अध्याय 41 में से 57पृष्ठ 560–571
उलूम गैर नाफ़ा
दुनिया और अहले दुनिया की मुज़म्मत बयान करने के बाद दुनिया किसे कहते हैं और दुनिया के माना बयान करते हुए मक्तूब 73 में फ़रमाते हैं:
‘‘आँचा तरा अज़ हक़ तआला बाज़ दारद पस अज़ ज़िन वफ़रज़नद विमाल वजाह विरियास्त विल्हो विलाब वाशतग़ाल बिमा ला यानी हिम्मा दाखिल दुनिया अस्त।इलूमे कि ब आख़िरत कार न्यायनद हम अज़ दुनिया इंद अगर तहसील नुजूम विमंतिक़ विहिंदसा वहिसाब वामिसाल आंहा अज़ उलूम ला ताइल बकार मि आयेद फिलासफा अज़ अहले निजात मि बोदनद,क़ाल अलैहि अस्सलात वस्सलाम अलामत आराज़ा तआला अन अलाबद इश्तग़ाला बिमा ला यानी।’’
तर्जुमा: जो चीज़ अल्लाह तआला से दौर करे वह दुनिया है, लिहाज़ा बीवी, बचे, माल व जाह, इक़तिदार व रियासत, लहू व लिएम और गैर ज़रूरी काम सब दुनिया में दाखिल हैं, इसी तरह वह उलूम जो आख़िरत में काम न आएं, वह भी दुनिया में शुमार हूँ गे, अगर इल्म नुजूम, मंतिक़ हिंदसा और हिसाब वगैरह की तहसील कार आमद होती तो फिलासफा निजात याफताह होते। प्यारे आका ﷺ ने फ़रमाया: बंदा से अल्लाह के आराज़ की अलामत यह है कि बंदा लायानी काम में मशगूल हो जाए।
कुछ लोगों ने इल्म नुजूम सीखने की ज़रूरत यों बयान की कि इस के ज़रिया औकात
नमाज़ की मार्फत होती है आप ने इस को यों रद्द फ़रमाया कि यह मत कहिये कि बग़ैर इल्म नुजूम के औकात नमाज़ पहचाने नहीं जा सकते हैं बल्कि औकात नमाज़ की मार्फत के जो तरीके हैं उन में से एक यह भी है,फिर फ़रमाते हैं कि‘‘ बहुत से लोग हैं कि इल्म नुजूम से कुछ नहीं जानते हैं और औकात नमाज़ को नुजूम के आलिमों से बेहतर पहचानते हैं।’’
इसी तरह का एक हीला लोगों ने तहसील मंतिक़ वहिसाब के सिलसिले में भी गढ़ा था कि फ़ी अलजुमला दर बाज़ उलूम शरएहि दरका रांद, हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं:
‘‘बालजुमला बाद अज़ तमहलात बसयार वजह जवाज़ अज़ बराए इश्तग़ाल बायं उलूम पैदा मि शव्द अम्मा अगर मकसूद अज़ ख़वानदन अनहा गैर अज़ मार्फत अहकाम शरएहि वितक़वियत अदल्ला कलामीया उमरे दीगर नबाशद वाला ला यजोज़ असला’’
तर्जुमा: हासिल यह कि उन उलूम के जवाज़ के लिए बड़े तकल्लुफ़ात किए गए हैं, लेकिन अगर उन उलूम के पढ़ने से मकसूद अहकाम शरएहि की मार्फत और इल्म कलाम की दलीलों को तक़वियत देने के अलावा जो भी ही नाजायज़ है।
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की मुजददाना बसीरत ऐसी न थी कि यह दाओ पेच आप को मुतमइन कर सकते,आप खूब जानते थे कि उन उलूम से किया हासिल है इसी लिए आप ने जवाज़ मुनहसिर फ़रमादिया कि अहकाम शरएहि वेतिक़ादिये की मार्फत वित्तायद के वास्ते हूँ तो वजह जवाज़ निकल सकती है वर्ना नहीं मगर यह नुक्ता भी साथ में तलक़ीन फ़रमाते हैं कि:
‘‘इंसाफ बायद कुर्द इर्तिकाब अम्र मुबाह कि मुस्तलिज़्म फ़ौत उमूर वाजिबा बाशद अज़ हद अबाहत बुर मि आयेद या न? शक नेस्त कि इश्तग़ाल ब एं मुफ़ूत इश्तग़ाल बालूम शरएहि जरूरीया अस्त।’’
आज असरी उलूम वफ़नून के दिलदादा इस मर्द हक़ आगाह के मबनी बुर हक़ीक़त कलाम को पढ़ें और गौर करें कि जिस चीज़ को वह कामयाबी तसोर कर रहे हैं वह उन्हें कहां ले जा रही है,हक़ीक़त यह है कि दुनिया की मुहब्बत और लालच ने दलों में इस क़द्र घर कर लिया कि अब
हर चीज़ में मादी मनफ़ात मतलूब हो गई,जहां यह मनफ़ात नज़र आई इसी की तहसील ज़रूरी हो गई।
आज अंग्रेजियत को जो फ़रोग़ हुआ और हो रहा है इस की ख़ास वजह यही है,इस में वह इज्जत वजाह,दुनयवी मनासिब का हुसूल और शादी ब्याह की कामयाबी देख रहे हैं फिर सितम यह कि हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू तो उन उलमा को रो रहे हैं जो उलूम दयनीय से भी वाकिफ़ थे मगर उन का इन्हिमाक वाशतग़ाल उन उलूम ला यानी से था और यहाँ तो नौबत यह पहुँच गई है कि अब सिर्फ़ असरी उलूम वफ़नून ही हैं,इस्लामी तालीम तो बिलकुल रुखसत हो गई,अब उदारे,कालिज और यूनिवर्सिटीयां सिर्फ़ इसी लिए हैं और इसी पर कौम नाज़ां वफ़रहाँ है जबकि इस के मक़ासिद अजहर मिन अश्शम्स हैं।
हैरत तो यह है कि दीनी तालीम उन की नज़र में बे कार और बे फायदा होगई,इस के पढ़ने वाले हक़ीर,इस के उदारे हक़ीर जबकि दुश्मनान इस्लाम की इस तालीम में नामालूम कितनी दौलत खर्च कर रहे हैं,यह अंग्रेज़ दोस्ती इस्लामी तालीमात के लिए सब से बड़ा आजार साबित हुई,इस ने इस्लामी उलूम वफ़नून को ख़त्म सा करदिया जिस के नतीजे में बिलआख़िर वह सारी बुलाएं और मुसीबतें आगईं जो जहालत वनादानी से आ सकती थीं।
हैरत बालाए हैरत यह कि पढ़े लिखों की वह कौम जिन्हें अवाम अपना रहबर समझती है,जिन को अपनी नोक पलक को बे पनाह दुरुस्त रखना चाहिए उन में ख़ुद अंग्रेजियत नवाजी का शौक बढ़ता जा रहा है,अफसोस सद अफसोस! गुलशन इस्लाम ख़ुद मुसलमानों ही के हाथों किस क़द्र उजड़ता जा रहा है काश! लोग समझें और बे होशी छोड़ कर अक्ल विशऊर का दामन पकड़ें,यह महल इस मौज़ू पर तफ़सील से गुफ़्तगू करने का नहीं इस लिए इतने ही पर इकतिफ़ा किया जाता है।
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू जहां उन उलूम वफ़नून की क़बाहतें बयान करते हैं वहीं
दोनों जहान की फ़लाह वबहबूद के ज़ामिन उलूम को जगह जगह लाज़िम और ज़रूरी करार देते हैं,कौन कौन से उलूम किस लिए ज़रूरी हैं इस सिलसिले में चंद इक़तिबासात मुलाहिजा हूँ:
(1)‘‘कार एनसत कि ओला तसहीह अक़ाइद बुर वफ़क़ आरा उल्मा अहले सुन्नत विजमाअत कि फ़िर्क़ा नाज्य इंद बायद कुर्द सानिया इल्म वामल बमुक़्तज़ाए अहकाम फ़िक़हय लाज़िम बायद साख़त बाद अज़ तहसील एं दो जिनाह एतिक़ादी वामली क़सद तैरान आलम क़ुद्दिस बायद नमूद।’’(मक्तूब 91 जिल्द 1)
तर्जुमा: काम यह है कि सब से पहले अहले सुन्नत व जमात के उल्मा जो कि फ़िर्क़ा नाज्य हैं की राय के मुताबिक अक़ीदा की तसहीह कर ली जाए, दूसरे यह कि इल्म व अमल को अहकाम फ़िक़हय के मुताबिक होना चाहिए, एतिक़ादी व इल्मी के उन दोनों परों को हासिल करने के बाद आलम क़ुद्दिस की तरफ़ परवाज़ करना चाहिए।
(2)‘‘नकद सआदत दारेन मनोत बमताबेत सय्यद कोनेन अस्त अलैहि वाला आला मिन अस्सलवात वालतसलीमात उतमहा वाकमल्हा बुर नहजीका उलमा-ए अहले सुन्नत शकर अल्लाह तआला सएहम बयान फर्मौदा इंद ओला तसहीह अक़ाइद बमुक़्तज़ाए आरा ए साइबा एं बुज़ुर्गवारां बायद कुर्द वसानियन इल्म हलाल वहराम वफ़र्ज़ विवाजिब वसंत विमंदूब विमबाह विमुश्तबा हासिल बायद नमूद वामल बमुक़्तज़ाए एं इल्म नीज़ दरकार सत।’’(मक्तूब 75 जिल्द 1)
तर्जुमा: दोनों जहां की सआदत हुज़ूर ﷺ की ऐसी पैरवी पर मुनहसिर है, जिसे उलमाए अहले सुन्नत ने बयान फ़रमाया है, सब से पहले उन बुजुर्गों की दुरुस्त राय के मुताबिक अकीदे को दुरुस्त करना चाहिए, दूसरे यह कि हलाल, हराम, फर्ज़, वाजिब, सुन्नत, मंदूब, मुबाह और मुश्तबा का इल्म हासिल कर के इस के मुताबिक अमल करना चाहते।
(3)‘‘आयत करीमा: विमाۤ इआतायकम अलरेसोۡल फ़ख़ज़ोۡह ۚ विमा नहईकम अन्ना फ़ानۡतहोۡअ ज़िक्र करके फ़रमाते हैं :‘‘मदार निजात बुर दो चीज़ आमद इम्तसाल अवामिर वान्तुहा अज़ नवाही विमाज़म तरिन एं दो जज़ जुज़ु अख़ीर अस्त कि माबर बोरा वितक़्वा अस्त।’’
तर्जुमा: निजात दो चीजों पर मुनहसिर है एक अवामिर की बजा आवरी और दूसरी नवाही से इजतिनाब। मगर उन दोनों में अहम दूसरी यानी नवाही से इजतिनाब है, जिसे वरा और तक़्वा से ताबीर किया जाता है।
फिर वरा वितक़्वा की अहमियत एक हदीस पाक से वाज़िह करने के बाद फ़रमाते हैं:
‘‘वफ़ज़ीलत इंसान बुर मुल्क अज़ीं जुज़ु मुतहक़्क़ अस्त वतरक़ी बुर मदार क़ुर्ब हम अज़ीं जुज़ु साबित मि शव्द चह मलाइक दर जज़ अव्वल मुशारकंद वतरक़ी दर ईशां मफ़क़ूद अस्त पस रियायत वरा वितक़्वा अज़ अहम महाम इस्लाम आमद अज़ अशद जरूरीयात दीन।’’
तर्जुमा: फरिश्तों पर इंसान की फ़ज़ीलत इसी चीज़ (नवाही से इजतिनाब) की वजह से है। ऐसेही क़ुर्ब में तरक्की भी इसी लिए साबित है, इस लिए कि पहले (अवामिर की बजा आवरी) में तो फरिश्ते ख़ुद ही शरीक हैं। इस लिए इस में तरक्की मफ़क़ूद है, इस से साबित हुआ कि वरा व तक़्वा की रियायत निहायत अहम और दीन की शदीद जरूरतों में से है।
इस के बाद फिजूल मुबाहात से इजतिनाब विपरहेज़ पर ताकीद फ़रमाते हैं क्योंकि मुहरमात से मुकम्मल तौर पर बचाव उन के बचाव के बग़ैर नहीं हो सकता है इस के बाद यों रकम तराज़ हैं:
‘‘वाजितिनाब अज़ मुहरमात नीज़ बुर दो किस्म अस्त किस्मी अस्त कि बहुक़ूक़ अल्लाह सुब्हानहू ताल्लुक दारद वक़्स्मी अस्त कि बहुक़ूक़ इबाद मुताल्लिक़ अस्त वरायत किस्म सानी अहम तर अस्त,हक़ सुब्हानहू व तआला ग़नी मुतअल्लिक़ अस्त वारहम अलराहमीन वाबाद फ़िक़रा विमहताजानंद वबालज़ात बख़ील विलिएम इंद,’’(ईजा)
तर्जुमा: मुहरमात से बचने की भी दो किस्में हैं। एक किस्म अल्लाह सुब्हानहू व तआला से मुताल्लिक़ है, और दूसरी किस्म हुक़ूक़ उलईबाद से मुताल्लिक़ है, दूसरी किस्म की रियायत ज़्यादा
अहम है, इस लिए कि अल्लाह तबारक व तआला अरहम अलराहमैन है और बंदे बा लजात फ़क़ीर, मुहताज, बख़ील और लएम हैं।
यह चंद इक़तिबासात ह्दय नाज़रीन हैं जिन से मालूम हुआ कि अक़ाइद अहले सुन्नत और अहकाम फ़िक़हय का इल्म ज़रूरी है मुहरमात की तफ़सीलात नीज़ हुक़ूक़ अल्लाह और हुक़ूक़ उलईबाद का जानना भी अशद ज़रूरी है,इस के साथ साथ यह भी मालूम हो अ कि उन अमोर्का भी इल्म ज़रूरी है जिन से वरा वितक़्वा का ताल्लुक है,राह सुलूक में क़दम रखने से पहले अक़ाइद वामाल वगैरह का इल्म ज़रूरी है फिर ख़ुदावंद क़ुद्दूस तौफ़ीक़ दे तो आलम क़ुद्दिस की तरफ़ परवाज़ करे जिस के लिए इल्म तसव्वुफ़ भी ज़रूरी है यही वह उलूम हैं जिन से सआदत दारेन वाबस्ता और उखरवी निजात उन्हें पर मुनहसिर है,जो इल्म विरासत अनबीए कराम अलैहिम अस्सलात वस्सलाम है वह यही है।
अब आप ठंडे दिल से सोचें कि असरी उलूम वफ़नून की तो इतनी लग्न है कि कामयाबी की हर राह इसी पर मुनहसिर नज़र आ रही है मगर हक़ीक़ी का मयाबी और अब्दी फ़लाह जिस से वाबस्ता है इस की कोई फ़िक्र नहीं है,फिर जो हासिल भी करते हैं वह भी ना तमाम ख़ास कर नफ़्स के तज़किया और क़ल्ब के तसफ़ीया से मुताल्लिक़ जो इल्म है इस का एहसास भी नहीं,हमारे उलमा-ए कराम में आज कितनी ज़ाहिरी वबातिनी ख़ामियां और कोताहियां हैं जिन की वजह से मुआशरा में तरह तरह की बुराइयां नमूदार हो रही हैं,वह उन्हें उमूर से नादानी और अदम वाक़फ़ीयत की वजह से है,हक़ीक़त यह कि कोई इंसान उन उलूम और उन पर अमल के बग़ैर कामिल इंसान नहीं बिन सकता है,यह एक अलाहदा बहस है जिस पर तफ़सील सेरोशनी डालने के लिए एक अलाहदा किताब की ज़रूरत है।
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की बसीरत अच्छी तरह जानती थी कि उलूम इस्लामीया(तफसीर,हदीस।फ़िक़्ह और उन से मुताल्लिक़ा उमूर) के अलावा जितने भी उलूम हैं उन से
दीन वदुनिया की कवि ग़रज वाबस्ता नहीं उन की वजह से ज़िन्दगी का सफर तवील तर होता है,फ़िक्र वनज़र की सारी तवानाइयां बे महल खर्च होती हैं,उन की गुथियां सुलझाने में इंसान को जो दिमागी मेहनत करनी पड़ती है वह अगर उलूम दयनीय में खर्च की जाए तो उलूम इस्लामीया को फ़रोग़ हासिल होगा,इस्लामी शौकत बढ़े गी,कुरआन वसंत की इशाअत होगी,कुरआन वसंत के बह्र बे करां से वह मिसाइल वाहिकाम बरामद हूँ गे जो जमाने की जरूरतें पूरी करें गे,अमल के जज़्बात उभरें गे,अनिवार सुन्नत से क़ल्ब विजगर रोशन हूँ गे,चेन विस्कोन की दौलत बे बहा हाथ आये गी,शब् विरोज़ ज़िक्र विबादत में शुमार हूँ गे,अल्लाह तआला और इस के रसूल ﷺ से राबिता वितालक़ मजबूत होगा और नफ़्स अनानीयत से बचे गा।
हक़ीक़त यह है कि आज भी हर आक़िल जानता है कि इस में(दुनियावी तालीम में) किसी तरह कामयाबी नहीं है,रज्जाक अल्लाह तआला है वह असरी उलूम वफ़नून के बल बूते पर रोज़ी नहीं देता है,अगर हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की रहनुमाई को अपना या जाता तो हम हक़ीक़ी नेअमतों से महरूम न होते,आज हमारे सामने सही इस्लामी तारीख है,हमारी सारी फतेह वकामरानी हमारे इस्लामी ताल्लुक और मजहबी पुख्तगी के सर है मगर हम ने उन वादियों में भटक कर अपना सब कुछ गंवा दिया मूलए क्रीम अक्ल सलेम अता फ़रमाए ताकि फिर से कामयाबियां हाथ आएं।
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने जो कुछ लाइहा अमल पेश किया वह सिर्फ़ कौल और तहरीर तक न था बल्कि आप ने अपने अफराद की इस मुतय्यना निजाम पर मुकम्मल तरबीयत फ़रमाई और ज़ाहिर वबातिन के उलूम से आरास्ता जमात तैयार की और फिर वह कुछ कर गए जो हजारों मिल कर भी न कर सकते थे,आप तफ़सील से पढ़ चुके हैं कि वहाँ असल तहरीर न थी बल्कि आप नैसब कुछ अमला कर के दिखा दिया और मुनज़्ज़म तहरीक चलाई जिस की वजह से सालिह निजाम और मुआशरा
वजूद में आया और वह रोशनी दुनिया के कोने कोने में फैल गई।
तरदीद रफ़्ज़ वख़रोज:
दूसरा गिरोह जो मजहब अहले सुन्नत विजमाअत को सब से ज़्यादा नुकसान पहुँचा रहा था वह रवाफ़िज़ का था,हिंदोस्तान में उन की आमद और फिर हुकूमत पर उन का तसल्लुत पिछले सफ़हात में हम मुख़्तसरा बयान कर चुके हैं जिस से आप बखूबी अंदाजा लगा सकते हैं कि इस की ज़रब कितनी कारी थी और हुकूमत विसियासत और मादी ताकत के बल बूते पर यह किया किया गुल खुला रहे थे,जो हालात पैदा हो गए थे और यह बद मजहब जिस तरीके से सरायत कर रहे थे इस से कोई भी आक़िल और ज़ी इल्म ना वाकिफ़ न था।
उन लोगों ने अपनी जो अहमियत पैदा कर ली थी इस से हर कोई ख़ाइफ़ विमुतास्सिर हो सकता था मगर हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू जैसा निडर मुजाहिद उन बातिल ताकतों के सामने कैसे सर नगों हो सकता था, इस के बुर खिलाफ़ आप ने उन्हें हर मोड़ पर ललकारा,मुनाज़रों और मुबाहिसों में उन्हें जगह जगह शिकस्त दी,मुख़तलिफ़ महफिलों और दीनी मजलिसों में ख़ुद जा जाकर उन के अक़ाइद वंज़रियात की किलई खोलते, दरसगाह में तलबा के सामने उन की तरदीद में तकरीर करते,दलायल वबराहीन के ज़रिया उन का रद्द बलेग़ फ़रमाते इस पर भी आप की एमानी ग़ैरत और इस्लामी हमीयत का कलेजा ठंडा न हुआ तो आप ने आगाज़ जवानी में इस फ़िर्क़ा ज़ाला के खिलाफ़ एक रिसाला बनाम‘‘रद्द शीया’’ तहरीर फ़रमाया,जिस का मुख़्तसर हाल आप पढ़ चुके।
जिस जमाने में इस मर्द हक़ आगाह ने शीयों के खिलाफ़ निहायत शिद्दत के साथ आवाज़ बुलंद फ़रमाई यह वह दौर था कि बड़े बड़े उलमा अगर शीयों की मुआफ़िक़त न कर रहे थे तो कम अज़ कम ख़ा मोश जरूर हो गए थे और ऐसा भी हुआ कि कुछ बुजुर्गों ने तौरया जैसी सूरत अपना ली कि इस अंदाज़ में किताबें तसनीफ़ फरमाएं जो मजहब अहले सुन्नत के माफ़िक़ मगर शीयों को खुश करने वाली थीं,मगर आप की रोष सब से अलग थी मैदान कारएज़ार का
यह सिपाही दीवाना वार हर हमले का दिफ़ा करता और फिर अपनी तरफ़ से वार करता।
कभी तौहीद पर हमला होता,कभी नुबुव्वत पर,कभी हज़रत अबू बुकर वामर वासमान रज़ि अल्लाह अन्हुम की इज्जत वहरमित पर,कभी हज़रत सीदतना आयशा सिद्दीक़ा रज़ि अल्लाह तआला अन्हा पर,कभी हज़रत तलहा वज़बेर और कभी हज़रत अमीरमुआवीया और कभी सारे सहाबा कराम रिज़वान अल्लाह अलैहिम अजमईन पर मगर यह सब का चहेता बे झिजक किसी भी ताकत वक़्व्वत की प्रवाह किए बग़ैर रात दिन जिहाद करता रहा बाला ख़र सब को सिवाए फरार के कुछ नज़र न आया और इस शेर हक़ के सामने कोई डट न सिक्का फ़िल्ला अलहम्द।
रिसाला रद्द शीया में आप ने उन के फ़िरक़े उन के अक़ाइद और फिर उन की तरदीद निहायत मुदल्लिल अंदाज़ में फ़रमाई ,इस के अलावा मुतअद्दिद मक्तोबात क़ुदसी आयात में ख़ास कर उन मौज़ूआत पर कलम उठाया,ख़ास कर तबका उमरापुर चूंकि इस के असरात ज़्यादा मुरत्तिब हो रहे थे लिहाज़ा उन के नाम मक्तोबात में यह रंग ज़्यादा ग़ालिब है।
आप की तबीअत शुरू ही से बहुत हस्सास और ग़ैरत मंद वाक़्य हो ई थी और चूंकि जहांगीर के दौर में दीन कोसब से ज़्यादा खतरा इसी फ़िर्क़ा से था और इस बात का बहुत कुछ इमकान पैदा हो गया था कि बादशाह उन के मजहब से वाबस्ता हो जाता,अकबर के दीन इलाही से ज़्यादा बुरे असरात अवाम वख़वास पर इसी के मुरत्तिब होने के इमकानात थे,यह जिस रूप में हिंदोस्तान आया था और जो तलबीसात रखता था वह लोगों के भटकने के लिए बहुत काफ़ी थीं,इसी लिए आप ने आगाज़ ही में इस की तरदीद को सब से अहम ज़रूरत महसूस किया।
आप जब तक हज़रत ख़्वाजा बाक़ी बिल्लाह क़ुद्दिस सिर्रहू की ख़िदमत में न पहुँचे थे इस वक़्त तक तकरीर वितहरीर का ढंग आलिमाना माकूल वमनक़ूल के ज़रिया अरबी वफ़ारसी ज़बान में रद्द फरमाता रहा,मगर हज़रत ख़्वाजा क़ुद्दिस सिर्रहू की नवाज़िशात वानायात के बाद इस में
एक निया रंग आज्ञा कि जहां आप उन के अक़ाइद बातिला का रद्द कुरआन वसंत और माकूल दलायल की रोशनी में फ़रमाते वहीं कश्फ़ विषहूद के ज़रिया उन (माकूल व मनक़ूल दलायल) की ताईद फ़रमाते,अज़मत सहाबा वख़ल्फा ए राशिदीन जहां आप आयात वाहादीस के ज़रिया बयान फ़रमाते वहीं उन की अज़्मतों वर्फ़ातों के डंके मुशाहदात सहीहा के ज़रिया बजाते।
ख़ुलफ़ाए राशिदीन की अफ़ज़लीयत,अज़मत सहाबा कराम वाहिल बीत अजाम रज़ि अल्लाह तआला अन्हुम के सिलसिले में जो मौक़िफ़ उलमा-ए अहले सुन्नत विजमाअत का शुरू से रहा है आप ने अपने कश्फ़ के ज़रिया इस की भर पुर ताईद फ़रमाई,यहाँ यह बात भी जेहन में रखने की है कि कुछ वजूहात की बना पर ख़ुद औलीए कराम रहिमहुम अल्लाह के मक्शफ़ात ऐसे वाक़्य हो रहे थे जो बजाहिर शीयों के मवेद थे यह और भी ज़्यादा मुज़िर और नुकसान दह थे,इसी लिए आप ने कश्फ़ विषहूद को दखल दे कर एक तो उन बुजुर्गों के कश्फ़ विषहूद की रसाई खोल दी कि कहां तक है।
दूसरे यह भी बता दिया कि शीया हज़रात हज़रत अली कर्म अल्लाह वजहा उलक्रीम और उन के ख़ानवादे से उलफ़त विमहबत के जुबानी दावे कुछ भी करें मगर जितनी गहराई से उन की अज़मतें वर्फातें हम जानते हैं और उन को जितना हम पहुचा नते हैं तुम शीया नहीं,जिस शान से आप ने उन बुजुर्गों के फ़ज़ाइल वुमनाक़िब बयान किए हैं और जो हैसियत वाक़ई हर एक को अता की है इस में को ई भी आप का साझी वशरेक नहीं न पहले और न बाद,तजदीद का यह गोशा मामूली नहीं है इस तरह आप ने उलमा वस्लहाए उम्मत के सही मौक़िफ़ की ताईद करके क़ारी के इतमीनान क़ल्ब का सामान फ़राहम करदिया,अब आप चंद इक़तिबासात क़दरे तफ़सील से मुताला फरमाएं:
पहले तो आप हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की जुबानी यह समझ लें कि र फ़िज़ किया है और
ख़ुरूज किया? और उन के मुकाबले में तसंन किया है?
(1)‘‘निजाबत आसार! मिन अलामात अहले अलसन वालजमा तफ़ज़ील उलशेख़ीन विमहब उलख़तनियन,तफ़ज़ील शेख़ीन कि बा मुहब्बत ख़तनीन जमा शव्द अज़ फ़ज़ाइल अहले सुन्नत विजमाअत अस्त।’’
तर्जुमा: निजाबत आसार! शेख़ीन को दीगर सहाबा पर फ़ज़ीलत देना और हज़रात उसमान व अली की मुहब्बत अहले सुन्नत व जमात होने की अलामत है। लिहाज़ा तफ़ज़ील शेख़ीन और ख़तनीन (दामादों यानी हज़रत उसमान व अलीरज़ि अल्लाह अन्हुमा) की मुहब्बत अहले सुन्नत व जमात की फ़ज़ीलतों में से है।
आखिर में तफ़ज़ील पर तफ़सील से बहस करते हुए फ़रमाते हैं:
‘‘पस मुहब्बत हज़रत अमीर शर्त तसंन आमद वांका एं मुहब्बत नदारद अज़ अहले सुन्नत विजमाअत खारिज गश्त वख़ारजी नाम याफत वांका दर मुहब्बत अमीर तरफ़ इफ़रात इख्तियार कुर्द वज़्यादा अज़ आँचा शायद बौक़ूअ आवर्द वग़ुलो दरआँ मुहब्बत नमूद व बसब वतान अस्हाब खैर अलबशर अलैहि वालैहिम अस्सलात वस्सलाम ज़बान किशोद वितरक तरीक़ सहाबा विताबईन वसल्फ सालहीन रिज़वान अल्लाह तआला अलैहिम अजमईन कुर्द राफ़िज़ी नाम याफत।’’
तर्जुमा: हज़रत अली की मुहब्बत सन्नी होने के लिए शर्त है, जिस में हज़रत अली की मुहब्बत नहीं वह अहले सुन्नत से खारिज हुआ। लिहाज़ा ख़ारिजी कहलाया। और जिस ने हज़रत अली रज़ि अल्लाह अन्हु की मुहब्बत में इफ़रात से काम लिया और हद से ज़्यादा और ग़ुलू कर बैठा और साथ ही साथ सहाबा कराम रिज़वान अल्लाह अलैहम अजमईन को सब व शतम अवरलान तान करने लगा। और सहाबा ताबईन व सल्फ सालहीन के तरीके को छोड़ दिया इस का नाम राफ़िज़ी पड़ गया।
फिर फ़रमाते हैं:‘‘पस अहले सुन्नत मुतवस्सित हैं दरमियान इफ़रात मुहब्बत अमीर और दरमियान इस मुहब्बत की तफ़रीत के कि राफ़िज़ियों और ख़ारिजियों ने इख्तियार की है और शक नहीं कि हक़ दरमियान में है और इफ़रात(ज्यादती) और तफ़रीत(कमी)दोनों मज़मूम जैसा
कि इमाम अहमद हनबल ने हज़रत अमीर से रिवायत करते हुए फ़रमाया कि हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया कि तुम्हारी मिसाल ए अली! ईसा जैसी है उन को यहूद ने दुश्मन रखा यहाँ तक कि उन की मां पर बोहतान लगाया और नसारा ने दोस्त रखा यहाँ तक कि उन को इस मंज़िल पर ले आये कि जो वह नहीं रखते थे यानी इब्न अल्लाह कह दिया,इस के बाद हज़रत अमीर ने फ़रमाया कि मुझ में दो किस्म के लोग हलाक हुए एक वह जिन्हों ने मेरी मुहब्बत में ज्यादती की और जो कुछ मुझ में नहीं है साबित किया और दूसरा वह जो मुझ से दुश्मनी करे और दुश्मनी में मुझ पर बोहतान रखा,पस ख़ारिजियों के हाल को यहूदियों से तशबीया दी और हाल रवाफ़िज़ को नसारा के अहवाल से कि दोनों हक़ वस्त से दो जानबों में जा पड़े।’’
राफ़िज़ियों और शीयों ने अपने आप को इस तरह पेश किया है कि गोया अहले बीत से मुहब्बत सिर्फ़ उन्हें को हासिल है अहले सुन्नत को नहीं,आप फ़रमाते हैं:
‘‘वह बड़ा नादान है जो अहले सुन्नत विजमाअत को महबान हज़रत अमीर से न जाने और मुहब्बत को रवाफ़िज़ के साथ मख़सूस जाने,मुहब्बत अमीर रफ़्ज़ नहीं है,ख़ुलफ़ाए सलासा से तबरा रफ़्ज़ है और सहाबा कराम से बेज़ारी मज़मूम और काबिल मलामत है।’’
फिर आप ने तफ़सील से साबित किया कि अहले सुन्नत को ही सही मुहब्बत अहले बीत हासिल है और किसी को नहीं।