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अध्याय 49 में से 57पृष्ठ 676–688

मयारतहक़ीक़

यह बात हमेशा मलहूज़ खातिर रखें कि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने न तो किसी के अक़्वाल विमकाशफ़ात से इस की बुज़ुर्गी वफ़ज़ल का अंदाजा करते और न किसी की शख्सियत से इस की बातों को अहमियत देते उन का मयार यह है कि वे अपने इल्म वफ़ज़ल और नूर बातिन से दूसरों के इल्म वफ़ज़ल और बातिनी मदारिज का पता लगाते , जिस की जो मंज़िल होती वही उसे देते अगर कोई बुजुर्ग है मगरइस के अक़्वाल मेज़ान शरीअत पर पूरे नहीं उतरते तो उन के अक़्वाल पर बुला ख़ौफ़ लोमत लाइम तन्क़ीद और गिरफ्त करते।

मगर गिरफ्त में आप का ख़ास इमतियाज़ी शान यह है कि अक़्वाल अफ़आल पर तन्क़ीद के वक़्त नाज़िर को क़दम क़दम पर कायल की बातिनी अज़्मतों से आगाह करते जाते हैं ताकि गलत अक़्वाल और खिलाफ़ हक़ मकाशफ़ात से कोई गुस्ताख फायदा उठा कर उन की रूहानियत को दागदार न करसके और हत्ता अलामकान सही महम्मल पर इबारत को महमूल करते हैं और बुजुर्गों के आज़ार भी बयान करते जाते हैं।

ख़ुद हज़रत शैख़ की कुतुब में बाज़ ऐसी बातें मौजूद हैं जिस की वजह से बाज़ उलमा ने काफ़ी तान वितशनीअ की है और उन के कमालात का एतराफ़ तो बड़ी बात है उन को गुमराह,ज़िंदीक़ वगैरह तक कह दिया , नऊज़बिल्लाह मगर हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू का उन के बारे में यह ख़याल है कि एक मसला में हज़रत शैख़ क़ुद्दिस सिर्रहू की गलती ज़िक्र करके फ़रमाते हैं:

हज़रत शैख़ हज़रत मुजद्दिद की नज़र में:

अजायब कारोबार है शैख़ मुही उद्दीन मकबूल बंदों से नज़र आते हैं और उन के अक्सर कि अहले हक़ की आरा के खिलाफ़ हैं खता वग़ैर दुरुस्त दिखाई देते हैं शायद कि ख़ताए कशफ़ी की वजह से माज़ूर रखा है और ख़ता इजतिहादी की तरह मलामत से दौर रखा है ,इस फ़क़ीर का हज़रत शैख़ मुही उद्दीन के सिलसिले में एतिक़ादखास है कि उन को मकबूलों से जानता है और उन के उलूम मुख़ालिफ़ कोख़ता और नुकसान दह समझता है।

इस गिरोह सूफ़िया से एक गिरोह शैख़ पर तान विमलामत करता है और उन के उलूम को भी खता करार देता है और दूसरा गिरोह वह है जिस ने शैख़ की तक़लीद की और यह लोग उन के तमाम उलूम को दुरुस्त तसोर करते और दलायल विशवाहिद के ज़रिया उन उलूम की हक़्क़ानियत को साबित करता है , अवर्षक नहीं कि उन दोनों फ़रीक़ ने इफ़रात वितफ़रीत का रास्ता इख्तियार्किया है और दरमियानी हाल से दौर रहे हैं।

शैख़ कि औलीए मक़बूलियन में से हैं ख़ता कशफ़ी की वजह से कैसे रद्द किए जा सकते हैं और उन के उलूम कि सवाब से दौर हैं और अहले हक़ की आरा के खिलाफ़ हैं क्योंकर तक़लीद के ज़रिया कबूल किए जा सकते हैं ,पस हक़ वह तवस्सुत है जिस की तौफ़ीक़ अल्लाह तआला ने अपने एहसान विक्रम से मुझ को अता फ़रमाई है।(म 266)

हज़रत शैख़ के मक्शफ़ात:

अब में शैख़ के चंद मिसाइल बताता हूँ जो शैख़ की ज़बान से सादर हुए,आप ब आसानी समझ सकते हैं कि हज़रत शैख़ क़ुद्दिस सिर्रहू से कैसी कैसी इल्मी और कशफ़ी ख़ताएँ हुई हैं:

1।मक्तूब 266 ज 1 जो कि अक़ाइद पर मुश्तमिल है ख़ुदावंदक़ुदिवस के बारे में अक़ीदा बयान करते हैं कि " अव तआला कादर मुख़तारास्त अज़ शाइबा एजाब विमज़ना इज़तिरार मुनज़्ज़ह विंबरा अस्त" इस के बाद फिलासफा का शदीद रद्द करते हैं जो कि अल्लाह तआला के फ़ाइल मूजिब

होने के कायल हैं , फिर फ़रमाते हैं " शैख़ मुही उद्दीन इब्न अरबी की इबारात भी नाज़िर बायजाब हैं और माना कुदरत में वह फलसफा की मुआफ़िक़त रखते हैं कि सेहत तर्क कादर से जायज़ नहीं करार देते हैं और जानिब फेअल को लाज़िम जानते हैं" इस के बाद शैख़ के बारे में वह फ़रमाया जो अभी आप पढ़ चुके हैं ।

मक्तूब 286में सूफ़िया कराम की मुख़ालफ़ात बयान करते हुइफ़रमाते हैं " और मिनजुमला उन बाज़ मुख़ालफ़ात केबाअज़ ऐसे उमूर का हुक्म लगाना है कि एजाब वाजिब तआला वितक़दस कि मुस्तलिज़्म हैं अगर चह यह लोग लफ़्ज़ एजाब का इतलाक़ नहीं करते हैं और इरादा साबित करते हैं लेकिन दरहक़ीक़त इरादा की नफ़ी करते हैं और इस हुक्म में तमाम अहले मिलल के मुख़ालिफ़ हैं

मिनजुमला उन उमूर (जो मुस्तलिज़्म एजाब हैं) के यह हुक्म करना है कि हक़ तआला ऐसी कुदरत पर कादर है जो बमाना "उन शा फेअल वान शा लिम यफाल" है (यानी अगरचाहे गा करेगा और अगर नहीं चाहे गा नहीं करे गा) लेकिन पहले क़ज़ीया को वाजिब अलसदक़ और दूसरे को मुम्तना अलसदक़ जा नते हैं और यह कौल बायजाब है बल्कि कुदरत का इंकार है इस मानी कर जो अहले मिलल के नज़दीक साबित हैं क्योंकि अहले मिलल के नज़दीक कुदरत सेहत फेअल और तर्क के माअना में है और उन के कौल से लाज़िम फेअल का वजूब और तर्क का इमतिना है तो यह कहां और वह कहां , उन सूफ़िया का मजहब इस मसला में बईना हुकमाका मजहब है।

शर्तिया औला के सिदक़ कोवाजिब साबित करार देने और सिदक़ शर्तिया सानिया के इमतिना के बावजूद इरादा साबित करना और अपने आप को इस इस्बात(इरादा) से हुकमा से जुदा करना नफा बख्श नहीं होसकता क्योंकि इरादा दो मत्सावी चीजों से तायक की तहसील का नाम है , पस जिस जगह त्सावी नहीं इरादा नहीं और इस जगह त्सावी मादूम क्योंकि वजूब और इमतिना

है"।

2- मक्तूब 266 में अपने मुर्शद ग्रामी वक़ार सय्यदना ख़्वाजा बाक़ी बिल्लाह क़ुद्दिस सिर्रहू के हवाले से तो यहाँ तक नकल फ़रमाया कि हज़रत शैख़ मुही उद्दीन कामलियन की अर्वाह के क़दीम होने के कायल हैं।

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि इस कौल को ज़ाहिर से फेरना चाहिए और तावेल पर महमूल करना चाहिए ताकि अहले मिलल के इजमा की मुखालफत न हो’’।

3-मसला रवैत बारी तआला:

अहले हक़ का इजमा है कि कयामत के दिन मोमिनीन को अल्लाह तआला का दीदार होगा,इस सिलसिला में कुरआन वसंत के नसोस बहुत काफ़ी हैं , मगर इस सिलसिले में हज़रत शैख़ मुही उद्दीन अरबी ने जो गुफ़्तगू फ़रमाई है वह ज़ाहिर नसोस के बिलकुल खिलाफ़ और अहले हक़ के अकीदे के बिलकुल मुतसादिम है ।

ख़याल रहे कि हज़रत शैख़ क़ुद्दिस सिर्रहू ने अपनी बाज़ तालीफ़ात में फ़रमाया है"राईत रबी अला सूरत अलफ़र्स"(में ने अपने रब को फ़र्स की सूरत पर देखा ) हज़रत शैख़ रुकन उद्दीन अलाउआलदौला रहमत अल्लाह अलैहि ने इस कौल की शरह करते हुए फ़रमाया : कि हक़ जल वाला के सालकेन हक़ सुब्हानहू व तआला को तजल्लियात सूरीय के साथ देखते हैं और वह आसार से ताल्लुक रखता है ,उन तजल्लियात में हक़ तआला बंदों पर जमी इश्याय मुफ़रदात अनासिर ,मुआदन,नबातात वहीवानात और अफराद इंसान की सूरत में तजल्ली फरमाता है , ओर्तजलि सूरी की इन्तहा मर्तबा इंसान में यह है कि हक़ तआला साहिब तजल्ली की सूरत में मुतजली हो और सालिक के लिए क़दम की लग़्ज़िश के लिए इस से ज़्यादा सख्त मक़ाम नहीं होगा , सुबहान अल्लाह! अनाउलहक़,हल फ़ी अलदारेन ग़ैरी और लेस फ़ी जबती स्वालिलाह ऐसी ही तजल्ली से नाशी हैं।(अज़ रशहात हाशिया मक्तोबात शरीफ़ ज,अव्वल ,स, 477)

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि हज़रत हक़ सुब्हानहू व तआला को मोमिनीन आख़िरत में जन्नत में देखें गे बग़ैर जिहत वबगैर कैफ़ और बे शुबह विमिसाल के , यह वह मसला है कि मिलित इस्लाम और गैर इस्लाम के तमाम फ़िरक़े अहले सुन्नत के अलावा सब इस के मुनकर हैं और बे जिहत वबे कैफ़ दीदार को जायज़ करार नहीं देते हत्ता कि शैख़ इब्न अरबी भी रवैत आख़िरत को तजल्ली सूरी में उतारते हैं और इस तजल्ली के अलावा जायज़ नहीं करार देते ।

एक दिन हज़रत ख़्वाजा बाक़ी बिल्लाह क़ुद्दिस सिर्रहू ने शैख़ से नकल फ़रमाया "अगर मोतज़िला मर्तबा तंज़िया को मुक़य्यद न करते और यह तशबीया के भी कायल होते और रवैत को इस तजल्ली (सूरी) के साथ जानते तो हरगिज़ रवैत से इंकार नहीं करते और मुहाल न जानते , यानी उन का इंकार बे जहती वबे कैफी की वजह से है जो कि मर्तबा तंज़िया से मख़सूस है बख़िलाफ़ इस तजल्ली कि जिहत विकीफ़ इस में मलहूज़ है "।

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि पोशीदा न रहे कि रवैत आख़िरत को तजल्ली सूरी में उतारना दरहक़ीक़त इंकार करना है इस रवैत का क्योंकि वह तजल्ली सूरी अगरचे दुनिया की तजल्लियात सूरीय से जुदा है( मुगरफिर भी ) रवैत हक़ नहीं।(म 266।ज1)

मक्तूब 79 ज,3 में फ़रमाते हैं :"हक़ सुब्हानहू की रवैत को सूरत की रवैत में करार देना दर हक़ीक़त रवैत की नफ़ी करना है, नीज़ जो सूरत आलम मिसाल में हासिल होती है हरचंद जामा हो आलम मिसाल के अंदाजा से होगी और आलम मिसाल हरचंद वसात रखता है अल्लाह तआला के पैदा करदा आलम से एक है ,सूरत की जामईयत जो इस में होगी किया गुंजाइश रखती है कि तमाम कमालात वजूब्य ज़ातीय की जामा हो और सब को जब्त करले ताकि इस मर्तबा मुक़द्दसा का जामा बिन सके? । "

में ने यह चंद बातें सुपुर्द कलम करदें जिन का ताल्लुक ज़ात वाजिब वस्फ़ात वगैरह से है ,इस सिलसिले में उन के अलावा भी और बहुत सी बातें हैं मगर आप इसी से अंदाजा लगा सकते

हैं कि सूफ़िया कराम ने ज़ात वस्फ़ात और अस्मा वाफ़आल वाजिब तआला में अपने तालम और कश्फ़ की वजह से कैसी कैसी ख़ताएँ की हैं और ठोकरें खायें, और शान अलूहियत की अज़मत विराफ़त बताने में किस क़द्र कोताहियों का इर्तिकाब किया है!

किया ऐसे दौर में ऐसे फ़र्द फरीद की ज़रूरत नहीं थी जो ख़ुदावंद क़ुद्दूस केह ज़ात वस्फ़ात वगैरह का सही तआरुफ़ क्रासके जो उन के तमाम नशेब वफ़राज़ से वाकिफ़ हो , जिस का कश्फ़ बिलकुल सही और नफ़्स अलामर के मुताबिक हो और जो उरूज वार्तिक़ा रूहानी के नुकता आखिर तक पहुँचा हो,बाल बाल की खबर रखता हो ,कहां पर किस तरह लोग ठोकरें खाते हैं, बहकने का सबब किया है सब से वाकिफ़ हो, ऐसे ही फ़र्द कामिल वाकमल को दुनिया मुजद्दिद अल्फ़ सानी कहती है ,आप ने उम्मत को जो कुछ दिया अगर ब नज़र इंसाफ देखा जाए तो मालूम हो जाए गा कि इस दूसरे हज़ारे में किसी ने नहीं दिया,और एसआद्या कि अब किसी के देने की ज़रूरत बाक़ी नहीं रखी।

आप ने अभी सिर्फ़ ज़ात वस्फ़ात वाजिब जल शाना के सिलसिले में सूफ़िया का हाल पढ़ा ख़ास कर हज़रत शैख़ मुही उद्दीन इब्न अरबी क़ुद्दिस सिर्रहू जो कि आम तौर पर माबाद के तमाम सूफ़िया की हुज्जत बने , दीगरों ने भी इस सिलसिले में बहुत कहा है मसला शैख़ अबदुलकरीम यमनी रहमत अल्लाह अलैहि जो कि अपने जमाने के निहायत मशहूर सोफी और उल्मा वसूफ़िया के मर्जा थे एक दिन मजलिस में फ़रमाया कि अल्लाह तआला आलम अलग़ीब नहीं, जब देखा कि हमारा यह कौल ज़हनों में धंस नहीं रहा है तो इस की तवज्जीया भी फ़रमाई , तफ़सील नके लिए देखिए मक्तूब 100 जिल्द अव्वल।

ख़ौफ़ तवालत की वजह से में ने इसी पर इकतिफ़ा किया है , कुछ और चीजें इस सिलसिले में आइंदा सफ़हात में आएं गी जिन से आप अंदाजा लगा लें गे कि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के यहाँ ख़ालिक़ कायनात जल शाना की अज़मत वितक़दस का कितना लिहाज है, अब में नुबुव्वत वरिसालत

के सिलसिले में चंद मक्शफ़ात वार्शादात सूफ़िया सुपुर्द कलम करता हूँ, आप देखें कि इस सिलसिले में भी सूफ़िया कराम से किस क़द्र चौक हुई है।

नुबुव्वत वरिसालत:

आम तौर पर सूफ़िया कराम का नज़रिया यह है कि "अलूलाय अफ़ज़ल मिन अलंबोत "यानी विलायत नुबुव्वत से अफ़ज़ल है इस कौल से चूंकि वहम होता था कि वली नबी से अफ़ज़ल है इस लिए बाज़ बुजुर्गों ने इस की तावेल यह की है कि "विलाय उन्नबी अफ़ज़ल मिन नबूत उन्नबी "नबी की विलाये नबी की नुबुव्वत से अफ़ज़ल है , इस की वजह यह बयान की कि विलायत में रुख हक़ की तरफ़ है और नुबुव्वत में ख़ल्क़ की जानिब और बुला शुबह हक़ की तरफ़ रुख अफ़ज़ल होगा ख़ल्क़ की तरफ़ रुख से।

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं :"मुंदरजा बाला कौल और इस की तवज्जीया सकर पर मबनी है बल्कि नामला इस के ब्रअक्स है सही हुक्म यह है कि नुबुव्वत विलायत से अफ़ज़ल है ख़्वाह इस नबी की ही विलायत क्यों न हो, क्योंकि विलायत में सीना की तंगी की वजह सेख़लक़ की जानिब रुख नहीं हो सकता है और नुबुव्वत कमाल अंशराह सदरी की वजह से न तवज्जो हक़ माने तवज्जो ख़ल्क़ है और न तवज्जो ख़ल्क़ माने तवज्जो हक़।

नुबुव्वत में रुख तन्हा ख़ल्क़ की तरफ़ नहीं है ताकि विलायत को इस पर तरजीह हासिल हो ,अयाज़ा बिल्लाह सुब्हानहू ख़ल्क़ की जानिब तन्हा रुख अवाम कालानाम का मर्तबा है शान नुबुव्वत इस से बरतर है ,इस माना की समझ अर्बाब सकर से दुश्वार है,मुस्तक़ीम अलाहवाल अकाबिर इस मार्फत से मख़सूस हैं"(खुलासा मक्तूब 108 जिल्द अव्वल)

मक्तूब 95जिल्द अव्वल में फ़रमाते हैं :"अनबया अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात जमी मौजूदात में बेहतरीन हैं और बेहतरीन दौलत उन के सुपुर्द हुई है, विलायत नुबुव्वत का जुज़ है और नुबुव्वत इस का कल है,ला मुहाला नुबुव्वत विलायत से अफ़ज़ल होगी ख़्वाह विलायत नबी हो या

विलायत वली ।।।"

मक्तूब 260 में फ़रमाते हैं कि इस सैर में मालूम होता है कि तमाम विलायतों के कमालात ख़्वाह विलायत सुग़रा हो या कुबरा और ख़्वाह विलायत इलिया हो, मक़ाम नुबुव्वत के कमालात के ज़लाल से हैं और वह कमालात(विलायत)शबह विमिसाल हैं उन कमालात(नुबुव्वत) की हक़ीक़त के लिए,और वाज़िह होता है कि नुकता कि इस सैर के ज़िमन में तै होता है मक़ाम विलायत के तमाम कमालात से ज़्यादा है ,तो कयास करना चाहिए कि इस के तमाम कमालात को किया निस्बत होगी मातक़दम के तमाम कमालात से(यानी वह कमालात विलायत जिन का ज़ुहूर हर सालिक पर पहले होता है ) दरयाय मुहीत को भी क़तरा से निस्बत है मगर इस जगह वह निस्बत भी मफ़क़ूद है , मगर यह कि हम कहीं कि मक़ाम नुबुव्वत को मक़ाम विलायत से ऐसी निस्बत है जैसे गैर मुतनाही को मुतनाही से निस्बत है।

सुबहान अल्लाह! जो इस राज़ से जाहिल है वह कहता है कि अलूलाय अफ़ज़ल मिन अलंबोत और दूसरा इस मामला से आगाही न होने के सबब इस की तो जेह में कहता हैवलाय उन्नबी अफ़ज़ल मिन नबूता। कबरत कलम तख़र्ज मिन अफ़्वासिम, मज़ेद बहस तजदीद के इसरार वरमोज़ में पढ़ीए गा।

विलायत विनबूत:

विलायत विनबूत के कमालात तक नारसीदगी ने लोगों से तरह तरह की बातें कहलवाएं हम यहाँ चंद मआरिफ़ वहक़ायक़ मक्तूब 302 से सुपुर्द कलम करते हैं आप देखें कि तजदीद अल्फ़ सानी ने कण कण मआरिफ़ व हक़ायक़ को जलवा गर किया।

2- सुलतान उलारफ़ैन हज़रत बायज़ीद बस्तामी क़ुद्दिस सिर्रहू से ग़लबा हाल में यहाँ तक निकल गया कि" लवाई अर्फ़ा मिन लोअ मुहम्मद"मेरा झंडा मुहम्मद सिल्ली अल्लाह अलैहि वसल्लम के झंडे से बुलंदत्तर है , हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि हज़रत बायज़ीद क़ुद्दिस सिर्रहू के यहाँ सकर सहव से अफ़ज़ल है उन्हों ने अपने लोअ को लवाए विलायत जाना और लवाए मुहम्मद सिल्ली अल्लाह अलैहि

वसल्लम कोस लवाए नुबुव्वत, लवाए विलायत को कि सकर की तरह रुख रखता है तरजीह दी है लवाए नुबुव्वत पर कि सहव की तरफ़ रुख रखता है ,आप क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं जो अहकाम सक्रिय से हैं वह मक़ाम विलायत से हैं और जो सहव है वह मक़ाम नुबुव्वत से ताल्लुक रखता है ।

3- बाज़ बुजुर्गों से ऐसी बातें सरज़द हाई हैं जिन से यह वहम होता है कि इताअत हक़ जल वाला और है और इताअत रसूल सिल्ली अल्लाह अलैहि वसल्लम दीगर,इसी तरह मुहब्बत इलाही और मुहब्बत रसूल में भी फ़र्क़ किया है , मसला हज़रत ख़्वाजा अबुलहसन खरक़ानी क़ुद्दिस सिर्रहू के बारे में आम तौर पर सवानिह निगारों ने लिखा है कि एक मर्तबा हज़रत सुलतान महमूद ग़ज़नवी पन्ने ज़माना बादशाहत में खरक़ानी के पास से गुजरे तो आप ने कुछ नुमाइंदे या ख़ुदाम हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू की बारगाह में भेजे और उन से कहा कि हज़रत ख़्वाजा से अर्ज़ करना कि वह मुझे देखने के लिए आएं ,उन्हें यह भी समझा दिया कि अगर हज़रत ख़्वाजा कुछ तवक़्क़्फ़ करें तो उन्हें आयत करीमा"इतिवाइल्ला वातीअवालरसोल वावली अलामर मुनिकम "(तुम अल्लाह की इताअत करू,रसूल की इताअत करू और अम्र वालों की इताअत करू) सुना देना , जब यह लोग आये और हज़रत ख़्वाजा की तरफ़ से आमद में तवक़्क़्फ़ देखा तो आयत मज़कूरा पढ़ कर सुनाया,

हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू ने जवाब में इरशाद फ़रमाया कि इतिवाइल्ला में इस क़द्र गिरफ्तार हूँ कि इतिआलरसोल से शर्मिंदा हूँ और फिर औली अलामर की इताअत का सवाल?

इस वाक़ा से यह पता चलता है कि हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू इताअत हक़ को इताअत रसूल के मुग़ायर समझते थे ,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि यह बात इस्तिक़ामत से कोसों दौर है ,मशाइख़ मुस्तक़ीम अलाहवाल ऐसी बातों से परहेज़ करते हैं और तमाम मुरातिब शरीअत,तरीक़त वहक़ीक़त में हक़ की इताअत इस के रसूल सिल्ली अल्लाह अलैहि वसल्लम की इताअत में जानते हैं और जो इताअत हक़ जल वाला इताअत रसूल के बग़ैर में हो उसे उएन ज़लालत समझते हैं ।

इसी मक्तूब152 में आप ने नसोस क़ुरानीय से साबित फ़रमाया है कि इताअत रसूल सिल्ली अल्लाह अलैहि वसल्लम उएन इताअत हक़ जल वाला है और जो इताअत रसूल सिल्ली अल्लाह अलैहि वसल्लम से हट कर होगी वह गैरहक़ की इताअत होगी हक़ की नहीं।

इसी तरह नकल किया गया है कि हज़रत शैख़ अबू सईद अबुअलख़ैर रहमताल्लाह अलैहि एक दफ़ा मजलिस में मोतक़िदीन के साथ बैठे हुए थे ,एक बुजुर्ग सय्यद जो अकाबिर सादाद खुरासान से थे वह मजलिस में तशरीफ़ फ़रमा थे ,इत्तिफ़ाका एक मजज़ूब मग़्लूब अलाहवाल वहाँ आग्ये ,हज़रत शैख़ सबू सईद क़ुद्दिस सिर्रहू ने सय्यद साहिब पर उन्हें तरजीह (तक़दीम)दी यह बात सय्यद साहिब को नापसंद आई , तो हज़रत शैख़ अबू सईद क़ुद्दिस सिर्रहू ने फ़रमाया कि आप की ताज़ीम मुहब्बत रसूल की वजह से है और उन मजज़ूब की मुहब्बत इलाही की वजह से , मक़सद यह कि सरकार अलैहि अस्सलात वस्सलाम की मुहब्बत चाहती है कि आप के तमाम मुताल्लिक़ीन विमुंतस्बीन से मुहब्बत हो इस लिए ताल्लुक की वजह से सय्यद साहिब की ताज़ीम की है और यह मजज़ूब चूंकि अ लिल्लाह तआला की मुहब्बत वाल्फत से सरशार क़ल्ब रखता है और मुहब्बत इलाही मुहब्बत रसूल पर मुक़द्दम है इस लिए उन मजज़ूब साहिब को मुक़द्दम किया ,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि इस किस्म का तफ़र्क़ा अकाबिर मुस्तक़ीम अलाहवाल जायज़ नहीं करार देते और हक़ सुब्हानहू व तआला की मुहब्बत का ग़लबा मुहब्बत रसूल सिल्ली अल्लाह अलैहि वसल्लम पर सकर अहवाल से जानते हैं और फिजूल के सिवा कुछ नहीं समझते , इसी क़द्र है कि मक़ाम कमाल में कि मर्तबा विलायत है मुहब्बत हक़ सुब्हानहू ग़ालिब है और मक़ाम तकमील में कि मक़ाम नुबुव्वत का हिस्सा है मुहब्बत रसूल ग़ालिब है(मक्तूब मज़कूर)

कितना ईमान अफ़्रोज़ और हक़ीक़त पर मबनी कलाम है , इस से आप ब आसानी अंदाजा लगा सकते हैं कि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू को किस क़द्र दिक्कत नज़र हासिल थी और दिल की गहराइयों में किस क़द्र मुहब्बत रसूल सिल्ली अल्लाह अलैहि विसल जलवा गर थी ।

नसोस क़ुरआनी और अहादीस करीमा पर नज़र डालिए तो पता चलता है कि अल्लाह तआला और इस के

रसूल सिल्ली अल्लाह तआला अलैहि वसल्लम की इताअत विमहबत एक दूसरे का उएन हैं, जो तफ़र्क़ा बाज़ बुजुर्गों से मनक़ूल है वह ज़ईफ़ अलएतिक़ाद और बीमार दलों के लिए बहुत मुजर और नुकसान दह है ,ऐसी बातें ज़बान पर लाना ख़ास कर इस जमाने में अक्लमंदों का काम नहीं है।

क़ुर्ब नुबुव्वत और क़ुर्ब विलायत:

हम यहाँ मक्तूब 311व312से कुछ इक़तिबासात सुपुर्द कलम करते हैं जिस से विलायत विनबूत का फ़र्क़ और उन के कमालात का फ़र्क़ ब आसानी समझ सकते हैं ,इस से आप के यह भी समझ में आजा ए गा कि शरीअत जो कि मक़ाम नुबुव्वत से नाशी है इस की किया हक़ीक़त है ? और मक़ाम विलायत से जो उलूम पैदा होते हैं और जिन्हें लोगों ने शरीअत पर तरजीह दी और उसे इल्म लदनीय समझते हैं और शरीअत की बोली से हट कर जिन की बोली है वह किस मक़ाम से नाशी होते हैं ।

इस से आप को यह भी पता चल जाए गा कि हज़ारावल में मजमूई तौर जो कुछ बुजुर्गों से सादर हुआ उसे जा हलों ने इतना सर पर चढ़ा लिया और उन्हें ना जायज़ मक़ासिद की तकमील का ज़रिया बना लिया जिस से नरों की नज़र में शरीअत बे ऐतबार होकर रह गई ,इस के मुक़ाबिल तजदीद अल्फ़ सानी अल्लाह तआला की कितनी बड़ी नेमत हैऔर कितनेहक़ायक़ विमआरिफ़ को जलवा गर करके शरीअत की अहमियत वाज़मत औरमुक़ाम नुबुव्वत की बुलंदी वरीअत में चारचांद लगादिए।

विलायत क़ुर्ब इलाही जल शाना का नाम है जो कि बग़ैर ज़लीयत की आमेज़िश के मुतस्व्वर नहीं होता है और हिजाबात के हाइल हुए बग़ैर हासिल नहीं होसकता है ,अगर विलायत ओलिया है तो दाग ज़लीयत से दागदार है और विलायत अनबया अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात हर चंद ज़लीयत से बाहर होजाति है लेकिन अस्मा वस्फ़ात के हिजाबात के हाइल हुए बग़ैर मुतहक़्क़ नहीं हो सकती है और विलायत मिला आला अला नबीना वालैहिम अस्सलवात वालतसलीमात हर चंद अस्मा वस्फ़ात के हिजाबात से बुलंद जा चुकी है लेकिन शेवन वाइतबारात ज़ातीय के पर्दों से चारा नहीं।

और नुबुव्वत वरिसालत कि ज़लीयत की आमेज़िश ने इस की जानिब राह नहीं पाई है और सिफ़ात वाइतबारात के पर्दों को राह में छोड़ दिया है ,पस ला मुहाला नुबुव्वत विलायत से अफ़ज़ल होगी और क़ुर्ब नुबुव्वत ज़ाती वासली होगा , और जो उन दोनों की हक़ीक़त पर मतला नहीं होसका इस ने विलायत के नुबुव्वत से अफ़ज़ल होने का हुक्म लगाया और क़ल्ब से यकीन करलिया पस वसूल दर मर्तबा नुबुव्वत होगा और हुसूल मक़ाम विलायत में क्योंकि हुसूल बे मुलाहिजा ज़लीयत मुतस्व्वर नहीं हो सकता ,बख़िलाफ़ वसूल के।

नीज़ कमाल के हुसूल में रफा असनीयत(दोई का खातमा)और कमाल वसूल में बकाए असनीयत पस रफा दुगांगी मक़ाम विलायत के मुनासिब होगी और बकाए दुगांगी मर्तबा नुबुव्वत के लायक , और रफा दुगांगी चूंकि मक़ाम विलायत के मुनासिब पस नाचार सकर हिम्मा वक़्त लाज़िम होगा मक़ाम विलायत के लिए और बकाए असनीयत चूंकि मर्तबा नुबुव्वत में है तो सहव इस मर्तबा के ख़वास से होगा ।

नीज़ तजल्लियात का हुसूल ख़्वाह इशकाल और सूरतों के लिबास में हो और ख़्वाह अलवान वानिवार के पर्दा में सब मक़ाम विलायत में है और इस के मुक़द्दमात विमबादी तै करने में बख़िलाफ़ मर्तबा नुबुव्वत के कि इस महल में असल के साथ वसूल है और उन तजल्लियात वज़होरात से इस्तिग़ना है कि इस असल के ज़लाल हैं और इस तरह इस मर्तबा के मुबादी विमुक़दमात तै करते वक़्त भी उन तजल्लियात की हाजित नहीं है मगर यह कि अज़राह विलायत उरूज हासिल हो ,इस ज़माना में उन तजल्लियात काहुसूल विलायत के वास्ता से है न कि राह उसूल नुबुव्वत की मुसाफ़त तै करने के वास्ते से।।। खुलासा यह कि तजल्लियात वज़होरात ज़लाल की खबर देती हैं और जो ज़लाल की गिरफ्तारी से गुज़रज्ञा है तजल्लियात से छुटकारा पागया है "माज़ाग अलबसर" का भेद इस से तलाश करना चाहिए।

ए फ़रज़न्द ! इश्क का वलवला और मुहब्बत का तनतना(क्रूफर)और शौक अंगेज़ नारे और दर्द

आमेज़ आवाजें ,वजदूतवाजिद,रक़्स वरक़ासी सब मुक़ामात ज़लाल और ज़हूरात वितजल्लियात ज़लीय के औकात में हैं असल से वसूल के बाद उन उमूर का हुसूल मुतस्व्वर नहीं है ।

मुहब्बत इस महल में इरादा ताअत के माना में है जैसा कि उलमा ने बयान फ़रमाया है न कि इस पर मानी ज़ाइद(का नाम)कि शौक वज़ौक़ का मंशा हैं जैसा कि बाज़ सूफ़िया ने गुमान किया है।

ए फ़रज़न्द ! सुनो! मक़ाम विलायत में चूंकि रफा असनीयत मतलूब है ना चार औलियाए कराम इरादा के ज़वाल की कोशिश करते हैं, शैख़ बसताम फ़रमाते हैं "अरीद उन ला अरीद"(में चाहता हूँ कि इरादा न करूँ) और मर्तबा नुबुव्वत में चूंकि रफा असनीयत दरकार नहीं है (इसी लिए ) नफ़्स इरादा का ज़वाल मतलूब न हुआ ,ओर्च मतलूब भी क्योंकर होगा कि उर्दा फ़ी हद ज़ातिहा सिफ़त कामिल है अगर नुक़्स ने इस की तरफ़ राह पाई है तो इस के मुताल्लिक़ के ख़बस(नापाकी) के वास्ता से है ,तो चाहिए कि इस का मुताल्लिक़ अम्र ख़बीस वना पसंदीदा न हो बल्कि इस के तमाम मुरादात हक़ के मर्ज़ियात हूँ जल वाला।

इस तरह मक़ाम विलायत में तमाम सिफ़ात बशरियत के लिए कोशिश करते हैं और मर्तबा नुबुव्वत में उन सिफ़ात के बुरे मुताल्लिक़ात की नफ़ी मतलूब है न कि असल उन सिफ़ात की नफ़ी कि फ़ी हद ज़ातिहा कामिल हैं ,मिसाल के तौर पर सिफ़त इल्म कि फ़ी हदज़ातहा सिफ़ात कामला से है अगर नुक़्स इस तक राह पाती है तो इस के बराए मुताल्लिक़ के ऐतबार से है पस इस के बुरे मुताल्लिक़ की नफ़ी ज़रूरी हुई न की असल इस सिफ़त की नफ़ी ,इसी पर दूसरी सिफ़ात को कयास कर लीजिए।

पस जो शख्स मक़ाम नुबुव्वत विलायत की राह से आया है इस को अस्नए राह में असल सिफ़ात की नफ़ी से चारा न होगा और जो विलायत के तवस्सुत के बग़ैर इस मक़ाम तक पहुँचा है इस को असल सिफ़ात की नफ़ी से कोई काम नहीं है ,उन सिफ़ात के बुरा मुताल्लिक़ात की नफ़ी करना चाहिए ।