अध्याय 43 में से 57पृष्ठ 594–615
तजदीद तसव्वुफ़
यानी खबरदार खबरदार! फिर खबरदार खबरदार! फिर बच्चो पर हेज़ करू! अकाबिरीन दीन के तान और कबराए दीन की मुज़म्मत से जिन्हों ने अपनी ताकत खर्च की कलिमा इस्लाम को बुलंद करने में और सीदालानाम की मदद में और जिन्हों ने शब् विरोज़ और ख़लवत विजलोत में दीन की ताईद के लिए अपने माल खर्च किए और रसूल की मुहब्बत में अपने कुनबे कबीले और अपनी औलादें और अपनी बीवियां और अपने वतन और अपने घर अपने चश्मे,अपनी खेतियां अपने दरख्त और अपनी नहरें छोड़ें।
और रसूल अकर्म ﷺ की ज़ात को अपनी जानों पर तरजीह दी और आप ﷺ की मुहब्बत इख्तियार की,अपनी मुहब्बत और अपने मालों और अपनी औलादों की मुहब्बत पर,यह वही लोग हैं जिन्हों ने शरफ़ सोहबत पाया और आप ﷺ की सोहबत में नुबुव्वत की बरकतों के साथ कामयाब हुए और वही का मिशा हिदा किया और हुज़ूर मुल्क से मुशर्रफ़ हुए और ख़वारिक़ आदात विमेजज़ात देखे,यहाँ तक कि उन का ग़ैब शहादत और उन का इल्म मुशाहिदा बिन गया,जो उन्हें यकीन दिया गया वह उन के बाद किसी को नहीं दिया गया,यहाँ तक कि उन के गैर का अहद के बराबर सोना खर्च करना उन के जो के एक मद खर्च के बराबर नहीं पहुँच सकता है ऊरणा उन के आधे के बराबर।
यही वह लोग हैं जिन की तारीफ़ अल्लाह तआला ने कुरआन मजीद में फ़रमाई,अल्लाह तआला उन से राजी हुआ और वह अल्लाह तआला से राजी हुए। (अलबेसिना)
यह उन की सिफ़त त्वरियत में है और उन की सिफ़त इंजील में जैसे एक खेती इस ने अपना पट्ट्हा निकाला फिर उसे ताकत दी फिर दबेज़ हुई फिर अपनी साक़ पर सीधी खड़ी हुई किसानों को बहली लगती है ताकि उन से काफ़िरों के दिल जिलें । अल्लाह ने वादा किया उन से जो उन में ईमान और अच्छे कामों वाले हैं बख़शिश और बड़े सवाब का । (अलिफ़ता)
तजदीद तसव्वुफ़
कुरआन पाक और सुन्नत नबवी में हमें जिस तज़किया नफ़्स और तसफ़ीया क़ल्ब या एहसान का ज़िक्र मिलता है और जिस की तहसील का हमें हुक्म दिया गया है वह रफ़्ता रफ़्ता तसव्वुफ़ की सूरत में एक मुदव्वन फन कैसे बिन गया? सर दस्त हमें इस से बहस नहीं,हम ने उसे मुख़्तसरा एक इलियाहदा और मुस्तक़िल तहरीर में बयान करदिया है,इस वक़्त हम सिर्फ़ यह दिखाना चाहते हैं कि यह पहले किया था और बाद में किया हो गया और इस में ख्वाब व ख़याल की आमेज़शों से किया किया तस्वरात शामिल हो गए।
यह मुक़द्दस चीज़ दर असल इस निस्बत व ताल्लुक की हिफाज़त व तक़वियत के लिए थी जो एक मोमिन को अल्लाह तआला के साथ होता है,हुब्ब दुनिया व गैरह की वजह से इंसान जिन बुराइयों का मुर्तक़िब होता है और नफ़्स व शैतान की जिन शरारतों और धोकों में आकर बिगड़ जाता है हुज़ूर ﷺ ने इस के लिए तज़किया व तसफ़ीया का हुक्म दिया और सुन्नत की शक्ल में वह शाहराह भी अता फ़रमादी जिस पर मुकम्मल अमल करने के बाद इंसान ऐसी साफ सुथरी ज़िन्दगी बना सकता है जो आख़िरत की फ़लाह व कामयाबी का सबब हो।
जब तक सर्वर कायनात ﷺ सेसचा इश्क रहा, इस वक़्त तक आप के अक़्वाल व अफ़आल से शग़फ़ और उन पर अमल का जज्बा बुर करार रहा,आप ﷺ की निसबतें जलवा गर रहीं,फिर रफ़्ता रफ़्ता जमाने के गुजरने के साथ साथ उन कैफ़ीयतों में जिस क़द्र कमी आती गई औरइसी क़द्र अमल में सस्ती व काहिली जगह पाती रही मगर सुन्नत पर अमल क़ल्ब व जिगर की जिस गहराई के साथ पहले था वह रफ़्ता रफ़्ता उठ गया,मगर आप के नाइबेन व वारसीन से जहां तक हो सिक्का इस की हिफाज़त करते रहे अगर चह मरूर ज़माना के साथ कम होते रहे।
उन मुक़द्दस बुजुर्गों ने अल्लाह तआला के साथ बंदों के ताल्लुक की बका और दुनिया की आलाईशों से हिफाज़त ,क़ल्ब की गफलत और नफ़्स व शैतान की शरारतों से हिफाज़त के लिए अनिवार व तजल्लियात और क़ुर्ब व इरफान की तहसील के लिए नफ़्स की सख्ती से मुखालफत शुरू की और इस सिलसिले में दुनिया और अहले दुनिया से अनुक़्ता और बे ताल्लुक़ी और नफ़्स को इस की शरारतों से पाक करने के लिए भूक व प्यास ,चिल्लों और ख़लवतों की वह मशक्कतें झिल्लें कि बयान से बाहर है,अपने रब को राजी करने के लिए दिन भर रोज़े से रहते और रात भर नमाज़ें पढ़ते,दुनिया वालों से कम मिलते जलते,अपने औकात की हिफाज़त करते, सहाबा कराम के बाद इस सिलसिले में मुतक़द्दिमीन और मुतवस्सितीन औलीए कराम ने जो कुछ किया उसे अगर आप पढ़ें गे तो मालूम हो जाए गा कि जो रियाज़त विमुजाहिदा और मेहनत विमशक्कत वह कर गए इस से ज़्यादा का तसोर नहीं किया जा सकता है।
उन बुजुर्गों ने उन रियाज़ात व मुजाहिदात के साथ साथ अपने मुहसिन आका ﷺ की सीरत व सुन्नत पर अमल और आप के अख़लाक़ व आदात से आरास्तगी का पूरा पूरा ख़याल किया और खिलाफ़ शरा बातों से सख्त मुहतरज़ रहे,यह बुज़ुर्गान दीन अपने अमल में लायक तक़लीद और अहवाल में सादिक थे।
उन के बाद जब इस्लामी फ़ुतूहात ने इस्लाम को अजम की वसातों में दाखिल किया तो हिंदोस्तान जैसे मुल्कों में आम तौर से सूफ़िया का वजूद हुआ ,चूंकि यहाँ जोगी और सन्यासी बहुत मशहूर थे,वह बड़ी बड़ी मेहनतीं करते थे,उन के लिबास मख़सूस थे,उन का रहन सहन ज़्यादा तर जंगलों में होता था, वह लंबे लंबे हब्स दम और दीगर आसनों के ज़रिया उन मक्शफ़ात को कुव्वत देते थे जो रियाज़ात के ताल्लुक से होते थे,बहुत से सूफ़ियों ने उन जोगियों से भी रवाबित पैदा किए और उन से भी बहुत कुछ ले कर तसव्वुफ़ में शामिल कर दिया जैसा कि आप अकबर के दौर के हालात के सिलसिले में पढ़ चुके हैं,उन के अलावा रियाज़ात व मुजाहिदात की और भी नयी नयी शक्लें सामने आएं मसला ग़ारों में रहना,कुँवें में उलटा लटक जाना और न मालूम किया किया दाखिल हुआ, जोगियों के इख़तिलात से नरी गैर शरई रस्में शामिल हो गईं और खिलाफ़ शरा उमूर का इर्तिकाब किया जाने लगा।
उन रियाज़तों और मुजाहिदा की कसरत से अवाम वख़वास में कइ किस्म की बद अनवानियां पैदा होने लगीं एक तो यह कि आम निजात व फ़लाह तो कुरआन व सुन्नत पर अमल से मिल सकती है मगर ख़ास फ़लाह और क़ुर्ब व इरफान की ख़ुसूसी दौलतीं बग़ैर उन कठिन मुजाहिदात के नहीं मिल सकती हैं लिहाज़ा आम इंसान क़ुर्ब व विलायत के हुसूल को सिर्फ़ इस्लामी क़वानीन पर अमल कर लेने से बालातर समझने लगा।
दूसरा नुकसान यह भी हुआ कि शरई अहकाम व क़वानीन चूंकि हर आम व ख़ास के लिए हैं इस में ग़नी व फ़क़ीर और सुलतान व रिआया की कोई तख़सीस नहीं है इस लिए उन पर अमल कोई वजह इमतियाज़ नहीं रहा,इमतियाज़ी ख़ुसूसीयत पैदा करने के लिए उन रियाज़ात व मुजाहिदात को अपनाना ज़रूरी था।
अवाम की नज़र में मख़सूस इज्जत व एहतिराम का इस्तिहक़ाक़ नज़र व नयाज़ और रुजू आम जब ही होता जबकि एक आम शरई ज़िन्दगी में वज़ा क़ता और रियाज़ात व मुजाहिदात की यह जलवा आराईयां न
होतीं,जिन की नज़रें सिर्फ़ ज़ाहिर तक ही महदूद थीं उन की नज़र में उन्हें मख़सूस वज़ा क़ता के लोगों का एहतिराम था ख़्वाह वह बबातिन कितने ही बुरे क्यों न होते, ज़माना की रफ़्तार के साथ उन के साथ गर्वीदगी और लगाव इस क़द्र बढ़ता गया कि उन की ताज़ीम वितकरीम में बसा औकात इस हद तक ग़ुलू हो गया कि लोग उन्हें सजदे करने लगे,उन का गुसाला पीने लगे और नफ़्स का शिकार इस लिबास में जब बद अमली के साथ आने लगे तो नमाज़ें तर्क करने लगे,मादी मनफ़ातें हासिल करने लगे तब भी लोग उन्हें अच्छी निगाह ही से देखते रहे और उन के अंदर फजल व कमाल तसलीम करते रहे और उन को अपना मुक़तदा व रहनुमा समझ कर अमल से बे परवा होते चले गए,यहाँ पर यह भी ध्यान रहे कि जो सूफ़िया बा अमल थे बाद में सुन्नत पर अमल में उन का इस क़द्र एहतिमाम नहीं रहा जो हा ना चाहिए था और दक़ायक़ से बे खबर होते चले गए।
तीसरा जबरदस्त नुकसान यह हुआ कि रियाज़ात व मुजाहिदात के नतीजे में जो बातिनी आंखें खिलने लगीं और ग़ैबी उमूर सामने आने लगे उन की वजह से बहुत से सूफ़िया गलत फ़हमियों का शिकार हो गए एक तो यह कि एक कश्फ़ वह होता है जिस का ताल्लुक क़ल्ब से है दोम वह कि जिस का ताल्लुक नफ़्स से होता है,अव्वल मुफीद कार आमद और महबूब व पसंदीदा है और हक़ की तरफ़ ले जाता है।
यह कश्फ़ जिन बुजुर्गों कोहासिल हुआ इस में कमजोर इस्तिदाद और कम इल्म सूफ़िया राह हक़ से हट गए क्योंकि अस्नए राह में तजल्लियात व अनिवार और वारदात व कैफियात के मुख़तलिफ़ रूप होते हैं,ऐसे ऐसे उमूर भी सामने आते हैं जो शरीअत के खिलाफ़ हो ते हैं क़दम क़दम पर ज़ुल और असल के इशतिबाहात वाक़्य होते हैं,कुछ मक़ाम ऐसे होते हैं जहां सालिक बहुत कुछ भटक सकता है,इस लिएकशफ़ी ख़ताओं के मुख़तलिफ़ असबाब हो ते हैं।
हर सालिक की नज़र इतनी दकीक़ नहीं हो ती है कि वह ज़ुल और असल का फ़र्क़ कर सके और न
ही हर सालिक नुकता आखिर पर पहुँचता हैजहाँ उलूम तरीक़त मुकम्मल तौर से उलूम शरीअत के मुताबिक हो ते हैं लिहाज़ा ऐसे हालात में उमूमन कम इल्म सूफ़िया और कम ज़र्फ़ सालकेन भटक गए हैं और बजाए इस के कि शरीअत को मेज़ान बनाते और उन के मक्शफ़ात अगर इस पर खरे उतरते तो कबूल करते वर्ना रद्द कर देते, उन्हों नेएसा न करके अपने मक्शफ़ात ही को मेज़ान बना लिया और जो ज़ाहिर हुआ इस को हक़ समझ लिया,यही लोग थे जिन्हों ने रफ़्ता रफ़्ता शरीअत को अवाम के साथ मख़सूस कर दिया और ख़ुद को हर तकलीफ़ शरई से आजाद कर लिया,उन्हें हर चीज़ में ख़ुदा की तजलियाँ नज़र आने लगीं ख़ास कर मुज़ाहिर जमेला में,लिहाज़ा हसीन ऊरतों और लड़कों को देखने की राहें भी खिलने लगीं और रफ़्ता रफ़्ता इख़तिलात से जो होता है वही सब कुछ हो ने लगा,यह मक्शफ़ात अपने साथ इस क़द्र आफतीं लाये कि उन की खराबियां बयान नहीं हो सकती हैं।
अब रहा दूसरी किस्म का कश्फ़ जिस का ताल्लुक नफ़्स से है यह हमेशा ज़लालत व गुमरही की तरफ़ ले जाता है,ख़ुदा से दौर करता है,फ़लाह से महरूम करता है इस में आम तौर से वही चीजें सामने आती हैं जिस से इंसान बिगड़ता चला जाता है आम तौर पर कसरत जू (भूक)और पैहम रोज़ों से पैदा होता है,ऐसे अस्हाब किशोफ़ कम होते हैं जो उन दोनों कशफ़ों में इमतियाज़ कर लें और हर एक को पहचान लें ,काफ़िरों को यही कश्फ़ हो ता है और मोमिनों को भी होता है मगर जो साहिब इस्तिक़ामत होता है और दीन पर अमल ग़ालिब होता है और तौफ़ीक़ इलाही शामिल होती है तो वह बच जाता है।
उन किशोफ़ से एक खराबी यह भी पैदा हुई कि जिस कश्फ़ का ताल्लुक कायनात से होता है कि कल किया होगा,फलां आदमी के दिल में किया है,सफर में अंजाम किया होगा,फलां इंसान ख़लवत में किया करके आया है,किया खाकर आया है वगैरह वगैरह यह कश्फ़ बड़ा ही दिलचस्प होता है कम इल्म और कम हिम्मत सूफ़िया बा ज़ाबता अहवाल मख़लूकात जानने के लिए
मुराक़बात करते हैं,लोगों को ग़ैबी खबरें देते हैं जिस से लोगों का मेलान बढ़ता है ऐसे लोगों को आम तौर पर देखा गया है कि बहुत जिल्द इज्जत व इक़तिदार और माल व जाह के ख्वाहिश मंद होजाते हैं और अवाम की तसख़ीर का जज्बा और इस की लग्न पैदा होजाति है फिर नतीजा यह निकलता है कि नफ़्स की जिन खराबियों को दौर करने के लिए यह मुजाहिदात होते हैं बालाख़िख़र ऐसे लोग कश्फ़ के ज़रिया उन्ही खराबियों का शिकार हो जाते हैं और फिर वह खराबियां नफ़्स में रच बस जाती हैं और इस फेअल को बंज़र एहसान देखने लगते हैं।
इस से दूसरा नुकसान ख़ुद उन का और उन से वाबस्ता लोगों का यह होता है कि बजाए तवज्जो अला अल्लाह के उन की पूरी तवज्जो अली अलख़लक होजाति है और बालाआ ख़र क़ुर्ब वारफान की उन दौलतों से महरूम होजाते हैं जिन से तवज्जो अली अल्लाह के ज़रिया मालामाल हो सकते थे,उन नाक़िस लोगों से जो मुरीद होते जाते वह भी महरूम हो जाते थे,दुनिया में चूंकि ऐसे शोबदों की बड़ी चाहत रही है इस लिए अवाम का रुजू भी ऐसे ही लोगों की तरफ़ ज़्यादा हुआ ,उन फरेब ख़ुर्दों में जो गैर देनदार थे उन्हों ने कौम व मिलित को जबरदस्त नुकसान पहुँचाया।
इस कश्फ़ कोनी के बिलमुक़ाबिल कश्फ़ इलाही है जिस का ताल्लुक अल्लाह तआला की ज़ात व सिफ़ात व गैरह और दीगर उमूर हसना से होता है और जिस के ज़रिया बुजुर्गों पर मआरिफ़ व हक़ायक़ मुनकशिफ़ हुए और यही वह कश्फ़ है जो सरासर महमूद और आख़िरत में काम आने वाला,ख़ुदा का क़ुर्ब बख़्शने वाला है,इस की अहमियत उन नाक़िसों और अवाम के दिल में बिलकुल नहीं रहती है जबकि हक़ीक़तन अज़मत वरीअत का बाइस यही होता है।
इसी कश्फ़ कोनी के दिल दादों ने अवाम को इतना भटकाया कि जिन शख्सियतों को अज़मत वितक़दस की निगाहों से देखना चाहिए था उन्हें तो कोई अहमियत नहीं दी गई और जिन की कोई ख़ास हैसियत नहीं थी उन्हें सब कुछ तसलीम करलिया गया।
कश्फ़ कोनी के शिकार लोगों का एक नुकसान यह भी हुआ कि चूंकि उन्हों ने फ़िक्र का महवर कायनात के अहवाल को बनाया इस लिए वह कश्फ़ इलाही के दक़ायक़ से महरूम रह गए और तरह तरह की गलतियां कर बैठे।
तसव्वुफ़ की करिश्मा साज़ियों से यह भी बुला आई कि मुख़तलिफ़ मुजाहिदात व रियाज़ात की वजह से बसा औकात ग़लबा सकर में ऐसे कलिमात सर ज़िद हुए जो शरीअत के मुताबिक न थे,चूंकि यह कलिमात ऐसी शख्सियतों से सादर हुए थे जिन की बुज़ुर्गी व विलायत पर सब को या अक्सर को यकीन या ज़न ग़ालिब था,जिन के दलों में चूर था वह उन्हें सही महम्मल पर किया महमूल करते उन्हों ने अपनी ख़ाहिशात में उन्हें ढाल लिया जिस से ऐसे नताइज बरामद हुए जो सरासर इलहाद व ज़िंदक़ा थे।
कश्फ़ ही की कर्म फरमाइयों से रफ़्ता रफ़्ता यह तसोर पैदा होगया कि शरीअत और है और तरीक़त और,अवाम शरीअत की मुकल्लिफ़ है और ख़वास तरीक़त व मार्रत के,शरीअत पोस्त है और तरीक़त व हक़ीक़त मग़ज़।
इस शरीअत और तरीक़त के फ़र्क़ ने बे पनाह मुफ़ासद के दरवाजे खोले और इस बहाने उन लोगों ने अपने आप को शरई तकालीफ़ से मुकम्मल आजाद कर लिया,उलूम शरीअत की तहसील करने वालों और उन पर अमल करने वालों को ज़ाहिद खुश्क या खुश्क मिला कहा गया और दीन के ठीके दार यही बिन बैठे।
बाद के सूफ़ियों से तसव्वुफ़ में एक खराबी यह भी पैदा हो गई कि अस्नेसलोक में सैर को सरीअ और तेज बनाने के लिए,और कुछ इश्क व मुहब्बत की चिंगारियों को शोला बनाने के लिए बाज़ कामिल बुजुर्गों ने हदूद व क़ुयूद के साथ समाव को दाखिल कर लिया था,बाद के लोगों ने जिन्हें न वह मंज़िल हासिल थी और न ही वह कैफीतें मगर बुजुर्गों की तक़लीद में समाव को लाज़िम कर लिया और बुजुर्गों की मुक़रर करदा हदूद व क़ुयूद को ख़त्म
करदिया और फिर इसी बहाने से हसन व इश्क पर मुश्तमिल ग़ज़लों और गानों के ज़रिया खूब जिम के आतिश नफ़्स को भड़काया गया और आज तो यह मामला जिस नुकता आखिर पर पहुँच गया है कि कौन दानिश मंद है जो नहीं जानता है।
रफ़्ता रफ़्ता हाल यह हुआ कि क़ुर्ब व इरफान के हुसूल के जो असल असबाब थे और तज़किया व तसफ़ीया के जो असल ज़राए थे वह काफूर हो गए,असली तसव्वुफ़ कोसों दौर भाग गया,बस रूहानियत,तसव्वुफ़,क़ुर्ब और इल्म लदनी सब यही उमूर रह गए।
तसव्वुफ़ में एक नुक़्स यह भी आया कि चूंकि सहाबा कराम के दौर में क़ुर्ब व इरफान की राह कुछ और थी और फिरताबईन वतबा ताबईन में सहाबा कराम की कुछ निसबतें बाक़ी रहीं अगर चह कम होती चली गईं,हुज़ूर सर्वर कोनेन ﷺ के फ़ैज़ से सहाबा को जिस राह से वसूल हासिल हुआ वह क़ुर्ब नुबुव्वत की राह थी जो निहायत आसान,फ़राख़ और कम वक़्त में ख़ुदा तक पहुँचाने वाली और उन कैफियात व अहवाल से दौर थी जिस की वजह से रक़्स व सर्वरोगीरह की तरफ़ मेलान हुआ।
बाद में आम तौर पर जो राह खुली वह क़ुर्ब व लायत की राह थी जो गोना गों कैफियात व तजल्लियात का हासिल और मुख़तलिफ़ मराहिल व मनाज़िल की मुतकल्लिल थी जब वह कैफियात और मराहिल ओलिया पर मुनकशिफ़ होने लगे तो उन के नाम भी मुक़रर होने लगे और उन के मफ़ाहीम भी मुतय्यन होने लगे,जिन कैफियात व तजल्लियात और मराहिल व मनाज़िल को बयान करने के लिए इस्तिलाहात मुक़रर की गईं उन में बाज़ में ताबीरी गलतियां हुईं नीज़ उन की मुनासबत से जो अलफ़ाज़ ताबीर के लिए मुक़रर किए ग्ये थे वह अलफ़ाज़ पूरी मुसाइदित नहीं करते थे।
उलग़र्ज़ असल तसव्वुफ़ दीन की रूह और अल्लाह तआला के साथ बंदों के राबिता को मजबूत करने वाला,नफ़्स व शैतान से बचाने वाला,क़ुर्ब हक़ की लाज़वाल दौलत को बख़्शने वाला
और सर्वर कोनेन ﷺ की हक़ीक़ी तालीमात पर अमल करने वाला था,जिस मक़सद के लिए इंसानी तख़लीक़ वजूद में आई थी इस मक़सद में बेहतर तौर पर कामयाब करने वाला,सारी गफलतों से दौर रख कर अपने मौला की याद में शब् विरोज़ बसर कराने वाला यही मुबारक रास्ता था जो बाद में तसव्वुफ़ कहलाया।
जो कलेजे से लगाने वाली चीज़ थी उसे रफ़्ता रफ़्ता एक मुअम्मा बना दिया गया और वह चीजें दाखिल कर दी गईं कि शरीफ़ और ज़ी इल्म इंसान इस से जुड़ने के बजाए इस से भागने लगा।
ख़याल रहे कि तसव्वुफ़ के नक़ाइस व उयूब जिन का क़दरे बयान आप ने पढ़ा यह इबतिदाई चंद सदियों के बाद ही पैदा होने लगे थे चुनांचे मुतक़द्दिमीन सूफ़िया की किताबों में इस तरह के बाज़ खयालात की तरदीद मिलती है।
यह भी ध्यान रहे कि हर दौर में साहिब इस्तिक़ामत और आरिफ कामिल इंसान रहे हैं जिन का नसब उलऐन शरीअत का तोहफ़्ज़ और ख़ुदावंद क़ुद्दूस से बंदों का रिश्ता जोड़ना रहा है इस सिलसिले में बुजुर्गों ने बड़े बड़े कारहाए नुमायाँ अंजाम दिए हैं।
किताबें पढ़ने से पता चलता है कि जिन मुक़द्दस बुजुर्गों ने तसव्वुफ़ में खिलाफ़ सुन्नत चीजों की आमेज़िश नहीं होने दी वह बड़े बड़े बुज़ुर्गान दीन थे जिन्हों ने अपने मुरीदैन व मुताल्लिक़ीन को शरीअत पर अमल की ताकीद की और बातिल बातों की तरदीद की,उन के दौर में इस क़द्र बातिल तस्वरात व तुहमात तसव्वुफ़ में दाखिल नहीं हुए थे और उन कवी अलतासीर बुजुर्गों की वजह से उन बातिल तुहमात की ज़्यादा गुंजाइश भी न थी और न इस दौर में इस क़द्र मक्शफ़ात के चर्चे थे और न ही उसे हुज्जत विदलील बनाया जाता और न रूहानी मक्शफ़ात की इस क़द्र वज़ा व तदवीन थी।
आप इबतिदाई सदी से ले कर हुज़ूर ग़ौस आज़म रज़ि अल्लाह तआला अन्हु के ज़माना
मुबारक तक और इस के कुछ बाद तक देखें गे तो यही कैफियत मिले गी,सरकार ग़ौस आज़म रज़ि अल्लाह तआला अन्हु और उन के तरबीयत याफताह नीज़ इस दौर में दूसरे बुज़ुर्गान दीन का रूहानी कमाल इस दर्जा पहुँचा हुआ था और उन की आगोश तरबीयत से ऐसे ऐसे मुस्तक़ीम अलाहवाल अश्ख़ास वजूद में आये थे कि उन के होते हुए तुहमात पल भी नहीं सकते थे।
मक्शफ़ात की वज़ा वितदव्यन का आम दरवाजा हज़रत शैख़ मुही उद्दीन इब्न अरबी क़ुद्दिस सिर्रहू से खुला और उन्हों ने अस्ना राह में पेश आने वाले वाक़ियात व हालात को जिन नाजुक ताबीरों से अदा किया था बाद में कज फहमों ने इस से बहुत गलत नताइज बरामद किए,फिर इस सिलसिले में किताबें भी ज़्यादा वजूद में आने लगीं रूहानी मिसाइल की ताबीरें इल्मी अंदाज़ में होने लगीं,बहस व तदक़ीक़ के दरवाजे खिलने लगे और माद्दियत के ग़लबे से जों जों रूहानियत कमज़ोरपड़ने लगी इसी क़द्र तुहमात शामिल होने लगे,अब ज़्यादा तर नाक़िस लोग पैदा होने लगे जिन्हों ने लोगों को मिन चाहा तसव्वुफ़ देना शुरू करदिया।
बाद के जमाने तसव्वुफ़ में एक बुनियादी गलती यह की गई कि जिन बुजुर्गों ने अपने अस्ना ए राह केमक्शफ़ात बयान कर दिए उन्हें उन सूफ़ियों ने आखिरी मंज़िल समझ लिया यह बहुत बड़ी गलती थी,हज़रत इब्न अलारबी के साथ ख़ास कर और और दीगर बुजुर्गों के बाज़ अक़्वाल के साथ यही नारवा सुलूक बरता गया,वहदत उलवजूद और वहद अलशहूद को जो मुअम्मा बनादिया गया इस की ख़ास वजह यही हुई, इसी तरह अनुलहक़ व सुबहानी मा आज़म शानी वगैरह के साथ हश्र हुआ।
तसव्वुफ़ के सिलसिले में अगर आप हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की तजदीदी ख़िदमात का जायजा लें गे तो आप को पता चले गा कि आप ने इंसानियत पर कितना बड़ा एहसान कियाहै और शरीअत का किस क़द्र तोहफ़्ज़ फ़रमाया,आप ने चंद चीजें अपना ईं एक तो आप ने इस रियाज़त व मुजाहिदा को गैर ज़रूरी क़रा दिया जो लोगों ने रियाज़त व मुजाहिदा के नाम से दाखिल
कियाथाजिस की वजह से सुन्नत का ऐतबार साक़ित हो गया था।
इस्लाम के खिलाफ़ एतिदाल से तजावुज़ कर के सूफ़िया ने जो अम्र भी इख्तियार किया हज़रत मुजद्दिद ने उसे खारिज कर दिया और सुन्नत के दक़ायक़ की तरफ़ तवज्जो दिलाई और आप ने दलायल के साथ बालतफ़सील बयान फ़रमाया कि सही माअनों में सुन्नत पर अमल ही सब से बड़ा मुजाहिदा है मिसाल के तौर पर आप फ़रमाते हैं कि भूका रहना,कसरत से रोज़े रखना यह वाक़ई मुजाहिदा है लेकिन अगर कोई इंसान जिसे खूब भूक लगी हो और वह खाना खा रहा हो अब अगर वह इतनी मिक़दार खाना खाये जितनी मिक़दार सुन्नत है और इश्तहा के बावजूद अपना हाथ खींच ले तो यह इस से बड़ा मुजाहिदा है कि खाना सामने आये ही न,इस में(सुन्नत के मुताबिक खाने में)चंद फ़वाइद हासिल हुए एक सुन्नत पर अमल हुआ ,नफ़्स पर यह फेअल बहुत ग्रां गुजरा और ख़ास बात यह कि भूक की हालत में आम तौर से इंसान अंदरूनी तौर पर ऐसी कैफियत का शिकार होजाता है कि फिर इस का दिल न औराद व अशग़ाल में लगता है न इबादात में जबकि शरीअत का हुक्म यह है कि खाना हाजिर हो और शिद्दत भूक हो तो पहले खाना खाओ।
इस के साथ साथ इस तरह के मुजाहिदात से जिसम में नक़ाहत व ज़ोफ़ लाहक़ होता है जिस की वजह से दीन की तबलीग़ व तरवेज पर भी असर पड़ता है और दीगर हुक़ूक़ की अदाएगी में भी फ़ुतूर पड़ता है,फिर इस किस्म के मुजाहिदात हर एक के बस में नहीं जबकि सुन्नत पर अमल में जो मुजाहिदा है वह इस किस्म का है कि हर एक अमल कर सकता है और इस में अमल का तसलसुल भी है,यहाँ यह नुक्ता भी फ़रामोश नहीं करना चाहिए कि कि सुन्नत पर अमल में साहिब सुन्नत की तरफ़ तवज्जो होती है और यही तवज्जो ही दर असल रूहानी कमालात की असल है इसी पर सारे क़ुर्ब मुतफ़रा होते हैं,सुन्नत पर अमल में अपने महबूब ﷺ के साथ जो एतना व एहतिमाम है और आप की अज़मत काजस क़द्र एतराफ़ है वह अहले नज़र पर मख़फ़ी नहीं, सुन्नत पर अमल करके इंसान अमलन यह गवाही देता है कि दर असल मेरे न
नबी का तरीका ही कामिल व मुकम्मल है औरफिर वह कमालात की तहसील में किसी दूसरे तरीके का मुहताज नहीं होता है।
आप यहाँ से हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की तजदीद का राज़ समझ सकते हैं कि आप के हर शोबा तजदीद में यही रम्ज़ छिपा है कि इतने तवील अर्से में नयी नयी चीजें दाखिल होते होते मुहद्दिसात का एक अंबार लग गया था और सुन्नत इस के दबेज़ पर्दों में छिप गई थी,आप ने हर शोबा में सुन्नत ही को अपना इमाम व मुक़तदा बनाया।
इसी तरह आप ने अज़ीमत पर अमल को लाज़िम करदियाऔर रुख़्सतों से हत्ता अलामकान परहेज़ व इजतिनाब किया और बचने की ताकीद भी की मसलन हालत सफर में रोज़े न रखने की रुखसत है मगर अज़ीमत यह है कि रोजा रखे,रमजान में रोजा रखने में जो रहमतें व बरकतें हासिल हो जाएँ गी और जिस क़द्र रफा दर्जात हासिल होगा वह क़ज़ा में कहां?क़ज़ा में सिर्फ़ इतना ही है कि इंसान गुनह गार न होगा,इसी तरह सफर में सुन्नत मूकदा नमाज़ न पढ़ने की रुखसत है,रुखसत पर अमल से सिर्फ़ इतना होगा कि आप गुनह गार न हूँ गे लेकिन अगर अज़ीमत पर अमल करें और सफर में पढ़ें तो कितना अज्र व सवाब मिले गा?
इसी तरह सफर में तर्क जमात जायज़ है लेकिन अज़ीमत पर अमल करने यानी जमात से नमाज़ अदा करने में जो अज्र व सवाब है वह रुखसत में कहां,नीज़ मस्जिद में जमात के साथ नमाज़ पढ़ने से अम्र मारूफ़ व नही मुनकर के मवाक़े भी हाथ आते हैं,मोमिनों से मुलाकातें भी होती हैं,बाहम मुहब्बत भी बढती है,फिर मस्जिद में नमाज़ अदा करने का सवाब अपनी जगह पर है,इसी तरह आप बाक़ी मामलात को समझ सकते हैं,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की बालिग नज़री आप देखें कि किस क़द्र हिक्मत पर मबनी काम किया और इस चीज़ को लाज़िम करके किस क़द्र ज़ख़ाइर मुहैया कर दिए यह बातें रियाज़ात में कहां?
इसी तरह नमाज़ की अदाएगी के बारे में आप ने बार बार ताकीद फ़रमाई है कि
निहायत अहसन तरीका से नमाज़ अदा की जाए,आप अगर हालात पढ़ें गे तो मालूम होगा कि सूफ़िया ख़ाम ने एक जमाने से नमाज़ को गैर ज़रूरी करार दे दिया,बहुत से तो तारक हो गए थे और जो अदा भी करते थे उन में अक्सर ऐसे थे कि वुज़ू,ग़ुस्ल और नमाज़ में जिन संन व मुस्तहबात और क़ल्ब की हुज़ूरी होनी चाहिए वह नहीं होती थी,इस सिलसिले में आप ने इतना एहतिमाम फ़रमाया कि नमाज़ के कमालात को मुतअद्दिद मक्तोबात में बयान फ़रमाया और ताकीद फ़रमाई कि तादील अरकान की रियायत के साथ नमाज़ अदा की जाए ।
मुख़तलिफ़ मक्तोबात में वह मिसाइल नमाज़ भी बयान फ़रमाए जिन से आम तौर पर गफलत हो जाती है,आप ने नमाज़ के एहतिमाम को तजदीद अल्फ़ सानी के बरकात से फ़रमाया और बार बार यह जेहन दिया कि हजारों समाव की महफिलों में जो हासिल नहीं हो सकता है वह तूल कनौत की रियायत के साथ वक़्त मुस्तहब में संन व मुस्तहबात के साथ एक वक़्त की नमाज़ में हासिल हो सकता है,अकबर तो आखिर में नमाज़ का ऐसा मुनकर हो गयाथा कि लोगों को मना करता था।
उलग़र्ज़ आप ने तसव्वुफ़ की बना सूफ़िया के वज़ा करदा रियाज़ात व मुजाहिदात और गैर मुस्लिमों से अख़ज़ करदा औराद व अशग़ाल से हट कर सिर्फ़ और सिर्फ़ मुकम्मल तौर पर सुन्नत पर अमल में रखी,खाने पीने,उठने बैठने,चलने फिरने,ख़लवत व जलवत,तिजारत व मामलात और ज़िन्दगी के हर शोबे में सिर्फ़ सुन्नत पर अमल हो और सवाब की नियत से नहीं बल्कि हर काम उदाए सुन्नत के तौर पर हो।
मक्तोबात शरीफ़ में आप ने उन संतों का जो फ़राइज़ से मुताल्लिक़ हैं और उन के अलावा दीगर संतों में बहुत फ़र्क़ और सवाब बयान फ़रमाया है,आप ने जहां फ़राइज़ व वाजिबात और संन मूकदा को निहायत कमाल के साथ अदा करने की ताकीद फ़रमाई वहीं संन गैर मूकदा का भी इल्तिज़ाम फ़रमाया,तहजद को लाजिमी करार दिया,इसी तरह अशराक़ व चाश्त,अवाबेन और फ़े ज़वाल वगैरह की सुनतीं,नमाज़ ज़ुहर के बाद किसी अच्छे क़ारी व हाफ़िज़ की ज़बान से
निहायत इस्तिग़राक़ के आलम में कुरआन सुनना,ख़ुद पाबंदी के साथ कई कई पारों की तिलावत करना और हर एक में आदाब का मुकम्मल ख़याल रखना और हर अमल को पाबंदी के साथ अदा करना,आप की नमाज़ भी बड़े अजीब तरह से अदा होती,अल्लामा बदरुद्दीन सरहंदी आप की सिफ़त नमाज़ बयान फ़रमाकर इरशाद फ़रमाते हैं:
यह फ़क़ीर(मूल्फ़)इस बर्गुज़ीदा इमाम हिमाम के ख़ादिमों में शुमार होने से पहले कभी कभी आप की मस्जिद में जुमा की नमाज़ों में शरीक हो जाताथा और आप की नमाज़ को देख कर बे इख्तियार हो जाता था और यकीन रखता था कि आप हमेशा हज़रत सर्वर कायनात ﷺ की ख़िदमत में रहते हैं और आँहज़रत ﷺ को देखते हैं और इसी तरीके के मुताबिक नमाज़ अदा करते हैं और यों तो इस फ़क़ीर ने दूसरे उलमा व मशाइख़ को भी देखा है लेकिन ऐसी नमाज़ किसी की नहीं देखी,हमेशा अव्वल वक़्त में नमाज़ अदा करना और एक ही तरीका से अदा करना अजूबा रोजगार मालूम होता था,कभी हम ने नहीं देखा कि आप ने अपने वक़्त से एक लम्हा भी तजावुज़ किया हो या तरीका नमाज़ में कभी कौमा या जलसा या किसी आदाब नमाज़ में किसी तरह का कोई फ़र्क़ महसूस हुआ हो।
आप की नमाज़ ही आप की आला करामत थी कि ख़र्क़ आदत और उर्फ आम ज़ाहिर होती थी,यह बात ज़ाहिर है कि हमेशा एक तौर पर बुला किसी रंज व मशक्कत के इसी तरह पूरी ताज़ीम व तौक़ीर,वक़ार वख़्शू और ख़ुज़ू और इन्किसार के साथ नमाज़ अदा करना महज़ हुज़ूर अनवर ﷺकी इत्तिबा और आप की बातिनी कुव्वत की वजह से थी।
आप सिर्फ़ नमाज़ ही की ताकीद न फ़रमाते बल्कि सख्त हिदायत थी कि बाजमाअत पढ़ी जाए और जमात भी ऐसी नहीं कि घर में द्विचार लोगों के साथ,या जमात अव्वल गुज़र जाने के बाद मस्जिद में अपने अहबाब व मुरीदैन के साथ कर ली जाए बल्कि ताकीद थी कि जमात औला के साथ मस्जिद में पढ़ी जाए और कसरत से लोग शामिल हूँ।
इस के साथ साथ आप ने नबवी दुआओं का इल्तिज़ाम भी बहुत किया,जिन जिन औकात की नमाज़ें और दुआएं मर्वी हैं आप उन्हें पाबंदी के साथ करते और हर अमल में एतिदाल और सुन्नत पर अमल ज़रूरी होता,आप ने हर चीज़ में मियाना रवी इख्तियार फ़रमाई,लिबास में,खाने पीने में,बोलने चालने में,सोने जागने में,अहले व अयाल के साथ गुफ़्त व शनैद में,अहबाब की महफिलों में आप तवस्सुत और मियाना रवी का इल्तिज़ाम फ़रमाते,इस के साथ साथ आप ने दवाम हुज़ूर मा अल्लाह को लाज़िम करार दिया,ज़िक्र की कसरत और इबतिदा ही से इस बात की ताकीद फ़रमाई कि लौह दिल तमाम अग़यार के नुक़ूश से खाली और साफ हो और कोई मुराद और ख्वाहिश सीने में बाक़ी न रहे।
सालकेन के लिए आप की पर जोर ताकीद यह थी कि तमाम औकात उन तीन इबादतों से खाली न हो या कलिमा तैबा की तसोर माना के साथ तकरार हो या लंबी क़िरात के साथ नमाज़ हो या तिलावत कलाम मजीद औरजिकिर को लाज़िम क़ल्ब कर लिया जाए।
इस के साथ साथ आप ने अपने तरीका की बना नक़्शबंदी सुलूक पर रखी जिस में जज्बा सुलूक पर मुक़द्दम है,यह रास्ता सब से ज़्यादा क़रीब तर है,ख़ुदा तक बहुत जिल्द पहुँचाता है,ख़ुद हज़रत शैख़ अब्द उलहक़ मुहद्दिस देहलवी रहमत अल्लाह अलैहि ने अपने इस मक्तूब में सराहत की है जो उन्हों ने अपने मख़दूम हज़रत ख़्वाजा बाक़ी बिल्लाह क़ुद्दिस सिर्रहू को तहरीर किया है कि इंसाफ यह है कि फना व बका की तहसील में नक़्शबंदी तरीक़ से आसान तर कोई रास्ता नहीं है,हम ने अपनी तालीफ़ ‘‘ख़साइस नक़्शबंदिया’’ में उन तमाम उमूर को तफ़सीलन बयान कर दिया है।
इस सुलूक में सालिक को मेहनत कम करना पड़ती है इस लिए की इस की बना शैख़ मुक़तदा की सोहबत व मुहब्बत पर रखी है जिस क़द्र मुहब्बत ज़्यादा होगी इसी क़द्र शैख़ के अनिवार व कमालात का अक्स मुरीद के आईना क़ल्ब पर मुनाकिस होगा,यह निहायत इख़तिसारन आप के सामने तसव्वुफ़ की
बुनियादी चीजें बयान हुईं,इस से चंद फायदे हासिल हुए एक तो तसव्वुफ़ शरीअत व सुन्नत के साँचे में ढल गया और उलमा व सूफ़िया में बजाहिर कोई इख़तिलाफ़ नहीं रहा,आप ने ख़ुद अपनी और अपने मुरीदैन की वज़ा व क़ता वही बनाई जो इस्लामी और सुन्नत के मुताबिक थी उन का कोई मख़सूस लिबास नहीं रखा।
हर सोफी के लिए आप ने तहसील इल्म लाज़िम करार दे दिया,आप जानते थे कि मुहक़्क़ीन सूफ़िया के नाजुक मक्शफ़ात तक सही न पहुँच पाने ही की वजह से कम इल्म सूफ़िया ने दीन में रख़्ना डाला है और सूफ़िया की सही मुराद तक रसाई न होने की वजह से बाद के सूफ़िया ख़ाम एतिक़ाद व अमल में कुफ्र व इलहाद तक पहुँच ग्ये हैं,इल्म भी मामूली नहीं बल्कि आप की बारगाह के तरबीयत याफताह सारे सूफ़िया उलूम व फ़नून में कामिल दस्तगाह के मालिक थे और मनक़ूल व माकूल सारे ही उलूम से वाकिफ़ थे,तसव्वुफ़ व तरीक़त के उलूम में महारत ताम्ह रखते थे।
आप के यहाँ बाज़ाबता तसव्वुफ़ का दर्स होता और आप उन्हें किताबों को पढ़ाते और मुताला करते जो मुस्तक़ीम अलाहवाल सूफ़िया कराम की लिखी हुई हैं जैसे अवारिफ़ उलमारफ़ शरीफ़ वगैरह,तसव्वुफ़ की इस्तिलाहात,नफ़्स के मुकाइद,क़ल्ब के अमराज़ और उन से बचाव और अज़ाला के इल्म में आप के दरबार के सोफी बहुत माहिर थे,सूफ़िया पर तहसील इल्म को लाज़िम करार देने के साथ साथ उलमा को अमल और तरीक़ सूफ़िया की तहसील निहायत ज़रूरी करार दिया,आप के मक्तोबात क़ुदसी आयात के मुताला से साबित हो ता है कि आप जगह जगह तीन चीजों पर जोर देते हैं अव्वलन अक़ाइद अहले सुन्नत दोम सुन्नत व फ़िक़्ह पर अमल सोम तरीक़ सूफ़िया का इल्तिज़ाम।
खालिस इल्म ज़ाहिर जो माक़ूलात के साथ हो वह किस क़द्र शरारतें और बुलाएं लाता है और इस के किया मोहलिक और मुज़िर असरात हैं,जिस ने भी इस्लामी तारीख का मुताला किया है
वह अच्छी तरह जानता है,ख़ास कर अकबर का भयानक दौर जिस ने भी ग़ायर नज़र से पढ़ा है उसे पता है कि इस्लाम और मुसलमानों पर ज़्यादा तर आफतीं उलमा-ए सौ और कम इल्म सूफ़िया से आएं।
अगर तरीका सूफ़िया का इल्तिज़ाम न किया जाए तो तजुर्बात शाहिद हैं कि मिजाज में एतिदाल का जौहर पैदा नहीं हो पाता है और न ही रात व दिन की ताअत विबादत में वह लग्न और तसलसुल पैदा हो पाता है जो आख़िरत में बुलंदी दर्जात या निजात के लिए ज़रूरी है,ताल्लुक मा अल्लाह की वह मुबारक कैफीतें जिन से ख़ौफ़ व ख़शीयत,मुआसी पर नदामत,हसद व बुग़ज़,जाह व माल वगैरह की चाहत से छुटकारा मिल पाता है जो आमाल सालहा की बका और तोहफ़्ज़ के लिए ज़रूरी है।
तदरीस व तालीम जैसे नेक और मुफीद कामों में वह इख़लास व ललाहीत पैदा नहीं हो पाती है जो होना चाहिए बल्कि हक़ीक़त यह है कि इल्म व फन एक ऐसी दौलत व नेमत है कि अगर जरा भी ध्यान न दिया जाए तो यह तकबर व अनानीयत और जिंग वजदाल,बहस व मुबाहिसा और महफिलों में दूसरों की तज़लील लाता है और बालाआ ख़र इतनी बड़ी नेमत की ना शुक्री और उसे दुनिया के लिए इस्तेमाल तबाही आख़िरत का ज़रिया बिन जाता है।
मुख़्तसर यह कि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सह ने खूब देख लिया था कि इल्म और तसव्वुफ़ और उलमा व सूफ़िया के दरमियान जो बाद हाइल हो गया है वह कण असबाब के तहत है जिस में बेशतर दखल सूफ़िया ख़ाम और कुछ उलमा-ए सौ को है,आप ने सूफ़िया को इल्म और उलमा से क़रीब किया और उलमा को तसव्वुफ़ व सूफ़िया से,और उलमा जिस तसव्वुफ़ की वजह से सूफ़िया दौर हो गए थे इस तसव्वुफ़ को आप ने तमाम बिदआत से पाक करके खालिस शरई और इस्लामी तसव्वुफ़ बनादिया।
दूसरा फायदा यह हुआ कि मुजाहिदात व रियाज़ात से पैदा होने वाले गलत मक्शफ़ात और मग़्लूब कर देने वाली कैफियात यकसर ख़त्म हो गईं,सुन्नत पर अमल का इल्तिज़ाम न तो वज्द लाता
है,न हाल और न ही रक़्स व सर्वद की तरफ़ मेलान पैदा करता है।
आप गौर से देखें कि आज जो बिगड़े हुए तरीक़त के ख़ानवादे हमारे सामने हैं वह ज़्यादा तर उन अहम बुजुर्गों से मंसूब हैं जो इश्क व मुहब्बत की कैफ़ीयतों से मग़्लूब हो ग्ये और इस ग़लबा में उन से ऐसे अक़्वाल व अफ़आल सर ज़िद हुए जो अगर चह शरीअत के खिलाफ़ न थे लेकिन उन के मुतबईन ने इत्तिबा व पैरवी में उन्हें इस क़द्र गाढ़ा रंग दे दिया कि अब बस वही अक़्वाल व अफ़आल उन की नज़र में तसव्वुफ़ रह गए हैं बस,बल्कि उन अक़्वाल व अफ़आल के बहाने शरीअत के खिलाफ़ उमूर का इर्तिकाब करने लगे और आज तो ना मालूम उन चीजों को कहां से कहां तक पहुँचा दिया।
हक़ीक़त यह है कि बुज़ुर्गान दीन अपने मर्तबे व मक़ाम के लिहाज से ख़्वाह कुछ भी हूँ लेकिन इश्क के ग़लबात में जो कुछ उन से सरज़द हुआ वह किसी हाल में क़ौमों के मुनासिब न था और इस से शरीअत को जबरदस्त नुकसान पहुँचा और आज के जाहिल लोग इसी चीज़ को रूहानियत तसोर करते हैं,शरीअत से हट कर तसव्वुफ़ के तसोर ने ही इंसानों को बहुत कुछ खराबियों का शिकार करदिया,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की पूरी कोशिश यही रही कि तसव्वुफ़ उएन शरीअत हो और इस में वह सारे इमतियाज़ात ख़त्म कर दिए जाएँ जो बुराइयों और लोगों की दूरी का बाइस हैं।
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के शरई तसव्वुफ़ से एक फायदा यह भी हुआ कि बातिनी निस्बत में बड़ी कुव्वत पैदा हो गई और तवज्ज्हात व तसर्फ़ात बहुत कवी अलासर हो गए और चूंकि मयार मेज़ान सुन्नत थी लिहाज़ा कश्फ़ सुन्नत के मयार पर तुला जाने लगा जो इस पर खरा उतरा मकबूल वर्ना मर्दूद,लिहाज़ा कशफ़ी गलतियां बहुत कम बल्कि नाबूद हो गईं,पहली बात तो यह कि खिलाफ़ शरा कश्फ़ ही कम हो गया।
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने कश्फ़ की मज़कूरी आफतों ही की वजह से बहुत हद तक
कश्फ़ से ध्यान हटा लिया और सालकेन और सूफ़िया को हमेशा सिर्फ़ तवज्जो अली लिल्लाह का दर्स दिया।
(5) मौत के आने से पहले अपना काम करना चाहिए और ‘‘या शौक’’ कहते हुए मरना चाहिए। अव्वल एतिक़ाद की दुरुस्ती से चारा नहीं और जो कुछ बितरीक़ ज़रूरत व तवातर दीन से मालूम है इस की तस्दीक ज़रूरी है। दोम जानना और अमल करना इस पर जो इल्म फ़िक़्ह से मुताल्लिक़ से नीज़ ज़रूरी है। सोम सुलूक तरीक़ सूफ़िया भी दरकार है, न इस ग़रज के लिए कि ग़ैबी सूरतों और शक्लों का मुशाहिदा करें और अनिवार और रंगों को देखें, यह ख़ुद लहू व लइब में दाखिल है। सूर व अनिवार हस्सी में किया नुकसान है कि कोई उन को छोड़ कर रियाज़ात व मुजाहिदात से सूर व अनिवार ग़ैबी का लालच करे। सूर व अनिवार ग़ैबी और हस्सी दोनों हक़ सुब्हानहू की मख़लूक़ हैं और इस के साने होने पर दलालत करने वाली निशानियों से हैं। सूरज और चांद का नूर जो आलम शहादत से है कई तरह उन अनिवार पर फ़ज़ीलत रखता है जो आलम मिसाल में देखते हैं, लेकिन चों कि यह दीद दाइमी हैऔर ख़वास व अवाम इस में शरीक हैं इस लिए नज़र ऐतबार से साक़ित कर के अनिवार ग़ैबी का लालच करते हैं। हां, मिसरा:
जो पानी तेरे दरवाजे के आगे जारी है वह गुदला मालूम होता है।
बल्कि तरीक़ सूफ़िया के सुलूक से मकसूद एतिक़ादियात शरएहि में यकीन की ज्यादती हासिल करना है ताकि इस्तिदलाल की तंग जगह से कश्फ़ की फ़राख़ जमीन में आजाऐं और इजमाल से तफ़सील की तरफ़ आजाऐं। मसलन अल्लाह तआला का वजूद और इस की वहदत पहले इस्तिदलाल के तरीक़ या तक़लीद से मालूम हुई थी और इस के माफ़िक़ यकीन हासिल हो अथा। जब तरीक़ सूफ़िया का सुलूक हासिल हो जाता है, वह इस्तिदलाल व तक़लीद कश्फ़ व शहूद से बदल जाता है और यकीन अकमल हासिल हो जाता है। बाक़ी एतिक़ादियात का यही हाल है, और नीज़ सुलूक से मकसूद अहकाम फ़िक़हय के अदा करने में आसानी का हासिल करना और इस
दुश्वारी का दौर करना है जो नफ़्स की सुरक्षी से पैदा होती है। फ़क़ीर का यकीन है कि तरीक़ सूफ़िया हक़ीक़त में उलूम शरएहि का ख़ादिम है न कि शरीअत के खिलाफ़ कोई अम्र। फ़क़ीर ने इस मज़मून को अपनी किताबों और रिसालों में तहक़ीक़ किया है और इस ग़रज के हुसूल के लिए सूफ़िया के तमाम तरीकों में से तरीका आलीया नक़्शबंदिया का इख्तियार करना औला और उनसब है; क्यों कि उन बुजुर्गों नेसंत की पैरवी का इल्तिज़ाम रखा है और बिद्दत से परहेज़ किया है। (मशाइख़ नक़्शबंदिया, स:236)
तसव्वुफ़ के हवाले से आप की तजदीद का यह गोशा भी नज़र में रखने के लायक है कि आप सेपेश्तर और आप के जमाने में आम तौर प्रसोफिया की रोष हुकूमत और अहले हुकूमत और मालदारों से उमूमन सख्त इजतिनाब व परहेज़ ई रही न सूफ़िया उन की मजलिसों में जाते थे और न उन के नज़राने कबूल करते थे,इस बारे में बुजुर्गों की सीरत के ज़िमन में बड़े अहम अहम वाक़ियात मिलते हैं,ग़ायत तक़्वा की वजह से वह दुनिया और अहले दुनिया से सख्त पर हेज़ ही मुनासिब समझते थे,यह सूफ़िया हुकूमत के मामलात में कोई दखल न देते थे,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने पूरी ज़िन्दगी निहायत कट्टर सोफी बिन कर बसर कर दी दुनिया और अहले दुनिया से सख्त इजतिनाब और परहेज़ का आलम यह कि अगर आप चाहते तो तो अपने इल्म व फजल और वसाइल की वजह से बड़े सा बड़ा मन्सब हासिल कर लेते मगर माइल होना तो दौर की बात कभी हाशिया जेहन में भी नहीं आया कि कोई ओहदा या मन्सब कबूल किया जाए।
इस के बा वजूद उमरा व वुज़रा और अहले स्रोत से रब्त व जब्त वह भी उन की महफिलों में हाजिर हुए बग़ैर इस क़द्र कि शायद किसी सोफी का रहा हो और हर एक से ताल्लुक सिर्फ़ दीन की खिदमतों,बादशाहत की इसलाह और अवाम की फ़लाह के लिए था,जो इख़तिलात मा इजतिनाब आप के यहाँ मिलता है तारीख में इस की मिसालें बहुत कम हूँ गी।
वैसे तो बहुत से बुजुर्गों की बा रगाहों में सलातीन व उमरा हाजिर हुए वह अलग चीज़
है लेकिन जिस मुनज़्ज़म तौर पर आप ने दौर रह कर उन के दलों में उतर कर दीन का काम लिया है यह आप ही का हिस्सा है,आप ने कभी सूफ़ियाना उसूल नहीं छोड़े बल्कि इस सिलसिले में भी ठीक अपने नबी ﷺ की सुन्नत पर अमल किया।
सूफ़िया की तारीख का मुताला करने से पता चलता है कि आम तौर से उमरा व सलातीन को बुजुर्गों से मुहब्बत रही,वह उन से मिलने आये,हाज़रीयां दें मगर अम्र मारूफ़ और नही मुनकर जिस क़द्र आ प ने उन लोगों को फ़रमाई वह आप ही की जवां मर्दी थी,आप के तजदीद तसव्वुफ़ का यह गोशा बहुत ही अहम है कि आप ने तसव्वुफ़ को इस क़द्र फ़रोग़ दिया इस क़द्र फ़रोग़ दिया कि आप के और आप के फ़र्रज़िंदों,ख़ुलफ़ा और बाद के मुजद्दिदी ख़ुलफ़ा दुनिया के अक्सर व बेशतर लोगों पर कई सदियों तक छाए रहे और जो उन से वाबस्ता था वह गोया पक्का सोफी था,बड़े बड़े उलमा व मुहद्दिसीन और मुफ़स्सिरीन व मुसन्निफ़ीन हर तरह के लोग आये जो बबातिन मुजद्दिदी फ़ैज़ान और अहमदी नवाज़िशात से क़ुर्ब व इरफान की आला मंज़िल पर फ़ाइज़ और बजाहिर एक जबरदस्त आलम और आलिमाना शान व शौकत से रहना,हर एक का मशग़ला इस्लामी अहकाम को फ़रोग़ देना था।
आप की तबलीग़ सिर्फ़ दीन के किसी एक रुकन या ग़रज के नाम से नहीं थी मसलन नमाज़ व कलिमा की तबलीग़ बल्कि पूरे दीन की तबलीग़ थी और इस्लाम को पूरी कुव्वत से नाफ़िज़ करने की तबलीग़ थी।
इसी तरह न ऐसा था कि आप ने अवाम की खातिर लिबास व गैरह में कोई ढील ढाल दी हो बल्कि कुफ्र व काफ़िरों से जिस क़द्र नफरत अपने सूफ़िया के दलों में पैदा की वह आप के मक्तोबात से अयाँ है।
मुशरिकीन हिंद की दोस्तियों से इस्लाम और मुसलमानों पर किया किया आफतीं आई थीं यह आप खूब जानते थे,ख़ास कर सूफ़िया में उमूमन दीगर मज़ाहिब वालों के लिए कुछ नरम गोशा