अध्याय 4 में से 57पृष्ठ 51–77
उलमएसो
बादशाह और दीगर अहले स्रोत वहकूमत ज़लालत विगमरही और इस्लाम वसंत से बेज़ारी की किस हद पर पहुँच गए थे यह आप इजमालन पढ़ चुके हैं कहा जाता है : एलिनास अला दीन मलूकहम
(लोग बादशाहों के दीन पर होते हैं) बादशाह अगर नेक है दीन काहामिल है दीनी ख़िदमात क़ल्ब में मोजज़िन हैं तो रिआया को हर मुमकिन तरीका से दीन पर चलाने की कोशिश वसुई करे गा, वसाइल वज़राए जिन से दीन की इशाअत वितरवेज होती है और लोगों को जिन के ज़रिया दीनी अहकाम का पाबंद और आमिल बनाया जा सकता है ख़्वाह बखुशी करें या ना खुशी से तूआ या कहरा ग़रज़कि अर्बाब हुकूमत के पास वह कुव्वत होती है जिस के ज़रिया वह रिआया को जिस नहज पर चलाना चाहें रिआया चले गी अब जब ख़ुद एक शहंशाह का आलम यह होजाए कि वह सिर्फ़ बिगड़े ही नहीं बल्कि लोगों को बिगाड़ने में लगा रहे,गुमराह ही न हो बल्कि गुमराह गर बिन जाए इस्लाम की बेख़ कन्नी जिस का नसब उलऐन हो जाए जो इस्लाम वसंत को ख़त्म करने में मुनज़्ज़म तहरीक चलाए हर वक़्त जिस का मशग़ला ही यह हो कि वह दीन को मिटाने की तमाम तदबीरें करे आप सोच सकते हैं कि इस के असरात किया मुरत्तिब हूँ गे।
पूरे मुल्क में नीचे से ले कर उपर तक हजारों अस्हाब इक़तिदार होते हैं दुनयवी इज्जत व वजाहत और स्रोत विद्वलत के तालिब ओहदों की तलाश में रहते हैं हर गलत से गलत और घनावना काम और हर बुरे से बुरे अम्र का इर्तिकाब करने के लिए तैयार रहते हैं इस अकबर शाही हुकूमत में अपनी कुर्सियों को बचाने के लिए और अपनी क़ुर्बतों और ओहदों के तालिब कितनी तेजी के साथ अकबर के दीन में दाखिल हो रहे हूँ गे,हुकूमत विद्वलत का नशे कोई मामूली खुमार नहीं लाताहै,आज मुशाहदात हमारे सामने हैं उन चीजों की तलब वचाहत किया किया कराती है फिर यह अपने दाता अकबर को खुश करने के लिए किया किया करते हूँ गे यह जो कुछ आप पढ़ चुके और अपने तजुर्बात विमुशाहदात से समझ सकते हैं में यह नहीं कहता कि अकबर के बिगड़ने से हर फ़र्द बिगड़ गया था लेकिन इतने तवील दौर हुकूमत में जो बादशाह इस तरह इस्लाम को ख़त्म करने में लगा हो इस से कितने बिगड़े हूँ गे इस का भी पता आसान नहीं लेकिन हर समझ दार अंदाजा कर सकता है
कि अर्बाब इक़तिदार के बिगड़ने से रिआया किस क़द्र बिगड़ती है ।
इस बादशाह और इस के हव्वारियों को बिगाड़ने में सब से बड़ा हाथ उलमा-ए सौ का था जैसा कि आप पढ़ चुके,इज्जत वजाह और हुकूमत वस्रोत के यह तालिब, दुनिया के कुत्ते अपने मक़ासिद और मादी मनफ़ातों की तहसील में किया किया नहीं करते थे ,अहकाम शरा की वक़ात दलों से उन्हों ने निकाली,मुनाज़रों विमबाहिसों में एक दूसरे पर तान वितशनीअ करके ख़ुद को बे वक़ात उन्हों ने किया,शरीअत को अपने ताबे करके जो चाहा फ़तवा दे दिया जिस में दुनिया का भला देखा जिस में बादशाह की ख़ुशनुदी नज़र आई वह यह हुक्म सादर करादेते साथ में बातिल दलायल के यह अंबार भी लगा देते।
डाढ़ी जैसी अज़ीम सुन्नत और अनबीए कराम की प्यारी चीज़ को जब मिटाने पर आये तो वह अकली विनकली दलायल क़ायम किए कि लोग सर पीटते रह जाएँ,अकबर जो हुक्म देता ,उद्यान बातिला से वह जो इख्तियार करता यह दुनिया के पुजारी फोरा लब्बैक कह कर दलायल की बहुतात शुरू कर देते,कहीं सौदी कर्ज हलाल कर रहे थे कहीं मता जायज़ कर रहे थे कहीं शराबें हलाल कर रहे थे उलग़र्ज़ हर तरफ़ उन उलमा-ए सौ ने कुहराम मचा रखा था, दीन को बर्बाद करने के लिए नित नये फ़ित्ने यह जन्म देते थे ,हज़रत मुजद्दिद उन के हाल पर मातम करते हुए फ़रमाते हैं:
जो उलमा इस बुला में मुबतला हैं और इस दिनी (हक़ीर) की मुहब्बत में गिरफ्तार हैं वह उलमाएदनिया से हैं यही लोग उलमा-ए सौ,बदतरीन मर्दुम और दीन के चूर हैं और हाल यह है कि यह लोग ख़ुद को दीन का मुक़तदा जानते हैं और बेहतरीन ख़लाइक़ समझते हैं।
वेहसिबोन अन्हम अला शे उला अन्हम हम उलकाज़बून इस्तिहवज़ अलैहिम उलशेतान फ़ांसाहम ज़िक्र अल्लाह ओलाइक हिज़्ब उलशेतान उला उन हिज़्ब उलशेतान हम अलख़ासरून
यानी यह लोग अपने आप को कुछ समझते हैं खबरदार! यही लोग झूटे हैं उन पर
शैतान ग़ालिब आज्ञा तो इस ने उन्हें अल्लाह का ज़िक्र भला दिया यही लोग शैतान का गिरोह हैं,खबरदार शैतान का ही गिरोह घाटा पाने वाला है।’’
एक बुजुर्ग ने शैतान को देखा कि खाली बैठा है और तज़लील वाग़वा(गुमराह गिरी)से खातिर मुतमइन किए हुए है,इस बुजुर्ग ने इस का राज़ पूछा तो इस मलऊन ने कहा कि इस वक़्त के उलमा-ए सौ ने इस काम में मेरी बड़ी मदद की है और मुझ को इस मुहम से फ़ारिग़ करदिया है(आखिरी अलफ़ाज़ यह हैं)वालहक़ दरें ज़मान हर सस्ती विमदाहंती कि दर उमूर शरएहि वाक़्य शुदा अस्त व्हर फतूरे कि दर तरवेज मिलित विदीन ज़ाहिर गश्ता अस्त हिम्मा अज़ शोमि उलमा-ए सौ अस्त वफसाद नयात ईशां(मक्तूब 33 ज 1)
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने इस इजमाल में इस दौर के उलमा-ए सौ की पूरी तारीख समेट दी है जो कुछ बिगाड़ और फसाद हुआ,इस्लाम वसंत के नूर से लोग महरूम हुए और दीन रो ब ज़वाल हुआ यह सब उलमा-ए सौ की बद बुख़ती और उन की नीयतों के फसाद की वजह से हुआ ,जो कुछ हुआ इस का मुख़्तसर खाका आप पढ़ चुके ।
मक्तूब 47 में यों नोहा कना M हैं‘‘गुज़श्ता जमाने में जो भी बुला आई इसी जमात(उलमा-ए सौ)की नहूसत से थी बादशाहों को भी यही लोग राह से ले गए,बेहतर फ़िरक़े जिन्हों ने गुमरही का रास्ता इख्तियार किया है उन के रहनुमा उलमा-ए सौ थे,उलमा के अलावा जो भी गुमराह हुआ कम ही इस की गुमरही का असर दूसरों पर पड़ा हो।
एक जगह फ़रमाते हैं''दुनिया की मुहब्बत और इस की तरफ़ रगबत उल्मा के चेहरा कमाल के लिए बद नुमा दाग है मख़लूक़ को अगरचे उन से फ़वाइद हासिल होते हैं लेकिन उन का इल्म उन की ज़ातों के हक़ में नफा बख्श साबित नहीं हुआ हर चंद शरीअत की ताईद विमलत की तक़वियत उन पर मित्रत्तिब है मगर बहुत मर्तबा अहले फ़ुजूर और अर्बाब फ़ुतूर से भी यह ताईद वितक़वियत हासिल हो जाती है जैसा कि सय्यद अलांबिया ﷺ ने इस मर्द फ़ाजिर के बारे में
‘‘उन अल्लाह लीउएद हाज़ा उद्दीन बालर्जिल अल्फ़ाजर’’
यानी बेशक अल्लाह तआला इस दीन की ताईद फरमाता है फ़ाजिर शख्स से, यह लोग सिंग पारस की तरह कि तांबा, लोहा और जो कुछ इस को पहुँचता है सोना हो जाता है और वह ख़ुद अपनी ज़ात के हक़ में पत्थर है,इसी तरह वह आग जो कि पत्थर और बांस में वदीअत की गई है आलम को इस आग से मनाफ़े का हुसूल है मगर वह पत्थर और बांस इस अंदरूनी आग से महरूम हैं बल्कि में कहता हूँ कि यह इल्म उन की ज़ातों के हक़ में नुकसान दह है कि उन पर हुज्जत को पूरा करदिया है(हदीस भी यही है)
उन अशद एलिनास अज़ाबा यूम उलक़याम आलम लिम युनिफ़ा अल्लाह बालमा
यानी कयामत के दिन सब से सख्त अज़ाब इस आलम को होगा जिस को अल्लाह तआला ने इस के इल्म से नफा नहीं दिया।
नुकसान दह क्यों न होगा जो इल्म कि ख़ुदाए इज़ विजल के नज़दीक अजीज़ और मौजूदात में अशरफ है इस को कमीनी दुनिया यानी माल वजाह और रियासत के लिए ज़रिया बना लिया है हालाँकि दुनिया हक़ तआला के नज़दीक ज़लील वख़्वार है और मख़लूकात में बद तरिन है तो अल्लाह तआला के अजीज़ को ख़वार करना और इस के ज़लील को इज्जत देना बे इन्तहा क़बीह है और दर हक़ीक़त हक़ तआला के साथ मुकाबला है और तदरीस वाफ़्ता इस वक़्त नफा देता है जबकि खालिसा लोजह अल्लाह हो हुब्ब जाह विरियास्त के शाइबा और माल वरीअत के हुसूल से खाली हो इस खाली होने की अलामत दुनिया में ज़हद(बे रग़बती) और दुनिया विमा फ़ीहा से बे रगबत होना है।’’
बात अगर चह तवील हो गई है मगर है काबिल इबरत, किया इस जमाने में जो उलमा-ए सौ ने किया आज नहीं कर रहे हैं? आज भी वही कर रहे हैं दुनिये दिनी के इक़तिदार विमन्सब को हासिल करने में किया किया नहीं कर रहे हैं ,नफ़्स इमारा के ग़लबा,इल्म
के गुरूर ने इख़तिलाफ़ात वांतुशारात का धारा खोल दिया है,मामूली मामूली बातों पर झगड़े,एक दूसरे की तज़लील वितफ़सीक़ और ख़ाहिशात नफ़्स के साँचे में अहकाम शरएहि को ढालना,हुसूल ज़र विमाल के लिए तमाम तरह के हीले बहाने निकालना,अपने आगे किसी की इज्जत विवक़ार को बर्दाश्त न करना ,एक दूसरे की तज़हीक वितज़लील करना ,वाज़ों,तकरीरों और तहरीरों को तहसील दुनिया का वसीला बनाना,अहकाम शरएहि को तोड़ मरोड़ कर बयान करना आखिर वह कौन सा क़बीह फेअल है जो इस जमात से सादर नहीं हो रहा है,उन की वजह से मदारिस तबाह हो रहे हैं,इल्म उठता जा रहा है,जिस फन से दुनिया के हुसूल की ज़्यादा आस है इस को अपनाते हैं,जो जलसे वगैरह तबलीग़ दीन वितरवेज शरीअत के लिए थे आज उन में गले फाड़े जाते हैं तो दुनिया के लिए,मनबरों पर एक दूसरे को ज़लील करते हैं तो दुनिया के लिए,मोशगाफियाँ दिखाते हैं तो दुनिया के लिए हत्ता कि काफ़िरों से सौदे बाजी करते हैं,क़ौमों को बेचते हैं और चंदों से पेट भरते हैं।
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू भूले इंसानों को आगाह फ़रमारहे हैं कि तुम उन के दीनी कामों से धोका न खाना,तदरीस वाफ़्ता की खिदमतें देख कर मुतास्सिर न हो जाना,वाज़ वितकरीर की शीरीं बयानी से अपने आप को उन के हवाले न करदेना यह दीन के डकैत हैं,चूर हैं राह ज़िन हैं,सारा ख़सारा उन ही से है,बिगाड़ उन्हें से है,ख़याल रहे यहाँ उन उलमा की बात हो रही है जो अक़ाइद की सेहत वस्सलामती के साथ आमाल की बजा आवरी में कोताह हैं,ख़िदमात दीनी को तहसील माल वुज़र का ज़रिया बना रखा है,ऐसे उलमा से कुछ दीनी काम भी होते हैं,बजाहिर ख़िदमात भी अमल में आती हैं मगर ख़िदमात उन की ख़ुदा रसीदगी की दलील नहीं ,उन का मयार यही है अगर वह दुनिया विमा फ़ीहा से बे रगबत हैं तो समझ लो तुम्हारे रहबर हैं,उन की सोच और फ़िक्र और सारी क़ुव्वतें खालिस रज़ाए इलाही के लिए सिर्फ़ होती हैं तो तुम्हारे मुक़तदा हैं,ख़ुद अमल करके दूसरों को अमल कराके तरवेज शरीअत
वाशाअत इस्लाम में लगे हैं तो वह वारिस अनबीए कराम हैं अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात वर्ना वही हैं जो बयान हो चुका।
उन उलमा की बात नहीं है जिन्हों ने गलत और फ़ासद अक़ाइद अपना लिए हैं अहले सुन्नत विजमाअत से हट गए हैं,हज़रत मुजद्दिद उन को उमूमा ज़ाल मुज़िल से ताबीर फ़रमाते हैं यह लोग भी दो तरह के इस जमाने में थे जिन से फसाद होरहा था,अवाम बिगड़ रही थी,बादशाह और इस के हवार यन गुमराह हो रहे थे।
एक वह जो मंतिक़ वफ़लसफा को अपना पेशवा बनाए हुए थे अकलियात के दिलदादा, इस्लामी उसूल वुज़ूइबत को अकली पैमानों पर नापने वाले,मंतिक़ वफ़लसफा के मज़ख़रफ़ात को अटल और मुहकम तसोर करने वालेथे और इस के सारे असल वुज़ूइबत की सेहत पर ईमान रखते थे।
दोम रवाफ़िज़ विशीया जिन का सारा नसब उलऐन सहाबा कराम बिलख़सूस ख़ुलफ़ा सलासा वगैरह रिज़वान अल्लाह अलैहिम अजमईन की तौहीन वतन्क़ीस,अहले सुन्नत विजमाअत की तज़लील और उन की तबाही को ही मक़सद ज़िन्दगी बना रखा था ,निहायत दिल आजार बातें बकना और उन बुजुर्गों की अज़मत दलों से निकालना ही उन का शेवा था हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने तफ़सील से सब की खबर ली है।
मंतिक़ वफ़लसफा के हमले:
अल्लाह तआला की ज़ात वस्फ़ात के सिलसिले में फलसफा ने जो ज़लालत विगमरही इख्तियार की है और जिस क़द्र घटिया तसोर ज़ात वस्फ़ात का पेश किया है इस के बयान से रोंगटे खडे हो जाते हैं एक ममन की गैर त कभी भी उन बातों को सुनना ग्वारा नहीं करे गी ,मसलन इस का अक़ीदा है कि अल्लाह तआला ने सिर्फ़ एक अक्ल पैदा की ।
दोम: यह कि यह अक्ल भी बितरीक़ एजाब वजूद में आई बालाख्तियार नहीं।
सोम: इस का कहना है कि सारे हवादिस अक्ल फ़आल से वजूद में नहीं आए
चहारम: अल्लाह तआला के बारे में इस का अक़ीदा है कि इस को जज़ईआत मुतग़य्यरा का इल्म नहीं होता है ।
पंजिम: कुरआन वसंत में बयान किया गया है कि कयामत के दिन आसमान फट जाएँ गे सितारे झड़ जा ईं गे,पहाड़ रेज़ा रेज़ा हो जाएँ गे,दरिया जारी हो जाएँ गे यह सब बातें नस क़तई से साबित हैं मगर फिलासफा इस के मुनकर हैं।
शुशम: अजसाम के भी हश्र के मुनकर हैं।
हफ़तुम: यह लोग आलम को इस के तमाम अजज़ा के साथ हादस नहीं मानते हैं यानी अक़ूल विंफ़ूस और सूरत व्हियौला के क़दीम होने के कायल हैं।
हशतुम: अल्लाह तआला की सिफ़ात के बारे में यह लोग कायल हैं कि वह खारिज में वजूद ज़ाइद के साथ मौजूद नहीं ब अलफ़ाज़ दीगर नफ़ी सिफ़ात के कायल हैं।
नहम: मेराज जिस्मानी के मुनकर हैं,उलग़र्ज़ दीन वायमान की जिन बातों पर बुनियाद है उन बे वक़ूफ़ों ने उन में वह तलबीस वितख़लीत की है और ज़लालत विगमरही का वह रास्ता इख्तियार किया है कि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू को लिखना पड़ा''एं बे दौलतां दर हमक़ व बलदहित पेश क़दम फ़र्क़ ज़लालत इंद काफिरां इल्तिजा बहज़रत हक़ सुब्हानहू व तआला मि आमदनद विदफा बल्य अज़ अव तआला मि तलबंद बख़िलाफ़ एन सफ़ेहान,दो चीज़ दरें बेदौलतां अज़ जमी फ़र्क़ ज़लालत वबलदहित बेशतर अस्त यके कुफ्र वानकार अस्त ब अहकाम मंज़िला वानाद वादावत अस्त बाख़बार मुर्सला,दोयम तरतीब मुक़द्दमात फ़ासदा अस्त वतलबीस दलायल विशवाहिद बातिला वास्बात मक़ासिद विमुतालिब वाह्य आं क़द्र जब्त दर इस्बात मक़ासिद ख़ुद कि ईशां ख़ूर्दा इंद हेच सफ़ीहे नख़्वर्दा।(मक्तूब 266 ज 1)
यानी यह बे दौलत हिमाक़त वबे खुर्दी में गुमराही के तमाम फ़िर्क़ों से आगे हैं,काफ़िर अल्लाह इज़ विजल की बारगाह में इल्तिजा करते हैं और इस से बुलाओं का दफा तलब करते
हैं बख़िलाफ़ उन बे वक़ूफ़ों के,दो चीजें उन बे दौलतों में गुमराही और हिमाक़त के तमाम फ़िर्क़ों से ज़्यादा है एक नाज़िल शुदा अहकाम का इंकार और उन के साथ कुफ्र और अखबार मुर्सला के साथ इनाद विदुश्मनी दोम फ़ासद मुक़द्दमात की तरतीब और बातिल दलायल विशवाहिद की तलबीस और कमजोर मक़ासिद विमुतालिब का इस्बात है कि अपने मक़ासिद साबित करने में जिस क़द्र ख़बत(पागल पन) उन लोगों ने खाया है किसी नादान ने नहीं खाया है।
बतौर नमूना फिलासफा के यह चंद अकीदे सुपुर्द कलम कर दिए,इस गिरोह ने अक़ाइद की बुनियादों को बे पनाह मुतज़लज़ल किया और लोगों को तश्कीकात की वादियों में भटकाया,यकीन वाज़ान के नूर से महरूम किया और तदकीक़ात वित्तहक़ीक़ात के नाम पर हिमाक़तों के वह अंबार लगाये कि हर सलेम अलतबा उन की बे खुर्दी पर मातम करे,उलमा में देनदारी वललाहीत इसी ने ख़त्म किया ,इसी ने उन्हें मुतकबर बनाया,मोशगाफ़ियों और कज बहसयों के दरवाजे इसी ने खोले उलग़र्ज़ किया किया कहा जाए जो शनाअतें वक़बाहतें मुसलमानों में यह लाया कोई नहीं लाया।
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू का दर्द पढ़िए तो आप को मालूम होगा कि अक्सर उलमा पर इस का भूत किस क़द्र सवार था और मुनाज़रात विमबाहिसात में यह गिरोह किस तरह भटक गया था,अकबर को बिगाड़ने में और अक़ाइद में तज़बज़ब का शिकार करने में इस ने किस क़द्र रोल अदा किया है यही वजह है कि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने इस का बहुत शदीद रद्द फ़रमाया है और इस के असरात बद से खूब खूब आगाह किया है,अकबर ने अगरचे शिर्क अपना लिया था मगर अल्लाह सुब्हानहू व तआला के बारे में इस क़द्र बे हौदा बातें न बिकी थीं और न ख़ुदा का इतना घटिया तसोर पेश किया था जितना कि फलसफा ने किया।
सूफ़िया ख़ाम:
अकबर के दौर में एक गिरोह और भी था जिस की वजह से दीन को बहुत नुकसान हो रहा था ,अल्लाह तआला की ज़ात वस्फ़ात के बारे में जो तस्वरात इस जमात ने पेश किए
थे उन में फलसफा की काफ़ी आमेज़िश और हम आहंगी थी और असली हक़ीक़त तक ना रसाई की बुनियाद पर असनाए राह के कुछ मक्शफ़ात विमुशाहदात गलत वसहीह के ज़रिया जिन उमूर का इर्तिकाब किया और जिन नज़रियात वाक़ाइद की यह जमात हामिल होगई थी वह इस्लाम के लिए कोई मामूली अलमीया न था ,जिन बिद्दतों और ज़लालतों को यह जमात रिवाज दे रही थी और उन से अक़ाइद वामाल के सिलसिले में अवाम में जो गलत फहमियां फैल रही थीं वह दीन के लिए बे पनाह मुज़िर और नुकसान दह थीं।
ख़याल रहे कि सूफ़िया के नाम से जो लोग मारूफ़ विमशहूर थे उन को तीन हिस्सों में तकसीम किया जा सकता है,एक वह थे जो इल्म वामल में निहायत कमजोर और गैर पुख्ता थे और अकाबिर की बाज़ इबारतों से उन लोगों ने बड़े गलत अक़ाइद वंज़रियात का अक़ीदा क़ायम करलियाथा शरई उमूर उन की नज़र में कोई हैसियत न रखते थे,रसूम वबदात में यह लोग क़ुर्ब, वस्ल और इरफान तलाश करते थे,उन्हें को रिवाज देते थे,यही वह गिरोह है जिस को हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू सूफ़िया ख़ाम के नाम से ताबीर फ़रमाते हैं,उन में उन लोगों को भी दाखिल किया जा सकता है जो अपने बाज़ अकाबिर के कुछ अक़्वाल वाफ़आल जो कि किसी अकीदत या मस्लिहत या असनाए राह कुछ मकाशफ़ात जो उन से ज़ाहिर हुए,से ना जायज़ फायदे अठारहे थे और खिलाफ़ शरा अक़ाइद वामाल के मुर्तक़िब हुए,उन हज़रात ने उन उमूर को अपना लिया था जिस में नफ़्स की सहूलत का सामान था और नफ़्स की मशक्कत वाले उमूर से कोई ताल्लुक नहीं था जैसा कि आज भी ऐसे बहुत हैं।
दोम: वह बुज़ुर्गान दीन जो इल्म वामल में पुख्ता और साहिब कश्फ़ विमुशाहिदा थे इस मंज़िल पर पहुँचने से क़ब्ल जहां मआरिफ़ वहक़ायक़ शरीअत के मुताबिक होते हैं उन बुजुर्गों से ऐसे ऐसे मआरिफ़ वहक़ायक़ और मक्शफ़ात सरज़द हुए जो मुसलिमात से टकराते थे या असनाए राह से ताल्लुक रखते थे,हक़ीक़त हाल कमा हुक्का उन बुजुर्गों पर मुनकशिफ़ न होने की
वजह से उन उमूर का सदूर हुआ अगर चह यह हज़रात मुख़लिस थे,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू बड़े एहतिराम से और उन की शख्सियतो M का लिहाज करते हुए उन तमाम बातों का तफ़सीली रद्द फ़रमाते हैं जो अलूहियत विनबूत के शायान शान नहीं,इस किस्म के उमूर बहुत हैं।
सोम: वह हज़रात हैं जो इल्म वामल में पुख्तगी के साथ साथ मआरिफ़ वहक़ायक़ को हमेशा शरीअत के ताबे रखते थे और खिलाफ़ शरा मक्शफ़ात पर ध्यान नहीं देते थे और इस्लाफ़ के खिलाफ़ शरा अक़्वाल वाफ़आल में मुनासिब तावीलात से काम लेते थे,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ऐसे बुजुर्गों की सोहबत को कबरीयत अह्मर से ताबीर फ़रमाते हैं और जगह जगह उन की सोहबत वख़दमत के इल्तिज़ाम को ज़रूरी करार देते हैं यह तबका आप के जमाने में निहायत नादिर उलवजूद था ।
सूफ़िया ख़ाम की जमात के अफराद चूंकि ज़ाहिरन तक़्वा विपर्हेज़गारी और रस्मी इबादात विमुजाहिदात के हामिल होते हैं इस लिए उमूमन अवाम के दलों में उन की क़द्र होती है,मकाशफ़ात विमिआयनात और दीगर ख़वारिक़ आदात का ज़ुहूर होता रहता है इस लिए क़ुर्ब वारफान में उन की रसाई अवाम में मशहूर होती है और इसी वजह से लोगों की गर्वीदगी भी होती है।
फिर उन सूफ़िया ख़ाम को एक जबरदस्त फायदा यह पहुँचा कि उमूमा वासलान हक़,औलीए कराम और अल्लाह तआला के मुक़र्रब बंदे चूंकि सूफ़िया के नाम से जाने पहचाने गए हैं,यह जमात अपने आप को इसी नाम से मौसूम करती थी और उन्हें की तक़लीद की दावेदार थी,उन्हें के लिबास में मलबूस रहती थी इसी लिए अवाम को ऐसे लोगों से बहुत धोके हुए,इस दौर में इस जमात ने किया रोष इख्तियार कर रखी थी इस की थोडी दास्तान आप हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की जुबानी समाअत फरमाएं:
तौहीद वजूदी से कुछ सूफ़ियों ने ऐसे गलत मफ़हूमात पैदा किए जिन की वजह से वह
कुफ़र्यात तक का इर्तिकाब कर बैठे और हर चीज़ को ख़ुदा कह बैठे,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू तौहीद के इक़साम तफ़सील से बयान करने के बाद फ़रमाते हैं कि उन उलूम ग़ामज़ा को बयान करने की वजह यह है कि
‘‘अक्सर अबनए वक़्त बाज़े ब तक़लीद बाज़े ब मुजर्रिद इल्म बाज़े दीगर ब इल्म मुमतजिज बज़ौक़ विलो फ़ी अलजुमला वबाज़े ब इलहाद वजंदक़ा दस्त बदामन एं तौहीद वजूदी ज़दा इंद वहमा रा अज़ हक़ मि दानंद बल्कि हक़ मि दानंद।’’(मक्तूब43 ज1)
तर्जुमा:इस जमाने के अक्सर लोग जिन में बाज़ तो बितरीक़ तक़लीद और बाज़ महज़ इल्म के जोर पर और कुछ दूसरे ज़ौक़ आमेज़ इल्म की बुनियाद पर ख़्वाह जितना भी हो और कुछ लोगों ने इलहाद वजंदक़ा के तौर पर तौहीद वजूदी के दामन को पकड़ना चाहा है और सब को हक़ से जानते हैं बल्कि सब को ख़ुदा समझते हैं।
ऐसे सूफ़िया ख़ाम इस जमाने में भी बहुत हैं में ने ख़ुद देखा है ऐसे जा हलों को ,ख़ुद मुझ से कहने लगे दरख्तों मकानों वगैरह की तरफ़ इशारा करके कि यह भी ख़ुदा है वह भी ख़ुदा सब कुछ ख़ुदा है नऊज़ बिल्लाह फिर सिर्फ़ कहने ही पर इकतिफ़ा नहीं बल्कि एक साहिब ने तो एक किताबचा भी अपने दावे के सबूत में पेश करदिया और इस को वह मार्फत ख़ास तसोर कर रहे थे जो इल्म की अक्ल वादराक से मावरा और इल्म लदनी था।
इस जमाने में कण वजूह से यह जाहिल एक महवर पर जमा हुए थे हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने इस मुख़्तसर इबारत में सब कुछ बता दिया है,आज भी उन बातों में वही असबाब हैं,इस से जो गलत फ़वाइद उन्हों ने हासिल किए इस में एक यह भी था ‘‘गरदनहाए ख़ुदरा अज़ तकलीफ़ शरई ब एं हीला मि कुषादनद विमदाहनात दर अहकाम शरएहि मि नमाईंद’’यानी अपनी गर्दनों को इस हीला के ज़रिया शरई क़वानीन की पाबंदी से आजाद करते हैं और शरई अहकाम में सस्ती और मदाहंत से काम लेते हैं।
और सितम बालाए सितम यह कि इस हीला साज़ी पर निहायत खुश विमसरूर और आख़िरत की फ़लाह वबहबूद अपने ही लिए समझते थे,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं:
‘‘वबायं मामला खुश वक़्त वख़ोरसंद वात्यान अवामिर शरएहि रा अगर एतराफ़ दारणद तुफ़ैली मि दानंद मकसूद असली विराए शरीअत ख़याल मि कनंद।’’
तर्जुमा: उन सब के बावजूद यह लोग खुश और मगन हैं अहकाम शरएहि के बजा लाने का अगर एतराफ़ भी करते हैं तो उसे तुफ़ैली समझते हैं जब कि शरीअत के मावरा को मकसूद असली ख़याल कर बैठे।’’
आप देख रहे हैं रसूल ﷺ ने दुनयवी वाख़िरवी फ़लाह विकामयाबी की जमानत इत्तिबा शरीअत से वाबस्ता की थी,मगर दीन के उन डकैतों ने उसे कुलअदम करार दे दिया और कह दिया कि इस की हैसियत तो सिर्फ़ एक तुफ़ैली की है मकसूद असली इस के अलावा है।
(2)उन सूफ़िया ख़ाम की एक बड़ी कमज़ोरी यह थी कि बुजुर्गों के कलाम को अच्छे महम्मल पर महमूल करने के बजाए अपने मुख़तरआत विमज़ऊमात के साँचे में ढालते थे और अपनी ख़ाहिशात के मुताबिक जो अक़ाइद गढ़ लिए थे बुजुर्गों के अक़्वाल उन्हें के मुताबिक करते थे ।आप क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं:
‘‘दरें ज़मान बसयारे अज़ीन ताइफा कि बिज़ी सूफ़ियान ख़ुद रा वा मि नमाईंद,तौहीद वजूदी रा शाय साख़ता इंद विकमाल रा जुज़ आं निमी दांद वबइल्म अज़ उएन बाज़ मांदा इंद व आन अक़्वाल मशाइख़ रा बमआनी मुतख़ीला ख़ुद फदरूद आवर्दा मुक़तदए रोजगार ख़ुद साख़ता इंद वबाजार कासदखुद रा इल्म बायं तख़ीलात राइज दाश्ता इंद’’
तर्जुमा:यानी इस जमाने के बहुत से लोग जो ख़ुद को सूफ़ियों के लिबास में ज़ाहिर करते हैं,तौहीद वजूदी को शाय किया है और कमाल को इस के अलावा नहीं जानते
हैं और इल्म अलीक़ीन की वजह से उएन अलीक़ीन से बाज़ रहे हैं, उन्हों ने मशाइख़ के अक़्वाल को अपने खयाली माअनों में ढाला है,अपने आप को मुक़तदए रोजगार बनाया है,अपने खोटे बाजार को उन खयालात से राइज रखा है।
(3)उन सूफ़िया ख़ाम ने किया किया इस जमाने में गुल खिलाए थे और अवाम को किस कार ज़लालत में ढकेल रहे थे और सूफ़ियाना वज़ा वक़ता से माल वुज़र की तहसील और दौलत दुनिया को बटोरने के चक्र में इस्लाम को किस तरह बर्बाद कर रहे थे इस का अंदाजा आप इस बात से कर सकते हैं कि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू मक्तूब 47 में इस्लाम की ज़बूँ हाली और फ़ित्ना अकबरी की रूदाद शैख़ फरीद को सुनाने और उलमा-ए सौ की दसेसा कार्यां सुनाने के बाद तहरीर फ़रमाते हैं:
‘‘वाक्सर जहलाए सोफी नुमा एं ज़माना हुक्म उल्मा सौ दारणद,फसाद अनहा नीज़ फसाद मुतअद्दी अस्त’’
यानी इस जमाने के अक्सर सोफी नुमा जाहिल उलमा-ए सौ का हुक्म रखते हैं,उन का फसाद भी मुतअद्दी फसाद है,इबारत का लब विलहजा बता रहा है कि इल्म वामल से कोरे उन सूफ़ियों ने किया किया,अगर अकबर को ज़लालत विगमरही का मुजस्समा बनाने में एक बाजू उलमा-ए सौ थे तो दूसरे यही सूफ़िया ख़ाम।
आज भी आप देखिए सूफ़ियाना वज़ा क़ता अपना कर पेरी मुरीदी का ढोंग रचा कर अपनी जहा लतों पर पर्दे डाल कर किस तरह अवाम को राह हक़ व सवाब से भटका रहे हैं,अब कुछ उन का जुज़वी किरदार भी सन लीजिए कि यह किया किया करते थे और मुरीदों से करवाते थे और कितनी कितनी गलत बातें कह जाते थे, मौलाना हसन कश्मीरी ने हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू को एक अरीज़ा तहरीर किया इस में लिखा था आप फ़रमाते हैं:
(4)''नविश्ता बोदनद कि शैख़ अब्द अलकबीर यमनी गुफ़्ता अस्त कि हक़ सुब्हानहू व तआला आलम बग़ैब
नेस्त'' यानी आप ने लिखा था कि शैख़ अब्द अलकबीर यमनी ने कहा है कि हक़ तआला आलम ग़ैब नहीं है।
हज़रत यमनी के फ़ज़ाइल अगरचे बाज़ बुजुर्गों ने बहुत लिखे हैं मगर यहाँ बहस बुज़ुर्गी से नहीं बल्कि शरई पैमाने और मुहम्मदी मेज़ान पर अक़्वाल वाफ़आल नापने और तौलने की है,रग फ़ारूक़्यत फ़ौरन हरकत में आई और इस मुक़द्दस बारगाह में ऐसे कलिमात सुनने की ताब कहां।जरा अंदाज़ बयान देखें!
''मख़दूमा फ़क़ीर रा ताब इस्तिमा इमसाल एं सुख़नान असलन नेस्त बे इख्तियार रग फ़ारूक़ीम दर हरकत मि आयेद वफ़रसत तावेल वित्त्वजेह आं निमी दहद,कायल आं सुख़नान शैख़ कबीर यमनी बाशद या शैख़ अकबर शामी कलाम मुहम्मद अरबी अलैहि वाला आला अस्सलात वस्सलाम दरकार आस्त न कलाम मुही उद्दीन अरबी वस्दरुद्दीन कौंवी वाबद अलर्ज़ाक काशी मारा बंस कार अस्त न बफ़स फ़ुतूहात मदनीय अज़ फ़ुतूहात मुक्य मस्तग़नी साख़ता अस्त(मक्तूब100 ज1)
तर्जुमा:ए मख़दूम! फ़क़ीर को इस जैसी बातें सुनने की बिलकुल ताब नहीं है मेरी रग फ़ारूक़ी बे इख्तियार हरकत में आती है और ऐसी बातों की तावेल वित्त्वजेह की फुर्सत नहीं देती है ,उन बातों के कायल शैख़ कबीर यमनी हूँ या शैख़ अकबर शामी मुहम्मद अरबी ﷺ का कलाम दरकार है न कि मुही उद्दीन इब्न अरबी ,सदरुद्दीन कौंवी और अबदुलरज़ाक काशी का मुझ को नस से काम है न कि फ़स(फ़सूस अलहकम)से मदनी फ़ुतूहात ने फ़ुतूहात मुक्य से बे नयाज़ करदिया है।
इस कलाम का हक़ीक़ी लुत्फ़ तो अहले इल्म ही उठा सकते हैं,आह! हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की ग़ैरत एमानी का नजारा देखिए,बात किसी की भी हो अगर गलत है तो गलत है इस में हीला साज़ी नहीं,फ़ुतूहात मदनीय ने वह शरह सदर अता किया था, वह वसातें दी थीं और वह कमाल बख्शा था कि सब से बे नयाज़ करदिया,यहाँ मयार मदनी मेज़ान है जो इस पर खरा वह
खरा,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू का यही मयार है यह मामूली बात नहीं फ़ुतूहात मदनीय के जलवे आप आगे देखें गे।
(5)कुछ बुजुर्गों ने ग़लबा हाल वस्कर में कुफ्र और ज़नार बांधने तक की मदह वितारीफ़ करदी है,एक बुजुर्ग फ़रमाते हैं:
कुफ्रत बद्दीन अल्लाह वालकुफ़र वाजिब लदी वांद उलमुस्लिमीन क़बीह
यानी में ने अल्लाह के दीन के साथ कुफ्र किया और मेरे नज़दीक कुफ्र वाजिब था और मुसलमानों के नज़दीक क़बीह है।
बुजुर्गों की उन बातों को इस जमाने के ऐसे सूफ़ियों ने ईमान बना लिया है और देर वहरम,काबा वबत ख़ाना को यह लोग झगड़ा करार देते फिरते हैं और इस सिलसिले में अजीब जाहिलाना गुल कार्यां करते हैं,तुर्रा यह कि इस को इल्म लदनी समझते हैं,या ललाजब! इसी का नतीजा था कि अबदुर्रहीम ख़ानख़ानां के एक जलेस वंदेम शाएअर ने अपना लकब कुफ्री रखा था,उन बातों से जहला कुफ्र से कितना क़रीब होते हैं और दिल में कुफ्र से नफरत कितनी तेजी से निकलती है जो कि ज़वाल ईमान का पेश खेमा होती है यह हर समझदार आदमी जानता है।
(6)आप के जमाने में एक बुजुर्ग निजाम थानेसरी थे वह इशा की नमाज़ रात के नसफ़ अख़ीर तक मोख़र करते थे और उसे क़याम अललील का वास्ता और ज़ौक़ विजमईयत के हुसूल का ज़रिया समझते थे जबकि यह बसराहत हनफ़ीह मकरूह है,उन की एक दूसरी हरकत यह थी कि गुसाला यानी आज़ाए वुज़ू से ग्रा हुआ पानी यानी मा मुस्तामल को पीना लोगों के लिए जायज़ करार देते थे जबकि इमाम आज़म क़ुद्दिस सिर्रहू से एक रिवायत के मुताबिक वह नजासत ग़लीज़ा है।
(7)एक निहायत क़बीह विष्णुईअ फेअल जो बाज़ सूफ़िया करते थे कि अपने ख़ुलफ़ा विमरीदैन से लिए अपने लिए सजदा कराते थे ,ख़ुद निजाम साहिब मज़कूर के बाज़ ख़ुलफ़ा
अली अलऐलान इस फेअल हराम के मुर्तक़िब थे,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि इस सिलसिले में ज़मीं बोस होने पर भी किफायत न करते थे(देखिए मक्तूब 29ज1)
(8)असनाए सुलूक में एक कैफियत पेश आती है जिसे यह लोग तौहीद फ़ाली से ताबीर करते हैं इस वक़्त यह लोग हक़ सुब्हानहू के अलावा किसी को फ़ाइल नहीं समझते हैं,इस वक़्त अक़ीदा बिन जाता है कि तमाम अफ़आल का फ़ाइल एक अल्लाह इज़ विजल है,उन अफ़आल का मुबाशर उन का फ़ाइल नहीं है यानी बजाहिर जिस इंसान से यह अफ़आल सादर होते हैं हक़ीकता फ़ाइल नहीं,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि यह कौल ख़ुद क़रीब है कि ज़िंदक़ा तक पहुँचाए।
(9)कुछ बुजुर्गों ने बा वजूदिके अल्लाह तआला को मजहूल मुतअल्लिक़ कहते हैं और इस पर किसी तरह का हुक्म का लगाना दुरुस्त विमुनासिब नहीं जानते इस के बा वजूद अल्लाह तआला के लिए क़ुर्ब विमईयत वाहाता विसरियान वगैरह के लिए जो अलफ़ाज़ वारद हुए हैं उन सब को क़ुर्ब ज़ाती विमईयत ज़ातीय विसरियान ज़ाती पर महमूल करते थे यह सब जबरदस्त गलती थी जो अपने अंदर सैकड़ों मुफ़ासद रखती थी ,इसी तरह फना वबका को इसी ढंग में बयान किया गया जिस से वहम होता था कि हक़ तआला मख़लूक़ में हलूल कर आता है।
(10)निरे बुजुर्गों ने विलायत को नुबुव्वत से अफ़ज़ल करार देते हुए कह दिया ‘‘अलूलाय अफ़ज़ल मिन अलंबोत’’ (यानी विलायत नुबुव्वत से अफ़ज़ल है) इस से जो नतीजा बरामद होता था कि वली नबी से अफ़ज़ल है इस लिए बाज़ बुजुर्गों ने तावेल करते हुए यों कहा कि नबी कि विलायत नबी की नुबुव्वत से अफ़ज़ल है,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं:अम्मा फ़ी उलहक़ीक़त कार बुर अक्स अस्त जीरा नुबुव्वत नबी अज़ विलायत अव अफ़ज़ल अस्त'' जैसा कि अन्क़रीब आये गा।
(11)कुछ सूफ़िया वजूदय सिफ़ात हक़ के बारे में यह शेअर पढ़ा करते थे؎
अज़ रवे ताकिल हिम्मा गैर इंद सिफ़ात
बाजात तो अज़ रवे तहक़्क़ हिम्मा उएन
इस शेअर से मफ़हूम होता है कि ज़ात वस्फ़ात में तग़ायर सिर्फ़ इल्मी है,ख़ारिजी नहीं,खारिज में ज़ात वस्फ़ात मुत्तहिद हैं,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि मोतज़िला वफ़लासफा जो कि नफ़ी सिफ़ात करते हैं वह भी इल्मी तग़ायर के कायल हैं और खारिज में इत्तिहाद मानते हैं।
(12)इस्लाम का मुस्लिमा अक़ीदा है कि मोमिन के लिए सवाब और काफ़िर के लिए अज़ाब अब्दी है कुछ बुजुर्गों ने‘‘रहमती वसात कल श’’ (मेरी रहमत हर चीज़ को वसीअ है) के तहत यहाँ तक कह दिया कि काफ़िरों को तीन हकबा यानी दोसु चालीस बरस अज़ाब होगा इस के बाद आग उन पर बुर्द वस्सलाम हो जाए गी जैसा कि हज़रत इब्राहिम अलैहि अस्सलाम पर हो गई थी,उन लोगों ने वईद में ख़लफ़ जायज़ करार दिया और यहाँ तक दावा कर दिया कि सूफ़िया में से कोई भी काफ़िरों के दाइमी अज़ाब का कायल नहीं है।
(13)कुछ बुजुर्गों ने ख़वास मुल्क को ख़वास बशर से अफ़ज़ल करार दिया यह कौल भी जमहूर उलमा के खिलाफ़ है हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की तहक़ीक़ इस मामला में भी अनोखी है कमा सीजे।
(14)बाज़ बुजुर्गों ने खिलाफत ख़ुलफ़ाए राशिदीन के बारे में यह कह दिया सबब तरतीब खिलाफतहम मदत आमारहम यानी ख़ुलफ़ाए राशिदीन की खिलाफत की तरतीब का सबब उन की उमरों की मुद्दत है।
यानी हज़रत अबूबकर का इंतकाल हज़रत उम्र से पहले मुक़द्दर था इस लिए खिलाफत पहले
हज़रत अबू बुकर को मिली,हज़रत उम्र का विसाल हज़रत उसमान से पहले मुक़द्दर था इस लिए उन्हें हज़रत उसमान से पहले खिलाफत मिली और हज़रत उसमान की शहादत हज़रत अली से पहले मुक़द्दर थी इस लिए हज़रत अली से क़ब्ल उन्हें खिलाफत मिली,इस से कुछ लोगों ने यह नतीजा निकाला कि उन में शरफ़ विमर्तबा में बाहम कोई तफ़ाज़ल नहीं है जिस से एक गुना मजहब अहले सुन्नत को मजहब रफ़्ज़ से क़ुरबत हो रही थी।
(15)कुछ बुजुर्ग ऐसे थे जो तशबीया वितंज़िया के जमा के कायल थे उन का कहना था कि तंज़िया पर ईमान तो सभी मोमिनीन को हासिल है आरिफ वह है जो तशबीया के तंज़िया को जमा करे और ख़ल्क़ को ख़ालिक़ का ज़ुहूर देखे ,कसरत को वहदत के लिबास में जाने और साने को मसनू में मुताला करे हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं:
बालजुमला तवज्जो तंज़िया सफ़ निज़द ईशां नुक़्स अस्त विषहूद वहदत बे मुलाहिजा कसरत ऐब''यानी खालिस तंज़िया उन के यहाँ नुक़्स है और कसरत के मुलाहिजा के बग़ैर वहदत का शहूद ऐब,यह वह लोग थे जो अहदेत खालिस की तरफ़ तवज्जो करने वालों को नाक़िस तसोर करते थे और मुताला कसरत के बग़ैर मुलाहिजा वहदत को तहदीद वितक़ियेद गुमान करते थे।
(16)उन में कुछ ऐसे भी थे जो उन लोगों को जो कि मुमकिन और वाजिब का वजूद जुदा मानते थे मशरिक कहते थे जबकि यह दो वजूदों को मानने वाले अल्लाह तआला के मासवा की इबादत से तंजा करते और इजतिनाब वाहितराज़ से काम लेते थे यह सूफ़िया सिर्फ़ उन ही को मौहद मानते थे जो सिर्फ़ एक वजूद का कायल हो अगरचे वह हजार बुतों की पूजा करे क्योंकि यह सब हक़ तआला के ज़हूरात हैं,उन की इबादत हक़ सुब्हानहू व तआला की इबादत है यानी आलम को उएन हक़ जानते हैं,उन में से मताख़रीन अगर चह ऐनीयत के कायल नहीं मगर उन्हों ने यह कह दिया कि आलम न उएन हक़ है न गैर हक़।
(17)कुछ सूफ़ियों का हाल तो यहाँ तक पहुँच गया था कि कहने लगे थे कि हम माथे की आंखों से बेदारी में अल्लाह तआला को देखते हैं और जो दौलत सर्वर कोनेन ﷺ को एक बार शब् मेराज में हासिल हुई थी हम को हर रोज़ मयस्सर हैऔर जो नूर उन को दिखाई देता था इस को सुबह रोशन के मुशाबेह समझते थे और इस नूर को मर्तबा बे कैफी तसोर करते थे और मुरातिब उरूज की इन्तहा इसी नूर के ज़ुहूर तक तसोर करते थे,तआला अल्लाह सुब्हानहू अन ज़ालिक अलव्न कबीरा
(18)कुछ लोग यह कहा करते थे कि हमें अल्लाह तआला से हम कलामी का शरफ़ हासिल है,रोजाना अल्लाह तआला के बारे में कहा करते थे कि इस ने ऐसा फ़रमाया है,यों कहा है,हद तो यह थी कि कभी अपने दुश्मनों के बारे में कहा करते थे कि अल्लाह तआला ने उन के बारे में यह सज़ा और वईद बयान फ़रमाई है,कभी दोस्तों को अल्लाह तआला की तरफ़ से बशारतें सुनाया करते थे ।
उन में कुछ लोग तो यह तक कह दिया करते थे कि तिहाई या चौथाई शब् बाक़ी रहने से नमाज़ सुबह तक अल्लाह तआला से हम कलामी रही और हर तरह की बातें हम ने पूछें और जवाब पाया,इस जमात की बातों से पता चलता हैकि यह इसी नूर मज़कूर को उएन हक़ जानते थे ,इसी को ख़ुदा तसोर करते थे महज़ इस का ज़ुहूर नहीं समझते थे।
(19)शरई क़वानीन वुज़ूइबत के मामले में उन सूफ़ियान ख़ाम के जो अक़ाइद वंज़रियात हो गए थे वह दीदा इबरत से पढ़ने के लायक हैं,दिल लरज़ उठता है,जिस सुन्नत और शरीअत को हज़ारहा तकालीफ़ विमसाइब झेल कर सर्वर कोनेन ﷺ ने और आप के मुक़द्दस सहाबा ने रज़ि अल्लाह अन्हुम अजमईन तमाम लोगों की फ़लाह वंजात के लिए फैलाया इस के बारे में उन हामिलान अनिवार वितजल्लियात का जुल्म विस्तम देखिए कि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू कितने दर्दनाक अंदाज़ में फ़रमाते हैं:
''मुतस्व्वफान ख़ाम विमलहदान बे सर अंजाम दरसदद आनंद कि गरदनहाए ख़ुद अज़ रबक़ा शरीअत बुर आरंद वाहिकाम शरएहि रा मख़सूस बावाम दारणद ख़याल मि कनंद कि ख़वास मुकल्लिफ़ बमार्फत इंद वबस''(मक्तूब 276 ज1)
तर्जुमा:बाज़ मुतस्व्वफान और बे सर अंजाम बे दीन इस के दर पे हैं कि अपनी गर्दनों को शरीअत की गिरफ्त से बाहर करलें और शरई अहकाम को अवाम के साथ ख़ास रखते हैं उन का ख़याल है कि ख़वास सिर्फ़ मार्फत के मुकल्लिफ़ हैं।
उन ख़ामकारों ने सिर्फ़ अपने आप ही को आजाद नहीं किया था बल्कि अपनी बद अमली पर पर्दा डालने के लिए बराबर इस अकीदे की तरवेज वाशाअत करते थे ,क्योंकि खतरा था कि हमारी बद अमली देख कर हलक़ा इरादत में कहीं बुज़ुर्गी का भ्रम न खिल जाए और नज़र विनियाज़ की वसूल्याबी ख़त्म हो जाए,इस लिए उन की तबलीग़ यह थी:
मि गवेन्द कि मकसूद अज़ अतियान शरीअत हुसूल मार्फत अस्त वचवन मार्फत मयस्सर शद तक़लीफ़ात शरएहि साक़ित गश्त'' गोया शरीअत एक मुअम्मार है कि जब तक मकान की तामीर हो रही है मुअम्मार की ज़रूरत है अब मकान बिन गया मुअम्मार मर जाए तो मकान में किया फ़र्क़ पड़े गा ,मार्फत के हुसूल तक शरीअत की ज़रूरत थी वह हासिल हो गई ज़रूरत ख़त्म हो गई फिर जसारत देखिए कि अपने बातिल दावे को नस क़ुरआनी से साबित करने की भवंडी को शिष् यह करते थे:
एं करीमा रा ‘‘वातुबद रबक हत्ता यातेक अलीक़ीन ई अल्लाह’’ फिर इस जमात को एक खतरा यह था कि इस्लामी हुकूमत कहीं हमारी बद अमली पर हमारी सरज़निश न करे और पिटाई हो जाए तो इस का भी उन लोगों ने यों रास्ता साफ करदिया'' चनां कि अज़ जहल उमरा वसलातीन रा बजुज़ अदल वानसाफ मुकल्लिफ़ निमी दानंद'' यानी जैसा कि जहालत की वजह से उमरा वसलातीन को अदल वानसाफ के सिवा किसी और चीज़ का मुकल्लिफ़ नहीं जानते हैं,बादशाहों को
उन्हों ने यह सहूलत दे दी और उन के आजार से भी मुतमइन हो गए अब उन्हें एक ख़दशा यह था कि जिन बुजुर्गों की विलायत वक्रब पर सब का इत्तफाक़ है और अवाम वख़वास में वह मकबूल विमशहूर हैं,उन की इबादात वरियाज़ात और तक़्वा वतहारत भी ज़बान ज़िद अवाम वख़वास है तो अगर शरीअत की ज़रूरत न थी तो मुक़रबान ख़ुदा क्यों यह तकलीफ़ें उठाते रहे,इस को नहों ने ब आसानी यों हल करदिया:
''विमी अंगारिंद कि इबादात आरिफ़ाँ रियाई अस्त बराए आं मि कनंद कि मुबतद्यान वप्स रवान ईशान ब आं इक़तिदा कनंद न आंका आरिफ़ान मुहताज ब इबादात इंद'' यानी यह लोग समझते हैं कि आरिफ़ों की इबादत रिया कारी है इस वास्ते करते हैं ताकि इबतिदाई दर्जे और पीछे चलने वाले लोग इस की इक़तिदा करें न कि इस वास्ते कि आरिफ़ैन इबादतों के मुहताज हैं।
आप देख रहे हैं कि इस जमात ने कितनी अय्यारी और मकारी से सारे इरफ़ा विकामलियन की इबादतों पर सिर्फ़ पानी ही नहीं फेर दिया बल्कि शिर्क ख़फ़ी यानी रिया कारी का बोहतान विल्जाम भी आइद करदिया, मज़ेद बरआँ यह भी देखें ''दर ताईद एं कौल अज़ मशाइख़ नकल मि कनंद कि गुफ़्ता इंद ता पीर मुनाफ़िक़ विमराई नबाशद मुरीद अज़वे मुंतफ़ा न गर्दद''
ख़ज़लहम अल्लाह सुब्हानहू मा अजहलहम
जहालत वनादानी का नुकता आखिर देखिए कि जब तक पीर मुनाफ़िक़ और रिया कार न होगा इस वक़्त तक मुरीदों को कोई नफा हासिल नहीं हो सकता है।
(20) उन ख़ामकारों में कुछ तो ज़लालत और गुमरही की इस गहरी वादी में गर चुके थे कि इस्लामी रमक़ ख़त्म हो गई थी और इस्लाम की बुनियादी बातों का इंकार कर रहे थे जरा उन का हाल सुनिये:
''जुमे अज़ नाक़िसान एं राह अज़ां अलफ़ाज़ मोहमा महव अज़महलाल एनी दानिस्ता वबज़ंदक़ा रसीदा इंद कि अज़ अज़ाब वस्वाब उखरवी इंकार नमूदा इंद कि हमचनांकि अज़ वहदत बकसरत आमदा इंद मर्तबा दीगर
हमें तौर अज़ कसरत बोहदत खोहहिंद रफ्त वायुं कसरत दराएं वहदत मुज़्महिल ख़्वाहिद शद,जुमे अज़ीं ज़नादक़ा आं महव शुदन रा कयामत कुबरा ख़याल करदा इंद वाज़ हश्र वंशर वहिसाब वस्रात विमेजान इंकार नमूदा इंद,ज़लवा फ़ाज़लवा''
तर्जुमा:यानी इस राह के नाक़िसों में से एक गिरोह ने महव वाज़्महलाल के अलफ़ाज़ मोहमा से एनी महव वाज़्महलाल समझा है और ज़िंदक़ा तक पहुँचे हैं कि उखरवी अज़ाब वस्वाब से इंकार करदिया और ख़याल किया है कि जिस तरह वहदत से कसरत में आये हैं दूसरी मर्तबा इसी तरह कसरत से वहदत में चले जा ईं गे और यह कसरत इस वहदत में गुम हो जाए गी ,उन ज़िंदीक़ों में से एक गिरोह ने इस गुम होने और महव होने को कयामत कुबरा ख़याल करलिया है और हश्र वंशर और हिसाब वस्रात विमेजान का इंकार कर दिया है तो गुमराह हुए और औरों को गुमराह किया।
तसव्वुफ़ की आड़ ले कर किस तरह जरूरीयात दीन का इंकार करदिया और कह दिया कि जिस तरह दरिया में क़तरा गुम हो जाता है इसी तरह बंदा ख़ुदा में गुम हो जाता है और जब ख़ुदा में गुम हो गया तो अज़ाब वस्वाब से किया ताल्लुक रहा,कुछ ख़बासत में और बढ़े तो उन्हों ने इस को कयामत कह दिया लिहाज़ा उन सब चीजों की छुट्टी हो गई जो बाद कयामत पेश आएं गी।
कुछ मुल्हिदों का हाल तो इस दर्जा पर पहुँच गया था कि'' बाज़े अज़ मुलाहदा कि बबातिल मसंद शेखी गिरफ्त हुक्म जवाज़ तनासुख़ मि नमाईंद विमी अंगारिंद कि नफ़्स ता ज़माना कि बहद कमाल रसीद अज़ तक़लब अब्दान औरा चारा नबूदद, मि गवेन्द चों बहद कमाल रसीद अज़ तक़लब अब्दान बल्कि अज़ ताल्लुक बदन फ़ारिग़ गश्त'' यानी बाज़ बे दीनों ने कि बातिल तौर पर मुशेख्त की मसंद पकड़ ली है तनासुख़(आवागोन) के जवाज़ का हुक्म देते और समझते हैं कि नफ़्स जिस वक़्त तक हद कमाल को नहीं पहुँचता है इस वक़्त तक उसे मुख़तलिफ़ बदन बदलने से चारा नहीं,कहते हैं कि जब हद कमाल को पहुँच गया तो मुख़तलिफ़ बदनों में फिर ने बल्कि बदन के ताल्लुक से फ़ारिग़ हो
यह था इस गिरोह का कारनामा जो जबह विदस्तार की आड़ में लोगों का शिकार करके अपना पेट भरते थे ,यह तो बहुत कम है जो नहीं लिखा गया वह इस से कहीं ज़्यादा है ,सितम तो यह कि उन सब की निस्बत ऐसे बुजुर्गों की तरफ़ की जाती थी या उन की बातों से यह मुतालिब अख़ज़ किए जाते थे जिन के बारे में लब कुशाई की हिम्मत न थी,इस को कमाल मार्फत और इल्म लदनी तसोर किया जाता था,अब थोडा हाल उन के अक़ाइद और इबादात के सिलसिले में और सन लीजिए फिर बात का रुख दूसरी तरफ़ किया जाए।
(22)उन लोगों का एक आम ख़याल यह था कि क़ल्ब दुरुस्त हो,बातिन सही हो जाए तो आमाल ज़ाहिर की कोई ख़ास ज़रूरत नहीं,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं:
''सलामती क़ल्ब अज़ इलतिफ़ात बिमा सिवाए अव तआला वामाल सालहा कि ब बदन ताल्लुक दारणद विश्रीअत बातियान आं अम्र फर्मौदा हर दो दरकार अस्त,दावा सलामत क़ल्ब बे अतियान आमाल सालहा बदनीय बातिल अस्त हम चुनान कि रूह दरें निशा बे बदन गैर मुतस्व्वर अस्त बसयारे अज़ मुल्हिदान एं वक़्त एं किस्म दावाए मि नमाईंद,नजाना अल्लाह सुब्हानहू अन मोतक़िदातहम अलसु बसदक़्त हबीबा’’
तर्जुमा:अल्लाह तआला के मासवा की तरफ़ से क़ल्ब का खाली होना और आमाल सालहा जो कि बदन से ताल्लुक रखते हैं,और शरीअत ने जिन के बजा लाने का हुक्म दिया है दोनों ही दरकार हैं,आमाल सालहा बदनीय बजा लाये बग़ैर सलामती क़ल्ब का दावा बातिल है जैसे रूह को इस दुनिया में बे बदन के तसोर नहीं किया जा सकता है,बहुत से इस वक़्त के मुल्हिद इस किस्म का दावा करते हैं अल्लाह तआला अपने हबीब ﷺ के सदक़े हमें उन के बुरे अकीदे से निजात बख़्शे।
एक और मौका पर फ़रमाते हैं''जो शख्स बातिन को दुरुस्त करता है और ज़ाहिर को यों
ही छोड़े हुए है,मुल्हिद है और इस के बातिनी अहवाल इस्तिदराज हैं,हाल बातिन की सेहत की अलामत ज़ाहिर को अहकाम शरएहि से आरास्ता करने का एहतिमाम है।
(23)उन सूफ़ियों की एक आम गलती यह भी थी कि उन की नज़र में मकाशफ़ात और मआरिफ़ वहक़ायक़ की इस दर्जा अहमियत पैदा हो गई थी कि उन ही को असल समझते थे ,और आमाल वाफ़आल की बुनियाद उन्हें पर रखते थे अगरचे यह मक्शफ़ात ज़ाहिर शरीअत से कितने ही क्यों न टकराते हूँ,इसी लिए हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने मुतअद्दिद जगह इस का तज़किरा किया है कि किताब वसंत और कयास वाजमा ही दलायल हल वहरमित के मुसबत हैं इलहाम विक्षफ़ मुसबत अहकाम शरएहि नहीं है,एक जगह फ़रमाते हैं:
''पस मुक़रर शद कि मोतबर दर इस्बात अहकाम शरएहि किताब वसंत अस्त विकियास मुज्तहिदान वाजमा उम्मत नीज़ बहक़ीक़त मुसबत अहकाम अस्त बाद अज़ीं चहार अदला शरएहि हेच दलीले मुसबत अहकाम शरएहि निमी तवांद शद,इलहाम मुसबत हल वहरमित नबूद विक्षफ़ अर्बाब बातिन इस्बात फर्ज़ वसंत न नुमायद''(मक्तूब 55 जिल्द दोम)
तर्जुमा:पस साबित हो गया कि अहकाम शरएहि के इस्बात में ऐतबार किताब वसंत का है और कयास वाजमा उम्मत भी दर हक़ीक़त अहकाम को साबित करते हैं।उन चार शरई दलीलों के बाद कोई दलील अहकाम शरएहि को साबित नहीं कर सकती है ,इलहाम हलाल वहराम को साबित नहीं करता और अर्बाब बातिन का कश्फ़ फर्ज़ वसंत का इस्बात नहीं कर सकता है।
(24)नमाज़ जैसी महत्तम बालशान इबादत जिस के फ़ज़ाइल विकमालात से कुरआन वहदेस भरे पड़े हैं इस के बारे में जरा उन मुतस्व्वफा का रवैया मुलाहिजा फरमाएं:
''जुमे रा अज़ीं ताइफा कि ब हक़ीक़त नमाज़ आगाह निसाख़तंद वबकमालात मख़सूसा आं इत्तिला नबख्शीदनद,मुआलिजात अमराज़ ख़ुदरा अज़ उमूर दीगर जस्तुंद वहसूल मुरादात ख़ुद रा बाशीयाय दीगर मरबूत साख़तंद''
तर्जुमा: उन मुतस्व्वफ़ीन का एक गिरोह जिन्हें नमाज़ की हक़ीक़त और इस के मख़सूस कमालात से आगाही नहीं बख्शी गई उन लोगों ने अपने अमराज़ का इलाज दूसरे उमूर से ढूँढा और अपनी मुरादात का हुसूल दीगर चीजों से मरबूत किया।
यानी क़ुर्ब हक़ की नेमत विद्वलत हासिल करने के लिए नमाज़ जैसी चीज़ उन की नज़र में ना काफ़ी थी और इस में कोई ख़ास इमतियाज़ न था इसी लिए रियाज़ात विमुजाहिदात ऐसे अपनाए गए जिन का कुरआन वसंत में कहीं वजूद न था ,यह तरीका इख्तियार करके गोया अमला यह बता या गया की क़ुर्ब हक़ की मख़सूस दौलत इस इस्लाम और इस की इबादत से हासिल नहीं हो सकती है जो कुरआन वहदेस में बयान हुआ, अगर यही काफ़ी होता तो निरे इस्लाम पर अमल करते हैं बहुत से पके नमाजी हैं उन्हें क्यों नहीं मार्फत वोलायत हासिल हो जाती।
अब ज़ाहिर है रियाज़ात विमुजाहिदात की कुव्वत हर एक तो रखता नहीं है तो बे चारा ज़ईफ़ वनातवां तहसील मार्फत के लिए हिम्मत ही क्यों करे गा,या दीगर मस्रुफ़ियात की वजह से जो उन बड़ी बड़ी रियाज़तों का हामिल नहीं हो सकता है वह इरादा ही कैसे करे गा? आप देख रहे हैं जिस इरफान हक़ के लिए बंदों के मालिक ने उन्हें सलाहीयतें दें और मार्फत के लिए भेजा और उन्हें हुक्म दिया वह चंद लोगों के लिए मख़सूस हो कर रह गई यह तास्सुर कोई निया नहीं था बल्कि काफ़ी जमाने से पैदा हो गया था, बुजुर्गों ने तो खैर हर हाल में शरीअत की पाबंदी लाज़िम रखी मगर उन ख़ामकारों के नफ़ूस इमारा पर इबादत बहुत ग्रां थी इस लिए यहाँ तक कह दिया:
अज़ीनहा नमाज़ रा दौर अज़ कार दानिस्ता ,मबनाए आं रा बुर गैर वग़ैरयत दाश्तनद'' यानी उन में से एक गिरोह ने नमाज़ को दौर अज़कार जाना कि इस की बुनियाद गैर वग़ैरयत पर है यानी नमाज़ से पता चलता है कि आबिद और है माबूद और,जबकि यहाँ तो एक ही है ,ख़ुदा की पनाह! रोजा में चूंकि यह
गैर वग़ैरयत नहीं बल्कि खाना पीना वगैरह तर्क करना है जो कि खुदाई सिफ़ात से है इस लिए उन बुजुर्गों ने रोजा को नमाज़ से अफ़ज़ल करार दिया है और फ़रमाया:
''दर सौम कि तर्क अकल विषर्ब अस्त बसिफ़त समदेत मुतहक़्क़ शुदन अस्त विद्र नमाज़ बग़ैर वग़ैरयत आमदन वाबिद विमाबूद दानिस्तन'' यानी रोज़े में कि खाने पीने को छोड़ना है ,सिफ़त समदेत से मुतहक़्क़ होना है और नमाज़ में गैर वग़ैरयत में आना और आबिद विमाबूद जानना।
नमाज़ का चूंकि यह हाल हो गया लिहाज़ा अब रूहानी ग़ज़ा कहां तलाश की जाए तो इस का सामान यों फ़राहम हुआ :
''अज़ अदम आगाही हक़ीक़त नमाज़ अस्त की जिम ग़फ़ीर अज़ीन ताइफा तस्कीन इज़तिराब ख़ुदरा अज़ समाव वनगमा व वज्द व तवाजिद जस्तुंद विमतलूब ख़ुदरा दर पर्दहाए नग़मा मुताला नमोदनद'' (मक्तूब 261 ज 1)
तर्जुमा:हक़ीक़त नमाज़ से बे खबरी ही का नतीजा है कि उन में सेएक बड़े गिरोह ने अपने इज़तिराब की तस्कीन समाव वनगमा और वज्द वतवाजिद में ढूँढी और अपने मतलूब को नग़मा के पर्दों में तलाश किया।
इस में हज़ नफ़्स का पूरा सामान मौजूद था ख़ास कर आज के सूफ़ियों के लिए जो तसव्वुफ़ जैसी बे बहा दौलत के लिए बद नुमा दाग बने हैं और इस से तनफ़र का बाइस भी,और उलमा-ए ज़ाहिर जिन्हों ने तसव्वुफ़ को इस के क़रीब हो कर समझने के बजाए ख़ामकार सूफ़ियों से समझा लिहाज़ा अपनी मोशिगा फियों की आमा जगाह बनादिया उन में निरे हक़ायक़ का इंकार कर बैठे और यही चीज़ अल्लाह वालों के इंकार का सबब बिन गई,मगर सूफ़ियों ने रक़्स वसरोद को अपनी आदत बना लिया और इस के मुनकरीन को मिलाए खुश्क कहने लगे,अल्लाह वालों के यहाँ तो फिर भी इस के हदूद वकेविद थे और उन्हें मुकम्मल तौर पर शरीअत का पास विलिहाज़ था मगर बे