अध्याय 33 में से 57पृष्ठ 453–463
तजदीदी का म का आगाज़
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की तजदीद अल्फ़ का मुख़्तसर हाल आप पढ़ चुके,किस क़द्र जा मा और हिम्मा जिहत थी,जिस का ताल्लुक कमालात ज़ाहिर से भी था और बातिन से भी,अक़ाइद व आमाल की तरवेज व इशाअत से भी और कमालात जदीदा के अफ़ाज़ा व आता से भी,ज़ाहिर है एक दम तो सारे कमालात किसी को नहीं मिल जाते हैं बल्कि बतदरीज अपनी अपनी सलाहीयत व इस्तिदाद के लिहाज से कमालात जलवा गर हो ते हैं।
यह भी अपनी जगह मुस्लिम है कि परवरदिगार जिस बंदे से जिस क़द्र और जिस तरह काम लेना चाहता है उसे आगाज़ ही से वैसा जेहन व सलाहीयत देता है,और जिस कुव्वत व ताकत और इल्म व फजल और होश व खुर्द की ज़रूरत हो ती है,वह अगर चह इबतिदा ही से होश संभालते ही ज़ुहूर में नहीं होती है लेकिन बह्र हाल आगाज़ भी उम्र के लिहाज से हो जा ता है,जिस इंसान से जिस तरह के काम वह लेना चाहता है वैसे ही तबीअत,मिजाज,अक्ल व फ़हम और इल्म व फजल वगैरह अता फरमाता है,और वह इंसान रफ़्ता रफ़्ता अपने काम शुरू कर देता है,असबाब व वसाइल तलाशना शुरू कर देता है,ख़ुदा विंद क़ुद्दूस की तरफ़ से इस के क़ल्ब व जेहन पर
ऐसे उमूर वारद हो ते रहते हैं,जिन की इसलाह व तजदीद का काम हो ना हो ता है और वह अपनी ताकत जमा करना शुरू कर देता है।
आगाज़ में इस की मेहनत व को शिष् इस क़द्र रंग नहीं ला पाती है कि लोग शुरू ही से उन की ख़िदमात को तजदीदी ख़िदमात कहने लगीं लेकिन रफ़्ता रफ़्ता कमालात के इज़ाफे और जिद वजहद की बार आवरी और तजुर्बात अपना रंग दिखाने लगते हैं और बिलआख़िर एक मोतद ब मिक़दार में नयी फ़िक्र के साथ जब तेजी से वह लो गों में अयाँ हो ता है तो लोगों का जेहन इस के का रना मों की तरफ़ मुंतक़िल हो ने लगता है और कामों को देख कर लोग ख़ुद तजदीदी का म की तईएन कर ने लगते हैं,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की तजदीद का तईन तो इल्हामी तरीके से भी हो गया था और ख़िदमात भी इतनी कसीर और अयाँ हो गई थीं,अगर चह इस वक़्त की दुनिया में ज़राए इस क़द्र न थे जो आज हैं,मगर फिर भी कसरत का र ने लो गों को मनवा दिया था कि आप बालीक़ीन मुजद्दिद हैं।
उन हालात को सामने रख कर आप सोचें कि यह कैसे कहा जा सकता है कि तजदीदी का म का आगाज़ हज़रत ख़्वाजा बा क़ि बा लिल्लाह क़ुद्दिस सिर्रहू की ख़िदमत में पहुँच कर हो अ है,अकबर का इंतकाल तक़रीबा 1605 में हुआ और आप की विलादित बा सआदत 1564 में,तक़रीबा 40/41 साल उम्र अजीज़ का हिस्सा अकबर के दौर में गुजारा इस में उम्र के इबतिदाई सत्रह साल बचपन और उलूम व फ़नून की तहसील में गुजरे,आप मज़कूरा उम्र में तमाम अहम उलूम व फ़नून पर कामिल महारत हासिल कर चुके थे और बाक़ी तक़रीबा 23 साल का ज़माना अकबर के दौर में वह गुजरा है जिस में दर्स व तदरीस और मुन्ना ज़रात व मुबाहिसात और रसाइल व कुतुब की तहरीर व तसनीफ़ के ज़रिया आप ने शब् व रोज़ दीन की ख़िदमत की है।
हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू की ख़िदमत में आप इस वक़्त पहुँचे हैं जबकि आप की उम्र शरीफ़ तक़रीबा 35 साल की थी उलूम व फ़नून से फ़राग़त के बाद और हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस
सिर्रहू की ख़िदमत आलीया में पहुँचने से क़ब्ल के जो रसाइल व कुतुब हैं वह जहां उलूम फ़नून में आप के यद तौला और महारत ताम्ह नीज़ आला ज़हानत व ज़का वित का खुला सबूत हैं वहीं इस दौर के हालात और इस्लाम की ज़बूँ हाली और मुख़तलिफ़ फ़िर्क़ों का अक़ाइद व आमाल पर हमला सभी कुछ बता ते हैं,इस अरसा में जो तहरीरात व जूद में आई हैं इस में आलिमाना और मुहक़्क़ाना पहलू नुमायाँ है,अगर चह आप को अपने वालिद बुज़ुर्गवार व गैरह से मुख़तलिफ़ सलासल में इजाजत व खिलाफत हासिल थी मगर रंग तसव्वुफ़ नहीं है।
जिस जमाने की आप की तहरीरात हैं इस से साफ ज़ाहिर हो ता है कि अकबर की गुमरही और इस का इस्लाम से इन्हिराफ़ व आराज़ उरूज पर था,फलसफा के ज़रिया इस्लामी मोतक़िदात और मुसलिमात को मुतज़लज़ल किया जा रहा था,रवाफ़िज़ बुरी तरह हावी हो रहे थे और निहायत पर ख़तर हालात पैदा हो गए थे।
आप ने किसी खतरा का ख़याल किए बग़ैर बुला ख़ौफ़ व ह्रास अ स फ़िर्क़ा या फ़र्द का रद्द कर ना शुरू कर दिया था जो इस्लामी अक़ाइद व आमाल और मजहब अहले सुन्नत पर हमला आवर था,आप ने तसनीफ़ व तदरीस के साथ साथ मुख़तलिफ़ मुहाफ़िल व मजा लस में मुन्ना ज़रे भी किए,आप ने ख़ुद तहरीर फ़रमा या है कि इस्लामी जोश वाकीदत और हमीयत व ग़ैरत ने सिर्फ़ तहरीर पर इकतिफ़ा नहीं करने दिया बल्कि जगह जगह तकरीरों और मुन्ना ज़रों से भी दिफ़ा किया।
उलूम व फ़नून से फ़राग़त के बाद आप के मुख़तलिफ़ और मुतअद्दिद जगहों पर सफर करने के निशानात मिलते हैं,अगरचे तफ़सील और औकात का तईन नहीं हो पा या है,और यह भी तै है कि फ़राग़त के बाद आप किसी बड़े से बड़े उस्ताज़ के पा स नहीं ग्ये,लिहाज़ा करीन कयास यही है कि कि यह कुछ सिर्फ़ अहयाए इस्लाम व सुन्नत के लिए था और तजदीदी का म का आगाज़ फ़राग़त के बाद ही हो गया था ,अगर चह हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू की बा रगाह अक़्दस में हुज़ूरी से क़ब्ल तसव्वुफ़ व सूफ़िया आप के निशाने पर न थे,जैसा कि तहरीरें अक्कास
हां! हम इतना मान सकते हैं कि इबतिदा में आप की सदाए हक़ का हाल वही रहा जो नकार ख़ाना में तूती की आवाज़ का हो ता है और रफ़्ता रफ़्ता यह आवाज़ ताकत पकड़ती रही और बतदरीज ज़ाहिर से बातिन की बुलंदियों की तरफ़ परवाज़ कर ती रही और ख़िदमात का एक मोतद ब हिस्सा और एक अरसा गुज़र जाने पर लोगों के सामने आयापुर दर असल सब से ज़्यादा चौक लोगों से यह हुई है कि मक्तोबात शरीफ़ के वजूद से लोग तजदीद का आगाज़ मा नते हैं और अकबर के मरने और जहा नगीर की तख़्त नशीनी के वक़्त से आप की ख़िदमात का सिलसिला जो ड़ते हैं।
मक्तोबात क़ुदसी से साफ ज़ाहिर है कि आप ने जहांगीर की तख़्त नशीनी की खबर शाय हो ते ही उमरा को मुतनब्बा किया कि आगाज़ ही से मामला को दुरुस्त कर लिया जाए वर्ना काम बहुत मुश्किल हो जाए गा ,फिर यह कैसे कहा जा सकता है कि उमरा से आप के रवाबित व ताल्लुकात पहले से न थे बल्कि इसी वक़्त रवाबित का सिलसिला शुरू हुआ जिस वक़्त आप ने उन्हें ख़ुतूत लिखे हैं।
हालात साफ ग़म्माज़ी करते हैं कि दीन हक़ की पा माली और ग़ुरबत आप के लिए मुस्तक़िल आजार बनी हो ई थी ,और इस दर्द ने रात व दिन का चेल छीन लिया था इस लिए जहां भी अपने दर्द का दरमाँ नज़र आता था आप जा ते और कलेजा चीयर कर दिखा ते और इस को भी अपने दुख दर्द में शरीक करने की को शिष् कर ते,जिन लो गों को अक्ल सलेम और ऐसे मुतहर्रिक व फ़आल तबीअतों का अंदाजा है वह खूब जा नते हैं कि ऐसे दीवानों का किया हाल हो ता है और बजाहिर हालात की ना साज़गारी ,बातिल का ग़लबा।अहले हक़ और हक़ की पा माली उन्हें किस क़द्र बे चेन रखती है और वह हर मोड़ पर किस क़द्र वसाइल व असबाब के ख़ाहां रहते हैं।
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की तबीअत व मिजाज और इस्लाम व संयत की तड़प को जिस ने भी पढ़ा है वह यह कैसे मान ले गा कि अकबर के मरने तक आप चुप चाप गो शह तन्हाई
में बैठे रहे और जहा नगीर के बैठते ही आप मैदान में उतर आये।
बाज़ अहले इल्म की ना दानी:
बाज़ मो रुख़ीन ने दर पर्दा अकबर की हिमायत करते हो ए यह साबित करना चा हा है कि अकबर आखिरी वक़्त में बा लकल बदल गया था अगर चह उन मो रुख़ीन ने इस मक़ाम पर हवालों का ऐसे ही सहारा लिया है जैसे डूबने वाला तिनके का सहारा लेता है और यह साबित करना चा हा है कि जहा नगीर का रुख तो ग़ालिब तौर पर इस्लाम की तरवेज व इशाअत की तरफ़ हो गया था जबकि उन ही की तहरीरें हिंदुओं के साथ इस की मसालहत बता ती हैं,अकबरी दौर के उमरा के बारे में उन बाज़ मो रुख़ीन ने उन का कट्टर मुसलमान हो ना और मुख़तलिफ़ बुजुर्गों के हलक़ा इरादत में दाखिल हो ना भी बता या है।
दर असल इस तरह के बाज़ मुअर्रिख़ीन या तो शीया हैं या वहाबी सिवाए मादूदे चंद के,जिन का मबलग़ इल्म ख़ुद उन की तहरीरों से ज़ा हर हैउन्हें तो यह भी पता नहीं है कि अभी हम चंद स्तर पहले किया लिख आये हैं?उन का तो मंशा सिर्फ़ यह है कि अकबर को जिस तरह मिला अब्द उलक़ादिर बदायूनी रहमत अल्लाह अलैहि ने उर्यां कर दिया है उसे छिपा या जाए और हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू का सेहरा तन्हा उन ही के सर न रह्यासी लिए ऐसे मुअर्रिख़ीन कहीं हज़रत बदायूनी को को सुने लगते हैं तो कहीं फलां बुजुर्ग की ख़िदमात बता ने लगते हैं,कहीं किसी अमीर का कारना मुह ज़िक्र करने लगते हैं,यह सब कुछ हालात से ना वाक़फ़ीयत और मख़सूस ज़हनी कैफियत का नतीजा है।
एक गलत फ़हमी का अज़ाला:
आप हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू से पहले सारे मुजदुद्दीन के हालात पढ़ जा ईं उन के जमाने की मजहबी तारीखों का भी मता ला कर लें और गौर करें कि कौन सा ऐसा दर्जा है जिस दौर में का फ़ी बड़ी तादाद में अहले हक़ उलमा,मुहद्दिसीन और मुफ़स्सिरीन वगैरह नहीं रहे
हैं?बुजुर्गों के इर्शादात तो यह बता ते हैं कि हज़रत आदिम अला नबीनावालैय अस्सलात वस्सलाम के तशरीफ़ ला ने के बाद आज तक को ई दौर और वक़्त ऐसा नहीं गुजरा है जिस में दुनिया मुकम्मल ईमान वालों से खाली हो गई हो।
हुज़ूर ख़ातिम उलंबीयन ﷺ की उम्मत में तो हर सदी और हर दौर में अहले हक़ अक्सरीयत में रहे हैं,बड़े बड़े उलमा भी,मुहद्दिसीन,मुफ़स्सिरीन और मुतकल्लिमैन भी,अवाम अक्सरीयत के साथ मजहब हक़ से जड़ी रही इस के बा वजूद भी तजदीदी जरूरतें पेश आती रहीं अक़ूर मुजदुद्दीन पैदा हो ते रहे,जो खिदमतें मुजदुद्दीन ने कीं इस का कुछ न कुछ तसोर और खाका मो जूद रहा,दीगर अहले इल्म व फजल इस ज़रूरत को महसूस भी करते रहे,मगर काम इसी से हुआ जिस से परवरदिगार ने लिया ।
आज इस दौर में कण कण इस्लाहात की ज़रूरत है यह अहले हक़ खूब जा नते हैं और कुछ न कुछ अफराद बह्र हाल रहे हैं जो हक़ को मुकम्मल तौर पर समझते भी हैं और उन की तरवेज व इशाअत की को शिष् भी करते हैं मगर वह को शिष् तजदीद की मंज़िल पर पहुँच जा ए यही नहीं हो पा रहा है।
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू का दौर ऐसा दौर था कि बड़े बड़े सूफ़िया भी थे,उन की खानक़ाहें भी ,का फ़ी वसीअ हलक़ा इरादत भी,अरीज़ रूहानी फ़ैज़ान भी,इसी तरह का फ़ी बड़ी बड़ी दरसगाहें भी थीं,मुख़तलिव उलूम व फ़नून में बड़ी बड़ी अबक़री शख्सियतें भी,कलम के धनी भी थे मगर तजदीद का मन्सब ही और है।
किस दौर में दीनी इन्पतात और दीन का वह किस क़द्र हिस्सा है,इस की तरवेज व इशाअत,इस की बका व तोहफ़्ज़ कैसे हो गा,इस वक़्त लोगों को कैसे फ़ैज़ान की ज़रूरत है उन सब को जान लेना उन की बका व तोहफ़्ज़ के असबाब तलाश कर लेना और फिर उन्हें अपना मर कज़ तवज्जो बना कर उन में नुमायाँ ख़िदमत कर देना यह हर एक से नहीं हो ता है बल्कि यह मुजदुद्दीन ही का हिस्सा
अहम तंबीया:
यहाँ गौर करने और समझने की चीज़ यह है कि उमरा वहकाम का इस दौर में या किसी दौर में बुजुर्गों से ताल्लुक,उन की खानक़ाहों में आमद वरफ़त और मुहब्बत वाकीदत वगैरह अलग चीज़ है और उन्हें इस्लाही कामों के लिए इस्तेमाल करना अलग बात है,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के मक्तोबात जो उन उमरा के नाम लिखे गए हैं वह इस बात की साफ ग़म्माज़ी करते हैं कि आप क़ुद्दिस सिर्रहू अक़ाइद वामाल में उन उमरा की इसलाह भी फ़रमाते थे और उन्हें हुकूमत का रुख इस्लाम की तरफ़ मोड़ने और उन्हें अपने मक़ाम विमन्सब से पूरा पूरा फायदा उठाने के लिए आमादा भी करते थे,जिस हसीन पैराय में आप ने उन की इसलाह फ़रमाई और दीनी हमीयत वग़ैरत बेदार फ़रमाई वह आप ही का हिस्सा है,उन उमरा वहकाम की गलत रोष छुड़ाना और फिर उन से काम लेना जिस खूबी से आप ने यह कारनामा अंजाम दिया है वह लायक तक़लीद है।
दूसरी बात यह कि आम उलमा वस्ल्हा जो दीनी हमीयत वबेदारी रखते थे और अकबर वजहाँगीर के खजानों के लालची न थे उन के बारे में ख़ुद शैख़ मुहम्मद इकराम यों रक़मतराज़ हैं:
‘‘अहद अकबरी में उलमा वस्ल्हा की कोई कमी न थी मुअर्रिख़ीन अहद ने उन की जो तवील फिहरिस्तें दी हैं उन से ख़याल हो ता है कि इस दौर को इल्म और तसव्वुफ़ का अहद ज़रीं समझना चाहिए लेकिन आम तौर पर उन बुजुर्गों ने अहद अकबरी की मजहबी बो उलाजबियों को रोकने के लिए कोई मूसिर कोशिश न की उन में से जो ग़ाली वहद उलवजूदी खयालात के थे(मसला शैख़ अमान पानी पत्ति के क़बीला दार)वह तो अकबर की मजहबी इख़तिराओं में इस के शरीक कार हो गए।जो शैख़ अबदुलहक़ मुहद्दिस देहलवी की तरह उन इख़तिराओं से मुतनफ़र थे वह दरबार से किनारा कश रहे और गोशा तन्हाई में अल्लाह अल्लाह या दर्स वितदरीस करने
लगे,मख़दूम उलमलिक और शैख़ अबदुन्नबी सदरालसदूर को आपस की मुखालिफ़तों और दूसरी कमज़ोरियों ने बे असर करदिया था,जौनपुर के मिला मुहम्मद यज़्दी और पंजाब के उलमा अकबर की ताज़ीरी को शिशों का शिकार हो गए,फ़ित्ने का सिद बाब और हालात की इसलाह किसी से न हो सकी।’’(रूद कौसर स: 192)
तीसरी चीज़ यह कि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू और उन के तमाम अफराद एक मुनज़्ज़म काम कर रहे थे उन की खिदमतें इत्तिफ़ाक़ी नहीं थीं कि जो आज्ञा दामन से वाबस्ता हो गया फ़बहा,यहाँ तो हर एक का इलाक़ा बट्टा हुआ था हर एक की नज़र हर छोटे बड़े पर थी,कण की इसलाह से किया फायदा हो सकता है,किस के इक़तिदार से किस क़द्र दीनी मनफ़ात हासिल हो सकती है यह सब कुछ नज़र में था,फिर एक ख़ास बात यह थी जो सब की असल है कि ख़लवत विजलोत की तमाम साअतों में सुन्नत पर अमल,सुन्नत का ज़िक्र,सुन्नत की तरवेज वाशाअत और इशाअत सुन्नत के लिए दूसरों को आमादा करना,दलों में सुन्नत का दर्द पैदा करना,तमाम कमालात को इसी से वाबस्ता दिखा देना,जो आम मख़लूत तसव्वुफ़ चला आरहा था जिस में अभी तक किया कुछ था इस का मुख़्तसर हाल आप पढ़ चुके और आइंदा पढ़ें गे,मुजद्दिदी फ़र्रज़िंदों के यहाँ इस तसव्वुफ़ का कोई तज़किरा न था यहाँ एक ही तसव्वुफ़ था कि सुन्नत को इस के तमाम खद वख़ाल के साथ ज़ाहिर वबातिन में नाफ़िज़ कर दिया जाए,बिद्दत के तमाम दरवाजे बंद करदिए जाएँ उलग़र्ज़ बात अकीदत विमहबत की नहीं बल्कि इंसाफ की है,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के वजूद से जो कुछ दुनिया को मिला है उसे निहायत गहराई से समझने की ज़रूरत है।
हमें भर पुर एहसास है कि इस मक़ाम पर हमारी गुफ़्तगू का फ़ी तवील हो गई मगर किया करूँ इल्म व तारीख दानी का दावा करने वालों से जो क़ल्ब मजरूह हुआ है इस का मुदावा यही ढूँढा कि तजुर्बात की रोशनी में और मुशाहदात के यक़ीनी मा हौल में हक़ायक़ का इज़हार कर
दिया जाए,बाक़ी फिर हर इंसान की अपनी तबीअत है,किसी शख्सियत के सही ख़ुदू ख़ाल और मुंसिफ़ाना जा ज़ा लेने के लिए क़ल्ब व जेहन का हर आलाइश से पाक होना ज़रूरी है।
तजदीदी काम के मूसिर तरीके:
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की हयात का वह हिस्सा जो तहसील उलूम व फ़नून के बाद का है और जिस पर तजदीदी ख़िदमात का तवील सिलसिला पैदा हुआ है उसे हम तीन हिस्सों में तकसीम कर सकते हैं,एक वह है जो उम्र के अठारहवीं साल से शुरू हो कर हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू की ख़िदमत मुबा रुका तक रसाई का हिस्सा है,हमारे तजुर्बात और इल्म के ऐतबार से इस हिस्सा में ज़्यादा तर काम तजदीद शरीअत का हुआ है,इस में रसाइल व कुतुब की तहरीर,मुनाज़रात व मुबा हस और मवाइज़ व तक़ा रीर के ज़रिया और अपनों से रवाबित और उन्हें हम ख़याल बना ने,उन्हें हत्ता अलोसा इस्तेमाल कर ने और इल्म व फन के ऐतबार से अपने आप को पहुचनवाने और मनवाने में सिर्फ़ हुआ है,यह इबतिदाई दर्जे की ख़िदमात थीं जो रफ़्ता रफ़्ता कुव्वत पकड़ रही थीं जैसा कि आप पढ़ चुके।
दूसरा हिस्सा चंद साला वह हैजो हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू की लिक़ा से ले कर उन के विसाल तक है,इस अरसा में ज़्यादा तर औकात बा तनी कमालात की तहसील और शरई ख़िदमात में बसर हो ए,हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू के दामन से वाबस्ता हो ने के कुछ अरसा बाद ही आप तालिबान ख़ुदा की तरबीयत के ला क़ हो ग्ये और रफ़्ता रफ़्ता पो री तेजी से यह काम बढ़ने लगा हत्ता कि आखिरी लम्हात में हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू ने अपना पूरा रूहानी तरबीयत का बार हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के का निधों पर डाल दिया और ख़ुद रफ़ीक आला के हुज़ूर में जा ने की तैयारी में मुकम्मल तौर पर लग ग्ये।
तीसरा दौर वह है जो हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू के विसाल के बाद से आखिरी लम्हात तक है,यह ज़माना आप के ज़ाहिरी वबा तनी उरूज व इर्तिक़ा और तजदीदी ख़िदमात के शबाब
का ज़मा न है इस में हर किस्म की तजदीद का काम शुरू हो रहा था और योमा फ्यूमा कमालात जदीदा का फ़ैज़ान इस क़द्र उरूज पर था कि बयान से बा हर है,इस दौर में दाखिल हो ते हो ते आप के पास ज़ाहिरी व बा तनी वसाइल का ज़ख़ीरा हो चुका था और ‘‘यदालवन फ़ी दीन अल्लाह अफ़्वाजा’’की जलवा गिरी हो रही थी,दुनिया की व सतों में काम फैलाने लगा था,गैर मुनक़सिम हिंदोस्तान की सरहदें आप की ख़िदमात पा र कर चुकी थीं।
आप के हालात पर नज़र डालने से पता चलता है कि आप ने इस भयानक दौर में तूफान का रुख मो ड़ने के लिए जो वसाइल तैयार किए वह आप के तैयार करदा निहायत जा मा अलसिफ़ात अफराद थे जो ज़ाहिरी व बा तनी मुहासिन व औसाफ़ से आरास्ता और आप की मुनज़्ज़म ख़िदमत से मुकम्मल आगाह और मक़सद व मंशा और काम की अहमियत से अच्छी तरह वाकिफ़ कार थे।
तजदीद शरीअत:
तहरीर वितकरीर और ज़ाहिरी वबातिनी औसाफ़ वफ़ज़ाइल से आरास्ता हो कर आप मैदान जिहाद में उतर पड़े,हालात का बड़ी संजीदगी के साथ जायजा लिया और फिर ख़िदमत सुन्नत ही को अपना बुनियादी महवर बनाया यही वह चीज़ थी कि अमल वेतिक़ाद की दुनिया में इस के नफ़ाज़ से बिद्दत को ख़त्म किया जा सकता था,सर्वर कोनेन ﷺ ने इसी के ज़रिया अपने गुलामों को सारे कमालात अता फ़रमाए, इस दौर में हर तरफ़ से इसी पर हमले थे,जबकि सब की जान और बुनियाद सुन्नत पर अमल ही था,इसी को मरकज़ बना कर आप पूरे तौर पर इसी की इशाअत में लग गए,इस सिलसिले में जो भी मूसिर तरीके हो सकते थे आप ने उन को अपनाया और उन तमाम चीजों का खातमा करते रहे और उन्हें राह से हटाते रहे जो रुकावट बिन सकती थीं,हिक्मत विम्वाज़त एक दाई हक़ के लिए लाजिमी चीजें हैं बग़ैर उन के कभी भी पुख्ता नताइज बरामद नहीं होते हैं,अल्लाह तआला ने इस सिलसिले में भी आप को कमाल अता फ़रमाया
था,आप देखते जाएँ कि तन तन्हा इस मर्द हक़ आगाह ने इतना बड़ा काम कैसे अंजाम तक पहुँचाया।
आप ने सब से पहले जानबाजों की वह जमात तैयार करना शुरू की जो उन तमाम इल्मी वामली और ज़ाहिरी वबातिनी खूबियों से आरास्ता थी,जिस की आप को इस अज़ीम काम में ज़रूरत थी और जिस को आप एक अज़ीम असलाह के तौर पर इस्तेमाल कर सकते थे ।