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Allama Afaque Ahmad Mujaddidiतजदीद अल्फ़ सानीइरसाल रसल के फ़वाइद

अध्याय 39 में से 57पृष्ठ 535–548

इरसाल रसल के फ़वाइद

उलूम इस्लामीया में मंतिक़ वफ़लसफा के दखल ने जहां बहुत सी खराबियां पैदा कीं वहाँ सब से बड़ी खराबी यह भी आई कि अक्ल धीरे धीरेसेहत वस्क़म और हक़ वबातिल का मयार बिन गई फिर बात यहाँ तक पहुँची कि जो अक्ल नाक़िस की समझ में आया उसे मान लिया और जो नहीं आया इस का इंकार कर दिया,हत्ता कि अहकाम से तजावुज़ करके बात इंकार नुबुव्वत तक पहुँच गई।

जिस मुक़द्दस जमात के तुफ़ैल सब कुछ मिला था आखिर वह उन अक्लमंदों की नज़र में बे फायदा और बे कार हो कर रह गई,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के जमाने में यह फ़ित्ना अपने शबाब पर था,इल्म वाक़िल से कोताह और तही दामन तहक़ीर वतन्क़ीस नुबुव्वत करते,तरह तरह की ख़ामियां और कोताहियां निकालते,जिस से हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू का कलेजा फटता,आप ने इस सिलसिले में भी बुनियादी ख़िदमात अंजाम दी और लिसानी वक्लमी जिहाद फ़रमाया और बिलआख़िर उन शर पसंदों को फना के घाट उतार दिया।

अज़मत नुबुव्वत वरिसालत के तोहफ़्ज़ और अनबीए कराम अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात के मुक़द्दस वजूद की बरकतें और रहमतें जो मुतफ़र्रिक़ तौर पर मक्तोबात क़ुदसी आयात में बयान हुई हैं अगर उन को यकजा किया जाए तो ज़ख़ीम किताब तैयार हो सकती है,चूंकि नुबुव्वत वरिसालत ही पर दीन का इन्हिसार था,और इंकार की बना अक्ल नाक़िस के सहारे पर रखी गई थी,अकली

तश्कीकात के ज़रिया लोगों को गुमराह किया जारहा था इस लिए आप ने रब अज़्ज़ व जल्ल की दी हुई इल्मी वाकली कुव्वतों को खूब इस्तेमाल फ़रमाया और बातिल के तमाम शकूक शुबहात को ख़ुद इस के अंदाज़ में नेस्त वनाबूद करदिया,इस मसला की अहमियत का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि आप ने इस बाब में मुस्तक़िल एक रिसाला बनाम इस्बात अलनबूत तहरीर फ़रमाया जिस में मुख़ालिफ़ के तमाम शकूक शुबहात को बे वक़ात वबे बुनियाद साबित करके यह दिखा दिया कि यह कौम जिस तरह इल्म से आरी है इसी तरह अक्ल से भी खाली है और आप ने निहायत माकूल अंदाज़ में इस्बात नुबुव्वत वरिसालत को बदलायल क़ाहिरा साबित फ़रमाया और अपनी महारत इलमीया के वह जो हर दिखाए कि किसी मंतक़ी वफ़लसफ़ी को मजाल दम ज़दन न रही और कोई इस मर्द मुजाहिद के मुकाबले के लिए तैयार न हुआ।

चूंकि इंकार की बना अक्ल के इस्तिक़लाल पर रखी गई थी इसी लिए आप एक तरफ़ इरसाल रसल के फ़वाइद वबरकात बयान फ़रमाते हैं तो दूसरी तरफ़ अक्ल के अदम इस्तिक़लाल को दलायल की रोशनी में साबित करते हैं,अंदाज़ वही है कि पढ़ने वाला पढ़ता ही रह जाए,बात इतने माकूल अंदाज़ में होती है कि दिल में उतरती चली जाए,चंद इक़तिबासात इरसाल रसल और अक्ल के अदम इस्तिक़लाल के सिलसिले में मुलाहिजा फरमाएं:

(1)मक्तूब 266 जिल्द अव्वल में एक बहस के ज़िमन में फ़रमाते हैं:‘‘दर बिअसत अनबया अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात रहमत आलमियां अस्त अगर तवस्सुत वजूद एं बुज़ुर्गवारां निमी बूद मा गुमराहां रा बमार्फत ज़ात वस्फ़ात वाजिब उलवजूद तआला वितक़दस कि दलालत मि फरमोद विमर्ज़ियात मूला मा रा जल शाना अज़ अदम मर्ज़ियात अव सुब्हानहू कि तमीज़ मि नमूद,अक़ूल नाक़िस्सा मा बे ताईद नूर दावत ईशां अज़ीं माना माज़ूल अस्त वाफ़हाम ना तमाम मा बे तक़लीद एं बुज़ुर्गवारां दरें मामला मख़ज़ूल।’’

तर्जुमा: अनबीए कराम अलैहम अस्सलाम की बिअसत आलमीन के लिए रहमत है अगर उन

हज़रात का वजूद शरीअत का वसीला न होता तो, हम गुमराहों को अल्लाह तबारक व तआला की ज़ात व सिफ़ात की मार्फत का इल्म कहां से होता? और कौन अल्लाह तआला की रज़ा को अदम रज़ा से मुमताज़ करता, हमारी नाक़िस अकलें उन हज़रात की दावत के बग़ैर इस काम से आजिज़ और हमारी समझ उन बुजुर्गों की तक़लीद के बग़ैर ख़वार रहती।

फिर एक सवाल का जवाब देते हुवे फ़रमाते हैं कि बिअसत तमाम आलम वालों के लिए रहमत है क्योंकि अल्लाह तआला की ज़ात वस्फ़ात की मार्फत का सबब है जो कि तमाम दीनी विदन्वी सआदतों को मुतज़िमन है,बिअसत ही की बदौलत मालूम विममेज़ होता है कि बारगाह क़ुद्दिस के मुनासिब किया है और ना मुनासिब किया है,आगे आप के अलफ़ाज़ यह हैं:

‘‘जीरा कि अक्ल लिंग वकुर मा कि बदाग इमकान वहदौस मुतस्म अस्त चह दांद कि मुनासिब हज़रत वजूब कि क़दम अज़ लवाज़म ओस्त अज़ असमा वस्फ़ात वाफ़आल कदाम अस्त वना मुनासिब कदाम ता इतलाक़ आं नमूदा आयेद वाजितिनाब अज़ीं करदा शव्द बल्कि बसयार सत कि अज़ नुक़्स ख़ुद कमाल रा नुकसान दांद विन्क़्स रा कमाल अंगारद एं तमीज़ निज़द फ़क़ीर फ़ौक़ जमी नोम ज़ाहिरा वबातिना अस्त,बे दौलत तर आंका उमूर ना मुनासिबह रा बजनाब क़ुद्दिस अव तआला निस्बत दहद वाशीयाय नाशाइस्ता रा बहज़रत अव सुब्हानहू मुंतसिब साज़द,वबिअसत अस्त कि बातिल रा अज़ हक़ जुदा साख़ता अस्त वना मुस्तहिक़ इबादत रा अज़ मुस्तहिक़ इबादत तमीज़ दादा,वबिअसत अस्त कि ब्राह हक़ जल वाला बतवस्सुत आं दावत मि फ़रमायंद वबंदहा रा बसआदत क़ुर्ब वूसल मौला जल सुल्ताना मि रसानंद व बोसीला बिअसत इत्तिला बुर मर्ज़ियात मौला जल सुल्ताना मयस्सर शव्द कमा मर विजवाज़ दर तसर्फ़ दर मुल्क अव अज़ अदम जवाज़ आं मुतमीज मि गर्दद वामिसाल एं फ़वाइद बसयार अस्त।’’

तर्जुमा: इस लिए कि हमारी लंगड़ी और अंधी अक्ल जो कि इमकान व हदूस के दाग से दागदार है। कैसे मालूम हो पाता है कि हज़रत वजूब तआला के लिए क़दीम होना लाज़िम है, इसी तरह यह भी पता नहीं हो पाता कि असमा, सिफ़ात और अफ़आल के किया मुनासिब है

है कि जिस का इतलाक़ किया जाए और किया गैर मुनासिब है कि जिस से बचा जाए। बल्कि ऐसा अक्सर हो जाता कि अपने नुक़्स की वजह से कमाल को नुकसान और नुकसान को कमाल समझ बैठते। इस फ़क़ीर के नज़दीक यह नेमत हर ज़ाहिरी व बातिनी नेमत से बढ़ कर है, वह शख्स बहुत बड़ अबे दौलत है जो ख़ुदावंद क़ुद्दूस की बारगाह को गैर मुनासिब उमूर से मंसूब करता है, और गैर शाइस्ता चीजों को इस की बारगाह से जोड़ता है।

यह बिअसत ही है जो हक़ व बातिल और मुस्तहिक़ व गैर मुस्तहिक़ के दरमियान तमीज़ करती है। यह बिअसत ही है कि जिस के वास्ते से राह ख़ुदा की तरफ़ दावत दी जाती है। जिस के नतीजे में बंदे अल्लाह जल शाना के क़ुर्ब से वासल होते हैं, बिअसत ही के वसीले से अल्लाह तआला की मर्ज़ियात का पता चलता है और बिअसत ही से अल्लाह की बादशाहत में तसर्फ़ के जवाज़ और अदम जवाज़ का पता चलता है, इस से और भी बहुत सारे फायदे हैं।

मक्तूब 259 तो ख़ास इसी मसला में तहरीर फ़रमाया गया है जो मुख़तलिफ़ और अहम फ़वाइद पर मुश्तमिल है,इरसाल रसल की नेमत की अज़मत को बयान करते हुए फ़रमाते हैं:

‘‘शकर नेमत इरसाल रसल अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात बकदाम ज़बान बजा आवर्दा शव्द वबकदाम दिल एतिक़ाद मुनइम आं नमूदा आयेद विजवारह गुह कि अव बामाल हसना मुकाफ़ात एं नेमत उज़्मा नुमायद।’’

तर्जुमा: रसूलान कराम के भेजने की नेमत का शकर भला कौन सी ज़बान अदा कर पाए गी और भला किस दिल से इस के मुनइम का इज़हार एतिक़ाद हो पाएगा। और भला किस के ज्वारह के आमाल हसना से इस नेमत उज़्मा का बदला अदा हो पाए गा।

फिर फ़रमाते हैं अगर उन बुज़ुर्गवारों का वजूद शरीफ़ न होता तो हम कम फहमों को साने जल अला के वजूद और इस की वहदत पर कौन दलालत करता,यूनान के कदमा फिलासफा ज़हा नतों के बा वजूद वजूद साने जल शाना की राह न पा सके और वजूद का नात को दहर की तरफ़ मंसूब कर

दिया,और जब अनिवार दावत अनबीए कराम अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात दिन बदन चमके तो मताख़रीन फिलासफा ने उन अनिवार की बरकत से अपने कदमा फिलासफा के मजहब का रद्द करके वजूद साने जल शाना के कायल हो गए और अल्लाह तआला की वहदत साबित की।

पस हमारी अकलें अनिवार नुबुव्वत की ताईद के बग़ैर इस काम से माज़ूल हैं और हमारी समझ वजूद अनबया अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात के तवस्सुत के बग़ैर इस मामला से दौर।

मजहब अहले सुन्नत विजमाअत:

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने अपने तमाम तजदीदी काम की बुनियाद दो चीजों पर रखी एक अक़ाइद अहले सुन्नत विजमाअत से वाबस्तगी और दोम इत्तिबा सुन्नत,आप की नज़र में फ़िर्क़ा नाज्य सिर्फ़ और सिर्फ़ अहले सुन्नत हैं,निजात और तमाम सआदात उन ही दो चीजों पर मुनहसिर हैं,यक सर मो तजावुज़ वान्हिराफ़ आप की नज़र में महरूमी और ख़सारा का सबब है,आप की सारी तबलीग़ का महवर यही दो चीजें हैं अगर इस मौज़ू पर मक्तोबात क़ुदसी आयात के मज़ामीन जमा किए जाएँ तो एक ज़ख़ीम किताब तैयार हो सकती है।

आप की असल तवज्जो उन ही दो चीजों की तरफ़ मुनातफ़ रही उमरा वामाइदीन और अवाम सब को इसी की दावत देते रहे और उन की तरवेज वाशाअत पर जोर दिया,इस सिलसिले में जो कामयाब तरीके और जितनी मेहनत और जिद वजहद हो सकती थी वह आप ने फ़रमाई,और इस सिलसिले में जो पुख्ता और मजबूत ख़िदमत आप ने अंजाम दी वह अपनी मिसाल आप है।

इस सिलसिले में आप ने एक मजबूत काम यह किया कि निहायत माकूल अंदाज़ में अक़ाइद का इस्बात फ़रमाया और उन की तरवेज वाशाअत और इत्तिबा सुन्नत से आरास्तगी के लिए जो को शिशें फरमाएं वह निहायत कामयाब और मूसिर थीं।(जिन की क़दरे तफ़सील आप पढ़ चुके)

दूसरा यह कि जो गुमराह फ़िरक़े अक़ाइद अहले सुन्नत पर हमला आवर थे और जिन की वजह से

बिद्दत को रिवाज हो रहा था और सुन्नत उठ रही थी उन का रद्द बलेग़ फ़रमाया,उन की अय्यारियों,मकारियों और शातिराना चा लूँ से लो गों को हमेशा आगाह फ़रमाया,आप की मुजददाना फितरत वबसीरत मुख़ालिफ़ के हर पैंतरे से वाकिफ़ और हर चाल से आगाह थी,इसी लिए हर हमले को निहायत मूसिर तरीके से रोका और इस का दिफ़ा फ़रमाया,दुश्मन की हर घात और कमीन गाह पर आप की नज़र थी,इस के हर हथियार से वाक़फ़ीयत थी इसी लिए तन तन्हा इस मर्द मुजाहिद ने सब को बैक वक़्त ललकारा और सब का डट कर मुकाबला किया और सभों को ऐसा नाकाम बनादिया कि फिर सर उठाने के काबिल न रहे।

अक़ाइद अहले सुन्नत पर मुख़तलिफ़ उद्वार में मुख़तलिफ़ फ़िरक़े रूप और चोगे बदल बदल कर हमला आवर होते रहे और मुँह की खाते रहे,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के दौर में अल्लाह तआला की ज़ात वस्फ़ात वगैरह,नुबुव्वत वरिसालत और अज़मत सहाबा पर सब से ज़्यादा हमले अगर हो रहे थे तो वह या तो मंतिक़ वफ़लसफा की जानिब से या शीयों की तरफ़ से या फिर ना अहले उलमा वसूफ़िया की तरफ़ से थे।

हमले भी इतने सख्त और इतने तेज थे कि अच्छे अच्छे अपनी इज्जत वनामोस की हिफाज़त की खातिर गोशा नशीन हो गए थे,अपने अंदर हमलों की ताब न पाकर साकित वखामोश हो गए थे,नरों ने तो दुश्मन के साथ वह मसालिहाना रवैया इख्तियार कर लिया था कि देखने वाले ग़यूर कभी बर्दाश्त न कर सकते थे,जिस से आने वाली नस्लों पर बुरे असरात मुरत्तिब हो सकते थे।

अपने मजहब पर क़ायम रहते हुए मुख़ालिफ़ के साथ ऐसा रवैया कि इस के खिलाफ़ आवाज़ न उठाई जा सके बजाहिर मेल मिलाप बुर करार रखा जाए और बाज़ मामलात और मिसाइल में ऐसी रोष इख्तियार की जाए कि जिस से मुख़ालिफ़ खुश हो और अपनी ताईद समझे इस को एक आम मुअर्रिख़ तो पसंद कर सकता है,जिस के जेहन में सुलह कल का माद्दा हो वह तो इस रोष को सराह सकता

है , दीन के रमूज़ और अवाम के मिजाज से से नावाकिफ़ इंसान इस रवैया पर खुशी का इज़हार कर सकता है मगर मुजददाना बसीरत और ग़ैरत कभी इस चीज़ को बर्दाश्त नहीं कर सकती है,वह कभी भी और किसी भी मरहले में किसी भी गुड़ बड़ी और किसी तरह की मसालहत मुख़ालिफ़ के साथ बर्दाश्त नहीं करती है।

मुजददाना फितरत न तो ताल्लुकात देखती है और न ही दुश्मन की ज़ाहिरी विमादी ताकत वक़्व्वत से मुतास्सिर और ख़ाइफ़ होती है,मुजद्दिद दीवाना वार अपने दीन के तोहफ़्ज़ में हिम्मा तन मसरूफ़ हो जाता है और हर मोड़ पर दुश्मन को ललकारिता है,दीन में लचक बर्दाश्त करने वाले इस की बुलंद निगाही से क़ासिर होते हैं इसी लिए उसे तशद्दिद या बे जा शिद्दत पसंदी से ताबीर करते हैं।

ख़ुदा वरसौल ﷺ,उन के आल वास्हाब और दीन मतीन से मुहब्बत रखने वाला ग़ैरत मंद इंसान किस तरह अपने उन महबूबों की इज्जत वनामोस पर हमलों को बर्दाश्त कर सकता है,इस की ग़ैरत वहमीयत इस को कैसे बैठने देती है?

उलमा-ए सौ,सूफ़िया ख़ाम और मुख़तलिफ़ गुमराह फ़िर्क़ों की तरफ़ से ज़ात वस्फ़ात और नुबुव्वत वरिसालत वगैरह पर जो हमले हो रहे थे,कुछ अपने थे मगर इल्मी और कश्फ़ की गलती की वजह से उन मुक़द्दस बारगाहों की हक़ीक़ी अज़्मतों से ना वाकिफ़ हो ने की वजह से लाशऊरी तौर पर तन्क़ीस का इर्तिकाब कर रहे थे उन्हें हज़रत मुजद्दिद सरहंदी जैसा ग़यूर मर्द मुजाहिद किस तरह बर्दाश्त कर सकता था और न ही बर्दाश्त किया बल्कि बुला किसी झिजक आप मैदान में कूद पड़े,नुसरत ख़ुदावंदी ने अपने आगोश में ले कर न सिर्फ़ हिफाज़त फ़रमाई बल्कि‘‘कम मिन फ़इत क़लील ग़लबत फ़इत कसीरत बाज़न अल्लाह’’ (बारहा कम जमात ग़ालिब आई है ज़्यादा गिरोह पर अल्लाह के हुक्म से) का जलवा दिखाया,बिलआख़िर आज सब के चिराग गुल हो गए,उन के मुख़ालिफ़ीन सब चिराग सहरी बिन कर रह गए,हद तो यह कि जिन मुक़द्दस बुजुर्गों ने उन की

मुखालफत में हिस्सा लिया उन्हें दुनिया इल्मी सतह पर जो भी जानती हो मगर उन के फ़ैज़ान के दरवाजे बंद हो गए,और अवाम वख़वास में उन की जो इज्जत वाहतराम होना चाहिए वह नहीं है यही है हर दौर की तारीख।

अब हम अक़ाइद अहले सुन्नत से वाबस्तगी की ताकीदात और उन के मुख़ालिफ़ीन की तरदीदात और इत्तिबा सुन्नत और बिद्दत की तरदीद वगैरह से मुताल्लिक़ चंद अहम इक़तिबासात सुपुर्द कलम करते हैं।

अक़ाइद अहले सुन्नत से वाबस्तगी:

अक़ाइद अहले सुन्नत से वाबस्तगी और इस की बुनियादी हैसियत और उन की अहमियत से हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू जहां अपने इल्मी तबहर और नज़र वास्तुदलाल की हैसियत से वाकिफ़ थे वहीं अपने कश्फ़ विमुशाहिदा से भी उन की हक़्क़ानियत और मदार निजात होने के कायल थे,इसी लिए आप के मक्तोबात शरीफ़ में इस मौज़ू पर ताकीदात वतंबीहात बहुत हैं,आप क़दम क़दम पर आगाह फ़रमाते हैं और हर तबके को उन के साथ वाबस्तगी की दावत देते हैं,कभी इजमालन और कभी तफ़सीलन अक़ाइद बयान फ़रमाते हैं,कभी मुस्तक़िला और कभी दीगर मौज़ूआत में ज़िमना इस पर जोर देते हैं,चंद इक़तिबासात मुलाहिजा हूँ:

(1)मक्तूब 59 जिल्द अव्वल में सय्यद महमूद साहिब को चंद जुमलों में मरासम दोस्ताना अदा करने के बाद फ़रमाते हैं:

‘‘मख़दूमा! आदमी रा अज़ सह चीज़ चारा नेस्त ता निजात अब्दी मयस्सर गर्दद इल्म,अमल व इख़लास,इल्म दो किस्म अस्त इल्मी अस्त कि मकसूद अज़ां अमल अस्त कि इल्म फ़िक़्ह मुतकल्लिल आँसुत विल्मी अस्त कि मकसूद अज़ां मुजर्रिद एतिक़ाद वीक़ीन कलबी अस्त कि दर इल्म कलाम ब तफ़सील ज़िक्र याफताह अस्त बमुक़्तज़ाए आरा साइबा अहले सुन्नत विजमाअत कि फ़िर्क़ा नाज्य इंद वंजात बे इत्तिबा एं बुज़ुर्गवारां मुतस्व्वर नेस्त वागर सर मो मुखालफत अस्त ख़तर दर ख़तर अस्त,एं सखुन बक्शफ़ सही

वाल्हाम सरीह बीक़ीन पैवस्ता अस्त एहतिमाल तख़ल्लुफ़ नदारद।’’

तर्जुमा: मख़दूम ग्रामी! अब्दी निजात पाने के लिए आदमी को तीन चीजों से छुटकारा नहीं: (1) इल्म, (2) अमल, और (3) इख़लास।

इल्म की दो किस्में हैं: एक वह इल्म कि जिस का मकसूद अमल है, इल्म फ़िक़्ह इस इल्म का काम करता है, एक वह इल्म है जो सिर्फ़ एतिक़ाद और यकीन कलबी के लिए है, इल्म कलाम में इस की तफ़सील दर्ज है। अहले सुन्नत व जमात जो कि फ़िर्क़ा नाज्य हैं और उन बुजुर्गों की इत्तिबा के बग़ैर निजात का तसोर भी नहीं है उन की दुरुस्त राए के मुताबिक अगर बाल बराबर भी मुखालफत हुई तो नुकसान अज़ीम है। यह बात कश्फ़ सही और इलहाम सरीह के ज़रिया इस क़द्र यक़ीनी है कि जिस में शक व शुबहा की क़तअन कोई गुंजाइश नहीं।

फिर इस के बाद इसी मक्तूब में बाज़ अक़ाइद ख़ुलफ़ाए राशिदीन वाज़मत सहाबा कराम वगैरह से मुताल्लिक़ बयान फ़रमाए।

(2)मक्तूब 80में मिर्ज़ा फतेह अल्लाह हकीम को कुछ दुआएं देने के बाद फ़रमाते हैं:‘‘हर फ़िर्क़ा अज़ हफ़्ताद वसा गिरोह मुद्दई इत्तिबा शरीअत अस्त विजाज़म निजात ख़ुद कल हिज़्ब बिमा लदेहम फरहवन नकद वक़्त शां अस्त अम्मा दलीले कि पैगम्बर सादिक अलैहि मिन अस्सलात अफ़ज़लहा वमन इलतसलीमात अकमल्हा बुर तमीज़ फ़िर्क़ा वाहिदा अज़फ़रक मुतअद्दिदा फर्मौदा अस्त आँसुत अलज़ीन हम अला मा अना अलैहि वास्हाबी’’ यानी आं फ़िर्क़ा नाज्य आनानंद कि ईशानां बुर तरीके इंद कि मिन बरआँ तरीकम वास्हाब मिन बुर आं तरीक़ इंद’’

तर्जुमा: तिहत्तर फ़िर्क़ों में से हर एक इत्तिबा शरीअत का दावेदार है। और अपनी निजात का यकीन रखता है। (हर गिरोह इस पर खुश है जो इस के पास है) उन के पेश नज़र है , लेकिन जो दलील हुज़ूर ﷺ (उन पर सब से अफ़ज़ल दुरूद, और कामिल तरिन सलाम) ने उन फ़िर्क़ों में से एक जमात की पहचान के लिए बयान फ़रमाई है। वह यह

(वह लोग वह हैं जो मेरे और मेरे सहाबा की तरीके पर हूँ) यानी फ़िर्क़ा नाज्य वह है जो इसी तरीके पर हैं, जिस पर में हूँ, और मेरे सहाबा जिस तरीके पर हैं।

फिर इस हदीस के एक गोशे को उजागर करने के बाद फ़रमाते हैं:‘‘शक नेस्त फ़िर्क़ा कि मुलतज़म इत्तिबा अस्हाब आं सर्वर इंद अलैहि वालैहिम अस्सलवात वालतसलीमात अहले सुन्नत विजमाअत इंद शकर अल्लाह तआला सएहम हम अलफ़रात अलनाज्य।’’

तर्जुमा: तर्जुमा: इस में कोई शक नहीं, कि जो फ़िर्क़ा सर्वर आलम ﷺ कि सहाबा के तरीका पर है, वह अहले सुन्नत व जमात हैं। (अल्लाह तआला उन की कोशिशों को ठिकाने लगाये) वही फ़िर्क़ा नाज्य हैं ।

(3)मक्तूब 112 में शैख़ अबदुलजलील थानेसरी सम जो निपोरी को तहरीर फ़रमाते हैं:‘‘हक़ सुब्हानहू व तआला शाना मा मुफलिसां रा बहक़ीक़त मोतक़िदात हुक्का अहले हक़ यानी अहले सुन्नत विजमाअत मुतहक़्क़ साख़ता,तौफ़ीक़ आमाल मर्ज़ीया नकद वक़्त गर्दानीदा,अहवाले कि समरात एं आमाल इंद करामत फर्मौदा बतमाम बजनाब क़ुद्दिस ख़ुद जल सुल्ताना जज़्ब फ़रमायद।

तर्जुमा: हक़ सुब्हानहू व तआला शाना ने हम मुफलिसों को अक़ाइद अहले हक़ यानी अहले सुन्नत व जमात की हक़ीक़त के साथ तहक़्क़ अता फ़रमा कर, पसंदीदा आमाल की तौफ़ीक़ से नवाज़िकर, उन अहवाल से, जो उन आमाल के नताइज हैं मुशर्रफ़ फ़रमा कर, मुकम्मल तौर पर अपनी तरफ़ खींच ले। ؏

कार अ युनिस्त वग़ैर एं हिम्मा हेच

काम यही है इस के अलावा सब बे कार

चह अहवाल विमवाजीद कि बे तहक़्क़ बहक़ीक़त एं फ़िर्क़ा नाज्य मयस्सर शव्द जुज़ इस्तिदराज हेच निमी दानम विजज़ खराबी हेच निमी अंगारियम,बा एं दौलत इत्तिबा फ़िर्क़ा नाज्य हर चह बदहिंद मन्नत दारेम विष्कर बजा आर्यम वागर हमें रा बदहिंद व्हीच अज़ अहवाल विमवाजीद नदहिंद बाक नदारियम विराजी एम।’’

क्योंकि वह अहवाल जो इस फ़िर्क़ा नाज्य की हक़ीक़त के साथ तहक़्क़ के बग़ैर हासिल हूँ, उन्हें ‘‘इस्तिदराज’’ के अलावा कुछ नहीं जानता, और खराबी के सिवा कुछ नहीं समझता, इस फ़िर्क़ा नाज्य की पैरवी के साथ जो कुछ दे दें, एहसान व कर्म समझें गे और शकर बजा लाएं। और अगर सिर्फ़ यही अता फ़रमाई और अहवाल व मुआजीद में से कुछ न दें, तो कोई ख़ौफ़ नहीं, औरो ह इस पर राजी हैं।

यह चंद इक़तिबासात हैं अगर तफ़सील मतलूब हो तो जिल्द अव्वल मक्तूब 59, 75,80,91,112,193,266,286 जिल्द दोम के मक्तूब 36,60,67 और जिल्द सोम का मक्तूब 17 मुलाहिजा फरमाएं। मज़कूरा मक्तोबात ख़ास इसी मो ज़ू पर तहरीर किए ग्ये हैं,दीगर मौज़ूआत के ज़िमन में जो ताकीदात वतंबीहात हैं वह इस के अलावा हैं।

अक़ाइद के सिलसिले में जो मुस्तक़िल कुतुब तहरीर की गई थीं वह तवील वबसीत हो ने की वजह से नीज़ ऐसे इस्तिदलालात पर मुश्तमिल थीं जिन की वजह से क़ारी का जेहन उलझ सकता था इस लिए आप उन्हें उमरा वामाइदीन के हाल के मुनासिब ख़याल नहीं करते थे जबकि उन्हें के बिगड़ने के आसार ज़्यादा थे उन के बिगड़ने से अवाम बहुत बुरी तरह मुतास्सिर हो सकती थी इसी लिए आप ने अक़ाइद पर मुश्तमिल बड़े बड़े तफ़सीली मकातीब तहरीर फ़रमाए जिन में तमाम ज़रूरी बहसें आगईं जिन्हें पढ़ने वाला बड़े आराम से समझ कर राह तलाश कर लेता है और उसे हक़ का पता मिल जाता है।

ख़याल रहे कि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू अक़ाइद में अहले सुन्नत अहनाफ़ के जबरदस्त इमाम हज़रत अबू मंसूर मात्रीदी क़ुद्दिस सिर्रहू के पेरो कार थे,इल्म कलाम में अल्लाह तआला ने आप को दर्जा इजतिहाद अता फ़रमाया था मगर आप ने उन अइम्मा कराम से बहुत कम इख़तिलाफ़ फ़रमाया,अल्लाह तआला की तौफ़ीक़,उलमा-ए अहले सुन्नत को नज़र वास्तुदलाल और कुरआन वसंत की रोशनी में ख़ुदावंद क़ुद्दूस और इस की ज़ात वस्फ़ात की सही पहचान मिली,आप क़ुद्दिस सिर्रहू उन्हें की

तक़लीद की दावत देते हैं और उन की इत्तिबा विपैरवी को हर हाल में ज़रूरी करार देते हैं,अक़ाइद की दुरुस्तगी और तसहीह की अहमियत को उजागर करते हुए मक्तूब 193 में फ़रमाते हैं:

‘‘वागर अयाज़न बिल्लाह सुब्हानहू दर मसला अज़ मिसाइल एतिक़ादिये जरूरीया खलल रफ्त अज़ निजात उखरवी महरूम अस्त वागर दरअमलयात मसाहिला रूद युहतमिल कि बे तौबा हम गुज़रानंद वागर मुवाख़िज़ा हम कनंद आखिर कार निजात अस्त,पस उम्दा कार तसहीह अक़ाइद अस्त,अज़ हज़रत ख़्वाजा एहरार क़ुद्दिस अल्लाह तआला सिर्रहू मनक़ूल अस्त कि मि फर्मोदनद कि अगर तमाम अहवाल विमवाजीद रा बिमा दहिंद वहक़ीक़त मारा बाक़ाइद अहले सुन्नत विजमाअत मुतहम्मिल निसाज़ंद जुज़ खराबी हेच निमी दानम वागर खराबेहा रा बुर मा जमा कनंद वहक़ीक़त मारा बाक़ाइद अहले सुन्नत विजमाअत बनवाज़ंद हेच बाके नदारियम।’’

तर्जुमा: नऊज़ बिल्लाह! अगर किसी एतिक़ादी मसले में कोई खलल पड़ जाए तो उखरवी निजात से महरूमी है, जब कि अगर अमल में सस्ती व मसाहलत हो जाए तो एहतिमाल है कि तौबा के बग़ैर भी माफी मिल जाए और अगर सज़ा भी मिले गी तो आखिर कार निजात है। लिहाज़ा सब से अहम काम सही अक़ीदा रखना है। हज़रत ख़्वाजा उबीद अल्लाह एहरार क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि अगर मुझे तमाम अहवाल व मुआजीद मिल जाएँ, मगर अहले सुन्नत व जमात के अक़ाइद न मिलें तो इस में अपनी खराबी के सिवा में कुछ भी नहीं जानता हूँ। ऐसे ही अगर अल्लाह मुझे तमाम बुराइयां दे दे मगर मेरे अकीदे को अहले सुन्नत व जमात के माफ़िक़ रखे तो मुझे कोई ख़ौफ़ नहीं।

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने अहले सुन्नत विजमाअत के अक़ाइद अपने मक्तोबात में बालतफ़सील बयान फ़रमाए हैं,उन में तमाम ज़रूरी अक़ाइद ज़ात वस्फ़ात,असमा वस्फ़ात और नुबुव्वत वरिसालत वाज़मत सहाबा कराम रिज़वान अल्लाह तआला अलैहिम अजमईन से मुताल्लिक़ तफ़सील बयान फ़रमाए,ख़ास कर इस दौर में अहले सुन्नत विजमाअत से जो गुमराह फ़िरक़े बुर सर पीकार

थे उन का जगह जगह रद्द भी है और अपने मुद्दा का इस्बात भी है।

अल्लाह तआला ने अपनी और अपने महबूब बंदों की मार्फत में हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू को कमाल अता फ़रमाया था और क़ुर्ब वारफान की जिस बुलंद मंज़िल पर फ़ाइज़ किया था और उन्हों ने कुरआन वहदेस और अपने बातिनी मुशाहदात की बुनियाद पर जिस अज़मत वरीअत को पहचाना इस अज़मत वरीअत पर जब भी किसी ने हमला किया तो आप की ग़ैरत वहमीयत ने उसे बिलकुल भी बर्दाश्त न किया और आप ने सब का रद्द किया,इस सिलसिले में हमारे सामने तीन गिरोह हैं जिन्हों ने सही अक़ाइद विमार्फत न होने की वजह से अक़ाइद में रख़्ना अंदाजी की एक तो मनातिक़ा वफ़लासफा दोम शीया वर्वाफ़िज़ और सोम कुछ सूफ़िया।

उन लोगों ने अक़ाइद हुक्का के सिलसिले में जो ठोकरें खायें इस की हल्की तस्वीर आप पढ़ चुके,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की नज़र में यह तीनों गिरोह हक़ से दौर और फ़लाह के लिए मुज़िर थे,इसी लिए आप ने उन तीनों का रद्द बलेग़ फ़रमाया और हर बातिल कुव्वत का जिस तरह मुकाबला किया वह आप ही का हिस्सा था, अव्वल विदुम को तो ज़ाल विमज़ल और बाज़ अक़ाइद की बुनियाद पर आप ने कुफ्र तक का हुक्म लगा या है और सोम को मुज्तहिद ख़ाती करार देते हैं,उन की बुज़ुर्गी का एतराफ़ करते हुए खता के असबाब भी बयान करते हैं,क़दम क़दम पर उन की लग़ज़िशों के ज़िक्र के साथ साथ उन की वाक़ई हैसियत और फजल वरीअत का सामे वनाज़र को जेहन भी देते हैं और उन्हें माज़ूर करार दे कर क़ारी को उन मुक़द्दस शख्सियतों के मामले में भटकने नहीं देते हैं।

इस के साथ साथ कुरआन वसंत से साबित शुदा अक़ाइद वंज़रियात से जहां भी उन बुजुर्गों का कश्फ़ विमुशाहिदा मुतसादिम नज़र आया वहाँ मुनासिब तावेल वित्त्वजेह कर के सही महम्मल पर महमूल करने की कोशिश करते हैं ताकि उन की अज़्मतों का तोहफ़्ज़ रहे और अगर बात किसी तरह बनाए नहीं बनती है तो बे दरेग़ तरदीद फ़रमाते हैं,जिस की तफ़सील

आइंदा सफ़हात में आये गी।

अब हम तीनों गिरोहों की इसलाह वितरमियम और हिदायत विरहनुमाई के सिलसिले में आप की बे मिसाल ख़िदमात का क़दरे तफ़सील से जायजा लेते हैं: