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Allama Afaque Ahmad Mujaddidiतजदीद अल्फ़ सानीउलमा-ए सौ की मुज़म्मत

अध्याय 38 में से 57पृष्ठ 523–535

उलमा-ए सौ की मुज़म्मत

हमेशा ताल्लुक खातिर रहा और वह उन बुजुर्गों की बारगाह में अकीदत विमहबत के नज़राने पेश करते रहे,इस तरह यह उमरा उन तमाम बुराइयों से बच ग्ये जो दुनिया से ताल्लुक खातिर की बुनियाद पर हो सकती थीं और दुनिया की मुहब्बत के बजाए उन के दलों में आख़िरत की मुहब्बत घर किए रही जिस से उन्हें नेकियां जमा करने का खूब मौका मिला।

फ़िक़रा वसूफ़िया के साथ अकीदत विमहबत की हद तक लगाव इतना मुफीद साबित हुआ कि इस से हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू इसलाह का वह तमाम काम ब आसानी कर ले ग्ये जो हुकूमत के लिए करना था,उन की दौलतों से निरे गरीबों और खानक़ाही फ़िक़रा की हाजित रवाई भी हुई,जिस से वह सुकून के साथ तहसील रूहानियत में लगे रहे,दुनियावी जरूरतों ने उन के बातिन को मुंतशिर नहीं होने दिया और उन की मादी कुव्वत वताक़त और जाह वहशमत से इस्लाम वाहिल इस्लाम को इज्जत वफ़रोग़ देने का भी बेहतरीन मौका हाथ आया।

अगर मक्तोबात क़ुदसी आयात से वह तमाम तहरीरें जमा की जाएँ तो बात काफ़ी तवील हो जाए गी जिस में क़दम क़दम पर उन्हें दुनिया की बे वक़ाती औरा स की बुराई पर खबरदार किया है,और सूफ़िया कराम विद्रवेशों से मुहब्बत पर उभारा है,आप ने चूंकि अपनी आंखों से उलमा-ए ज़ाहिर के कारनामे देखे थे,और महज़ इल्म ज़ाहिर की बुनियाद पर इंसान आलम आख़िरत बिन जाए यह बहुत मुश्किल है इस लिए आप उमरा वाग़निया को उन ही बुजुर्गों और उलमा से वाबस्ता रहने की ताकीद विनसीहत फ़रमाते थे जो ज़ाहिर के साथ साथ बातिन के भी हामिल थे,नीज़ इल्म ज़ाहिर से आरी सूफ़ियों से भी आप लोगों को दौर रखना चाहते थे,क्योंकि उन के हाथों से दीन पर कोई कम मुसीबतें नहीं आई थीं,अब चंद इक़तिबासात मुलाहिजा फरमाएं दाराब ख़ाँ को बुजुर्गों और सोफी से लगाव और मुहब्बत की ताकीद करते हुए और इस के फ़वाइद पर आगाह करते हुए फ़रमाते हैं:

‘‘दौलत खुशगवार कि दर खानदान क्षमा एहसास नमूदा मि आयेद बा वजूद असबाब गुना वबा हुसूल

मवाद इस्तिग़ना नयाज़ मंदी अस्त बा फ़िक़रा वख़दमतगारी अस्त ब एं तबका इलिया कि मुँबई अज़ मुहब्बत वाख़िलास एं ताइफा इलिया अस्त विमशार अज़ मोद्दत व इख़तिसास एं फ़िर्क़ा नाज्य,महबान एं ताइफा रा बशारत उलमर मा मिन अहब का फ़ी अस्त विजलेसान एं तबका रा नवेद हम कौम ला यशक़ा जलेसहम वाफ़ी।’’

तर्जुमा:खुशगवार दौलत जो आप के घर में महसूस हो ती है मालदारी के असबाब के बावजूद इस्तिग़ना(बे नियाज़ी)के मवाक़े के हुसूल के साथ फ़िक़रा के साथ नयाज़ मंदी है और इस तबका बुलंद के साथ खिदमतगारी कि मुहब्बत वाख़िलास की खबर देती है इस जमात के साथ,और इस फ़िर्क़ा नाज्य के साथ इख़तिसास वाल्फत का एहसास दिलाती है,इस जमात से मुहब्बत करने वालों के लिए उलमर मा मिन अहब की बशारत का फ़ी और इस तबका के हम नशीनों के लिए हम कौम ला यशक़ा जलेसहम की खुशखबरी बहुत है।

इस के बाद उन्हें बताते हैं कि यही मुहब्बत जब ग़लबा करती है तो महबूब की इताअत जरूर होती है और अपनी सारी मुरादें इस की मुराद में फना हो जाती हैं यह गोया फना फ़ी उलशेख़ की मंज़िल है जो फना फ़ी अल्लाह का वसीला हो ती है जिस पर बका बिल्लाह मुरत्तिब होती है।

मक्तूब 67 दफ्तर दोम के आ ग़ाज़ में ख़ान जहां को इस नेमत के शकर पर उभारते हैं कि अल्लाह तआला ने दरवेशों और फ़िक़रा से मुहब्बत बख्शी है और इस पर उन की तारीफ़ करते हैं ख़ुदभी अल्लाह तआला की हमद करते हैं, फ़रमाते हैं:

‘‘हमदन लिल्लाह सुब्हानहू कि दरें तौर अवान पर शुबह विमशतबाह अग़न्या सआदतमंद रा अज़ हसन निशा कि दारणद बावजूद बे मुन्ना सब्तेहा बा फ़िक़रा दौर अज़कार सर नयाज़ अस्त वायमाने ब एं ताइफा हासिल अस्त चह नामते अस्त कि ताल्लुकात शता माने हुसूल एं दौलत नगश्ता अस्त वितवजहात पुरा गंदा अज़ मुहब्बत एनां बाज़ निदाश्ता,शकर एं नामते उज़्मा बजा बायद आवर्द वामीदवार बायद बूद कि उलमर मा मिन अहब हदीस नबवी अस्त अलैहि वाला आला अस्सलात वस्सलाम।’’

यानी अल्लाह सुब्हानहू व तआला के लिए हमद है कि इस शुबह और इशतिबाह के वक़्त नेक बख़्त मालदारों को हसन फितरत की वजह से कि रखते हैं,फ़िक़रा दौर अज़ कार के साथ बे मुनासबती के बावजूद सर नयाज़ है और इस जमात की तस्दीक हासिल है,किया नेमत है कि मुतफ़र्रिक़ ताल्लुकात इस दौलत के हुसूल से माने न हुए और मुंतशिर तवज्ज्हात ने उन की सोहबत से बाज़ नहीं रखा,इस बड़ी नेमत का शकर बजा लाना चाहिए और उम्मीद वार रहना चाहिए कि हदीस नबवी अलैहि वाला आला अस्सलात वस्सलाम है कि आदमी इसी के साथ है जिस के साथ मुहब्बत है।

मक्तूब 73 दफ्तर अव्वल में दुनिया वाहिल दुनिया की मुज़म्मत और उलूम गैर नाफ़ा वालमए सौ की बुराई वगैरह बयान करके और अहम उमूर की नसीहत करने के बाद फ़रमाते हैं:

‘‘व्हर हाल रिश्ता मुहब्बत एं ताइफा रा अज़ दस्त नदहद वाल्तजा वितज़रा बायं कौम शआर ख़ुद साज़द विमुंतजिर बाशद कि हक़ सुब्हानहू व तआला बतूसल मुहब्बत एं ताइफा मुहब्बत ख़ुद मुशर्रफ़ वबतमाम बजानिब ख़ुद कुषद।’’

तर्जुमा:किसी भी हाल में इस जमात की मुहब्बत का रिश्ता हाथ से न जाए और इस कौम के साथ इल्तिजा वज़ारी अपना शआर बना लें और मुंतज़िर रहीं कि हक़ सुब्हानहू व तआला इस जमात की मुहब्बत के वसीले से अपनी मुहब्बत का शरफ़ बख़्शे और मुकम्मल तौर पर अपनी जानिब खींचे।

आप हर अमीर को अच्छी तरह पहचानते थे जिस के अंदर जो ख़ामियां होतीं बुर मिला बयान फ़रमाते,जो कमियां कविता हियां हो तें उन के इज़हार में कभी ढील से काम नहीं लेते,किसी मन्सब वोहदा के रोब ने इज़हार हक़ से कभी मना नहीं किया बल्कि हर एक पर अपना रोब रखते थे।

मक्तूब 68 से ऐसा महसूस हो ता है कि ख़ान ख़ानां इस बात के मुहताज थे कि उन्हें तवाज़ा वाणिकसारी का जज्बा दिलाया जाए,उन के कलाम में आदाब फ़िक़रा की रियायत नहीं

थी,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की बारगाह में इस वक़्त उन के तीन ख़ुतूत आये हुए थे,आप उन्हें तंबीया करते हुए फ़रमाते हैं:

‘‘दर मकातीब सलासा क्षमा गैर अज़ इस्तिग़ना उमरे मफ़हूम निशद,हर चंद मकसूद तवाज़ा बूद मसला दर मक्तूब अख़ीर मस्तूर बूद बाद अलहम्द वालसला नमूदा मि आयदायं इबारत रा नेक दरिया बंद कि दर कजा बायद नविश्त,आरी! ख़िदमत फ़िक़रा बसयार करदा इंद अम्मा रियायत आदाब ख़िदमत हम जरूरयस्त ता समरा बुर आं मित्रत्तिब शव्द वबदुनहा खुर्त उलक़ताद।’’

तर्जुमा: आप के तीनों ख़ुतूत से सिवाए बे नियाज़ी के और कोई बात समझ में नहीं आई अगर चह मकसूद तवाज़ा थी मिसाल के तौर पर अख़ीर मक्तूब में लिखा था,बाद अलहम्द वालसला नमूदा मि आयेद, इस इबारत को अच्छी तरह देखें कि कहां लिखना चाहिए यह ठीक है कि आप ने फ़िक़रा की बहुत ख़िदमत की है लेकिन साथ ही फ़िक़रा के आदाब का लिहाज भी ज़रूरी है ताकि इस पर नतीजा मुरत्तिब हो सके और बग़ैर इस के तो ख़ारदार दरख्त (नाग फनी) पर हाथ फेरने वाली बात है।

इसी मक्तूब में आगे चल कर उन की बाज़ कमज़ोरियों की निशानदेही करते हैं इस के बाद फ़िक़रा और अहले अल्लाह से ताल्लुक की वजह बयान करते हैं:

‘‘मकसूद अज़ आशनाई फ़िक़रा इत्तिला बुर उयूब मकनूंह अस्त वज़हूर रिज़ाइल मख़ज़ूना लेकिन बदानंद कि इज़हार एं किस्म सुख़नान न अज़ रोए आजार अस्त बल्कि अज़ रोए नेक ख़्वाही विदलसोज़ी अस्त।’’

तर्जुमा: फ़िक़रा से ताल्लुक से मकसूद छिपे हुए उयूब पर इत्तिला है और पो शीदा बुरी ख़सलतों का ज़ुहूर लेकिन ख़याल रहे कि इस किस्म की बातों को ज़ाहिर करना आजार की नियत से नहीं है बल्कि भलाई चाहने की वजह से है।

इंसान को इस के मक़ाम विमन्सब और मिजाज के ऐतबार से मुखातिब करना हर किस विनाक्स का काम नहीं,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के कलाम में इस की रियायत आप बहुत पाएं

गे,हर हक़ को अगरचे कितना ही कड़वा हो बड़ी आसानी के साथ हलक में उतार देते हैं और अहले अल्लाह की शान बरकरार रखते हैं।

आप क़ुद्दिस सिर्रहू के सामने एक बड़ी मुश्किल यह थी कि अगर उमरा वामाइदीन से ताल्लुक रखते हैं तो बद ख़्वाहों को ज़बान दराज़ी और बद ज़नी का मौका हाथ आता है और अगर इस्तिग़ना वबे नियाज़ी बरतते हैं तो तकबर और अनानीयत का दाग लगता है,हक़ीक़त हाल तक पहुँचना और सही राय क़ायम करना हर एक के बस की बात नहीं,मगर आप ने दीन की खातिर जिस शान से ताल्लुक रखा वह भी आप ही का हिस्सा है,मक्तूब 198 में ख़ान ख़ानां से फ़रमाते हैं:

‘‘मख़दूमा! फ़िक़रा रा बाग़निया आशनाई करदिन दरें ज़मान बसयार मुतास्सिर अस्त अगर फ़िक़रा बिगुफ़्तन या नविश्तन राह तवाज़ा वहसन ख़ल्क़ कि अज़ लवाज़म फक्र अस्त पेश गिरंद को तह अंदेशां अज़ सौ ज़न ख़ुद मि अंगारिंद कि तामे विमहताज इंद ला जुर्म दरें ज़न ख़ुसर अलदन्या विलाख़रा मि गरदनद वाज़ कमालात एं बुज़ुर्गवारां महरूम मि मानन्द,वागर फ़िक़रा बास्तग़ना हर्फ़ मि जनंद क़ासिर नज़रां अज़ बद ख़लक़ी ख़ुद कयास मि कनंद कि मुतकबर वबद ख़ल्क़ इंद।’’

तर्जुमा:ए मख़दूम! फ़िक़रा को मालदारों से पहचान करना इस जमाने में बहुत मुश्किल हो गया है,फ़िक़रा अगर बोलने और लिखने में तवाज़ा और हसन ख़ल्क़ कि फ़िक़रा के लवाज़म से है का रास्ता इख्तियार करें तो कम अंदेश अपने सौ ज़न की वजह से समझते हैं कि लालची और मुहताज हैं और लामुहाला इस गुमान में दोनों जहां का ख़सारा उठाएं गे और फ़िक़रा अगर बे नियाज़ी से काम लें तो क़ासिर नज़र अपनी बद ख़लक़ी की वजह से गुमान करें गे कि यह(फ़िक़रा)मुतकबर और बद अख़लाक़ हैं।

उन उमरा और अमाइदीन को सुधारने और संभालने में और सच्चा विपका मुसलमान बनाने में आप की कोशिशें कई तरह की थीं,मक्तोबात के अलावा उन्हें अपनी दीगर तसनीफ़ात भी भेजा करते थे,इस के अलावा एक ख़ास बात यह थी कि आप अच्छे उलमा और देनदार

हज़रात को नो करियां दिलवाया करते थे,इस से दोहरा फायदा था,एक तो यह कि उमरा वामाइदीन के हम नशीन और हम सोहबत अच्छे लोग रहीं गे तो अक़ाइद वामाल में बजाए फ़ुतूर आने के यह लोग दिन बदन नेकियों की तरफ़ रागब रहीं गे,यह बहुत बड़ा कारनामा था और इस के फ़वाइद भी बहुत मुतअद्दी थे।

आप की कोशिश थी कि हर मन्सब अच्छे लोगों के हाथ में आजाए ताकि इस्लाम और अहले इस्लाम को खूब उरूज हासिल हो,दोम यह कि यह हज़रात मआश की गोना गों परेशानियों से निजात पा जाते थे और मुतमइन हो कर दीन की ख़िदमत करते थे,एक अहम फायदा यह था कि अगर जगह खाली रहे गी तो कोई गलत इंसान भी आ सकता है और इस से फिर वही हालात साबिक़ा पैदा होने लगीं गे।

उलमा-ए सौ की मुज़म्मत:

अकबर को बिगाड़ने में चो निका सब से बड़ा हाथ उलमा-ए सौ का था जैसा कि आप पढ़ चुके इसी लिए हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू जहां जहां उन उमरा वामाइदीन विदीगर को नसाइह फ़रमाया करते वहीं आप बराबर उन्हें उलमा-ए सौ के शर वफसाद से आगाह फ़रमाया करते और उन की सोहबत के ज़हर हलाहल होने पर तंबीया फ़रमाया करते थे,अब आप चंद इक़तिबासात उलमा-ए सौ की मुज़म्मत में भी पढ़ लें और देखें आज भी इस गिरोह से दीन को कितना जबरदस्त खतरा लाहक़ है उन्हें पहचानें और उन की सोहबत बद से बचें।

मक्तूब 213 में सय्यद फरीद साहिब के बे शुमार एहसानात का एतराफ़ करते हैं फिर उन के शुक्रिये और जज़ा के सिलसिले में उन्हें बताते हैं कि हम फकीरों की तरफ़ से यही हो सकता है कि सलामती दारेन की दुआ करें,नीज़ उन्हें मुकाफ़ात का एक निया तरीका यह बताते हैं कि वाज़ वितज़कीर से काम लिया जाए अगर कबूल हो जाए तो कितनी बड़ी नेमत है,इस तरह उन्हें पंद वंसाइह और उन के कबूल पर आमादा करने के बाद पहले देनदार

उलमा-ए अहले सुन्नत से इख़तिलात वानबिसात को तमाम नसीहतों और मवाइज़ का खुलासा बताते हैं और फ़लाह वंजात को उन्हें की पैरवी में मुनहसिर करने के बाद फ़रमाते हैं:

‘‘अगर मालूम शव्द कि शख़से बराबर दाना खरदला अज़ स्रात मुस्तक़ीम एं बुज़ुर्गवारां जुदा उफ़्तादा अस्त सोहबत औरा सम कातिल बायद दानिस्त विमजालसित औरा ज़हर अफ़ा बायद अंगाशित,तालिब उलमान बेबाक अज़ हर फ़िर्क़ा कि बाशिंद लसूस दीन इंद इजतिनाब अज़ सोहबत अनहा नीज़ अज़ जरूरीयात अस्त एं हिम्मा फ़ित्ना वफसाद कि दर दीन पैदा शुदा अस्त अज़ शिवमी एं जमात अस्त कि बवास्ता हताम दुनयवी आख़िरत रा बर्बाद दादा इंद।’’

तर्जुमा:अगर मालूम हो जाए कि कोई शख्स राई के दाने के बराबर उन बुजुर्गों के स्रात मुस्तक़ीम से हटा हुआ है तो इस की सोहबत को ज़हर कातिल जानें और इस के पास बैठने को अज़्दहे का ज़हर समझें,बेबाक तालिब इल्म किसी भी फ़िर्क़ा के हूँ दीन के रहज़न हैं उन की सहबुतों से परहेज़ भी जरूरीयात दीन से है,यह दीन में जो कुछ फ़ित्ना वफसाद पैदा हो गया है इसी जमात की नहूसत है कि दुनिया के लालच में आख़िरत को बर्बाद किया है।

मक्तूब 194 में सदर जहां को फ़रमाते हैं:

‘‘मालूम शरीफ़ अस्त कि दर क़र्न साबिक़ हर फ़सादीका पैदा शद अज़ शिवमी उलमा-ए सौ बज़हूर आमद’’ आप को अच्छी तरह मालूम है कि क़र्न साबिक़ में जो फसाद भी पैदा हुआ है इस का सबब उलमा-ए सौ ही हैं।

चूंकि इस वक़्त बादशाह को कुछ उलमा दरकार थे इस लिए आप सदर जहां को ताकीद फ़रमाते हैं कि उलमा के इंतखाब में निहायत गहरी नज़र की ज़रूरत है,फिर फ़रमाते हैं:

‘‘उलमा-ए सौ लसूस दीन इंद मतलब ईशां हुब्ब जाह विरियास्त विमंजिलत निज़द ख़ल्क़

अस्त’’यानी उलमा-ए सौ दीन के रहज़न हैं उन का मक़सद ख़ल्क़ की नज़र में जाह और हुकूमत विमन्सब की मुहब्बत है।

मक्तूब 33 हाजी मुहम्मद लाहौरी के नाम आप ने ख़ास उलमा-ए सौ की मज़त में तहरीर फ़रमाया और तफ़सील से उन की क़बाहतें बयान फरमाएं,चूंकि कभी कभार ऐसे उलमा से भी दीनी ख़िदमात ज़ुहूर में आती हैं,इल्म ख़ुद एक ऐसी चीज़ है जो लोगों को मता सर करता है फिर इस पर तदरीस वाफ़्ता वगैरह के ज़रिया दीनी ख़िदमात अवाम के लिए बहकने का ज़रिया बिन जाती हैं,इसी लिए आप ने बड़ी तफ़सील से बयान फ़रमाया कि इल्म और तदरीस और इफ़्ता वगैरह कब नाफ़े हैं यह सब बयान फ़रमा कर इरशाद फ़रमाते हैं:

‘‘वालहक़ दरें ज़माँ हर सस्ती विमदाहंती कि दर उमूर शरएहि वाक़्य शुदा अस्त व्हर फतूरे कि दर तरवेज मिलित विदीन ज़ाहिर गश्ता अस्त हिम्मा अज़ शिवमी उलमा-ए सौ अस्त वफसाद नयात ईशां।’’

और सही बात यह कि इस जमाने में जो सस्ती विकाहली कि उमूर शरएहि में वाक़्य हुई है और हर फ़ुतूर कि मिलित विदीन की तरवेज में ज़ाहिर हुआ है सब उलमा-ए सौ की नहूसत और उन की नीयतों का फसाद है।

उलमा-ए सौ हर दौर में रहे हैं और उन से दीन विमलत का जो फसाद वाक़्य हुआ है इस से तारीख भरी पड़ी है,इस जमाने में भी वही हुब्ब दुनिया वजाह है जिस ने उन्हें बिगाड़ा है रफ़्ता रफ़्ता यह दुनिया की तरफ़ माइल हो ते जाते हैं,इसी चीज़ ने आज इल्म को ख़त्म करदिया और फ़ित्ना वफसाद के वह दहाने खोल दिए हैं कि बयान से बाहर है,दीन के जो सच्चे रहबर हैं उन्हें भी बे वक़ात कर दिया।

आज ज़रूरत है कि मदारिस में देनदार उलमा पैदा किए जाएँ,पहले जमाने में

सूफ़िया कराम थे जिन की रहबरी और जिन की वाबस्तगी की वजह से उलमा-ए आख़िरत की भी एक मोतद ब मिक़दार रहती थी,अब यह चीज़ मफ़क़ूद है इसी लिए उलमा-ए आख़िरत कम हैं और उलमा-ए सौ ज़्यादा,प्रवर दिगार आलम सब को अमान में रखे,आमीन!

हम बार बार कह चुके हैं कि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू का तरीका इस सिलसिले में आम लोगों से जुदा रहा है आप गर उलमा-ए सौ की मुज़म्मत करते हैं ताकि फ़ित्ना वफसाद के दरवाजे बंद हूँ तो इसी के साथ उलमा-ए आख़िरत की मदह वितारीफ़ भी करते हैं,और उमरा वामाइदीन को जगह जगह उन्हें उलमा-ए आख़िरत की इत्तिबा विपैरवी की रगबत दिलाते हैं,उन के औसाफ़ वख़सुसीआत भी ज़िक्र फ़रमाते हैं ता कि उन्हें ब आसानी पहचाना जा सके,मक्तूब मज़कूर में फ़रमाते हैं:

‘‘आरी! उलमा कि अज़ दुनिया बे रगबत इंद वाज़ हुब्ब जाह विरियास्त विमाल विमनफ़ात आजाद अज़ उलमा-ए आख़िरत इंद व विरसा अनबया इंद अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात वबेहतरीन ख़लाइक़ ईशानंद कि फ़रदाय कयामत स्याही ईशां रा बखून शुहदा फ़ी सबील अल्लाह वजन खोहहिंद कुर्द विपुला एं स्याही ख़्वाहिद चरबीद वनोम अलालमा इबादत दर शान ईशां मुतहक़्क़ अस्त,ईशानंद कि जमाल आख़िरत दर नज़र शां मुस्तहसिन आमदा वक़बाहत दुनिया विष्णुआअत आं मुशाहिद गश्ता आंरा बंज़र बक़ादीदनद वायुं रा बदाग ज़वाल मुतस्म याफ़्तुंद ला जुर्म ख़ुदरा बबाकी सुपर्दनद वाज़ फ़ानी बाज़ दाश्तनद,शहूद अज़मत आख़िरत समरा शहूद अज़मत जलाल ला यज़ाल अस्त विज़लील दाश्तन दुनिया विमा फ़ीहा अज़ लवाज़म शहूद अज़मत आख़िरत अस्त।’’

खबरदार! जो उलमा दुनिया से बे रगबत हैं और जाह व सरदारी और माल व मनफ़ात की मुहब्बत से आजाद हैं, उलमा-ए आख़िरत और अंबिया अलैहिम अस्सलवात व इलतसलीमात के वारिस हैं और मख़लूक़ में सब से बेहतर यही हैं कि कल कयामत में उन की स्याही को अल्लाह की राह में शहीद

होने वालों के खून के साथ तुला जाएगा और उन की स्याही का पल्ला भारी होगा, ‘‘उलमा का सोना इबादत है’’ उन्ही की शान में साबित है, उन लोगों की नज़र में जमाल आख़िरत मुस्तहसिन है और दुनिया की क़बाहत व शनाअत मुशाहिदा में आचुकी है। यह हज़रात आख़िरत को बका की निगाह से देखते हैं और दुनिया को दाग ज़वाल से दागदार पाते हैं, लाजिर्म ख़ुद को बाक़ी के सुपुर्द करते हैं और फ़ानी से बाज़ रखते हैं, आख़िरत की अज़मत का शहूद अज़मत जलाल ला यज़ाल (ख़ुदा) का समरा है और दुनिया को ज़लील रखना शहूद अज़मत आख़िरत के लवाज़म में से है।

आज हर एक अपने आप को नायब व वारिस रसूल ﷺ तसोर करता है और उन तमाम क़ुरआनी आयात वाहादीस का ख़ुद अपने आप को मिस्दाक़ समझता है जो इस सिलसिले में आई हैं जबकि हाल यह है कि जहां देखो दीन का सौदा दुनिया से करता फिरता है,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने आलम आख़िरत और वारिस नबी होने की कई अलामतें बता दें जिस से आप समझ सकते हैं कि हमारा सही रहबर और मजहबी क़ाइद कौन है?

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने मुतफ़र्रिक़ मुक़ामात पर जो तारीफ़ वितौसीफ़ फ़रमाई है अगर उन सब को जमा किया जाए तो तहरीर का फ़ी तवील हो जाए गी,उलमा तो उलमा रहे तलबा पर खर्च वगैरह की ताकीद फ़रमाते और उन की अज़मत दलों में बिठाते और आम सूफ़िया कराम पर उन्हें(तलबा को)तरजीह देते,एक दफ़ा सय्यद फरीद ने मौलाना कलेज को तलबा वसूफ़िया पर कुछ खर्च करने का हुक्म दिया और इस का हवाला हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू को लिखे गए एक ख़त में दिया आप क़ुद्दिस सिर्रहू पहले तो उन की इबारत का ‘‘जुज़ु खर्ची बराए तालिब उलमां वसूफ़ियां फ़ुर्सतादा शद’’ लिखते हैं इस के बाद फ़रमाते हैं:

‘‘ज़िक्र तक़दीम तालिब उलमां बुर सोफियां दर नज़र हिम्मत बसयार ज़ेबा दर आमद बहकम‘‘अलजाहिर अनवान अलबातिन’’ उम्मीद अस्त कि दर बातिन शरीफ़ नीज़ एं जमा कराम तक़दीम पैदा करदा बाशिंद

कल अना यत्रशह बिमा फिया।’’

तर्जुमा: मौसूफ़ ने जो यह ज़िक्र किया कि उन्हों ने तालिबान उलूम नबूय को सूफ़िया पर मुक़द्दम रखा है, यह सभी के नज़दीक बहुत ही उम्दा है, इस लिए कि ज़ाहिर बातिन का अनवान और पता होता है, उम्मीद है कि जनाब बातिन में भी तलबा को सूफ़िया पर मुक़द्दम रखते हूँ गे। इस लिए कि हर बर्तन से वही छलकता है जो इस में होता है।

इस के बाद फिर यों फ़ज़ाइल वुमनाक़िब बयान फ़रमाते हैं‘‘तालिब इलमों को मुक़द्दम करने में शरीअत को रिवाज देना है,शरीअत के हामिल यही हैं और मिलित मुस्तफ़व्य अला साहबहा अस्सलात वस्सलाम उन से क़ायम है,कल कयामत के दिन शरीअत के बारे में पो छें गे न की तसव्वुफ़ के बारे में ,जन्नत में दाखिल होना और दोज़ख से बचना शरीअत की बजा आवरी से वाबस्ता है,अनबया कराम अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात कि का नात में सब से बेहतर हैं,उन्हों ने शराए की दावत की है और निजात का मदार इसी पर रखा है उन अकाबिर की बिअसत से मकसूद शरीअत की तबलीग़ है पस सब से बड़ी खैरात तरवेज शरीअत में को शिष् करना है और इस के अहकाम से किसी हुक्म को ज़िंदा करना ख़ास कर इस जमाने में जब शाइर इस्लाम ख़त्म हो गए हूँ,राह ख़ुदा इज़ विजल में करूरों खर्च करना मिसाइल शरएहि में से किसी मसला को रिवाज देने के बराबर नहीं है क्योंकि इस फेअल में अनबया कि बुजुर्ग तरिन मख़लूकात हैं की इक़तिदा है अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात,और उन अकाबिर केसाथ मुशारकत है और साबित है कि कामिल तरिन हसनात उन्हें को सुपुर्द की गई हैं जबकि करूरों खर्च करना उन अकाबिर के अलावा को भी मयस्सर है।

नीज़ शरीअत को बजा लाने में नफ़्स की पूरी मुखालफत है क्योंकि शरीअत नफ़्स के खिलाफ़ वारद हुई है और अम्वाल खर्च करने में कभी नफ़्स माफ़िक़ होता है,जो

अम्वाल खर्च करना शरीअत की ताईद और मिलित की तरवेज के वास्ते हो दर्जा इलिया है और इस नियत से थोडी सी चांदी या एक पैसा का पचीसवाँ हिस्सा खर्च करना ला खों के खर्च के बराबर है जो इस नियत के गैर में हो।’’

उलग़र्ज़ हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू का मुतम्मा नज़र हर वक़्त अक़ाइद इस्लाम की तरवेज वाशाअत और उन की तरक्की थी,अहयाए सुन्नत उन्हें जान से ज़्यादा अजीज़ था,जिन बुजुर्गों से यह काम वजूद में आता वह उन्हें जान से ज़्यादा अजीज़ थे,उन की ताज़ीम वाकराम वह दीन की ताज़ीम वाकराम समझते थे,उन की गहरी नज़र हमेशा को शां रहती कि दीन के सही रहबरों से कौम वाबस्ता हो,अल्लाह वालों से जो इल्म वामल के हामिल और ख़ुदा के तालिब हूँ उन से लो गों का रब्त हो,जिन मुल्लाओं ने दीन को तबाह वबरबाद किया,अकबर को बिगाड़ा जिस के नतीजे में इस्लाम और अहले इस्लाम पर किया किया मुसीबतें आएं आप चाहते थे कि दीन के उन डकैतों को उमरा वामाइदीन पहचान लें ताकि फिर से फ़सादाद के वह चश्मे न फूटें जो फूट चुके थे और बमुश्किल तमाम जिन्हें बंद किया गया था।

एक वजह यह भी थी कि अकबर इस हद तक बिगड़ गया था कि अवाम तक ब आसानी इस के इस्लाम से इन्हिराफ़ को पहचान रही थी,जब ज़्यादा बाद होता है तो इंसान दूसरे का असर जिल्द कबूल नहीं करता है,मगर बुज़ूर हुकूमत अवाम को भी बिगाड़ा जा रहा था और यह बिगाड़ उलमा-ए सौ के हाथों से हुआ था,यह बिगाड़ अभी ताजे ताजे था उसे मुकम्मल तौर पर करार वस्बात हासिल नहीं हुआ था,अगर ख़ुदा नख़्वास्ता जहांगीर भी अपने बाप की रोष अपना लेता तो यह फसाद वबगाड़ और पुख्ता हो जाता फिर जिस तेजी के साथ यह फैलता और फिर इस्लाम वाहिल इस्लाम का हिंदोस्तान में जो हश्र होता उसे अहले दानिश ही समझ सकते हैं।

यह बातें हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के कलाम से जगह जगह मित्रशह होती हैं,आप का हस्सास क़ल्ब हर वक़्त इस टोह में लगा रहता कि बादशाह और इस के अमाइदीन के इर्द

गर्दसिर्फ़ और सिर्फ़ नेक,सालिह और ज़ी इल्म लोगों का हलक़ा हो ताकि अकबर की सारी को शिशें यक लख़्त फना हो जाएँ और इस के बुर खिलाफ़ तेजी से शाइर इस्लाम और अहकाम शरएहि को रिवाज हासिल हो और अलहम्द लिल्लाह आप अपने इख़लास,ख़ुदा तरसी और लग्न विमेहनत की वजह से का मयाब भी हुए,अपने बातिनी तसर्फ़ात से सिर्फ़ हिंदोस्तान ही नहीं बल्कि दुनिया को ज़लालत विगमरही के तारीक माहौल में हिदायत का चिराग दिखलाया।