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अध्याय 51 में से 57पृष्ठ 699–709

तासीर असबाब

असबाब की तासीर के सिलसिलेमें हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू का मसलक यह है कि "जायज़ है कि हज़रत हक़ सुब्हानहू व तआला बाज़ औकात असबाब में भी तासीर पैदा फ़रमाए ताकि मूसिर होजाएं और बाज़ औकात में उन में तासीर पैदा न फ़रमाए पस ला मुहाला कोई असर उन पर मुरत्तिब न होगा जैसा कि हम इस माना का उन असबाब में मुशाहिदा करते हैं कि मुसबबात का वजूद कभी उन असबाब पर मित्रत्तिब होता है और कभी कोई असर उन से ज़ाहिर नहीं होता है , असबाब की मुतअल्लिक़ तासीर का इंकार मुकाबरा(लगू वबातिल) है तासीर का कायल होना चाहिए और इस तासीर को इस सबब के वजूद की तरह हज़रत हक़ सुब्हानहू व तआला के ईजाद से जानना चाहिए फ़क़ीर (हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू) की राय इस मसला में यही है वाल्लाह सुब्हानहू आलम।"

तवस्सुत असबाब मुनाफ़ी तोकल नहीं:

बाज़ वह सूफ़िया जो दर्जा कमाल तक नहीं पहुँचे उन्हों ने यह गुमान करलिया कि असबाब को अमल में लाना और उन को वास्ता बनाना तोकल के खिलाफ़ है, अहजरत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू इसी मक्तूब में बयान बाला के बाद फ़रमाते हैं:" इस बयान से ज़ाहिर होगया कि असबाब का तवस्सुत तोकल के मुनाफ़ी नहीं है जैसा कि नाक़िसों ने गुमान करलिया है बल्कि तवस्सुत असबाब कमाल तोकल है हज़रत याकूब अला नबीना वालैहिम अस्सलात वस्सलाम मामला को हक़ जल वाला के सुपुर्द रखते हुए असबाब की रियायत को तोकल फ़रमाया :

अलैहि त्वकुलित वालैय फलैतुकल अलमतोक्लोन(में ने अल्लाह तआला पर भरोसा किया और

इसी पर भरोसा करने वाले भरोसा करें)।"

मुरीद खैर विश्र:

अल्लाह तआला खैर विश्र का इरादा फरमाता है मोतज़िला से तो जो चौक हुई सौ हुई लेकिन हज़रत शैख़ महयालदीन इब्न अरबी क़ुद्दिस सिर्रहू और उन के मुतबईन रहिमहुम अल्लाह से भी इस मसला में जबरदस्त चौक हुई है हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं:"अल्लाह तआला खैर विश्र का इरादा और उन दोनों का ख़ालिक़ है लेकिन खैर से राजी और शर से राजी नहीं , इरादा और रज़ा के दरमियान यह फ़र्क़ बारीक है कि हज़रत हक़ सुब्हानहू व तआला ने अहले सुन्नत को इस फ़र्क़ के साथ हिदायत बख्शी है बाक़ी तमाम फ़िरक़े इस फ़र्क़ की राह याबी न होने की वजह से गुमरही में पड़े हैं मोतज़िला ने इस जगह बंदे को अपने अफ़आल का ख़ालिक़ कहा है और कुफ्र विमुआसी के ईजाद को बंदे से मंसूब किया है।"

शैख़ मुही उद्दीन इब्न अरबी और उन के मुतबईन के कलाम से मफ़हूम होता है कि जिस तरह ईमान और नेक आमाल असम उलहादी के मर्जी(पसंदीदा ) हैं कुफ्र विमुआसी भी असम उलमज़ल के मर्जी हैं, यह बात भी अहले हक़ के खिलाफ़ है और जानिब एजाब की तरफ़ मेल रखती है कि रज़ा का मंशा होती है जैसा कि कहते हैं अशराक़ व इज़ात आफताब की मर्जी हैं।

फेअल मौक़त की जज़ा मुख़लिद:

यानी दुनयवी उम्र में चंद साला कुफ्र की सज़ा दाइमी अज़ाब है, और ईमान मौक़त की जज़ा दाइमी तलज़जात यानी जन्नत है , इस का सबब किया है बाज़ मशाइख़ ने फ़रमाया कि जन्नत में दख़ूल दर हक़ीक़त अल्लाह तआला के फजल पर मौक़ूफ़ है और उसे ईमान से इसी लिए वाबस्ता किया गया कि जा आमाल की जज़ा होगी ज़्यादा लजीज होगी , हज़रत मुजद्दिद क़दसरा की दिक्कत नज़र का आप आलम देखें ओला ता आप ने इस जज़ा विसज़ा दाइमी को हक़ सुब्हानहू की तक़दीर के हवाले

किया फिर फ़रमाते हैं"अल्लाह सुब्हानहू की तौफ़ीक़ से हम भी इतना जानते हैं कि कुफ्र इख्तियार करना हज़रत हक़ सुब्हानहू की निस्बत जो कि ज़ाहिरी वबातिनी नेअमतों का अता करने वाला है और आसमानों विजमीन का मौजुद है और हर बुज़ुर्गी विकमाल की है इस मुक़द्दस जनाब के लिए साबित है (ऐसे हक़ सुब्हानहू के) इंकार विकिफ़र की सज़ा वर बदला चाहिए कि सब से सख्त सज़ा हो और वह अज़ाब में ख़ुलूद (विद्वाम) है।"

फिर बाज़ मशाइख़ का मज़कूरा बाला कौल नकल करने के बाद फ़रमाते हैं:"फ़क़ीर के नज़दीक दख़ूल बहिश्त दर हक़ीक़त ईमान से मरबूत है लेकिन ईमान अल्लाह तआला का फजल है और इस का अतीया और दोज़ख में दख़ूल कुफ्र से मरबूत और कुफ्र नाशी(पैदा)है नफ़्स इमारा की ख्वाहिश से

माआसाबुक मिन हसन फमन अल्लाह विमा असाबुक मिन सीय फमन नफ़सिक

जानना चाहिए कि दख़ूल बहिश्त को ईमान से मरबूत करना दरहक़ीक़त ईमान की ताज़ीम है बल्कि मोमिन ब(जिस पर ईमान लाया जाए)की ताज़ीम है कि ऐसा जर अज़ीम अलक़द्र इस पर मित्रत्तिब हुआ है।

इसी तरह दख़ूल नार को कुफ्र से मरबूत करना कुफ्र की तहक़ीर है और इस ज़ात की ताज़ीम है कि जिस की निस्बत यह कुफ्र वाक़्य हुआ है कि इस तौर दाइमी सज़ा इस पर मित्रत्तिब होती है बख़िलाफ़ इस के कि जो बाज़ मशाइख़ ने कहा है कि इस दक़ीक़ा से खाली है नीज़ दख़ूल नार में कि दख़ूल बहिश्त का अदील(मुसावी )है इसी जैसी वजह (जो बाज़ मशाइख़ ने बयान की है) जारी नहीं होसकती है क्योंकि क्योंकि दख़ूल नार दर हक़ीक़त कुफ्र के साथ मरबूत है वाल्लाह सुब्हानहू आलम।"

मोमिनों और काफ़िरों का मआल:

अहले हक़ का अक़ीदा है कि हिसाब विकिताब के बाद एक गिरोह गिरोह जन्नत में जाए गा अवी एक दोज़ख में जो मोमिन हूँ गे जन्नत में जाने के बाद वह हमेशा जन्नत में

रहीं गे और काफ़िर हमेशा दोज़ख में, हज़रत मुही उद्दीन क़ुद्दिस रह से इस मसला में जबरदस्त चौक हुई है उन्हों ने फ़रमाया कि सब का अंजाम रहमत है और आयत करीमा: रहमती वसात कल शे से इस्तिदलाल करदिया ,हज़रत शैख़ ने फ़रमाया कि काफ़िरों को अज़ाब तीन हकबा(यानी दोसु चालीस बरस क्योंकि एक हकबा इसी साल का लिखा है)होगा इस के बाद वह कहते हैं कि आग उन काफ़िरों के हक़ में बर्दोसलाम(यानी ठंडी और सलामती) हो जाए गी, जिस तरह हज़रत इब्राहिम अला नबीना वालैय अस्सलात वस्सलाम पर होगई थी ।

अब उन पर एतराज हुआ कि नसोस क़ुरानीय और हादीस नबूय जगह जगह सराह काफ़िरों के लिए ख़ुलूद फ़ी अलनार बताती हैं और आप यह कह रहे हैं तो उन्हों ने कह दिया कि यह वईदात हैं और वईद में ख़लफ़ जायज़ है यानी इस के खिलाफ़ करना जायज़ है, हद तो यह है कि यहाँ तक कह दिया कि सूफ़िया से कोई भी अज़ाब कुफ़्फ़ार के ख़ुलूद का कायल नहीं है।

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने इस मसला में उन का शदीद रद्द फ़रमाया,आप फ़रमाते हैं:"वसात रहमत मोमिनों और काफ़िरों के साथ दुनिया के साथ मख़सूस है, आख़िरत में काफ़िर को रहमत की बो भी नहीं लगे गी" और फिर इस पर मुतअद्दिद आयात से इस्तिदलाल फ़रमाया है ,ख़याल रहे कि हज़रत मुजद्दिद क़दसरा ने इस मक़ाम पर वईद में ख़लफ़ को वादा में ख़लफ़ की तरह मुस्तलिज़्म किज़्ब ठहराया है, यानी अल्लाह तआला के लिए जिस तरह ख़लफ़ वादा मुहाल है ख़लफ़ वईद भी मुहाल है।

हज़रत शैख़ क़ुद्दिस सिर्रहू ने जिस आयत से ख़लफ़ वईद के जवाज़ केसिलसले में इस्तिदलाल किया था इस का आप ने शाफ़ी जवाब अता फ़रमाया, और रह गया अहले दिल यानी सूफ़िया का इजमा अज़ाब कुफ़्फ़ार के अदम ख़ुलूद के सिलसिले में तो आप फ़रमाते हैं कि यह शैख़ का कश्फ़ है और कश्फ़ में खता की बहुत गुंजाइश है लिहाज़ा इस का कोई शुमार नहीं बावजूदिके यह इजमा के भी खिलाफ़

है, तफ़सील के लिए देखें मक्तूब 266

ख़वास बशर ख़वास मुल्क से अफ़ज़ल हैं:

आम अहले सुन्नत का अक़ीदा है कि ख़वास बशर यानी अंबियाए कराम अलैहिम अस्सलाम ख़वास मुल्क से अफ़ज़ल हैं,मगर इमाम उलहरमें और उन के शागिर्द हज़रत इमाम मुहम्मद ग़ज़ाली और हज़रत शैख़ इब्न अलारबी रहमत अल्लाह अलैहिम इस बात के कायल हैं कि ख़वास मुल्क ख़वास बशर से अफ़ज़ल हैं,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की तहक़ीक़ और उन की मार्फत सब से जुदा गाना है,आप क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं:"वह जो इस फ़क़ीर पर ज़ाहिर किया है यह है कि फरिश्तों की विलायत नबी की विलायत से अफ़ज़ल है अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात, लेकिन नुबुव्वत वरिसालत में ख़ास नबी के लिए ऐसा दर्जा है कि फरिश्ते वहाँ तक नहीं पहुँचे हैं और वह दर्जा अंसर खाक की राह से आया है जो कि बशर के साथ मख़सूस है ,और नीज़ इस फ़क़ीर पर ज़ाहिर किया है कि कमालात विलायत का निस्बत बुकमालित नुबुव्वत कोई शुमार नहीं काश क़तरा का हुक्म रखते दरयाय मुहीत की निस्बत पस जो फ़ज़ीलत की नुबुव्वत की राह से आई कई गुना ज़्यादा होगी इस फ़ज़ीलत से कि राह विलायत से हासिल हो,पस अफ़ज़लीयत मुतल्लक़ा ख़ास अनबया अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात के लिए होगी और फजल जज़ई मलाइका कराम के लिए हेहुला नबीना वालैहिम उलसवात वालतसलीमात,पस दुरुस्त वही है जिस को जमहूर उल्मा ने फ़रमाया शकर अल्लाह तआला सएहम।"

इस तहक़ीक़ से ज़ाहिर होगया कि कोई वली अनबया अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात में से किसी नबी के दर्जा को नहीं पहुँच सकता बल्कि इस वली का सर हमेशा इस नबी के जीर क़दम होगा।

उलमिजाज़ कंतरत उलहक़ीक़त:

मिजाज़ हक़ीक़त का पल है सूफ़िया के दरमियान यह नज़रिया बहुत मशहूर है, नेक विसालिह अफराद ने उसे किसी माना के लिए इस्तेमाल किया हो लेकिन अहले हवस नफ़्स के शिकार ख़ाम सूफ़िया ने इस से जो अंदरूनी ख़ाहिशात की तकमील की राह हमवार की है उसे आप हज़रत मुजद्दिद

क़ुद्दिस सिर्रहू से समाअत फरमाएं" सूफ़िया ख़ाम के अबल्हों (अहमक़ों) ने इस इबारत के माना न समझ कर,हसीन सूरतों से दिल लगी करते हैं और उन के नाज़ वांदाज़ पर फ़रेफ़्ता होते हैं इस लालच में कि उन को वसूल बहक़ीक़त का वसीला बनाएं और हुसूल मतलूब का ज़ीना बनाएं हर गज़ नहीं यह ख़ुद राह मतलूब की रुकावट है और मकसूद के लिए मजबूत माने,एक बातिल है कि उन अहमक़ों की नज़र में मुज़य्यन होगया है और हक़ीक़त के धोके में डाला है , उन में से एक गिरोह ने उन सूरतों के हसन वजमाल को हक़ जल शाना का हसन वजमाल जान कर उन के साथ गिरफ्तारी को उएन हक़ की गिरफ्तारी जानते हैं और उन के मुशाहिदा को मुशाहिदा हक़ समझते हैं उन में से बाज़ ने कहा है।

इमरोज़ चों जमाल तो बे पर्दा ज़ाहिर सत

दर हैरतम कि दावा फ़र्दा बरां चीस्त

तआला अल्लाह उम्मा यकोलोन अलवा कबीरा

हक़ सुब्हानहू व तआला को उन कोताह नजरों ने किया गुमान करलिया है ? शायद नहीं सुना है कि जन्नत की हूरें ऐसी मख़लूक़ हैं कि उन के बालों का एक तार दुनिया में गुरजाए तो इस बाल की चमक और रोशनी की वजह से हरगिज़ दुनिया में रात न हो और तारीकी न हो , कोह तौर के जल जाने का क़िस्सा और एक तजल्ली हक़ जल वाला से टुकड़े टुकड़े हो जाने और हज़रत क्लेम अल्लाह अला नबीना वालैय अलसलाआ वस्सलाम के बे होश जाने और गर पड़ने इस तजल्ली से ब आं क़ुर्ब विमंजिलत नस क़ुरआनी से साबित हुआ है।

और यह इस बे अकली के बावजूद हिम्मा वक़्त बे पर्दा हक़ को देखते हैं और रवैत उखरवी के वादा पर ताजब करते हैं

लकद इस्तिकबरवा फ़ी इंफ्सहम वातो अतवा कबीरा।"

इस मक्तूब ग्रामी के आगाज़ में इस इबारत के माना बयान करते हुए फ़रमाते

हैं:"और जान लीजिए कि मिजाज़ हक़ीक़त का ज़ुल है कि ज़ुल से असल तक कुशादा राह है ,शायद इसी ऐतबार से कहा है :

मिन उर्फ नफिसा फ़क़द उर्फ रब्बा

क्योंकि ज़ुल की मार्फत असल की मार्फत को मुस्तलिज़्म है क्योंकि ज़ुल अपनी असली सूरत पर मौजूद है तो असल के इन्किशाफ़ का सबब होगा , क्योंकि श की सूरत वह है जिस से श मुनकशिफ़ हो लेकिन जान लें कहालमिजाज़ कंतरत उलहक़ीक़पास तक़दीर पर है कि मिजाज़ के साथ गिरफ्तारी दरमियान में न आये बल्कि नज़र सानी तक न खिंचे , पहली नज़र है कि हक़ीक़त का पल है कि मुखबिर सादिक अलैहि वाला आला अस्सलात वस्सलाम ने इस को उलनज़रत उलअव्वला लकफ़रमाया है गोया लफ़्ज़ लुक से इसी दौलत के हुसूल की तरफ़ इशारा फ़रमाया और अगर अयाज़ा बिल्लाह सुब्हानहू मिजाज़ के साथ गिरफ्तारी दरमियान में आगई बल्कि नज़र सानी तक खिंच गई तो वह मिजाज़ वसूल हक़ीक़त के लिए सिद राह होगा पल किया होगा (बल्कि)एक बुत है जो अपनी परस्तिश की तरफ़ बुलाता है और देव है कि हक़ीक़त से फेरता है ,लिहाज़ा मुखबिर सादिक ﷺ नज़र सानी को नुकसान दह जान कर उलनज़रत एलिसानिया इलेक् फ़रमाया कोम सी चीज़ इस से ज़्यादा नुकसान दे गी कि हक़ से बाज़ रखती है और बातिल में गिरफ्तार करती है ।

और जानना चाहिए कि पहली नज़र इस वक़्त नफा बख्श है कि इख्तियार से न हो अगर इख्तियार से होगी तो नज़र सानी का हुक्म रखती है, आयत करीमा:

क़ुल ललममनीन यग़ज़ू मिन अबसारहम

इस मज़लब के इस्बात में काफ़ी है ।"

मक्तूब66 ज3का अक्सर हिस्सा का तर्जुमा आप ने पढ़ा हमें बताने की ज़रूरत नहीं आप ब आसानी समझ सकते हैं कि सूफ़िया कराम की ऐसी इबारात से किस तरह मकारों ने हज़ूज़ नफ़सानी हासिल किए और हसीन मुर्दों और ऊरतों को आंखें फाड़ फाड़ कर देखने की राह

किस तरह हमवार की जबकि सब से ज़्यादा यही चीज़ मुज़रावर नुकसान दह इस उम्मत के लिए हो रही है और हुई है, इस के बुर खिलाफ़ हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने उन बुजुर्गों के ऐसे अक़्वाल की शरई हदूद में मुरादें मुतय्यन फ़रमाकर उन हसन वजमाल के प्रस्तारों लिए चूर दरवाजे बंद करके किस क़द्र इस्लाम वसंत का तोहफ़्ज़ फ़रमाया है ।

जिन्हों ने मक्तोबात शरीफ़ और हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की हयात मुबारका का मुताला किया है वह जानतेहैं कि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू से क़ब्ल के सूफ़िया से कैसी कैसी इबारतें सरज़द हुईं और बाद के लोगों ने फिर किया किया गुल खिलाए मगर हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने ख़ुद तो कभी ऐसी इबारत बोली नहीं जिस से लोग धोका खायें और जिन्हों ने बोली थीं उन के सही माना जो शरीअत से मुतसादिम न हो बयान करके शरीअत वतरीक़त का किस क़द्र तोहफ़्ज़ फ़रमाया है ।

ख़ुदा रहमत कंद एं आशिक़ान पाक तुयन्त रा

बाज़ अहकाम सक्रिय:

सूफ़िया कराम पर एक हालत तारी होती है इस वक़्त उन की अजीब कैफियत होती है,ऐसी हालत में यह लोग बेखुद होते हैं और इस कैफियत से मग़्लूब होकर बाज़ दफ़ा ऐसे कलिमात ज़बान से अदा करदेते हैं जो शरीअत से मुतसादिम या नफ़्स अलामर के खिलाफ़ होते हैं ऐसी हालत को सूफ़िया कराम सकर से ताबीर करते हैं।

जिन के दलों में कजी होती है वह अक़ीसी हालत के अक़्वाल वाफ़आल से नाजायज़ फायदे उठाने की कोशिश करते हैं,दरअसल इस गिरोह की बोली हर मंज़िल की अलग होती है,इस का सही तईएन न करने जी वजह से लोगों ने दो किस्म के धोके खाये एक नतु अहले इल्म ने कि बाज़ बुजुर्गों को तो उन्हों ने काफ़िर तक कह दिया जिन की बुज़ुर्गी और विलायत हद शहरत तक पहुँची हुई थी उन्हें वह काफ़िर कहने से मजबूर हुए तो उन के अक़्वाल वाफ़आल में

दौर अज़कार तावीलात शुरू करदें और इस तरह ला ताइल बहसें वजूद में आगईं।

दोम सूफ़िया ख़ाम ने उन का सहारा ले कर और उन्हें अपना ईमान बनाकर वह कुछ किया कि जिस के ज़िक्र से रूह काँपती है।

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू का एक कारनामा यह है कि आप ने मुख़तलिफ़ विमुतअद्दिद मक्तोबात सूफ़िया कराम की उन बोलियों और खिलाफ़ शरा अक़्वाल वाफ़आल की मंजिलें मुतय्यन करके एक तरफ़ तो उन बुजुर्गों की अज़मत का तोहफ़्ज़ किया और लोगों को उन्हें तान वितशनीअ का निशाना बनाने से रोका तो दूसरी तरफ़ सूफ़िया ख़ाम को ज़लालत विगमरही से बचाया,जेल में हम चंद नमूने पेश करते हैं मुताला फरमाएं।

(1)बाज़ मशाइख़ रहिमहुम अल्लाह वसात क़ल्ब की खबर देते हुए फ़रमाते हैं"अगर अर्श को और जो कुछ इस में है क़ल्ब आरिफ के गोशा में डाल दें तो कुछ महसूस न होगा"हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि जो मशाइख़ अर्बाब सहव हैं वह जानते हैं कि यह हुक्म सकर पर मबनी है और श की हक़ीक़त और इस के नमूने के दरमियान इमतियाज़ न कृपाने पर महमूल है ।

इस खता का सबब दरअसल यह है कि इंसान दरअसल एक ऐसा नुस्खा है जो सब का जामा है जो कुछ तमाम मौजूदात में है वह तन्हा इंसान में हैलेकिन आलम इमकान से बितरीक़ हक़ीक़त और मर्तबा वजूब से बितरीक़ सूरत,इस जामईयत पर इंसान का क़ल्ब है कि जो कुछ इंसान की कलियत में है वह क़ल्ब में तन्हा है इसी लिए क़ल्ब को हक़ीक़त जामिआ कहते हैंक्योंकि क़ल्ब अनासिर वाफ़्लाक और अर्श वक्रसी और अक्ल विनफ़स का जामा और मकान विला मकान को शामिल ,तो अर्श विमाफ़िया ला मकानीयत को शामिल होने की वजह से लाजिमी तौर पर क़ल्ब में कोई मिक़दार नहीं होगी क्योंकि अर्श विमा फिया वसात के बावजूद दायरा मकान में दाखिल हैं, और मकानी हरचंद वसीअ हो तंग है लामकानी के बगल में इस की कोई क़द्र नहीं है,इस वजह से

उन मशाइख़ ने यह हुक्म लगादिया।

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि अर्श मजीद कि ज़ुहूर ताम का महल है इस से बुलंद तर है कि तंग क़ल्ब में इस की गुंजाइश होऔर जो क़ल्ब में अर्श मजीद से दिखाई देता है वह अर्श का उनमोवेज और नमूना है न कि हक़ीक़त अर्श,और कोई शक नहीं कि इस उनमोवेज क़ल्ब के पहलू में कोई मिक़दार नहीं है कि वह बे इन्तहा उनमोज़जों का जामा है ,आईना कि इस में आसमान इस बुराई के बावजूद दीगर इश्याय के साथ दिखाई देता है नहीं कहा जा सकता है कि आईना आसमान से वसीअ तर है,हां! आसमान की सूरत विपीकर कि आईना में है आईना के पहलू में छोटी है न कि हक़ीक़त आसमान।

यह बहस एक मिसाल से रोशन होजाति है, मिसाल के तौर पर इंसान में अंसर खाक का नमूना पोशीदा है ,इंसान की जामईयत के पेश नज़र नहीं कहा जा सकता है कि वजूद इंसान अंसर खाक के करा से वसीअ तर है बल्कि करा अंसर खाक के पहलू में अलावा श हक़ीर के कोई मिक़दार नहीं है बल्कि श के उनमोवेज हक़ीर को श जान कर यह कम वक़ूअ में आया है।

(2)बाज़ मशाइख़ ने ग़लबप सकर में यहा M तक कह दिया कि जमा मुहम्मदी ज़्यादा जामा है जमा इलाही से,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि यह कलाम भी मज़कूरा बाला कलाम के क़बील से है क्योंकि हज़रत मुहम्मद ﷺ को हक़ीक़त इमकान और मर्तबा वजूब का जामा जान कर हुक्म करदिया कि मुहम्मद ﷺ की जामईयत अल्लाह तआला की जामईयत से ज़्यादा है,इस जगह भी सूरत को हक़ीक़त तसोर करते हुए यह हुक्म करदिया ,हज़रत मुहम्मद ﷺ मर्तबा वजूज की सूरत के जामा हैं न कि हक़ीक़त वजूब के और अल्लाह तआला वाजिब उलवजूद हक़ीक़ी है और अगर फ़र्क़ करते हक़ीक़त वजूब और सूरत वजूब के दरमियान तो ऐसा हुक्म नहीं करते ,हाशा विकला मिन हाज़ा अलाहकाम अलसक्रिय।(मक्तूब 95ज1)

(3)बाज़ सूफ़िया ने ख़ल्क़ और ख़ालिक़ के दरमियान इत्तिहाद तक साबित करदिया और मईयत

वगैरह के ज़ाती होने के कायल हुए जैसा कि आप पढ़ चुके यह भी सकर पर मबनी है,आप क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं:"अथाद वायनीयत और निस्बत अहाता विसरियान विमईयत ज़ातीय का इस जगह हुक्म लगाना ग़लबा हाल और सुकरातत् से है।"

सौम वस्ला में सूफ़िया का फ़र्क़:

नमाज़ जैसी अहम इबादत के सिलसिले में बाज़ सूफ़िया ने ऐसी बातें कह कि सूची भी नहीं जा सकती हैं,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू नमाज़ के कुछ कमालात बयान करने के बाद फ़रमाते हैं:"उन सूफ़िया से एक गिरोह को कि जिसे हक़ीक़त नमाज़ से आगाह नहीं किया और इस के कमालात मख़सूसा पर इत्तिला नहीं बख्शी(तो इस गिरोह ने)अपने अमराज़ के इलाजात दीगर उमूर से ढूँढे और अपनी मुरादात का हुसूल दीगर इश्याय से वाबस्ता किया , लेकिन उन में से एक गुरोवे ने नमाज़ को दौर अज़कार जानते हुए इस की बुनियाद गैर और ग़ैरयत पर रखी और रोजा को नमाज़ से अफ़ज़ल समझा ।

साहिब फ़ुतूहात मुक्य(शैख़ इब्न अलारबी)कहते हैं कि रोजा में कि खाना पीना छोड़ना है ,सिफ़त समदेत से मौसूफ़ होना है और नमाज़ में गैरोगैरियत के साथ आना और आबिद और माबूद जानना है,हज़रत मुजददक़दस सिर्रहू फ़रमाते हैं"यह कौल जैसा कि आप देख रहे हैं तौहीद वजूदी पर मबनी है जो कि सकर वालों के हवाल से है।

हक़ीक़त नमाज़ से आगाही न होने की वजह से है कि उन सोफिया से जिम ग़फ़ीर ने अपने इज़तिराब की तस्कीन समाव वनगमा और वज्द अतवाजिद से तलाश की और अपने मतलूब को नग़मों के पर्दों में मुताला किया ,लामुहाला रक़्स वरक़ासी (नाच कूद)को अपनी आदत बनाया बावजूदिके आप ने सुना होगा।

मा जाल अल्लाह फ़ी उलहराम शिफ़ा।