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अध्याय 34 में से 57पृष्ठ 463–476

काम के तरीके

तदरीस :

इस सिलसिले में एक इक़दाम आप ने यह किया कि उलूम ज़ाहिरी ख़्वाह अक्लिया हूँ या नक़लय की तदरीस शुरू की और हर फन में निहायत आला सलाहीयत वकाबलियत से तलबा को मुतास्सिर करना शुरू किया और तदरीस में वह तहक़ीक़ वतदक़ीक़ और नये नये नकात वालोम जीर बहस आते जिस से तलबा झूम उठते,इस तरह बहुत जिल्द आप की तदरीस का शहरा हो गया और आला सलाहीयत मंद और इल्मी ज़ौक़ रखने वाले हज़रात आप की मुक़द्दस बारगाह की तरफ़ खिंचने लगे,इस तरह आप नेइलमए आख़िरत पैदा करने का एक मूसिर तरीका अपना कर अपने काफ़ी मुआविनीन फ़राहम कर लिए।

आप की मुक़द्दस दरसगाह चूंकि निहायत साफ सुथरी पाकीज़ा माहौल पर मुश्तमिल थी और उन तमाम उमूर से पाक थी जो इस जमात को बिगाड़ते थे,आप हर इल्म की क़द्र इस के

मर्तबा के लिहाज से दलों में बिठाते और उन में इल्म वामल के वह जो हर पैदा करते जिस से उन तलबा की शख्सियत पर कशिश बनती,इल्म वामल से आरास्ता होते,काम के तरीके सिखाते,उन में हिम्मत वज्रात पैदा करते,उन के दलों में सुन्नत का दर्द पैदा करते,इस तरह वह एक जाँबाज़ मुजाहिद और सिपाही बिन कर कौम के सामने आते हर फन और हर इल्म में वह जो हर दिखाते कि उलमा-ए सौ की सारी फनकारियां और मोशगाफियाँ धुरी की धुरी रह जातें।

इस इल्मी और फ़न्नी महारत ने एक और भी अहम काम किरदार अदा किया कि बड़े बड़े माहिरीन फन आप की तरफ़ दौड़ने लगे,आप के दीदार के मुश्ताक रहने लगे जिस से आप को दूसरी दरसगाहों के फ़ारग़ीन की तरबीयत का अच्छा मौका मिला,वह आते और आप के सामने अपने आप को तिफ़्ल मुक्तब महसूस करते,आप के बातिनी कमालात और हक़ायक़ विमआरिफ़ हुक्का को देख कर अंगुश्त बदंदाँ रह जाते फिर आप ही के हो कर रह जाते,सारा गुरूर इल्म चूर चूर हो जाता,इस तरह तकबर वगुरवर में मुबतला नरों को आप की बारगाह ने सालिह विमतवाज़ा इंसान कामिल बनादिया।

ग़रज़कि तदरीस के काम ने आइंदा की तैयारी में ख़िश्त अव्वल का काम किया और इस से ला तादाद फ़वाइद हासिल हुए,आप की दरसगाह से जो नकली वाकली उलूम फ़नून में माहिर रोजगार अफराद तैयार हुए अगर आप उन के मक़ाम विमंज़िल और उन की महारत वकाबलियत पढ़ें गे तो हैरत ज़दा रह जाएँ गे मगर इस के लिए दूसरा मक़ाम है।

बीअत वारादत:

अफराद की तैयारी में जिस ने सब से अहम किरदार अदा किया वह है सिलसिला बीअत वारादत और असल तसव्वुफ़ की इशाअत,बीअत वारादत का रिश्ता ऐसा मजबूत और अहम रिश्ता है कि शायद अकीदत विमहबत और लगाव के लिए इस से ज़्यादा मजबूत रिश्ता न होगा,बीअत वारादत ही

मुरीद को अपने पीर की इताअत सिखाती है,हर चीज़ पर मुरीद अपने पीर विमर्शद के हुक्म को मुक़द्दम समझता है,तसलीम वाख्तियार का जो जज्बा इस के ज़रिया उभरता है वह किसी के ज़रिया नहीं उभरता है,जो जाँ निसारी वफ़दाकारी इस के ज़रिया हासिल होती है वह किसी के ज़रिया नहीं, जब मुरीद अपने शैख़ के कमालात और गोना गों औसाफ़ वफ़ज़ाइल देखता है और उन का परतो वज़ल अपने अंदर महसूस करता है तो इस की मसल‘‘मुर्दा बदस्त गुसाल’’ (जिस तरह मुर्दा नहलाने वाले के हाथ में होता है) होती है वह उमरा व हुक्काम और सलातीन के साथ रवाबित की तरह शैख़ से रवाबित नहीं रखता है कि हुज़ूर में ग़ायत दर्जा नयाज़ मंदी और तसलीम वाताअत हो और पस पुश्त मुखालफत क्योंकि यहाँ ख़ौफ़ कहलवाता है और दौलत वोहदा दारी काम करवाती है।

वहाँ ख़लवत हो कि जलवत ज़िक्र है तो शैख़ का,इताअत है तो शैख़ की और मुहब्बत है तो शैख़ की इस से एक नूरानी मुत्तहिद विमुत्तफ़िक़ मुआशरा अमल में आता है,और रफ़्ता रफ़्ता वह तमाम जरासीम निकलते रहते हैं जो दुनिया व आख़िरत के लिए मुज़िर हैं,और वह तमाम औसाफ़ पैदा होते रहते हैं जिन की तवानाई हर मादी तवानाई से बढ़ कर और जिन की कुव्वत हर कुव्वत से बाला तर है

रूहानी कमालात ही वह कमालात हैं जिन के आगे सब सुरंगों होते हैं,चपरासी से ले कर बादशाह तक सब इसी के आगे झुकते हैं,सब का रोब विजलाल इस के आगे सर ख़ुम किए रहता है,यही वह कमंद है जिस के ज़रिया ब आसानी हर एक का शिकार हो सकता है,इस के ज़रिया इस्लाम सिर्फ़ बताया नहीं जाता है बल्कि दिखाया जाता है,सुनतीं दलों में उतारी जाती हैं,क़ल्ब विनफ़स जिन की हुकूमत सारे जिसम पर हावी होती है इस के ज़रिया उन का तसफ़ीया वितज़किया करके इंसान को इंसान कामिल और पक्का मुसलमान बनाया जाता है,इस्लाम की बातिनी खूबियों को इसी के ज़रिया पहुचंवा सकते हैं,दीन की बातिनी

अज़्मतों और महज़ कुव्वतों को इसी के ज़रिया आशकारा कर सकते हैं।

इल्म वास्तुदलाल के ज़रिया एक आम मुसलमान को ख़ास मुसलमान बना ने में बड़ी दिक्कतें पेश आती हैं मगर इस के ज़रिया मुनकरीन ख़ुदा को ख़ुदा आशना निहायत आसानी से करदिया जाता है,हक़ीक़त यह है कि इस्लाम अपनी तमाम ज़ाहिरी वबातिनी अज़्मतों के साथ अगर ज़िंदा रहा है तो तसव्वुफ़ के ज़रिया,फैला है तो इसी के ज़रिया।

जिस वक़्त उमरावहकाम आपस में हुसूल इक़तिदार के लिए बुर सर पीकार थे इस वक़्त भी इस्लाम की ख़िदमत गर कोई कर रहा था तो तसव्वुफ़ ही कर रहा था,रूह इस्लाम अगर बुर करार है तो इसी के ज़रिया,अश्ख़ास में पूरे तौर पर अगर इस्लाम नाफ़िज़ हुआ है तो इसी के ज़रिया,इसी लिए हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने अपनी तमाम तजदीदी ख़िदमात के लिए इसी को मुंतख़ब फ़रमाया,आप की नज़र में यही वह हथियार था जिस से हर बातिल को फना के घाट उतारा जा सकता था और आला कलम अल्लाह का फ़रीज़ा अंजाम दिया जा सकता था।

अल्लाह तआला को चूंकि आप से बड़ा काम लेना था इसी लिए आप की शख्सियत को इस मामला में इतना पर कशिश बनाया था कि जिसे देखो वह खिंचा चला आरहा था हर एक की नज़र में आप की ज़ात मार्फत का एक शीरीं चश्मे थी जहां निहायत साफ विशफ़्फ़ाफ़ ऐसा पानी मयस्सर आसकता था जहां हर बड़े से बड़े की प्यास बुझ सकती थी और कामिल तौर पर सैराबी हासिल हो सकती थी।

वसात इरादत:

हज़रत ख़्वाजा बाक़ी बिल्लाह क़ुद्दिस सिर्रहू से वाबस्ता होने से क़ब्ल आप अगर चह अपने वालिद बुज़ुर्गवार से सिलसिला आलीया कादरिया विचिषत्य में बीअत कर चुके थे,कब्रव्य सिलसिले की भी तहसील फ़रमा चुके थे,यह एक रस्मी बीअत न थी बल्कि रूहानी मनाज़िल की तहसील भी थी जैसा कि आप पढ़ चुके मगर तारीख से यह पता नहीं चलता है कि आप ने इरादत वबीअत का

सिलसिला शुरू किया हो और लोग आप के मुरीद हुए हूँ,हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू से इजाजत वखिलाफ़त के बाद जिस तेजी से यह काम हुआ और आप के हलक़े को वसात हासिल हुई वह भी मिसाली था,हज़रत अल्लामा बदरुद्दीन सरहंदी जिन्हों ने आप के शब् विरोज़ को देखा आप के हालात लिखते हुए फ़रमाते हैं:

‘‘ ग़रज कि जब आप का शहरा दुनिया और दुनिया वालों पर हुआ और आप की हिदायत का चर्चा तमाम आलम में शाय हुआ और आप के कमालात का डंका हफ़्त अक़लेम में बजने लगा तो आयत करीमा अज़ा जा नस्रूल्लाह वालिफता विरायत एलिनास यदालवन फ़ी दीन अल्लाह अफ़्वाजा के मिस्दाक़ मुख़तलिफ़ मुक़ामात में लोगों ने आप के हुल्या मुबारका को अपने ख्वाबों में देखा बल्कि अनबया अलैहिम अस्सलाम से भी इशारे और बशारतें पाएं कि आप की ख़िदमत में लोग हा ज़र हूँ चनां चह बकसरत लोग जौक़ दर जौक़ और फौज दर फौज आप की ख़िदमत में हा ज़र हुए और जो बशारतें उन्हें ख्वाब में मिली थीं उन का मिस्दाक़ आप ही को देखा,इस लिए हर शख्स आप का मोतक़िद और मुतीअ बिन गया ,आप के ख़वारिक़ आदात विकरामात नीज़ कश्फ़ क़ुलूब वाशराक़ ग़्यूब इस तरह लगातार ज़ाहिर होते थे जिस तरह कि उबर नेसां ।

फिर ज़ाहिर वबातिन में आप के तसर्फ़ात और तवज्ज्हात बेहद वहिसाब महसूस होते थे इस लिए आप की सूरत और रूहानियत का हर शख्स शैदा बिन गया और लोग आप के दर पर बिलकुल आजिज़ बिन कर रहते थे और अदब वाणिकसार की हालत यह थी कि वह नक़्श बुर दीवार बिन जाते थे।

फिर आप जैसे कुतुब इलाक़ताब से बात करने की किस को जुरात होती और हम जुबानी की ताब किसे थी?आप की वजह से ख़ुदा के दोस्तों और हक़ प्रस्तों का ऐसा मजमा लग गया

......................

। वह बादल जो मौसम बिहार या मौसम सरमा में बरसता है। मशहूर है कि इस की बूंद से सीप में मोती, बांस में बंस लोचन और दहान अय्यदहा में ज़हर पैदा होता है। फ़र्हंग आनंद राज

था कि तमाम दुनिया में इस की मिसाल न थी,उन तालिबान हक़ और सालिकां हक़ में से जो शख्स भी आप को देखता था तो बे इख्तियार और बा इज़तिरार कह उठता था‘‘बे शक यह कोई बड़े फरिश्ते हैं’’।’’(हज़रात अलक़ुद्स स:36)

इस से आप बखूबी अंदाजा लगा सकते हैं कि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू का तजदीदी काम कितनी तेजी और वसात वबाक़ायदगी के साथ था।

अफराद सालिह:

आप के सिलसिला इरादत को बहुत वसात हासिल हुई और इस के ज़रिया कामिल अफराद का एक अज़ीम ज़ख़ीरा हाथ आज्ञा,जो अफराद तैयार हुए थे वह मामूली न थे,इल्म मनक़ूल हो या माकूल शरीअत हो या तरीक़त,कश्फ़ विमुशाहिदा हो या तसर्फ़ विकरामत हर मैदान के शहसवार और हर महाज़ के ग़ाज़ी थे,सुन्नत पर अमल और सुन्नत की हर मुमकिन इशाअत, ज़ाहिर व बातिन को सुन्नत से आरास्ता करना और अक़ाइद वामाल की तमाम बिद्दतों को यक लख़्त ख़त्म करना,जाहिलाना रसूम वादात से जेहन विद्माग और अजसाम को पाक करना यही इस जमात का महवर और बुनियादी नुकता नज़र था।

उन को काम के तरीके भी बताये गए थे,मुख़तलिफ़ मवाक़े से दीनी फ़वाइद की तहसील, उमरा वहकाम को और अवाम वख़वास को पन्नी तरफ़ माइल करना उन में दीनी ख़िदमात के जज़्बात पैदा करना,सुन्नत के काम के लिए उन्हें उभारना,हुकूमत का रुख इस्लाम की तरफ़ मोड़ना सभी की तरबीयत दी गई थी,दुनिया वाहिल दुनिया से इस्तिग़ना और तोकल वक़नाअत तमाम औसाफ़ आलीया से मुत्तसिफ़ किया गया था।

उलग़र्ज़ यह वह जमात थी जो अपनी मिसाल आप थी,यहाँ न सिर्फ़ इल्म ज़ाहिर की मोशगाफियाँ थीं न जाहिलाना तसव्वुफ़ था न बीअत वारादत की आड़ में शिकम परवरी थी यह वह थे जो उलमा-ए ज़ाहिर में बड़े आलम ज़ाहिर,सूफ़ियों में बड़े सोफी,मुत्तक़ियों में बड़े

मुत्तक़ी और बड़े बड़े तसर्फ़ात विकमालात के हामिल इसी लिए यह जिधर निकल जाते थे तो उलमा-ए ज़ाहिर भी झुकते थे,सोफी भी सैराबी हासिल करते थे,उन के सामने किसी मंतक़ी वफ़लसफ़ी की दाल न गलती थी,न किसी मुनाज़रे विमबाहिसे में यह पेच खाने वाले थे और न ही किसी के कश्फ़ विमुशाहिदा से मुतास्सिर होने वाले थे।

उन्हें ताकीद की गई थी कि अजिलित विगोशा नशीनी बिलकुल इख्तियार न की जाए बल्कि हर वक़्त अवाम में रह कर संतों की इशाअत करें और रात दिन तलबा को उलूम ज़ाहिरी वबातिनी का फ़ैज़ पहुँचाएं हर वक़्त उन्हें आरास्ता करें और अख़लाक़ वावसाफ़ हमीदा से मुत्तसिफ़ करें,सुन्नत को इस के पूरे ख़द्दओख़ाल के साथ ख़ुद भी अपनाएं और दूसरों को भी तलक़ीन करें,बिद्दत को हर मुमकिन तरीके से मिटाएं और कोई ऐसा गोशा न छोड़ें कि जिस से इस के अमल के जवाज़ की राह फ़राहम की जासके।

जिन खूबियों केआफराद की ज़रूरत थी जैसे जैसे वह तैयार होते जाते उन्हें कोई न कोई इलाक़ा सौंप दिया जाता,कोई अहम इलाक़ा सुपुर्द करदिया जाता,वहाँ के लिएमुनासिब हिदायात दे दी जातें,दीन की ख़िदमत का सब से कामयाब तरीका और मूसिर तर्ज़ यही है हर दौर में जितने अच्छे सालिह और लायक अफराद तैयार हूँ गे दीन की इतनी ही जबरदस्त ख़िदमत होगी।

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू को सुलूक वत्सलेक में जो कुव्वत अता की गई थी और नये नये कमालात अता फ़रमाए गएथे अगरचे आप की कुव्वत तासीर वितवजा बहुत जिल्द मनाज़िल विमराहिल तै कराती थी मगर फिर भी जो बुलंद सुलूक अता फ़रमाया गया था इस के नुकता आखिर तक पहुँचना और ख़ुसूसी कमालात से हिस्सा पाना फ़र्क़ इस्तिदाद की वजह से हर एक को चंद लम्हात में तो हासिल हो नहीं सकता था उधर अफराद की अशद ज़रूरत थी इसी लिए आप ने इस सिलसिले में इतनी वसात दी कि जब आप देखते कि यह रूहानी मदारिज काफ़ी हद तक तै क

कर चुका है और इस को मुक़ामात और संतों पर अमल में सबात और तहक़्क़ हासिल हो गया है,इस से ख़ल्क़ को रशद व्हिदायत हासिल हो सकती है,अवाम वख़वास को फ़लाह विकामयाबी मिल सकती है और संतों की इशाअत अच्छी तरह कर सकता है,संतों पर अमल और मशाइख़ की तवज्ज्हात से बाक़ी मांदा मराहिल तै कर सकता है तो उसे आप खिलाफत वाजाजत अता फ़रमाकर इरशाद व्हिदायत के लिए भेज देते मगर यह इजाजत मशरूत होती थी।

उलग़र्ज़ दर्स वितदरीस और बीअत वारादत के ज़रिया उन अफराद की बड़ी जमात हाथ आगई जिस के ज़रिया आप ने अपने तजदीदी काम को आगे बढ़ाया और उन कमालात की तरवेज वाशाअत ब आसानी हो सकी जो आप के ज़रिया ताजे और ज़िंदा हुए थे,उन अफराद की तैयारी में आप के पीर विमर्शद हज़रत ख़्वाजा बाक़ी बिल्लाह क़ुद्दिस सिर्रहू की नवाज़िशात को भी बहुत दखल है जैसा कि अन्क़रीब आप पढ़ें गे।

ख़ुलफ़ाएकराम:

अब आप एक मुख़्तसर फिहरिस्त उन अफराद की मुलाहिजा फ़रमालें जो इस रूहानी और इल्मी दरसगाह से फ़ारिग़ इलतहसील थे और उन्हें कण कण इलाकों में दीनी वशरई ख़िदमात के लिए मुंतख़ब किया गया था,अगर उन के इल्म वफ़ज़ल।तक़्वा वतहारत,तसर्फ़ विकरामत और दीगर ज़ाहिरी वबातिनी औसाफ़ वाख़लाक़ पढ़ना चाहें तो हमारी किताब‘‘तज़किरा मशाइख़ बाकिया मुजद्दिदय ’’ का मुताला कीजिए व्हान आप को पता चल जाए गा कि यह हज़रात कण औसाफ़ के हामिल थे और जिन इलाकों में उन्हें मुंतख़ब किया गया था वहाँ उन्हों ने कितनी तेजी,वसात और लग्न विमेहनत के साथ काम किया और जिन ख़िदमात के लिए उन्हें भेजा गया था उन को उन्हों ने कितने अहसन तरीके पर अंजाम दिया,इजमाली फिहरिस्त यह है:

1।हज़रत ख़्वाजा मुहम्मद सादिक फ़ारूक़ी मुजद्दिदी

2।ख़ाज़िन अर्रहमा हज़रत ख़्वाजा मुहम्मद सईद

।उरू अलौसका हज़रत ख़्वाजा मुहम्मद मासूम क़ुद्दिस अल्लाह इसरारहम यह सब हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के फ़रज़न्द थे

4।हज़रत मीर मुहम्मद नोमान कुशमी

5।हज़रत शैख़ ताहिर लाहौरी

6।हज़रत मौलाना मुहम्मद हाशिम कुशमी

7।हज़रत शैख़ बदी उद्दीन सहारनपुरी

8।हज़रत शैख़ नूर मुहम्मद पटनी

9।हज़रत शैख़ हमीद बंगाली

10।हज़रत शैख़ मुज़म्मिल

11।हज़रत शैख़ ताहिर बदखुशी

12।हज़रत मौलाना यूसुफ समरकंदी

13।हज़रत मौलाना अहमद बरकी

14।हज़रत मौलाना मुहम्मद सालिह कोलाबी

15। हज़रत मौलानामुहम्मद सिद्दीक़ कुशमी

16। हज़रत मौलाना शैख़ अबदुलहई हिसारी

17। हज़रत मौलानायारमोहम्मद।।।तालिक़ानी

18। हज़रत मौलाना कासिम अली साहिब

19।हज़रत शैख़ हसन बरकी

20। हज़रत मौलानाबदुलहादी बदायूनी

21।हज़रत शैख़ यूसुफ बरकी

22।हज़रत सय्यद मुहब् अल्लाह मानकपुरी

।हज़रत हाजी ख़िज़र अफगानी

24।हज़रत शैख़ अहमद देवबंदी

25। हज़रत शैख़ क्रीम उद्दीन बाबा हसन अबदाली

26। हज़रत मौलाना अबदुलवाहिद ला होरी

27। हज़रत मौलाना अमान अल्लाह लाहौरी रहमत अल्लाह अलैहिम अजमईन

यह वह ख़ुलफ़ा ए कराम हैं जिन का मुख़्तसर ज़िक्र हज़रत मौलाना मुहम्मद हाशिम क़ुद्दिस सिर्रहू ने बरकात अहमदिया में किया यानी अपने इल्म और जानकारी के लिहाज से ख़ुलफ़ाए ख़ास में शुमार किया है,कुछ के असमा भी ज़िक्र किए हैं यानी यह हज़रात आम ख़ुलफ़ा में हैं जिन की फिहरिस्त यह है:

1।हज़रत मौलाना अमान अल्लाह फ़क़ीह

2।हज़रत शैख़ मुहम्मद हरी?

3। हज़रत शैख़ दाऊद सालकी

4।हज़रत शैख़ सलेम बनौरी

5।हज़रत शैख़ आदिम बनौरी

6।हज़रत शैख़ मुहम्मद तिहारी

7।हज़रत शैख़ हामिद तिहारी

8। हज़रत सोफी कुर्बान क़दीम

9। हज़रत मौलाना सादिक काबुली

10।हज़रत मौलाना मुहम्मद हाशिम ख़ादिम

11। हज़रत मौलाना नमाजी गुजराती

12। हज़रत सोफी कुर्बान जदीद

। हज़रत सय्यद बाक़िर सारंगपुरी

14। हज़रत मौलाना फ़र्ख़ हसीन साहिब

15। हज़रत मौलाना सिफर अहमद

16।हज़रत मौलाना बदरुद्दीन सरहंदी(साहिब हज़रात अलक़ुद्स)

17। हज़रत मौलाना हमीदी अहमदी

18। हज़रत हाजी हसीन

19।हज़रत शैख़ अब्द अलरहीम बरकी रहमत अल्लाह अलैहिम अजमईन

उन के अलावा कितने और हैं किसी को पता नहीं,कुछ तो वह अस्हाब कमाल हैं जिन से इत्तिफ़ाका हज़रत मौलाना मुहम्मद हाशिम की मुलाक़ात हो गई और उन्हों ने अपने नूर बातिन से पहचान लिया कि यह साहिब कमाल है,पूछने पर मालूम हुआ कि वह हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के दर के गुदा हैं जिन का ज़िक्र बरकात अहमदिया में है उन के अलावा कुछ नाम दीगर कुतुब में भी दिए हैं उन्हें में हज़रत शैख़ जीन इलाबदीन तबरेज़ी सम उल्मिकी उलशाफ़ई और हज़रत शैख़ अब्द उलअज़ीज़ नज्वी मग़रिबी मालिकी और हज़रत शैख़ अहमद इस्तंबोली ।।।हैं।

उन सब के अलावा कुछ हज़रात वह हैं जो बज़ाहिराहल सिपाह से थे और बबातिन अस्हाब खानगाह से जिन के नाम मक्तोबात शरीफ़ में ख़ुतूत हैं जैसे हज़रत ख़्वाजा मुहम्मद अशरफ काबुली,हज़रत मौलाना हाजी मुहम्मद ख़रकती, हज़रत मौलाना अब्द उलग़फ़ूर समर कंदी, हज़रत हाफ़िज़ महमूद गुजराती,हज़रत सलेम ख़ान लश्करी रहमत अललिला अलैहिम अजमईन।

यह चवन(54) अस्हाब कमाल के असमाए ग्रामी हैं जो मालूम हुए हैं,जो नहीं मालूम होसके वह बहुत ज़्यादा हैं अल्लामा नूर बख्श तोकली फ़रमाते हैं:

‘‘ हज़रत ख़्वाजा मुहम्मद मासूम के हाथ पर यक्म रबी उलअव्वल 1034؁ में पचास हजार आदमियों ने बीअत की जिन में दो हजार हज़रत मुजद्दिद रज़ि अल्लाह अन्हु के ख़ुलफ़ा थे बाक़ी ख़ुलफ़ा

जो मुख़तलिफ़ मुमालिक में थे वह भी मुख़तलिफ़ औकात में सरहिंद में हाजिर ख़िदमत हो कर बीअत से मुशर्रफ़ हुए’’

ख़याल रहे यह वह लोग हैं जिन्हों ने बा ज़ाबता सुलूक तै किया था और दर्जा कमाल को पहुँचे थे और मुजद्दिदी कमालात और अहमदी रमूज़ वाषारात से भर पुर हिस्सा पाया था उन में हसब ज़र्फ़ फ़र्क़ मुरातिब जरूर है,ख़िदमात भी किसी की कम किसी की ज़्यादा तो किसी की बहुत ज़्यादा हैं मगर सब साहिब इरशाद थे।

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के यह और उन के अलावा गुमनाम ख़ुलफ़ा ने फ़ैज़ान मुजद्दिद को पूरे आलम में आम किया कोई मुल्क कोई सूबा और अहम शहर नहीं छोटा जहां उन के ज़रिया आप की तालीमात और तजदीदी काविशें न पहुँची हूँ,उन्हों ने हज़रत मुजद्दिद के मिशन को फ़रोग़ देने में कोई कसर नहीं अठारखी।

ख़याल रहे कि आप के यहाँ वैसा दस्तूर न था जैसा कि बाद में (अहले खानगाह के यहाँ) हुआ कि जिसे चाहा खिलाफत दे दी,कहीं पहुँचे खिलाफत नामा तहरीर करदिया,या सुलूक तै किए बग़ैर आप से तबरका खिलाफत ले ली हो,वहाँ तो हाल यह था कि दूसरे मशाइख़ के तरबीयत या फ़त्ह अस्हाब फजल विकमाल आते तो उन्हें भी जब तक अपनी कसौटी पर परख नहीं लिया जाता और अपनी निसबतों से मालामाल नहीं कर दिया जाता इस वक़्त तक खिलाफत न मिलती।

आज कल जिस तरह ख़ुलफ़ा बटोरे जा रहे हैं हलक़े बढ़ाने के लिए खिलाफत नामे तहरीर किए जा रहे हैं यह बे चारे ख़ुलफ़ा तो दरकिनार खिलाफत देने वाले तक तसव्वुफ़ के अल्फ़ से वाकिफ़ नहीं इस को इल्मी हैसियत तक से नहीं जानते हैं सुलूक तो बड़ी चीज़ है,इस की वहाँ को ई गिनती नहीं रही।

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के ख़ुलफ़ा तो ख़ुलफ़ा रहे आम मुरीदैन हजारों ऐसे थे जो साहिब निस्बत और साहिब हालात विकिफ़यात थे और हर एक हसब हैसियत अहयाए सुन्नत

में लगा हुआ था,हर मुल्क में हर सूबे में हर बड़े और मर कज़ी शहर में एक न एक नुमाइंदा मो जूद था जो रात वदन काम में लगा हुआ था और सब की क़ियादत सरहिंद का बोर्य नशीन कर रहा था,मौका ब मौका सब को हिदायात पहुँचती थीं सब की पुश्त पनाही वाली सरहिंद कर रहे थे हर एक की धन यही थी कि किसी अमीर या वजीर को किस तरह पकड़ें,कैसे मुतास्सिर करें जिस से रुख इस्लाम की तरफ़ हो जाए,कुफ्र टूटे और बद मजहबी ख़त्म हो,किस इलाक़े में कौन कितना बा असर है,किस से किया ख़िदमात ली जा सकती हैं और कौन कितना मुमद विमुआवन हो सकता है ?

उलग़र्ज़ अवाम वख़वास सब पर यह ख़ुलफ़ाए कराम और रूहानी फ़र्रज़िंदान ग्रामी अपने तास्सुरात क़ायम कर रहे थे और हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की अज़्मतों और रफातों से आशना करके उन के दामन से वाबस्ता कर रहे थे,इस तरह रफ़्ता रफ़्ता अराकीन सल्तनत का एक जबरदस्त गिरोह हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के अल्ताफ़ वानायात का मौरिद (जगह) बिन गया और आप के हलक़ा इरादत में आकर अपनी ताकतों और ओहदों को दीनी ख़िदमात के लिए इस्तेमाल करने लगा।

अब उन उमरा व वुज़रा के नाम भी सन लीजिए जो हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के हलक़ा इरादत में दाखिल हो गए थे या कम अज़ कम आप की शख्सियत और अज़मत वरीअत के इस क़द्र कायल और गर्वीदा हो गए थे कि आप के हुक्म से रोगिरदानी दोनों जहान का ख़सारा समझते थे और हर हाल में आप की हिदायात और इर्शादात पर अमल वाजिब समझते थे और इसी में सआदत तसोर करते थे।

मौलाना रईस अहमद साहिब जाफ़री अनिवार उलावलिया में लिखते हैं:

‘‘बड़े बड़े अफसरान फौज,हुक्काम व ओहदेदारान हज़रत इमाम रब्बानी के मुतवस्सिलीन में शामिल थे जिन में शैख़ फरीद,महाबत ख़ान,इस्लाम ख़ान, सिकंदर ख़ाँ,हकीम फतेह अल्लाह

ख़ान,हकीम शैख़ अबदालोहाब,सय्यद महमूद अख्तर,सय्यद अहमद, ख़िज़र ख़ान लोधी,मिर्ज़ा बदी अल्ज़मां जपाती ख़ान,ख़ान जहान और कलेज ख़ान वगैरह काबिल ज़िक्र हैं’’