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Allama Afaque Ahmad Mujaddidiतजदीद अल्फ़ सानीअफराद की अहमियत

अध्याय 35 में से 57पृष्ठ 476–489

अफराद की अहमियत

एक दाई हक़ जो काम अच्छे अफराद के ज़रिया कर सकता है वह किसी दूसरे तरीके से नहीं कर सकता है,उन अफराद के ज़रिया ही हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने अपने ज़ाहिरी वबातिनी औसाफ़ दूसरों तक पहुँचाए, लाखों किताबें जो नहीं कर सकती हैं वह चंद अच्छे अफराद कर गुजरते हैं क्योंकि मौका विमहल के ऐतबार से ज़बान विबयान की ख़ुसुसीआत को यही अच्छी तरह मलहूज़ रख पाते हैं,तबलीग़ विदावत में एक अहम कारनामा यह है कि दाई अपनी बात को सामईन के जेहन में अच्छी तरह उतारदे और साबित करदे कि हक़ीक़त पर मबनी यही बात है और इस के अंदर इस को कबूल करने का जज्बा बेदार करदे,किस मक़ाम पर हमें अपनी बात किस अंदाज़ में करनी है,किस चीज़ से सामे का जेहन मुतास्सिर हो सकता है यह अच्छा मबलग़ ही कर सकता है।

मक्तोबात:

तीसरी चीज़ जिस ने हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के तजदीदी काम में बड़ी मदद की है वह आप के मक्तोबात हैं,उन से चंद फायदे हासिल हुए एक तो आप के कमालात को बका हासिल हुई हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू किस तसव्वुफ़ के हामिल थे,शरीअत वतरीक़त को आप ने किस तरह एक किया,हक़ायक़ विकमालात इसरार विमआरिफ़ में आप की किया मंज़िल थी वगैरह वगैरह आज यह चीजें सिर्फ़ मक्तोबात ही के ज़रिया जानी जा सकती हैं आप की अज़ीम शख्सियत के बहुत खद वख़ाल इसी के ज़रिया मालूम किए जासकते हैं वर्ना अब वह अफराद कहां जिन के बातिन आप के कमालात के अमीन हूँ और जिन के ज़ाहिर में आप का अक्स नज़र आये।

दूसरा फायदा यह हुआ कि जो लोग बुला वास्ता या बालवासता आप के हलक़ा इरादत में दाखिल न थे उन तक आप की ज़ाहिरी व बातिनी और इस्लाही कोशिशें उन्हें मक्तोबात के ज़रिया पहुँचीं और उन की हिदायत विरहनुमाई का सबब बनें,उन मक्तोबात के ज़रिया यह काम बहुत हुआ चंद मिसालें आप पढ़ चुके हैं।

हर तबका के लोगों को जो इल्मी फ़वाइद पहुँचे ,पहुँच रहे हैं और आइंदा पहुँचीं गे वह बयान नहीं किए जा सकते हैं,हर दौर के लोगों के लिए उन में हिदायत विरहनुमाई का तसल्ली बख्श और काबिल इतमीनान सामान मौजूद है,मक्तोबात का रंग आम कुत्ता बों की तरह नहीं है,जिन मिसाइल को आप बयान फ़रमाते हैं सुनने वाले को तसल्ली वितशफ़ी होती चली जाती है वह उन में अपनी रूहानी तस्कीन का सामान मौजूद पाता है।

तीसरा फायदा यह भी हुआ कि अस्नए सुलूक में आप जिन मंजिलों और मरहलों से गुजरते जाते थे उन मनाज़िल विमराहिल में जो ताजे दम कमालात वानायात ख़ुदावंदी हासिल होती थीं वह उन्हें मक्तोबात के ज़रिया ख़ुलफ़ा और दीगर हज़रात तक पहुँचती रहती थीं कभी ऐसा भी हुआ है कि आज कोई चीज़ मक्षुफ़ हुई और कुछ दिनों तक वह कैफियत बरकरार रही जो लोग इस वक़्त मौजूद थे उन्हों ने इस को आखिरी बात और मंज़िल तसोर कर लिया फिर कुछ दिनों के बाद दीगर मुक़ामात वुमनाज़िल मक्षुफ़ हुए,नयी कैफियात वहालात ने रुख दिखाया तो उन्हें के ज़रिया वह नयी नयी तहक़ीक़ात और कैफियात उन अफराद तक पहुंचतीं जो उन से क़ब्ल जा चुके थे,इसी लिए आप देखें गे कि जमाने के गुजरने के साथ साथ मक्तोबात में बयान शुदा कमालात का रंग बदलता रहा,तहक़ीक़ात बदलती रहीं,नये नये मुक़ामात वुमनाज़िल लोगों के सामने आते रहे और लोग हसब इस्तिदाद कशां कशां मंज़िल की तरफ़ रवाँ दवां रहे और रफ़्ता रफ़्ता हक़ायक़ विमआरिफ़ के हामिल बनते चले गए।

यह चंद निहायत अहम और आम फ़वाइद में ने बयान कर दिए अब में अहम मिसाइल पर आप की तहरीरी ख़िदमात सुपुर्द कलम करता हूँ,आप अंदाजा करें गे कि आप कितने पर कशिश अंदाज़ में अपनी बात कहते हैं,आप ने अक़ाइद वामाल के सिलसिले में उन तमाम मिसाइल पर कलम उठाया है जिन में अहले बिद्दत अहले हक़ की मुखालफत कर रहे थे,आप हक़ को माकूल अंदाज़ में बयान फ़रमाते हैं और इस के मका बल में बातिल की तरदीद भी खूब फ़रमाते जाते हैं हर चीज़ का मक़ाम विमहल भी खूब मुतय्यन फ़रमाते हैं।

आप का तरीका यह नहीं था कि बाँसुरी को ख़त्म करने के लिए दुनिया से बांस के जंगल ख़त्म कर दिए जाएँ आप जहां उलमा-ए सौ की मुज़म्मत करते हैं वहीं उलमा-ए हक़ की अहमियत वाफ़ादीयत और उन के फ़ज़ाइल वुमनाक़िब भी बयान फ़रमाते हैं,जहां आप तसव्वुफ़ की ख़ामियों और कोताहियों की निशानदेही फ़रमाते हैं वहीं तसव्वुफ़ की तलक़ीन और ताकीद भी फ़रमाते हैं,इस की तहसील पर जोर भी देते हैं,मिसाइल पर उन की अहमियत की हैसियत से बहस फ़रमाते हैं,कहीं कम कहीं ज़्यादा कहीं बहुत ज़्यादा गुफ़्तगू फ़रमाते हैं,कहीं इजमाल तो फिर इस की तफ़सील भी है।

फिर कुछ मक्तोबात वह हैं जो अपने पीर बुज़ुर्गवार क़ुद्दिस सिर्रहू की बारगा ह में लिखे,शुरू के बेस मक्तोबात हज़रत ख़्वाजा बाक़ी बिल्लाह क़ुद्दिस सिर्रहू के नाम हैं जिन में आप ने असनाए सुलूक में वारद होने वाले हालात और कैफियात बयान की हैं,कुछ अहबाब विमख़लिसीन की तरक़्क़ीयात,कुछ सिफ़ारिशात और कुछ मिसाइल की तहक़ीक़ पर मुश्तमिल हैं।

कुछ मक्तोबात शरीफ़ वह हैं जो उमरा के नाम तहरीर किए गए हैं उन में ज़्यादा तर इस्लाम की ज़बूँ हाली और ज़ोफ़ वनातवानी,कुफ़्फ़ार का इस्लाम और अहले इस्लाम पर सितम,अहकाम कुफ्र का बरमला इज़हार,ग़रज़कि जो कुछ हो रहा था,हुकूमत की तरफ़ से जो सितम ढाए जा रहे थे उन को ज़िक्र फ़रमाते हैं,फिर उन्हें इस्लाम की ग़ैरत याद दिलाते हैं और उभारते

हैं,उन्हें ख़िदमत इस्लाम काजज्बा दिलाते हैं,अक़ाइद भी बयान फ़रमाते जाते हैं ग़रज़कि उन तमाम ख़तरात को ज़िक्र फ़रमाते हैं जिन का अंदेशा था और उन्हें नसीहत भी फ़रमाते जाते हैं।

चंद मक्तोबात के इक़तिबासात पेश ख़िदमत हैं आप देखें कि इस मुजाहिद ने उमरा वोहदेदारान की ख़ुद इसलाह भी फ़रमाई और उन्हें ख़िदमत इस्लाम पर आमादा करके हुकूमत का रुख रफ़्ता रफ़्ता इस्लाम की तरफ़ करदिया और तमाम अरकान सल्तनत को किस क़द्र अपना गर्वीदा बना लिया था कि सब की लगाम आप के हाथ में थी,ख़याल रहे कि उमरा से आप को दो अहम काम लेने थे एक तो अकबर की दीनी इख़तिराआत और बे एतिदालियां जो इस ने अपनाई थीं जिन की क़दरे तफ़सील आप पढ़ चुके हैं (का खातमा), दूसरे हुकूमत के अहम मंसबों पर शीयों के फ़ाइज़ हो जाने से अहले सुन्नत विजमाअत को जो ख़तरात दर पेश थे यह खतरा जहांगीर के दौर में सब से ज़्यादा था,इसी लिए जो मक्तोबात आप ने उमरा वाराकीन के नाम तहरीर फ़रमाए हैं उन में शीयों की तरदीद और मजहब हक़ अहले सुन्नत विजमाअत के अक़ाइद वामाल की तरग़ीब भी है।

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के मक्तोबात क़ुदसी के बा रे में अला मुह नूर बख्श तोकली फ़रमाते हैं:

ख़ुलफ़ा के अलावा हज़रत के मक्तोबात के ज़रिया से तबलीग़ व इशाअत ज़ुहूर में आई। मक्तोबात की पहली जिल्द 1025ह में तमाम हुई जिसे हज़रत के ख़लीफ़ा ख़ास शैख़ यार मुहम्मद जदीद तालिक़ानी ने जमा किया था। लोगों ने इस की नकलें हासिल कीं और ईरान तौरइन, बदख़शां, मावरा अलनहर में शाय हुई और इस का बहुत अच्छा असर पड़ा। चनां चह तजदीद के बाईसवीं साल एक दरवेश बिलख से हिंदोस्तान आया, इस की वसातत वहाँ के अकाबिर ने मसलन मशाइख़ में से स्यादत पनाह सेदमेरिक शाह और शैख़ अलमशाइख़ कब्रवी, मीर मुहम्मद और फिर मोमिन

बिल्ख़ी ने और उलमा में से मौलाना उबानी हसन क़तादानी और मौलाना नौलक ने दरख़ास्तें भेज कर ग़ायबाना बीअत की। (तज़किरा)

हज़रत ख़्वाजा की नवा ज़िशात:

तजदीदी का म में मुआविन अफराद जिस कसरत से आप को हा थ आये इस सिलसिले में हज़रत ख़्वाजा मुहम्मद बा क़ि बा लिल्लाह क़ुद्दिस सिर्रहू की इनायात व नवाज़िशात को भी बहुत दखल है,हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू का हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के ताल्लुक से जो अमल आप ने पहले पढ़ा है।

अगर ग़ायर नज़र से देखा जाए तो हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू ने जो कुछ हज़रत मुजद्दिद के बारे में फ़रमाया और जिस अंदाज़ से पेश आये वह बड़ी हिक्मत पर मबनी था। फिर अपने तमाम इरादत मंदों को दो चार को मुस्तसना कर केआप के हवाले कर दिया और सब की तकमील आप के सुपुर्द कर दी। हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू के इस अमल से हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू को कई फायदे हासिल हुए; एक तो यह कि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के ज़रिया जिन कमालात की तजदीद होने वाली थी और जो मआरिफ़ खासा वजूद में आने वाले थे वह ऐसे थे कि हो सकता था कि ख़ुद आप के पीर भाई और दीगर हम अस्र लोग उन के इदराक से क़ासिर रहते और इंकार व रद्द से काम लेते, मगर हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू ने जो मनाक़िब अपने इस मुरीद के फ़रमाए और जिस तवाज़ा का उन के सामने इज़हार फ़रमाया उन के इंकार पर जो ज़ज्र व तौबेख़ फ़रमाई वह ऐसी थी कि हज़रत ख़्वाजा के हर मोतक़िद के लिए हज़रत मुजद्दिद का एक तआरुफ़ साबित हुआ और बजाए इंकार के हर एक हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की तरफ़ इस तरह अपनी तकमील के लिए दौड़ा जैसे हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू की तरफ़ जा रहा हो और पीर भाई हो कर भी हज़रत मुजद्दिद की उन अज़्मतों के कायल हो गए जो एक मुरीद अपने पीर का होता है। इस तरह पीर भाइयों को भी जदीद कमालात

से फ़ैज़याब होने का मौका मिल गया।

दूसरे हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू को भी काफ़ी अफराद एक साथ हाथ आगये और नये लोगों को भी हज़रत मुजद्दिद की बारगाह में कामयाबी की यक़ीनी मंज़िल नज़र आगई। अब हर एक दौड़ा चला आरहा था और इस तमाम हलक़े में आप अपने तमाम खद व ख़ाल के साथ इसी अज़मत से मशहूर व मुतआरिफ़ हो गए जो हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू का था।

अब तीन चीजें जमा हो गई थीं; एक ख़ुद आप बड़े बाप के बेटे थे जो मैदान तदरीस के जबरदस्त शहसवार होने के साथ साथ साहिब हाल व निस्बत सोफी भी थे और उलमा व सुलहा के माबैन एक मख़सूस मक़ाम के हामिल और मर्जा थे। मुख़तलिफ़ सलासल के बड़े बड़े औलीए कराम से गहरा ताल्लुक और मुख़तलिफ़ दयार में शहरत के मालिक इंसान थे।

दूसरे अपनी बुलंद इस्तिदाद और फ़िक्री सलाहीयत की वजह से उलूम माकूल व मनक़ूल में दर्जा इमामत व इजतिहाद पर ख़ुद आप का फ़ाइज़ होना हरफन को इस के बड़े उस्ताज़ से हासिल फरमाना था। हर उस्ताज़ के हलक़ा तिलमिज़ में मुमताज़ मंज़िल के हामिल थे। उलमा-ए मशहूर में आप का किया वक़ार था यह आप पढ़ चुके।

तीसरे हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू के तारीफ़ी कलिमात और ग़ायत एहतिराम व इकराम जिस ने आप की बातिनी अज़्मतों को बहुत जिल्द मुतआरिफ़ करा दिया।

दूसरा फायदा हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू के तर्ज़ अमल से यह भी हुआ कि जो उमरा हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू के हलक़ा इरादत व अकीदत में दाखिल हुए और उन के मिजाज में इस्लामी हमीयत व ग़ैरत की चिंगारी पैदा हुई थी हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू उसे शोला बना दिया और अपनी आला दिमागी से उन से खूब काम लिया और उन की सलाहीयतों को खूब खूब बेदार कर दिया।

हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू की ज़ात से जो लगाव और अकीदत का ताल्लुक पैदा हुआ था वह हज़रत मुजद्दिद के साथ बढ़ता ही चला गया और आप ने पूरा पूरा उन उमरा की कुव्वत व मन्सब से फायदा हासिल किया। अगर यही वजूहात न रही होतीं तो इतनी तेजी के साथ मैदान में कूदने का मुअम्मा समझ में न आता जिस तेजी के साथ हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू के विसाल के बाद तजदीदी मैदान में कूदे हैं।

उलग़र्ज़ पौदा हज़रत ख़्वाजा ने लगाया, परवान हज़रत मुजद्दिद ने चढ़ाया, ख़िश्त अव्वल हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू ने रखी, तकमील व तामीर सब कुछ हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने फ़रमाई।

मुनज़्ज़म तबलीग़:

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने (1)तदरीस, (2)बीअत वारादत और (3)मक्तोबात क़ुदसी के तीन निहायत कामयाब तरीकयापनाए इस तरह आप मुकम्मल तौर पर तैयार हो गए और अफराद सालिह का एक अज़ीम गिरोह तैयार कर लिया अब आप ने मुनज़्ज़म तौर पर मैदान में क़दम रख दिया और मुख़तलिफ़ मुमालिक और हिंदोस्तान के मुख़तलिफ़ मुक़ामात पर अपने तैयार शुदा अफराद को भेजना शुरू किया ,मौलाना नूर बख्श तोकली फ़रमाते हैं:

‘‘हज़रत शैख़ ने सत्रह बरस की उम्र में उलूम ज़ाहिरी से फ़ारिग़ हो कर दर्स वितदरीस और तसनीफ़ वर्साइल के ज़रिया से तबलीग़ का काम शुरू कर दिया था बाद अज़ां हज़रत ख़्वाजा बाक़ी बिल्लाह क़ुद्दिस सिर्रहू से इजाजत इरशाद पा कर तलक़ीन तलाब में मशगूल हो गए और हसब इशारा पीर बुज़ुर्गवार लाहौर में इशाअत तरीका फ़रमा रहे थे कि हज़रत ख़्वाजा ने वफ़ात पाई उन के विसाल के बाद उन के मस्तर्षदीन ने आप से तजदीद बीअत कर के इस्तिफ़ादा बातिनी जारी रखा,आप के कमालात आलीया की बरकत और अनिवार सोहबत के फ़ैज़ से सिलसिला नक़्शबंदिया हिंदोस्तान में दौर दौर शाय हो गया।

इस के बाद सिलसिला आलीया मुजद्दिदय हिंदोस्तान से बाहर दीगर मुमालिक में फैलाने लगा चनां चह तजदीद क्यूमियत के छुटे साल शैख़ ताहिर बदखुशी,शैख़ अहमद बरकी,ख़्वाजा यूसुफ बरकी,शैख़ हसन बरकी,मौलाना यार मुहम्मद क़दीम तालिक़ानी,मौलाना सालिह गोलामी,शैख़ अबदुलहक़ शादमानी अपने शहरों से दौर दराज़ सफर तै करके सर हिंद शरीफ़ में हाजिर हुए और सिलसिला आलीया मुजद्दिदय में दाखिल हुए,यह सब खिलाफत से सरफ़राज़ हो कर ज़रिया इशाअत तरीका बने।

तजदीद के बारहवीं साल बहुत से जिन भी हज़रत के सिलसिला में दाखिल हुए,चनां चह जनों का बादशाह मा लश्कर आप का मुरीद हो गया,तजदीद के चौदहवीं साल हज़रत ने अपने ख़लीफ़े बग़रज़ हिदायत ख़ल्क़ दुनिया के अतराफ़ में रवाना किए,चनां चह सत्र अहले इरादत बसर कर्दगी मौलाना यार मुहम्मद क़दीम तालिक़ानी मुल्क तुर्किस्तान वक्बचान को भेजे और चालीस इरादत मंद यमन शाम वरूम की तरफ़ बसरकर्दगी मौलाना फ़र्ख़ हसीन रवाना फ़रमाए और अपने दस मोतबर यार मौलाना सादिक काबुली के तहत में का शग़र की तरफ़ रवाना किए और तीन बड़े बड़े ख़लीफ़ों को बसरकर्दगी मौलाना शैख़ अहमद बरकी तौरइन बदख़शां और खुरासान की तरफ़ रुखसत किया उन ख़ुलफ़ा की हर जगह बड़ी इज्जत हुई और उन मुल्कों के छोटे बड़े वजीर बल्कि बादशाह तक हज़रत के ख़ुलफ़ा के मुरीद बिन ग्ये,खुरासान,बदख़शां और तौरइन में तोतरीक़ा आलीया अहमदिया का इस क़द्र रिवाज हुआ कि वहाँ का कोई शहर या कस्बा ऐसा न था जहां इस सिलसिला के ख़ुलफ़ा न हूँ,यहाँ तक कि अबदुल्लाह ख़ाँ उज़बक जो वहाँ का बादशाह था हज़रत का ऐसा मोतक़िद हो गया कि कोई काम आप के ख़ुलफ़ा के मशविरे के बग़ैर न करता’’

हिंदोस्तान और बैरून हिंद आप के ख़ुलफ़ा ने आप के मिशन को जिस मुनज़्ज़म अंदाज़ में आगे बढ़ाया और जिस तेजी के साथ पूरे आलम पर हावी हो ग्ये और को ई ख़ित्ता ऐसा नहीं छोड़ा जिस को नूर सुन्नत से जगमगा न दिया,इस की झलक आप देखना चाहते हैं तो हमारी तालीफ़‘‘तज़किरा मशाइख़ बाकिया मुजद्दिदय’’ का मुताला फरमाएं जिस में सिर्फ़ अपने शिजरा

तरीक़त के ऐतबार से अपने रूहानी आबा और उन के फ़र्रज़िंदों वख़ल्फा की ख़िदमात का जायजा लिया गया है जिस से आप को सही से अंदाजा हो जाए गा कि अहया वितजदीद का काम कितने मुनज़्ज़म,सलीके और कसरत से हुआ है,हम यहाँ बंज़र इख़तिसार सिर्फ़ आप के जानशीन हज़रत ख़्वाजा मुहम्मद मासूम और चंद ख़ुलफ़ा की ख़िदमात का मुख़्तसर तज़किरा करते हैं ताकि क़ारईन के लिए यह मुअम्मा न रहे कि आप ने इतना बड़ा इंकलाब कैसे बरपा करदिया?

हज़रत ख़्वाजा मुहम्मद मासूम रहमत अल्लाह अलैहि की ख़िदमात:

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के जानशीन हज़रत ख़्वाजा मुहम्मद मासूम क़ुद्दिस सिर्रहू की उन ख़िदमात की तफ़सील तो मालूम न हो सकी जो आप ने अपने वालिद बुज़ुर्गवार की हयात में अंजाम दें लेकिन मसंद मिशीखीत पर रौनक अफ़्रोज़ हो ने के बाद आप ने हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के मिशन को किस तरह आगे बढ़ाया और तजदीदी शुवाओं से किस तरह आलम के गोशा गोशा को मनोर किया इस का इजमाली खाका मौलाना नूर बख्श तोकली की ज़बान से समाअत फ़रमा लीजिए,फ़रमाते हैं:

‘‘हज़रत क़य्यूम सानी यक्म रबी उलअव्वल 1034؁ह को मसंद इरशाद वक्यूमियत पर जलवा अफ़्रोज़ हुए इस रोज़ पचास हजार आदमियों ने आप से बीअत की जिन में से दो हजार हज़रत मुजद्दिद रज़ि अल्लाह अन्हु के ख़ुलफ़ा थे बाक़ी ख़ुलफ़ा जो मुख़तलिफ़ मुमालिक में थे वह भी मुख़तलिफ़ औकात में सरहिंद में हाजिर हो कर बीअत से मुशर्रफ़ हुए,मावरा अलनहर,खुरासान वबदख़शां वगैरह मुमालिक के बादशाहों ने अपने वकील मा तहाइफ़ भेज कर ग़ायबाना आप से दुबारा बीअत की,क्यूमियत के तीसरे साल जब शाहजहाँ तख़्त पर बैठा तो सरहिंद में हाजिर हो कर दुबारा बीअत से मुशर्रफ़ हुआ और तरवेज इस्लाम में ग़ायत दर्जा को शिष् की गई,चौथे साल ख़्वाजा मुहम्मद हनीफ काबुली हाजिर ख़िदमत हो कर आप से बीअत हो ए आप ने उन्हें खिलाफत दे कर काबुल भेजा ख़्वाजा साहिब को वहाँ बड़ी क़बूलीयत नसीब हुई और

हज़ारहा लोग उन के मुरीद हो कर साहिब हाल हुए।

पाँचवीं साल ख़्वाजा मुहम्मद सिद्दीक़ पेशावरी और शैख़ अबू उलमज़फ़र बुरहानपुरी हाजिर ख़िदमत हो कर बीअत से मुशर्रफ़ हुए,आप ने ख़्वाजा साहिब को खिलाफत दे कर पेशावर भेजा जहां उन को बड़ी कामयाबी हुई और शैख़ साहिब को कुछ मुद्दत के बाद ख़लीफ़ा बना कर दक्कन रवाना किया जहां बहुत से लोग उन के मुरीद हुए,छुटे साल अखून मूसा ननगर हादी और ख़्वाजा अब्द अलसमद काबुली शरफ़ बीअत से मुशर्रफ़ हुए और खिलाफत पा कर अपने अपने वतन में इशाअत तरीका में मशगूल हुए,सातवें साल शैख़ बदरुद्दीन सुल्तानपुरी और शैख़ अनवर नूर महली बीअत हुए और खिलाफत दे कर बग़रज़ इशाअत सुल्तानपुर और नूर महल में भेज दिए ग्ये।

आठवें साल मुल्क शाम के सात सौ उलमा विमशाइख़ और वहाँ के दीगर हज़ारहा आदमी सरहिंद में आ कर बीअत से मुशर्रफ़ हुए, नवें साल फंगार रोम ने अपने वकील के साथ तहाइफ़ व्हिदाया भेजे और ग़ायबाना बीअत की,तेरहवीं साल अब्द उलअज़ीज़ शाह तौरइन ग़ायबाना बीअत से मुशर्रफ़ हुआ,चौदहवीं साल शहजादा मुहम्मद औरंग ज़ेब आलमगीर बीअत से मुशर्रफ़ हुए,पंद्रहवां साल औरंग ज़ेब की बहन रोशन आरा ने और सोलहवीं साल रोशन आरा की बहन गोहर आरा ने आप से बीअत की,उन्नीसवीं साल सुलतान अब्द अलरहमान शाह खुरासान और इस की बेगम बीअत से मुशर्रफ़ हो ए,इक्कीसवीं साल तुर्किस्तान और दश्त कब्चान के तमाम ख़ान और सलातीन अपने अपनेलशकर समेत ग़ायबाना मुरीद हुए,बाईसवीं साल शाह सुलेमान बादशाह ईरान अपने रफ़्ज़ से ताइब हो कर ग़ायबाना मुरीद हुआ और इस के साथ हज़ारहा शीया ताइब हो कर मुरीद हुए,तेइसवें साल बादशाह काशग़र ग़ायबाना मुरीद हुआ,चौबीसवीं साल इमाम सज्जन ग़ायबाना मुरीद हुआ,पच्चीसवीं साल शैख़ हबीब अल्लाह बुखारी को जो दसवीं साल मुरीद हुआ था खिलाफत दे कर बुखारा में भेजा वहाँ उन को क़बूलीयत आम्मा नसीब

हुई,छोटे बड़े वज़ीअ व शरीफ़,ख़वातीन वसलातीन और रिआया मुरीद हुई और चार सौ ने दर्जा तकमील पर पहुँच कर उन से खिलाफत पाई उन के ज़रिया सिलसिला आलीया खुरासान विमावरा अलनहर में बहुत फैला।

सत्ताईसवीं साल हज़रत ने अपने ख़लीफ़ा ख़्वाजा अर्गवन को खतहाचीन में भेजा और इस के साथ वहाँ का बादशाह मुलकब ब का आन मुसलमान हो गया,उठाईसवीं साल आप ने शैख़ मुराद को खिलाफत दे कर बग़रज़ इशाअत मुल्क शाम में भेजा वहाँ आप दमिश्क में मुकीम हुए और वाली शाम और तमाम उमरा और दीगर लोग बकसरत उन के हलक़ा इरादत में आये और सिलसिला आलीया पूरे तौर पर राइज हुआ

चौतीसवीं साल बहुत से इरादत मंदों के साथ आप हज के लिए तशरीफ़ ले गए,छतीसवीं साल वापस आये जब बंदरगाह सूरत में पहुँचे तो हर रोज़ हज़ारहा लोग मुरीद होने लगे सुबह शाम तक़रीबा तीस हजार लोग हलक़ा में शामिल हुए,हुजूम ख़ल्क़ की यह कैफियत हुई कि उमरा वसलातीन को आप की ज़ियारत बदक्कत नसीब हुई।

क़िस्सा कोताह हज़रत क़य्यूम सानी की कसरत इरशाद विमशेख़्त बयान से बाहर है,जनाब पैगम्बर्ख़ुदा ﷺ और अस्हाब रज़ि अल्लाह अन्हुम के बाद किसी वली को इस क़द्र मुशेख्त नसीब नहीं हुई चनां चह तारीख मरा अलालम वजहाँ नुमा में जो आलमगीर के हुक्म से लिखी गईं हैं यह लिखा कि है कि‘‘ मुशेख्त की मसंद पर कोई ऐसा शैख़ नहीं बैठा जैसा कि शैख़ मुहम्मद मासूम रज़ि अल्लाह अन्हु,जहान के तमाम अतराफ़ विजवानब के बादशाह,उल्मा विमशाइख़,छोटे बड़े वज़ीअ वशरीफ़ मशरिक़ से मग़रिब और जुनूब से शुमाल तक आँहज़रत के मुरीद थे’’

ख़ास वेआम बंदगान ख़ुदा सुबह विशाम परवानों की तरह आँजनाब पर जान फिदा करते,हिंदोस्तान, तौरइन, तुर्किस्तान,बदख़शां,दश्त कब्चान,काशग़र,खता ,रोम,शाम और यमन के बादशाह आँजनाब के मुरीद हुए।

और इस वक़्त के बड़े बड़े शैख़ और उलमा गुरोहा गिरोह अपनी अपनी मुशेख्त तर्क करके आँजनाब के मुरीद हुए,रोए जमीन के मुख़तलिफ़ हिस्सों के लोग आँहज़रत को ख्वाब में देख कर और अंबिया वावलिया से खुशखबरी पा कर हाजिर ख़िदमत हो कर शरफ़ बीअत से मुशर्रफ़ हो ए,मुख़तलिफ़ मुल्कों में आँजनाब के ख़ुलफ़ा की ख़िदमत में हज़ारहा हजार आदमियों का मजमा,हर रोज़ सैकड़ों नये मुरीद हाजिर ख़िदमत होते और फना वबका और परवरदिगार का पूरा पूरा क़ुर्ब हासिल करते।

हज़रत की मजलिस का रोब विदबदबा इस क़द्र था कि मजलिस अक़्दस में बड़े बड़े बादशाह आपस में गुफ़्तगू न कर सकते थे बग़ैर इजाजत बात न करते अगर बड़ा ज़रूरी काम होता तो कागज़ पर लिख कर आप की ख़िदमत में पेश करते,आलमगीर बादशाह पर अगरचे आप ग़ायत दर्जा मेहरबान थे लेकिन फिर भी ब सबब ग़ायत अदब इस ने आँजनाब के हुज़ूर में इस नेकभी किसी से गुफ़्तगू न की और बग़ैर इज़न न बैठा।

चालीसवीं साल ख़ुसूसीयत से तमाम रवे जमीन के ख़ुलफ़ा मा अपने मुरीदों के हज़रत की ख़िदमत में हाजिर हुए,बादशाह और अमीर अपनी अपनी सल्तनत और अमेरी छोड़ कर आप की ज़ियारत को आये,चनां चह ख़ानान तौरइन वितरकस्तान, वालियान दश्त क़बाचान वबदख़शां, फ़रमां रवायान खता वख़रासान,तख़्त नशीनान काशग़र वतबरस्तान,हाकिमान क़हस्तान विगरजस्तान सब के सब हज़रत के दीदार फ़ाइज़ अलांवार के वास्ते शहर सर हिंद में हाजिर हुए,शहर के गिर्दागर्द एक एक मेल तक लश्कर पड़ा था इस से पहले कभी ऐसा मजमा नहीं हुआ और बाद में भी ऐसा कभी नहीं हुआ,नमाज़ के वक़्त इस क़द्र हुजूम होता कि एक दूसरे की पीठ पर सजदा करते बल्कि खडे होने को भी काफ़ी जगह न मिलती।

च्वालीसवीं साल हज़रत क़य्यूम सानी रज़ि अल्लाह तआला अन्हु ने अपने मुरीदों औरख़ुलफा को हसब जेल तौर पर अपने फ़र्रज़िंदों के सुपुर्द किया,हज़रत मुहम्मद सबात अल्लाह को काबुल और इस के

गिर्द वनवाह के तमाम पठान और मुगल मुरीद हुए, बदख़शां, तुर्किस्तान, दश्त कब्चाक़, काश्गर, खता, रोम विशाम के तमाम मुरीद और हिंद के बाज़ आदमी हज़रत ख़्वाजा मुहम्मद नक़्शबंद रहमत अल्लाह अलैहि के सुपुर्द हुए।

ख़्वाजा मुहम्मद हनीफ काबुली,ख़्वाजा मुहम्मद सिद्दीक़ पेशावरी,ख़्वाजा अबदुस्समद अखून,मूसा ननगर हादी,शैख़ मुराद शामी,ख़्वाजा अर्गवन ख़ताई वगैरह और शहजादा औरंग ज़ेब भी आँजनाब के सुपुर्द हुआ,जब हज़रत हज अल्लाह काबुल गए तो काबुल के तमाम आदमियों ने आप से रुजू किया।

हज़रत ख़्वाजा उबीद अल्लाह मुरूज अलशरीआ को खुरासान, मावरा अलनहर,तौरइन दारगंज गौर सिद,इंदिराप क़हस्तान,तबरिस्तान और सजस्तान के इलाक़े सुपुर्द किए और हसब जेल ख़ुलफ़ा आप के मातहत किए शैख़ अबवालमज़फ़र बुरहानपुरी,शैख़ हबीब अल्लाह बुखारी,सफ़ी पाइंदा तला,शैख़ अबुलक़ासम बिल्ख़ी वगैरह ओरहंद के अक्सर उमरा और शहजादा मुअज़्ज़म भी आप के सुपुर्द हुए आखिर उन्हों ने भी हज़रत हज अल्लाह से रुजू किया।

दक्कन और पंजाब के अक्सर मुरीद और ख़ुलफ़ा को ख़्वाजा मुहम्मद अशरफ के हवाला किया,सुलतान औरंग ज़ेब,आज़म शाह,जाफर ख़ाँ,वजीर शाइस्ता ख़ाँ,मुकर्रम ख़ाँ,मुहतशिम ख़ान और सुलतान अब्द अलरहमान हज़रत शैख़ सेफ उद्दीन के सुपुर्द किए और हसब जेल ख़ुलफ़ा उन के हवाला किए,अखून मीर मुहम्मद मुहसिन स्यालकोटी,सोफी पाइंदा,शैख़ अबुलक़ासम भक्री वगैरह,सुलतान हिंद ने आकर हज अल्लाह से रुजू किया,हज़रत मुहम्मद सिद्दीक़ को अरब ,बहरीन और मशरिक़ हिंद के अक्सर शहर सुपुर्द किए।

बाद अज़ां हज़रत क़य्यूम सानी रज़ि अल्लाह अन्हु ने अपने तमाम ख़ुलफ़ा को जहान के मुख़तलिफ़ हिस्सों में भेजा एक हजार सात सौ ख़ुलफ़ा तुर्किस्तान और दश्त क़बाचान में भेजे उन का सरदार ख़्वाजा मुहम्मद अमीन और ख़्वाजा अबदुलरहमान को बनाया,पांच सौ ख़लीफ़े काशग़र और खता की त

तरफ़ भेजे उन का सरदार ख़्वाजा अर्गवन को मुक़रर फ़रमाया,चार सौ ख़ुलफ़ा शाम और रोम की तरफ़ भेज कर इस का सरदार शैख़ मुराद को बनाया,सात सौ ख़ुलफ़ा खुरासान,बदख़शां और तौरइन में शैख़ हबीब अल्लाह के मा तहत करके भेजे,एक सौ ख़ुलफ़ा काबुल में और एक सौ ख़ुलफ़ा नवाह पेशावर में भेजे,बेस ख़ुलफ़ा ननगर हार में भेजे उन सब का सरदार ख़्वाजा मुहम्मद हनीफ,ख़्वाजा मुहम्मद सिद्दीक़ और अखून मूसा को मुक़रर फ़रमाया,बाक़ी ख़ुलफ़ा को हिंदोस्तान के मुख़तलिफ़ शहरों में भेजा कहते हैं कि ख़ुलफ़ा और फ़र्रज़िंदों की वसातत के बग़ैर ब्राह रास्त नो लाख आदमी हज़रत क़य्यूम सानी रज़ि अल्लाह अन्हु के मुरीद हुए,आप के ख़ुलफ़ा की तादाद सात हजार थी जो सब के सब साहिब कमालात थे।’’