफ़ मुतवज्जा हो जाए इसी वजह से हजार साल बाद कुफ्र व बिद्दत की तारीकियां ग़ालिब हो गई हैं और इस्लाम व संयत के नूर ने कमी पैदा कर ली।’’

यहाँ से आप पूरे तौर पर तजदीद अल्फ़ सानी का राज़ समझ सकते हैं और जान सकते हैं कि ऐसे आलम में किया ऐसे मुजद्दिद की ज़रूरत न थी जो मुहम्मद रसूल अल्ला ﷺ का सच्चा नायब हो और आप के कमालात ज़ाहिरी व बातिनी से कामिल हिस्सा रखता हो और फिर से इस ख़िला को पर कर के नूर सुन्नत से दुनिया को रोशन कर दे और अपने महबूब ﷺ के जलवों सेलोगों को क़रीब कर दे और इरफान की राहें कुशादा कर दे। हक़ीक़त यह है कि इस मक़ाम से हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के सारे कमाला के खद व ख़ाल का राज़ समझा जा सकता है। आप की पैदाइश बक़ीया खमीर अतहर से हुई, इस का भेद भी यहीं समझ में आता है रूहानी तौर पर जो उरूज हुआ, हर मंज़िल व मरहले से वाक़फ़ीयत हुई,हर मक़ाम से नसीब हासिल किया, जबरदस्त कुव्वत व हिम्मत सेपूरे आलम में नूर सुन्नत फैला दिया, तेजी से कमालात हासिल होने लगे। हर मुल्क, हर सूबे, हर शहर व बस्ती में आप का फ़ैज़ पहुँचा। यह सब इसी नियाबत व विरासत का असर था हुज़ूर सर्वर कोनेन ﷺ के कमालात आप के सोहबत याफतों पर ज़ाहिर हुए और फिर रफ़्ता रफ़्ता कम होते गए आप के अज़ीम मक़ाम व मन्सब से लाइलमी बढ़ने लगी, हजार साल तक पहुँचते पहुँचते नुबुव्वत से इंकार व तौहीन तक बात पहुँचने लगी, बिलआख़िर वह नायब व मुजद्दिद व मनोर अल्फ़ सानी तशरीफ़ लाया जिस ने अपने नबी के वह कमालात बातिन और

सब के मुक़ामात व मनाज़िल लोगों पर अयाँ कर दिए और आप ﷺ की अज़मत व रफात और दर्जात की बुलंदियों से दुनिया को आशना कर दिया।؏

उबर रहमत उन के मर्क़द पा गहर बारी करे

बात कहां से कहां पहुँच गई, हुज़ूर सर्वर आलिम ﷺ के मुबारक दो नामों के इसरार व रमूज़ और उन की विलायत बयान हो रही थी, मक्तूब/92 आप ने पढ़ा, अब मक्तूब/94 का कुछ हिस्सा भी पढ़ लीजिए जो गोया पहली तकरीर की एक गुना तफ़सील है, हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि हज़रत हक़ सुब्हानहू तआला फ़ी हद ज़ाता जमील है और इस के लिए हसन व जमाल ज़ाती साबित है, वह हसन व जमाल नहीं जो हमारे इदराक में आये और हम पर मक्षुफ़ हो और हमारी अक्ल व ख़याल में आये इस के बावजूद इस हज़रत में एक ऐसा मर्तबा है अक़्दस कि यह हसन वजमाल भी अपनी ग़ायत अज़मत व किबरियाई के बावजूद इस मर्तबा को नहीं पहुँच सकता है और हसन व जमाल से मुत्तसिफ़ नहीं किया जा सकता है तईन अव्वल कि तईन वजूदी है इस कमाल व जमाल ज़ाती का तईन है और इस का ज़ुल अव्वल है और इस मर्तबा अक़्दस से कि कमाल व जमाल की भी इस जगह गुंजाइश नहीं है इस तईन (वजूदी) में कुछ साबित नहीं है कि वह (मर्तबा अक़्दस) ग़ायत अज़मत व किबरियाई की वजह से किसी तईन से मुतय्यन नहीं होता है؏

दर कदाम आईना दर आयेद अव

इस के बावजूद इस मर्तबा अक़्दस से एक राज़ और कैफियत इस तईन अव्वल के मरकज़ दायरा में वदीअत रखा है और इस बेनिशान से एक निशान छिपाया है चनां चह तईन अव्वल विलायत खलीली का मंशा है और वह राज़ और वह कैफियत कि इस तईन के मरकज़ में रखी है विलायत मुहम्मदी का मंशा हेहुला साहिभा अस्सलात व अस्सलाम

और वह हसन व जमाल ज़ाती कि तईन अव्वल इस का ज़ुल है सबाहत से मुशाबहत रखता है

कि आलम मिजाज़ में हसन रुखसार व जमाल ख़ाल के क़बील से है और वह राज़ व कैफियत कि मरकज़ में अमानत रखी है मुल्लाहत से मुनासबत रखती है जो कि कद के हसन और रुखसार के गोरेपन के अलावा है और हसन चश्म व जमाल ख़ाल के विरा एक अम्र ज़ौक़ी है जब तक ज़ौक़ नहीं दें पा नहीं पाएं गे (हासिल नहीं कलर पाएं गे), एक शाएअर कहता है؎

आं दारद आं निगार कि आँसुत हर चह हस्त

आंरा तलब कनंद हरीफ़ां कि आं कजासित

इस बयान से उन दोनों विलायतों के फ़र्क़ का पता लगा है, हर चंद दोनों क़ुर्ब हज़रत ज़ात तआला व तक़दस से पैदा हुई हैं लेकिन एक का मर्जा कमालियत ज़ात है और दूसरे का सिर्फ़ ज़ात तआला और जब मुल्लाहत सबाहत के उपर है तो मुल्लाहत तक वसूल मर्तबा सबाहत को तै करने के बाद ही मुतस्व्वर हो सकता है और जब तक जमी मुक़ामात विलायत इब्राहीमी तक वसूल मयस्सर नहीं होगा इस विलायत की हक़ीक़त तक कि विलायत मुहम्मदी की ऊंची चोटी है मयस्सर नहीं आएगाला साहिभा अस्सलात व अस्सलाम

हो सकता है इसी वजह से ख़ातिम अलर्सल अलैहि व अलैहिम अस्सलवात व इलतसलीमात हज़रत इब्राहिम की मिलित की मुताबेत का मामूर हुए हूँ अलेहमा अस्सलात व अस्सलाम ताकि इस मुताबेत के वसीला से उन की विलायत की हक़ीक़त तक पहुँचीं और वहाँ से अपनी विलायत की हक़ीक़त कि जिस की ताबीर मुल्लाहत की जगह है, से मुतहक़्क़ हूँ और चों कि हमारे पैगम्बर को दायरा विलायत ख़लत के मरकज़ से मुनासबत ज़ाती है कि हज़रत इजमाल ज़ात से क़रीब तर है और इस दायरा के मुहीत से मुनासबत कमतर है कि रुख कमालात ज़ात तआला की तफ़सील की तरफ़ है पस जब तक इस दायरा के मुहीत के कमालात से भी मुतहक़्क़ नहीं हूँ गे विलायत ख़लत तमाम नहीं होगी और इसी वजह से मासूरा दुरूद में कमा सुलीत अला इब्राहिम आया है ताकि विलायत ख़लत के कमालात पूरे तौर पर आप को हासिल हूँ जिस तरह से विलायत वाले (यानी हज़रत इब्राहिम) को मयस्सर होते हैं , अला नबीना व अलैहि अस्सलात

व अस्सलाम।

फिर चंद स्तर बाद एक राज़ बयान करते हैं जो सिर्फ़ आप पर ही मुनकशिफ़ हुआ है वह यह कि दायरा विलायत ख़लत के मरकज़ का नुकता कि इस के बाक़ी नुक्तों से मुहब्बत के साथ मुमताज़ हुआ है अगरचे बसीत है लेकिन चों कि ऐतबार मुहबीत और ऐतबार महबूबीयत को मुतज़िमन है सूरत दायरा पैदा करता है और इस मरकज़ से दायरा पैदा करता कि इस का मुहीत ऐतबार मुहबीत है और इस का मरकज़ ऐतबार महबूबीयत और विलायत मूसवी अला नबीना व अलैहि अस्सलात व अस्सलाम का मंशा ऐतबार मुहबीत है कि इस का मुहीत दायरा है और विलायत मुहम्मदी का मंशा ऐतबार महबूबीयत है कि इस दायरा का मरकज़ है हक़ीक़त मुहम्मदी का हुसूल इस जगह तसोर करना चाहिए और हजार साल बाद मरकज़ दायरा सानी के इस नुकता ने कि हक़ीक़त मुहम्मदी इस से वाबस्ता है, भी वसात पैदा की और दो ऐतबार इस में हुवेदा हुए और सूरत दायरा में ज़ाहिर हुआ कि इस का मरकज़ खालिस महबूबीयत है और इस का मुहीत महबूबीयत मुमतजिज ब मुहबीत है और मंशा विलायत अहमदी इस दायरा का मरकज़ है और अहमद दूसरा नाम इस सर्वर अलैहि अस्सलात व अस्सलाम का कि अहले समावयित में इस नाम से मारूफ़ हैं जैसा कि कहा है इस जगह से हो सकता है कि हज़रत ईसा अला नबीना व अलैहि अस्सलात व अस्सलाम ने कि अहले समावात से हुए हैं इस सर्वर की आमद की बशारत नाम अहमद के मानन्द है और असम मुबारक को ज़ात अहद जल शाना से बहुत तक़र्ब है और इस असम दीगर से एक हिस्सा हज़रत ज़ात तआला से नज़दीक तर है। चनां चह बयान किया गया और यह असम (मुबारक अहमद) असम मुबारक अहद से एक हलक़ा मेम जुदा हुआ है के वह मुबदा मुहब्बत है जो ज़ुहूर व इज़हार का बाइस हुआ है नीज़ मेम कि अहमद में इंद्राज होती है, हुरूफ़ मुक़तआत क़ुरआनी से है जो (हुरूफ़) सूरतों के शुरू में नाज़िल होते हैं और इसरार ग़ामज़ा से है और इस लिए हर्फ़ मुबारक मेम को इस सर्वर से ख़ास ख़ुसूसीयत है जो आप की महबूबीयत की बाइस हुई है और उन को सब पर फ़ौक़ियत दी है।