अध्याय 13 में से 57पृष्ठ 185–204
अहयाएसंत
बिद्दत वज़लालत के ज़ुल्मत कदूं में सर्वर कोनेन ﷺ की मुबारक संतों की शमा रोशन करना मामूली जिहाद नहीं था,हर मौका और हर महल में सुन्नत को नाफ़िज़ करना और ख़ुद अपनी नोक पलक इस क़द्र सुन्नत के मुताबिक कर लेना कि जिस से उपर मुतस्व्वर न हो सके,बिद्दत का रिवाज कहां से हो रहा है और इस का बदबू दार चश्मे कहां से फूट रहा है,उसे किस तरह बंद किया जा सकता है यह सब कुछ मुजददाना बसीरत थी,सुन्नत की अज़मत दलों में बिठाना और बिद्दत के सारे चूर दरवाजे बंद कर देने का काम जिस शान और जिस जिहाद से आप ने किया वह तजदीद अल्फ़ सानी का निहायत अहम गोशा है और बे मिसाल ख़िदमत है इस सिलसिला में आप ने चंद इक़दामात किए।
एक तो आप ने निहायत सख्ती से संतों पर अमल ख़ुद पर लाज़िम करलिया और इस मामला में इस क़द्र एतिना फ़रमाया कि कौल वफाल में,उठने बैठने,सोने जागने ।खाने पीने,गुफ़्त विषनीद और ख़लवत विजलोत में सर मो सुन्नत से तजावुज़ न होता ,आप के सवानिह निगार ख़ुलफ़ा ने इस सिलसिला में जो वाक़ियात सुपुर्द कलम फ़रमाए हैं उन को पढ़ने के बाद हर क़ारी यकीन करले गा कि सुन्नत पर अमल का इस से ज़्यादा कोई तसोर नहीं होसकता है।
दोम:अपने ख़ुलफ़ा और मुरीदैन की तरबीयत सुन्नत परफ़रमाई,दर्स वितदरीस के ज़रिया,मजलिसी गुफ़्तगू के ज़रिया और तहरीर के ज़रिया संतों पर अमल की ताकीद वतंब्य या सिर्फ़ तरग़ीब ही न फ़रमाते बल्कि उन के फ़वाइद वुमुनाफा भी बताते,रूहानी तरक्की को इसी पर मौक़ूफ़ फ़रमाते, उन पर अमल से जो रूहानी तरक़्क़ीयात होतीं और नाजुक मौकों पर सुन्नत पर अमल के सिलसिले में जो तजल्लियात वानिवार और इनामात व एहसानात इलाही मिलते उन्हें मकाशफ़ात और मुशाहदात की शक्ल में आप उन मुतबईन को बताते,ज़ाहिर है जो कमाल वितकमेल का तालिब हो और रतजल्लियात वानिवार का ख्वाहिशमंद हो ,इस्लाफ़ की निसबतों का हामिल बनना
चाहता हो जब इस का रहबर उन सब का हुसूल संतों पर अमल से मौक़ूफ़ करदे गा तो रूहानियत के मुतलाशियों के लिए ख़लवत विजलोत की सारी तवानाइयां इसी अमल बुर सुन्नत ही पर सिर्फ़ हूँ गी।
मुतबू विमुक़तदा के अफ़आल वामाल जो सरासर नफ़सानी ख़ाहिशात के खिलाफ़ और जिस्मानी मेहनतों और मशक्कतों पर मबनी होते हैं इस का अक्स ताबे और मुक़ल्लिद में कितना परता है और रफ़्ता रफ़्ता इस के यह औसाफ़ मुतबईन तक पहुँचते पहुँचते किस क़द्र मुज़्महिल होजाते हैं यह हर ज़ी शऊर इंसान जानता है ।
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की क़ियादत का ख़ास जौहर यह है कि आप ने अपने मुजाहिदात वरियाज़ात और सरासर मेहनतों और मशक्कतों पर मबनी तमाम औसाफ़ वाफ़आल अपने मुतबईन में इस खूबी के साथ उतारा और ऐसी हिक्मत विदानाई से काम लिया कि वह औसाफ़ वाख़लाक़ एक तो पूरे जूर पर जलवा गर होगए दोम सदियों तक बाक़ी रहे और आज भी बाक़ी हैं अगरचे अगलों की बनिस्बत कम हैं।
किसी क़ाइद का उन आमाल वाफ़आल का पाबंद होना जिन का वह क़ाइद है और बात है लेकिन पेरो कारों में मुकम्मल वह औसाफ़ पैदा करदेना और उन्हें हयात का लाजिमी अंसर बना देना यह और बात है।
सुन्नत के दाई विमबलग़ और तरवेज वाशाअत करने वाले इस दुनिया में बहुत हुए हैं,सुन्नत पर सख्ती से अमल करने वाले ,संतों को ज़िंदा करने वालेकसीर तादाद में पैदा हुए मगर क़ुरून औला के बाद अहया सुन्नत का काम जिस खूबी और अहमियत के साथ आप ने किया और जिस क़द्र लोगों के ज़ाहिर वबातिन में सुनतीं आप ने नाफ़िज़ कीं वह अपनी मिसाल आप है।
आम तौर पर लोगों के अहादीस नबूय अला साहबहा अस्सलात वस्सलाम की तरवेज वाशाअत और
ख़ुद उन पर अमल करके ؒविगों को सुन्नत पर अमल की दावत दे मगर आप ने सिर्फ़ दावत न दी बल्कि अपने सारे अकीदत मंदों की निहायत आला पैमाने पर सुन्नत के मुताबिक तरबीयत फ़रमाई,क़दम क़दम पर उन्हें देखा और परखाफर क़ौमों के सामने और उन के रूबरू दावत वितबलीग़ कराई और उन अफराद के ज़रिया इसलाह वितबलीग़ का अज़ीम काम लियाऔर मक्तोबात क़ुदसी आयात के ज़रिया तहरीरों में भी इशाअत वितरवेज फ़रमाई,फ़वाइद वुमुनाफा बयान फ़रमाए ।
अपनी हयात भर तमाम ख़ुलफ़ा और मुरीदैन की खबर गिरी भी की चुनांचे आप के ख़ुलफ़ा विमरीदैन के जिन्हों ने हालात पढ़े हैं वह अच्छी तरह जानते हैं कि आप के तरबीयत याफताह लोगों के आप के पस पुश्त दीगर मुल्कों और शहरों और आप के विसाल के बाद इस सिलसिले में आप की जानशीनी का हक़ किस तरह अदा किया और आप के तब्लीग़ी व दावती असरात पूरी दुनिया में किस क़द्र सरायत कर गए थे ,किसी शख्स वाहिद ने बिद्दतों के इस अंधेरे तूफानों के मुक़ाबिल चिराग जलाए हूँ जो आप ने जलाए हैं तो मिसाल दे।
तारीख इस्लामी शाहिद है कि अफराद जिस कसरत से आप के फ़ैज़ से पूरी दुनिया में संतों से मालामाल हुए और फिर से संतों में जो बिहार आई वह अजहर मिन अश्शम्स है।
तीसरा तरीका सुन्नत की तिरूज वाशाअत का जो आप ने इख्तियार फ़रमाया वह सब से अनोखा था वह यह है:
‘‘ पिछली सदियों में लोगों के सामनेऔलिया कराम के मुजाहिदात वरियाज़ात जिस मेहनत विमशक्कत पर मबनी थे इस से यह आम तसोर पैदा होगया था कि रूहानियत और इस का कमाल ऐसे कठिन मुजाहिदात वरियाज़ात पर मौक़ूफ़ है,जबकि सुन्नत पर अमल इस के मुक़ाबिल कोई रियाज़त विमुजाहिदा नहीं इस तास्सुर के दो ज़बर दस्त नुकसान हुए एक तो यह कि कसरत
से लोग हिम्मत हार कर बैठ गए और समझ लिया कि रूहानियत हमारे बस की बात नहीं।
दूसरे संतों की हैसियत बहुत मामूली होगई और यह जेहन बिन गया कि सुन्नत पर अमल कोई इमतियाज़ी चीज़ नहीं बल्कि अवाम वख़वास सब में मुश्तर्क है लिहाज़ा अगर इसी से कमालात की तहसील मुमकिन होती तो अवाम वख़वास सब को कमालात का हुसूल होना चाहिए था लिहाज़ा सुन्नत से हट कर जो चीजें ईजाद की गई थीं जैसे जान लेवा मुजाहिदात वरियाज़ात।सर्वर वनगमा की महफ़िलें और वज्द वहाल वगैरह यही उमूर कमालात के हुसूल के लिए असास और बुनियाद बिन गए।’’
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने हुज़ूर सर्वर कोनेन ﷺ के कमालात के दर्जेमुक़रर फ़रमाए और वह वह कमालात बयान फ़रमाए कि आप से पहले इस आसमान के नीचे किसी ने न सुने थे न अर्बाब मुजाहिदात वरियाज़ात की यहाँ उन कमालात का पता था न अस्हाब कश्फ़ विमुशाहिदा के यहाँ उन का कोई नाम वंशान और यह सारे कमालात आप ने इत्तिबा सुन्नत से वाबस्ता और मरबूत बताये,क़दम क़दम पर तंबीया फ़रमाई कि जिस का क़दम इत्तिबा सुन्नत में जितना आगे होगा वह इतना ही तहसील कमालात में साबिक़ होगा ,चुनांचे तजदीद तरीक़त वहक़ीक़त में पढ़ें,नीज़ तजदीद मआरिफ़ में देखें गे की यह मुजाहिद संयत जो कुछ बताता है वह कितना बुलंद है और उएन शरीअत के मुताबिक है सारे कमालात इसी पर मुनहसिर हैं।
इस के बरख़िलाफ़ बिद्दतों से और खिलाफ़ सुन्नत मुजाहिदात से जो पैदा होता है वह कितना खतरनाक है और नुकसान पहुँचाया है,बिदआत से जो कैफियात वाहवाल वजूद में आते हैं उन की हक़ीक़त किया है? इस में बहकने के चूर दरवाजे कितने हैं और कमालात से इंसान किस क़द्र महरूम होजाता है?
उलग़र्ज़ एक तरफ़ सुन्नत की अहमियत और मनफ़ात बताई तो दूसरी तरफ़ इस के
खिलाफ़ की क़बाहत विष्णुआअत ,बैक वक़्त दोनों चीजों को आप पाबंदी से ज़ाहिर करते रहे और जिस से सुन्नत की अज़मत वर बिद्दत से नफरत दलों में बैठती चली गई।
एक ख़ास चीज़ जो लोगों के ज़हनों पर अयाँ हुई थी वह था मुजाहिदात वरियाज़ात और उन से पैदा होने वाले अहवाल विमवाजीद का भूत,आप क़ुद्दिस सिर्रहू ने अपने बयानात से अमल से जगह जगह साबित करदिया कि मुकम्मल सुन्नत पर अमल ख़ुद सब से बड़ा मुजाहिदा है और उन से पैदा होने वाले अहवाल विकिफ़यात बुज़ुर्गी वोलायत की दलील नहीं,मुसलमान तो मुसलमान ऐसे मुजाहिदात और उन की कैफियात का फ़िरों को भी हासिल हुई हैं।
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने संतों से जो रूहानी कमा लात वाबस्ता कर दिए इस का ख़ास फायदा यह हुआ कि सुन्नत पर अमल बजाहिर चंद चीजों पर मुनहसिर न रिहाबल्कि ज़ाहिर वबातिन में सुनतीं पैवस्त हो गईं,दोम यह कि रूहानी नुकसान वख़सारा की वजह से कोई ख़लवतों में भी सुनतीं छोड़ने के लिए तैयार न था बल्कि कमालात रूहा नियत को शौक संतों पर अमल में दिन ब दिन इजाफा करता था ।
आप को अल्लाह तआला ने इस क़द्र रूहानी क़ुव्वतें अता फरमाएं थीं कि रूहानियत के राइज और गैर राइज तमाम सिलसिलों में आप मुकम्मल बसीरत रखते थे और हर एक से सलाक की कुदरत रखने के बा वजूद आप ने सिलसिला नक़्शबंदिया की तरवेज वाशाअत और सिलसिलों की बनिस्बत ज़्यादा फ़रमाई,इस सिलसिले को आप लोगों के हालात के ज़्यादा माफ़िक़ समझते थे क्योंकि इस में सुन्नत पर अमल की तरग़ीब ज़्यादा थी,
इस नाक़िस की राय के मुताबिक आप के अहयाए सुन्नत और तजदीद सुन्नत का यह इजमाली खाका है,जो जुबानी लफ़ाज़ी नहीं बल्कि दलायल विशवाहिद की रोशनी में पेश किया गया है,जिस शख्स ने आप को और आप के मक्तोबात क़ुदसी आयात को पढ़ा है वह यकीन से जानता है जह जो कुछ इस में बयान हुआ है वह मुकम्मल तौर पर सदाकत पर मबनी है।
(1)मक्तूब 23 जिल्द दोम में सुन्नत की तरवेज और बिद्दत को ख़त्म करने और अपने दौर में बिद्दत के रिवाज और सुन्नत से ला प्रवाही बयान करते हुए फ़रमाते हैं:‘‘इस्लाम ने इस वक़्त में ग़ुरबत पैदा करली है और मुसलमान गरीब हो गए हैं और जहां तक जाएँ गे गरीब तर होते जा ईं गे इस हद तक कि अल्लाह कहने वाला ज़मीं पर न रहे गा और कयामत बदतरीन लोगों पर क़ायम होगी,नेक बख़्त वह है कि इस ग़ुरबत में मतरूक संतों में से किसी सुन्नत को ज़िंदा करे और अमल में दाखिल बिद्दतों से किसी बिद्दत को मुर्दा(ख़त्म)करदे’’
यह व ह वक़्त हैकि हज़रत खैर अलबशर ﷺ की बिअसत के हजार साल गुज़र गए और कयामत की अलामतों ने पर तो डाला है और अहद नुबुव्वत दे दूरी की वजह से सुन्नत पो शीदा हो गई है और इंशा किज़्ब(झूट फैलना) के सबब बिद्दत ज़ाहिर हो गइ है,शहबा जच्चाहीए कि सुन्नत की मदद करे और बिद्दत को शिकस्त दे।
बिद्दत को रिवाज देना दीन की तख़रीब का सबब है और बिद्दती की ताज़ीम इस्लाम ढाने का बाइस है
मिन वक्र साहिब बद फ़क़द इआन अला हुदुम उलइस्लाम
(जिस ने बिद्दती की तौक़ीर की इस ने इस्लाम ढाने पर मदद की)
सुना होगा,पूरी हिम्मत और कामिल इरादा इस तरफ़ मुतवज्जा करना चाहिए कि संतों में से किसी सुन्नत की तरवेज की जाए और बिद्दतों से कोई बिद्दत ख़त्म की जा ए,(यों तो)हिम्मा वक़्त ख़ास कर इस ज़ोफ़ इस्लाम के वक़्त में मरासम इस्लाम को क़ायम करना सुन्नत की तरवेज और बिद्दत की तख़रीब से वाबस्ता है।(तफ़सील के लिए देखिए मक्तूब मज़कूर)
(2)लोग उलूम विमआरिफ़ और अहवाल विमवाजीद की तहसील के लिए कैसे कैसे मुजाहिदात वरियाज़ात अपनाते थे और ज़िक्र वफ़कर, औराद विमशाग़ुल ख़लवत नशीनी वगैरह इख्तियार
करते रहे मगर संतों के दीवाने इस मर्द मुजाहिद का हाल देखिए फ़रमाते हैं:
‘‘एं फ़क़ीर अज़ नकद वक़्त ख़ुद मि नवीसद कि मुद्दतहा अज़ उलूम विमआरिफ़ वाज़ अहवाल विमुक़ामात दर रंग उबर नेसां रेख़्तनद विकारीका बायद कुर्द बानायत अल्लाह सुब्हानहू करदनद वालहाल आरज़ूए निमांदा अस्त उला आंका अहया सुनते अज़ संन मुस्तफ़व्य अली साहबहा अस्सलात वस्सलाम नमूदा आयेद वाहवाल विमवाजेदमर अर्बाब ज़ौक़ रा मुस्लिम बाशद’’(मक्तूब 37 ज1)
यह फ़क़ीर अपना नकद वक़्त लिखता है कि मुद्दतों उलूम विमआरिफ़ और अहवाल विमुक़ामात बरसने वाले बादल की तरह बहाए और जो काम करना चाहिए था अल्लाह सुब्हानहू की इनायत से किया अब कोई आरज़ू बाक़ी नहीं रही सिवाए इस के कि संन मुस्तफ़व्य अला साहबहा अस्सलात वस्सलाम से किसी सुन्नत को ज़िंदा किया जाए और अहवाल विमवाजीद ख़ास अहले ज़ौक़ को मुस्लिम रहीं।
उलफ़त विमहबत और इश्क जब समाया होता है और कमाल तक पहुँचता है तो महबूब विमाशूक़ की हर अदा से मुहब्बत और उलफ़त होती है ,आशिक सादिक की यह आरज़ू रहती है कि सारा ज़माना हमारे महबूब की उदाओं का हामिल बिन जाए ताकि हर तरफ़ महबूब ही महबूब और इस के जलवे नज़र आएं।
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू को मदनी महबूब ﷺ से जो मोहबत विलगाव था वह नुकता आखिर तक पहुँचा हुआ था जिस की झलक हर हर स्तर से,ज़िन्दगी की हर साअत से और हर अदा से ज़ाहिर था,सच्चे दीवाने की और किया अलामत हो सकती है कि न मआरिफ़ वहक़ायक़ की आरज़ू है और न इसरार वरमोज़ की और न तजल्लियात वानिवार की तलब बस सिर्फ़ जैसे हो अपने महबूब की आर्ज़ूं को रिवाज दे दिया जाए और लोगों को हामिल बना दिया जाए।
सुबहान अल्लाह! किया शान थी काश जबज़नी दावेदार समझते और ऐसे आशिक की क़द्र करते,आप अगर गौर से मक्तोबात शरीफ़ का मुताला फरमाएं तो पता चल जाए गा कि आप की बालिग नज़र ने अहया सुन्नत के सिलसिले में किया रोष इख्तियार की ,किस किस तरह सुन्नत की
तरवेज पर उमरा वसलातीन को उभारा और अपने महबूब कोनेन ﷺ की अज़मत विमहबत कामला दलों में किस तरह बिठाला।
मक्तूब 114 का इक़तिबास मुलाहिजा फरमाएं:
‘‘हक़ सुब्हानहू व तआला हम मुफलिसान बे सरोबर्ग को सय्यद उलअव्वलीन वाला ख़रीन की इत्तिबा की दौलत से कि आप की दोस्ती के तुफ़ैल से अपने कमालात वस्माती को मैदान ज़ुहूर में लाया और आप को तमाम कायनात का बेहतरीन पैदा फ़रमाया अलैहि मिन अस्सलात अफ़ज़लहा वमन इलतसलीमात अकमल्हा, मुशर्रफ़ फ़रमाए और इस पर इस्तिक़ामत बख़्शे कि इस मुताबेत मर्ज़ीया(पसंदीदा पैरवी) को ज़र्रा जमी तलज़जात दुनयवी और तनामात उखरवी से बमरातब बेहतर है,फ़ज़ीलत आप की रोशन सुन्नत की मुताबेत पर मुअल्लक़ है और बुज़ुर्गी आप की शरीअत को बजा लाने से वाबस्ता अलैहि वाला आला अस्सलात वस्सलाम’’
बयान की बलाग़त लफ़्ज़ लफ़्ज़ से ज़ाहिर है आप क़ुद्दिस सिर्रहू बता रहे हैं कि सर्वर कोनेन ﷺ को तमाम अव्वलीन वाख़रीन का सरदार बनाया,तमाम इस्माई वस्फ़ाती कमालात आप के तुफ़ैल आप की मुहब्बत की वजह से ज़ाहिर हुए,जब आप की बड़ाई और बुज़ुर्गी का यह आलम है तो आप ही ख़याल करें कि फिर आप की पैरवी से बढ़ कर और आप के तरीका से अफ़ज़ल कौन सा तरीका हो सकता है दुनिया की सारी लज़्ज़तें और आख़िरत की सारी नेअमतें जिन की तहसील के लिए शब् बेदारियां होती हैं,मुसलसल रोज़े रखे जाते हैं ,नफ़्स इमारा की सुरक्षी कतम करने के लिए तरह तरह के रियाज़ात शाक़ा और मुजाहिदात शदीदा इख्तियार किए जाते हैं,उन सारी लज़्ज़तों और नेअमतों से कामिल मुताबेत नहीं बल्कि मुताबेत का एक ज़र्रा बराबर नहीं बल्कि बमरातब बेहतर है,सुबहान अल्लाह! सुबहान अल्लाह! अपने महबूब ﷺ की बारगाह में यह ख़राज अकीदत मदह वस्ना की किस बुलंदी पर फ़ाइज़ है, फिर मिसाल देते हुए फ़रमाते हैं:
‘‘मसला कैलूला कि इस मुताबेत की रो से वाक़्य हो उन करूरों शब् बेदारियों से औला और अफ़ज़ल है जो मुताबेत की रो से न हूँ,इस तरह यूम फ़ित्र(ईद) का इफ्तार कि शरीअत मुस्तफ़वी ने जिस का हुक्म फ़रमाया है अब्दुलआबाद के उन सारे रोज़ों से बेहतर है जो शरीअत से माख़ूज़ न हूँ।
एक जीतल(एक किस्म की चांदी या पैसे का उन्नतिसवाँ हिस्सा) शारा के हुक्म से अता करना इस सोने के पहाड़ से खर्च करने से फ़ाज़लतर है जो कि अपने पास से हो, अमीर उलमोमिनें हज़रत उम्र फ़ारूक़ रज़ि अल्लाह अन्हु ने एक रोज़ सुबह की नमाज़ बाजमाअत अदा करके अस्हाब में निगाह की एक शख्स को हाजिर नुहियान पाया पूछा, अस्हाब ने अर्ज़ किया कि वह शख्स रात भर जागता है शायद इस वक़्त सौ गया ,अमीर उलमोमिनीन ने फ़रमाया कि अगर वह तमाम रात सोता और नमाज़ सुबह को बा जमात अदा करता तो बेहतर होता ।
अहले ज़लालत ने रियाज़ात विमुजाहिदात बहुत किए हैं लेकिन चूंकि शरीअत हुक्का के मुताबिक नहीं हैं बे ऐतबार और ख़वार हैं अगर उन आमाल शाक़ा पर अज्र मित्रत्तिब हो तो बाज़ दुनियावी मनाफ़े के साथ मकसूर है पूरी दुनिया की किया हैसियत है कि इस के बाज़ मनाफ़े का ऐतबार करें’’
जो लोग अहले दानिश लोगों के आमाल और उन की नफ़सियात से वाकिफ़ हैं जानते हैं कि बहुत से लोग निरे ऐसे का मों में काफ़ी रकम खर्च कर देते हैं जिन का शरीअत ने हुक्म नहीं दिया अगर चह वह काम शरीअत के खिलाफ़ नहीं हैं इसी तरह निरे ऐसे लोग हैं जो उन आमाल वाफ़आल को बजा लाते हैं जिन का शरीअत ने अम्र नहीं फ़रमाया हालाँकि वह आमाल वाफ़आल मेहनत विमशक्कत में कहीं ज़्यादा हैं उन आमाल वाफ़आल से जिन का सर्वर कोनेन ﷺ ने हुक्म फ़रमाया, जबकि यही लोग ज़कात देने में सस्ती और काहिली करते हैं और फ़राइज़ वसंन और वाजिबात की अदाएगी में ला प्रवाही से काम लेते हैं ऐसे
लोगों की नज़र में मामूरात शरएहि की वह अहमियत नहीं होती है जो उन की होती है क्योंकि शरीअत के अवामिर ग़ायत दर्जा एतिदाल पर मबनी हैं जिन पर हर शख्स आसानी से अमल कर सकता है और सब की तरफ़ नज़र करते हुए उन की वज़ा व तदवीन हुई है ,चूंकि उन आमाल में इतनी मेहनत व मशक्कत नहीं है इस लिए उन की इतनी अहमियत नहीं है।
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की नज़र बड़ी गहरी थी आप उन चीजों से बहुत वाकिफ़ थे आप की बसीरत का कमाल यही है आप ने जगह जगह इस चीज़ पर जोर दिया हैकि जो आमाल वाफ़आल अपनी तरफ़ से बजा लाये जाएँ वह बजाहिर कितने ही हसन हूँ उन की अहमियत उन के मुक़ाबिल कुछ नहीं है जो बितरीक़ सुन्नत अदा किए जाएँ, मस्नून तरीके पर अदा किए जा ने वाले आमाल बजाहिर कितने ही आसान हूँ मगर सवाब की जो फ़रावानी उन में है वह उन में नहीं है ,जो क़ुर्ब ख़ुदावंदी उन में हासिल होता है वह उन में नहीं।
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की बालिग नज़री का आप इस से अंदाजा लगा सकते हैं,दरअसल सरसरी और खुली हुई ख़ामियों का अंदाजा लगा लेना कोई कमाल नहीं है दीनी गिरावट जो मख़फ़ी रास्तों से आती है इस को समझ लेना और उन ख़ामियों का अज़ाला करना जिस से दीन अपने तमाम तर तवानाइयों के साथ क़ायम रहे यह मुजददाना तरीक़ होता है,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने अहकाम शरीअत की अहमियत वाफ़ादीयत के लिए जो पैराया बयान इख्तियार किया वह आप ही का हिस्सा है लफ़्ज़ लफ़्ज़ से अज़मत शरीअत और सुन्नत ज़ाहिर है।
(3)हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के बातिन में महबूब कोनेन ﷺ की मुहब्बत वाल्फत के कैसे शोले भड़क रहे थे और आप का इश्क कितना सच्चा था इस का आप अंदाजा मक्तोबात क़ुदसी आयात के मुताला से ब आसानी लगा सकते हैं,मुहब्बत विल्फ़त ने आप के अंदर अजब दीवानगी की कैफियत पैदा कर दी थी सर्वर कोनेन ﷺ की मुहब्बत का असर आप से ताल्लुक रखने
वाली हर चीज़ तक सरायत कर गया थाऔर इस मुहब्बत के असर से जो गैरत पैदा हो गई थी मुल्लाहिता फरमाएं:
हज़रत सय्यद ज़ैद को मुखातिब करके फ़रमाते हैं:
‘‘पहले तो उन्हें यह बताते हैं कि सर्वर कोनेन ﷺ की मीरास दोकस्म की हैएक मीरास सूरी दोम माअनवी अव्वल का ताल्लुक आलम ख़ल्क़ से और दोम का आलम अम्र से क्योंकि ।।।। ईमान विमार्फत है और रशद व्हिदायत फिर बताते हैं कि मीरास सूरी जो नेमत उज़्मा है का शकर यह है कि मीरास माअनवी से आरास्ता हुआ जाए और मीरास माअनवी से तहली व आरास्तगी सर्वर को नें ﷺ की कमाल मुताबेत से हो सकती है लिहाज़ा आप की कमाल इत्तिबा व पैरवी लाज़िम है तमाम अवामिर व नवाही में यह सब कुछ बयान करके फ़रमाते हैं:
‘‘और सर्वर दोआलम ﷺ के कमाल मुताबेत आप ﷺ के साथ कमाल मुहब्बत की फरे है
उन अलमहब लिमन हवाह मुतीअ (मुहब्बत करने वाला महबूब की इताअत करता है)
और कमाल मुहब्बत की अलामत आप ﷺ के दुश्मनों के साथ कमाल बुग़ज़ है और आप ﷺ की शरीअत के मुख़ालिफ़ीन के साथ दुश्मनी का इज़हार है,मुहब्बत में मदाहंत(सस्ती) गुंजाइश नहीं रखती है मुहब् महबूब का दीवाना है मुखालफत की ताब नहीं रखता और महबूब के मुख़ालिफ़ीन के साथ किसी तरह सुलह नहीं करता है इस लिए कि दो मुतबायन मुहब्बतें जमा नहीं होती हैं ज़िद्दीन के जमा को मुहाल कहा है एक की मुहब्बत दूसरे की अदावत को मुस्तलिज़्म है।
अच्छी तरह गौर कर लेना चाहिए कि अभी कान हाथ से नहीं गया है गुज़शता का तदारुक हो सकता है कल (कयामत के दिन) कि काम हाथ से चला जाए गा सिवाए नदामत के कुछ हासिल न होगा।؎
बवक़्त सुबह शव्द हमचो रोज़ मालूमत
कि बा कि बाख़्ता इश्क दर शब् दीजूर
मता दुनिया गुरूर दर गुरूर(सरासर धोका) है और उखरवी अब्दी मामला इस पर मित्रत्तिब चंद रोजा ज़िन्दगानी को अगर सय्यद उलअव्वलीन वाख़रीन की मुताबेत में बसर किया जाए तो अब्दी निजात की उम्मीद है वर्ना हेच दर हेच है कोई भी हो और कोई भी अमल खैर कि करे؎
मुहम्मद अरबी कि आबरुए हर दूसरा अस्त
किसीका खाक दर्श नेस्त खाक बुर सर अव।’’(मक्तूब165 ज1)
मक्तूब शरीफ़ के हर हर जुमले से मुहब्बत वग़ैरत के चश्मे फूटे पड़ते हैं,यहाँ न इस मुहब्बत का ऐतबार है जो सिर्फ़ जुबानी द्दों से हो और अमल कुछ न हो और न इस मुहब्बत का कि सर्वर कोनेन ﷺ की मुहब्बत का दावा भी हो और अवामिर पर अमल भी लेकिन आप के औरआप की शरीअत के दुश्मनों के साथ मुहब्बत हो या मुहब्बत तो न हो मगर उन से नफरत भी न होऔर अग्रणफरत भी हो मगर सिर्फ़ दिल में हो तो आदाब मुहब्बत सिर्फ़ कलबी नफरत पर इकतिफ़ा नहीं करते हैं बल्कि इस अदावत और नफरत का इज़हार भी ज़रूरी है।
सुबहान अल्लाह! मुजददाना बसीरत कितनी जामा होती है और कितनी गहरी होती है यहाँ कोशिश यह होती है कि शरीअत का नफ़ाज़ पूरे तौर पर हो,मुहब्बत की अलामतें भी सबूत मुहब्बत के लिए ज़रूरी हैं ख़ुद आमाल वाफ़आल शरई में मदाहंत और अग़यार के साथ मुहब्ताना मरासम किया किया खराबियां लाते हैं,रफ़्ता रफ़्ता दीन की रूह कैसे निकलती चली जाती है फिर सुलह कलियत अवाम में किस तरह दाखिल होती है हर गहरी नज़र रखने वाला जानता है।
जिन सूफ़िया कराम ने इस नुक्ता से गफलत बरती है और मौका की नज़ाकत महसूस नहीं करसके आज उन के मुक़ल्लिदीन विमतबईन किस तरह रूह दीन को बर्बाद कर रहे
हैं,मुख़ालिफ़ीन वाइदा दीन के साथ कैसे कैसे मरासम हैं फिर कितनी अच्छी तावेलों से अपने आप को और मुरीदों को समझाए रखते हैं यह कौन पढ़ा लिखा नहीं जानताहै?
अब तो मुशरिकीन विका फ़रेन को मुरीद करना शुरू करदिया हैबल्कि उन्हें माबूदइन बातिल की पूजा का हुक्म देते हैं मआज़ अल्लाह!मआज़ालिला! सच्ची बात यह है कि बुज़ुर्गी और चीज़ है और क़ियादत विरहनुमाई अम्र दीगर,अग़यार को दावत वितबलीग़ में किस तरबीयत की ज़रूरत है उन से ताल्लुक रखते हुए भी अपने आप को उन की आलाईशों से बचाए रखना और अवाम के सामनेइसलामी तोहफ़्ज़ का ख़याल रखना कि कहीं ऐसा न हो कि दुश्मनान दीन या फिसाक़ वफ़जा र हमारी ज़ाहिरी क़ुरबत से धोका खा कर उन से मुहब्बत का ताल्लुक पैदा न करलें वगैरह वगैरह यह उमूर हर एक के अंदर जमा नहीं होते।
(4)लोगों की अमली हालत पर आप क़ुद्दिस सिर्रहू की गहरी नज़र थी आप चाहते थे कि दीन में लोगों की नितर में आसानी रहे,दीन पर अमल जब हर एक के लिए आसान रहे गा तो अमल का जज्बा पैदा होगा लोग क़रीब हूँ गे इस के लिए आप जुबानी तौर पर तहरीरी तौर पर कोशिश फ़रमाते जो मसले नफ़्स पर ज़्यादा ग्रां होत्तान में यसर वसहोलत निहायत बस्त वितफ़सील से बयान फ़रमाते उन पर अमल के दीनी वदन्यावी फायदे भी ज़िक्र फ़रमाते और कोशिश फ़रमाते कि लोगों के दलों में यह बात बस जाए कि क़ुर्ब ख़ुदावंदी का हुसूल रियाज़ात विमुजाहिदात पर मुनहसिर नहीं बल्कि सर्वर कोनेन ﷺ की संतों पर अमल ही काफ़ी है।
आप के अता किए हुए फ़राइज़ विवाजबात वसंन पर अमल का जो सही तरीका है वह अपना लिया जाए सिर्फ़ रस्मी अमल न हो ,ममनूआत वमुंहयात से इजतिनाब हासिल होजाए बस सारे कमालात की तहसील के लिए यही काफ़ी है।
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की दावत वितबलीग़ में एक बात और भी ख़ुसूसीयत के
साथ मलहूज़ रहती कि जब आप किसी शरई ममनू से बचने की ताकीद फ़रमाते हैं तो इस के इव्ज़ किसी मुबाह चीज़ को इस्तेमाल के लिए जरूर बयान फ़रमाते देते हैं और इस ममनू के नुक़्सानात और इस मुबाह के फ़वाइद वुमुनाफा की भी निशानदेही फ़रमा देते हैं।
क़ियादत का यह जौहर मामूली हैसियत का नहीं है उन तमाम बातों के लिए आप मक्तूब 191 ज अव्वल वगैरह का मुताला करें तो आप ताजब करें गे कि अल्लाह के इस बंदे ने लोगों को इस्लाम वसंत का गर्वीदा किस तरह बनायाऔर दीन की अतमत को दलों में किस तरह बिठाया?
लोगों की आम कमज़ोरी यह है कि आम तौर पर फ़राइज़ पर अमल नहीं करते और जो करते भी हैं तवान में कोताहियां बहुत करते हैं,संतों और मुस्तहबात का आम तौर पर लिहाज नहीं किया जाता है,उन की कोई अहमियत नज़र में नहीं होती है जिस ज़बर दस्त उखरवी ख़सारा होता है ,यह शैतान की गहरी चाल होती है कि मामूली गफलत से इंसान बहुत बड़े सवाब से महरूम हो जाता है ।
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू को इस चीज़ का बड़ा लिहाज था इसी लिए आप नमाज़ वगैरह के छोटे छोटे मिसाइल सुनतीं और आदाब तफ़सील से बयान फ़रमाते जिन से अवाम तो अवाम ख़वास भी गफलत बरत जाते हैं और लोगों के जेहन में यह बात ताकीद से बिठाते कि फ़राइज़ की ततमीम वितकमेल के लिए जो संन वादाब हैं उन की हैसियत दूसरी है और दीगर संन वादाब की दूसरी।
मक्तूब29 जिल्द अव्वल में फ़रमाते हैं:
‘‘मुक़रबात आमाल या फ़राइज़ हैं या नवाफ़िल,नवाफ़िल का फ़राइज़ के पहलू में कोई ऐतबार नहीं है फ़राइज़ में से किसी फर्ज़ को औकात में से किसी वक़्त में अदा करना हजार साला नवाफ़िल की अदा से बेहतर है अगरचे बनीत खालिस अदा किया हो ,कोई भी नफ़ल हो नमाज़
,ज़कात,रोजा और ज़िक्र वफ़कर और उन जैसी दीगर चीजों से बल्कि में कहता हूँ कि संतों में से किसी सुन्नत और आदाब में से किसी अदब की रियायत फ़राइज़ की अदा के वक़्त में भी यही हुक्म रखती है’’
(5)सर्वर कोनेन ﷺ की इत्तिबा और पैरवी की अहमियत और फ़वाइद मनाफ़े बयान करते हुए फ़रमाते हैं:
‘‘उखरवी निजात और सरमदी फ़लाह सय्यद उलअव्वलीन विलाख़रीन ﷺ की मुताबेत से वाबस्ता है लिहाज़ा आप ﷺ की मुताबेत सेहक़ जल सुल्ताना की महबूबीयत के मक़ाम पर पहुँचते हैं और आप की मुताबेत से तजल्ली ज़ात तआला वितक़दस से मुशर्रफ़ होते हैं और आप की मुताबेत से मर्तबा अबद्युत कि जमी मुरातिब कमाल के उपर है और मक़ाम महबूबीयत के हुसूल के बाद है से सरफ़राज़ करते हैं,और आप के कामिल मुतबईन को अनबया बनी इसराईल की तरह फ़रमाते हैं और पैग़ंबरान ओलवालाज़म आप की मुताबेत की आरज़ू करते हैं (विलो कान मूसा हयाफ़ी ज़मुना मा वसा उला इत्तिबाआ)
(अगर आप के जमाने में हज़रत मूसा दुनिया में होते तो आप की पैरवी के सिवा कोई चारा न होता)
और रूह अल्लाह (हज़रत ईसा अलैहि अस्सलाम) के नुज़ूल और हबीब अल्लाह की उन का पैरवी करने का क़िस्सा मालूम विमशहूर है,और आप की उम्मत आप की मुताबेत के तुफ़ैल खेरालामम और अहले जन्नत में सब से ज़्यादा हुई हैकल(कयामत के दिन)मुताबेत की बदौलत उम्मत सारी उम्मतों से पहले जन्नत में ले जाएँ गे और तनामात फरमाएं गे’’(मक्तूब 249)
(6)तरीका अलैहि नक़्शबंदिया के अकाबिर क़ुद्दिस अल्लाह तआला इसरारहम ने सुन्नत सनेह की पैरवी का इल्तिज़ाम किया है और अज़ीमत पर अमल इख्तियार फ़रमाया है अगर इस इल्तिज़ाम और इख्तियार
के साथ उन को अहवाल विमवाजीद से मुशर्रफ़ करते हैं तो नेमत अज़ीम जानते हैं और अगर अहवाल विमवाजीद उन को देते हैं और इस इल्तिज़ाम और इख्तियार में फ़ुतूर पाते हैं तो उन अहवाल को नहीं पसंद करते हैं और उन मुआजीद को नहीं चाहते हैं और इस फ़ुतूर में अपनी खराबी के सिवा कुछ नहीं जानते हैं,क्योंकि हिंदोस्तान के ब्रह्मन और जोगी और यूनान के फिलासफा अज़ किस्म तजल्लियात सूरी और मकाशफ़ात मिसाली और उलूम तौहीदी बहुत रखते हैं लेकिन रुसवाई और खराबी के अलावा इस का नतीजा नहीं रखते हैं और बाद वहरमान के अलावा उन को कुछ हासिल नहीं है।(मक्तूब 237)
(7)आप के ख़लीफ़ा अरशद हज़रत ख़्वाजा सय्यद मुहम्मद हाशिम कुशमी सम बुरहानपुरी क़ुद्दिस सिर्रहू ने एक मर्तबा चंद सवालात किए जिन के जवाबात मक्तूब313 ज अव्वल में अआप ने अता फ़रमाए जिस में सवाल नंबर2 का खुलासा और इस का जवाब आप ही की ज़बान मुबारक से सुपुर्द कलम करता हूँ आप गौर से पढ़ें जो बहुत सारे शकूक शुबहात को दौर करदेता है,फ़रमाते हैं:
‘‘और दूसरे सवाल का हासिल यह कि तरीका अलैहि नक़्शबंदिया में मुताबेत सुन्नत का इल्तिज़ाम है हालाँकि सर्वर कोनेन ﷺ ने रियाज़ात अजीबा और सख्त भूकें बर्दाश्त की हैं और इस तरीका में रियाज़ात को मना करते हैं बल्कि रियाज़ात को सूरी किशोफ़ के ज़ुहूर की वजह से मुज़िर जानते हैं ताजब होता है कि सुन्नत की पैरवी में जरुर का एहतिमाल क्योंकर मुतस्व्वर होसकता है।
जवाब: मुहब्बत अत्वार! किस शख्स ने कहा है कि इस तरीका में रियाज़ात मना हैं और कहां से आप ने सुना है कि रियाजात को मुज़िर जानते हैं इस तरीका में मुहाफ़ितत निस्बत का दवाम और मुताबेत सुन्नत अला साहबहा अस्सलात वस्सलाम का इल्तिज़ाम और सत्र अहवाल में कोशिश और तवस्सुत हाल(मियाना रवी) का इख्तियार और खानों और लिबासों में हद आदाल की
रियायत रियाज़ात शाक़ा और मुजाहिदात शदीदा से है,ज़्यादा से ज़्यादा यह कह सकते हैं कि अवाम कालानाम उन उमूर को रियाज़ात से नहीं शुमार करते हैं और मुजाहिदात से नहीं जानते हैं,उन के नज़दीक रियाज़त विमुजाहिदा भूक में मुनहसिर है और भूक की कसरत उन की नज़र में बड़ी क़द्र वाली है क्योंकि खाना उन बहाइम सिफ़त लोगों के नज़दीक ज़रूरी तरिन जरूरीयात और आज़म मक़ासिद से है पा इस का तर्क ला मुहाला रियाज़त शाक़ा होगा और मुजाहिदा शदीदा होगा इस के बरख़िलाफ़ मुहाफ़िज़त निस्बत कादवाम और मुताबेत सुन्नत अला साहबहा अस्सलात वस्सलाम और उन के इमसाल की अवाम की नज़र में कोई क़द्र नहीं और न कोई शुमार है ताकि उन कातरक मुनकरात से जानते हुए उन उमूर की तहसील को रियाज़ात से शुमार करते
पस इस तरीका के अकाबिर पर लाज़िम हैस्तर अहवाल में कोशिश करते हुए ऐसी रियाज़त छोड़ें कि अवाम की नज़र में अज़ीम अलक़द्र और कबूल ख़ल्क़ का बाइस है और शहरत को मुस्तलिज़्म है कि आफत को मुतज़िमन है और शरारत का नतीजा ख़ेज़ दिखाई देती है सर्वर कोनेन ﷺ ने फ़रमाया: आदमी के लिए यही शर काफ़ी है कि दीन या दुनिया में इस की तरफ़ उँगुलियों से इशारा किया जाए मगर अल्लाह तआला जिसे महफूज़ रखे।
फ़क़ीर के नज़दीक दौर व दराज़ भूकें माकूलात में हद एतिदाल की मुराआत बहुत आसान है और पूरी आसानी रखता है (और यह फ़क़ीर)पाता है कि मुराआत तवस्सुत हाल की रियाज़त कसरत जू की रियाज़त से ज़्यादा है ,हज़रत वालिद बुज़ुर्गवार क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते थे कि इल्म सुलूक में में ने रिसाला देखा है इस में लिखा था कि माकूलात(खाने की इश्याय) में एतिदाल की रियायत करना और दरमियानी की हिफाज़त रखना मतलूब तक वसूल में काफ़ी है इस मुराआत के साथ ज़िक्र वफ़कर की कोई हाजित नहीं है,और हक़ यह कि मताऊमात और मलबूसात में बल्कि जमी उमूर में तवस्सुत हाल और मियाना रवी
न चंदाँ बख़ौर कि दहांत बुर आयेद
न चंदाँ कि अज़ ज़ोफ़ जानत बुर आयेद
हज़रत हक़ सुब्हानहू व तआला ने हमारे पैगम्बर ﷺ को चालीस मुर्दों की ताकत अता फ़रमाई थी कि इस कुव्वत की वजह से मशक्कत भरी भूकों का बोझ बर्दाश्त कर लेते थेऔर सोहबत खैर अलबशर ﷺ की बरकत से अस्हाब कराम भी इस बोझ को बर्दाश्त कर लेते थे और उन के आमाल वाफ़आल में कोई फ़ुतूर वाक़्य न हुआ ,भूक के बावजूद दुश्मनों से जिंग पर कुदरत इस क़द्र रखते थे कि शिकम सैर लोग इस के दसवीं हिस्से को भी नहीं पहुँचीं गे यही वजह थी कि उन में बेस शख्स जाबिरीन से दो सौ अश्ख़ास पर ग़ालिब आ गए और सौ अश्ख़ास हजार लोगों पर गलबा हासिल कर लेते थे।
और सहाबा के अलावा जो भूक का मुजाहिदा करते हैं नज़दीक है कि संतों और आदाब के बजा लाने में आजिज़ आ जाएँ बल्कि हो सकता है कि अदाय फ़राइज़ के ओहदा से ब तकल्लुफ़ निकल पाएं,बग़ैर कुदरत के इस मामला में सहाबा कराम की तक़लीद करना संतों और फ़राइज़ में अपने आप को आजिज़ करना है।
मनक़ूल है कि हज़रत सिद्दीक़ रज़ि अल्लाह तआला अन्हु ने सर्वर कोनेन ﷺ की तक़लीद करते हुए सौम विसाल(पे दर पे बुला इफ्तार रोज़े रखना) रखा और ज़ोफ़ वना तवानी की वजह से बे इख्तियार जमीन पर गर पड़े हुज़ूर ﷺ ने बितरीक़ एतराज फ़रमाया: तुम में मेरे मसल कौन है? में अपने परवरदिगार के पास रात गुज़ारता हूँ और इसी जगह से खाना पीना खाता हूँ तो बे कुदरत तक़लीद करना अच्छा नहीं रखा।
नीज़ अस्हाब कराम सोहबत खेरालानाम ﷺ की बरकत से कसरत जू की पोशीदा मुज़रतों से महफूज़ विमामून थे और दूसरों को यह अमन और यह हिफाज़त मयस्सर नहीं है
इस का बयान यह है कि भूक की कसरत अलबत्ता सफ़ा बख्श है किसी गिरोह को सफ़ाए क़ल्ब बख्शती है और दूसरे गिरोह को सफ़ाए नफ़्स सफ़ाए क़ल्ब कि हिदायत को फुज़ूँ तर करने वाली और नूर बख्श है और सफ़ाए नफ़्स ज़लालत नुमा है और ज़ुल्मत अफ़्ज़ा यूनान के फ़ालासफा और हिंद के ब्रह्मन और जोगियों को भूक की रियाज़त ने सफ़ाए नफ़्स बख्श कर ज़लालत वख़सारे की रहनुमाई की।
बे खुर्द अफलातून ने अपने नफ़्स की सफ़ा पर एतिमाद किया और अपनी कशफ़ी विख़्याली सूरतों को अपना मुक़तदा बनाया और अजब(ख़ुद बेनी) इख़्तिया र की और हज़रत ऐसी अला नबीना वालैय अस्सलात वस्सलाम कि इस वक़्त में मबऊस हुए थे का मुतीअ नहीं हुआ और कहा:
नहन कौम महदेवन ला हाज बना अला मिन यहुदेना
(यानी हम हिदायत याफताह कौम हैं हमें किसी रहनुमा की हाजित नहीं)
अगर यह ज़ुल्मत अफ़्ज़ा सफ़ा न रखता और सूर कशफ़्या खयालय इस के लिए राह की रुकावट न होतीं और मतलब तक वसूल के लिए माने न आतीं, इस ने अपने आप को इस सफा की वजह से नूरानी पाया और नहीं जाना कि यह सफ़ा इस के नफ़्स इमारा के बारीक छिलके से नहीं गुज़री है और और इस का इमारा इसी अपनी ख़बस(गंदगी) और नजासत पर है इस से ज़्यादा नहीं है कि नजासत मुगलिज़ा को शकर के रकीक़ ग़लाफ़?????
क़ल्ब कि फ़ी हद ज़ाता पाकीज़ा है और नूरानी,इस के रुख पर नफ़्स की मुजावृत(पड़ोस) तारीक रंग बैठ गई है थोड़े से तसफ़ीया से अपनी असली हालत की तरफ़ रुजू कर लेता है और नूरानी हो जाता है इस के बरख़िलाफ़ नफ़्स कि फ़ी हद ज़ातिहाख़बीस है और ज़ुल्मत इस की सिफ़त ज़ाती है जब तक सियासत क़ल्ब बल्कि मुताबेत सुन्नत और इत्तिबा शरीअत अला साहबहा अस्सलात वस्सलाम बल्कि बमहज़ फजल ख़ुदावंदी जल सुल्ताना मज़केआ विमतहर न होजाए और इस का ख़बस ज़ाती ज़ाइल न होजाए फ़लाह वबहबूद इस से मुतस्व्वर नहीं।
अफलातून ने कमाल जहल की वजह से अपनी सफ़ा को कि नफ़्स इमारा से ताल्लुक रखती थी सफ़ा क़ल्ब ईसवी की तरह जाना(इसी लिए) ला मुहाला अपने आप को मुहज़्ज़ब विमतहर हज़रत ईसा की तरह समझा और उन की दौलत मुताबेत से महरूम रहा और ख़सारा अब्दी के दाग से दागदार हुआ
इआज़िना अल्लाह तआला सुब्हानहू मिन हाज़ा अलबिला
चूंकि यह नुकसान भूक की तबीअत में पोशीदा था (इस लिए)इस तरीका के अकाबिर क़ुद्दिस अल्लाह तआला इसरारहम ने भूक की रियाज़त को तर्क करके मताऊमात में आदाल की रियाज़त और तवस्सुत हाल के मुजाहिदा की रहनुमाई की है और भूक के मनाफ़े को इस जरुर अज़ीम उलख़तर के एहतिमाल से तर्क करदिया और दूसरों ने भूक के मनाफ़े को मुलाहजा किया और इस के नुक़्सानात से आंख बंद कर ली और भूक कि तरग़ीब दी ।
अक्लमंदों के यहान साबित शुदा (अम्र) यह है कि जरुर के एहतिमाल से मनाफ़े कसीर को छोड़ा जा सकता है ,इसी गुफ़्तगू के क़रीब है जो उन उल्मा ने फ़रमाया शकर अल्लाह तआला सएहम कि अगर कोई अम्र सुन्नत और बिद्दत के दरमियान दायर हो तो बिद्दत का तर्क सुन्नत के बजालाने से बेहतर है यानी बिद्दत में जरुर का एहतिमाल है और सुन्नत में मनाफ़े की तवक़्क़े पस एहतिमाल जरुर को मनाफ़े की तवक़्क़े पर तरजीह देते हुए बिद्दत को तर्क करना चाहिएप्स ताजब नहीं कि सुन्नत के बजालाने में जरुर दूसरे रास्ते से पैदा होजाए,इस बात की हक़ीक़त यह है कि वह सुन्नत गोयाइस जमाने के साथ मौक़त है चूंकि इस की तौक़्क़ीत को बारीकी और सफ़ाई की वजह से एक गिरोह न जान सिक्का इस लिए इस की तक़लीद में जल्दी की और दूसरे गिरोह ने इस को मौक़त जान कर तक़लीद इख्तियार न की वाल्लाह सुब्हानहू आलम बहक़ीक़त अलहाल।’’