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Allama Afaque Ahmad Mujaddidiतजदीद अल्फ़ सानीविलायत सुग़रा और कुबरा में फ़र्क़

अध्याय 50 में से 57पृष्ठ 688–699

विलायत सुग़रा और कुबरा में फ़र्क़

जानना चाहिए कि जिस विलायत का ज़िक्र हुआ इस से मुराद विलायत ज़ुली है जिस की ताबीर विलायत सुग़रा से की जाती है और विलायत ओलिया है लेकिन विलायत अनबया जो कि ज़ुल से गुज़र चुकी है दीगर है इस जगह सिफ़ात बशरियत के बुरे मुताल्लिक़ात की नफ़ी मतलूब है न कि असलान सिफ़ात की और जब सिफ़ात के बुरे मुताल्लिक़ात की नफ़ी हासिल होगई विलायत अनबया अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात हासिल होगई, इस के बाद जो उरूज हासिल होगा कमालात नुबुव्वत से मुताल्लिक़ होगा।

इस बयान से मालूम होगया कि नुबुव्वत में असल विलायत से चारा नहीं क्योंकि विलायत इस के मुबादी विमुक़दमात से है ,लेकिन विलायत ज़ुली कमालात नुबुव्वत के वसूल में कुछ भी दरकार नहीं है बाज़ का इत्तफाक़ पड़ता है और बाज़ दूसरों को बिलकुल इस सेउबूर वाक़्य नहीं होता है फ़ाफ़हम।

और शक नहीं है कि असल सिफ़ात की नफ़ी दुश्वार है उन सिफ़ात के बुरे मुताल्लिक़ात की नफ़ी के ब निस्बतपुस कमालात नुबुव्वत का हुसूल आसान तर और क़रीब तर होगा कमालात विलायत के हुसूल की बनिस्बत और यही यसर वक्रब की निस्बत है हर इस अम्र में कि असल से वसूल रखता है उन उमूर की निस्बत जो कि असल से जुदा हैं , नहीं देखते हो कि कीमिया असल अमल मक्की सहूलत से मयस्सर है और क़रीब तर रास्ते से हासिल और जो शख्स इस असल से जुदा पड़ा है मेहनत में है और एक उम्र इस की तहसील में फना करता है और इस के बावजूद महरूमी इस के नकद वक़्त है और जोकुछ हाथ लगा है तमाम मेहनतों के बाद इस असल से मुशाबहत रखते हैं और कभी ऐसा होता है कि वह अर्जी शबाहत इस से ज़ाइल हो जाए और अपनी असल की तरफ़ पलट जाए और अय्यारी विमकारी की तरफ़ खींचेबख़िलाफ़ वासल असल के कि यह अमल की आसानी और राह की नज़दीकी की वजह सेयारी विमकारी के ख़ौफ़ से मामून है।

रियाज़ात विमुजाहिदात:

इस राह के सालकेन का एक गिरोह जो मशक्कत भरे रियाज़ात और सख्त मुजाहिदात के ज़रिया ज़लाल से किसी ज़ुल तक पहुँचा है इस ने गुमान करलिया है कि मतलूब तक वस्ल रियाज़ात शाक़ा और मुजाहिदात शदीदा से मरबूत है , यह लोग नहीं जानते हैं कि दूसरी राह इस राह से क़रीब तर है और नहाय अलनहाय तक पहुँचाने वाली है।

राह इज्तिबा और अनाबत:

और वह राह इज्तबा है जो कि महज़ फजल विक्रम से मरबूत है और जो राह उन लोगों ने इख्तियार की है वह राह अनाबत है जो कि मजा हदात से वाबस्ता है इस राह के वासल बहुत कम हैं और राह इज्तिबा के वासल जिम ग़फ़ीर हैं,हज़रात अंबियाए कराम अलैहिम अस्सलाम राह इज्तिबा से ग्ये हैं और उन के सहाब भी तबईत वोरासत से राह इज्तिबा से वासल हुए हैं ,अर्बाब इज्तिबा की रिया ज़तीं नेमत वसूल के शकर की अदाइगी की खातिर हैं।

सर्वरिकोनेन ﷺ ने इस शख्स के जवाब में फ़रमाया था जिस ने रियाज़ात शदीदा के बारे में पूछा था कि आप हर गुनाह से मासूम होते हुए इस क़द्र रियाज़ात क्यों फ़रमाते हैं? आप ﷺ ने फ़रमाया:"अफला इकोन अबदा शकूरा"(किया में शकर गुज़ार बंदा न बनों)फिर मुजद्दिद साहिब इसी मक्तूब में चंद स्तर बाद फ़रमाते हैं :

मक़ाम विलायत की गुल अफ़्शानियां:

एफ़रज़नद! मक़ाम विलायत में दुनिया वाख़िरत से हाथ धोना चाहिए और आख़िरत के साथ गिरफ्तारी दुनिया के साथ गिरफ्तारी के मसल समझना चाहिए और दर्द आख़िरत कुदर्द आख़िरत की तरह पसंद नहीं करना चाहिए,हज़रत इमाम दाऊद ताई फ़रमाते हैं "उन अरुदत्त अलसलाम सल्लम अला अलदन्या वान अरुदत्त अलकराम कब्बर अला इलआख़िरत"(अगर सलामती चाहते हो तो दुनिया को रुखसत करू और अगर करामत चाहते हो तो आख़िरत पर तकबीर कहू यानी उसे मुर्दा समझो और इस से ना उम्मीद रहो)

इसी गिरोह में से एक दूसरे आयत"मुनिकम मिन युरीद अलदन्या विमनकम मिन युरीद

इलआख़िरत"(तुम में के बाज़ दुनिया का रादा रखते हैं और तुम में के बाज़ आख़िरत का इरादा रखते हैं ) में शिकायत दोनों फ़रीक़ से है(यानी तालिब दुनिया से भी और तालिब आख़िरत से भी यानी दोनों की तलब बुरी है) उलग़र्ज़ फना कि हक़ जल वालाके मा सिवा को भूल जाने का नाम है दुनिया और आख़िरत दोनोन को शामिल है और फना वबका हर दो विलायत के अजज़ा हैं तो विलायत में आख़िरत के निस्यान से चारा नहीं।

और कमालात नुबुव्वत के मर्तबा में आख़िरत से लगाव विगिरफ़्तारी महमूद है और दर्द आख़िरत मर्जी विमकबूल बल्कि दर्द इस महल में दर्द आख़िरत है और गिरफ्तारी गिरफ्तारी आख़िरत है, आयत करीमा "यदावन रभम खुफ़ा वतमिआ"(अपने रब को पुकारते हैं डरते हुए और उम्मीद करते हुए) और आयत करीमा"वेख़्शून रभम वेखाफोन अज़ाबा"(और अपने रब सेडरते हैं और इस के अज़ाब से ख़ौफ़ ज़दा हैं) और आयत करीमा"अलज़ीन यख़्शून रभम बालग़ीब वहम मिन अलसा मुशफ़िक़ून"(जा अपने रब से ग़ायबाना डरते हैं और कयामत से तरसा हैं) उन मक़ाम वालों के लिए नकद वक़्त है उन का गर्ये वनाला अहवाल आख़िरत की याद से है और उन का निदोह वालिम अहवाल कयामत के ख़ौफ़ से है ,हमेशा कब्र के फ़ित्ने से पनाह चाहते हैं और शदाइद अज़ाब दोज़ख से पनाह ढूँढ़ते और ज़ारी करते हैं उन के नज़दीक दर्द हक़ जल वाला दर्द आख़िरत है और उन का शौक विमहबत आख़िरत का शौक विमहबत है, क्योंकि अगर लिक़ा है तो वह आख़िरत के साथ मौऊद है और अगर रज़ा है तो इस का कमाल भी आख़िरत के साथ मौक़ूफ़ है । दुनिया हक़ जल वाला की मबगौज़ है औरआख़िरत इस की मर्ज़ीया (पसंदीदा) मबगौज़ा को मर्ज़ीया के साथ किसी अमरमें बराबर नहीं बनाया जासकता है क्योंकि मबगौज़ा लायक आराज़ है और मर्ज़ीया लायक इकबाल ,मर्ज़ीया से आराज़ करना उएन सकर है और अल्लाह तआला के मौऊद विमर्जी के खिलाफ़, आयत करीमा"वाल्लाह यदाव अली दारेस्सलाम" इसी माना पर गवाह है।

हज़रत हक़ सुब्हानहू व तआला मुबालग़ा वित्ताकीद के साथ आख़िरत की तरग़ीब देता है तो आख़िरत से आराज़ करना दर हक़ीक़त हक़ जल वाला से मुआरिज़ा है और इस की मर्जी को ख़त्म करने में कोशिश करना है,इमाम दाऊद ताई इस बुज़ुर्गी के बावजूद चूंकि विलायत में क़दम रासिख़ रखते थे इस लिए तर्क आख़िरत को करामत कहा मगर नहीं जाना कि सहाबा कराम अलैहिम इलरिज़्वान सभी दर्द आख़िरत में मुबतला थे और अज़ाब आख़िरत से ख़ौफ़ ज़दा वलर्ज़ां।

एक रोज़ हज़रत फ़ारूक़ रज़ि अल्लाह अन्हु ऊंट पर सवार एक कूचा से गुजरे क़ारी ने इस आयत को पढ़ा"उन अज़ाब रबक लवाक़ा मा ला मिन दाफ़े" इस आयत को सन कर बेहोश होग्ये और ऊंट से बे ख़ुद जमीन पर गर पड़े,इस जगह से उठा कर लोग घर पर लाये और एक मुद्दत तक इस दर्द से बीमार रहे कि लोग इयादत को आते।

हां तवस्सुत अहवाल में मक़ाम फना में दुनिया वाख़िरत से निस्यान मयस्सर होता है और गिरफ्तारी आख़िरत को दुनिया की गिरफ्तारी की तरह जानते हैं लेकिन जब शरफ़ बका से मुशर्रफ़ होगए और काम अंजाम को पहुँचा और कमालात नुबुव्वत ने परतो डाला इस जगह सब दर्द आख़िरत है और दोज़ख से इस्तिआज़ा है और जन्नत की तमन्ना है ।

जन्नत के अश्जार,उन्हार और होर वग़लमां को दुनयवी इश्याय के साथ कोई मुनासबत नहीं बल्कि यह दोनों तरफ़ नक़ीज़ हैं गजब और रज़ा की नक़ाज़त की तरह,अश्जार वानहार और जो कुछ जन्नत में है आमाल सालहा के नताइज वसमरात हैं सरकार मदीना ﷺ ने फ़रमाया कि जन्नत दरख्त नहीं रखती है इस जगह दरख्त लगाव! पूछा कि किस तरह लगायें, फ़रमाया कि तस्बीहोतहमीद वितमजीद वितहलील के ज़रिया, यानी सुभान अल्लाह कहू ताकि जन्नत में एक दरख्त लगे ,पस जन्नत के दरकत तस्बीह का नतीजा हुए।कमालात तंजेही को जैसा कि इस कलिमा में हुरूफ़ वास्वात के लिबास में मुंदरज बनाया है जन्नत में उन कमालात को लिबास दरख्त में छिपाया है ,अली हज़ा उलक़यास जो कुछ जन्नत में है अमल सालिह का नतीजा है ,और जो कमालात वजूबी तालत

वित्तक़्दस्त सलाह कौली वामली के लिबास के ज़िमन में मुंदरज हुए हैं जन्नत में वह कमालात लजात वतनामात के पर्दे में ज़ुहूर फरमाएं गे तो ला मुहाला वह तलज़िज़ वतनाम पसंदीदा विमकबूल होगा और लक़ाऔर वसूल का वसीला होगा।

राबिया बे चारी अगर इस राज़ से आगाह होतीं तो जन्नत को जलाने की फ़िक्र नहीं करतें और जन्नत के साथ गिरफ्तारी को हक़ जल वाला की गिरफ्तारी का गैर नहीं जानतीं ,इस के बुर खिलाफ़ दुनयवी तलज़िज़ वतनाम कि जिस का मंशा ख़बस विशरारत है और इस का नतीजा आख़िरत में महरूमी ,इआज़नाइलिला सुब्हानहू मुँह यह तलज़िज़ अगर शरआ मुबाह है तो हिसाब दर पेश है ,अगर रहमत ख़ुदावंदी दस्तगीरी न फ़रमाए अफसोस सद अफसोस ,और अगर शरआ मुबाह नहीं है तो मौरिद वईद है "रबिना ज़ुल्मना इन्फ़िसना वान लिम तग़फरलना वितरहमना लिंकोंण मिन अलख़ासरीन" तो इस तलज़िज़ को इस तलज़िज़ से किया निस्बत होगी ,यह तलज़िज़ ज़हरक़ातल है और वह(उखरवी )तलबेज़तरयाक़ नाफ़े पस आ खरत किस दर्द या तो अवाम मोमिनीन का हिस्सा है या अख़स ख़वास का नसीब ख़वास इस दर्द से पर हेज़ करते हैं और करामत इस के खिलाफ़ में जा नते हैं؏

आं ईशानंद मिन चुनैनम या रब

मक्तूब 302 का बेशतर हिस्सा आप हज़रात के सामने है बात अगर चह काफ़ी तैल होगई मगर इस मुबारक मक्तूब के इक़तिबास से विलायत विनबूत का फ़र्क़ अच्छी तरह वाज़िह हो गया ,आप ब आसा नी समझ सकते हैं कि नुबुव्वत की बोली किया है और विलायत की बोली किया है,मक़ाम विलायत में औलियाए कराम जो कुछ फ़रमाते हैं इस वक़्त वह कण कैफ़ीयतों केसाथ होते हैं यह आप ने पढ़ लिया मगर आखिरी मंज़िल यह नहीं बल्कि आखिरी बोली वही है जो कुरआन वसंत में बोली गई है ,सही इल्म वही है जो उन मुबारक चीजों में बयान किया गया है ।

आप ब आसानी जान सकते हैं कि तजदीद अल्फ़ सानी की कितनी ज़रूरत थी ,नबी किस मक़ाम से बोलते हैं और वली कहां से इस को मुतय्यन करना माउष्मा के बस की बात न थी बल्कि इस

दानाए राह की ज़रूरत थी जो हर मंज़िल से आशना ,हर बोली से खबरदार और हर कैफियत से आगाह हो ,मुजद्दिद अल्फ़ सानी ने यह हक़ जिस तरह अदा किया वह अपनी मिसाल आप है।

एक ख़ास बात जेहन में रखने की है कि कुरआन वसंत के अहकाम वक़्वानीन सब के लिए आम हैं,उन की नसीहतें और इबरतें सब के लिए लायक अमल हैं, उन के मुखातिब सभी हैं किसी का कोई इमतियाज़ नहीं ,इस लिए अवाम में उन की कोई ख़ास अहमियत नहीं रही क्योंकि जिन उमूर में इमतियाज़ होता है उन की अहमियत ज़्यादा होती है ,औलियाए कराम की मख़सूस बोलियाँ हैं इस लिए उन की क़द्र वाज़मत काफ़ी होती है क्योंकि उन्हें लोग इसरार व रमूज़ समझते हैं ।

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू का एक कारनामा यह रहा कि मक़ाम नुबुव्वत के कमालात को जलवा गर करके और मआरिफ़ वहक़ायक़ का समंदर बहा कर लोगों को बताया कि नुबुव्वत वह बा अज़मत मक़ाम है कि विलायत इस से कोसों पीछे है ,वहाँ जो हक़ायक़ विमआरिफ़ और इसरार व रमूज़ जलवा गर होते हैं उन के मुक़ाबिल मक़ाम विलायत के इसरार वरमोज़ की वह हिसीत भी नहीं जो एक क़तरा को दरिया से होती है ,आप तजदीद के इसरार वरमोज़ में पढ़ें गे तो आप को मालूम हो जाए गा कि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू कमालात विलायत विनबूत को बालतफ़सील बयान करके कैसे कैसे हक़ायक़ विमआरिफ़ को मंसा शहूद पर जलवा गर किया है और अज़मत नुबुव्वत ही का नहीं बल्कि विलायत का भी किस क़द्र तोहफ़्ज़ फ़रमाया है।

बाज़ औलियाए कराम से इस मक़ाम में एक चौक और भी होजाति है ,मक्तूब 301 में कमालात नुबुव्वत के ज़िमन में फ़रमाते हैं:"औलिया की एक जमात ने मक़ाम विलायत में शरफ़ नुज़ूल से मुशर्रफ़ हुई है जो कमालात मक़ाम नुज़ूल से ताल्लुक रखते हैं उन्हें कमालात नुबुव्वत ख़याल करली है ,न ऐसा बल्कि यह नुज़ूल उन के उरूज की तरह दोनों विलायत से हैं वह दूसरा उरूज विन्ज़ूल है मक़ाम विकायत के उपर जो नुबुव्वत से ताल्लुक रखता

है और यह ख़ल्क़ की जानिब तवज्जो इस तवज्जो बुख़लक़ के मुग़ायर है जो कि नुबुव्वत के मुनासिब है और यह दावत इस दावत के गैर है कि कमालात नुबुव्वत से शुमार किया है, किया करें कि क़दम दायरा विलायत से बाहर नहीं रखा है अव र कमालात नुबुव्वत की हक़ीक़त को नहीं पाया है , नसफ़ विलायत को कि इस का जानिब उरूज है तमाम विलायत जान लिया है और इस का नसफ़ दीगर कि इस का जानिब नुज़ूल है नुबुव्वत का मक़ाम तसोर कर लिया है"।

चों आं कि दर संगे निहां अस्त

जमीन वासमान अव हमान अस्त

नुबुव्वत विलायत के मुताल्लिक़ कुछ मुबाहिस दीगर बहसूँ के ज़िमन और कुछ इसरार वरमोज़ में पढ़ें गे , हम बाज़ और लियाए कराम के अक़्वाल और हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के मसलक को बयान करके इस बहस को ख़त्म करना चाहते हैं , आप देखें कि कैसी कैसी बातें उन से सरज़द हुईं और ना अहलों ने उन से कैसे ना जा ज़ फायदे उठाये।

महवू अज़महलाल:

बाज़ मशाइख़ क़ुद्दिस अल्लाह अर्वाह्हम की इबारत में बाज़ मुक़ामात के बयान में महवू अज़महलाल का लफ़्ज़ वाक़्य हो गया था , उन की मुराद कुछ और थी ,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं इस से महव नज़री मुराद है न कि महव एनी यानी सालिक का तईन इस की नज़र सेमुरतफा हो जाता है , यह माना नहीं कि सालिक नफ़्स अलामर में महव हो जाता है कि यह इलहाद वजंदक़ा है , मगर बाज़ ना क़िस्सों ने उसे किया समझा हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की जुबानी सुनिये।

मक्तूब 294 में मुबादी तैनात बयान करते हुए फ़रमाते हैं:"इस राह के कुछ नाक़िसों ने अलफ़ाज़ मोहमा महव वाज़्महलाल एनी जाना है और ज़िंदक़ा तक पहुँचे हैं और उखरवी अज़ाब वस्वाब से इंकार किया है और ख़याल किया है कि जा तरह वहदत से कसरत में आये हैं दूसरी मर्तबा में इसी तौरसे वहदत में चले जा ईं गे और यह कसरत इस वहदत

में मुज़्महिल हो जाए गी और उन ज़िंदीक़ों से एक गिरोह ने महव होने को कयामत कुबरा ख़याल करलिया है औरहशर वंशर वहिसाब वस्रात विमेजान से इंकार किया है, ज़लवा फ़ाज़लवा कसीरामन एलिनास"

एक शख्स को इस जमात से देखा कि अपने मतलब को साबित करने के लिए मौलाना अब्द अलरहमान इलजामी क़ुद्दिस अल्लाह सिर्रहू के इस शेअर को शहादत में लाया

जामी मुआद विंबदा मा वहदत अस्त वबस

मा दरमियाना कसरत मौहूम वस्सलाम

नहीं जानते हैं कि इस शेअर से मौलाना की मुराद ब ऐतबार नज़र व शहूद वहदत की तरफ़ पलटना है अलावा एक ज़ात के उन का मशहूद नहीं रहता है और कसरतें मुकम्मल तौर से उन की नज़र से पोशीदा हो जाती हैं न कि उएन वजूदी रुजू(मुराद है) मगर अंधे हैं नहीं देखते हैं कि किसी कामिल से अजुज़ विन्क़्स वाहतियाज ज़ाइल हुआहे तो वहदत की तरफ़ रुजू वजूदी के किया माना हूँ गे ? और अग्रवादित की तरफ़ रुजोके बाद ख़याल किया है तो का फर ज़िंदीक़ हैं कि उखरवी अज़ाब से इंकार रखते हैं और अंबियाए कराम अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात उतमहा वाकमल्हा की दावत को बातिल करते हैं।

अज़ा तुम अलफ़क़र फहवाल्लाह:

बाज़ बुजुर्गों के इस जुमला से कुछ नाक़िसों ने इत्तिहाद समझ लिया , हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू मक्तूब 266 में अक़ाइद बयान करते हुए फ़रमाते हैं :"अल्लाह तआला किसी चीज़ से मुत्तहिद नहीं होता है और इसी तरह कोई चीज़ इस से मुत्तहिद नहीं होती है और वह जो बाज़ सूफ़िया की अबनारत से इत्तिहाद मफ़हूम होता है उन की मुराद के खिलाफ़ है क्योंकि उन की मुराद इस कला म से कि मोहम इत्तिहाद है "अज़ा तुम अलफ़क़र फहू अल्लाह" यह है कि जब फक्र तमाम होजाता है और नीस्ती महज़ हासिल होजाति है तो बाक़ी नहीं रहता मगर अल्लाह तआला ,न यह कि वह फ़क़ीर ख़ुदा से मुत्तहिद हो

जाता है और ख़ुदा होजाता है कि यह कुफ्र वजंदक़ा है तआला अल्लाह सुब्हानहू उम्मा यतोहम अलज़ालमोन अलवा कबीरा"।

हमारे हज़रत ख़्वाजा बाक़ी बाइल्ला क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि इबारत "अनुलहक़ "के माना यह नहीं कि में हक़ हूँ बल्कि माना यह हैं कि में नहीं हूँ और मौजूद हक़ है सुब्हानहू।

(3)बाज़ सूफ़िया ने यहाँ तक कह दिया कि अल्लाह तआला इस्माई वस्फ़ाती कमालात के ज़ुहूर में हमारा मुहताज है नऊज़ बिल्लाह हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू मक्तूब मज़कूर में फ़रमाते हैं:" अल्लाह तआला ग़नी मुतअल्लिक़ है ज़ात में भी और सिफ़ात में भी और अफ़आल में भी और किसी अम्र में किसी चीज़ का मुहताज नहीं है जिस तरह वजूद में मुहताज नहीं है ,ज़ुहूर में मुहताज नहीं है और वह जो बाज़ सूफ़िया की इबारत से मफ़हूम होता है कि अल्लाह तआला कमालात इस्माई वस्फ़ाती के ज़ुहूर में हमारा मुहताज है यह बात इस फ़क़ीर पर बहुत ग्रां है।"

(यह फ़क़ीर) जानता है कि ख़ल्क़ की पैदाइश से मकसूद ख़ल्क़ को कमालात का हुसूल है न कि ऐसा कमाल कि इस पाक बारगाह की तरफ़ आइद हो,आयत करीमा:

विमा ख़लक़त अल्जन वालांस उला लेबुदून

इसी माना की ताईद करती है , पस जिन वाँस की पैदाइश से मकसूद मार्फत का हुसूल है जो कि उन का कमाल है ,न कि ऐसा अम्र जो कि बारगाह हक़ सुब्हानहू की तरफ़ राजा हो , और वह जो हदीस क़ुदसी में वाक़्य हुआ है "फ़ख़लक़त अलख़लक लाउर्फ़"

इस जगह भी मख़लूक़ की मार्फत मुराद है न यह कि में मारूफ़ होजाओं और उन की मार्फत के वास्ता से कमाल हासिल करूँ । तआला अल्लाह अन ज़ालिक अलवा कबीरा

(4)बाज़ हज़रात इश्याय को इब्तिदा बग़ैर तवस्सुत असबाब अल्लाह तआला की तरफ़ मंसूब करते हैं और रफा असबाब में भी कमाल समझते हैं हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू मक्तूब मज़कूर में फ़रमाते हैं:"जानना चाहिए कि सारी मुम्किनात किया जवाहर किया आराज़ और किया अजसाम और किया

अक़ूल और किया नफ़ूस किया अफ़्लाक और किया अनासिर सब कादर मुख्तार के एमा की तरफ़ मुस्तनद हैं कि अदम के पर्दे से उन को वजूद में लाया है और जिस तरह यह वजूद में अल्लाह तआला के मुहताज हैं बका में भी अल्लाह सुब्हानहू की मुहताज हैं, असबाब वोसाइत के वजूद को अपने फेअल का रुपोश बनाया है और हिक्मत को कुदरत के पर्दे बनाए , बल्कि असबाब को अपने सबूत फेअल के दलायल किया और हिक्मत को वजूद कुदरत का वसीला फ़रमाया क्योंकि अर्बाब फ़ितान्त (होशियारी विदानाई) कि जिन की बातिनी आंखें अनबया अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात की मुताबेत के सुरमा से आरास्ता हैं जानते हैं कि असबाब वसाइल कि वजूद वबका में अल्लाह तआला के मुहताज हैं और इसी से सबूत वकियाम रखते हैं और इसी से रखते हैं और दर हक़ीक़त जमाद महज़ हैं क्योंकि दूसरे में कि (वह दूसरे) उन्हें के मसल हैं तासीर करें गे और उन का अहदास वाख़तिरा (यानी अदम से वजूद में लाना ) करें गे , एक कादर है उन के वरा जो कि उन्हें ईजाद करता है और उन के लायक कमाल अता करता है कि जिस तरह अकला इस फेअल को जमाद महज़ से देखते हैं , इस जगह से सुराग लगा लेते हैं इस के फ़ाइल विमहर्रिक का क्योंकि वह जानते हैं कि यह फेअल जमाद महज़ के सज़ावार नहीं है,ल एक फ़ाइल है उन के वरा कि इस की ईजाद फरमाता है , तो फेअल जमाद अकला के नज़दीक फ़ाइल हक़ीक़ी के फेअल का पर्दा नहीं हुआ बल्कि वह फेअल इस की जमादेत की तरफ़ नज़र करते हुए फ़ाइल हक़ीक़ी पर दलील हुआ फ़िक़ज़ा हाज़ा।"

हां कम अक्ल की नज़र में फेअल जमाद फ़ाइल हक़ीक़ी के फेअल का रुपोश है कि कमाल गुबावत(कंद ज़हनी) की वजह से जमाद महज़ को इस फेअल की वजह से साहिब कुदरत जान लिया है और फ़ाइल हक़ीक़ी से काफ़िर हो गया है

युज़िल ब कसीरा वेहदी ब कसीरा

यह मार्फत मुश्का नुबुव्वत से ली गई है हरहुख्स की समझ इस जगह तक नहीं पहुँचती है ,

सूफ़िया का एक गिरोह रफा असबाब में कमाल जानता है और इब्तिदा इश्याय को असबाब के तवस्सुत के बग़ैर हज़रत हक़ सुब्हानहू से वाबस्ता करता है , नहीं जानते हैं कि रफा असबाब में हिक्मत का रफा है कि इस हिक्मत के ज़िमन में कितनी हिकमतें मलहूज़ हैं

रबिना मा ख़लक़त हाज़ा बातिला (तफ़सील के लिए मक्तूब 266 देखें)