अध्याय 7 में से 57पृष्ठ 100–115
विलादित व नसब
हज़रत इमाम रब्बानी मुजद्दिद अल्फ़ सानी उलशेख़ अहमद उलफ़ारुकी अलसरहंदी क़ुद्दिस सिर्रहू और उन के बाज़ आबा व अज्दाद के हालात में ‘‘तज़किरा मशाइख़ बाकूय मुजद्दिदय’’ में कलम बंद कर चुका हूँ। यहाँ निहायत इख़तिसार के साथ आप का मामूली तआरुफ़ अर्ज़ करता हूँ।
शब् जुमा 24 शवाल 971ह 1563 को शहर सरहिंद में रौनक अफ़्रोज़ आलम हुए। लफ़्ज़ ‘‘ख़ाशा’’ से आप की तारीख विलादित निकलती है। वालिद बुज़ुर्गवार ने अहमद नाम रखा। आप 31 वास्तों से हज़रत अमीर अलममनीन सय्यदना उम्र फ़ारूक़रज़ि अल्लाह अन्हु तक पहुँचते हैं। यह निस्बत आप की रग रग में समाई हुई थी और वह हिम्मत व जुरात और ग़ैरत हमीयत पैदा करती थी कि बयान से बाहर है, आगे चल कर जिस के जिलो से बहुत ज़ाहिर हुए हज़रत मख़दूम के आप के अलावा छ बेटे और थे वस्त आप ही थे यानी आप से तीन बड़े और तीन छोटे थे।
तहसील इल्म:
आप के मुबारक घराने में इल्मी व अमली व रूहानी माहौल पहले हमेशा रहा है। आप के वालिद ग्रामी इल्म व इरफान की इस मंज़िल पर फ़ाइज़ थे कि बड़े बड़े औलीए कराम आप के घर आया करते थे ख़ास कर सिलसिला आलीया कादरिया के अज़ीम तरिन बुजुर्ग हज़रत शाह कमाल कैथली जिन के बारे में हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाया करते थे कि हज़रत ग़ौस आज़म के बाद उन के ख़ुलफ़ा में शाह कमाल जैसा बुजुर्ग कोई नज़र नहीं आता
है। हज़रत शाह कमाल की आप पर बड़ी ख़ास नज़र थी। एक मर्तबा आप बीमार हुए, आप की वालिदा माजिदा हज़रत शाह कमाल कैथली साहिब की ख़िदमत में ले गईं।
हज़रत शाह कमाल ने अपनी ज़बान मुबारक आप के मुँह में दे दी, आप काफ़ी देर तक उन की ज़बान चूसते रहे, फिर शाह साहिब ने फ़रमाया कि खातिर जमा रखो यह लड़का बड़ी उम्र का मालिक होगा और अपने जमाने का आलम व आमिल और आरिफ होगा, मेरे तेरे जैसे इस से बहुत पैदा हूँ गे।
आप की मुक़द्दस पेशानी से आसार होश मंदी व बुज़ुर्गी अयाँ थी जब होश संभाला तालीम का आगाज़ हो गया, चंद माह में कुरआन पाक हिफ़्ज़ फ़रमाया, फिर उलूम मतदावला की तरफ़ मुतवज्जा हुए, ज़्यादा तर उलूम व फ़नून आप ने अपने वालिद बुज़ुर्गवार से हासिल किए और हर इल्म को निहायत तदक़ीक़ से पढ़ा था बुला काहाफ़िज़ा और जेहन रसा पाया था। फिर कुछ उलूम में महारत ताम्ह की खातिर आप स्यालकोट गए जहां बाज़ कुतुब माक़ूलात मसल अज़दी वगैरह अपने दौर के जबरदस्त फ़ाज़िल व मुहक़्क़ हज़रत शाह कमाल कश्मीरी और बाज़ कुतुब अहादीस हज़रत मूलान याकूब कश्मीरी से पढ़ें। अव्वल अलज़कर (शाह कमाल कश्मीरी) मंतिक़ व फलसफा, इल्म कलाम व उसूल फ़िक़्ह में मुमताज़ उलमा से थे, इल्म व फजल, ज़कावत व ज़हानत, कुव्वत हाफ़िज़ा कसरत मुताला में इस वक़्त में अपना नज़ीर नहीं रखते थे। अज़दी वगैरह आप ने उन्ही से पढ़ें। मशहूर ज़माना फ़ाज़िल अल्लामा अब्द अलहकीम स्यालकोटी आप के तलामज़ा से हैं।
हज़रत मौलाना याकूब इब्न उलहसन अलसर्फी कश्मीरी की 908ह में कश्मीर में विलादित हुई। तहसील इल्म और हुसूल तरीका के लिए समरकन्द का सफर किया जहां शैख़ हसीन ख़वारज़मी से तरीका कब्रव्य हासिल किया और एक अरसा तक उन की सोहबत में रहे। हिजाज़ जा कर इल्म हदीस हासिल किया और वहाँ से फ़िक़्ह, हदीस और तफसीर की नफीस किताबें अपने साथ लाएं। 12 ज़ी कादा 1003ह में उन की वफ़ात हुई। (तारीख दावत)
यों तोआप बहुत से उलूम में यद तौला के मालिक थे ख़ास कर इल्म हदीस में तो कोई जवाब नहीं रखते थे और मशहूर ज़माना मुहक़्क़ व मुहद्दिस हज़रत शैख़ शहाब उद्दीन अहमद इब्न हिज्र हैतमी मक्की के शागिर्द रशीद थे रहमत अल्लाह अलैहिम अजमईन रहमत वासु।
इस के अलावा हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने तफसीर वाहिदी व दीगर मुअल्लिक़ात वाहिदी और तफसीर बैजई और दीगर मुसन्निफ़ात बुखारी व मुश्का अलमसाबेह शमाइल तिरमिज़ी व जामा सग़ीर सेवती व क़सीदा बुर्दा व गैरह की इजाजत आलम रब्बानी क़ाज़ी बहलूल बदख़शानी से हासिल की थी। क़ाज़ी मौसूफ़ को कुतुब मज़कूरा की इजाजत शैख़ अब्द अलरहमान इब्न फहदा से थी जिन का घराबा व अज्दाद से बीत अलहदीस चलाआता था। क़ाज़ी साहिब से हदीस मुसलसल की भी इजाजत पाई थी। ख़्वाजा मुहम्मद हाशिम रहमत अल्लाह अलैहि हज़रत मुजद्दिद के हवाले से बयान करते हैं कि जब यह इजाजत ली तो ऐसा महसूस हुआ कि मुझे मुहद्दिसीन के तबके में दाखिल कर लिया गया।
मुख़्तसर यह कि सत्रह साल की उम्र में जुमला उलूम व माकूल व मनक़ूल, फ़ुरू व उसूल से फ़राग़त हासिल की। उलूम में इस क़द्र बुलंद पाया मक़ाम हासिल था कि आप की इमामत के सब कायल हैं। इल्म कलाम में आप को बारगाह नबवी ﷺ से इजतिहाद की बशारत मिली।
फ़राग़त के बाद आप ने तदरीस का काम शुरू कर दिया और एक मुद्दत दराज़ तक उलूम व फ़नून से तलबा को फ़ैज़ याब फ़रमाया। इसी दौरान तसनीफ़ व तालीफ़ का काम भी शुरू कर दिया। रिसाला तहलीलीय, रद्द शीया इसी जमाने की तसनीफ़ हैं। इस दौरान आप सरहिंद से आग्रह आये जो इस वक़्त दार अलहकूमत और उलमा व फुज़िला का जबरदस्त मरकज़ था। अबुलफ़ज़ल व फ़ैज़ी से आप की सोहबत व क़ुरबत भी रही मगर मसलक के इख़तिलाफ़ात की वजह से ताल्लुकात में उस्तवारी न आस्की। वाक़ियात से मालूम होता है कि अबू अलफ़ज़ल और इस का बिरादर फ़ैज़ी उलूम व फ़नून में बुलंद मक़ाम रखने के बावजूद हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के तफ़ौक़ व बरतरी के कायल थे और शायद इस जमाने के उलमा में उन दोनों की नज़र में उलूम व फ़नून में इतना बुलंद
पाया कोई आलम न था। अबू अलफ़ज़ल व फ़ैज़ी दोनों आप की सोहबत के हरीस थे।
आग्रह सफर के किया असबाब थे इस का सही पता नहीं चल पाया। हो सकता है शौक इल्म व सोहबत उलमा ले गया हो, आगे चल कर आप ने जो काम किया और जिस अक्ल व दिमाग से किया वह बताता है कि तबीअत में तेजी व फिरती हालात को समझना और काम की राह पैदा करना सब कुछ आगाज़ ही से था, ज़िबदत उलमुक़ामात से पता चलता है कि अबू अलफ़ज़ल फुज़िला का काफ़ी क़द्र दान था और इस के यहाँ फुज़िला की आमद व रफ्त रहती थी ख़्वाह तहसील मआश के लिए या इल्म व फन की हुनर आज़माई के लिए। क़ल्ब नाजुक पर इस वक़्त किया बीत रही होगी जब इस्लाम और अहले इस्लाम का खून किया जा रहा हो। आप किस तरह बेचैनी की करवटें ले रहे हूँ गे, ग़यूर दिल पर किया किया आलाम की बौछार हुई होगी, यह आप का ख़ुदा ही जानता है। बह्र हाल यह औसाफ़ एक दम वजूद में नहीं आजाते हैं, यह जज़्बात शुरू ही से पाए जाते हैं। अभी आप पढ़ें गे कि आगाज़ जवानी में ही हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू को किस क़द्र ग़ैरयत व हमीयत हासिल थी। बह्र हाल आप का क़याम आग्रह में तवील हुआ, वालिद बुज़ुर्गवार को यह मुफ़ारिक़त बर्दाश्त न हुई तो आप आग्रह अपने लख़्त जिगर नूर नज़र को लेने के लिए गए।
हज़रत मख़दूम क़ुद्दिस सिर्रहू की इमरास वक़्त काफ़ी हो चुकी थी इतना लंबा सफर कर के आग्रह इस उम्र पर पहुँचे तो आशना लोगों को बड़ा ताजब हुआ। एक फ़ाज़िल ने पूछ ही डाला कि आप ने इतनी जहमत क्यों उठाई तो आप ने फ़रमाया: फ़रज़न्द दलबंद शैख़ अहमद सल्लमा अल्लाह का शौक मुलाक़ात। चों कि उन को बाज़ जरूरीयात की बना पर मेरे पास आना मयस्सर नहीं हो पाया इस लिए हम आगये। (बरकात अहमदिया)
आप के वालिद बुज़ुर्गवार आप को अपनी जान अजीज़ से भी ज़्यादा चाहते थे और दिल्ली तमन्ना रहती थी कि हमारा फ़रज़न्द हमारी सोहबत में रहे। हज़रत मख़दूम आप से उलूम दयनीय के दक़ायक़ और यक़ीनी इसरार बयान फ़रमाया करते थे। (बरकात अहमदिया)
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के अलावा हज़रत मख़दूम के छ बेटे थे। आप से तीन बड़े और तीन छोटे। तमाम फ़र्रज़िंदों में आप से जो लगाव और मुहब्बत हज़रत मख़दूम को था वह किसी से न था। हज़रत मख़दूम ख़ुद साहिब निस्बत और अहले कश्फ़ से थे, बड़े बड़े बुजुर्गों के परवर्दा आप की बातिनी नज़र ने भी अंदाजा लगा लिया था कि मेरा यह फ़रज़न्द किया होने वाला है नीज़ आप की विलादित बा सआदत के मौका पर और इस के बाद के बुजुर्गों की बशारतें और ख़ुद आप की सलाहीयत व इस्तिदाद वगैरह यह वह उमूर थे जिन की वजह से आप को यकीन था कि मेरा फ़रज़न्द आगे चल कर वह काम करेगा जो बमुश्किल ही कोई कर पा या होगा। बह्र हाल हज़रत मख़दूम क़ुद्दिस सिर्रहू आप को ले कर सरहिंद के लिए रवाना हो गए।
दिहली और सरहिंद के दरमियान शहर थानेसर से गुज़र हुआ तो वहाँ के शैख़ सुलतान जो कि अपने वक़्त के काफ़ी बड़े रईस व मालदार और आलम व फ़ाज़िल नीज़ बादशाह के मुक़र्रब थे और शहर के हाकिम थे, बड़े एहतिराम से पेश आये और आप को अपने यहाँ मेहमान रखा। एक ग़ैबी इशारा की वजह से या हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के फ़ज़ाइल व कमालात देख कर ख्वाहिश मंद हुए कि अपनी बेटी का रिश्ता हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू से कर दें। हज़रत मख़दूम क़ुद्दिस सिर्रहू से पेश कश की, आप ने मंजूर फ़रमा लिया और वहीं आप का निकाह हो गया, फिर वहाँ से हज़रत मख़दूम अपने फ़रज़न्द व बहु को ले कर सरहिंद पहुँचे। फिर जब तक हज़रत मख़दूम क़ुद्दिस सिर्रहू बाहयात रहे आप सरहिंद में ही मुकीम रहे। आप ने हज़रत मख़दूम क़ुद्दिस सिर्रहू की ख़िदमत व सोहबत को लाज़िम कर लिया और हज़रत मख़दूम के ज़ाहिरी व बातिनी फ़ैज़ान से माला माल होते रहे। हज़रत मख़दूम के फ़ैज़ से जहां आप को उलूम दयनीय के दक़ायक़ में दर्जा इमामत हासिल था वहीं आप को बातिनी इसरार व हक़ायक़ में बुलंद मक़ाम मयस्सर आया। आप ख़ुद फ़रमाते हैं : इस दरवेश को निस्बत फ़रदीयत अपने पिदर बुज़ुर्गवार से हासिल हुई और पिदर बुज़ुर्गवार ने इस को एक शैख़ जो कि जज्बा कवी रखते थे
(यानी हज़रत शाह कमाल क़ुद्दिस सिर्रहू) और करामात में मशहूर थे, से हासिल किया था नीज़ इस दरवेश को इबादत नाफ़िला ख़ास कर सलात नाफ़िला की तौफ़ीक़ में मदद पदरबुज़ुर्गवार से है और पिदर बुज़ुर्गवार को यह सआदत अपने शैख़ (अब्द अलक़ुदूस गंगोही क़ुद्दिस सिर्रहू) से हासिल हुई थी जो कि सिलसिला चिश्तिया में थे।(बरकात अहमदिया)
इस के अलावा ख़ुद बचपन में आप ने हज़रत शाह कमाल क़ुद्दिस सिर्रहू अंजार खासा हासिल फ़रमा ली थीं और आप के हाफ़िज़ा में उन का पूरा तसोर मोद था। हज़रत शाह कमाल क़ुद्दिस सिर्रहू की यह ख़ुसूसी और जुदागाना अताएँ कि जब हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू का शहरा इल्म व फजल चारों तरफ़ फैल रहा था इस वक़्त शाह सिकंदर वह ख़ुसूसी जबह ले कर हाजिर ख़िदमत हुए थे जिस के बारे में शाह कमाल ने वाक़ियात में मुकरर ताकीद फ़रमाई थी। हज़रत शाह सिकंदर इस जान से ज़्यादा अजीज़ चीज़ को किसी हाल में जुदा नहीं करना चाहते थे, जुदा करना तो बड़ी बात है घर से निकालना भारी था जब हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने इस जबह को ज़ेब तन फ़रमाया इस वक़्त कादरी बुजुर्गों की कैसी नवाज़िशात थीं फिर दीगर बुजुर्गों ने भी किस क़द्र आप को चाहा और नवाजा इस की तफ़सील बरकात अहमदिया वगैरह में आप पढ़ सकते हैं।
उलग़र्ज़ आप ने अपने वालिद बुज़ुर्गवार से उलूम व फ़नून और कादरी व चिश्ती अनिवार व बरकात का एक वाफ़र हिस्सा हासिल फ़रमाया। मदीना तैबा की ज़ियारत और हज बीत अल्लाह का शौक आप को रह रह कर तड़पाता था मगर चों कि वालिद बुज़ुर्गवार क़ुद्दिस सिर्रहू सन रसीदा बुजुर्ग थे बजाहिर उन की रहलत क़रीब थी इस लिए हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू शौक ज़ियारत के बावजूद सरहिंद से न निकले। 1007ह में हज़रत मख़दूम क़ुद्दिस सिर्रहू का विसाल हो गया।
तहसील कमालात, हज़रत ख़्वाजा बाक़ी बिल्लाह क़ुद्दिस सिर्रहू से बीअत:
हज़रत मख़दूम के विसाल के बाद आप हरमैन शरीफ़ैन की ज़ियारत के लिए
(1008ह) रवाना हुए, दिहली पहुँचे, मौलाना हसन कश्मीरी से मुलाक़ात हो गई, आप ने यह सफर काफ़ी खामोशी से किया था। हज़रत कश्मीरी से आप के पुराने ताल्लुकात थे, उन्हों ने हज़रत सय्यदना ख़्वाजा मुहम्मद बाक़ी क़ुद्दिस सिर्रहू का ज़िक्र खैर किया और मुलाक़ात की रगबत दिलाई। हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के वालिद बुज़ुर्गवार क़ुद्दिस सिर्रहू अगरचे कादरी व चिश्ती बुजुर्गों के फ़ैज़ याफताह थे मगर नक़्शबंदी बुजुर्गों से मुलाक़ात का इश्तियाक़ बहुत था और तलाशी के बावजूद किसी कामिल नक़्शबंदी बुजुर्ग से मुलाक़ात न हो सकी थी इस वक़्त सिलसिला नक़्शबंदिया हिंदोस्तान में बहुत कम मारूफ़ था लेकिन हज़रत मख़दूम क़ुद्दिस सिर्रहू कितने क़रीब से वाकिफ़ थे कि उन्हों ने यहाँ तक फ़रमाया था : ‘‘मरकज़ एं दायरा व शाह राह एं बादय ब दस्त ताइफा नक़्शबंदिया उफ़्तादा अस्त।’’
हज़रत मौलाना कश्मीरी रहमत अल्लाह अलैहि ने जब बताया तो हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू को मुलाक़ात का शौक हुआ। आप हाजिर ख़िदमत हुए। हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू बड़ी मेहरबानी से पेश आये। आप का क़सद व इरादा मालूम फ़रमाया। जब आप ने बताया कि ज़ियारत हरमैन शरीफ़ैन के अज़म से निकला हूँ, हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू ने रगबत ज़ाहिर फ़रमाई कि एक हफ्ते या महीना भर फ़िक़रा की सोहबत में रहो। हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू का यह तरीका न था, लोग ना मालूम कितने चक्र लगाते थे तब कहीं बारियाब हो पाते थे किसी को भी आप रोकते न थे इतने दिनों की मेजबानी तो बड़ी बात है मगर हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू उन के ख़ालिक़ व मालिक जल व अला ने वह रूहानी व बातिनी चश्म बातिन अता फ़रमाई थी कि एक ही नज़र में आप ने सब कुछ पढ़ लिया था कि आने विला हमारे फ़ैज़ से आगे किया बनेगा।
आप ने हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू के हुक्म के मुताबिक हफ्ते भर क़याम का इरादा कर लिया अभी दो रोज़ भी न गुजरे थे कि दिल में निस्बत नक़्शबंदिया की तहसील की रगबत मौजें मारने लगी। आप ने रगबत का इज़हार फ़रमाया तो हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू ने इस्तिख़ारा
किए बग़ैर आप को तन्हाई में ले जा कर बीअत किया और ज़िक्र ख़फ़ी की इबतिदा की, फ़ौरन क़ल्ब जाकिर हो गया, हलावत व चाशनी पैदा हुई और फिर रोज़ बरोज़ तरक़्क़ीयात व उरूजात के ऐसे दरवाजे खुले कि बयान में नहीं आसक्ति हैं। आप अगर उन उरूजात की तफ़सील पढ़ना चाहें तो इबतिदाई मक्तोबात पढ़ें जो हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू की ख़िदमत में लिखे गए हैं। आप को मालूम हो जाएगा कि जिस सुरअत व तेजी से आप ने सुलूक तै किया वह अपनी मिसाल आप है जो कुछ हालात पेश आतेआप बालतफ़सील हज़रत ख़्वाजा से अर्ज़ करते जब सरहिंद आगये तो मक्तोबात के ज़रिया मारूज़ात पेश करते रहे आप तीन मर्तबा दिहली अपने मुर्शद आली वक़ार की ख़िदमत में हाजिर हुए; पहली मर्तबा हज़रत ख़्वाजा के इरशाद के बमूजब हफ्ते भर क़याम के लिए मेहमान बिन कर ठहरे मगर फिर मुरीद बिन गए और नवाज़िशात मुर्शद देख कर तक़रीबन ढाई माह क़याम फ़रमाया, इस पहले सफर में ही आप को हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू ने तमाम व कमाल निस्बत नक़्शबंदिया के हुसूल की बशारत दी आप वापस सरहिंद आगये और अपने घर के क़रीब एक मस्जिद बनाम ‘‘मर्दान ख़ुदा’’ 1008ह में तामीर फ़रमाई।
यही वह मुबारक मस्जिद है जो आज भी अहले दिल के लिए क़िबला तवज्जो है, रशद व हिदायत का यही वह मरकज़ था जहां बैठ कर इरशाद व हिदायत का वह काम किया गया जिस की मिसाल नहीं। लाखों करोड़ों बंदगान ख़ुदा ने यहाँ सुबह व शाम दरबानी करके दौलत वस्ल व इरफान हासिल की, फ़ैज़ व इरफान के वह चश्मे फूटे जिन्हों ने पूरे आलम को अपनी आगोश में ले लिया, हर अमीर व गरीब का मस्किन व मावा यही मुबारक मस्जिद बनी। आज भी अहले बातिन जिस के अनिवार पर महव हैरत बने रहते हैं इस ढाई माह की सोहबत में हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने किया पाया और हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू इस हाल में किया इस्तिकबाल मुलाहिजा फ़रमाया इस का अंदाजा इस वाक़ा से लगाया जा सकता है जिस को हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू ने उन्ही अय्याम में एक मुख़लिस को
तहरीर फ़रमाया, फ़रमाते हैं ‘‘शैख़ अहमद नाम मुर्दे अस्त दर सरहिंद कसीर अलालम व कवी उलअमल रोज़े चंद फ़क़ीर बा अव नशिस्त।
‘‘सरहिंद में बहुत इल्म और कवी अमल वाहे एक शख्स रहते हैं उन का नाम शैख़ अहमद है, कुछ दिन फ़क़ीर उन के साथ रहा, उन के औज़ा व अत्वार से बहुत कुछ अजाइबात ज़ाहिर हो रहे हैं,में महसूस करता हूँ कि वह ऐसा रोशन चिराग हूँ गे जिस से दुनिया रोशन हो जायेगी उन के कमालात को देख कर अल्लाह के फजल से मुझ को इस का यकीन है, आप के बिरादरान और अक़्रबा भी नेक और उलमा की जमात में से हैं, उन में से बाज़ अफराद से मेरी मुलाक़ात हुई है, मेरी नज़र में वह सब जवाहर आलीया हैं, उम्दा सलाहीयत के मालिक हैं, शैख़ मज़कूर की औलाद जो अभी कम उम्र बचे हैं, इसरार इलाही हैं।
खुलासा कलाम यह कि वह मसल शजरत तैब के हैं, अल्लाह उन की अच्छी परवरिश फ़रमाए, अयाल की कसरत और फक्र व बे मआशी की वजह से इस जमात को तकलीफ़ का सामना करना पड़ता है, अगर चालीस में से एक की कोई मिक़दार इस घराने के वास्ते मुक़रर कर दें कि हर साल पहुँच जाया करे और यह कातब इस की तकसीम मुक़रर कर दे तो बेहतर और मोरिस खैर कसीर से यह मिक़दार चाहे कितनी ही कम हो खैरात में रुकन अज़ीम रहे, यह लोग अल्लाह तआला के दर के फ़िक़रा हैं, अजीब व गरीब दिल रखते हैं, ज़्यादा गुस्ताखी’’
हज़रत मौलाना ज़ैद की किताब (हज़रत मुजद्दिद औरइन के नाक़िदीन) से रुक़ा नंबर 65 की इबारत का तर्जुमा में ने सुपुर्द कलम कर दिया, असल इबारत किताब मज़कूर में मौजूद है। मौसूफ़ ने इस के अलावा भी हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू के मुतअद्दिद रक़ात नकल किए हैं, यह रक़ात हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू के किसी मुख़लिस ने जमा फ़रमाए हैं। हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू ने उन रक़ात में जो कुछ हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के ताल्लुक से फ़रमाया है आप पढ़ें गे तो मालूम होजाएगा कि हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू
किया एतिक़ाद रखते थे और हज़रत मुजद्दिद की अहमियत किया थी जो बुलंदियां हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू को हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की ज़ात में नज़र आरही थीं उन का जिस गहराई से आप ने एतराफ़ किया है वह कम किसी मुर्शद ने मुरीद के हक़ में किया होगा, रक़ात की तफ़सील आप ‘‘हज़रत मुजद्दिद और उन के नाक़िदीन’’ में पढ़ें।
मज़कूरा बाला रुक़ा से पता चलता है कि यह किसी साहिब स्रोत इंसान को लिखा गया है। हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की इस पहली और मुख़्तसर सोहबत में हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू ने किया देखा था यह बिलकुल अयाँ है। हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू की रोशन ज़मीरी और बुलंदी नज़र मार्फत में कमाल कौन नहीं जानता है, आप की ज़िन्दगी जिस ने पढ़ी है वह जानता है कि अपने महबूब हक़ीक़ी को पाने के लिए हज़रत ख़्वाजा ने किया किया मसाइब झेले और कैसे कैसे मुजाहिदात किए और फिर परवरदिगार जल व अला ने क़ुर्ब व इरफान में जो बुलंद दर्जा अता फ़रमाया था और कितनी एहतियात से आप ने हयात मुबारका के लम्हात बसर फ़रमाए, हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू ने जो कुछ हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के बारे में फ़रमाया है, उसे पढ़ कर लोगों को बड़ा ताजब होता है और बाज़ लोग तरह तरह की तावीलात करने लगते हैं, पता नहीं हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू का अपने इस चहेते मुरीद के बारे में यह एतराफ़ और इज़हार हक़ीक़त क्यों नागवार गुजरता है। हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू के यह इर्शादात महज़ तवाज़ा व इन्किसारी पर महमूल करना मेरी नज़र में हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू की दौरंदेशी से मुनकर होना है।
हक़ीक़त यह है कि हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू ने इतने अर्से में हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की सलाहीयत व इस्तिदाद और जो काम उन के सुपुर्द होने वाला था, जिन बुलंदियों पर पहुँचने वाले थे यह सब कुछ बालीक़ीन मुशाहिदा फ़रमा लिया था जब भी कोई बुलंद ख़याल इंसान वजूद में आता है दौर और हालात के लिहाज से वह नुमायाँ काम करता है, बुलंद माख़ज़ होता है
जहां से वह बोलता है वहाँ तक अख़स उलख़वास के अलावा किसी की रसाई होती नहीं है तो लोग आम तौर पर इस के बारे में बहकी बहकी बातें करने लगते हैं, तरह तरह से मौरिद इल्जाम ठहराते हैं।
हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू की बातें चों कि अपने मुरीद रशीद के हक़ में एक संद की हैसियत रखती थीं लिहाज़ा आप ने तमाम मुख़लिसीन और दुनिया के इंसानों को पहले ही से आगाह फ़रमा दिया और वह हक़ायक़ ज़ाहिर फ़रमा दिए। अगर हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू की उन हिदायात और इज़हार कमालात का सही तरीके से एतराफ़ कर लिया जाता तो बाद में हज़रत मुजद्दिद की बुलंद कामत शख्सियत और उन के इज़हार कमालात को ताजब की निगाह से न देखा जाता। पहली सोहबत में हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू ने जो कुछ महसूस फ़रमाया वह वह आप की बुलंदी नज़र की खुली दलील है और पूरी ज़िन्दगी की तरफ़ इशारा है।
हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू के मुतवस्सिलीन में बड़े बड़े बाकमाल और क़ुर्ब के हामिल अफराद थे ख़ास कर शैख़ ताज संभली जैसे बुजुर्ग जिन की अज़्मतों के डंके दयार अरब में ऐसे बजे कि हज़रत शाह वली अल्लाह जैसे इंसान को एतराफ़ करना पड़ा कि दुनिये अरब में इतना मकबूल कोई नहीं हुआ। इस के बावजूद हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू ने किसी के बारे में आखिर इस तरह का इज़हार ख़याल क्यों नहीं फ़रमाया और न इस की ताज़ीम व तौक़ीर की जो हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की की और न किसी के हवाले अपने मुरीदैन फ़रमाए न अपने फ़र्रज़िंदों पर किसी से तवज्जो डलवाई अगर मुजद्दिदी हज़रात ने इस किस्म के कमालात किताबों में तहरीर कर दिए तो बाज़ लोगों के जिगर फटने लगे और इस को वह हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू की तौहीन समझने लगे, फ़हम की कोताही से ऐसे ही नताइज बरामद होते हैं अगर गौर से देखा जाए तो यही चीज़ हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू की बड़ी बालिग नज़री की दलील है और हज़रत क़ुद्दिस सिर्रहू के बारे में इस तरह के खयालात का इज़हार फ़रमाकर आप ने
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू को आगाज़ ही से एक मुस्लिम अलसबूत शख्सियत और हर एक के लिए संद बनाने की जो कोशिश फ़रमाई है वह अपनी मिसाल आप है।
हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू के बयानात पर एतिमाद करते हुए अगर आगाज़ ही से लोग हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू को वाक़ई हैसियत दे देते तो इस जमाने में और बाद में निरे लोग महरूमी का शिकार न होते और हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की मईयत में दीन व सुन्नत की वह नुमायाँ ख़िदमत अंजाम देकरकरब हक़ की बुलंद मंजिलों पर फ़ाइज़ होते। अब चंद बयानात आप समाअत फ़रमालें जिन से हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के जहां सारे खद व ख़ाल आप के सामने आजाऐं गे वहीं हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू की दूरबीनी का भी पता चल जाएगा।
हज़रत मौलाना बदर उद्दीन क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं: आप अपने वतन (सरहिंद) से तीन मर्तबा हज़रत ख़्वाजा की ख़िदमत में हाजिर हुए; पहली मर्तबा हज़रत ख़्वाजा ने दौलत कामिल व तकमील नीज़ मदारिज क़ुर्ब व निहायत की तरकियों के हुसूल की खुश खबरी दी जैसा कि उपर मज़कूर है, दूसरी मर्तबा हज़रत ख़्वाजा ने आप को तालिबान हक़ के इरशाद व इफ़ादा की इजाजत दी और खिलाफत की ख़िलअत इनायत फ़रमाई और अपने मुंतख़ब अस्हाब की एक जमात आप के हमराह करदी और उन की तरबीयत आप के हवाला करदी, तीसरी मर्तबा जब आप हज़रत ख़्वाजा की ख़िदमत में पहुँचे और हज़रत ने आप की आमद की खबर सन्नी तो पाप्यादा आप का इस्तिकबाल के लिए किला फिरोजी से जो हज़रत का मस्किन मुबारक था काबुली दरवाजा तक पहुँचे और बहुत एज़ाज़ व इकराम के साथ आप को हमराह ले गए।
साहिब हज़रात अलक़ुद्स ने बवक़्त इनइक़ाद मजलिस का हाल बयान किया और वह निहायत उदक़ सवाल किया जो हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू ने हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू से किया और हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू निहायत मबनी बुर हक़ीक़त इस का जवाब अर्ज़ किया। हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस स
सिर्रहू का सवाल इस बात की खुली दलील है कि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू इल्म और कश्फ़ व मुशाहिदा और उरूज व इर्तिक़ा की इस बुलंदी पर फ़ाइज़ थे जिस तक आम औलिया अल्लाह की रसाई नहीं थी।
महशी ने तीनों मर्तबा हाजिरी की यह तफ़सील बयान की है कि पहली मर्तबा रबी इलआख़िर 1008ह में, दूसरी मर्तबा रमजान से ज़ी कादा 1009ह में और तीसरी मर्तबा 1012ह में हज़रत ख़्वाजा रहिमा अल्लाह की वफ़ात से चंद माह क़ब्ल, फिर जब वापसी हुई तो लाहौर में हज़रत ख़्वाजा की वफ़ात की खबर सन्नी तो वापस दिहली गए वहाँ अक्सर हज़रात ने आप के हाथ पर तजदीद बीअत की लेकिन बाज़ के दिल में वस्वसा पैदा हुआ। (देखें हज़रात अलक़ुद्स का यही दूसरा दफ्तर, हज़रत सोम)
फिर मौलाना बदर उद्दीनरहमत अल्लाह अलैहि फ़रमाते हैं: ग़रज कि इस तीसरी मर्तबा हज़रत ख़्वाजा ने आप का एहतिराम व इकराम हद से ज़्यादा किया। चनां चह जब हज़रत ख़्वाजा अपनी जगह से उठते तो उलटे पावं जाते कि कहीं आप की तरफ़ पुश्त न हो जाए और रास्ता चलने में भी हज़रत ख़्वाजा यही मामूल रखते बल्कि तालिबेन और हाज़िरीन को भी हुक्म था कि आप की मौजूदगी में मेरी ताज़ीम हरगिज़ न करना और उन्हों ने अपने तमाम मुरीदों को आप के हवाला कर दिया बल्कि अपने साहिब ज़ादों को जो अभी शेर ख़वार थे तलब फ़रमा कर आप की तवज्जो के लिए पेश करदिया जैसा कि उन दोनों साहिब ज़ादों के मुताल्लिक़ दफ्तर अव्वल में अर्ज़ किया जा चुका है। हज़रत ख़्वाजा के बाज़ अस्हाब हुज़ूर में नहीं थे तो उन की ग़ायबाना तरबीयत के लिए आप से ख्वाहिश की गई, फिर हज़रत ख़्वाजारहमत अल्लाह अलैहि का रशाद हुआ कि हमारी पेरी मुरीदी का मक़सद सिर्फ़ आप का ज़ुहूर था इस लिए अब हम ने मुशेख्त तर्क करदी है।’’
हज़रत सोम में दर्जा 4 के तहत हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू के बयान को नकल करते हुए फ़रमाते हैं कुतुब अलमहफ़क़ीन ख़्वाजा मुहम्मद बाक़ी क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते कि हज़रत मौलाना ख़्वाजगी इमकंगी क़ुद्दिस सिर्रहू ने हम को हुक्म दिया कि हिंदोस्तान जाओ, वहाँ यह सिलसिला
तुम्हारी वजह से फ़रोग़ पाएगा। में ने ख़ुद को इस ख़िदमत का अहले न पाकर उज़्र किया तो हज़रत ने इस्तिख़ारा करने का हुक्म दिया, में ने इस्तिख़ारा किया तो मालूम हुआ कि एक तोता एक शाख पर बैठा है, में ने दिल में ख़याल किया कि अगर यह तोता इस शाख से उड़ कर मेरे हाथ पर बैठता है तो मुझे इस सफर में कामयाबी होगी। बस यह ख़याल किया ही था कि वह तोता उड़ कर मेरे हाथ पर बैठ गया और में ने इस की चोंच अपने मुँह में ले ली और अपना लुआब उसे चट्टा दिया तो वह बोलने लगा। दूसरी बार फिर में ने इस की चोंच अपने मुँह में ले ली तो इस ने मेरे मुँह में शकर डाल दी।
इस वाक़ा की ताबीर में ने इस तरह की कि तोता चों कि हिंदोस्तान का एक परिंदा है इस लिए हिंदोस्तान का एक बुजुर्ग मुझ से ताल्लुक करेगा जो मआरिफ़ व हक़ायक़ बयान करेगा और मुझे भी इस से फायदा पहुंचेगा। में ने यह वाक़ा और इस की ताबीर हज़रत (इमकंगी) को सुनाई तो उन्हों ने फ़रमाया कि इस वाक़े की यही ताबीर है जो आप के दिल में आई है और एक अर्से से हमारे बुजुर्ग इस बुजुर्ग के इंतजार में हैं, जल्दी करू और इस बुजुर्ग को पकड़ो, मालूम हुआ कि वह बुजुर्ग तुम्हारे दामन से परवाज़ हासिल करेगा।
हज़रत ख़्वाजा बाक़ी बिल्लाह क़ुद्दिस सिर्रहू ने हज़रत मुजद्दिद से खिताब करके फ़रमाया कि फिर मेरे नज़दीक यह वाक़ा और यह ताबीर आप ही के मुताल्लिक़ है। चनां चह हज़रत ख़्वाजा की ताबीर के मुताबिक ही हक़ीक़त रौनुमा हुई। हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू ने तरबीयत व तालीम मुरीदैन की जब आप के हवाले फ़रमाई तो हज़रत सय्यद मुहम्मद नोमान क़ुद्दिस सिर्रहू को भी फर माया इस वक़्त का क़िस्सा आप हज़रत ख़्वाजा मुहम्मद हाशिम क़ुद्दिस सिर्रहू की जुबानी समाअत फरमाएं जो पीर साहिब के मुरीद भी हैं और दामाद भी। हज़रत सय्यद साहिब का कौल नकल करते हुए फ़रमाते हैं कि इस फ़क़ीर नोमान से भी फ़रमाया कि उन की (मियां शैख़ अहमद) ख़िदमत को अपनी सआदत जान कर लाज़िम कर लो चों कि वह मेरे पीर भाई थे इस लिए नफ़्स में
ख़ुद्दारी की वजह से में ने अर्ज़ किया कि मेरी तवज्जो का क़िबला आप की दरगाह है। हर चंद वह बुजुर्ग हैं आप ने अज़ रवे गजब फ़रमाया कि मियां शैख़ अहमद वह आफताब हैं कि हम जैसे हजारों सितारे उन के ज़िमन में गुम हैं और औलीए मुतक़द्दिमीन के कामिल तरिन लोगों में ख़ाल ख़ाल उन के मसल हुए हूँ गे।’’
हज़रत ख़्वाजा मुहम्मद हाशिम क़ुद्दिस सिर्रहू ने यह भी लिखा है कि हज़रत ख़्वाजा आप से अपने मुरीदों का हाल दरयाफ्त फ़रमाते थे जो आप के पास रहते थे और हज़रत मुजद्दिद उन के मुताल्लिक़ अपने कश्फ़ की रो से जवाब तहरीर फ़रमाते थे। एक मुख़लिस मुरीद ने हज़रत ख़्वाजा से नज़र ख़ास की इल्तिजा की, आप ने फ़रमाया: जब वह (हज़रत मुजद्दिद) सरहिंद से आएं गे उन से कहूँ गा कि वह तवज्जो ख़ास कर के थोडी मुद्दत में मुक़ामात आलीया तक तुम को पहुँचा दें और हज़रत ख़्वाजा अर्बाब मार्फत व तहक़ीक़ के दर्जात मुक़ामात और दक़ायक़ उलूम आप से इस्तिफ़सार फ़रमाया करते थे और आप के जवाबात से ख़ोरसंद होते थे। (हज़रत मुजद्दिद और उन के नाक़िदीन)
इस के अलावा भी निरे वाक़ियात हैं जिन से आप को हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की अज़मत व रफात का पूरा पूरा अंदाजा हो जाएगा और हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू की रोशन ज़मीरी और दौर बेनी का अच्छी तरह एहसास हो जाएगा। यह दर्जात मुख़तलिफ़ बशारतों और दीगर अज़्मतों पर मुश्तमिल हैं। ख़ौफ़ तवालत से में ने तर्क कर दिए। मकसूद किताब की ज़ख़ामत नहीं बल्कि यह दिखाना है कि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के लिए हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू की शख्सियत से बढ़ कर और किया संद हो सकती है। जब एक मुर्शद साहिब एहतियात और बुलंद मुक़ामात और मुशाहदात का हामिल किसी मुरीद को इस तरह नवाज़े तो इस की अज़्मतों को निहायत शरह सदर के साथ तसलीम कर लेना चाहिए था।
हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू की अज़मत व रफात और फजल व कमाल के कायल सभी इस
दौर के बड़े बड़े उलमा थे। आप की अज़मत का इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि हज़रत शैख़ अब्द उलहक़ मुहद्दिस देहलवीरहमत अल्लाह अलैहि जैसा साहिब फजल व कमाल इंसान भी कादरिया निस्बत के हुसूल के बावजूद भी इस्तिफ़ाज़ा की खातिर मुरीद हुआ। हक़ीक़त यह है कि अगर हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू की इनायात को बद गिरोह लोग नज़र में रखते जिन्हों ने बद ख़्वाहों के धोके में आकर मुखालिफ़तें की हैं तो वह कभी धोका न खाते।