अध्याय 16 में से 57पृष्ठ 237–256
खमीरतयंत
अल्लाह तआला ने हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू को हुज़ूर सर्वर कोनेन ﷺ की तुयन्त(खमीर जिसम अतहर)के बक़ीया से पैदा फ़रमाया,आप क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं:"अगरचे इस दौलत खासा मुहम्मदी(यानी हज़रत की ख़लक़त का ज़ुहूर नफ़्स इलाही होना)में किसी दूसरे की शिरकत नहीं मगर फ़क़ीर इस क़द्र मालूम करता है कि आँहज़रत ﷺ की इस दौलत खासा से आप की तख़लीक़ वितकमेल के बाद बक़ीया रह गया था क्योंकि सख़्यों की ज़याफ़त की दौलत के ख़वान में ज्यादतियां जरूर हुआ करती हैं जो बसूरत अलिश(????)नौकरों के नसीब होती हैं वह बक़ीया आँहज़रत ﷺ की उम्मत के दौलतमंदों में से एक को बतौर अलिश अता किया गया है और इस को खमीर माया बना कर इस उम्मती की तुयन्त में गौंधा गया है और उसे तबईत वोरासत के तौर पर आँहज़रत ﷺ की दौलत खासा में शरीक किया गया है؎
बाक्रीमां कारहा दशोर नेस्त
यह बक़ीया हज़रत आदिम अला नबीना वालैय अस्सलवात वालतसलीमात की तुयन्त के बक़ीया की मानन्द है जो दरख्त खुरमा की ख़लक़त के नसीब होगया है चुनांचे आँहज़रत ﷺ ने फ़रमाया है:
अकर्मो अमुतकम अलनख़ल फ़ान्हा ख़लक़त मिन तेन् आदिम
हां!सख़्यों के प्याला में से जमीन को हिस्सा मिला करता है(मक्तोबात दफ्तर सोम मक्तूब 100,तज़किरा मशाइख़ नक़्शबंदिया ललितोकली)
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू पर इस ख़ास फजल इलाही की इनायात इस क़द्र हैं कि ज़बान वक्लम उन के बयान वितहरीर से क़ासिर हैं,जिन लोगों ने हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के कमालात में नज़र की है,आप रूहानियत में उरूज वार्तिक़ा की जिन हदों को पार कर गए हैं और क़ुर्ब विलायत विनबूत वरिसालत और ओलो अलाज़म से जो हिस्से पाए हैं,इसरार मुक़तआत
क़ुरआनी से जो मालामाल हुए हैं और अनबया कराम बिलख़सूस सय्यद अलानबया ﷺ की तबईत वोरासत से जो अनोखे कमालात विमुक़ामात पाए हैं वह इसी इनायत अज़ली का नतीजा मालूम होते हैं।
आप के उलूम विमआरिफ़ की उलूम शरएहि से मुताबिक़त,आप पर हुज़ूर सर्वर कोनेन ﷺकी मुताबेत के सात दर्जों का इन्किशाफ़ और हर दर्जे के कमालात से हिस्सा पाना जिन की तरफ़ हम शुरू में इशारा कर चुके हैं यह सब कुछ इसी खमीर की बरकतें मालूम होती हैं।
हुज़ूर सर्वर कोनेन ﷺ की संतों की कमाल इत्तिबा इस तौर पर कि इस से फ़ौक़ का तसोर नहीं किया जा सकता है,अल्फ़ चानी में अहया सुन्नत और उन की तरवेज वाशाअत की हर मुमकिन कोशिश और हर कमाल के हुसूल को इत्तिबा सुन्नत से मरबूत करना जैसा कि आप पढ़ चुके हैं यह सब इसी खमीर तुयन्त ही की रहमतें मालूम होती हैं,ऐसा लगता है कि तजदीद अल्फ़ सानी जिन कमालात के फ़ैज़ान का नाम है उन का सबब यही खमीर तुयन्त है,इसी ने दिया जो दिया और आप को पहुँचाया जहां पहुँचाया।
ख़ालिक़ दहर जल वाला को जो बुलंद काम आप से लेना था इस की तैयारी का अज़ल ही से सामान किस्मत करदिया गया था ,आप जगह जगह अपने उलूम विमआरिफ़ को मुश्का नुबुव्वत से माख़ूज़ फ़रमाते हैं,जगह जगह नुबुव्वत वरिसालत के परचम लहराते हैं,शरीअत वतरीक़त को आप ने किस अनोखे अंदाज़ में मुलादिया यह सब इसी खमीर तुयन्त की तजलियाँ मालूम होती हैं।
दिल के अंधे जिन को बसीरत का नाम वंशान हासिल नहीं वह इस कमाल पर नाक भों चढ़ाने लगे और हैरत वास्तिजाब से देखने लगे मगर आप की बुलंद वबाला शख्सियत और मुशाहदात विमक्शफ़ात की सच्चाई के सामने इस को लफ़ाज़ी तो ना कह सके मगर तावेल के दरवाजे खोलने लगे,दरअसल उन की आंखें सिर्फ़ महसूसात तक मुनहसिर हैं और रोहानी
कमालात से कोरी,उन कमालात के लिए दिल बीना की ज़रूरत है फिर भी अगर आप हैरत वास्तिजाब को मिटाना चाहें तो हज़रत क़ाज़ी सना अल्लाह पानी पत्ति रहमत अल्लाह अलैहि की तसनीफ़ इरशाद अलतालिबेन का सफ़ा37व38 मुताला फरमाएं तो आप को मालूम हो जाए गा कि यह चीज़ न कुरआन के खिलाफ़ है और न हदीस के और न ही अकला इस पर कोई इस्तहाला क़ायम।
हम सामईन के इतमीनान की खातिर हज़रत क़ाज़ी सनाइआलला रहमत अल्लाह अलैहि की नफीस तशरीह का तर्जुमा सुपुर्द कलम करते हैं वह फ़रमाते हैं:
मसला मुमकिन है कि बाज़ औलिया बाज़ अनबया की बक़ीया तुयन्त से पैदा हुए हूँ और यह भी हो सकता है कि रसूल अल्ला ﷺ की तुयन्त अकर्म से पैदा हुए हूँ
सवाल:यह बात अक्ल में नहीं आती है क्योंकि हर एक अपने वालदैन के नुतफ़ा से पैदा होता है
जवाब:अक्सर चीजें हैं कि इंसान की अक्ल से साबित नहीं होती हैं शरीअत से साबित होती हैं या कश्फ़ वाल्हाम से चुनांचे नफ़्स विलायत कि क़ुर्ब बे चों का नाम है इमाम मुही अलसिंह बगवी रहमत अल्लाह अलैहि ने तफसीर मुआलिम इलतंजील में आयत करीमा:
मुँहा ख़लक़नाकम वफ़ेहा नईदकम विमिनहा नख़र्जकम तार उख़्रा
की तफसीर में अता खुरासानी का कौल ज़िक्र किया है कि नुतफ़ा जो रहम में करार पकड़ता है फरिश्ता इस जगह से कुछ मिट्टी लाता है कि जिस में दफन किया जाए गा तो नुतफ़ा में डाल देता है तो मिट्टी और नुतफ़ा से आदमी पैदा होता है।
और ख़तीब ने इब्न मसाऊद रज़ि अल्लाह अन्हु से रिवायत की कि रसूल अकर्म ﷺ ने फ़रमाया:और कोई नहीं पैदा होता है मगर इस की नाफ़ में वह मिट्टी होती है जिस से वह पैदा किया जाता है तो जब उसे उम्र के सब से रजील हिस्सा की तरफ़ लौटाया जाता है(यानी मौत आजाती है)तो लौटाया जाता है इसी मिट्टी की तरफ़ जिस से पैदा किया गया और जिस में
दफन किया जाए गा और बे शक में और अबू बुकर वामर एक मिट्टी से पैदा किए गए और इसी में हम दफन किए जाएँ गे"(ख़याल रहे कि में ने सिर्फ़ हदीस का तर्जुमा ज़िक्र किया है वर्ना असल मतन में हदीस और इस का तर्जुमा दोनों हैं)
मिर्ज़ा मुहम्मद बदख़शानी ने कहा कि इस हदीस के शवाहिद हैं हज़रात इब्न उम्र, इब्न अब्बास,अबू सईद और अबू हुरीरा(रज़ि अल्लाह अन्हुम)बाज़ को बाज़ तक़वियत देते हैं,जिस वक़्त सही बुखारी की शरह में किताब जनाइज़ में इब्न सेरियन का कौल लाया कि उन्हों ने कहा कि अगर में किस्म खाओं तो सच्चा हूँ गा और में शक नहीं करता इस बात में कि रसूल अल्लाह ﷺ और अबूबकर वामर एक तुयन्त(मिट्टी)से पैदा हुए हैं और रसूल अल्लाह ﷺ ने अबदुल्लाह बिन जाफर से फ़रमाया कि तुम मेरी तुयन्त से पैदा हुए हो और तुम्हारे बाप फरिश्तों के साथ आसमान में परवाज़ करते हैं।
और जायज़ है कि वह खाक कि हक़ तआला ने पैगम्बर के वास्ते मुहैया की हो और जमीन की पैदाइश के आगाज़ से इस काक को अनिवार बरकात विन्ज़ूल रहमत से परवरिश किया हो और इस से कुछ बाक़ी रह गई हो जो कि औलिया से किसी का खमीर माया हो जाए यह अम्र अकला मुहाल नहीं है और शरीअत से मुस्तफ़ाद है और कश्फ़ से साबित होता है और इस को इस्तिलाह में असालित कहते हैं और साहब असालित नज़र कशफ़ी में ऐसा दिखाई देता है कि इस का जिसम मोतियों से आरास्ता है और दूसरों का आब विगुल से।
इल्म मुतशाबहात:
प्रवर दिगार आलम जल वाला ने हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू को इस क़द्र नवाजा कि उन चंद मख़सूस बुजुर्गों में बनाया जिन को क़ुरआनी मुतशाबहात और हुरूफ़ मुक़तआत के इसरार का इल्म अता फ़रमाया और आप को उल्मा रासख़ीन से फ़रमाया,अल्लाह तआला की इस अज़ीम नेमत को आप यों बयान फ़रमाते हैं:
"एभाई!हज़रत हक़ सुब्हानहू व तआला ने अपनी किताब मजीद को दो किस्म बनाया महकमात और मुतशाबहात पहली किस्म इल्म शराए वाहिकाम का मंशा और दूसरी किस्म इल्म हक़ायक़ वासरार का मख़ज़न यद,वजह,क़दम,साक़,असाबा और अनामिल कि कुरआन वाहादीस में आये हैं सब मुतशाबहात से हैं और इसी तरह हुरूफ़ मुक़तआत भी कि क़ुरआनी सूरतों के अवाइल में वारद हुए हैं मुतशाबहात से हैं कि उन की तावेल पर इत्तिला नहीं दी है मगर उल्मा रासख़ीन को ।
ख़याल न करें कि कुदरत का नाम है कि जिस की ताबीर“यद” से की है और याजात है कि"वजह"से इस की ताबीर की है बल्कि उन की तावेल इसरार ग़ामज़ा से है कि अख़स ख़वास को यह ज़ाहिर की है,हुरूफ़ मुक़तआत क़ुरआनी के बारे में किया लिखे कि हर हर्फ़ उन हुरूफ़ से एक समंदर है मौजें मारता हुआ आशिक विमाशूक़ के इसरार खुफिया से और ग़ामज़ रम्ज़ है मुहब् विमहबूब के रमूज़ दक़ीक़ा से।
महकमात हर चंद उम्हात किताब हैं लेकिन उन के नताइज वसमरात कि मुतशाबहात हैं मक़ासिद किताब हैं,उम्हात वसाइल से ज़्यादा नहीं हैं हुसूल नताइज के वास्ते पस मग़ज़ किताब मुतशाबहात हुईं और महकमात किताब इस मग़ज़ का छिलका,मुतशाबहात हैं कि रम्ज़ वाषारा से असल को बयान करती हैं और इस मोतबा की हक़ीक़त मामला से निशान देते हैं बख़िलाफ़ महकमात(कि वसाइल हैं)
मुतशाबहात हक़ायक़ हैं और महकमात मुतशाबहात की निस्बत उन हक़ायक़ की सूरतों,आलम रासिख़ वह शख्स होगा कि मग़ज़ को छिलके के साथ जमा करे और हक़ीक़त को सूरत में लाये"(तफ़सील के लिए देखिए मक्तूब276जलदावल)
मक्तूब 18दफ्तर दोम में फ़रमाते हैं"इल्म शरीअत की एक सूरत है और एक हक़ीक़त सूरत वह कि उल्मा ज़वाहर का नसीब है शुक्रउल्लाह तआला सएहम जो किताब वसंत के महकमात से ताल्लुक रखती है और इस की हक़ीक़त वह है कि उलमा-ए रासख़ीन का
हिस्सा है रज़ि अल्लाह तआला अन्हुम कि किताब वसंत के मुतशाबहात से मुताल्लिक़ है"
हज़रत अल्लामा बदरुद्दीन सरहंदी क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि एक दिन मख़दूम ज़ादा नवरात्म क़य्यूम ख़्वाजा मुहम्मद मासूम स्लिमा अल्लाह ने ख़लवत में मुझ से फ़रमाया कि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू पर मुतशाबहात और मुक़तआत के इसरार वरमोज़ ज़ाहिर हुए हैं लेकिन आप बताते नहीं हैं जब आप से दरयाफ्त किया जाता है तो आप फ़रमाते हैं कि शैतान बड़ा दुश्मन है और वह हमेशा इज़हार इसरार की जुस्तजू में रहता है कि उन मामलात कइ मकाशफ़ात को ज़ाहिर किया जाए ताकि वह इस्त्राक़ समा करके फोरा उन का इफ़शा करदे अल्लाह पाक ने उन उल्मा को जो उन तक पहुँचे हैं रासख़ीन फ़रमाया है उन के रसूख की वजह से कि वह इस मामले को पाशीदा रखते हैं और जब किसी को आगाह फ़रमाया गया है तो इस ने उसे मस्तूर ही रखा है ,में ने अर्ज़ किया कि(बफ़ज़्ला तआला)आँजनाब इस अम्र पर कुदरत रखते हैं कि इस महल विमूक़र से शयातीन को दफा करदें और अपने अतराफ़ से भी उन को दौर करदें ताकि इस्त्राक़ समा न करसकें जब में ने हद से ज़्यादा इसरार किया और इलतिमास किया (कि वह इसरार ज़ाहिर करदें) तो आँजनाब ने हर्फ़ क़ के इसरार का इज़हार किया तो मेरे होश उड़ गए"(हज़रात अलक़ुद्स स:70 बरकात अहमदिया में भी इस किस्म का वाक़ा दर्ज है)
ख़याल रहे कि कुतुब हनफ़ीह में जो यह दर्ज है कि मुतशाबहात का इल्म अल्लाह वरसौल ﷺ के अलावा किसी को नहीं होसकता है इस से मुराद यह है कि नज़रवास्तदलाल के ज़रिया कोई नहीं जान सकता है कश्फ़ इस से मुस्तसना है(देखिए हाशिया नूरालानवार इस बहस से मुताल्लिक़)
उलूम फना वबका:
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू का कौल नकल करते हुए हज़रत अल्लामा बदरुद्दीन फ़रमाते हैं"वह उलूम जो मक़ाम फना फ़ी अल्लाह और बका बिल्लाह से ताल्लुक रखते हैं अल्लाह पाक ने
महज़ अपनी इनायत से मुझ पर मुनकशिफ़ फ़रमादिये हैं और यह भी बता दिया है कि हर चीज़ की ख़ास वजह किया है और सैर फ़ी अल्लाह के किया माना हैं और बर्क़ी तजल्ली किया है और मुहम्मदी अलमशरब कौन है और इसी तरह की दूसरी बातें और हर मक़ाम में इस के लवाज़म और जरूरीयात बताई जाती हैं और उन की सैर कराई जाती है और बहुत कम ऐसी चीजें हूँ गी जिन की निशानदेही औलिया अल्लाह ने की होगी और वह रास्ते में छोड़ दी गई हूँ और न दिखाई गई हूँ और वह शख्स मकबूल हो गया जिस ने इस को बे चवन विचरा कबूल करलिया"
इल्म मुक़ामात:
दर्जा नंबर 4में फ़रमाते हैं"अल्लाह तआला ने महज़ अपनी इनायात बे ग़ायत से मदारिज कमालात में तरक़्क़ीयां अता फ़रमाई हैं मक़ाम विलायत से उपर मक़ाम शहादत है और शहादत से विलायत की निस्बत ऐसी ही है जैसे की तजल्ली ज़ाती से तजल्ली सूरी की निस्बत है ,उन दोनों के दरमियान दूरी उन दोनों तजलियों के दरमियान की दूरी से ज़्यादा है और मक़ाम शहादत से उपर मक़ाम सिद्दीक़ीत है और दोनों मुक़ामों में जो फ़र्क़ है वह न तो इबारत में बयान हो सकता है और न इशारे से बताया जा सकता है और इस मक़ाम सिद्दीक़ीत से उपर सिर्फ़ मक़ाम नुबुव्वत है और कोई नहीं और सिद्दीक़ीत और नुबुव्वत केदरम्यान कोई दूसरा मक़ाम नहीं हो सकताहै बल्कि मुहाल है और ऐसा मुहाल होना सरीह और सही कश्फ़ से मालूम हुआ है,
और वह जो बाज़ बुजुर्गों ने उन दोनों मुक़ामों के दरमियान एक वास्ता साबित किया है और इसेक़ुरबत कहा है तो इस से भी मुझे मुशर्रफ़ फ़रमाया गया है और और इस की हक़ीक़त की भी मुझे इत्तिला दी गई है ,बहुत सी तवज्जो और बे हद तज़रा के बाद पहले तो इसी तरह जैसा कि बाज़ अकाबिर ने बताया है मुझ पर भी इज़हार हुआ लेकिन बाद में मुझे इस की हक़ीक़त से आगाही दी गई,बेशक इस मक़ाम का हुसूल सिद्दीक़ीत के बाद और उरूज के
वक़्त होता है लेकिन वास्ते का होना महल तामिल क्योंकि वह मक़ाम बहुत बुलंद है और उरूज की मंजिलों में इस से उपर कोई मक़ाम नहीं और ज़ात जल वाला पर ज़ाइदेत वजूद इसी मक़ाम में ज़ाहिर होती है जैसा कि उलमा-ए हक़ से यह बात साबित होती है और इसी मक़ाम पर वजूद भी राह में रह जाता है और इस से उपर उरूज वाक़्य होता है"
दर्जा नंबर10 के तहत फ़रमाते हैं:
इल्म मुशारब:
हज़रत मुजद्दिद पर अंबिया अलैहिम अस्सलाम की इस्तिदाद के मुशारब,उन के तैनात के मुबादी और अल्लाह तआला के साथ हर एक की निस्बत यिनी मुहबीत,महबूबीयत और ख़लत और इसी तरह उन सालकों की इस्तिदाद जो किसी नबी के जीर क़दम हूँ मक्षुफ़ करदी गई थी फिर उन मुशारब में हर एक के क़दम का फ़र्क़ भी ज़ाहिर करदिया गया था इसी लिए आप फ़रमाते थे कि फलां शख्स विलायत मूसवी में है,फलां विलायत ईसवी में,फलां मुहम्मदी अलमशरब है और फलां नज़दीक है फलां विलायत के नुकता मरकज़ से और फलां इस दायरे के क़रीब है वगैरह यह बिजी आप की अज़ीम ख़ुसुसीआत और रफ़ी मुक़ामात में से है।(दर्जा11 के तहत फ़रमाते हैं)
तईन वजूदी कि जिस के मुताल्लिक़ आज तक किसी आरिफ ने लब कुशाई नहीं की थी आप पर ज़ाहिर किया गया और इस आली मक़ाम के इसरार वबरकात से आप को मुमताज़ फ़रमाया गया जैसा कि मक्तोबात के दफ्तर सोम में मक्तूब 89 में तफ़सील आई है और इसी तरह दूसरे मक्तोबात में भी है।
इल्म क़ुलूब ख़मसा:
दर्जा नंबर12 के तहत फ़रमाते हैं:"हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू को क़ुलूब ख़मसा के इसरार वालोम से भी नवाजा गया था ख़ुसूसन मर्तबा इलिया से जो क़ल्ब पंजिम से ताल्लुक रखता
है और यह रुतबा क़ुर्ब का आला मर्तबा है और मनाज़िल हुसूल का मंतहा भी है और आप की आला ख़ुसुसीआत में से भी है और आप हुज़ूर अनवर ﷺ की नियाबत के रुतबा तक पहुँचाए गए थे और इस मक़ाम में भी दाखिल किए गए थे जिस से ऊँचा कोई मक़ाम नहीं और अक़ताब वावताद को आप की विलायत के तहत रखा गया था जैसा कि रिसाला मुबदा विमाद में आप ने फ़रमाया है"फिर इस के बाद मुबदा विमाद की इबारत नकल की है।
उलूम तरीक़त:
दर्जा13 के तहत फ़रमाते हैं"हज़रत मुजद्दिद पर विलायत के तीन दर्जात मुनकशिफ़ फ़रमाए गए थे यानी विलायत सुग़रा,विलायत कुबरा और विलायत इलिया उन तीनों की तफ़सील आप ने मक्तोबात शरीफ़ में तहरीर फ़रमाई है।तफ़सील के लिए देखिए मक्तूब260,287,302वगैरह जिल्द अव्वल और मक्तूब 3जिल्द दोम नीज़ हमारी तालीफ़ ख़साइस नक़्शबंदिया भी मुलाहिजा फरमाएं।
दर्जा14 के तहत फ़रमाते हैं"हज़रत मुजद्दिद पर हक़ीक़त कुरआन,हक़ीक़त काबा और हक़ीक़त बीत उलमुक़द्दस के इसरार मुनकशिफ़ फ़रमाए गए और यह भी ज़ाहिर किया गया कि एक हजार साल के बाद हक़ीक़त अहमदी के साथ हक़ीक़त मुहम्मदी मुत्तहिद करदी गई थी इस की तफ़सील भी आप ने ख़ुद फ़रमाई है ,तफ़सील के लिए दफ्तर सोम के मक्तोबात 77,124 वगैरह देखें।
दर्जा 16 के तहत फ़रमाते हैं"हज़रत मुजद्दिद को अल्लाह तआला ने हक़ अलीक़ीन से मुशर्रफ़ फ़रमाया और सूफ़िया की इस्तिलाह में जो हक़ अलीक़ीन है वह आप के नज़दीक उएन अलीक़ीन है इस के बाद आप ने तहरीर फ़रमाया कि क़ुदसिया उएन अलीक़ीन और हक़ अलीक़ीन के मुताल्लिक़ यह फ़क़ीर किया कहे?और अगर कहे तो कौन है जो समझ सके और किया हासिल कर सके? यह मआरिफ़ अहाता विलायत से खारिज हैं और उलमा-ए ज़ाहिर की तरह अर्बाब विलायत भी समझने
से क़ासिर और आजिज़ हैं यह उलूम अनिवार नुबुव्वत(अला साहबहा अस्सलात वस्सलाम)की मुश्कात से माख़ूज़ हैं कि दूसरे हजार वाली तजदीद से महज़ तबईत और विरासत की वजह से ताजे हुए हैं।(हज़रात अलक़ुद्स स:84)
दर्जा 22 के तहत फ़रमाते हैं"हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू को अनबया अलैहिम अस्सलाम की विलायत से मुशर्रफ़ फ़रमाया गया और विलवियत ज़ुली से विलायत असली का इत्तिसाल फ़रमाया गया"
दर्जा18 के तहत फ़रमाते हैं"हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू को हुज़ूर सर्वर कोनेन ﷺ के कमाल इत्तिबा की वजह से ऐसे मक़ाम से जो मक़ाम रज़ा से बाला तर है मुमताज़ फ़रमाया गया जैसा कि आप ने दफ्तर दोम के मक्तूब दोम में तहरीर फ़रमाया है,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू को अल्लाह तआला ने अपने फजल विक्रम से सर्वर कोनेन ﷺ की मुताबेत के सात दर्जात अता फ़रमाए आप क़ुद्दिस सिर्रहू हर दर्जा के बालतफ़सील कमालात मक्तूब50दफ्तर दोम में तहरीर फ़रमाते हैं जिन की तरफ़ हम इबतिदा में इशारा कर चुके हैं,उन कमालात को आप पढ़ें तो आप को महसूस हो जाए गा कि आप का काशाना इरफान कितना बुलंद और शरीअत,तरीक़त और हक़ीक़त में आप इस मक़ाम तक पहुँचे हैं जहां गुने चुने ही मकबूल अश्ख़ास पहुँच पाते हैं,और उन उलूम विमआरिफ़ को हासिल करलिया है जिन से बहुत कम लोग मुशर्रफ़ होते हैं,यह मुताबेत के सात दर्जात का इन्किशाफ़ भी आप के ख़साइस में से है ।
रूहानी उरूज:
आप का रूहानी वारफानी उरूज वार्तिक़ा हर आम विख़ास पर रोशन वबाहर है और इस कमाल को पहुँचा हुआ है कि कुछ बयान करना छोटा मुँह और बड़ी बात मगर इस दौर पर फ़ित्न में जहालत वनादानी इस क़द्र बढ़ गई है कि लोग अब खुले हुए हक़ायक़ से इंकार करने लगे और अक्ल नाक़िस का इस क़द्र ग़लबा होगया है कि हर पागल अपने आप को बहुत बड़ा होशमंद तसोर करता
है और शरीअत वतरीक़त के हक़ायक़ में बे जा दखल देता है,तास्सुब की ऐंक आंखों पर इस क़द्र लगी है कि जान बोझ कर अज़्मतों का इंकार करदेता है,में ने इंसाफ पसंदों और एतराफ़ हक़ायक़ की दिल में कसक रखने वालों के लिए चंद कमालात अर्ज़ कर दिए और भी चंद मुलाहिजा फरमाएं और आप की रूहानी मंजिलों से आशना हो कर परवरदिगार आलम की इस रहमत वाज़मत की क़द्र करें।
दर्जा6 के तहत हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की जुबानी मौलाना बदरुद्दीन क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं:
"मुझ फ़क़ीर को जब इस रास्ते की ख्वाहिश पैदा हुई तो इनायत ख़ुदावंदी से ख़ानवादा हज़रत ख़्वाजगान नक़्शबंदिया क़ुद्दिस अल्लाह तआला इसरारहम के एक ख़लीफ़ा(हज़रत ख़्वाजा बाक़ी बिल्लाह क़ुद्दिस सिर्रहू)की ख़िदमत में पहुँचाया गया और वहाँ से उन बुजुर्गों का तरीका अख़ज़ करके इस बुजुर्ग की सोहबत इख्तियार की और इस बुजुर्ग की तवज्जो की बरकत से ख़्वाजगान नक़्शबंदिया का वह जज्बा जो सिफ़त क्यूमियत में कमाल फना हासिल करने से पैदा होता है इस फ़क़ीर को हासिल हुआ और इंद्राज निहायत फ़ी अलबदाय से भी किसी क़द्र सैराबी हासिल हुई जब यह जज्बा अच्छी तरह पुख्ता होगया तो सुलूक में मुझे करार हासिल हुआ और में ने इस राह को शेर ख़ुदा हज़रत अली कर्म अल्लाह तआला वजहा की रूहानी तरबीयत से अंजाम को पहुँचाया यानी मुझे इस असम तक उरूज हासिल होगया जो मेरा मुरब्बी(परवरिश कनुंदा)था और फिर हज़रत ख़्वाजा नक़्शबंद की रूहानियत की मदद से इस असम से काबिलियत औला के दर्जे तक उरूज किया जिसे हक़ीक़त मुहम्मदी(अला साहबहा अस्सलात वस्सलाम)से ताबीर किया जाता है और इस के बाद मुझे हज़रत फ़ारूक़ आज़म रज़ि अल्लाह अन्हु की रूहानी दस्तगीरी से इस काबिलियत औला से भी बुलंदी नसीब हुई और वहाँ से फिर में इस मक़ाम तक पहुँच गया जो इस काबिलियत से भी बुलंद तर है गोया यह काबिलियत इस मक़ाम की ख़ुसूसी तफ़सील है और मक़ाम इस का इजमाल है यह मक़ाम
अक़ताब मुहम्मदिया का मक़ाम कहलाता है और इस फ़क़ीर का इस मक़ाम तक तरक्की हुज़ूर अनवर ﷺ की रूहानी तरबीयत से हासिल हुई इस मक़ाम तक पहुँचते वक़्त इस फ़क़ीर को हज़रत ख़्वाजा इला उद्दीन अता क़ुद्दिस सिर्रहू की रूहानियत से भी एक गुना इमदाद हासिल रही जो हज़रत ख़्वाजा नक़्शबंद के ख़लीफ़ा और कुतुब इरशाद हैं।अक़ताब का मुंतहाए उरूज इसी मक़ाम तक है और दायरा ज़लीयत भी इसी मक़ाम तक पहुँच कर ख़त्म होजाता है।
इस के बाद असल खालिस का मक़ाम है या असल और ज़ुल दोनों मिले हुए हैं अफराद की एक जमात को इस दौलत तक पहुँचने का इमतियाज़ हासिल है,बाज़ अक़ताब को भी अफराद की सोहबत के ज़रिया इस असल और ज़ुल आमेज़ मक़ाम का मुशाहिदा मयस्सर होजाताहै,लेकिन असल खालिस तक पहुँच जाना असल ख़ास का मुशाहिदा बतफ़ावुत दर्जात करना सिर्फ़ अफराद ही का ख़ुसूसी इमतियाज़ है(यह अल्लाह तआला का फजल है वह जिसे चाहता है अता करता है और अल्लाह तआला बहुत ही फजल वाला है)
और इस फ़क़ीर को इस मक़ाम तक पहुँच जाने के बाद जो अक़ताब कका मक़ाम कहलाता है सर्वर कोनेन ﷺ की तरफ़ से कुतुबीयत इरशाद की दौलत अता हुई और मुझे इस मन्सब पर सरफ़राज़ फ़रमाया गया इस के बाद फिर इनायत ख़ुदावंदी शामिल हाल हुई तो इस मक़ाम से मज़ेद बुलंदी की तरफ़ मुतवज्जा फ़रमाया गया चुनांचे एक मर्तबा असल ज़ुल आमेज़ तक रसाई हासिल हुई और इस मक़ाम में भी गुज़शता मुक़ामात की तरह फना और बका नसीब हुई और फिर वहाँ से असल मक़ाम तक पहुँचा दिया गया इस आखिरी उरूज में जो कि मुक़ामात असल का उरूज है इस फ़क़ीर को हज़रत ग़ौस आज़म मुही उद्दीन अबदुलक़ादिर जैलानी क़ुद्दिस अल्लाह सिर्रहू अलाक़दस की रोहानियत से इमदाद हासिल हुई और उन की कुव्वत तसर्फ़ ने उन तमाम मुक़ामात से गुजार कर असल अलासल तक वासल फ़रमाया।
और फिर वहाँ से मुझे इस दुनिया की तरफ़ वासल करदिया गया जैसा कि इस से पहले भी हर
मक़ाम से वापस किया जाता था और इस फ़क़ीर को निस्बत फ़रदीयत का सरमाया जिस के साथ आखिरी उरूज मख़सूस है अपने वालिद माजिद(ख़्वाजा अब्द अलाहद क़ुद्दिस सिर्रहू)से हासिल हुआ था और मेरे वालिद को यह निस्बत अपने एक बुजुर्ग(हज़रत शाह कमाल कैथली क़ुद्दिस सिर्रहू) से हासिल हुई थी यह जज्बा कवी रखते थे और करामात वख़वारिक़ आदात में शहरत रखते थे ।
नीज़ इस फ़क़ीर को इल्म लदनी की तौफ़ीक़ हज़रत ख़िज़र(अला नबीना वालैय अस्सलात वस्सलाम)की रूहानियत से हासिल हुई लेकिन यह सूरत हाल इस वक़्त तक रही जब तक कि मक़ाम अक़ताब से नहीं गुज़रज्ञा लेकिन इस मक़ाम से गुज़र जाने और बुलंद तर मुक़ामात में तरक़्क़ीयां हासिल करलेने के बाद उन उलूम का हुसूल ख़ुद अपनी हक़ीक़त से होने लगा यानी उलूम अपनी ज़ात में ख़ुद बखुद अपनी ज़ात से हासिल होने लगे किसी गैर की मजाल न थी कि दरमियान में आसके"
दर्जा 7 के तहत फ़रमाते हैं:
"फिर इस फ़क़ीर को को नुज़ूल के वक़्त जिसे सैर अन अल्लाह बिल्लाह से ताबीर किया जाता है दूसरे सिलसिलों के मशाइख़ के मुक़ामात पर भी उबूर हासिल हुआ और हर मक़ाम से कामिल हिस्सा पाया और वह मशाइख़ मेरे काम में मेरे मददगार साबित हुए और अपनी अपनी निसबतों के चीदह चीदह हिस्से अता फ़रमाए,सब से पहले मुझे अकाबिर चिश्तिया(क़ुद्दिस अल्लाह इसरारहम)के मुक़ामात पर उबूर हासिल हुआ और उन मुक़ामात से वाफ़र हिस्सा मुझे मिला और उन मशाइख़ अजाम में से हज़रत ख़्वाजा कुतुब उद्दीन (बख्तियार काकी) रहमत अल्लाह अलैहि की रूहानियत ने दूसरे बुजुर्गों से कहीं ज़्यादा मेरी इमदाद फ़रमाई और सच तो यह है कि यह बुजुर्ग इस मक़ाम में बड़ी शान वाले हैं और इस मक़ाम के सरदार हैं।
इस के बाद मशाइख़ कब्रव्य(क़ुद्दिस अल्लाह इसरारहम) के मक़ाम पर गुजरहुआ यह दोनों
मक़ाम (चिश्तिया विकबरव्य) उरूज के ऐतबार से मुसावी हैं लेकिन यह मक़ाम(कब्रव्य)फ़ौक़ से नुज़ूल करते वक़्त इस शाहराह की दायें जानिब होता है और वह मक़ाम(चिश्तिया) इस स्रात मुस्तक़ीम की बाएं जानिब है और यह शाहराह(स्रात मुस्तक़ीम) वह रास्ता है कि अक़ताब इरशाद में से बाज़ अकाबिर इसी रास्ते से फ़रदीयत के मक़ाम तक पहुँचते हैं और आखिरी इन्तहा तक रसाई हासिल कर लेते हैं,अफराद तन्हा(यानी बुला कुतुबीयत ) का रास्ता दूसरा है बग़ैर कुतुबीयत के इस रास्ते से गुजरना मुमकिन नहीं मक़ाम सिफ़ात और इस शाहराह के दरमियान यह मक़ाम वाक़्य हुआ है,गोया उन दोनों मुक़ामों के दरमियान एक बर्ज़ख़ है जिसे दोनों तरफ़ से हिस्सा मिलता है और पहला मक़ाम तो इस शाहराह की दूसरी जानिब वाक़्य हुआ है जो सिफ़ात से कम मुनासबत रखता है।
इस के बाद अकाबिर सुह्रवर्दीय के मक़ाम पर उबूर हासिल हुआ जो शैख़ शहाब उद्दीन क़ुद्दिस अल्लाह सिर्रहू की तरफ़ मंसूब हैं यह मक़ाम इत्तिबा सुन्नत(अला मुसद्दिरहा अस्सलात वस्सलाम)के नूर से रोशन है और मुशाहिदा फ़ौक़ उलफ़ौक़ की नूरानियत से जीनत हासिल किए हुए है और इबादतों की तौफ़ीक़ इस मक़ाम की रफ़ीक है(यानी इस मक़ाम वालों के लिए हासिल है)।
बाज़ सालकों को जो अभी तक इस मक़ाम पर फ़ाइज़ नहीं हुए हैं लेकिन इबादात नाफ़िला में मशगूल हैं और इसी में आराम हासिल किए हुए हैं इस मक़ाम की मुनासबत से इस मक़ाम का कुछ हिस्सा हासिल है क्योंकि इबादात नाफ़िला सेबला वास्ता इस मक़ाम को मुनासबत है और और दूसरों को ख़्वाह वह मुबतदी हूँ या मनतही इसी वास्ते से इस मक़ाम के साथ मुनासबत है और यह मक़ाम बहुत अजीब है क्योंकि जो नूरानियत इस मक़ाम में ज़ाहिर होती है वह दूसरे मुक़ामात में कम है और इस मक़ाम के मशाइख़ कमाल इत्तिबा की वजह से अज़ीम उलशान और रफ़ी उलमकान हैं और अपने अबनए जिंस में इमतियाज़ी ख़ुसूसीयत रखते हैं।
इस के बाद हमें मक़ाम जज्बा में ले आये और यह मक़ाम बे शुमार मुक़ामात जज़्बात को
लिए हुए है फिर इस मक़ाम से नीचे भी नुज़ूल हुआ ,मुरातिब नुज़ूल की इन्तहा मक़ाम क़ल्ब पर होती है जो एक हक़ीक़त जामिआ है और इरशाद वितकमेल का ताल्लुक इस मक़ाम तक नुज़ूल होने पर है चुनांचे मुझे इस मक़ाम पर नुज़ूल हुआ लेकिन क़ब्ल इस के कि मुझे इस मक़ाम में तमकीन हासिल हो फिर उरूज वाक़्य हुआ और इस मर्तबा में ने साया (ज़ुल) की तरह असल को भी पीछे छोड़ दिया और इस उरूज में जो कि क़ल्ब के मक़ाम में वाक़्य हुआ मुझे तमकीन और पुख्तगी नसीब हो गई।(हज़रात अलक़ुद्स स:80)
क्यूमियत अश्या:
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की रफात वबलंदी का आप इस बात से अंदाजा लगा सकते हैं कि अल्लाह तआला ने आप को इश्याय का क़य्यूम बनाया और यह आप के ख़साइस में से है,मर्तबा क्यूमियत किया है हम जरा इस पर तफ़सीली रोशनी डालना चाहते हैं क्योंकि यह नाम और मर्तबा इस नाम से पहली मर्तबा हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के वजूद मसाऊद से लोगों के दरमियान आया,जिन के दलों में एतराफ़ अज़मत वहक़ के दरवाजे खुले हुए थे उन्हों ने तो बुला चवन विचरा कबूल करलिया क्योंकि वह हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की इल्मी वरूहानी जलालत शान से वाकिफ़ थे ,आप के बुलंद उरूज वार्तिक़ा रूहानी से आशना थे और जानते थे कि आप जैसे इमाम रब्बानी और मुजद्दिद अल्फ़ सानी ने यह मन्सब अपने लिए मुशाहिदा फ़रमाया और किसी मुनासबत से क्यूमियत नाम तजवीज़ फ़रमाया और साहिब मन्सब को क़य्यूम फ़रमाया जो उन के लिए इतना ही काफ़ी है।
मगर हर दौर में कुछ न कुछ ऐसे बुग़ज़ वानाद के हामिल जरूर होते हैं जो यह चाहते हैं कि सब कुछ हमें मिल जाए,दूसरों की बुलंदियां यकलख़्त उन्हें भाती ही नहीं ,ख़ास कर वहाबी देवबंदी जिन की तंग नज़री ख़ुद अनबया कराम अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात के बारे में हर पढ़ा लिखा इंसान जानता है जनें बात बात पर शिर्क के ढेर नज़र आने
लगते हैं,जिस कौम को अनबीए कराम अलैहिम अस्सलाम जैसे रफ़ी उलशान गिरोह के उन औसाफ़ के कबूल में पस विपेश हो जिन के साथ ज़ाहिर शरा नातिक़ है और कुरआन वसंत से साबित हैं भला वह गैर अनबया के लिए वह मुक़ामात वुमनासिब बुलंद वबाला कैसे कबूल कर सकते हैं जिन के साथ कुरआन वसंत बजाहिर नातिक़ नहीं हैं दरअसल यह कौम निहायत महरूम कौम है ख़ुदा तआला की अताओं पर हर वक़्त मुँह समेटे रहते हैं,उन्हें बहुत हड़ता है जब अल्लाह तआला किसी को नवाजता है,मगर इस से फायदा किया है अपनमे हाथों अपनी हलाकत के सिवा ।
हम चंद इक़तिबासात दर्ज करते हैं जिस से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि इंसान रफातों की कण हदों पर पहुँच सकता है और मन्सब क्यूमियत भी इस ज़िमन में वाज़िह हो जाए गा।
इंसान कामिल:
दफ्तर दोम मक्तूब11में पहले फ़ौक़ अर्श ज़ुहूर के कमालात बयान फ़रमाते हैं और आयत करीमा: अल्लाह नूर अलसमाज़ात वालअर्ज़ अलाआय
के माना तावेली निहायत आरिफ़ाना अंदाज़ में बयान करते हैं और निहायत तफ़सील से साबित करते हैं कि ज़ुहूर ज़ात कभी बसिफ़ात होता है और कभी बे पर्दा सिफ़ात,फिर फ़रमाते हैं कि अर्श मजीद को बे शाइबा ज़लीयत तजल्ली से हिस्सा है और किसी को नहीं हां! क़ल्ब इंसान चूंकि आलम सग़ीर का अर्श है जो कि आलम कबीर के अर्श से एक गुना मुशाबहत रखता है इसी लिए इंसान में जो कामलियन हैं उन के क़ुलूब को भी तजल्ली बे शाइबा ज़लीयत से हिस्सा है फिर कुछ ख़साइस इंसानी बयान करके फ़रमाते हैं:
"पस इंसान अजूबा( अजीब और जो लोगों को ताजब में डाले)है कि खिलाफत की लियाकत ली है और बार अमानत उठाया है,इंसान के ख़साइस गरीबा से सुनो कि इस का मामला यहाँ तक पहुँच जाता है कि हज़रत अहदेत मुजर्दा की मरातीत (आएंगी)की
काबिलियत पैदा करलेता है और सिफ़ात विषयोनात के इक़तिरान के बग़ैर ज़ात अहद का मज़हर होजाता है,तआला शाना इस का बयान यह कि इंसान कामिल जब ज़ात अहदेत तआला वितक़दस के मा सिवा की गिरफ्तारी से आजाद हो जाता है तो ज़ात अहद जल सुल्ताना के साथ गिरफ्तारी पैदा करलेता है और सिफ़ात विषयोनात में से कोई चीज़ इस की मलहूज़ विमंजूर विमकसूद विमतलूब नहीं रहती है उलमर मा मिन अहब के हुक्म के मुताबिक इस को एक किस्म का इत्तिसाल मजहूल अलकिफी हज़रत अहदेत मुजर्दा से पैदा होजाता है और वह गिरफ्तारी कि ज़ात अहद जल सुल्ताना से इस को हासिल हुई थी क़ुर्ब बे चवन की निस्बत ज़ात बे चवन की तरफ़ इस में साबित करती है इस वक़्त में इंसान कामिल ज़ात अहद का आईना बिन जाता है इस तरह पर कि सिफ़ात विषयोनात इस में कुछ भी मशहूद विमरई महीं होता है बल्कि ज़ात अहदेत मुजर्दा तालत वित्तक़्दस्त इस में ज़ाहिर होती है सुबहान अल्लाह उलअज़ीम" तफ़सील के लिए देखिए मक्तूब मज़कूर।
(2)मक्तूब 80 दफ्तर सोम में पहले तो निहायत तफ़सील से साबित करते हैं कि ज़ुल में जो कुछ हसन विकमाल और वजूद वितवाबा वजूद है सब असल से मुस्तफ़ाद है,फिर फ़रमाते हैं:" चूंकि आलम असमा वस्फ़ात वाजिबी तआला के ज़लाल हैं इस के उसूल भी असमा वस्फ़ात हूँ गे और यह ज़लाल आराज़ हैं कि उन का क़याम अपने उसूल से है जो कि असमा वस्फ़ात हूँ गे और उन के दरमियान कोई जौहर नहीं है कि इस से क़ायम हूँ मोतज़िला से निजाम बहकम उन अलकज़ूब कद यसदक़ ( बहुत झोटा भी सच बोल देता है) इस भेद पर आगाह होगया इस ने कहा कि आलम बतमामा आराज़ है और कोई जौहर उन के दरमियान नहीं है कि इस से क़ायम हूँ लेकिन निजाम ने खता की है कि उन आराज़ का क़याम बांफिसहा कहा है(यानी आराज़ बज़ात ख़ुद क़ायम हैं)और उन के इस उसूल से गाफिल रहा कि जिस से क़याम रखते हैं।
और सूफ़िया से शैख़ मुही उद्दीन इब्न अलारबी क़ुद्दिस सिर्रहू ने आलम को आराज़ मुजतमा फ़रमाया है और उन के क़याम को ज़ात हक़ जल वाला से रखा न कि असमा वस्फ़ात से कि उन के उसूल हैं"हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू को हज़रत शैख़ की इस बात पर बड़ा ताजब है कि उन आराज़ मजुमा का क़याम उन्हों ने ज़ात हक़ से कैसे माना ?
ओला ज़ात से मुराद वह ज़ात है जो तमाम वजूह वाइतबारात से खाली है तो इस जगह क़याम के किया माना?क्योंकि क़याम बमाना इख़तिसास नाअत हो सकता है और इस जगह कोई नात वस्फ़त नहीं तो क़याम भी नहीं।
सानिया यह कि क़याम भी मिनजुमला उन वजूह वाइतबारात में से जिन की नफ़ी की गई है लिहाज़ा इस मर्तबा मुक़द्दसा में इस के इस्बात के कोई माना नहीं रहे।
फिर आप क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं:"और जब अफराद आलम असमा वस्फ़ात के ज़लाल होगए तो नाचार उन का उसूल उन के उसूल तक होगा कि असमा वस्फ़ात हूँ गी और अगर उसूल उसूल तक भी पहुँचीं तो ज़ात मुजर्रिद मुक़द्दस मनतही होगा इस से आगे गुजरना होगा क्योंकि असालित को भी इस की गुंजाइश नहीं है कि ग़ुनाए ज़ाती है इस जगह सब से किया असम किया सिफ़त और किया शान किया ऐतबार।
तो आलम को हज़रत ज़ात तआला के मर्तबा मुक़द्दसा से सिवा महरूमी के कोई हिस्सा नहीं हुआ और वस्ल वातसाल की इस जगह गुंजाइश न होगी लेकिन आदत अल्लाह जारी हुई है कि अपने कमाल रहमत विराफ़त से क़ुरून मत्तावला वाज़मना मुतबादा(लंबे दौरों और दौर दराज़ ज़मानों)के बाद किसी साहिब दौलत को फ़नए उत्तम के बाद बक़ाए अकमल बख्शते हैं और ज़ात अक़्दस से उनमोवेज(नमूना) इस को अता फ़रमाते हैं कि इस का क़याम जैसा कि पहले अपनी असल से था कि असमा वस्फ़ात हूँ गी अब इस उनमोवेज से क़ायम होगा और जिन आराज़ साबिक़ा का मजमूआ रखता था और यह ज़ात मोहूब इस की हक़ीक़त होगी और इस का इंसानी कमाल अंजाम को
पहुँचे गा और नेमत इस के हक़ में तमाम होगी ,और एक बात कहता हूँ अच्छी तरह सुनना कि आरिफ मख़सूस का क़याम इस ज़ात महबूब से नहीं है बल्कि तमाम अफराद आलम को कि आराज़ मुजतमआ हैं जिस तरह पहले क़याम असमा वस्फ़ात से रखते थे अब उन का क़याम इस ज़ात मोहूब से मरबूत करदिया है और इस एक ज़ात से सब को क़ायम करदिया؎
ख़ास कंद बंदा मस्लिहत आम रा
खिलाफत का राज़ कि आयत करीमा: अनी जाइल फ़ी उलअर्ज़ ख़लीफ़्त आया है इसी जगह मुतहक़्क़ होता है और खबर: उन अल्लाह ख़ल्क़ आदिम अला सूरता की हक़ीक़त इस मक़ाम में वाज़िह होती है और वह जो हम ने कहा कि ज़ात अक़्दस सेइस को उनमोवेज अताफ़रमाते हैं,मैदान इबारत की तंगी की वजह से है वर्ना उनमोवेज की इस जगह किया गुंजाइश है और कौन चीज़ है कि इस की सूरत पर आयऔर सूरत की इस जगह किया मजाल है"तफ़सील के लिए देखिए मक्तूब मज़कूर
(3)मक्तूब74दफ़्तर्दूम में सूरह फ़ातिर की आयत:फ़िमुंहम ज़ालिम लंफसा अलाय
और सूरह एहज़ाब की आयत: अना अर्कना अलएअमान अलाय
केमाना की तावेल बयान करते हुए फ़रमाते हैं:
"जानना चाहिए कि उन अल्लाह ख़ल्क़ आदिम अला सूरता (बेशक अल्लाह तआला ने आदिम को अपनी सूरत पर पैदा फ़रमाया) कि वह परवरदिगार सूरत से मुनज़्ज़ह और मुताली है पस आदिम की तख़लीक़ इस सुब्हानहू की सूरत पर बायं माना हो सकती है कि अगर मर्तबा तंज़िया आलम मिसाल में कोई सूरत फर्ज़ की जासकती है तो जरूर यह सूरत जामा होगी कि इंसान जामा इसी सूरत पर मौजूद हुआ है कोई दूसरी सूरत को इस की काबिलियत नहीं है कि इस मर्तबा मुक़द्दसा की मिसाल होसके और इस का आईना बिन सके, इसी जगह से है कि इंसान अल्लाह तआला की खिलाफत के लायक हुआ है क्योंकि (श)जब तक श की सूरत पर मख़लूक़ न हो इस श की खिलाफत के
लायक न होगी क्योंकि श का ख़लीफ़ा श का ख़लफ़(पस मानद।फ़रज़न्द) होता है और इस श का क़ायम मक़ाम है और जब इंसान ख़लीफ़ा रहमान तआला ह्विज्ञातो ला मुहाला बार अमानत का तजमल मुतय्यन हो गया ला युहमल अताया उलमलिक उला मुतायाह (बादशाह की अताउन को इस की ऊंटनियां ही उठा सकती हैं)
तमाम आसमान और जमीन और तमाम पहाड़ जामईयत कहां से पाएं गे ताकि अल्लाह की सूरत पर पैदा हूँ और इस तआला की खिलाफत के लायक और इस सुब्हानहू की अमानत के बोझ को उठा सकें और महसूस होता है कि अगर इस बार अमानत को बिलफ़र्ज़ आसमान विजमीन और पहाड़ के हवाले कर देते तो टुकड़े टुकड़े हो जाते और उन का कोई निशान बाक़ी नहीं रहता और वह अमानत इस फ़क़ीर के गुमान(ज़ोअम)में जमी इश्याय की क्यूमियत है नियाबत के तौर पर कि अफराद इंसान के कामलियन के साथ मख़सूस है यानी इंसान कामिल का मामला इस जगह तक पहुँच जाता है कि इस को बहकम खिलाफत जमी इश्याय का क़य्यूम बनादेते हैं और सब को वजूद वबका और तमाम कमालात ज़ाहिरी वबातिनी का फ़ैज़ इसी (क़य्यूम)के वास्ते से पहुँचाते हैं अगर फरिश्ता है तो इसी से मुतवस्सिल और अगर जिन वाँस हैं तो इसी का दामन थामे(मुतशब्स)दरहक़ीक़त जमी अश्या की तवज्जो इसी की जानिब है और सब इस के निगरां हैं जानें या न जानें।
फिर चंद स्तरों के बाद फ़रमाते हैं: