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Allama Afaque Ahmad Mujaddidiतजदीद अल्फ़ सानीइंकार सिफ़ात की वजह

अध्याय 21 में से 57पृष्ठ 301–312

इंकार सिफ़ात की वजह

जिन सूफ़िया कराम रहमत अल्लाह अलैहिम से सिफ़ात का इंकार हुआ उन से दर हक़ीक़त कशफ़ी खता वाक़्य हुई,मक्तूब 286 जिल्द अव्वल में फ़रमाते हैं:‘‘इस ताइफा से बाज़ की मुखालिफ़तों से वहदत वजूद का हुक्म है और अहाता वक्रब ज़ाती का जैसा कि उपर गुजरचुका और इस तरह उन का सिफ़ात सबा या समानिया का इंकार करना है,खारिज में ज़ात इज़ असमा पर वजूद ज़ाइद के साथ क्योंकि उलमा-ए अहले सुन्नत सिफ़ात को खारिज में मौजूद जानते हैं वजूद ज़ाइद के साथ,वजूद ज़ात तआला पर उन का नकार इस राह से पैदा हुआ है कि कि इस वक़्त में उन का मशहूद उन सिफ़ात के आईने में ज़ात तआला वितक़दस है और मालूम है कि आईना, देखने वाले की नज़र से पोशीदा हो जाता है और इस पोशीदगी के वास्ता से उन के अदम वजूद फ़ी अलख़ारिज का हुक्म करदिया और गुमान कर लिया कि अगर सिफ़ात मौजूद होतीं तो मशहूद होतीं बहीस ला शहूद ला वजूद और उलमा ने चूंकि वजूद सिफ़ात का हुक्म लगाया है इस वजह से उन पर ताने किए हैं बल्कि कुफ्र वबत परस्ती का हुक्म लगाया है,इआज़िना अल्लाह सुब्हानहू अन अलजरा त फ़ी अलतान।’’

आप क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं:‘‘अगर उन की इस मक़ाम से तरक्की वाक़्य होती और उन का शहूद इस पर्दा से निकल आता और आईना दारी का हुक्म ख़त्म हो जाता तो सिफ़ात को जुदा देखते और उन के इंकार का हुक्म न लगाते और उन का काम अकाबिर उलमा के तान तक न खिंचता।’’

6।मक्तूब 114, जिल्द सोम में फ़रमाते हैं: ‘‘सिफ़ात हक़ीकया कि हज़रत ज़ात तआला व तक़दस के मर्तबा में हम साबित करते हैं, इस इस्बात से किसी किस्म का कोई तईन इस ज़ात जल सुल्ताना और तंज़िल पैदा नहीं होता है और मर्तबा औला के अलावा कोई दूसरा मर्तबा साबित नहीं होता है और उन के वजूह इनाकास में किसी वजह कर कोई सूरत नहीं बंधती और जब तक मर्तबा सानी मुतहक़्क़ न होगा और वजूह में किसी वजह कर इनाकास हासिल न होगा तईन व तंज़िल की सूरत पैदा नहीं होती है और हज़रत ज़ात और इस सुब्हानहू

की सिफ़ात हक़ीकया गोया एक मर्तबा में साबित हैं और ज्यादती के बावजूद गोया उएन ज़ात तआला हैं।

और हर चंद यह सिफ़ात मुक़द्दसा हज़रत ज़ात सुब्हानहू के कमालात मुंदरजा की तफ़सील हैं, लेकिन उन का हुक्म बाक़ी इजमाल व तफ़सील से अलाहदा है क्यों कि इजमाल इस मर्तबा में है कि तफ़सील इस मर्तबा में साबित नहीं है, बल्कि मर्तबा तफ़सील मर्तबा इजमाल के सिवा और इस हज़रत जल सुल्ताना में यह मानी मकसूद हैं और तफ़सील उएन मर्तबा इजमाल में है। यह मार्फत तौर अक्ल के विरा है कि नज़र कशफ़ी जिस के साथ हिदायत याफताह होती है और इल्म वाजिबी जल सुल्ताना इस मर्तबा में कि उन सिफ़ात से मुताल्लिक़ हुआ है अपनी ज़ात के इल्म और अपने कमालात ज़ातीय मुंदरजा के इल्म की तरह इल्म हुज़ूरी है और यह ज्यादती के बावजूद गोया उएन आलम हैं और उन का हुज़ूर नफ़्स आलम के हुज़ूर की तरह है।

हज़रत ज़ात तआला के साथ उन के कमाल इत्तिहाद का असर है कि सूफ़िया के जिम ग़फ़ीर ने सिफ़ात को उएन ज़ात तआला कहा है और ज्यादती सिफ़ात का इंकार किया है और ला हो को मना करके ला गैरह को साबित किया है और कमाल यह है कि ला हो की तस्दीक के बावजूद लागीरह को साबित किया जाए और ज्यादती के बावजूद ग़ैरयत का सबब किया जाए यह कमाल उलूम अंबियाअलैहिम अस्सलाम के मजाक के माफ़िक़ और फ़िर्क़ा नाज्य अहले सुन्नत व जमात के आरए साइबा के मुताबिक है।

7। जानना चाहिए कि इन्किशाफ़ ज़ाती इस मर्तबा में कि हज़रत ज़ात तआला और इस की सिफ़ात मुक़द्दसा से ताल्लुक रखता है, इल्म हुज़ूरी के क़बील से है क्यों कि सिफ़ात मुक़द्दसा के लिए भी हज़रत ज़ात तआला व तक़दस का हुक्म है जैसा कि गुज़र गया और वह जो में ने कहा कि इल्म हुज़ूरी के क़बील से है क्यों कि इल्म हुज़ूरी नफ़्स आलम के हुज़ूर का नाम है और सिफ़ात चों कि नफ़्स आलम नहीं हैं तो चाहिए कि उन का इल्म, इल्म हुज़ूरी न हो, लेकिन

चों कि उन से कोई सूरत मुंतज़ा नहीं होती है और उन का हुज़ूर नफ़्स साबित है (इस लिए) इल्म हुज़ूरी के क़बील से है।

और वह जो इन्किशाफ़ कि सिफ़त इल्म से ताल्लुक रखता है इल्म हुसूली के क़बील से है और वह जो में ने कहा कि इल्म हुसूली के क़बील से है क्यों कि इल्म हुसूली इल्म में मालूम से सूरत हासिला का नाम है और इस फ़क़ीर (हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू) के नज़दीक मुहक़्क़ और मक्षुफ़ हुआ है कि इल्म वाजिबी जल शाना में किसी मालूम की सूरत ने नक़्श नहीं पकड़ा है और इस तआला का इल्म किसी सूरत मालूमा का मुतहम्मिल नहीं तो हुसूल सूरत का ज़ात आलम तआला में कैसे होगा, बल्कि अल्लाह तआला के इल्म का ताल्लुक है मालूम से और एक इन्किशाफ़ है इस से बग़ैर इस के कि मालूम की कोई सूरत इल्म में साबित हो और ख़ाना इल्म जमी नुक़ूश और इल्मी सूरतों से खाली और मुसफ़ा है

व मा ज़ालिक ला यानी ब व अन अलमा मसक़ाल ज़र फ़ी उलअर्ज़ विला फ़ी अलस्मा

इस क़द्र मक्षुफ़ होता है कि अल्लाह तआला का इल्म जब मालूम से ताल्लुक पर्वता है तो इस ताल्लुक से मालूम से एक सूरत मुंतज़ा होती है और इस इल्म से क़याम पैदा करती है बग़ैर इस के कि कोई हलूल व हुसूल इल्म में पैदा करे और चों कि इल्म के ताल्लुक से मालूम से कोई सूरत मुंतज़ा होती है और इल्म से क़याम, बल्कि आलम से पैदा करता है (लिहाज़ा) दुरुस्त आया कि इल्म हुसूली के क़बील से है और जब सिफ़त इल्म अल्लाह तआला के कमालात ज़ातीय मुंदरजा सेताल्लुक़ पैदा करती है नाचार उन कमालात से इस ताल्लुक की वजह से इल्मी सूरतों मुंतज़ा हूँ गी और इल्म के साथ क़याम पैदा करें गी अगरचे उन का हलूल व हुसूल इल्म में साबित न होगा।

8।अच्छी तरह सुनो! सूरत मालूम नफ़्स इल्म का नाम है, उन का हुसूल व हलूल किस इल्म में किस मानी कर होगा, मताख़रीन सूफ़िया ने कहा है कि सूर इलमीया जो कि आयान साबिता से

इबारत हैं और मुम्किनात के हक़ायक़ हैं उन का सबूत ख़ाना इल्म में है और बस, और खारिज में बोए इल्म वजूद उन तक नहीं पहुँची है, लेकिन वह सूर इलमीया चों कि ज़ाहिर वजूद के आईने में इल्म कि इस के अलावा खारिज में मौजूद नहीं है (इस लिए) वहम होता है कि वह सूरतों खारिज में मौजूद हैं इस सूरत की तरह कि जब आईने में मुनाकिस होती है तो मुतवहम होता कि वह सूरत आईना में है

फिया लेत शेअरी मा मुराद हज़ा अलकबरा व मा मानी हुसूल उलसूर फ़ी अलालम व मा उलसूर फ़ी उलशाहिद ज़िला नफ़्स अलालम व फ़ी उलगायब अलमा तआला अज़ली क़दीम बसीत वहदानी ताल्लुक बमालूमात मुतकसरत हिसलत मिन तालुका सूर मुतअद्दिदित मुतमीज लतलक उलमालूमात मिन गैर उन्न यसबत हुसूलहा व हलूलहा फ़ी ज़लक़ अलालम इलाज़ली कैफ़ तहल उलसूर अलमतादिदित फिया व हो यस्तलिज़्म इलतबआअज़ व इल्तजज़ई व अलखुनक़साम लिलमहलो ।।।।। कशॆ फिया गैर शे व हो यूजब अलतरकैब उलमनानी ललकदम विलाआज़लेत

9।जानना चाहिए कि वह सूरतों जो कि अल्लाह तआला के कमालात ज़ातीय मुंदरजा के साथ ताल्लुक सिफ़त इल्म से साबित हुई हैं नज़र कशफ़ी से वाज़िह होता है कि उन (सूर) को हयात व इल्म साबित है और जो इन्किशाफ़ कि इल्म हुज़ूरी के मुनासिब है उन को उन कमालात की बनिस्बत जो उन में दाखिल हैं, साबित है।

मक्तूब 113, ज: 3 में फ़रमाते हैं: ‘‘वाजिब उलवजूद जल सुल्ताना की सिफ़ात कि इस तआला व तक़दस की ज़ात के साथ क़याम रखती हैं जैसे हयात, कुदरत, इल्म वगैरह कमाल तक़दस व तंजा की वजह से मुमकिन के सिफ़ात से कोई निस्बत नहीं रखती हैं क्यों कि सिफ़ात मुमकिन आराज़ हैं कि जवाहर से क़याम रखती हैं और सिफ़ात वाजिबी जल सुल्ताना मुक़ूम जवाहर (यानी जिस से जवाहर की तहसील होती है) कि जवाहर का क़याम उन से है नीज़ मुमकिन की सिफ़ात मीत का हुक्म रखती हैं और जमाद महज़ हैं और हयात व इल्म वगैरह से बे

नसीब, इसी क़द्र है कि मुमकिन उन के तवस्सुत से ही, आलम और कादर हुआ है, लेकिन यह बज़ात ही, आलम और कादर नहीं हैं बख़िलाफ़ वाजिब उलवजूद तआला व तक़दस की सिफ़ात मुक़द्दसा कि इस हक़ीर की नज़र कशफ़ी में यह भी (सिफ़ात वाजिबा) भी अपने मौसूफ़ सुब्हानहू की तरह ही व आलम हैं और अपने कमालात मुंदरजा की तफ़सील से वाकिफ़ व ।।।।।। लेकिन उन का इल्म, इल्म हुज़ूरी के क़बील से मफ़हूम होता है न इल्म हुसूली के आलम से और इसी तरह हर सिफ़त व शान कि मर्तबा वजूब तआला व तक़दस में साबित की जाती है सब सबूत हयात व इल्म के साथ मक्षुफ़ होती हैं और नूर सिर्फ़ नज़र आती हैं गोया वह नूर सब का सब हयात और सब इल्म व इन्किशाफ़ और यह दो सिफ़त कमाल इस जगह ज़ाहिर व हुवेदा हैं बख़िलाफ़ दूसरी सिफ़ात कुदरत व इरादा वगैरह कि इस वज़ाहत के साथ इस जगह मक्षुफ़ नहीं होती हैं हां जो कुछ दरकार हैइस महल में (वह) कमालियत का इन्किशाफ़ है कि सिफ़त इल्म से ताल्लुक रखता है और जब इल्म हयात के ताबे है तो सिफ़त हयात से भी चारा नहीं और कुदरत व इरादा मक़दूर और मुराद से वाबस्ता है और समा व बस्र से इल्म पर इकतिफ़ा किया जा सकता है और कलाम से मकसूद फायदा देना है और तक्वीन मकुनात् (मख़लूकात) के हुसूल के लिए है इस के बावजूद हर सिफ़त जब जामा है तो लामुहाला यह सिफ़ात कमाल इस में साबित हैं ज़ाहिर हो या ज़ाहिर न हो।

10।चों कि इस बयान सेलाजिम आता था कि मानी का क़याम मानी के साथ हो क्यों कि जब सिफ़ात ही व आलम हूँ गी तो सिफ़ात से हयात और इल्म क़ायम होगा। इस का जवाब देते हुए फ़रमाते हैं: ‘‘कि दोनों ज़ात वाजिब तआला के साथ क़ायम हैं। एक बासालित, दोम ब तबईत जैसा कि उलमा ने बक़ाए आराज़ में कहा है कि अर्ज़ व बका दोनों महल अर्ज़ के साथ क़ायम हैं। इस बहस की तहक़ीक़ यह है कि सिफ़ात वाजिबी जल सुल्ताना का क़याम इस तआला की ज़ात अक़्दस से ऐसा नहीं जैसा कि अर्ज़ का जौहर से होता है, हरगिज़

नहीं, बल्कि क़याम मसनू और साने के मुशाबेह है कि साने मसनू का क़य्यूम है, हर चंद इस जगह इतसाफ़ है और इस जगह इतसाफ़ नहीं’’

नहीं बल्कि वह क़याम ऐसा हैजैसे क्षे का क़याम अपनी ज़ात से, इस क़द्र फ़र्क़ है कि इस जगह (सिफ़ात में) ज्यादती साबित है और इस जगह (क़याम क्षे बज़ात ख़ुद) में ज्यादती मुतस्व्वर नहीं है, लेकिन इस ज्यादती ने हद ग़ैरयत तक नहीं पहुँचाया हैकि लागीरह फ़रमाया है। पस दोनों जगह एतबारी तग़ायर साबित हुआ और क़याम मुतहक़्क़ हो गया और इस जगह इतसाफ़ का हुसूल ऐसा है जैसे इंसान का इतसाफ़ इंसानियत से और जौहर का इतसाफ़ है जौहरीयत से, बल्कि में कहता हूँ कि इस जगह में कि ज़ात अक़्दस और सिफ़ात हक़ीकया मुक़द्दसा हैं कि हज़रत ज़ात से क़ायम हैं कुछ सिफ़त व इतसाफ़ का मुलाहिजा इस जगह साबित नहीं है न हज़रत ज़ात में मौसूफ़ियत का मुलाहिजा है और न सिफ़ात मुक़द्दसा में सिफ़ातीत मलहूज़। जब वज्द व वजूब वजूद को इस बारगाह में गुंजाइश न हुई तो सिफ़त व इतसाफ़ की किया मजाल होगह कि वजूद की फरे में इस जगह नूर के सिवा किसी चीज़ की गुंजाइश नहीं है और वह भी बे मसल अगर हयात है तो नूर है और अगर इल्म है तो नूर है और इसी पर कयास।

इस नूर अक़्दस बे चवन का ज़ुहूर अगर मर्तबा सानी में तग़ैर व इंतकाल के बग़ैर साबित किया जाए तो मज़हरीयत के काबिल वजूद के सिवा कोई दूसरी चीज़ न होगी। लिहाज़ा तईन अव्वल इस हक़ीर के नज़दीक तईन वजूद आया है और बाक़ी तैनात इस तईन के ताबे हैं। हर चंद कि लफ़्ज़ तईन का इतलाक़ इस हक़ीर के उलूम के मुक़तज़ा के मुताबिक गुंजाइश नहीं रखता है, लेकिन चों कि कौम में यह लफ़्ज़ मुतआरिफ़ हो गया है तो हम ने भी इतलाक़ में सस्ती से काम लिया।

जब बयान साबिक़ से वाज़िह हो गया कि इस अल्लाह तआला की ज़ात अक़्दस और इस सुब्हानहू की सिफ़ात मुक़द्दसा एक मर्तबा में साबित हैं और सिफ़ात की ज्यादती के सबूत से किसी किस्म का

का तईन व तंज़िल इस हज़रत जल सुल्ताना में पैदा नहीं हुआ है तो जान लो कि इस मर्तबा मुक़द्दसा का कि हज़रत ज़ात तआला मा सिफ़ात है मर्तबा सानिया में ज़ुहूर अव्वल तग़ैर व तब्दिल के शाइबा के बग़ैर है और वह इस हक़ीर के नज़दीक अज़ रवे कश्फ़ व शहूद लाजिमी तौर पर हज़रत वजूद है कि खैर महज़ और खालिस कमाल है और जमी कमालात के ज़ुहूर की काबिलियत रखता है बितरीक़ ज़लीयत और वजूद के गैर को यह दौलत मयस्सर नहीं होती है। लिहाज़ा अगर इल्म इस मर्तबा मुक़द्दसा से मुताल्लिक़ होगा और इस के कमालात अख़ज़ करेगा जैसा कि गुज़र गया तो लामुहाला पहली चीज़ कि इस हज़रत जल शाना से माख़ूज़ होगी हज़रत वजूद होगा और दीगर कमालात इस के ताबे हूँ गे।

यही वह जगह है कि सूफ़िया वग़ैरहम के जिम ग़फ़ीर ने वजूद को उएन ज़ात सुब्हानहू तसोर कर लिया है और तईन वजूद को ला तईन समझ लिया और इस साबिक़ तर तईन का सबूत इल्म व खारिज के मावरा है जैसा कि इस मानी की तहक़ीक़ कसीर जगहों में बयान हो चुकी है और यह हज़रत वजूद बितरीक़ ज़लीयत इजमालन जमी कमालात ज़ातीय व सिफ़ातीय का जामा है और इस मर्तबा जामा इजमालिया की तफ़सील है कि कहा जा सकता है तईन सानी है, पहली चीज़ कि मर्तबा तफ़सील में जिस ने सबूत पैदा किया सफ़ अलहया है कि जमी सिफ़ात की असल है और यह सिफ़त हयात गोया ज़ुल हैइस सिफ़त हयात का कि हज़रत ज़ात तआला के मर्तबा में साबित है और लाहु और ला गैरह इस के हक़ में साबित और यह ज़ुल चों कि इस मर्तबा में पैदा हुआ है कि हज़रत ज़ात के मर्तबा के विरा है, ला मुहाला ला गैरह इस के हक़ में साबित न होगा और वह दाग ग़ैरयत से दाग दार होगा और सिफ़त अलहया के बाद सिफ़त अलालम इसी तरह जो बितरीक़ ज़लीयत साबित है जो सिफ़त अलहयात में गुज़र गया और यह सिफ़त जमी सिफ़ात की जामा है और सिफ़त अलक़द्रत और अलाराद वग़ैरहमा इस्तिक़लाल के बावजूद गोया इस के अजज़ा हैं क्यों कि इस सिफ़त को हज़रत ज़ात तआला व तक़दस से एक किस्म का इत्तिहाद है कि इस के गैर को नहीं है क्यों

कि इल्म हुज़ूरी की सूरत में इल्म व आलम व मालूम का इत्तिहाद है और कुदरत हरगिज़ कादर व मक़दूर से मुत्तहिद नहीं होती है और अलाराद में कि अहद उलमकदूरेन को तरजीह देने का नाम है, भी पर इत्तिहाद साबित नहीं है। अला हज़ा उलक़यास।

अल्लाह तआला की ज़ात वस्फ़ात का मसला निहायत अहम और दकीक़ है, हमारी फ़लाह व निजात इस की सही मार्फत ही पर मौक़ूफ़ है। उन हक़ायक़ तक अक्ल की रसाई नहीं, जिन्हों ने अक्ल के ज़रिया जानना चाहा तो ठोकरों के सिवा कुछ हाथ न आया। बड़े बड़े चौक गए और उलमा की अबहासि का एक तवील सिलसिला वजूद में आज्ञा। अगर में हुकमा व फिलासफा व मुतकल्लिमैन व उलमा के अक़्वाल ज़ात वस्फ़ात से मुताल्लिक़ अर्ज़ करता और इस के इख़तिलाफ़ात व दलायल ज़िक्र करता तो बात बहुत तवील हो जाती। मक़सद मेरा हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की रसाई व पहुँच बयान करना है कि परवरदिगार आलम ने अपना फजल व इरफान किस क़द्र अता फ़रमाया था और वाक़ई किस दौर में आप का ज़ुहूर हुआ है, ज़ात व सिफ़ात तआला व तक़दस में जिस क़द्र लोगों को इशतिबाहात हो रहे थेइस दौर में ऐसे ही बालिग नज़र मुजद्दिद की ज़रूरत थी जिस ने उन हक़ायक़ को जलवा गर कर के लोगों को इतमीनान व अंशराह का सामान मुहैया कर दयावहीं यह बताना है कि यह आप का बड़ा एहसान है और परवरदिगार आलम जल जलाला का फजल अज़ीम है कि इस ने ऐसे भयानक दौर में हम नाक़िसों की रहनुमाई के लिए ऐसा साहिब कश्फ़ व बसीरत मुजद्दिद अता फ़रमाया जिस ने लोगों को सही मार्फत की शाहराह दे दी और हम को लाताइल तवील बहसूँ में उलझने से बचा लिया और शकूक व शुबहात के दलदल से निकाल कर ईमान व ईक़ान की सही वादी अता फ़रमा दी। हक़ीक़त यह है कि इलाहयात व निबवात का वह मैदान है जहां न सिर्फ़ इल्म काम आता है न फ़िक्र, बल्कि इल्म व फ़िक्र के साथ साथ बातिनी बुलंदपरवाज़ी और बसीरत की अशद ज़रूरत है।’’

यह चंद बहसें में नेसपुर्द कलम कर दें अगरचे अवाम को उन से कोई ख़ास हिस्सा

हासिल न होगा मगर जो लोग मनातिक़ा व फिलासफा और बाज़ मुतकल्लिमैन व सूफ़िया की बातों और उन के तूल तवील कलाम व कश्फ़ में उलझ कर मंज़िल से भटक सकते हैं उन के लिए उन में सामान इतमीनान व ईमान जरूर है। अगर आप मज़ेद हक़ायक़ व मआरिफ़ और दक़ायक़ देखना चाहें तो उन मक्तोबात को देखिए जो ज़ात व सिफ़ात वगैरह और सिलसिला नक़्शबंदिया बितरीक़ा मुजद्दिदय के बयान में लिखे गए हैं और वह बहुत हैं।

हक़ायक़ अनबीए कराम अलैहिम अस्सलाम( )

।हक़ीक़त से मुराद वह असम इलाही है जो इस शख्स का रब है।

गुज़श्ता तकरीर जेहन में रखिये, हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू इस के बाद फ़रमाते हैं: ‘‘इस फ़क़ीर के नज़दीक हज़रत खलील अला नबीना व अलैहि अस्सलात व अस्सलाम का मुबदा तईन बालासाल तईन अव्वल है कि तईन वजूदी है और इस तईन (वजूदी) का मरकज़ कि इस के अशरफ अजज़ा से है बालासाल हज़रत ख़ातिम अलर्सल अलैहि व अलैहिम अस्सलवात व इलतसलीमात का मुबदा तईन है। चनां चह एक मक्तूब में इस बहस की तहक़ीक़ ज़िक्र पा चुकी है और चों कि हज़रत खलील अला नबीना व अलैहि अस्सलात वस्सलाम की विलायत, विलायत इसराफ़ीली है अला नबीना व अलैहि अस्सलात व अस्सलाम तो लामुहाला हज़रत इसराफ़ील अला नबीना व अलैहि अस्सलात वस्सलाम का मुबदा तईन भी यही तईन वजूदी होगा और हर पैगम्बर और रसूल का बालासाल मुबदा तईन इस तईन अव्वल वजूदी के हुसूल में से एक हिस्सा है और उम्मतों से भी अगर किसी को अंबिया अलैहिम अस्सलवात व इलतसलीमात की मुताबेत की बरकत से इस तईन वजूदी में कोई नसीब हो और इस तईन के हुसूल से कोई हिस्सा या नुक्तों से कोई नुकता इस शख्स का मुबदा तईन हो तो जायज़ है बल्कि वाक़्य।

और जब तक इस तईन में मुबदा तईन ज़ाहिर नहीं होगा हज़रत ज़ात तआला तक बालासाल वसूल की गुंजाइश न होगी और मलाइका अल्येन के भी कि हज़रत ज़ात के मुक़रबीन हैं अला नबीना व अलैहिम अस्सलवात व इलतसलीमात, मुबादी तैनात इसी तईन वजूदी में हैं कि हज़रत तआला तक वसूल इसी से वाबस्ता है।

जानना चाहिए कि यह सफ़ अलालम तईन वजूदी के मर्तबा तफ़सील में ज़ाहिर होती है, हर चंद हिस्सा इस तईन वजूदी के हुसूल से, लेकिन चों कि जामईयत रखती है (इस लिए) गोया नफ़्स वजूद में इस तईन के जमी हुसूल की जामा है और इस के लिए इजमाल भी है और तफ़सील भी, इजमाल मरकज़ दायरा का हुक्म रखता है और तफ़सील मुहीत का हुक्म। पस इस तईन इल्मी का मरकज़ कि इजमाल है गोया महल है इस तईन अव्वल वजूदी का और इसी ताल्लुक की वजह से एक गिरोह ने यकीन कर लिया है कि हज़रत ख़ातिम अलर्सल अला नबीना व अलैहिम

अस्सलवात व इलतसलीमात का मुबदा तईन हज़रत इल्म का इजमाल है नहीं (ऐसा) नहीं है, बल्कि यह इजमाल आप के मुबदा तईन का ज़ुल है अलैहि व अला आला अस्सलात वस्सलाम कि तईन अव्वल वजूद का मरकज़ है जैसा कि गुज़र गया नीज़ इस इजमाल इल्म को (इस गिरोह ने) तईन अव्वल कहा है और मर्तबा फ़ौक़ को लातईन जाना है और उएन हज़रत वजूद समझ लिया, हां उएन वजूद है लेकिन तईन की तरफ़ मंसूब है जैसा कि गुज़र गया।

पोशीदा न रहे कि हर चंदतईन अव्वल के तैनात हक़ीक़ी मुंदरजा अनबीए कराम व मलाइका अजाम अलैहिम अस्सलवात व इलतसलीमात के मुबादी हैं, लेकिन चों कि इस मर्तबा में इजमाल साबित है, हर एक के मुबादी अलाहदा तफ़सील से मालूम नहीं होते हैं और किसी नाम से मौसूम नहीं किया जा सकता है और जब तफ़सील पाई हर एक के मुबादी एक दूसरे से जुदा हो गए और अलाहदा नाम पाया। मिसाल के तौर पर एक हिस्सा इस तईन अव्वल वजूदी का असम ‘‘अलहया’’ है और हिस्सा दीगर असम ‘‘अलालीम’’ है अला हज़ा उलक़यास। और मशहूद होता है कि असम अलहया इस जामईयत के ऐतबार से जो कि रखता है मलाइका अल्येन अजाम का मुबदा तईन है अला नबीना व अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात। नीज़ हज़रत रूह अल्लाह को कि मिला आला से मुनासबत रखते हैं इस मक़ाम से नसीब है अला नबीना व अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात। और हज़रत महदी अलैहि इलरिज़्वान चों कि हज़रत रूह अल्लाह से मुनासबत ख़ास रखते हैं इस मक़ाम से उम्मीदवार हैं अला नबीना व अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात।

जानना चाहिए कि सिफ़ात समानिया से हर एक कि तईन सानी के मर्तबा में तफ़सील पाती है मुबदा है हर एक ख़ास पैगम्बर बुजुर्ग मुक़तदा का चनां चह इल्म मसलन हज़रत ख़ातिम अलर्सल अला नबीना व अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात का मुबदा तईन है और कुदरत हज़रत ईसा अला नबीना व अलैहिम अस्सलात व अस्सलाम का मुबदा तईन है और तक्वीन हज़रत आदिम अला नबीना व अलैहिम अस्सलात व अस्सलाम का मुबदा तईन है और उन असमाए कल्या मुक़द्दसा के जज़ईआत बाक़ी अंबिया अलैहिम अस्सलवात

वालतसलीमात के मुबादी तैनात हैं उन बुज़ुर्गवारों से हर एक गिरोह कि असम ख़ास से मुनासबत रखता है और नबी ख़ास मुक़तदा के साथ उन को मुनासबत है इस असम के जज़ईआत उन के मुबादी तैनात हैं।

मक्तूब/3251 में फ़रमाते हैं: और वह सफ़ अलालम बाइतबार इजमाल रब मुहम्मद है और बाइतबार तफ़सील रब हज़रत खलील और बाइतबार बुर्ज़खीत इजमाल व तफ़सील रब हज़रत नूह है। चनां चह हज़रत मूसा का रब सफ़ अलकलाम है और हज़रत ईसा का रब सफ़ अलक़द्रत है और हज़रत आदिम का रब सफ़ अलतक्वीन।