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Allama Afaque Ahmad Mujaddidiतजदीद अल्फ़ सानीहक़ायक़ मुम्किनात इंद उलमजदद

अध्याय 46 में से 57पृष्ठ 638–649

हक़ायक़ मुम्किनात इंद उलमजदद

हक़ायक़ मुम्किनात (ख़याल रहे कि यह हक़ायक़ अंबियाए कराम और मलाइका अजाम अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात के अलावा हैं)की यह तफ़सील आप ने मुलाहिजा फ़रमाई और जो नताइज बरामद होते थे वह भी कुछ समाअत फ़रमाए,अब आप हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की मुख़तलिफ़ विमुतअद्दिद तकरीरात का खुलासा देखें!

खुलासा यह है कि हक़ सुब्हानहू व तआला की हक़ीक़त वजूद सिर्फ़ है कि कोई दूसरा अम्र इस

के साथ मंज़िम नहीं,वह वजूद हर खैर विकमाल का मंशा और हर हसन वजमाल का मुबदा है वह वजूद जज़ई हक़ीक़ी और हर तरह बसीत है न ज़हनन मुरक्कब है न ख़ारिज्न और बाइतबार हक़ीक़त मुम्तना इलतसूर और अल्लाह तआला की ज़ात पर मुवातातन महमूल है बतौर इश्तिक़ाक़ नहीं अगर चह हमल की भी इस महल में दर हक़ीक़त गुंजाइश नहीं क्योंकि तमाम निसबतें इस जगह साकित हैं।

और जो वजूद आम और मुश्तर्क है(वाजिब और मुमकिन के दरमियान) इसी वजूद ख़ास तआला वितक़दस के ज़लाल से है,यह ज़ुल ज़ात तआला वितक़दस पर और दीगर अश्या पर बुर सबील इश्तिक़ाक़ महमूल है मुवातातन नहीं और इस ज़ुल से मुराद मुरातिब तंज़िलात में हज़रत वजूद का ज़ुहूर है और इस ज़ुल के अफराद में से औला वाकदम और अशरफ वह फ़र्द है जो कि ज़ात तआला पर इश्तिक़ाक़न महमूल है पस मर्तबा असालित में अल्लाह तआला वजूदٌ कहा जा सकता है न कि अल्लाह तआला मौजूदٌ और इस ज़ुल के मर्तबा में अल्लाह तआला मौजूद सादिक है न कि अल्लाह तआला वजूदٌ चूंकि हुकमा और सूफ़िया में से एक गिरोह ऐनीयत वजूद का कायल है उन्हों ने इस फ़र्क़ की हक़ीक़त की इत्तिला नहीं पाई है और न ज़ुल को असल से जुदा किया है,हमल इश्तिक़ाक़ और हमल मुवातात दोनों को एक मर्तबा में साबित किया है और हमल इश्तिक़ाक़ को सही करने में हीले और तकल्लुफ़ से काम लिया है।

यह असालित और ज़लीयत तमाम सिफ़ात हक़ीकया की असालित वज़लीयत की तरह है क्योंकि मर्तबा असालित में जो कि मवतन इजमाल और ग़ैब अलग़ीब है उन सिफ़ात का हमल बितरीक़ मुवातात है न बितरीक़ इश्तिक़ाक़ ,अल्लाह तआला इलमٌ कहा जा सकता है और अल्लाह तआला आलम नहीं कहा जा सकता है क्योंकि हमल इश्तिक़ाक़ में हुसूल मुग़ायरत ज़रूरी है अगर चह एतबारी ही क्यों न हो और वह इस मवतन में बिलकुल मफ़क़ूद है क्योंकि तग़ायर सिर्फ़ मुरातिब ज़लीय में होता है और इस जगह कोई ज़लीयत नहीं क्योंकि वह चंद मुरातिब तईन अव्वल के उपर है क्योंकि निसबतें बितरीक़ इजमाल इसी तईन में मलहूज़ हैं और इस जगह अश्या से किसी श का मुलाहिजा किसी वजह के

ऐतबार से नहीं।

और मर्तबा ज़ुल में जो कि इस इजमाल की तफ़सील है हमल इश्तिक़ाक़ सादिक है हमल मुवातात नहीं लेकिन उन सिफ़ात की ऐनीयत इस मर्तबा में ऐनीयत वजूद की फरे है,यह वजूद ज़ुली भी आसार ख़ारिज्य का मुबदा है,पस जो माहीयतीं कि इस वजूद से मुत्तसिफ़ हो M गी हर मर्तबा में मौजूदात ख़ारिज्य के मुरातिब से हूँ गी तो सिफ़ात हक़ीकया भी मौजूदात ख़ारिज्य हूँ गी और मुम्किनात भी खारिज में मौजूद हूँ गे।’’

अगर आप इस बहस को बालतफ़सील देखना चाहें तो मक्तूब 234 में देखिए,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने इस जगह एक और सर ग़ामज़ बयान फ़रमाया वह यह कि कमालात ज़ातीय हज़रत ज़ात तआला वितक़दस के मर्तबा में उएन ज़ात हैं मसला सिफ़त इल्म इस मवतन में उएन हज़रत ज़ात है इसी तरह दीगर कुदरत वारादत और बाक़ी सिफ़ात।

नीज़ इस मवतन में हज़रत ज़ात बतमामा इल्म है और इसी तरह बतमामा कुदरत है ऐसा नहीं है कि बाज़ हज़रत ज़ात इल्म है और बाज़ दीगर कुदरत क्योंकि तजज़ी वतबाज़ इस जगह मुहाल है और उन कमालात ने कि गोया हज़रत ज़ात तआला से मुंतज़ा हैं,हज़रत इल्म के मर्तबा में तफ़सील पाई है और तमीज़ पैदा किया है मा बका हज़रत अलजात तालत वित्तक़्दस्त अला तलक उलाराफ़ इलाजमालीत अलवहदाने इस के बाद इस मवतन में कोई चीज़ नहीं बची कि इस तफ़सील में दाखिल न हुई हो और मुतमीज न हुई हो बल्कि तमाम कि जिन का हर एक उएन हज़रत ज़ात तआला था मर्तबा इल्म में आया है और उन कमालात मुफ़स्सिला ने मर्तबा सानी में वजूद ज़ुली पैदा करके सिफ़ात नाम पाया है।’’

और अदम चूंकि वजूद का मुक़ाबिल है और इस की नक़ीज़ है तो बिलज़ात हर शर विन्क़्स का मंशा होगा बल्कि उएन हर शर विन्क़्स होगा जिस तरह वजूद मर्तबा इजमाल में उएन हर खैर विकमाल है और जिस तरह हज़रत वजूद असल अलासल के मवतन में ज़ात तआला पर बितरीक़

इश्तिक़ाक़ महमूल नहीं है,अदम भी कि इस वजूद के मुक़ाबिल है माहेत अदमय पर बितरीक़ इश्तिक़ाक़ महमूल नहीं है इस मर्तबा में माहेत को मादूम नहीं कह सकते हैं बल हो अदम महज़ और तफ़सील इल्मी के मुरातिब में कि इस माहेत अदमय से ताल्लुक पाया है इस माहेत के जज़ईआत अदम से मुत्तसिफ़ होते हैं और हमल इश्तिक़ाक़ इस जगह दुरुस्त आता है और मफ़हूम अदम गोया मुंतज़ा इस माहेत इजमालिया अदमय से है और ज़ुल की मानन्द है इस माहेत के लिए जमी अफराद मुफ़स्सिला पर इस को बितरीक़ इश्तिक़ाक़ महमूल करना चाहिए और जब वह अदम मर्तबा इजमाल में उएन हर शर वफसाद है और अल्लाह सुब्हानहू के इल्म में हर शर दूसरी शर से जुदा थी और हर फसाद ने दूसरे फसाद से इमतियाज़ रखा जैसा कि वजूद में भी यही था।

पस हर कमाल इस कमालात वजूदय में से उन नक़ाइस अदमय से हर नुक़्स में इस के मुक़ाबिल है फ़ाना इल्म में मुनाकिस हुआ और हर एक(वजूद वादम) की इल्मी सूरतों ने बाहम एक दूसरे के साथ मिलाप पैदा किया पस वह अदमात कि शरूर वनक़ाइस से इबारत हैं उन कमालात मुनाकिसा के साथ कि मर्तबा हज़रत इल्म में तफ़सील इल्मी पाई है मुम्किनात की माहियात हैं ज़्यादा से ज़्यादा यह कि वह अदमात उन माहियात के उसूल विमादों की तरह हैं और वह कमालात हलूल करदा सूरतों के मसल उन में,पस आयान साबिता मेरे नज़दीक उन्हें अदमात और उन कमालात का नाम है कि एक दूसरे के साथ मख़लूत हो गए हैं।’’

नताइज:

बात अगर चह तवील हो गई और बहस भी खालिस इल्मी थी, में ने निहायत इख़तिसार के साथ कुछ बातें सुपुर्द कलम कीं दर असल बहुत से बुनियादी मिसाइल हैं जो इसी बात पर मौक़ूफ़ हैं कि यह बात समझ ली जाए कि कायनात और इस के ख़ालिक़ में किया ताल्लुक है इसी

फ़र्क़ से आप समझ जाएँ गे कि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू बारगाह अलूहियत में कितने मुहतात हैं और ज़ात वाजिब तआला वितक़दस के मुक़द्दस आदाब का किस क़द्र लिहाज फ़रमाया है।

(1)हज़रत शैख़ अकबर और उन के मुतबईन रहमत अल्लाह अलैहिम अजमईन के कौल से लाज़िम आता है कि वजूद मुमकिन के लिए भी साबित है जबकि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के नज़दीक मुमकिन का नसीब अदम है वजूद नहीं,फ़रमाते हैं:

‘‘वजूद हर खैर विकमाल का मुबदा है और अदम हर नुक़्स विशरारत और ज़वाल का मंशा तो वजूद ख़ास वाजिब जल सुल्ताना के लिए साबित होगा और अदम मुमकिन के लिए ताकि हर खैर विकमाल अल्लाह तआला की तरफ़ आइद हो और हर शर विन्क़्स इस मुमकिन की तरफ़ राजा हो।’’

आप क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं:‘‘मुमकिन के लिए वजूद साबित करना और खैर विकमाल को इस की तरफ़ राजा ठहराना दर हक़ीक़त मुमकिन को हक़ तआला के मुल्क विमलकोत में शरीक करना है।’’

बाज़ उलमा-ए ज़वाहर का कौल:

बाज़ उलमा-ए ज़ाहिर ने यह कह दिया कि मुमकिन के लिए भी वजूद साबित है और वाजिब के लिए भी पस क़ज़ीया तशकीक की बना पर वाजिब तआला का वजूद औला वाकदम होगा,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि यह कौल भी दर हक़ीक़त वाजिब तआला के साथ मुमकिन को उन कमालात वफ़ज़ाइल में शरीक करना है जो वजूद से पैदा होते हैं,तआला अन ज़ालिक अलवा कबीरा।

हदीस क़ुदसी में आया है‘‘अलकबरिया रदाई वालज़म अजारी’’ अगर उलमाए ज़वाहर इस दक़ीक़ा से आगाह होते तो हर गज़ मुमकिन के लिए वजूद साबित न करते और खैर विकमाल कि हज़रत वाजिब तआला के साथ मख़सूस है इख़तिसास वजूद के ऐतबार से मुमकिन के लिए साबित न करते।

(2)इसी तरह हज़रत शैख़ अकबर क़ुद्दिस सिर्रहू के कौल से लाज़िम आता है कि मुमकिन उएन वाजिब है,इसी तरह मुमकिन के सिफ़ात वाफ़आल उएन सिफ़ात वाफ़आल हक़ तआला हैं,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं:

‘‘वजूदी दर इल्म व खारिज बजुज़ ज़ात वाजिब तआला वग़ैर अज़ असमा वस्फ़ात वाजिबी जल सुल्तान्हा कि उएन ज़ात इंद तआला वितक़दस निज़द ईशां साबित निशदा वसूरत इलमीया रा उएन ज़ी सूरत दानिस्ता न शबह विमिसाल आं व हम चुनें सूरत मुनाकिसा आयान साबिता रा कि दर मुरात ज़ाहिर वजूद नमूदे पैदा करदा अस्त उएन आं आयान तसोर करदा इंद न शुबह आं नाचार हुक्म ब इत्तिहाद नमूदा इंद वहम ओस्त गुफ़्ता।’’

तर्जुमा:यानी चूंकि इल्म और खारिज में वाजिब तआला की ज़ात और असमा वस्फ़ात वाजिबी जो कि उन के नज़दीक उएन ज़ात तआला हैं के अलावा कोई साबित नहीं हो सिक्का और इल्मी सूरतों को ज़ी सूरत का उएन जाना न उन की मिसाल,शबह और इसी तरह आयान साबिता की सूरत मुनाकिसा कि ज़ाहिर वजूद के आईना में नमूद पैदा किया जाए उन आयान का उएन तसोर किया न उन की मिसाल ला मुहाला इत्तिहाद का हुक्म कर के हिम्मा ओस्त कहा।

मतलब यह कि इस से लाज़िम आता है कि मुमकिन उएन वाजिब है और मुमकिन के सिफ़ात वाफ़आल अल्लाह तआला की सिफ़ात वाफ़आल का उएन हैं, इसी लिए वहद उलवजूद का एक दीवाना कहता है।؎

हमसाया वहम नशीन वहमरा हिम्मा ओस्त

दर दिलक गुदा वात्लस शह हिम्मा ओस्त

दर अंजुमन फ़र्क़ वन्हां ख़ाना जमा

बिल्लाह हिम्मा ओस्त सम बिल्लाह हिम्मा ओस्त

तर्जुमा: पड़ोस, हम नशीन और हमराही सब वही है। फ़क़ीर की गुदड़ी और बादशाह के

अतलसी लिबास में वही है। अंजुमन में अलग अलग और ख़लवत में इकट्ठा। ख़ुदा की किस्म, सब वही है ख़ुदा की किस्म, सब वही है।’’

यहीं से इत्तिहाद की शाख फूटी,जिम्मा दारों ने तो हाल से मजबूर हो कर जो कहा वह कहा मगर तक़लीद महज़ और दिल के मरीजों ने बात को कहीं से कहीं पहुँचा दिया एक दफ़ा एक ना अहले बात के दौरान सामने मौजूद अश्जार वाहिजार को ख़ुदा कहने लगा और इस का नाम फ़कीरी विद्रवेशी और इल्म लदनी रख लिया गया,यही वह किरदार है जिस ने तसव्वुफ़ जैसी आला नेमत के इंकार पर न जाने कितनों को मजबूर कर दिया और सूफ़िया वावलीए कराम का गुस्ताख बना डाला।

आप क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि यह सौ अदब है और अल्लाह तआला के असमा वस्फ़ात में इलहाद, आप फ़रमाते हैं ज़लील विजारोब कश कि ज़ाती ख़बस और नुक़्स से दागदार है को किया मजाल कि ख़ुद को बादशाह अज़ीम उलशान कि तमाम खैरात विकमालात का मंशा है का उएन तसोर करे और अपने मज़मूम सिफ़ात वाफ़आल को इस के जमील सिफ़ात वाफ़आल का उएन तोहम करे।

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि उन बुजुर्गों ने हर चंद तशरीक वजूद से पर हेज़ किया है और असनैनीत और दोई से भागे हैं लेकिन गैर वजूद को वजूद पाया है और नक़ाइस को कमालात जाना।

(3)इसी से यह नतीजा भी निकला कि किसी चीज़ में शरारत और नुक़्स ज़ाती नहीं है अगर है तो नसबी और इज़ाफ़ी है,ज़हर कातिल इंसान की तरफ़ निस्बत रखते हुए शरारत रखता है क्योंकि हयात को ख़त्म करदेता है और इस हैवान की तरफ़ निस्बत करते हुए कि जिस में वह ज़हर पैदा किया गया है आब हयात और तिरयाक़ नाफ़े’ जबकि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के नज़दीक हर मुमकिन में ज़ाती शरारत विन्क़्स है।

(4)हज़रत शैख़ क़ुद्दिस सिर्रहू के नज़दीक पूरा आलम असमा वस्फ़ात से इबारत है कि

जिन्हों ने ख़ाना इल्म में तमीज़ पैदा करके ज़ा हर वजूद के आईना में खारिज में नमूद वज़हूर हासिल किया है जबकि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के नज़दीक आलम अदमात से इबारत है कि असमा वस्फ़ात वाजिबी जल सुल्ताना ख़ाना इल्म में उन अदमात में मुनाकिस हुईं और खारिज में हक़ सुब्हानहू की ईजाद से वह अदमात उन अकूस के साथ वजूद ज़ुली के साथ मौजूद हो गए,पस आलम में ख़बस ज़ाती पैदा हुआ और तिब्बी शरारत ज़ाहिर हुई और खैर विकमाल सब का सब इस मुक़द्दस बारगाह की तरफ़ राजा हुआ।

आप क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि फ़क़ीर के नज़दीक हक़ायक़ मुम्किनात अदमात हैं कि असमा वस्फ़ात के नकाइज़ हैं उन असमा वस्फ़ात के अकूस के साथ कि उन अदमात के आईनों में ख़ाना इल्म में ज़ाहिर हुए और एक दूसरे के साथ मुमतजिज हो ग्ये।

और कादर मुतअल्लिक़ जल सुल्ताना ने जब चाहा किसी माहेत को उन माहियात मुमतज़िजा में से वजूद ज़ुली के साथ कि यह परतो है हज़रत वजूद से मुत्तसिफ़ करके मौजूद ख़ारिजी बना दिया,बालजुमला हज़रत वजूद से पर तो इस माहेत मुमतज़िजा पर डाल कर आसार ख़ारिज्य का मुबदा बना दिया पस वजूद मुमकिन इल्म में और खारिज में इस के बाक़ी सिफ़ात की तरह पर तो है हज़रत वजूद का और इस के ताबे कमालात का ,मसला इल्म मुमकिन पर तो है इल्म वाजिब तआला का और ज़ुल है इस का कि इल्म वाजिब अपने मुकाबले में मुनाकिस हुआ है और कुदरत मुमकिन भी ज़ुल है कि अजुज़ में कि कुदरत का मुक़ाबिल है मुनाकिस हुआ है,इसी तरह वजूद मुमकिन ज़ुल है हज़रत वजूद का जो कि आईना अदम कि इस के मुक़ाबिल है मुनाकिस हुआ है।

आप क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं लेकिन फ़क़ीर के नज़दीक मुमकिन उएन वाजिब नहीं है बल्कि शबह और इस की मिसाल है और एक का हमल दूसरे पर मुम्तना है तो फ़क़ीर के नज़दीक मुमकिन उएन वाजिब न होगा और मुमकिन और वाजिब के दरमियान हमल साबित न होगा क्योंकि हक़ीक़त मुमकिन अदम है और वह अक्स जो असमा वस्फ़ात से इस अदम में मुनाकिस हुआ है अ

उन असमा वस्फ़ात की शबह विमिसाल है न कि उन का उएन तो हिम्मा ओस्त कहना दुरुस्त न होगा बल्कि हिम्मा ज़ावस्त क्योंकि जो कुछ मुमकिन ज़ाती है अदम है कि शरारत विन्क़्स वख़बस का मंशा है और जो कुछ कमालात की जिंस से मुमकिन में ज़ाहिर है वजूद और इस के तवाबा वह सब इस वाजिब तआला से मुस्तफ़ाद हैं और इस के कमालात ज़ातीय का पर तो हैं,पस ला मुहाला हक़ तआला आसमानों और जमीन का नूर होगा और इस का मावरा सब ज़ुल्मत कैफ़ वुलअदम फ़ौक़ जमी अलज़लमात।

उलग़र्ज़ आलम खारिज में वजूद ज़ुली के साथ मौजूद है जैसे कि हक़ तआला वजूद असली बल्कि अपनी ज़ात के साथ खारिज में मौजूद है,इतना हो सकता है कि यह खारिज भी इस खारिज का ज़ुल हो जैसे मुमकिन के सिफ़ात और वजूद हक़ के सिफ़ात और वजूद का ज़ुल हैं लिहाज़ा आलम को उएन हक़ नहीं कह सकते हैं और एक का दूसरे पर हमल दुरुस्त न होगा,ज़ुल शख्स को उएन शख्स नहीं कहा जा सकता है क्योंकि उन दोनों के दरमियान खारिज में तग़ायर मौजूद है लान् अलासनीन मुतग़ायरान।

यहाँ कोई शख्स कह सकता है कि हज़रत शैख़ और उन के मुतबईन भी आलम को ज़ुल हक़ कहते हैं तो फ़र्क़ किया हुआ इस का जवाब हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने यह दिया कि यह हज़रात इस ज़ुल का वजूद सिर्फ़ वहम में जानते हैं और वजूद ख़ारिजी की बो इस के अंदर जायज़ नहीं मानते हैं,खुलासा यह कि कसरत मोहूमा को वहदत मौजूदा के ज़ुल से ताबीर करते हैं और खारिज में सिर्फ़ एक मौजूद जानते हैं,खुलासा यह कि यह हज़रात ज़ुल के लिए वजूद ख़ारिजी साबित नहीं मानते हैं इसी लिए असल पर महमूल करते हैं और हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू चूंकि ज़ुल को खारिज में मौजूद मानते हैं इस लिए हमल दुरुस्त नहीं जानते,दोनों हज़रात इस बात पर मुत्तफ़िक़ हैं कि ज़ुल को वजूद असली हासिल नहीं सिर्फ़ ज़ुली है।

(5)हज़रत शैख़ और उन के मुतबईन रहमत अल्लाह अलैहिम अल्लाह तआला की सिफ़ात हक़ीकया को सिर्फ़ ख़ाना इल्म में मौजूद मानते हैं खारिज में मौजूद नहीं मानते हैं,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि‘‘अहले हक़ शकर अल्लाह सएहम के अलावा मुख़ालिफ़ फ़िर्क़ों से भी कोई सिफ़ात वाजिबी जल सुल्तान्हा के वजूद का कायल नहीं हुआ है हत्ता कि अहले हक़ के मताख़रीन सूफ़िया ने भी वजूद सिफ़ात का इंकार किया है और ज्यादती सिफ़ात को इल्म की जानिब राजा करार देते हुए कहते हैं:؎

अज़ रोए ताकिल हिम्मा गैर इंद सिफ़ात

बाजात तो अज़ रोए तहक़्क़ हिम्मा उएन

तर्जुमा: अक्ल के नज़दीक अल्लाह तआला की सिफ़ात गैर ज़ात हैं और हक़ीक़तन सभी उएन ज़ात हैं।’’

आप क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं: और हक़ यह कि अहले हक़ की बात बरहक़ है और मुश्कात नुबुव्वत से हासिल शुदा और नूर कश्फ़ वफ़रासत से साबित शुदा है।

मक्तूब 45 जिल्द 2 में अपना और शैख़ का मजहब बयान करते हुए फ़रमाते हैं:‘‘अर्बाब तौहीद वजूदी अलावा एक ज़ात तआला वितक़दस के किसी को मौजूद नहीं जानते और अल्लाह तआला के सिफ़ात वास्मा को इल्मी एतबारात जानते हैं और हक़ायक़ मुम्किनात के लिए कहते हैं कि उन को वजूद की बो भी नहीं पहुँची है अलाइयान मा शिमत राइय उलवजूद (आयान ने वजूद की खुशबू नहीं पाई) उन का कलाम हैऔर यह फ़क़ीर वाजिब तआला के सिफ़ात को भी वजूद ज़ाइद के साथ मौजूद जानता है जैसा कि अहले हक़ ने फ़रमाया है और मुम्किनात कि वाजिब तआला की सिफ़ात वास्मा के आईने हैं के लिए भी वजूद साबित करता है।’’

इस सिलसिले में हम निहायत अहम गोशे ह्दय नाज़रीन करते हैं जिस से आप ब

आसानी समझ लें गे कि हज़रत मुजद्दिद अल्फ़ सानी क़ुद्दिस सिर्रहू का मुर्ग़ रूहानी लाहूती विजबरोती फ़िज़ा में कितना बुलंद परवाज़ वाक़्य हुआ हैऔर आप क़ुर्ब वारफान की कण हदों को पार कर गए हैं जहां निहायत ख़ास ख़ास बल्कि अख़स उलख़वास की भी बमुश्किल रसाई होती है और आप के नोक कलम से जो मआरिफ़ निकल गए हैं वह उम्मत में से किसी आलम वसूफ़ी के न मलफ़ूज़ात में हैं और न कुत्ता बों में बल्कि यह सिर्फ़ तजदीद अल्फ़ सानी का नसीब हैं।

पहली बात तो यह नज़र में रखें कि असनाए सुलूक में आप पर एक वक़्त ऐसा था जब आप हक़ीक़त वाजिब तआला सिर्फ़ वजूद को करार देते थे जैसा कि मक्तूब 234 जिल्द अव्वल में तसरीह है मगर बिलआख़िर जिस इरफान से मालामाल हुए वह सब से वरा था।

हक़ीक़त बारी तआला:

मक्तूब अव्वल जिल्द दोम में आगाज़ करते हुए यों तआरुफ़ फ़रमाते हैं:

‘‘अलहम्द लिल्लाह अलज़ी जाल अलामकान मराआ त ललोजोब वसीयर उलअदम मज़हरा ललवजूद,वाल्वजूब वाल्वजूद व ऎ न काना सफ़तई कमाल ला सुब्हानहू फहू तआला विराइहुमा बल वरा जमी उलास्मा वालसिफ़ात व वरा जमी उलशेविन वाल्तबारात व वरा अलज़हूर वालबतून व वरा अलबरूज़ वालकमोन व वरा इल्तिजल्लियात वालज़हूरात व वरा कल मौसूल विमफ़सूल व वरा अलमुशाहदात वा लिमकाशफ़ात व वरा कल महसूस व माकूल व वरा कल माकूल व वरा कल मो होम विमतख़ील फहू सुब्हानहू वरा अलवरा सम वरा अलवरा सम वरा अलवरा’’

चुगोयम बातो अज़ मुर्गे निशाना

कि बा अन्क़ा बूद हम आशियाना

ज़ोअन्क़ा हस्त नामे पेश मर्दुम

ज़मुर्ग़ मिन बूद आं नाम हम गुम

तर्जुमा: में तुम्हें इस परिंदे का नाम व निशान कैसे बताओं, बस इतना जान लीजिए कि अन्क़ा का हम आशियाना है, बल्कि लोग तो कम अज़ कम अन्क़ा के नाम से वाकिफ़ हैं मगर मेरे परिंदे के नाम से भी कोई वाकिफ़ नहीं।’’

यानी तमाम खूबियां इस अल्लाह के लिए जिस ने इमकान को वजूब का आईना बनाया और अदम को वजूद का मज़हर किया,और वजूब व वजूद अगर चह अल्लाह तआला की सिफ़ात कमाल हैं,पस अल्लाह तआला उन दोनों से विरा बल्कि तमाम असमा वस्फ़ात से विरा,जमी शिवनात और एतबारात से विरा और ज़ुहूर वबतून से विरा,बरोज़ विकिमोन से विरा,तजल्लियात वज़होरात से विरा,हर मौसूल विमफ़सूल से विरा,मुशाहदात और मकाशफ़ात से विरा,हर महसूस विमाकल से विरा और हर मौहूम विमतख़ील से विरा तो वह सुब्हानहू वरा अलोरा है,फिर वरा अलोरा और फिर वरा अलवरा।