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Allama Afaque Ahmad Mujaddidiतजदीद अल्फ़ सानीहज़रत अमीर के फ़ज़ाइल व मनाक़िब

अध्याय 25 में से 57पृष्ठ 348–362

हज़रत अमीर के फ़ज़ाइल व मनाक़िब

फिर हज़रत अली मुर्तज़ारज़ि अल्लाह अन्हु के बारे में फ़रमाते हैं ‘‘ए भाई, हज़रत अमीर चों कि विलायत मुहम्मदी अला साहबहा अस्सलात व अस्सलाम व इलतहीत के बार के हामिल हैं (इस लिए) मुकाम अक़ताब व अबदाल व अवताद कि औलीए अजिलित से हैं और उन (अक़ताब वगैरह) में जानिब कमालात विलायत ग़ालिब है, की तरबीयत हज़रत अली की इमदाद व इआनत के सुपुर्द है कुतुब इलाक़ताब कि कुतुब मदार है का सर आप के जीर क़दम है कुतुब मदार आप की हिमायत व रियायत से अपनी मुहम सरअंजाम देता है और ओहदा मदारियत की जिम्मा दारियों से सबकदोश होता है हज़रत फ़ातिमा और दोनों इमाम (हसन व हसीनरज़ि अल्लाह अन्हुमा) भी इस मक़ाम में हज़रत अमीर के साथ शरीक हैं।

मक्तूब 123, जिल्द सोम में आप ने इस बात को मज़ेद वज़ाहत के साथ बयान फ़रमाया है। आप क़ुद्दिस सिर्रहू ने इस मक्तूब ग्रामी में पहले यह बयान फ़रमाया कि ख़ुदावंद क़ुद्दूस तक जो राहें पहुँचाती हैं वह दो हैं; एक वह जिस का ताल्लुक क़ुर्ब नुबुव्वत से है जो असल अलासल तक पहुँचाती है इस राह के वासल बालासाल अनबीए कराम हैं अलैहिम अस्सलवात व इलतसलीमात और उन के सहाबा और बाक़ी इमितियों से जिस को इस दौलत से नवाज़ दें अगरचे क़लील हूँ, बल्कि अकिल और दूसरी राह का ताल्लुक क़ुर्ब विलायत से है, इस के बारे में आप क़ुद्दिस सिर्रहू यों रकम तराज़ हैं: ‘‘एक वह राह है कि क़ुर्ब विलायत से ताल्लुक रखती है अक़ताब व अवताद व बदला व निजबा और आम औलिया अल्लाह इसी राह से वासल हैं और राह सुलूक इसी राह का नाम है, बल्कि जज्बा मुतआरिफा भी इसी में दाखिल है तवस्सुत व हैलोलित इसी राह में साबित हैं इस राह के वासलेन के पेशवा और उन के सरगरोह और उन बुजुर्गों के फ़ैज़ का सरचश्मा हज़रत अली मुर्तज़ा कर्म अल्लाह तआला वजहा उलक्रीम हैं और यह मन्सब अज़ीम

उलशान आप से ही ताल्लुक रखता है, इस मक़ाम में गोया हुज़ूर सर्वर आलम अलैहि व अला आला अस्सलात व अस्सलाम के दोनों क़दम हज़रत अली कर्रम अल्लाह तआला वजहा के सर मुबारक पर हैं हज़रत फ़ातिमा व हज़रात हसनैन रज़ि अल्लाह तआला अन्हुम इस मक़ाम में हज़रत अली के साथ शरीक हैं।

में समझता हूँ कि हज़रत अमीर निशा अंसरी (आलम अजसाम) से पहले भी इस मक़ाम के जाए पनाह और मिलजा थे जिस तरह निशा अंसरी के बाद और जिस शख्स को भी इस राह से फ़ैज़ व हिदायत पहुँचा आप के (हज़रत अली कर्म अल्लाह वजहा) वास्ता से पहुँचा क्यों कि आप इस राह के नुकता आखिर के नज़दीक हैं और इस मक़ाम का मरकज़ आप से ताल्लुक रखता है और जब हज़रत अमीर का दौरे पूरा हुआ यह मन्सब अज़ीम अलक़द्र हज़रात हसनैन से बिलतर्तीब (यानी अव्वल इमाम हसन से और इस के बाद इमाम हसीन के सुपुर्द और उन को मुस्लिम हुआ और उन के बाद वही मन्सब बारह इमाम से हर एक के साथ बिलतर्तीब व इलतफ़सील करार पाया (जिन की तफ़सील यह कि अव्वल इमाम हज़रत अली, फिर इमाम हसन, फिर इमाम हसीन, फिर इमाम जीन इलाबदीन, फिर इमाम बाक़िर, फिर इमाम जाफर सादिक, फिर इमाम मूसा काज़िम, फिर इमाम अली मूसा रज़ा, फिर इमाम मुहम्मद तक़ी, फिर इमाम मुहम्मद नक़ी, फिर इमाम हसन अस्करी, फिर इमाम मुहम्मद महदी रज़ि अल्लाह तआला अन्हुम अजमईन) उन बुज़ुर्गवारों के ज़मानों में और इसी तरह उन के कोच के बाद जिस किसी को फ़ैज़ व हिदायत पहुँचा उन बुज़ुर्गवारों के वास्ता से पहुँचा और उन की हैलोलित से अगरचे वक़्त के अक़ताब और निजबा हूँ सब के जाए पनाह और मिलजा यही बुज़ुर्गवार रहे हैं क्यों कि अतराफ़ को मरकज़ के साथ लाहक़ होने के सिवा चारा नहीं है यहाँ तक कि नौबत हज़रत शैख़ अब्द उलक़ादिर जैलानी क़ुद्दिस सिर्रहू तक पहुँची और जब नौबत उन बुज़ुर्गवार तक पहुँची तो मन्सब मज़कूर आप क़ुद्दिस सिर्रहू के सुपुर्द हुआ अऔर अइम्मा मज़कूरियन और हज़रत शैख़ के दरमियान कोई शख्स इस मर्कजपुर मशहूद नहीं होता है और अक़ताब व निजबा से जिस

किसी को भी इस राह में फ़्यूज़ व बरकात का वसूल हुआ आप के तवस्सुत शरीफ़ से मफ़हूम होता है क्यों कि यह मरकज़ आप के गैर को मयस्सर नहीं हुआ, इसी वजह से आप ने फ़रमाया؎

अफलत शमोस अलावालीन व शमसुना

अबदन अला उफ़ुक़ अलाला लातग़्रब

अगलों के सूरज डूब गए और हमारा सूरज हमेशा बुलंदी के उफ़ुक़ पर है कभी नहीं डूबेगा।’’

शम्स से मुराद फ़ैज़ान हिदायत व इरशाद का सूरज है और इस का अफ़ूल (डूबना) अदम फ़ैज़ान मज़कूर है और चों कि हज़रत शैख़ के वजूद से इस मामला ने कि अव्वलीन से ताल्लुक रखता था हज़रत शैख़ के साथ करार पकड़ा और वह रशद व हिदायत का वास्ता हुए जिस तरह उन से पहले वाले थे और नीज़ जब तक तवस्सुत फ़ैज़ान का मामला क़ायम है वह हज़रत शैख़ के तवस्सुल से है लामुहाला दुरुस्त हुआ कि अफलत शमोस अलावालीन व शमसुना ।।।

यहाँ एक सवाल पैदा होता था कि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने मुजद्दिद की तशरीह बयान करते हुए मक्तूब4, जिल्द दोम में फ़रमाया है कि मुजद्दिद वह है कि जो कुछ इस मुद्दत में इमितियों को फ़्यूज़ पहुँचते हैं इसी के तवस्सुत से पहुँचते हैं अगरचे इस वक़्त के अवताद व अक़ताब हूँ औरबदला व निजबा हूँ उलग़र्ज़ हज़रत ग़ौस आज़म क़ुद्दिस सिर्रहू के मक़ाम व मन्सब कुतुबीयत व गोसीयत का तक़ाज़ा है कि यह मन्सब हमेशा (ता इमाम महदी अलैहि इलरिज़्वान) उन के सुपुर्द रहे जब कि मुजद्दिद का मन्सब यह बता रहा है यह फ़ैज़ान हज़रत मुजद्दिद अल्फ़ सानी के तवस्सुत से है हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू इस काने जवाब दिया कि मुजद्दिद अल्फ़ सानी इस सिलसिले में हज़रत ग़ौस आज़म क़ुद्दिस सिर्रहू के नायब हैं और उन्ही की नियाबत से यह मामला उन से मरबूत है जैसा कि नूर अलक़मर मुस्तफ़ाद मिन नूर अश्शम्स फला

महज़ूर’’

यह बात ज़िमनन आगई दर असल गुफ़्तगू मुबादी तैनात की चल रही थी और ख़ुलफ़ाए राशिदीन के फ़ज़ाइल व मनाक़िब के आखिर में एक इक़तिबास हज़रत अबू बुकर सिद्दीक़रज़ि अल्लाह अन्हु से मुताल्लिक़ और समाअत कर लीजिए, फ़रमाते हैं:

हक़ीक़त सिद्दीक़ अकबर रज़ि अल्लाह अन्हु:

मक्तूब 122, जिल्द सोम में फ़रमाते हैं: ‘‘जान लीजिए कि हज़रत अबू बुकर की हक़ीक़त यानी असमाए इलाही जल शाना से उन का रब जो कि उन का मुबदा तईन है बग़ैर किसी अम्र के तवस्सुत के ज़ुल हक़ीक़त मुहम्मदी ﷺ है इस नहज पर कि जो कुछ इस हक़ीक़त में साबित है तबईत व विरासत के तौर पर इस ज़ुल में साबित है इसी वजह से आप रज़ि अल्लाह तआला अन्हु इस उम्मत के वारसीन में अकमल व अफ़ज़ल हुए। नबी अकर्म अलैहि व अला आला अस्सलात व अस्सलाम ने फ़रमाया:

‘‘मा सब् अल्लाह शीयन फ़ी सदरी ज़िला वक़द सब्बीता फ़ सदर अबी बुकर’’

अल्लाह तआला ने मेरे सीने में कोई क्षे नहीं डाली मगर में ने इस को अबू बुकर के सीने में डाल दिया।

हक़ीक़त असरा फ़ीली:

नीज़ वाज़िह हुआ कि हक़ीक़त इसराफ़ीली अला नबीना व अलैहि अस्सलात व अस्सलाम भी वही हक़ीक़त मुहम्मदी अलैहि व अला जमी इख़वाना अस्सलात व अस्सलाम बितरीक़ असालित व ज़लीयत नहीं हज़रत सिद्दीक़ रज़ि अल्लाह तआला अन्हु की तरह कि ज़ुल है इस हक़ीक़त का बल्कि इस जगह दोनों असालित रखते हैं ज़लीयत दरमियान हाइल नहीं है अगर फ़र्क़ है तो कलियत व जज़ीएत का है क्यों कि वह सर्वर अलैहि व अला आला अस्सलात व अस्सलाम कल हैं इसी लिए वह हक़ीक़त आप अलैहि व अला आला अस्सलात व अस्सलाम के नाम से मौसूम है और मलाइका कराम के हक़ायक़ अला नबीना व अलैहिम अस्सलवात व इलतसलीमात इसी हक़ीक़त

इसराफ़ीली से पैदा हैं।

उखरवी मौजूदात के मुबादी तैनात:

अब तक आप ने उन हक़ायक़ को सुना जो इस दुनिया के मौजूदात से ताल्लुक रखते हैं अब आप आख़िरत के मौजूदात के हक़ायक़ से मुताल्लिक़ भी मुजद्दिदी रफातों का मंज़र मुलाहिजा फ़रमालें, फ़रमाते हैं:

यह सारे मुबादी तैनात कि मज़कूर हुए तईन वजूदी जुमली (इजमाली) हो या तफ़सीली इस निशा दुनयवी के मौजूदात मुम्किन की निस्बत हैं इस दुनिया के मौजूदात का वजूद व तशख़्स उन मुबादी आलीया के साथ मरबूत है लेकिन मौजूदात उखरव्य के बारे में मशहूद होता है कि उन मुबादी मज़कूरा से वाबस्ता नहीं हैं, बल्कि उन के मुबादी तैनात उमूर दीगर हैं और वह उमूर इस फ़क़ीर के नज़दीक कमालात ज़ातीय हैं कि ज़लीयत की गिर्द उन के पाक दामन तक नहीं पहुँची है और इस मर्तबा अक़्दस में इंद्राज रखते हैं, बल्कि इस मर्तबा मुक़द्दसा में मुफ़स्सिल और मुतमीज हैं बे चुनी तफ़सील व तम्येज़ के साथ वह कमालात मुफ़स्सिला ज़ातीय मुक़द्दसा से हर एक इस निशा उखरवी के मौजूदात से एक मौजूद का मुबदा तईन है अहले बहिश्त के वजूद को गोया उन तैनात वजूदी जुमली व तफ़सीली से कोई ताल्लुक नहीं है कि निशात दुन्यवीय से ताल्लुक रखते हैं और इस निशा के मौजूदात गोया इस मर्तबा मुक़द्दसा के मुक़ाबिल हैं ऐसी निशा (दुन्यवीय) के ब्रअक्स कि मुकाबला से कम नसीब रखते हैं इस निशा दाइमा के मौजूदात का बयान करे कि इस मर्तबा मुक़द्दसा से किस किस्म के नसीब और हज़ूज़ रखते हैं।’’

में ने यह चंद इक़तिबासात अनबीए कराम व सय्यद अलांबिया अलैहि व अलैहिम अस्सलवात व इलतसलीमात व औलीए अजाम व आम मोमिनीन व कुफ़्फ़ार के हक़ायक़ व मुबादी के ताल्लुक से सुपुर्द कलम किए जहां यह हक़ायक़ हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के जबरदस्त रूहानी उरूज व इर्तिक़ा और

बुलंदी नज़र की वाज़िह और रोशन दलील हैं वहीं अक़ीदा व ईमान की हिफाज़त का बड़ा ज़रिया हैं जिन अश्ख़ास व अफराद के हक़ायक़ आप ने पढ़े उन के मक़ाम व मन्सब का तईन और उन के हिसाब से फ़र्क़ मुरातिब और एहतिराम व ताज़ीम ईमान के लिए लाजिमी चीज़ हैं कुरआन व सुन्नत के ज़ाहिर से उन मुरातिब की हक़ीक़त का पता लगाना अगर आसान होता तो कोई इस्लामी फ़िर्क़ा उन शख़्सियात के सिलसिले में धोका न खाता जब कि उन्हों ने बाज़ आयात क़ुरआनी और अहादीस के ज़ाहिर ही से धोका खाया है।

जिस दौर में हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की ख़लक़त हुई और जिस बुलंदी व रफात के साथ हुई यह उएन हिक्मत का तक़ाज़ा था, इस दौर में ऐसे बुलंद नज़र इंसान की ज़रूरत थी आप ने मुरातिब के सिलसिले में जो अपने बातिनी मुशाहदात सुपुर्द कलम किए हैं वह उएन कुरआन व सुन्नत और सहाबा के फरमान के मुताबिक हैं और जिन आयात व अहादीस से शुबहात पैदा होते थे उन के सही मुहामिल बयान फ़रमा दिए, हर एक की हिक्मत बता दी।

आज अगर अहले सुन्नत के मुख़ालिफ़ सारे फ़िरक़े हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के मुशाहदात को अपना पेशवा बना लें तो अक़ीदा व ईमान की सारी खराबियां दौर हो सकती हैं, न वहाबियत रहे न देवबंदीत, न चकड़ालवेत न शीयेत, न ख़ुरूज न एतिज़ाल, हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू जहां आने वाली नस्लों के लिए हक़ का निशान बिन कर आये वहीं गुज़श्ता लोगों की निशानी और यादगार थे, हक़ का परचम जिस तरीके से बुलंद किया, गुज़श्ता ख़ामियों से जिस तरह दीन को पाक किया और आइंदा लोगों के लिए जो प्रसुकून रास्ता मुतय्यन किया वह आप ही का हिस्सा था। हर दौर में आप की तालीमात व मुशाहदात सिंग मेल का काम देते रहे और आप का फ़ैज़ान कभी ख़त्म न होगा जो हक़ायक़ व मआरिफ़ जलवा गर हुए कोई दिखाए तो؏

ख़ुदा रहमत कंद एं आशिक़ान पाक तुयन्त रा

हसन यूसुफ़ी से हज़रत याकूब की मुहब्बत की वजह:

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू इस दुनिया में ऐसे ऐसे सवालात के जवाबात और मुश्किलात को हल कर के गए हैं कि इंसान पढ़ता है तो अंगुश्त बदंदाँ रह जाता है इस दुनिया में बड़े इल्म व फन, फजल व कमाल और मकाशफ़ात व मुशाहदात के हामिल पैदा हुए मगर मआरिफ़ व हक़ायक़ में जो बुलंदी और शरीअत से जो मुताबिक़त आप के यहाँ है वह कहीं नहीं है।ऐसे ऐसे उदक़ मिसाइल को हल किया है कि बे साख़ता कहना पढ़ता हैकि आप एक मोजिज़ा थे हज अल्लाह थे, ख़लीफ़्त रसूल अल्लाह थे, में ने अक्सर उदक़ मआरिफ़ के बयान से गुरेज किया है। एक तो इस इल्म से अजनबियत, दोम इस्तिलाहात से नावाक़फ़ीयत नीज़ मक्तोबात समझने के लिए जो मुख़तलिफ़ उलूम व फ़नून पर दस्तरस चाहिए, फिर बातिनी रोशनी भी इस के हामिल अफराद उँगुलियों पर गिनने के लायक मिलें गे, लेकिन फिर भी मआरिफ़ में कलम उठाया है तो कुछ कहना ही है। अब आप एक कठिन सवाल और इस का जवाब और इस के ज़िमन में हक़ायक़ का बहता हुआ समंदर मुलाहिजा फरमाएं।

सवाल:

हज़रत शैख़ अब्द उलहक़ मुहद्दिस देहलवीरहमत अल्लाह अलैहि के फ़रज़न्द हज़रत शैख़ नूर उलहक़रहमत अल्लाह अलैहि ने आप से मुतअद्दिद बार यह सवाल किया कि हज़रत यूसुफ के आबए कराम अला नबीना व अलैहिम अस्सलवात व इलतसलीमात के बारे ख़ुदावंद क़ुद्दूस ने फ़रमाया है:

وَاذْکُرْ عِبٰدَنَاۤ اِبْرٰہِیۡمَ وَ اِسْحٰقَ وَ یَعْقُوۡبَ اُولِی الْاَیۡدِیۡ وَ الْاَبْصَارِ اِنَّاۤ اَخْلَصْنٰہُمۡ بِخَالِصَۃٍ ذِکْرَی الدَّارِ وَ اِنَّہُمْ عِنۡدَنَا لَمِنَ الْمُصْطَفَیۡنَ الْاَخْیَارِ ((ص:۳۸؍۴۵،۴۷)

तर्जुमा: और याद करू हमारे बंदों इब्राहिम और इसहाक़ और याकूब कुदरत और इल्म वालों को, और बेशक वह हमारे नज़दीक चुने हुए पसंदीदा हैं, बेशक हम ने उन्हें एक खरी बात से इमतियाज़ बख्शा कि वह इस घर की याद है।’’

जब परवरदिगार आलम जल व अला ने खालिस ज़िक्र आख़िरत के लिए चुन लिया तो फिर हज़रत याकूब को हज़रत यूसुफ से इस क़द्र मुहब्बत क्यों थी? हज़रत यूसुफ के साथ गिरफ्तारी और लगाव यह हक़ के मासवा के साथ मुहब्बत लगाव है ऐसे बुलंद पाया बंदों का मख़लूक़ के साथ लगाव किसी तरह सही नहीं मालूम होता है।

जवाब:

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने इबतिदा में यह इजमाली जवाब अता फ़रमा दिया था कि हज़रत यूसुफ अला नबीना अलैहि अस्सलात व अस्सलाम की पैदाइश और उन का हसन व जमाल इस निशा दुनयवी की पैदाइश और हसन व जमाल की जिंस से नहीं है और (मक्षुफ़ में) ज़ाहिर हुआ कि उन का जमाल बहिश्तियों के जमाल की जिंस से है और मशहूद हुआ कि इस दुनिया के बावजूद उन की सबाहत (गोरापन) हूर व ग़लमान के हसन के मुशाबेह है।

फिर हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने इस पर मक्तूब 100, जिल्द 3 में तफ़सील से बहस फ़रमाई जिस का खुलासा यह है कि मज़कूरा बाला सवाल के जवाब में यह कहा जा सकता था कि हज़रत यूसुफ के साथ हज़रत याकूब की यह गिरफ्तारी और और मुहब्बत मादून हक़ (अल्लाह के सिवा) के साथ गिरफ्तारी नहीं है क्यों कि सूफ़िया कराम ने कहा है कि मख़लूक़ अल्लाह तआला के हसन व जमाल का आईना है और वहदत के शहूद कुकसरत के आईना में जायज़ करार दिया गया है। सूफ़िया कराम ने उखरवी दीदार के सिवा इस दुनिया में भी मुम्किनात की सूरतों के आईनों और मज़हरों में मुशाहिदा व मकाशफा साबित किया है। उलग़र्ज़ हज़रत याकूब ने हज़रत यूसुफ की सूरत में हक़ का ही जलवा देखा तो दर असल यह मुहब्बत हक़ के साथ हुई अला नबीना व अलेहमा अस्सलवात व इलतसलीमात।

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू इस सवाल का जवाब देते हुए फ़रमाते हैं कि इस दुनिये फ़ानी में तौहीद के ग़लबात में सालिकां सूफ़िया को इस किस्म का कश्फ़ व शहूद हासिल

होता है, क़रीब है कि उम्मत के ख़वास अनबीए कराम इस से इंकार करें और यह हज़रात इस मक्षुफ़ व मशहूद से तहाशी और परहेज़ करें।जब मामला यह है तो अनबीए बर्गुज़ीदा के लिए इस किस्म के अहवाल का सबूत किया एहतिमाल रखता है, बल्कि इस मानी का तसोर उन बुजुर्गों के हक़ में उएन वबाल है।

फिर आप क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि (मुंदरजा बाला) सवाल का जवाब एक मुकदमा पर मबनी है वह यह कि आख़िरत का हसन व जमाल और इसी तरह इस जगह के तलज़जात व तनामात भी न दुनयवी हसन व जमाल के मानन्द हैं और न ही यहाँ के तलज़जात व तनामात की तरह क्यों कि वह हसन व जमाल सब का सब खैर ही खैर है और वह तलज़िज़ व तनाम मौला जल व अला को मकबूल और इस का मर्जी (पसंदीदा) है और यह (दुनयवी) हसन व जमाल सब का सब शर व नुक़्स है और यह तलज़िज़ व तनाम सब नामकबूल और ग़ैरमुस्तहसिन इसी लिए दार आख़िरत दार रज़ा हुआ और दार दुनिया दार गजब मौला हुआ जल सुल्ताना।

सवाल:

मुमकिन में हसन व जमाल चों कि हज़रत वजूब तआला से मुस्तआर है और मुमकिन इस मर्तबा के मज़हर और आईने से ज़्यादा न होगा क्यों कि मुमकिन अपने पास से कुछ नहीं रखता है और जो कुछ रखता है हज़रत वजूब तआला व तक़दस से मुस्तफ़ाद है तो फ़र्क़ उन दोनों जगहों (दार दुनिया व दार आख़िरत) में किस जगह से आएगा और क्यों एक पसंदीदा और मकबूल और दूसरा ना मकबूल और गैर मुस्तहसिन हुआ।

इस अहम सवाल के जवाब में आप हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के इल्म व फजल और वसात नज़री की बुलंदी समाअत फरमाएं, आप फ़रमाते हैं ‘‘जवाब चंद मुक़द्दमात पर मबनी है,मुकदमा औला यह कि आलम मुकम्मल तौर पर असमा व सिफ़ात वाजिबी जल शाना का आईना और मज़हर है और इस तआला के इस्माई और सिफ़ाती कमालात का आईना। मुकदमा दोम यह कि सिफ़ात वाजिबी

जल सुल्तान्हा हर चंद दायरा वजूब में दाखिल हैं,लेकिन चों कि वजूद व क़याम में हज़रत ज़ात तआला के साथ उन का एहतियाज साबित है इस लिए इमकान की बो उन में साबित है और ज़ाती वजूब उन के हक़ में गैर मतीक़्न है क्यों कि उन का वजूब ख़ुद से नहीं है, बल्कि ज़ात वाजिब तआला से है और हर चंद उन्हें गैर ज़ात न कहीं लेकिन ग़ैरयत से चारा नहीं रखती हैं क्यों कि असनैनीत (दोई) उन के दरमियान साबित है और ‘‘अलास्नान मुतग़ायरान’’ अर्बाब माकूल का क़ज़ीया मुक़ररा है इस के बावजूद इमकान का इतलाक़ उन के हक़ में नहीं करना चाहिए कि हदूस का वहम डालता है इस लिए कि उन के नज़दीक हर मुमकिन हादस है , और वजूब बालग़ीर भी इस महल में जायज़ नहीं करार देना चाहिए कि हज़रत ज़ात तआला व तक़दस से उन के इनफ़्काक का मोहम है।

मुकदमा सालस यह कि जिस जगह इमकान की बो है अदम की इस जगह फ़ी हद ज़ाता गुंजाइश है अगरचे इस अदम का हुसूल मुहाल हो लेकिन वह इस्तहाला इस की ज़ात से पैदा नहीं हुआ है बल्कि दूसरी जगह से आया है मुकदमा राबा यह कि असमा व सिफ़ात वाजिबी जल सुल्ताना के लिए जिस तरह उन के जानिब वजूद में हसन व जमाल साबित है उन के एहतिमाल अदम की जानिब में भी हसन व जमाल साबित है अगरचे इस हसन का सबूत मर्तबा हस व वहम में हो कि अदम के मुनासिब है और हर चंद मुस्तआर पड़ोस से हो कि अदम के लिए फ़ी हद ज़ाता शर वक़्बह के अलावा कोई नसीब नहीं है, वजूद है कि सरासर खैर व कमाल है और बतमामा हसन व जमाल। जानना चाहिए कि जो हसन अदम में नमूदार होता है वह इस की तरह है कि हनज़ल (एक निहायत तल्ख़ फल) पर शकर का ग़लाफ़ चढ़ा दें और मीठा बताएं।

दुनिया और आख़िरत का फ़र्क़:

मुकदमा ख़ामस यह कि अल्लाह सुब्हानहू के कर्म से नज़र कशफ़ी से वाज़िह हुआ है कि इस दुनिया में अदम मुमकिन की जानिब को कमाल कुदरत से तरबीयत फ़रमा कर इस को हस व वहम के मर्तबा

में अपनी कामिल दस्तकारी से सबात व करार बख्शा है और सिफ़ात के इस हसन व जमाल का मज़हर बनाया है जो उन के एहतिमाल अदम की जानिब में नमूदार हुआ था और नीज़ वाज़िह हुआ है कि दार आख़िरत में मुमकिन के वजूद की जानिब को तरजीह दे कर सिफ़ात के हसन व जमाल का मज़हर बनाएं गे जो कि उन के वजूद की जानिब में साबित है।

जब यह पुंज गाना मुक़द्दमात मालूम हो गए तो इस दुनिया के हसन व जमाल और आख़िरत के हसन व जमाल के दरमियान फ़र्क़ वाज़िह हो गया और एक का क़बह और दूसरे का हसन रोशन हो गया और मर्जी से गैर मर्जी ने इमतियाज़ पैदा कर लिया। उन तहक़ीक़ात से यह सवाल भी हल हो गया और मुकदमा की तौज़ीह भी हो गई कि सवाल अव्वल का जवाब इसी पर मबनी रहा है जैसा कि जहीन गौर करने वाले पर पोशीदा नहीं है।

और जब यह मुकदमा वाज़िह हो गया तो सवाल अव्वल के जवाब में हम कहीं गे कि फजल ख़ुदावंदी जल शाना से बक्शफ़ सरीह मालूम हुआ है कि हज़रत यूसुफ अला नबीना व अलैहि अस्सलात व इलतसलैम का वजूद हर चंद इस दुनिया में पैदा हुआ है लेकिन इस दुनिया के बाक़ी मौजूदात के बुर खिलाफ़ उन का वजूद दार आख़िरत से है और उन के जानिब वजूद को तरजीह दे कर उन को इस हसन व जमाल का मज़हर बनाया है जो असमा व सिफ़ात के वजूद से ताल्लुक रखता था और शाइबा अदमियत को उन की ज़ात या उन की असल से ताल्लुक पकड़ना मुंतफ़ी कर दिया और इल्लत अदम से कि हर क़बह व नुक़्स का मंशा है उन को और उन की असल को पाक कर दिया और नूर वजूद की जानिब के ग़लबा के अलावा कि बहिश्तियों का हिस्सा है उन में न छोड़ा (इस लिए) ला मुहाला उन के हसन व जमाल की गिरफ्तारी बहिश्त और बहिश्तियों के हसन व जमाल के साथ गिरफ्तारी की तरह महमूद हुई और कामलियन का नसीब हुई और जिस क़द्र मुहब् कामिल तर होगा आख़िरत के हसन व जमाल का गिरफ्तार ज़्यादा होगा और मौला जल शाना की ख़ुशनुदियों में क़दम ज़्यादा रखेगा क्यों कि इस आख़िरत की गिरफ्तारी उएन इस के मालिक के साथ गिरफ्तारी है क्यों कि वह निशा इस जल

सुल्ताना के तिलिस्म हिक्मत से ज़्यादा नहीं है और किबरियाई की चादर की तरह रुपोश पर्दगी नहीं। वाल्लाह यदाव हुला दार अस्सलाम नस क़ाते है और वाल्लाह युरीद इलआख़िरत इस मानी पर रोशन हुज्जत है।

और (सूफ़िया से) जिस ने आख़िरत की गिरफ्तारी को दुनिया की गिरफ्तारी की तरह मज़मूम रखा है और मौला जल शाना की गिरफ्तारी के वरा करार दिया तो इस ने आख़िरत की हक़ीक़त को सही तौर पर जाना नहीं है और गायब को शाहिद (दुनिया) पर फ़ारुक ज़ाहिर के बावजूद कयास कर लिया (हज़रत) राबिया (रहमत अल्लाह अलैहा) बे चारी अगर जन्नत की हक़ीक़त को मुकम्मल तौर पर जानतीं तो इस के जलाने की फ़िक्र न करतें और इस के साथ लगाव को इस के मौला जल सुल्ताना के अलावा के साथ लगाव न जानतीं।

और (सूफ़िया से) दूसरे ने कहा है कि आयत करीमा:

مِنۡکُمۡ مَّنۡ یُّرِیۡدُ الدُّنْیَا وَمِنۡکُمۡ مَّنۡ یُّرِیۡدُ الۡاٰخِرَۃَ (آل عمران:۳؍۱۵۲)

तर्जुमा: तुम में कोई दुनिया चाहता था औरतम में कोई आख़िरत चाहता था।’’

में दोनों फ़रीक़ से शिकायत है (यानी जो दुनिया के तालिब हैं उन से भी और आख़िरत के तालिब से भी, लिहाज़ा दुनिया की तरह आख़िरत भी मज़मूम है) हज़रत हक़ सुब्हानहू उन को इंसाफ दे, कैसे मुतस्व्वर हो सकता है कि हज़रत हक़ सुब्हानहू व तआला जन्नत की तरफ़ दावत दे (बुलाए) और जो दावत के बाद उसे कबूल करले इस से शिकायत करे, गर इस मुक़द्दस जगह से लगाव बुरा होता या बुराई का शाइबा रखता तो बहिश्त दार रज़ा न होती कि रज़ा मुरातिब कबूल की इन्तहा है और वह भी दुनिया की तरह गजब का महल बनती गजब की इल्लत और मुज़म्मत का बाइस अदम है कि हर क़बह व नुक़्स की जुड़ है और दुनिया का हिस्सा है और दुनियाकी लानत का सबब हुआ और जब अदम से बे ज़ारी हासिल हुई जिम व क़बह का शाइबा ज़ाइल हुआ और नारजाई व नामक़बूली दुश्मनों का हिस्सा हुई और बजुज़ रज़ा और वजूद व नूर के कबूल के और अलावा वस्ल व

वसूल और राहत व सर्वर के कुछ नहीं रहा।’’

आप देख रहे हैं कि मुजद्दिदी कलम मौजूदात दुनिया और मौजूदात (आख़िरत) के दरमियान तफ़ावुत व फ़र्क़ किस दिक्कत नज़र के साथ फ़रमा रहा है कि सिफ़ात में दो ऐतबार हैं एक एहतियाज अली अलगीर और एक उन का ख़ुद अपना वजूद । अव्वल की वजह से उन में इमकान और अदम का शाइबा है। मौजूदात दुनिया का ताल्लुक इसी जिहत से है और आख़िरत में जानिब वजूद को तरजीह हासिल है, लिहाज़ा उन का ताल्लुक दूसरी जिहत से है, यह कोई मामूली बात नहीं, तसव्वुफ़ के कितने ही मिसाइल इसी एक असल पर मुतफ़रा हैं, इसी से आप को मालूम मालूम होगा कि दुनिया दार गजब क्यों है और आख़िरत दार रज़ा क्यों है, इसी से मालूम होगा कि जिन्हों ने जन्नत को जलाने की बात कही है उन की पहुँच कहां तक है? इसी से मालूम होगा कि दुनिया के हसन व जमाल से लगाव और ताल्लुक, जिस को बहुतों को वसूल अली अल्लाह का ज़रिया समझा है इस की हक़ीक़त किया है? जिस से ख़ामकारों के लिए निरे मुफ़ासद के दरवाजे खुले।

दानए ग़्यूब ﷺ तो फ़रमा रहे हैं कि दुनिया की मुहब्बत सारी ख़ताओं की जुड़ है। आप अलैहि अस्सलात व अस्सलाम तो फ़रमा रहे हैं कि दुनिया की क़द्र अगर बारगाह इलाही इज़ व जल एक मच्छर के बराबर भी होती तो किसी काफ़िर को पानी पीने को नहीं मिलता जब कि जन्नत की तरफ़ ख़ुदावंद क़ुद्दूस ख़ुद कुरआन में बुला रहा है। इसी तरह का तजदीद अल्फ़ सानी का फ़ैज़ान मक्तोबात शरीफा की तीनों जिल्दों में मोजज़िन है, विलायत की नज़र और नुबुव्वत की नज़र का फ़र्क़ आप बेन तरीका से मुलाहिजा फ़रमा सकते हैं। हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के हक़ायक़ किस क़द्र कुरआन व सुन्नत और नफ़्स अलामर के मुताबिक होते हैं, इस का सही अंदाजा तो इल्म व फजल व इरफान के हामिल बुलंद अफराद ही कर सकते हैं। अब इस सिलसिले में और एक तजल्ली मुलाहिजा फरमाएं, फ़रमाते हैं:

‘‘मुखबिर सादिक ﷺ ने फ़रमाया है कि तस्बीह व तहलील व तहमीद के ज़रिया जन्नत में दरख्त लगाव यानी सुबहान अल्लाह कहू और जन्नत में दरख्त लगाव मानी तंजेही कि इस दुनिया में उन हुरूफ़ व कलिमात के लिबास में इस जगह ज़ाहिर होते हैं इस जगह (आख़िरत में) दरख्त की सूरत में हूँ गे, इस दरख्त से मुहब्बत और इस से तलज़िज़ उएन मानी तंजेही से मुहब्बत और और तलज़िज़ होगा। इस पर कयास कर लो।’’

यानी सुबहान अल्लाह जिस की दलालत हर ऐब व नुक़्स से ब्रायत व पाकी पर है, अल्लाह तआला की इस पाकी पर ईमान और इमकान बयान भी सुबहान अल्लाह की सूरत में है जिस के पढ़ने से बंदे को सवाब और क़ुर्ब हासिल होता है आख़िरत में इस मानी का ज़ुहूर दरख्तों और दीगर लज़्ज़तों की शक्ल में होगा कि उन के इस्तेमाल से बिंदु M को क़ुर्ब दर क़ुर्ब हासिल होगा यही हाल इस की तौहीद और हमद व सना का है।

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं ‘‘सूफ़िया अलैहि ने कि वह तमाम दक़ायक़ व इसरार तौहीद व इत्तिहाद में बयान फ़रमाते हैं और इस दुनिया के मुज़ाहिर जमेला पर उन को उतारा है और आशिकी की है और उन के ज़िमन में शहूद व मुशाहिदा साबित किया है और उन के हसन व जमाल को मौला इज़ व जल का हसन व जमाल जाना है, एक कहता है ज़्क़्तक फि कुल तआम लजीज यानी में ने तुझे हर लजीज खाने में चखा। दूसरा कहता है؎

इमरोज़ चों जमाल तो बे पर्दा ज़ाहिर अस्त

दर हैरतम कि वादा फ़र्दा बराए चीस्त

यानी आज तेरा जमाल जब बे पर्दा ज़ाहिर है तो में हैरत में हूँ कि कल (आख़िरत) का वादा किस लिए है। तीसरा कहता है؎

अज़ अतश गर दर क़दह आबे ख़ुर्न्द

दर द्रवण आब हक़ रा नाज़िर इंद

यानी प्यास की वजह स्यागर पीलए में पानी पीते हैं तो पानी के अंदर हक़ को देखते हैं, इस दुनिया में उन जैसी बातों की सच्चाई इस फ़क़ीर की दरयाफ्त और समझ से दौर है कि इस

दुनिया में इस किस्म की नज़ाकतों को बर्दाश्त की ताकत नहीं पाता है और उन को इस किस्म की दौलत के कबूल के काबिल नहीं जानता है, अगर कबूल की ताकत रखती तो मौला जल शाना की महल गजब न होती और सरकार अलैहि व अला आला अस्सलात व अस्सलाम अलदन्या मलऊन न फ़रमाते। जन्नत है कि उन करामतों की सज़ावार है और उन मुक़ामात के काबिल है। ज़्क़्तक फि कुल तआम लजीज जन्नती तआम में सादिक है न कि दुनयवी तआम में कि आब अदम के ज़हर से मख़लूत है इसी लिए इस का इर्तिकाब मुस्तहसिन नहीं आया।