अध्याय 42 में से 57पृष्ठ 571–593
मुहब्बत अहले बीत
मुहब्बत अहले बीत के फ़वाइद वसमरात बयान करते हुए फ़रमाते हैं:‘‘यह कैसे गुमान किया जा सकता है कि अहले सुन्नत को अहले बीत से मुहब्बत नहीं क्योंकि यह मुहब्बत ईमान काजिज़ है और सलामती खातमा को इस मुहब्बत के रसूख से वाबस्ता किया है,इस फ़क़ीर के वालिद बुज़ुर्गवार(मख़दूम अब्द अलाहद क़ुद्दिस सिर्रहू) कि इल्म ज़ाहिर वबातिन के आलम थे,अक्सर औकात अहले
बीत की मुहब्बत की तरग़ीब फ़रमाते और फ़रमाते थे कि इस मुहब्बत को सलामती खातमा में दखल अज़ीम है,इस की हिफाज़त करनी चाहिए,उन के मर्ज मौत में यह फ़क़ीर हाजिर था जब आप का मामला आ ख़र को पहुँचा और इस आलम का शऊर कम रह गया,फ़क़ीर ने इस वक़्त में उन की बात को याद दिलाया और इस मुहब्बत के बारे में पूछा?
इस बे ख़ुदी के बारे में फ़रमाया कि में अहले बीत की मुहब्बत में गर्क हूँ,अल्लाह इज़ विजल का शकर बजा लाया गया,मुहब्बत अहले बीत ,अहले सुन्नत का सरमाया है मुख़ालिफ़ इस चीज़ से गाफिल हैं और उन की मुतवस्सित मुहब्बत से जाहिल।’’
फिर आप ने अहले बीत की मुहब्बत के सिलसिले में खूब खबर ली है,चंद इक़तिबासात पेश ख़िदमत हैं:
(1)मक्तूब 80 जिल्द1 में पहले यह दावा करते हैं कि तिहत्तर फ़िर्क़ों में नाजी फ़िर्क़ा अहले सुन्नत विजमाअत का है फिर इस हदीस शरीफ़ से इस का यों इस्बात करते हैं कि आका अलैहि अस्सलात वस्सलाम से जब इस फ़िर्क़ा नाज्य की अलामत पूछी गई तो आप ﷺ ने फ़रमाया‘‘अलज़ीन हम मा अना अलैहि वास्हाबी’’
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू यहाँ यह सवाल उठाते हैं कि इतना ही काफ़ी था कि फ़रमा दिया जाता कि जो फ़िर्क़ा मेरे तरीके पर होगा वह निजात या फ़त्ह है फिर वास्हाबी का ज़िक्र क्यों हुआ, फिर इस की गुथी को यों सुलझाते हैं कि आका अलैहि अस्सलात वस्सलाम के साथ सहाबा कराम का ज़िक्र इस बुनियाद पर है कि लोगों को मालूम हो जाए कि मेरा तरीका वही है जो मेरे सहाबा का तरीका है, और निजात का रास्ता सहाबा के तरीके के साथ मुताल्लिक़ है यह ऐसा ही है जैसे अल्लाह तआला ने फ़रमाया:‘‘मिन यता अलरसोल फ़क़द इता अल्लाह’’ इस आयत से मालूम हुआ कि इताअत रसूल उएन इताअत हक़ है,रसूल अल्ला ﷺ की इताअत के खिलाफ़ उएन मासियत हक़ जल जलाला है,फिर आयत से साबित करते हैं कि जो इताअत ख़ुदा को
इताअत रसूल के खिलाफ़ तसोर करते हैं कुरआन उन्हें काफ़िर कहता है,फिर अपने मतलब को यों बयान फ़रमाते हैं:
‘‘पस द्रमा नहन फिया दावा इत्तिबा आं सर्वर नमोदन अलैहि अस्सलात वस्सलाम बख़िलाफ़ इत्तिबा तरीक़ अस्हाब रिज़वान अल्लाह तआला अलैहिम अजमईन दावा बातिल अस्त बल्कि आन इत्तिबा फ़ी उलहक़ीक़त उएन मासियत रसूल अस्त अलैहि अस्सलात वस्सलाम पस निजात रा दरां तरीक़ मुख़ालिफ़ चह मजाल।’’
तर्जुमा: हमारी गुफ़्तगू का लब लबाब यह है कि सहाबा कराम रिज़वान अल्लाह अलैहम अजमईन के तरीके की पैरवी किए बग़ैर इत्तिबा रसूल ﷺ का दावा बातिल है, बल्कि यह इत्तिबा दर हक़ीक़त रसूल अकर्म ﷺ की मासियत है, पस उन का तरीका कहा M और निजात उखरवी कहां।
फिर यह साबित करते हैं कि सहाबा कराम रज़ि अल्लाह अन्हुम अजमईन की इत्तिबा विपैरवी का जिस फ़िर्क़ा ने इल्तिज़ाम किया है वह अहले सुन्नत विजमाअत हैं को ई दूसरा नहीं क्योंकि जो लोग नबी अलैहि अस्सलात वस्सलाम के अस्हाब में तान करते हैं वह ख़ुद उन अस्हाब की इत्तिबा से महरूम हैं जैसे शीया और ख़वारिज,और मोतज़िला जो मजहब मुहद्दिस(नो पैद) रखते हैं उन का सरदार वासल इब्न अता इमाम हसन बस्री के शागिर्दों से है कि ईमान विकिफ़र के दरमियान वास्ता साबित करके इमाम से जुदा हो गयाऔर इमाम ने उन की शान में फ़रमाया:एतज़िल इन्ना,इसी कयास पर बाक़ी दूसरे फ़िरक़े हैं।
फिर सहाबा कराम में तान करने के उयूब वनक़ाइस यों बयान फ़रमाते हैं:
‘‘तान करदिन दर अस्हाब फ़ी उलहक़ीक़त तान करदिन अस्त ब पैगम्बर ख़ुदा जल शाना अआ मिन बरसूल अल्लाह मिन यूक्सर असहाबह चह ख़बस ईशां मंजर ब ख़बस साहिब ईशां मेशोद नऊज़ बिल्लाह सुब्हानहू मिन हाज़ा अलएतिक़ाद अलसु।’’
तर्जुमा: सहाबा कराम पर तान करना दर असल रसूल ख़ुदा ﷺ पर तान करना है, (इस ले रसूल ﷺ पर ईमान रखने वाला आप के सहाबा की ताज़ीम व तौक़ीर जरूर करे गा) इस लिए कि उन की (सहाबा की) ख़बासत बयान करना उन के (रसूल अकर्म ﷺ) तक पहुँचती है, इस बुरे अकीदे से अल्लाह की पनाह ।
सहाबा कराम में तान वितशनीअ करने से दूसरी जबरदस्त खराबी यह लाज़िम आये गी फ़रमाते हैं:
‘‘वायजा शराए कि अज़ राह कुरआन वाहादीस बिमा रसीदा अस्त बतवस्सुत नकल ईशां अस्त हर गाह ईशां मतऊन बाशिंद नकल ईशां नीज़ मतऊन ख़्वाहिद बूद वायुं नकल मख़सूस बबाअज़ दून बाज़ नेस्त बल कुलहम फ़ी उलअदाल वालसदक़ वालतबलीग़ सिवा पस तान ईशां एव वाहिद कान मुंहम मुस्तलिज़्म तान दर दीन अस्त वालयाज़ बिल्लाह’’
तर्जुमा: कुरआन व हदीस की शरीअत हमें उन्हें (सहाबा कराम)के नकल के ज़रिया मिली है, लिहाज़ा जब यह लोग मतऊन हूँ गे तो उन की नकल भी मतऊन होगी और ऐसा नहीं है कि बाज़ की नकल तो मतऊन हो और बाज़ की न हो। इस लिए कि सारे सहाबा अदालत, सिदक़ और तबलीग़ में बराबर हैं, पस उन में से जिस पर भी तान हो दर असल दीन पर तान को मुस्तलिज़्म होगा। वालयाज़ बिल्लाह
जो लोग तान करते हैं वह यह भी कह सकते थे कि सहाबा कराम की मुताबेत हम भी करते हैं ज़रूरी नहीं कि सारे सहाबा कराम के हम मुताबे हो जाएँ बल्कि बैक वक़्त सारे सहाबा कराम की पैरवी मुमकिन नहीं क्योंकि उन की आरा में तनावुज़ और उन के मज़ाहिब में इख़तिलाफ़ है।
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू इस का जवाब देते हो ए फ़रमाते हैं कि बाज़ सहाबा की पैरवी इस वक़्त फायदा मंद साबित होगी जबकि इस से दूसरे बाज़ का इंकार मिला हुआ न हो
और बाज़ से इंकार की सूरत में बाज़ दीगर की मुताबेत नहीं हो सकती है फिर इस को मिसाल से यों वाज़िह फ़रमाते हैं:क्योंकि हज़रत अमीर(हज़रत अली रज़ि अल्लाह अन्हु)ने ख़ुलफ़ाए सलासा रज़ि अल्लाह तआला अन्हुम की ताज़ीम व तौक़ीर की है और उन को पैरवी के लायक जान कर उन से बीअत की तो ख़ुलफ़ाए सलासा के इंकार के बा वजूद हज़रत अमीर की पैरवी का दावा महज़ इफ़्तिरा है बल्कि वह इंकार दर हक़ीक़त हज़रत अमीर का इंकार है और उन के अक़्वाल वाफ़आल का सरीह रद्द।’’
(यह तो एक कली बहस थी मजहब शीया के बारे में कि यह मजहब मुहद्दिस है किसी हाल में लायक तक़लीद विपैरवी नहीं हैहक़ानियत की अदना बो भी इस में मौजूद नहीं अब कुछ जुज़वी बातें समाअत फरमाएं जो इस मजहब वालों ने मुख़तलिफ़ सहाबा कराम रज़ि अल्लाह तआला अन्हुम अजमईन के बारे में कही हैं और आप ने उन की तरदीद फ़रमाई।)
मालूम हुआ कि यह फ़िर्क़ा हज़रत अमीर कर्म अल्लाह वजहा की मुहब्बत वाल्फत और इत्तिबा का दावा कुछ भी करे मगर हक़ीकता यह इत्तिबा से महरूम है।
फिर मज़ेद तन्क़ीह के साथ जवाब देते हुए फ़रमाते हैं:‘‘ कि तमाम सहाबा कराम की मुताबेत उसूल दीन में लाज़िम है और हर गज़ उसूल दीन कभी इख़तिलाफ़ नहीं रखते हैं अगर इख़तिलाफ़ है तो फ़ुरू में है और जो शख्स बाज़ में तान करता है वह जमी सहाबा की पैरवी से महरूम है हर चंद उन का कलिमा मुत्तफ़िक़ है लेकिन अकाबिरीन के इंकार की बद बुख़ती(कलिमा के इत्तफाक़ को) इख़तिलाफ़ में डाल देती है और इत्तफाक़ से निकाल देती है,नीज़ तमाम सहाबा कराम शरीअत के मबलग़ हैं जैसा कि गुज़र गया क्योंकि तमाम सहाबा कराम अदूल हैं हर एक से कुछ शरीअत हम को पहुँची है और इसी तरह कुरआन भी एक आयत या ज़्यादा हर एक से ले कर जमा किया है पस बाज़ से इंकार इस के पहुँचाए हुए(कुरआन) से इंकार है तो तमाम शरीअत का बजा लाना मुनकर केबारे में साबित नहीं हुआ फ़कीफ़ इलिंजा वल-फ़लाह?
इस के अलावा हम कहते हैं कि कुरआन पाक हज़रत उसमान का जमा किया हुआ है बल्कि जमा करने वाले दर हक़ीक़त हज़रत सिद्दीक़ वफ़ारूक़ हैं हज़रत अमीर का जमा इस कुरआन के मा सिवा है पस सूचना चाहिए कि उन अकाबिर का इंकार दर हक़ीक़त कुरआन के इंकार तक पहुँचाता है अयाज़ा बिल्लाह।एक शख्स ने एक शीया मुज्तहिद से सवाल किया कि कुरआन हज़रत उसमान का जमा करदा है इस कुरआन के हक़ में किया अक़ीदा रखते हो इस ने कहा कि इस के इंकार में मस्लिहत नहीं देखता हूँ कि इस के इंकार से दीन पूरे तौर पर बर्बाद हो जाए गा।
इस बहस से आप बखूबी समझ गए हूँ गे कि सहाबा कराम में से किसी का भी इंकार इंसान को दीन पर एतिमाद से महरूम कर देता है,ऐसे इंसान को कुरआन वसंत पर सही एतिक़ाद हासिल नहीं हो सकता क्योंकि कुरआन वसंत उन्हें सहाबा के ज़रिया मिले हैं अब इंकार करने वाले ख़्वाह राफ़िज़ी हूँ या ख़ारिजी जो भी मुनकर होगा इस का अमल अपनी मिन घड़त शरीअत पर होगा रसूल अल्लाह ﷺ की शरीअत पर न होगा।’’आप ने इस तरह की बहस मुतअद्दिद मक्तोबात में फ़रमाई है जिस से मजहब शीया व ख़वारिज कली तौर पर बातिल होजाता है।
इस कली बहस के अलावा इस फ़िर्क़ा ज़ाला के मुख़तलिफ़ अक़ाइद वंज़रियात का मुतअद्दिद मक्तोबात में रद्द फ़रमाया हम चंदाहम तबरक्न पेश करते हैं:
(3)हज़रत अबू बुकर वामर वासमान वगैरह रज़ि अल्लाह तआला अन्हुम की खिलाफत विनियाबत का इंकार उन के मजहब का अहम रुकन है,इस गुमराह फ़िरक़े ने सिर्फ़ इसी पर इकतिफ़ा नहीं किया बल्कि फजल वशरफ़ और अज़मत विबुज़ुर्गी से इंकार करके तरह तरह से मुर्तक़िब तौहीन वतन्क़ीस हुए हैं,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू जगह जगह कली तौर पर सारे सहाबा कराम का शरफ़ वफ़ज़ल बयान फ़रमाते हैं,चनां चह मक्तूब 59 में फ़रमाते हैं:
‘‘ख़फ़ी अलैहिम फ़ज़ील अलसहब वफ़ज़ल अलसहाबत हरमुआ अन मुहब अहले बीत अलरसोल विमोद औलाद अलबत्तूल फ़ुमनावा अन खैर कसीर ना लहा अहले अलसन।विममा युनिबग़ी उन याल्म उन अलांकार अन बाज़ इंकार अन जमीहम फ़ान्हुम फ़ी फ़ज़ील सहब खैर अलबशर मुश्त्रिकोण वफ़ज़ेल अलसहब फ़ौक़ जमी अलफ़ज़ाइल वालकमालात।’’
तर्जुमा: शीयों से सोहबत और सहाबीयत की फ़ज़ीलत मख़फ़ी रही, लिहाज़ा यह लोग अहले बीत रसूल और औलाद बतूल की मुहब्बत से भी महरूम रहे, जिस की वजह से उन सारी भलाइयों से भी महरूम रहे, जो अहले सुन्नत व जमात के हिस्से में आएं।
यह भी वाज़िह रहे कि बाज़ सहाबा का इंकार सारे सहाबा का इंकार है, इस लिए सब के सब खैर अलबशर ﷺ की सोहबत की फ़ज़ीलत में मुश्तर्क हैं और सोहबत की फ़ज़ीलत तमाम फ़ज़ाइल व कमालित से बढ़ कर है।
फिर फ़रमाते हैं कि इसी लिए हज़रत अवैस कर्नी जो खैर अलताबईन हैं सरकार अलैहि अस्सलात वस्सलाम के सहाबा में से किसी अदना सहाबी के मर्तबे तक नहीं पहुँच सके,तो तुम फ़ज़ीलत सोहबत के बराबर किसी चीज़ को न करू कोई भी हो क्योंकि उन का ईमान सोहबत की बरकत से और वही के नुज़ूल की वजह से शहवदी हो गया था,सहाबा के बाद किसी को ईमान का यह दर्जा मयस्सर न आया।
(4)सहाबा कराम की तरतीब अफ़ज़लीयत बयान करते हुए फ़रमाते हैं:
‘‘तरतीब अफ़ज़लीयत दरमियान ख़ुलफ़ा राशिदीन तरतीब खिलाफत अस्त अम्मा अफ़ज़लीयत शेख़ीन बाजमा सहाबा विताबईन साबित शुदा चनां चह नकल करदा इंद आं रा जमाआ अज़ अकाबिर अइम्मा कि यके अज़ ईशां इमाम शाफ़ई अस्त।’’(मक्तूब 66 जिल्द 1)
तर्जुमा: ख़ुलफ़ाए राशिदीन के दरमियान अफ़ज़ेलित की तरतीब, खिलाफत की तरतीब के ऐतबार से है, मगर शेख़ीन की अ फ़ज़ीलत पर सहाबा व ताबईन का इजमा है, उसे अकाबिर अइम्मा ने
नकल किया है , जिन में एक इमाम शाफ़ई भी हैं।
फिर आप ने उम्मत के अहम उलमा विमहद्दिसीन के नसोस नकल फ़रमाए ख़ुद हज़रत अली रज़ि अल्लाह तआला अन्हु का इरशाद ग्रामी नकल फ़रमाया जो इस बात में सरीह है कि नबी अकर्म ﷺ के बाद लोगों में सब से बेहतर हज़रत अबू बुकर फिर हज़रत उम्र हैं,एक दूसरी रिवायत हज़रत इमाम ज़हबी के हवालेसे नकल फ़रमाई कि हज़रत अली कर्म अल्लाह वजहा ने एक मर्तबा फ़रमाया कि खबर दार! मुझे खबर पहुँची है कि कुछ लोग मुझे हज़रत अबू बुकर वामर पर फ़ज़ीलत देते हैं जिस को में ने फ़ज़ीलत देते हुए पाया वह मुफ़्तरी है तो इस पर वही है जो मुफ़्तरी पर है यानी बोहतान तराशी की सज़ा।
एक दूसरी रिवायत नकल फ़रमाई जिस में हज़रत अली रज़ि अल्लाह तआला अन्हु ने फ़रमाया कि में कोड़े मारों गा,फिर फ़रमाते हैं:‘‘वामिसाल ज़ालिक मुँह वमन गैरह मिन अलसहाबत मुतवातर बहीस ला मजाल फ़ीहा लान्कार वाहिद।’’
इस के बाद अब्द अलर्ज़ाक जो अकाबिर शीया से था इस का कौल नकल फ़रमाया,इस ने कहा कि‘‘ में हज़रत अबू बुकर वामर को इस लिए फ़ज़ीलत देता हूँ कि ख़ुद हज़रत अली ने उन दोनों को अपने उपर फ़ज़ीलत दी है वर्ना में उन कोकियों फ़ज़ीलत देता,मेरे लिए गुनाह है कि में हज़रत अली से मुहब्बत करूँ फिर उन की मुखालफत करूँ।’’
यह तो हज़रत अबू बुकर वामर रज़ि अल्लाह तआला अन्हुमा के बारे में तफ़सील थी,फिर हज़रत उसमान की हज़रत अली पर अफ़ज़लीयत यों बयान फ़रमाते हैं:
(5)‘‘अम्मा तफ़ज़ील उसमान बुर अली रज़ि अल्लाह तआला अन्हुमा पस अक्सर उल्मा अहले सुन्नत बरानंद कि अफ़ज़ल बाद अज़ शेख़ीन उसमान अस्त पस अली विमज़हब अइम्मा अर्बा मुज्तहिदयन नीज़ हमें अस्त।’’
तर्जुमा: अक्सर उलमा-ए अहले सुन्नत के नज़दीक शेख़ीन के बाद हज़रत उसमान ,
हज़रत अली से अफ़ज़ल हैं, इस के बाद हज़रत अली अफ़ज़ल हैं, चारों अइम्मा मुज्तहिदयन का भी यही मजहब है।
बाज़ उलमा ने इस सिलसिले में हज़रत माम मालिक का तवक़्क़्फ़ नकल किया था,आप फ़रमाते हैं कि इमाम क़ाज़ी य्याज़ मालिकी ने हज़रत इमाम मालिक के बारे में फ़रमाया कि आप ने रुजू कर लिया था और इस बात के कायल हो गए थे कि हज़रत अली से हज़रत उसमान अफ़ज़ल हैं रज़ि अल्लाह तआला अन्हुमा।
यहाँ एक बात और काबिल बयान है वह यह कि हज़रत इमाम आज़म अबू हनीफा रहमत अल्लाह अलैहि से जब अहले सुन्नत की अलामात पो छी गईं तो आप ने अपने दौर में जितने इस्लामी फ़िरक़े थे इस में अहले सुन्नत को मुमताज़ करने के लिए यह अलामात ज़िक्र फ़रमाए:‘‘तफ़ज़ील उलशेख़ीन वहब उलख़तनियन वालमस्ह अली अलख़फ़ीन’’यानी हज़रत अबू बुकर वामर को फ़ज़ीलत देना,दोनो दामादों यानी हज़रत अली वासमान से मुहब्बत करना,और मोज़ों पर मस्ह को जायज़ समझना, इस में हुब्ब उलख़तनियन से कुछ लोगों ने यह समझ लिया कि हज़रत इमाम उन दामादों में से किसी को किसी पर फ़ज़ीलत देने के हक़ में नहीं हैं।
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने इस इबारत की निहायत हसीन तवज्जीया फ़रमाई,फ़रमाते हैं:‘‘ इस फ़क़ीर के नज़दीक इस इबारत को इख्तियार करने का महल दूसरा है कि चूंकि फ़ित्नों का ज़ुहूर और मुर्दों के उमूर में खलल हज़रात ख़तनीन(उसमान वाली रज़ि अल्लाह तआला अन्हुमा) की खिलाफत के जमाने में बहुत हो गया था और इस के ज़रिया लोगों के दलों में कदूरत ने राह पा ली थी इमाम(आज़म) ने इस चीज़ को मुलाहिजा फ़रमाया तो उन के हक़ में लफ़्ज़ मुहब्बत इख्तियार फ़रमाया है और उन की दोस्ती को अलामात सुन्नत से बताया,बग़ैर इस के कोई शाइबा तवक़्क़्फ़ मलहूज़ हो और तवक़्क़्फ़ कैसे हो सकता है बल्कि अहनाफ़ की कुत्ता बें भरी पड़ी हैं कि उन की अफ़ज़लीयत उन की खिलाफत की तरतीब पर है,खुलासा यह कि शेख़ीन की अफ़ज़लीयत यकी
यक़ीनी है और हज़रत उसमान की अफ़ज़लीयत इस से कम।’’
अफ़ज़लीयत के मुनकर को आप अगर चह काफ़िर विमुर्तद करार नहीं देते,ज़ाल विमुबतदा समझते हैं मगर इस शख्स का हाल भी यज़ीद पलीद की तरह समझते हैं और फ़रमाते हैं:‘‘यह मुनकर यज़ीद बे दौलत की तरह है कि एहतियात की वजह से इस के लान में तवक़्क़्फ़ किया है और जो ईज़ा सरकार अलैहि अस्सलाम को ख़ुलफ़ाए राशिदीन की ईज़ा की राह से पहुँची है वह इस ईज़ा के मानन्द है जो इमामीन(हज़रत हसन वहसेन रज़ि अल्लाह तआला अन्हुमा) की ईज़ा की राह से नबी अकर्म ﷺ को पहुँची है।’’
फिर एक हदीस नकल फ़रमाई जिस में सर्वर कोनेन ﷺ ने फ़रमाया:
‘‘अल्लाह अल्लाह फ़ी असहाबी ला तत्ख़ज़ोहम ग़रज़ा मिन बादी मिन अहबहम फ़बहबी अहबहम वमन अब्ग़ज़हम फ़बबग़ज़ी अब्ग़ज़हम वमन अआ ज़ाहम फ़क़द अआजानी वमन अआ ज़ानी फ़क़द अआज़ा अल्लाह वमन अआ ज़ा अल्लाह फ़ीयूशक उन यया ख़िज़ा’’
यानी मेरे सहाबा के सिलसिले में अल्लाह तआला से डरो! मेरे बाद उन को निशाना न बनाना,जिस ने उन से मुहब्बत की मेरी मुहब्बत के सबब की,जिस ने उन से बुग़ज़ रखा तो इस ने मुझे मबगौज़ रखने के सबब बुग़ज़ रखा(मतलब यह कि सहाबा से बुग़ज़ नबी ﷺ के बुग़ज़ की अलामत है)और जिस ने उन को ईज़ा दी तो इस ने मुझे ईज़ा दी,और जिस ने मुझे ईज़ा दी इस ने अल्लाह तआला को ईज़ा दी और जो अल्लाह तआला को ईज़ा देगा तो अल्लाह तआला उसे अन्क़रीब पकड़े गा’’
फिर अल्लाह तआला का यह इरशाद पाक भी नकल फ़रमाया:‘‘ अन् अलज़ीۡन युओज़ोۡन अल्ला व रसोۡला लान्हुम अल्ला फि अलदनिया व अलआख़रत व आद लहम अज़ाबिया महीۡनिया’’ बे शक जो लोग अल्लाह और इस के रसूल को तकलीफ़ देते हैं उन पर दुनिया और आख़िरत में अल्लाह तआला की लानत।
इल्म कलाम की बड़ी मशहूर विमतदावल किताब शरह अक़ाइद निसफ़ी जिस के मुसन्निफ़ हज़रत
अल्लामा सादुद्दीन तफ़ता ज़ानी हैं ,अहले सुन्नत के ज़बर दस्त मुहक़्क़ और मकबूल मुसन्निफ़ हैं,अल्लामा मौसूफ़ ने तवक़्क़्फ़ के कायलीन यानी वह लोग जो हज़रत उसमान वाली रज़ि अल्लाह तआला अन्हुमा में से किसी को किसी पर फ़ज़ीलत नहीं देते हैं उन पर तन्क़ीद करते हुए फ़रमाया:‘‘वालांसाफ अन्ना उन अरीद बालाफ़ज़ले कसर उलसवाब फ़ुललतवक़िफ़ जहत वान अरीद कसर मा याद ह ज़ोव अलाक़ोल मिन अलफ़ज़ाइल फला।’’यानी अगर अफ़ज़लीयत से कसरत सवाब मुराद है तो तवक़्क़्फ़ के लिए गुंजाइश है और अगर उन उमूर में कसरत मुराद है जिस को अहले फजल फ़ज़ाइल शुमार करते हैं तो नहीं मतलब यह कि फिर तो हज़रत उसमान पर हज़रत अली ही फ़ज़ीलत रखते हैं।
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने इस पर जबरदस्त गिरफ्त फ़रमाई,आप फ़रमाते हैं कि मौलाना साद उद्दीन ने शरह अक़ाइद निसफ़ी में जिसे इस अफ़ज़लीयत में बे इंसाफ जाना है वह इंसाफ से दौर है और जो तरदीद की है वह बे फायदा है,इस के बाद इस पर दलील क़ायम की कि उलमा के नज़दीक साबित विमुक़रर है कि इस जगह अफ़ज़लीयत से मुराद यह है कि अल्लाह तआला के यहाँ सवाब ज़्यादा है वह मुराद नहीं है जिसे अल्लामा अफ़ज़लीयत समझते हैं यानी फ़ज़ाइल वुमनाक़िब का कसरत से ज़ुहूर।
इस की वजह यह है कि सल्फ ने सहाबा विताबईन से जो फ़ज़ाइल वुमनाक़िब हज़रत अली के नकल किए हैं वह किसी सहाबी के नकल नहीं किए यहाँ तक कि हज़रत इमाम अहमद बिन हनबल रहमत अल्लाह अलैहि ने फ़रमाया:‘‘मा जा लाहद मिन अलसहाबत मिन अलफ़ज़ाइल मा जा लाली’’ इस के बा वजूद उन सब ने ख़ुलफ़ाए सलासा की अफ़ज़लीयत का हुक्म लगाया है ,लिहाज़ा मालूम हुआ कि वजह अफ़ज़लीयत फ़ज़ाइल वुमनाक़िब का कसरत से ज़ुहूर नहीं बल्कि इस के अलावा श दीगर है,इस अफ़ज़लीयत पर इत्तिला बस्रीह या बक़राइन उन हज़रात को हासिल थी जिन्हों ने दौलत वही का मुशाहिदा किया और वह सर्वर कोनेन ﷺ के सहाबा कराम हैं। इसी लिए मालूम हुआ कि
तवक़्क़्फ़ की को ई वजह नहीं अगर कसरत सवाब भी मुराद लें क्योंकि तवक़्क़्फ़ की गुंजाइश इस वक़्त होती जबकि सराहता या दलाल साहिब शरीअत की जानिब से जानकारी न हुई होती और जब अफ़ज़लीयत मालूम हो गई तो तवक़्क़्फ़ क्यों करें और अगर जानकारी न होती तो अफ़ज़लीयत का हुक्म क्यों लगाते,फिर उन का सख्त अलफ़ाज़ में रद्द फ़रमाया जो दोनों को बराबर समझते हैं।
हज़रत शैख़ मुही उद्दीन इब्न अरबी क़ुद्दिस सिर्रहू की एक इबारत में उन के कलम से यह सादर हो गया कि सबब तरतीब खिलाफतहम मदत आमारहम यानी ख़ुलफ़ाए अर्बा की खिलाफत की तरतीब का सबब उन की उमरों की मुद्दत है,मतलब यह कि अल्लाह तआला के नज़दीक हज़रत अबू बुकर का विसाल हज़रत उम्र वासमान वाली से पहले था इस लिए वह मसंद खिलाफत पर पहले रौनक अफ़्रोज़ हुए,उन के बाद चूंकि हज़रत उम्र का विसाल बाक़ी अपने दो ख़ुलफ़ा से पहले मुक़द्दर था इसी लिए हज़रत उम्र ख़लीफ़ा दोयम हुए,हज़रत उसमान की क़ज़ा हज़रत अली से पहले मुक़द्दर थी इसी लिए ख़लीफ़ा सोम हुए,आखिर में हज़रत अली हुए इस लिए कि उन की हयात बाक़ी तीन ख़ुलफ़ा से ज़्यादा थी।
इस इबारत से कुछ लोग यह समझ सकते थेकि हज़रत अबू बुकर सब से पहले जो ख़लीफ़ा बनाए गए हैं इस का सबब यह नहीं कि आप सब से अफ़ज़ल हैं,यों ही हज़रत उम्र वासमान रज़ि अल्लाह अन्हुम बल्कि इस का सबब मज़कूर हुआ।
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने दो वजूह से इस ख़याल का रद्द किया अव्वल तोव्ही है कि यह इबारत फ़ज़ीलत में बराबरी पर दलालत नहीं करती क्योंकि अम्र खिलाफत दीगर है और अफ़ज़लीयत दीगर श, दोम यह कि अगर मान भी लिया जाए कि इस कौल से फ़ज़ीलत में मुसावात वबराबरी लाज़िम आती है तो यह और इस के मसल हज़रत शैख़ क़ुद्दिस सिर्रहू के दीगर अक़्वाल शतहयात के क़बील से हैं जो कि इस्तिदलाल वितमस्क के लायक नहीं हैं।हज़रत शैख़ केकसर मआरिफ़ कशफ़्या जो कि उलूम अहले सुन्नत से अलग हैं वह सवाब विदुरस्तगी से भी दौर
हैं उन की पैरवी वही करे गा जिस के दिल में खोट हो या वह महज़ मुक़ल्लिद हो।
(6)सहाबा कराम रिज़वान अल्लाह तआला अलैहिम अजमईन के बाहमी इख़तिलाफ़ात और मुहारबात वुमनाज़आत की वजह से बहुत लोग भटके और तरह तरह से बे अदबी विगुस्ताखी का शिकार हो कर ख़सारा उखरवी के मुस्तहिक़ हुए,इस सिलसिले में अहले सुन्नत का जोमौक़िफ़ रहा है वह निहायत साफ सुथरा,हर कजी से दौर और निहायत एहतियात पर मबनी है जिस में पूरे तौर पर अज़मत सहाबा का लिहा ज़ रखा गया है,और जो लोग भी उन के खिलाफ़ गए हैं उन से यकीना चौक हुई है,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू अहले सुन्नत का मौक़िफ़ बयान करते हुए फ़रमाते हैं:
‘‘मनाज़आत विमहारबात कि दरमियान ईशां वाक़्य शुदा अस्त बुर मुहामिल नेक सिर्फ़ बायद कुर्द वाज़ हुआ वित्तासब दौर बायद दाश्त जीरा कि आं मुख़ालफ़ात मबनी बुर इजतिहाद वतावेल बूदा न बुर हुआ विहवस चुनांचे जमहूर अहले सुन्नत बरानंद।’’(मक्तूब 251 जिल्द 1)
तर्जुमा: सहाबा कराम के दरमियान जो मुन्ना रग़ात व मुहारबात हुए उन्हें अच्छे मुहामिल पर महमूल करना चाहिए, और इस बारे में ख्वाहिश नफ़्स और तास्सुब से बिलकुल दौर रहना चाहिए। इस लिए कि उन हज़रात की बाहमी मुखालिफ़तें इजतिहाद और तावेल पर मबनी थीं, न कि हवाव हवस पर, यही जमहूर अहले सुन्नत का मजहब है।और यह चीजें अहले सुन्नत व जमात की आरा के मुताबिक हैं, जो कि फ़िर्क़ा नाज्य हैं। और उन बुजुर्गों की पैरवी के बग़ैर निजात का तसोर ही नहीं है, और अगर बाल के बराबर भी मुखालफत हो तो खतरा ही खतरा है, यह बात सही कश्फ़ और सरीह इलहाम से यकीन कि हद तक पहुँच चुकी है, जिस में तख़ल्लुफ़ का कुछ भी एहतिमाल नहीं है।
आप क़ुद्दिस सिर्रहू ने मुतअद्दिद मक्तोबात में इस बात को दोहराया है और निहायत सख्ती के साथ इजतिनाब विपर हेज़ का हुक्म दिया है और इस सिलसिले में मुतअद्दिद उलमा के नसोस नकल
फ़रमाए हैं,उन आपसी इख़तिलाफ़ात में हक़ किस की जानिब था? आप मज़कूरा बाला इबारत के बाद फ़रमाते हैं:
‘‘अम्मा बायद दानिस्त कि मुहारबान हज़रत अमेरक्रम अल्लाह वजहा बुर खता बूदा इंद वहक़ बजानिब अमीर।’’
तर्जुमा: मालूम रहे कि हज़रत अमीर (सय्यदना अली) कर्म अल्लाह वजहा के मुहारबियन खता पर थे और हक़ हज़रत अली के साथ था।
मगर यह खता ऐसी नहीं थी जिस की वजह से उन पर लान वतान जायज़ हो या उन की तफ़सीक़ वितज़लील दुरुस्त हो,आप फ़रमाते हैं:‘‘लेकिन चों एं खता खता इजतिहादी अस्त अज़ मलामत दौर अस्त वाज़ मुवाख़िज़ा मर्फ़ू ’’यानी यह खता ख़ताए इजतिहादी है लिहाज़ा इस पर न मलामत दुरुस्त और न ही मुवाख़िज़ा।
शारह मवाकिफ़ ने शरह में कह दिया कि हमारे बहुत से अस्हाब इस बात पर हैं कि सहाबा कराम के मनाज़आत अज़ रोए इजतिहाद न थे, हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं मालूम नहीं कि शारह ने अस्हाब से कौन सा गिरोह मुराद लिया है अहले सुन्नत इस के खिलाफ़ हुक्म लगाते हैं जैसा कि गुज़र गया‘‘वक्तब अलकूम मशहून बालख़ता इलिजतिहादी कमा सुरह ब अलामाम उलग़ज़ाली वालक़ाज़ी अबू बुकर वग़ैरहमा’’ (यानी अहले सुन्नत की किताबें भरी पड़ी हैं कि सहाबा की ख़ताएँ खता इजतिहादी थीं जैसा कि इमाम ग़ज़ाली और क़ाज़ी अबू बुकर वग़ैरहमा ने उन की सराहत की है) पस तफ़सीक़ वितज़लील दर हक़ मुहारबान हज़रत अमीर जायज़ नबाशद(पस हज़रत अली रज़ि अल्लाह तआला अन्हु के मुहारबियन पर तफ़सीक़ वितज़लील का हुक्म लगा ना रवा न होगा)
बाज़ फ़िक़हा ने हज़रत अमीर मुआवीया रज़ि अल्लाह तआला अन्हु के लिए लफ़्ज़ ज्वर इस्तेमाल करदिया था और कह दिया था:‘‘कान मुआवीत अमीरा जायरा’’ यानी हज़रत मुआवीया डिक्टेटर और ज्वर
वाले थे,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू अव्वलन तो इस की तावेल करते हैं जैसा कि आप का तरीका है कि उलमा वफ़क़हा वसूफ़िया कराम रहमत अल्लाह अलैहिम की हक़ वस्दाक़त से हटी हुई इबारतों को अच्छे महम्मल पर महमूल करते हैं,फ़रमाते हैं कि ज्वर से मुराद हज़रत अली के ज़माना खिलाफत में हज़रत अमीर मुआवीया की खिलाफत का खिलाफ़ हक़ होना मुराद है वह ज्वर मुराद नहीं जिस का मआल फ़िस्क़ वज़लालत है ताकि अहले सुन्नत के अक़्वाल के माफ़िक़ हो’’
इस तावेल के बाद आप का अपना मिजाज यह है:‘‘बावजूदिके अर्बाब इस्तिक़ामत ऐसे अलफ़ाज़ के इस्तेमाल से पर हेज़ करते हैं जो खिलाफ़ मकसूद का वहम पैदा करें और खता से ज़्यादा जायज़ करार नहीं देते हैं’’ फिर आप के ख़ास अलफ़ाज़ यह हैं:‘‘कैफ़ युकोन जायज़ा वक़द सह अन्ना कान इमामाआदिला फ़ी हुक़ूक़ अल्लाह सुब्हानहू’’ यानी जायर कहना कैसे सही होगा जबकि यह बात साबित शुदा है कि आप हुक़ूक़ अल्लाह सुब्हानहू की अदाएगी में इमाम आदिल थे।
आरिफ नामी हज़रत मौलाना अब्द अलरहमान जामी क़ुद्दिस सिर्रहू ने इस खता को ‘‘खता मुनकर’’ कह दिया था,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि हज़रत जामी ने भी ज्यादती की है,खता पर जो भी ज़्यादा करें गे खता है,यानी सिर्फ़ खता कह सकते हैं इस से ज़्यादा कुछ कहना खता है,इस से भी आगे बढ़ कर हज़रत जामी क़ुद्दिस सिर्रहू ने कुछ और फ़रमादिया था,आप फ़रमाते हैं:
‘‘अगर एं सखुन दरबारह यज़ीद मैगुफ़्त गुंजाइश दास्त अम्मा दर बारह हज़रत मुआवीया गुफ़्तन शनाअत दारद’’ यानी अगर यह बात यज़ीद के हक़ में कहते तो गुंजाइश थी लेकिन हज़रत अमीर मुआवीया के बारे में शनीअ है,इस के बाद आप ने हज़रत अमीर मुआवीया रज़ि अल्लाह तआला अन्हु के बारे में सका हज़रात की अस्नाद से सर्वर कोनेन ﷺ की यह दुआ नकल फ़रमाई:‘‘अललहम् अलमा अलकिताब वालहिसाब वक़ा उलाज़ाब’’ यानी ए अल्लाह! तो मुआवीया को किताब और हिसाब सिखा और उन को अज़ाब से बचा एक मक़ाम पर यह दुआ दी:‘‘अललहम् अजाला
हादिया महदिया’’ ए अल्लाह! तो उन्हें रहबर और राह याफताह बना।
आप फ़रमाते हैं कि हुज़ूर ﷺ की दुआ कबूल होती है मतलब यह कि हज़रत अमीर मुआवीया को इल्म किताब वहिसाब भी है और वह अज़ाब से भी महफूज़ हैं और हादी विमहदी भी हैं,इस के बाद हज़रत जामी क़ुद्दिस सिर्रहू के बारे में फ़रमाते हैं:‘‘ज़ाहिरा एं सखुन अज़ मौलाना बुर सबील सहू विनिस्यान सर बुर ज़दा बाशद’’ यानी मौलाना जामी से यह बात सहू विनिस्यान की वजह से सरज़द हो गई होगी,एक और जगह हज़रत जामी ने कुछ और अशआर में हज़रत अमीर मुआवीया का नाम न ले कर‘‘आं सहाबी दीगर’’ कह दिया था,आप क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं:‘‘एं इबारत नीज़ अज़ नाखुशी खबर मि दहद रबिना ला तवाख़िज़ना उन नसेना अव अखता ना।’’ यानी मौलाना की यह इबारत भी दुरुस्त नहीं है,ए अल्लाह! हमारी खता विनिस्यान पर मुवाख़िज़ा न फ़रमा।
हज़रत इमाम शाबी से हज़रत अमीर रज़ि अल्लाह तआला अन्हु की कुछ मुज़म्मत नकल की थी,मुज़म्मत भी ऐसी जो फ़िस्क़ से भी ज़्यादा थी,इस से भी शीया धोका देते थे क्योंकि वह अहले सुन्नत के जबरदस्त इमाम हैं,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं‘‘यह चीजें सबूत को नहीं पहुँची हैं,हज़रत इमाम आज़म जो कि उन के शागिर्दों में से हैं अगर मुज़म्मत सच्ची होती तो वह नकल के ज़्यादा हक़दार थे,इमाम मालिक जो कि ताबई हैं और उन के हम अस्र और उलमाए मदीना में सब से बड़े आलम उन्हों ने हज़रत मुआवीया और अमरो बिन उल्लास के शातिम (गाली देने वाला) को क़त्ल का हुक्म दिया है जैसा कि गुज़र गया,अगर वह शतम के मुस्तहिक़ थे तो क़त्ल का हुक्म क्यों दिया पस मालूम हुआ कि उन का शतम कबीरा गुनाहों से जान कर शातिम के क़त्ल का हुक्म दिया, नीज़ हज़रत अमीर मुआवीया का शतम हज़रत अबू बुकर वामर वासमान के शतम के बराबर ठर्राया है जैसा कि गुज़रज्ञा पस हज़रत अमीर मुआवीया मुज़म्मत वबराई के मुस्तहिक़ न हो M गे।’’
इस के बाद हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं:‘‘ए भाई! इस मामले में मुआवीया अकेले नहीं हैं बल्कि तक़रीबा आधे सहाबा कराम इस मामला में उन के साथ शरीक हैं तो अगर हज़रत अमीर के जंगी (जिंग करने वाले) काफ़िर या फ़ासिक़ हूँ गे तो दीन के इस हिस्से से एतिमाद ख़त्म हो जाए गा जो उन की तबलीग़ से हम तक पहुँचा है,लिहाज़ा इस बात को वही जायज़ करार दे गा जो ज़िंदीक़ है औरजिस का मक़सद दीन को बातिल करना है।
ए बिरादर! इस फ़ित्ने के उठने का मंशा हज़रत उसमान रज़ि अल्लाह तआला अन्हु की शहादत है और उन के कातिलों से क़िसास तलब करना,तलहा वज़बेर जो कि मदीना से पहले आये ताख़ीर क़िसास की वजह से आये,हज़रत सिद्दीक़ा ने भी इस मामले में उन की मुआफ़िक़त की,और जिंग जमल कि जिस में तेरह हजार आदमी क़त्ल हुए और तलहा वज़बेर जो कि अशरा मुबशरा से हैं शहीद हुए,ताख़ीर क़िसास उसमान की वजह से थी,इस के बाद मुआवीया भी शाम से बाहर निकल कर उन के साथ शरीक हुए,जिंग सफ़ीन लड़ी,हज़रत इमाम ग़ज़ाली ने सराहत की कि यह झगड़ा मुखालफत पर न था बल्कि हज़रत अमीर की खिलाफत के आगाज़ में क़िसास लेने के सिलसिले में था,शैख़ इब्न हिज्र ने भी इस बात को मोतक़िदात अहले सुन्नत से करार दिया, अबू शकूर सालमी हनफ़ी का कौल नकल करके और इस की तावेल करके आखिर में फ़रमाते हैं:
‘‘ ए बिरादर!असलम दरें मवतन सुकूत अज़ ज़िक्र मुशाजरात सहाबा पैगम्बर अस्त अलैहि वालैहिम अस्सलवात वालतसलीमात वाराज़ अज़ मनाज़आत ईशां,पैगम्बर फर्मौदा अलैहि वाला आला अस्सलात वस्सलाम अयाकम विमा शजर बेन असहाबी विनीज़ फर्मौदा अलैहि वाला आला अस्सलात वस्सलाम अज़ा ज़िक्र असहाबी फामस्कवा विनीज़ फर्मौदा अलैहि अस्सलात वस्सलाम अल्लाह अल्लाह फ़ी असहाबी ला तत्ख़ज़ोहम ग़रज़ा मिन बादी’’
तर्जुमा: ए बिरादर! सलामती इसी में है कि हुज़ूर ﷺ के सहाबा कराम के
मुशाजरात को बयान करने से सुकूत किया जाए और उन के मनाज़आत से आराज़ किया जाए। इस लिए कि पैगम्बर ख़ुदा ﷺ का फरमान आलीशान है: मेरे सहाबा के मुशाजरात (झगड़ों) से बच्चो, हुज़ूर ﷺ ने यह भी फ़रमाया: जब मेरे सहाबा का ज़िक्र हो तो खामोश रहो, नीज़ यह भी इरशाद हुआ: मेरे सहाबा के बारे में अल्लाह से डरो! अल्लाह से डरो, मेरे बाद उन्हें निशाना (तान वितशनीअ का) न बनाना।
फिर फ़रमाते हैं कि इमाम शाफ़ई ने फ़रमाया नीज़ हज़रत उम्र बिन अब्द उलअज़ीज़ से भी मनक़ूल है:‘‘तलक दमा तहर अल्लाह अन्हा ईदेना फलनतायर अन्हा अलस्तना’’यह खून हैं जिन से अल्लाह तआला ने हमारे हा थों को पाक रखा तो चाहिए कि हम जुबानें भी पाक रखें,इस से मालूम हुआ कि उन की ख़ताएँ भी ज़बान पर नहीं लाना चाहिए और खैर के अलावा उन का ज़िक्र नहीं करना चाहिए’’
मक्तूब 36 जिल्द दोम मुहारबात विमुशाजरात के सिलसिले में एक फैसला कण गुफ़्तगू यों फ़रमाते हैं:‘‘नबी अकर्म ﷺ के अस्हाब बाहमी मुहारबात वुमनाज़आत के वक़्त तीन गिरोह थे एक गिरोह ने दलील वाजतिहाद के ज़रिया जानिब अमीर में हक़ होना मालूम किया था,दूसरे गिरोह ने भी दलील वाजतिहाद के ज़रिया जानिब दीगर का हक़ होना पाया और उन के अलावा एक गिरोह मुतवक़्क़्फ़ था जो किसी जानिब को दलील से तरजीह नहीं देता था,पस पहले गिरोह पर जानिब अमीर की मदद वाजिब हुई कि उन के इजतिहाद के माफ़िक़ थी और दूसरे गिरोह पर जानिब मुख़ालिफ़ अमीर की मदद कि उन के इजतिहाद का मुक़तज़ी ٰ था और तीसरे गिरोह पर तवक़्क़्फ़ लाज़िम आया,एक को दूसरे पर तरजीह खता,पस तीनों गिरोहों ने अपने इजतिहाद की चाहत पर अमल किया और उन पर जो लाज़िम विवाजिब था उसे बजा लाये तो मलामत की किया गुंजाइश है और तान कैसे मुनासिब?।’’
फिर हज़रत उम्र बिन अब्द उलअज़ीज़ रज़ि अल्लाह तआला अन्हु का कौल मज़कूर और एक हदीस
‘‘अज़ा ज़िक्र असहाबी फामस्कवा’’ यानी जब मेरे अस्हाब का ज़िक्र हो तो खामोश रहो और एक को दूसरे पर इख्तियार न करू,ज़िक्र करके फ़रमाते हैं:‘‘लेकिन जमहूर अहले सुन्नत इस दलील से जो उन पर ज़ाहिर हुई इस बात पर हैं कि हक़ जानिब अमीर में था और उन के मुख़ालिफ़ खता की राह चले लेकिन यह खता चूंकि इजतिहादी थी इस लिए मलामत और तान से दौर रहे और तशनीअ वितहक़ीर से मुबर्रा (अलग),हज़रत अमीर(अली) से मनक़ूल है आप ने फ़रमाया: हमारे भाई हम पर बागी हुए यह न काफ़िर हैं न फ़ासिक़ क्योंकि उन के पास तावेल है जो फ़िस्क़ विकिफ़र को मना करती है।’’
फिर सहाबा कराम रिज़वान अल्लाह अलैहिम अजमईन के बारे में कुछ अहादीस नकल करके इरशाद फ़रमाते हैं:‘‘तमाम सहाबा कराम की ताज़ीम वितौक़ीर में दीगर अहादीस भी बहुत हैं पस सब को माज़िज़ विमक्रम रखना चाहिए और उन की लग़ज़िशों को अच्छे महलों पर महमूल करना चाहिए यह है इस मसला में मजहब अहले सुन्नत जबकि राफ़िज़ी इस मामला में बहुत ग़ुलू करते हैं और हज़रत अली से जिंग लड़ने वालों की तकफ़ीर करते हैं और मुख़तलिफ़ नवो के तान और मुतअद्दिद किस्म की गालियों से अपनी ज़बानों को गंदा करते हैं अगर मकसूद हज़रत अमीर की जानिब हक़्क़ानियत का ज़ुहूर और उन के मुहारबियन की खता का इज़हार है तो जो अहले सुन्नत ने इख्तियार किया है काफ़ी है और अदालत वाइतिदाल की हद पर है।
अकाबिरीन दीन को बुरा कहना और तान करना दयानत वतदेन से दौर है जो कि रवाफ़िज़ ने इख्तियार किया है,नबी अकर्म ﷺ के अस्हाब को गालियां देना दीन वायमान तसोर कर रखा है अजब दीन है कि जा नशीनान पैगम्बर अलैहि वालैहिम अस्सलवात वालतसलीमात को गाली गलोच जिस का जुज़ु आज़म है! बिद्दती गिरोहों में से जिन्हों ने भी बिद्दत इख्तियार की है और अहले सुन्नत से जुदा हुए उन सब में फ़िर्क़ा ख़वारिज वर्वाफ़िज़ मुआले से दौर हैं और हक़ से बईद जा पड़े हैं,जो गिरोह अकाबिर दीन के सब व तान को अपने ईमान काजज़ो आज़म तसोर
करे हक़ से किया हिस्सा रखे गा? रवाफ़िज़ बारह फ़िरक़े हैं और सभी अस्हाब पैगम्बर अलैहि वालैहिम अस्सलवात वालतसलीमात को काफ़िर कहते हैं और ख़ुलफ़ाए राशिदीन को गालियां देना इबादत जानते हैं।’’
उलग़र्ज़ यह मक्तूब ग्रामी निहायत कसीर मालूमात पर मुश्तमिल है और तफ़सील से मजहब रफ़्ज़ वख़रोज की खबर ली है और उन की बातिनी ख़बासत को तश्त अज़ बाम कर दिया है,हम ने निहायत इख़तिसार के साथ चंद बहसें ज़िक्र करदी हैं,यह ताइफा शनीआ आज भी अहले सुन्नत की दुश्मनी में सब से आगे है,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने मुतअद्दिद मक्तोबात में मुख़तलिफ़ मिसाइल पर कलम उठाया है औरमुताइन के निहायत मुदल्लिल विमफ़सल जवाबात मरहमत फ़रमाए हैं।
मक्तूब 96 जिल्द दोम में वाक़ा क़िरतास पर कलम उठाया तो ऐसा उठाया कि मुख़ालिफ़ को मजाल दम ज़दन नहीं रही,छ मुक़द्दमात बाहरा क़ायम फ़रमाए जो कुल्लियात की हैसियत रखते हैं जिन से ख़ुद बखुद सैकड़ों शुबहात के जवाबात मिल जाते हैं,आखिर में ख़ुद फ़रमाते हैं:
‘‘और जब यह मुक़द्दमात मालूम हो गए तो बुला तकल्लुफ़ यह शुबह और इस जैसे दीगर शुबहात का जवाब हासिल हो गया बल्कि मुतअद्दिद जवाबात हासिल हो गए क्योंकि उन मुक़द्दमात में से हर एक मुकदमा के बारे में कहा जा सकता है कि वह मोतद ब जवाब है जैसा कि गुज़र गया और उन मुक़द्दमात का मजमूआ बऊन अल्लाह तआला सुब्हानहू इस शुबह को बिलकुल्लिया ख़त्म करदेता है और इस तशकीक के दफा में नज़र से हदस में लाता है जैसा कि जहीन मुंसिफ़ पर पोशीदा नहीं।
लफ़्ज़ हदस मजबूरन ज़बान पर आता है वर्ना उन जैसी तश्कीकात बदेही अलबतलान हैं,उन शुबहात के बतलान में जो मुक़द्दमात लाये जाते हैं वह तंबीहात के क़बील से हैं इस बदाहित पर,बल्कि इस किस्म के शुबहात अवर्तश्कीकात इस फ़क़ीर के नज़दीक इस शख्स की तरह हैं जो फ़नून वाला है बे वक़ूफ़ लो गों के पास आये और इस पत्थर को जो कि इस के
सामने है दलायल व मुक़द्दमात ज़र अंदौदा (सोने का पानी चढ़ा हुआ) के ज़रिया उन पर साबित करे कि वह सोना है और यह बे चारे उन मुलम्मा किए हुए मुक़द्दमात के दफा करने में आजिज़ हैं,उन दलायल के के गलत मादों की तईएन से क़ासिर,ला मुहाला इशतिबाह में पड़ें गे बल्कि इस पत्थर के सोना होने का यकीन करें गे और अपने एहसास को फ़रामोश करें गे बल्कि मुतहम ठहराएं गे,अक्लमंद कोचाहिये कि हस की बदाहित पर भरोसा करे और मुलम्मा किए हुए मुक़द्दमात को मुतहम बनाए।
जिस मसला में हम गुफ़्तगू कर रहे हैं इस में भी ख़ुलफ़ाए सलासा की बुज़ुर्गी और बुलंदी दर्जात बल्कि तमाम सहाबा कराम हज़रत खैर अलबशर ﷺ की बुज़ुर्गी किताब वसंत के मुक़तज़ा के मुताबिक महसूस विमुशाहिद है,तान करने वाला ,क़दह पैदा करने वाला उन बुजुर्गों की शान में ज़र अंदौदा दलायल के ज़रिया उन में क़दह वतान करे वह तान उन में इस पत्थर के क़दह की तरह है जो इस के वजूद में करें और राह से भटका दें।’’
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के इस मुबारक बयान से आज तक रवाफ़िज़ की भाग दौड़ और कोशिश का हाल ज़ाहिर है सिवाए तलबीस के और कुछ हाथ नहीं आया,यह फ़िर्क़ा शनीआ अजब अहमक़ फ़िर्क़ा है,और तो और है जिन की मुहब्बत का इज़हार ही सब कुछ मजहबी सरमाया है और जिस के बल बूते पर यह फूले फूले रहते हैं यानी हज़रत अली और उन की आल पाक के सिलसिले में अगर उन की खुराफ़ात पढ़ें गे तो आप देर तक हँसीं गे,हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं:
(7)‘‘एं जमाआ बहकम तक़िया कि दारणद अकाबिर अहले बीत रा मुनाफ़िक़ विमुखादा अंगाश्ता इंद वहकम करदा इंद कि हज़रत अमीर सी(30) साल बहकम तक़िया बा ख़ुलफ़ा इसलासा सोहबत बनफ़ाक़ दाश्ता इंद वबनाहक़ ताज़ीम वित्त्व कैर ईशां नमूदा।’’
तर्जुमा: उन शीयों के यहाँ तक़िया है जिस की वजह से अकाबिर अहले बीत को मुनाफ़िक़
विमुखादा(फरेबी) तक कह दिया। चुनांचे यह कहते हैं कि हज़रत अमीर तक़िया की वजह से पूरे 30 बरसों तक तीनों ख़लीफ़ा की सोहबत में रहे और उन की ताज़ीम व तौक़ीर करते रहे।
(हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं अजीब मामला है अगर अहले बीत रसूल की मुहब्बत मुहब्बत रसूल के वास्ता से है अलैहि वालैहिम अस्सलवात वालतसलीमात,चाहिए कि दुश्मनान रसूल को भी दुश्मन रखें और दुश्मनान अहले बीत से ज़्यादा उन पर सब विलान करें,अबू जहल कि दुश्मन रसूल है अलैहि वाला आला अस्सलवात वालतहयात और मुख़तलिफ़ किस्म के आजार और बे शुमार जफ़ाएँ सरकार अलैहि अस्सलाम को पहुँचाई हैं,अलैहि वाला आला अस्सलवात वालतहयात इस जमात के किसी फ़र्द से नहीं सुना गया कि अबू जहल को बुरा कहता हो और लान करता हो और इस की बुराइयों में ज़बान खोलता हो।)
फिर फ़रमाते हैं‘‘मुख़ालिफ़ लोग तीनों ख़ुलफ़ा की खिलाफत की हक़्क़ानियत का इंकार करते हैं और उन की खिलाफत को ग़सब और तुग़्लब (जबरदस्ती हासिल करना) से मंसूब करते हैं और हज़रत अमीर के अलावा किसी को इमाम बुर हक़ नहीं जानते हैं,और हज़रत अली से जो तीनों ख़ुलफ़ा की बीअत वाक़्य हो ई उसे तक़िया पर महमूल करते हैं और अस्हाब खैर अलानाम अलैहि वालैहिम अस्सलात वस्सलाम के दरमियान सोहबत नफ़ाक़ जानते हैं और एक दूसरे को रियायत विमदारात में धोका बाज़ तसोर करते हैं क्योंकि उन के गुमान में अमीर के माफ़िक़ उन के मुख़ालिफ़ीन के साथ यकीना बहकम तक़िया सोहबत नफ़ाक़ रखते थे और जो कुछ उन के दलों में था इस के खिलाफ़ ज़बान से ज़ाहिर करते थे और मुख़ालिफ़ीन भी चूंकि उन के गुमान में दुश्मनान अमीर और दोस्तान अमीर के दुश्मन थे,नफ़ाक़ के साथ आशनाई रखते थे और दुश्मनी को दोस्ती में ज़ाहिर करते थे और जो बातिन में होता इस के खिलाफ़ ज़ाहिर करते,पस चाहिए कि उन के नज़दीक इस उम्मत के बद तरिन सहाबा कराम हूँ और सब से बुरी
सोहबत खैर अलबशर अलैहि वाला आला अस्सलात वस्सलाम की सोहबत हो क्योंकि यह बुरे अख़लाक़ इसी जगह पैदा हुए हैं,और सब से बद तरिन ज़माना सहाबा कराम का ज़माना हो कि जो नफ़ाक़ वादावत,बुग़ज़ विकीना से भरा हुआ था हालाँकि अल्लाह तआला अपने कलाम मजीद में फरमाता है:‘‘रहमआ बेन्हम’’ जब इस उम्मत के साबिक़ीन उन अख़लाक़ ज़मीमा के साथ मुत्तसिफ़ हूँ गे तो लाहक़ीन में किया खैरियत पाएं गे।’’
हज़रत अली और उन की आल पाक के सिलसिले में आप ने उन का यह हाल पढ़ा जब उन पर यह हमले हैं तो औरों की किया गिनती,उन की ख़बासत कहां तक नकल की जाए,तफ़सील के लिए देखिए मक्तूब 59,80,266,286 जिल्द अव्वल और 36,60,67 जिल्द दोम और 17 जिल्द सोम।
हम इस बहस को हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू की इस इबारत पर ख़त्म करते हैं,जिस में आप ने निहायत जामा अंदाज़ में सहाबा कराम के भी फ़र्दा फ़र्दा औसाफ़ फ़ाज़िला बयान फ़रमाए हैं,बाक़ी आप ने उन तमाम सहाबा कराम के भी फ़रदन फ़रदन फ़ज़ाइल वुमनाक़िब बयान फ़रमाए जिन की शान में मुख़ालिफ़ीन तान करते हैं,तवालत की वजह से हम ने छोड़ दिए,आप क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं:
‘‘फालहज़र अलहज़र सम अलहज़र अलहज़र सम अलहज़र अलहज़र अन तान अकाबिर उद्दीन वज़्म कबिरा उलइस्लाम अलज़ीन बज़लवा जहदहम फ़ी आला कलम उलइस्लाम विंसर सय्यद अलानाम वानफ़क़्वा अमवालहम लताएद उद्दीन बाललील वालनहार वफ़ी अलसर वालजहार,वितर्कवा लहब अलरसोल इशायरहम वक्बायलहम व औलादहम वाज़्वाजहम वावतान्हुम विमसाकिन्हुम वायोंहम विजर्वोहम वाइजारहम वानहारहम।
वाआ सरवा नफ़्स अलरसोल अलैहि वालैहिम अस्सलात वस्सलाम अला इंफ्सहम वाख़्तारवा मुहब्ता अला मुहब्तहम विमहब अमवालहम वज़रियातहम,वहम अलज़ीन नालवा शरफ़ अलसहब वफ़ाज़वा फ़ी सहबता बरकात अलंबोत विशाहदुआ अलवही विश्रफुआ बहज़ूर उलमलिक विराउआ उलख़वारिक़ वालमोजज़ात हत्ता सार ग़ैबहम शहाद,वालमहिम एना वित्वा मिन अलीक़ीन मा ला याता लाहद मिन बादहम हत्ता ला यबलिग़ इन्फ़ाक़ गैरहम मसल अहद ज़हबा मबलग़ इन्फ़ाक़ मद शएरहम विला नसीफ़ा ।
वहम अलज़ीन असना अल्लाह तआला अलैहिम फ़ी उलक़राआन उलअज़ीम वर्ज़ी अल्लाह अन्हुम वर्ज़्वा अन्हु,ज़ालिक मसलहम फ़ी इलतूरा विमसलहम फ़ी अलांजील कज़रा अख़र्ज शता ह फ़ाआ जिरह फ़ास्तग़लज़ फ़ास्तवा अला सौक़ा याजब अलज़रा लीग़ीज़ बहम अलकुफ़्फ़ार,समा अल्लाह तआला ग़ालज़हम कफारा फ़्लेहज़र अन ग़ैज़हम कमा यहज़र अन अलकुफ़र वाल्लाह सुब्हानहू उलमोफ़िक़।’’