मुख्य सामग्री पर जाएँ

Allama Afaque Ahmad Mujaddidiतजदीद अल्फ़ सानीमंतिक़ वफ़लसफा की तरदीद

अध्याय 40 में से 57पृष्ठ 548–560

मंतिक़ वफ़लसफा की तरदीद

मंतिक़ वफ़लसफा और उन के हामिलियन का रद्द पहले उद्वार में भी हमारे हस्सास इस्लाफ़ ने किया और इस के मख़फ़ी असरात बद से लोगों को आगाह किया ख़ास कर हज़रत सय्यदना इमाम मुहम्मद ग़ज़ाली क़ुद्दिस सिर्रहू ने,मगर इस फन से उलमा का लगाव और दिलचस्पी बढती चली गई और रफ़्ता रफ़्ता इस ने ऐसी तरक्की की कि यह फन इल्म कलाम का एक अहम जुज़ बिन गया,हैरत तो यह है कि इल्म कलाम से तजावुज़ करके फ़िक़ही कुतुब तक में इस का इस्तेमाल होने लगा,इस की इस्तिलाहात के ज़रिया मिसाइल की तालीम अमल में आने लगी,उसूल फ़िक़्ह में भी इस ने जुड़ पकड़ ली।

इस से ख़ुसूसी तौर पर दो चीजें वजूद में आएं एक तो यह कि अब अक़ाइद वामाल के मोतद ब हिस्सा का इल्म हासिल करने के लिए पहले मंतिक़ वफ़लसफा का पढ़ना लाजिमी हो गया क्योंकि इस के बग़ैर हम मैदान तदरीस के अच्छे और कामयाब खिलाड़ी नहीं बिन सकते थे,एक बा वक़ार और ज़ी इल्म मदर्स बनने के लिए इस का सीखना ज़रूरी हो गया।

दोम अक़ूल नाक़िस्सा को इस से इतनी आजादी मिल गई कि कैल वकाल और बहस विमबाहिसा और तान वितशनीअ के दरवाजे खिल गए जिस की वजह से इल्म कलाम वगैरह की तहसील कठिन भी हो गई और एक सादा लौह और कम इल्म हक़ के मुतलाशी के लिए हक़ की तलाश का फ़ी दुश्वार और तवील हो गई,हक़ वस्वाब की मंज़िल तक पहुँचना हर किस विनाक्स का काम नहीं रहा था बल्कि राह में बातिल के फ़ित्ने,चूर दरवाजे और पर ख़तर वादियां पैदा हो गई थीं कि भटकने और लटने के इमकानात बहुत कवी हो गए थे।

देनियात में इस के शमूल ने जहीन वतबा उलमा-ए कराम को इस फन ने अपने दाम

तज़वीर में इस तरह लिया कि उन्हों ने अपनी वह सारी ज़हनी क़ुव्वतें जो दीन और इल्म दीन की मोतद ब ख़िदमत अंजाम दे सकती थीं इसी फन के इर्तिक़ा में सिर्फ़ करदें,उन लोगों ने बड़ी बड़ी किताबें लिख डालें और बिलआख़िर उन बुजुर्गों की फ़िक्र वनज़र का दायरा इसी फन तक महदूद हो कर रह गया जिस से जहां कौम का नुकसान हुआ वहीं ख़ुद उन हज़रात का भी कि उन तवानाइयों को ज़िक्र इलाही वफ़कर आयात ना मुतनाही और अहयाए सुन्नत में खर्च करके उखरवी फ़लाह के जो मदारिज वह हासिल करसकते थे नहीं कर पाए इस के बुर अक्स निरे कार ज़लालत (गुमरही के गड्ढे) में गर गए।

जिस फन में अल्लाह वरसौल पर ऐसी खुली चोटें की गई थीं जिसे मामूली इल्म वफ़हम का इंसान भी समझ सकता था,जब इस से शग़फ़ और दिल चस्पी ऐसे जबरदस्त उलमा को हो गई तो आप जानते हैं कि जिन उलूम वफ़नून में इस तरह का जारिहाना इक़दाम अल्लाह वरसौल ﷺ पर न था मगर वह दुनयवी वाख़िरवी मनफ़ातें अपने अंदर नहीं रखते थे जिन्हें उलूम गैर नाफ़ा कहा जाता है उन में किस क़द्र दिल चस्पी बढ़ गई होगी,जबकि जो कशिश इस में थी वह उन में भी थी,उन उलूम गैर नाफ़ा से जहां निरे नुक़्सानात हुए वहीं एक खुला हुआ नुकसान यह भी था कि उम्र अजीज़ का कीमती सरमाया इस में खर्च होता रहा जिस से यह लोग दीनी मनफ़ातों से महरूम हो गए।

हमें इस सिलसिले में बुजुर्गों की तहरीरी ख़िदमात से इंकार नहीं है मगर इस सिलसिले में हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू का अहम कारनामा जोदूसरों से मुमताज़ करता है वह यह है कि एक तो आप ने रद्द में ऐसा अनोखा अंदाज़ अपनाया कि जो सिर्फ़ उलमा ही की समझ का न था बल्कि अवाम भी ब आसानी इस की ज़लालतों और क़बाहतों से आगाह हो सकती थी,एक ऐसी माकूल तरदीद जो हर एक जेहन में उतरती चली जाए और हर शख्स यकीन करता चला जाए कि इल्म वाक़िल का दावा करने वाला सब से बड़ा इल्म वाक़िल से आरी यही गिरोह है।

दूसरे यह कि आप ने सिर्फ़ जुबानी या तहरीरी रद्द पर इकतिफ़ा न किया बल्कि बा कायदा इस के खिलाफ़ तहरीक चलाई,अफराद तैयार किए और ठीक इस के खिलाफ़ वह राह दिखाई कि जिस में क़ल्ब का इतमीनान,रूह का चेन,अक्ल का करार,ईमान की जिला,आमाल का जज्बा और फ़लाह दारेन का सामान था,हक़ वस्वाब पर मुश्तमिल निहायत साफ सुथरा,वसीअ वक्षादा और आसान विमुख़्तसर रास्ता और हर आम विख़ास के लिए ख़ुदा तक पहुँचने की अज़ीम शाहराह अता फ़रमाई।

इस तरीके से हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने कौम विमलत की जो अज़ीम ख़िदमत की है और दीनी विदुनेवी मनफ़ातों से जिस क़द्र मालामाल किया है उसे तहरीर करने के लिए अलाहदा तहरीर की ज़रूरत है,चंद इक़तिबासात तबरक्न ह्दय नाज़रीन हैं जिन में मंतिक़ वफ़लसफा की तरदीद,उलूम गैर नाफ़ा से बचने की तलक़ीन वित्ता केद है।

फलसफा की तरदीद:

अल्लाह तआला ने दुनिया में इंसान को मुख़तलिफ़ सिफ़ात वख़सुसीआत का हामिल पैदा फ़रमाया और हर एक को इस के मुनासिब औसाफ़ विकमालात अता फ़रमाए और मुख़तलिफ़ विमतफ़ावत अज़हान वाक़ोल अपनी हिक्मत बालग़ा से इनायत फ़रमाए मगर हर एक की अक्ल इस लायक नहीं कि अश्या का हसन वक़्बह और इस के खैर विश्र का इदराक कर सके,अच्छाई वबराई के मुख़तलिफ़ दर्जे और जिहतें हैं,दुनिया और आख़िरत में कौन सी चीज़ मनफ़ात का सबब है और कौन सी मुज़िरत का इस को कमा हुक्का पहचान लेना हर एक के बस की बात नहीं।

अल्लाह तआला ने अपने ग़ायत कर्म से हमारी दुनयवी और उखरवी भलाई और फ़लाह के लिए अनबीए कराम अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात को पैदा फ़रमाया,इस मुक़द्दस गिरोह ने खैर विश्र और हसन वक़्बह को हम पर ख़ू ब खूब वाज़िह फ़रमादिया,अगर यह हज़रात न होते तो हम सिर्फ़ कमालात ही से आरी न होते बल्कि ना मालूम हमारा ठिकाना जहनम की किस गहराई में होता,अगर अक्ल ही हमारी रहनुमाई के लिए काफ़ी होती तो उन बुजुर्गों की बिअसत की कोई

हाजित न होती।

इस मुक़द्दस जमात ने इंसानियत पर जो एहसानात फ़रमाए ज़बान वक्लम उन के बयान से क़ासिर हैं,उन्हों ने इंसानियत को शकूक शुबहात की पर ख़तर वादियों से निकाल कर अज़आन वायक़ान की अज़ीम शाहराह अता फ़रमादी,ज़िन्दगी गुजारने के ऐसे उसूल वुज़ूइबत अता फ़रमा दिए जो दुनयवी वाख़िरवी फ़लाह वकामरानी के ज़ामिन थे,अगर पूरी दुनिये इंसानियत सर जोड़ के बैठती और चाहती कि ऐसे कुछ भी उसूल बुज़ूर अक्ल मुतय्यन कर लें तो न कर पाती।

आप देखिए वही फलसफा जो अक्ल कल का दावेदार है इस की बरसहा बरस की काविश विमेहनत के बा वजूद भी सिवाए चंद अश्या के फसल विजन्स के और कुछ न बयान कर सिक्का,और जो बयान भी किया वह इतना नाक़िस कि अक्लमंदों को हँसी आती है,अक्ल के दावेदार बिलकुल अपने मुक़रर करदा उसूलों वज़ाबतों की वजह से अक्ल सलेम रखने वालों की नज़र में सब से बड़े अहमक़ साबित हो गए,मुझे इस वक़्त उन की हिमाक़तें और क़बाहतें और उन के उसूल वुज़ूइबत की कमज़ोरियां नहीं बयान करना है,जो उन्हें पढ़ना चाहे वह इमाम ग़ज़ाली क़ुद्दिस सिर्रहू की कुत्ता बें पढ़े और ख़ास कर इमाम अहले सुन्नत आलियाहज़रत फ़ाज़िल बरेलवी क़ुद्दिस सिर्रहू की अलकलम अलमलहम वगैरह देखे जिस से उन की अक्ल वखुर्द की रसाई का पूरा पूरा अंदाजा हो जाए गा।

इस वक़्त मुझे इस की थोडी सी का रकर्दगी और गुल अफ़्शानी बयान करनी है हक़ीक़त यह है कि तालीम वानक़ियाद की जो दौलत हज़रात अनबीए कराम अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात की बारगाहों से मिली थी इस का ज़वाल इसी के ज़रिया हुआ,इसी ने कैल वकाल और बहस विमबाहिसे के दरवाजे खोले,शकूक शुबहात के बाद समोम से अज़आन वीक़ीन के गुलशन को ख़िज़ां रसीदा किया,अहकाम शरा को अक्ल की कसौटी पर परखने का जेहन दिया,हर चीज़ में अक्ल को पैमाना बनाया,जो चीज़ नाक़िस अक्ल के दायरे में आई मान ली वर्ना इंकार

करदिया,अकलियत के बल बूते पर दीन के निहायत अहम उसूल विमबादियात का इंकार कर दिया हत्ता कि नुबुव्वत को गैर ज़रूरी करार दे दिया,ख़ुदा विंद क़ुद्दूस की शान में वह लगू और बे हौदा बातें बिकें कि सन कर एमानी बुनियादें लरज़ उठती हैं,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के रिसाले‘‘इस्बात अलनबूत’’ से पता चलता है कि उलमा-ए सौ को बिगाड़ने में सब से ज़्यादा दखल फलसफा ही को है।

अकबर के दौर में फ़नून में अगर कोई परवान चढ़ा है तो यही फलसफा है,हिंदोस्तान में इस की सब से ज़्यादा आबयारी अकबर की ज़ात से हुई यही वजह है कि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने मुतअद्दिद मक्तोबात में सैकड़ों उम्हात मिसाइल पर बहस फ़रमाई है,उन में बहुत दखल इसी बात को है कि इसी फलसफा कि वजह से दीन की बुनियादें हिलाई जा रही थीं,यही वजह है कि आप जगह जगह अक्ल का अदम इस्तिक़लाल और बिअसत अनबया कराम अलैहिम अस्सलाम के फ़वाइद बयान फ़रमाते हैं,और फलसफा से लोगों को आशना करते हैं,चंद इक़तिबासात मुलाहिजा फरमाएं:

(1)इस्लाम से टकराव ,नुबुव्वत की मुखालफत और दीगर अहम उमूर का इंकार बयान करते हुए फ़रमाते हैं:‘‘अजब मामला अस्त अक़ूल नाक़िस्सा फिलासफा गोया दर तरफ़ नक़ीज़ बतौर नुबुव्वत उफ़्तादा अस्त हम दर मुबदा हम दर मुआद वाहिकाम आंहा मुख़ालिफ़ अहकाम अंबिया अस्त अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात।’’(मक्तूब 23 जिल्द 3)

तर्जुमा: नाक़िस अक्ल रखने वाले फिलासफा का बड़ा अजीब हाल है कि गोया मुबदा और मुआद दोनों में वह नुबुव्वत की नक़ीज़ हैं। और उन के अहकाम हज़रात अंबियाए कराम अलैहम अस्सलवात वालतसलीमात के अहकाम के मुख़ालिफ़ हैं।

(2)उन के ईमान का यह हाल है:‘‘न ईमान बिल्लाह दुरुस्त करदा इंद,न ईमान ब आख़िरत,बक़दम आलम कायल इंद वहाल आंका इजमा मलयेन अस्त बुर हदूस आलम बजमीअ अजज़ा ख़ुद

वहम चुनें बांशक़ाक़ समावात वांतुशार क्वाकब वानदकाक जबाल वानफ़जार बहार कि बरोज़ कयामत मौऊद अस्त कायल नेस्तंद विमनकर हश्र अजसाद इंद वानकार नसोस क़ुरआनी मि नमाईंद।’’(ईजा)

तर्जुमा: अल्लाह तआला और आख़िरत पर उन का ईमान दुरुस्त नहीं है, उन का हाल यह है कि आलम को क़दीम कहते हैं, जब कि तमाम अहले मज़ाहिब का आलम और इस के तमाम अजज़ा के हादस होने पर इजमा है, इसी तरह यह लोग आसमान के ढह जाने, सितारों के झड़ जाने, पहाड़ों के रेज़ा रेज़ा हो जाने और समंदरों के आग बिन जाने के कायल नहीं हैं। जब कि कयामत के दिन ऐसा होने का खुदाई वादा है। इस तरह यह लोग जिस्मों के दुबारा उठाये जाने के मुनकर और क़ुरआनी नसोस का इंकार करते हैं।

(3)यह तो मुतक़द्दिमीन का हाल था उन के मताख़रीन जो इस्लामी कहलाते हैं उन का हाल यह है:

‘‘विमताख़रान आंहा कि दर ज़मुरा अहले इस्लाम ख़ुद रा दाखिल साख़ता इंद हमचनां बुर उसूल फ़लसफ़ी ख़ुद रासिख़ इंद वबक़दम समावात वक्वाकब वामिसाल अनहा कायल इंद वबादम फना वहलाक अनहा हाकिम,कुव्वत ईशां तक़ज़ीब नसोस क़ुरआनी अस्त वरज़्क़ शां इंकार जरूरीयात दीन अजब मोमिन इंद बख़ुदा वरसौल ईमान आरंद अम्मा आँचा ख़ुदा वरसौल अव फर्मौदा अस्त कबूल नदारणद सफ़ाहत अज़ीं निमी गुजर्द؎

फलसफा चों अक्सरश बाशद सफा पस कल आं

हम सफा बाशद कि हुक्म कल हुक्म अक्सर अस्त’’

(ईजा)

तर्जुमा: मताख़रीन फिलासफा जिन्हों ने अपने आप को अहले इस्लाम के ज़ुमरे में दाखिल माना है। यह लोग भी अपने उन्हें फ़लसफ़ी उसूलों पर क़ायम हैं और आसमानों और सितारों वगैरह के क़दीम होने की बात करते हैं। और कहते हैं कि यह फना नहीं हूँ गे,

नसोस क़ुरआनी की तक़ज़ीब और जरूरीयात दीन का इंकार उन का ओढ़ना बिछौना है, अजीब मोमिन हैं कि ख़ुदा व रसूल पर तो ईमान है, मगर उन के फर्मोदात को कबूल नहीं करते हैं, इस से बड़ी बे वक़ूफ़ी और किया होगी?؎

फलसफा की अक्सर चीजें जब बेवकूफी पर मबनी हैं तो फिर पूरे का पूरा फलसफा बेवकूफी होगा, इस लिए कि अक्सरपुर कल का हुक्म लगा दिया जाता है।

उनका र जरूरीया त दीन में यह फ़िर्क़ा ज़ाला यहाँ तक पहुँच गया कि:

‘‘ कि हक़ रा सुब्हानहू बे कार व मुअत्तल दानिस्ता इंद वग़ैर अज़ यक चीज़ वाँ हम ब एजाब न ब इख्तियार बाव तआला मुस्तफ़ीद निसाख़ता अक्ल फ़आल अज़ निज़द ख़ुद तराशीदा हवादिस रा अज़ ख़ालिक़ समावात वार्ज़ बाज़ दाश्ता बाव मंसूब मेदारिन्द वासर रा अज़ मूसिर हक़ीक़ी जल सुल्ताना मना नमूदा आं रा असर मनहूत ख़ुद मेदानंद।’’(ईजा)

तर्जुमा: यह लोग हक़ सुब्हानहू व तआला को बे कार और मुअत्तल जानते हैं, और सिर्फ़ एक चीज़ वह भी इख्तियारी नहीं, बल्कि ऐजाबी के अलावा ख़ुदा को किसी और चीज़ से मुक़य्यद नहीं करते हैं। अपनी जानिब से अक्ल फ़आल को गढ़ कर हवादिस को आसमान व जमीन के पैदा करने वाले की तरफ़ न मंसूब कर के इस अक्ल की तरफ़ मंसूब करते हैं और असर को मूसिर हक़ीक़ी से फेर कर इसी अक्ल की तरफ़ से जानते हैं।

उन के फलसफा का मुख़्तसर हाल तो यह है जो आप ने पढ़ा मंतिक़ जिस की तारीफ़ यह यों करते हैं‘‘वह आला कानूनय है जिस की रियायत जेहन को खता फ़ी अलफ़कर से बचाए’’ इस का हाल यह है:

‘‘एं जमाआ उम्र ख़ुदरा दर तालीम वित्ताल्लुम आलते कि आसिम अज़ ख़ताए फ़िक्री अस्त सिर्फ़ करदनद विद्रां बाब दिक्कतहा नमूदा इंद चों बमकसद इकसाए ज़ात वस्फ़ात वाफ़आल वाजिबी रसीदनद जल सुल्ताना दस्त विपाए ख़ुद रा गुम करदनद वालित आसमा रा अज़ दस्त दादा ख़बतहा ख़ुर्दनद विद्र तेह

ज़लालत मानदनद दर रंगे आंका शख़से सालहा आलात हर्ब रा तैयार साज़द विद्र वक़्त हर्ब दस्त विपाए ख़ुद रा गुम करदा बकार नबुरद,मर्दुम उलूम फ़लसफ़ी रा मत्सुक़ विमुंतज़िम दानंद वाज़ गलत वखता रा महफूज़ मि अंगारिंद।’’(ईजा)

तर्जुमा: इस गिरोह ने अपनी ज़िन्दगी को इस आला कानूनय की तालीम व ताल्लुम में कि जिस की रियायत (उन के नज़दीक) फ़िक्री गलतियों से बचाती है, खपा दिया और इस में बड़ी बारीकियां तलाशी हैं, जब उन लोगों ने ज़ात व सिफ़ात व अफ़आल वाजिबी जल सुल्ताना का क़सद किया तो उन के हाथ पीर फूल गए, ख़ताए फ़िक्री से महफूज़ रखने वाला आला (मंतिक़) बे कार साबित हुआ, लिहाज़ा खूब ठोकरें खायें और अंजाम कार सहराए ज़लालत में सरगर्दां ही रहे। बिलकुल इसी शख्स की तरह जो सालों से जंगी असलहे तैयार करे, मगर जिंग के वक़्त उन्हें चला न सके। लोग फ़लसफ़ियाना उलूम को मुंतज़िम जानते और गलती व खता से महफूज़ समझते हैं।

उन के उलूम वफ़नून जो बरसहा बरस की मेहनत विकाविश के बाद तैयार हुए उन का हाल यह है:

‘‘हज उलइस्लाम इमाम ग़ज़ाली दर रिसाला मुनक़ज़ मिन अलज़लाल मि फ़रमायंद की फिलासफा इल्म तिब्ब वाल्म नुजूम रा अज़ कुतुब अंबिया मा तक़दम अला नबीना वालैहिम अस्सलवात वालतसलीमात सरक़ा करदा इंद वख़वास अद्व्य वग़ैर आं रा कि अक्ल दर दरक आंहा क़ासिर अस्त अज़ सहफ़ वक्तब मंज़िला बानबया अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात इक़तिबास नमूदा,वाल्म तहजीब अख़लाक़ रा अज़ कुतुब सूफ़िया इलाहीह कि दर हर अस्र दर उम्मत हर पैग़म्बरे बूदा इंद अज़ बराए तरवेज अबातील ख़ुद सरक़ा करदा इंद पस एं सह इल्म मोतबर शान सरक़े गश्त।’’(ईजा)

तर्जुमा: हज उलइस्लाम इमाम ग़ज़ाली क़ुद्दिस सिर्रहू रिसाला ‘‘अलमनकद मिन अलज़लाल’’ में फ़रमाते हैं कि फिलासफा ने इल्म तिब्ब व नुजूम को साबिक़ीन अंबिया अला नबिया व अलैहम अलसलोत वालतसलैम की किताबों

से चुराया है, अद्व्य वगैरह के नुस्खों को कि जिन के इदराक से अक्ल क़ासिर है, उसे भी अनबीए कराम अलैहम अस्सलाम पर नाज़िल शुदा किताबों से अख़ज़ किया है, इसी तरह इल्म तहजीब व अख़लाक़ को ख़ुदा रसीदा सूफ़िया जो कि हर पैगम्बर के जमाने में रहे हैं, की किताबों से अपने बातिल मज़ख़रफ़ात को रिवाज देने और जोर फैलाने के लिए सरक़ा किया। लिहाज़ा मालूम हुआ कि फिलासफा के यह तीनों अहम उलूम सरक़ा किए हुए हैं।

इलाहयात में उन की रसाई का यह आलम है:

‘‘जाहिल तरिन मर्दुम दर ज़ात वस्फ़ात वाजिबी जल सुल्ताना अनहा इंद कि हक़ रा सुब्हानहू बेकार विमुअत्तल दानिस्ता इंद।’’(ईजा)

तर्जुमा: अल्लाह तआला जल शाना की ज़ात व सिफ़ात में सब से बड़े जाहिल यही फिलासफा हैं। इस लिए कि उन्हों ने हक़ सुब्हानहू व तआला को बे कार और मुअत्तल समझ रखा है।

उन जहालतों और हिमाक़तों के बाद उन के बारे में कुछ लोगों की अकीदत यह है:

‘‘अजब तर आंका जुमे एं सिफ़हा रा हुकमा मि नामंद वबहकमत मंसूब मि दारणद अक्सर अहकाम ईशां सीमा दर इलाहयात कि मक़सद असना अस्त काज़िबा इंदोमख़ालिफ़ किताब वसंत,इतलाक़ हुकमा बुर अनहा कि सरासर जहल मुरक्कब नसीब अस्त बकदाम ऐतबार नमूदा आयेद मगर बुर सबील तहकम वास्तुहज़ा गुफ़्ता शव्द व्या अज़ क़बील इतलाक़ बसीर बुर आमा शमुरदा आयेद।’’(ईजा)

तर्जुमा: ताजब है कि कुछ लोग उन बे वक़ूफ़ों को हुकमा कहते हैं और उन्हें हिक्मत से मंसूब करते हैं, उन के अक्सर अहकाम ख़ास कर इलाहयात जो कि सब से रोशन मक़सद है, इस में यह झूटे और किताब व सुन्नत के मुख़ालिफ़ हैं, ऐसे लोगों पर हुकमा का इतलाक़ सरासर जहल मुरक्कब है जो उन पर किसी तरह दुरुस्त नहीं। हां मगर दो सूरतों में उन्हें हुकमा किया जा सकता है। एक बतौर हँसी व मजाक और दूसरे जैसे कि अंधे को बीना कह दिया जाए।

कुछ सर फिरों ने तो अकीदत में इतना ग़ुलू कर दिया और यहाँ तक कह बैठे:

‘‘वबाज़े अज़ मर्दुम कि बालूम फ़लसफ़ी सरे दारणद वबतसवीलात फ़लसफ़ी मफ़तून इंद एं जमाआ रा हुकमा दानिस्ता अदील अनबया मि दानंद अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात बल्कि नज़दीक अस्त कि उलूम काज़िबा ईशां रा सादक़ा दानिस्ता बुर शराए अनबया तक़दीम मि दहिंद अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात इआज़िना अल्लाह सुब्हानहू मिन अलएतिक़ाद अलसु।’’(ईजा)

तर्जुमा: बाज़ लोग जो कि उलूम फलसफा के दिल दादा और फिलासफा की डींगों से मरऊब व मफ़तून हैं यह लोग तो हुकमा को अंबिया ए कराम अलैहम अस्सलाम के बराबर दर्जा देते हैं, बल्कि ऐसा लगता है कि उन के झूटे उलूम को सच जान कर अनबीए कराम अलैहम अस्सलाम की श्रीअतों पर फ़ौक़ियत दे दें गे। अल्लाह तआला हमें इस बुरे एतिक़ाद से अपनी पनाह में रखे।

यह फ़िर्क़ा ज़ाला ज़लालत विगमरही में इतना आगे बढ़ा कि अल्लाह तआला के अलावा और बहुत सी इश्याय मसला अक़ूल विंफ़ूस,ह्यूला वसूरत और जो कुछ आसमानों में है सब के क़दीम होने का कायल हो गया,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि इसी वजह से हज़रत इमाम ग़ज़ाली क़ुद्दिस सिर्रहू उन की तकफ़ीर के कायल हुए,बाज़ ज़लालतों में तो यह तमाम गुमराहों से भी आगे बढ़ गए,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं:

‘‘दो चीज़ दरें बेदौलतां अज़ जमी फ़र्क़ ज़लालत वबला हित बेशतर अस्त यके कुफ्र वानकार अस्त बाहकाम मंज़िला वानाद वादावत अस्त बाख़बार मुर्सला दोयम तरतीब मुक़द्दमात फ़ासदा अस्त वतलबीस दलायल विशवाहिद बातिला दर इस्बात मक़ासिद विमुतालिब वाह्य आं क़द्र ख़बत दर इस्बात मक़ासिद ख़ुद कि ईशां ख़ूर्दा इंद हेच सफ़ीहे न ख़ूर्दा,समावात वक्वाकब कि हिम्मा वक़्त बेकरार व सरगर्दानंद मदार कार रा बुर हरकात व औज़ा ईशां दाश्ता इंद वाज़ ख़ालिक़ समावात विमौज्द क्वाकब विमहर्रिक अनहा विमदबर अम्र ईशां चश्म पो शीदा इंद विदुर अज़ मामला दानिस्ता,ज़हे बे खुर्दान ज़हे

बे दौलतां।’’(मक्तूब 266 जिल्द1)

हैरत तो इस बात पर है कि उन सब हिमाक़तों और उलूम वफ़नून में इस रसाई और इस्बात वास्तुदलाल की उन कमज़ोरियों के बा वजूद उलमा-ए इस्लाम ने इस मंतिक़ वफ़लसफा को ऐसा मुँह लगा या कि बाद के जमाने में बस यही उलूम वफ़नून शुमार हो ने लगे,कुरआन वहदेस और उन से मुताल्लिक़ा उलूम वफ़नून की कोई गिनती ही न रही हत्ता कि हदीस वितफ़सीर के दर्स में शिरकत तलबा की नज़र में गैर ज़रूरी हो गई,जो मंतिक़ वफ़लसफा में महारत रखता है बस वही आला मदर्स है अगर चह उलूम मकसूदा से को ई ख़ास हिस्सा न रखता हो और यह जेहन आज का नहीं बल्कि बहुत प्राना है जबकि उन उलूम वफ़नून का हाल आप पढ़ चुके।

मक्तूब 266 जिल्द अव्वल में हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू उन की जहालतें और ज़लालतें बयान करते हुए यों फ़रमाते हैं:

‘‘सफ़िया तर अज़ ईशां आंका ईशां रा ज़ीरक दांद विसाहब फ़ितान्त अंगारद वाज़ उलूम मत्सुक़ विमुंतज़िम ईशां इल्म हिंदसा अस्त कि मा ला यानी महज़ अस्त विमा ला ताइल सिर्फ़,मुसावात ज़वायए सल्स मुसल्लस मर दो क़ायमा रा बचकार मि आयेद विष्कल उरूसी विमामोनी कि जानकाह ईशां अस्त बकदाम ग़रज मरबूत अस्त,इल्म तिब्ब वाल्म नुजूम वाल्म तहजीब अख़लाक़ ईशां बेहतरीन उलूम ईशां अस्त अज़ कुतुब अनबया मा तक़दम अला नबीना व अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात सरक़ा करदा तरवेज अबातील ख़ुद नमूदा इंद कमा सुरह ब अलामाम उलग़ज़ाली फ़ी अलमनकज़ मिन अलज़लाल।’’

आप क़ुद्दिस सिर्रहू यहाँ पर एक बड़ा प्यारा नुक्ता बयान फ़रमाते हैं कि अनबीए कराम अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात के मुतबईन विपैरोकार अगर इस्बात वास्तुदलाल में गलती भी करें तो कोई हर्ज नहीं इस लिए कि उन के काम का दार विमदार अनबीए कराम की तक़लीद पर है अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात अपने बुलंद मुतालिब के इस्बात पर दलायल वबराहीन बुर सबील तबरे पेश करते हैं वर्ना उन के लिए वही तक़लीद का फ़ी है,बख़िलाफ़ उन बे दौलतों के कि अपने

आप को तक़लीद से आजाद कर के दलायल के साथ इस्बात के दर पे हुए।

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के दौर में हिंदोस्तान में चूंकि लोग इस इल्म के दीवाने हुए जा रहे थे,आप जैसे दाना वबीना और दीन विमलत के वफ़ा दार से से भला यह कब बर्दाश्त हो सकता था कि अल्लाह वरसौल ﷺ की तालीमात से इस क़द्र रो गर्दानी हो और ऐसे इल्म की तरफ़ एतना वितवजा हो इसी लिए आप जहां तहरीरों के ज़रिया इस की क़बाहतें और शनाअतें बयान फ़रमाते हैं वहीं दौरान तदरीस भी,चनां चह इसी मक्तूब ग्रामी में फ़रमाते हैं:

‘‘दरें अय्याम फ़र्रज़िंदी मुहम्मद मासूम जवाहर शरह मवाकिफ़ रा तमाम कुर्द दर असनाए सबक अव क़बाहतिहाए एं बे खुर्दान बौज़ूह आमद वफ़ायदा हा बरां मित्रत्तिब शद।’’

तर्जुमा: मेरे फ़रज़न्द दलबंद मुहम्मद मासूम ने जवाहर शरह मवाकिफ़ को ख़त्म कर लिया है। उसे पढ़ाते वक़्त उन बे अक़्लों की क़बाहतें ज़ाहिर हुईं, इस के अलावा और भी बहुत सारे फायदे हुए।

यह चंद इक़तिबासात सुपुर्द कलम किए गए इस के अलावा मुतअद्दिद मक्तोबात क़ुदसी आयात में इस मर्द मुजाहिद ने इस की क़बाहतों और शनाअतों से आगाह फ़रमाया और हमेशा लोगों को लायानी उलूम के साथ मशगूलियत को मुज़िर बताया और हर इस इल्म से इजतिनाब की ताकीद की जिस के इस्लाम और अहले इस्लाम पर बुरे असरात मुरत्तिब हो सकते थे।

इस्लामी अहकाम में अज़आन वायक़ान की कैफ़ीयतों में या जिन में मस्रूफ़ियत दिल को ख़ुदावंद क़ुद्दूस से दौर कर सकती थी उन सब से बचाते रहे और ज़िन्दगी के इस सरमाया को हमेशा याद ख़ुदा और फ़िक्र आख़िरत में गुजारने की तंबीया फ़रमाते रहे,यह वह उलूम थे जिन का कम अज़कम अदना असर यह था कि उन से कोई दुनिया का फायदा मुताल्लिक़ था न आख़िरत का,इस के बुर खिलाफ़ नफ़्स में रऊनत वसर कशी और फिर इज्जत वजाह और इक़तिदार वगैरह की चाहत और फिर आपसी इख़तिलाफ़ात

और बाहमी तफ़सीक़ वितज़लील तक बात पहुँचती थी।

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू कभी आम रुजहान के ताबे न हुए बल्कि उन्हों ने हमेशा हर चीज़ को और हर इल्म वफ़न को कुरआन वसंत के दायरे में देखने की कोशिश की ,हक़ को हक़ कहना और बातिल को बातिल कहना आखिरी दम तक आप का वतीरा रहा,आप ने कौम विमलत की जिस हमदर्दी का सबूत पेश किया है हक़ीक़त यह है कि दुनिया कभी उन के एहसानात को चुका नहीं सकती है।