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अध्याय 51 में से 54पृष्ठ 619–629

मुरातिब हसद

हसद के चार मुरातिब हैं:

1। दूसरे आदमी से नेमत का ज़वाल चाहे अगर पसंदीदा नेमत इस की तरफ़ मुंतक़िल नहीं होती, यह इंतिहाई दर्जा की खयानत है।

2। इस दूसरे आदमी से नेमत का ज़वाल चाहे क्यों कि यह ख़ुद इस में रगबत रखता है जैसे किसी खूब सूरत मकान या खूब सूरत अव्रत, हुकूमत या माली हैसियत जो दूसरे को हासिल है और यह चाहता है कि ख़ुद उसे हासिल हो, इस का मकसूद सिर्फ़ इस नेमत का हुसूल है, दूसरे आदमी से ज़वाल मतलूब नहीं, वह इस बात को मकरूह जानता है कि वह इस नेमत से महरूम है, दूसरे का इनाम याफताह होना नापसंद नहीं करता।

3। अपने लिए बईना इस नेमत की ख्वाहिश रखे, बल्कि इस के मसल की तमन्ना करे और अगर इस का मसल हासिल करने से आजिज़ हो जाए तो इस शख्स से इस का ज़वाल चाहे ताकि उन के दरमियान तफ़ावुत ज़ाहिर न हो।

4। अपने लिए इस के मसल की ख्वाहिश करे और अगर इस को हासिल न कर सके तो इस (दूसरे) से इस का ज़वाल न चाहे।

यह आखिरी किस्म का हसद माफ़ किया जाता है अगर दुनिया से मुताल्लिक़ हो और अगर दीन से मुताल्लिक़ हो तो मुस्तहब है। तीसरे दर्जे का हसद मज़मूम भी है गैर मज़मूम भी। दूसरे दर्जे का हसद तीसरे दर्जा से हल्का है और पहले दर्जे का हसद महज़ मज़मूम है। दूसरे दर्जे को मजाज़न हसद कहा जाता है, लेकिन यह काबिल मुज़म्मत है।

रषिक और हसद के असबाब

रषिक का सबब इस चीज़ से मुहब्बत है जिस में रषिक करता है। अगर यह दीनी अम्र हो तो इस का सबब अल्लाह तआला और इस की इताअत की मुहब्बत है और अगर वह दुनयवी बात हो तो इस का बाइस दुनिया की मुबाह अश्या की मुहब्बत और उन से लुत्फ़ अंदोज़ होना है। मज़मूम हसद के रास्ते बहुत ज़्यादा हैं, लेकिन यह तमाम सात बाबों में मुनहसिर है।

(1)अदावत (2)हुसूल इज्जत (3)तकबर (4)ख़ुद पसंदी (5)महबूब मक़ासिद के फ़ौत हो जाने का ख़ौफ़ (6)हुकूमत की ख्वाहिश (7)नफ़्स की ख़बासत और इस का बुख़ल।

इलाज:हज़रत इमाम क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं: हसद दिल की बड़ी बीमारियों में से एक है और इस का इलाज इल्म और अमल ही से हो सकता है, इस का इल्म नाफ़े यह है कि यकीन से जान लो कि हसद दुनिया और आख़िरत में नुकसान देता है और जिस से हसद किया जाए इस का कोई दीनी या दुनयवी नुकसान नहीं होता, बल्कि उसे दोनों ऐतबार से फायदा ही होता है। जब तुम बसीरत के साथ यह बात जान लोगे और तुम अपने नफ़्स के दुश्मन और अपने दुश्मन के दोस्त नहीं बनोगे तो लाज़िमन हसद से दौर होगे।’’

जहां तक दीन में हसद के नुकसान का ताल्लुक है तो इस की सूरत यह है कि तुम ने हसद के ज़रिया अल्लाह तआला के फैसले से नाराजगी का इज़हार किया और इस की इस नेमत को नापसंद किया जो इस ने अपने बंदों के दरमियान तकसीम की है नीज़ इस अदल को भी नापसंद किया जिसे इस ने अपनी पोशीदा हिक्मत के तहत अपने मुल्क में क़ायम किया है। तो तुम ने बुरा जाना और बे मजा समझा और यह तौहीद की आंख की स्याही और चश्म ईमान का कोड़ा है। दीन में तुम्हारे लिए इतना जुर्म ही काफ़ी है जब कि तुम ने इस के साथ मुसलमान से कीना भी रखा और इस की खैर ख़्वाही को छोड़ दिया। अनबीए करामअलैहिम अस्सलाम व औलीए अजामरज़ि अल्लाह अन्हुम से अलाहदा रास्ता इख्तियार किया कि वह अल्लाह के बंदों से मुहब्बत करते हैं और तुम

ने शैतान और तमाम कुफ़्फ़ार का रास्ता इख्तियार किया कि वह अहले ईमान के लिए मसाइब और ज़वाल नेमत के ख़ाहां रहते हैं। यह कलबी ख़बासतें हैं जो कलबी नेकियों को इसी तरह खाती हैं जिस तरह आग लकड़ी को जिला देती है। दुनिया में इस का नुकसान यह है कि हसद की वजह से हासिद को तकलीफ़ महसूस होती है या वह अज़ाब में मुबतला होता है और हमेशा ग़म व अलम का शिकार रहता है क्यों कि जो नेमत की वजह से हसद करता है वह इस के महसूद से अल्लाह तआला वापस नहीं लेता और हसद करने वाला जब नेअमतों से माला माल देखता है तो इस से जलता है और जब इस से कोई मुसीबत ज़ाइल होती है तो यह तकलीफ़ महसूस करता है और यों मग़्मूम व महरूम होता है, दिल परेशान और सीना तंग होता है।

हुब्ब जाह व मर्तबा की मुज़म्मत

हज़रत इमाम क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं: जाह का मतलब लोगों में मशहूर होना है और यह मज़मूम है, बल्कि गुमनामी काबिल तारीफ़ है। यह अलग बात कि अल्लाह तआला किसी दुश्मन को अपना दीन फैलाने के लिए मशहूर कर दे और इस में हुसूल शहरत के लिए कोई तकलीफ़ न हो। इस ताल्लुक से चंद अहादीस मुलाहिजा हूँ:

1। हज़रत इंसरज़ि अल्लाह अन्हु रावी कि हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया कि किसी इंसान की बुराई के लिए यही काफ़ी है कि लोग इस के दीन या दुनिया में इस की तरफ़ इशारा करें, मगर जिस को अल्लाह तआला महफूज़ रखे।(शोब अलायमान)

2। बहुत से बिखरे बाल, गुब्बार आलूद, पुराने कपड़ों वाले जिस की कोई प्रवाह नहीं की जाती अगर अल्लाह तआला पर किस्म खालें तो अल्लाह तआला उसे पूरा कर देता है।(मुस्लिम)

3। आप ﷺ फ़रमाते हैं: किया तुम्हें न बताओं कि जन्नती कौन हैं? हर कमजोर जो कमजोर कर दिया गया अगर अल्लाह तआला पर किस्म खाये तो अल्लाह तआला इस की किस्म पूरी कर देता है और दोज़ख़ी वह है जो मुतकबर अकड़ कर चलने वाला हो।(बुखारी)

माना: माल और जाह दुनिया के दो रुकन हैं। माल का माना उन चीजों का मालिक होना

है जिन से नफा हासिल किया जाता है और जाह का मतलब दलों का मालिक होना है जिन से अपनी ताज़ीम और फ़रमां बरदारी मतलूब होती है और जिस तरह मालदार आदमी दरहमों और देनारों का मालिक होता है यानी इस बात पर कादर होता है कि उन के ज़रिया अपने अग़राज़ व मक़ासिद और ख़ाहिशात की तकमील तक पहुँच सके और तमाम नफ़सानी फ़वाइद हासिल कर सके। इसी तरह जिस को जाह व मर्तबा हासिल होता है वह लोगों के दलों का मालिक होता है यानी वह उन में तसर्फ़ पर कादर होता है ताकि उन के दलों के वास्ते से उन लोगों से अपने मक़ासिद और अग़राज़ हासिल कर सके और जिस तरह आदमी मुख़तलिफ़ किस्म के पेशों से माल कमाता है इसी तरह मुख़तलिफ़ मामलात के ज़रिया लोगों के दलों को अपनी तरफ़ माइल करता है और दिल इसी वक़्त मसख़र होते हैं जब इस शख्स की मार्फत और इस पर एतिक़ाद हो तो जिस शख्स में किसी कमाल का एतिक़ाद हो वह इस के लिए झुक जाता है और जिस क़द्र कलबी एतिक़ाद होता है इसी क़द्र वह इस के लिए मसख़र भी होता है। इसी तरह इस के दिल का झुकाव इस आदमी के कमाल के मुताबिक होता है। इस में यह ज़रूरी नहीं कि वाक़ई इस में कमाल हो, बल्कि इस के जेहन व एतिक़ाद में यह हो कि वह कमाल वाला है, बल्कि कभी ऐसा भी हो जाता है कि वह अदम कमाल को कमाल समझ लेता है और इस का एतिक़ाद रखता है और इस शख्स के बारे में कमाल का यकीन रखता है क्यों कि दिल का झुकाव दिल की एक हालत और कैफियत है और दलों की हालतें उन के एतिक़ादात, उलूम व तख़ीलात के ताबे होती हैं।

ख़याल रहे कि जाह से मुतास्सिर लोग मदह और तारीफ़ में हद से बढ़ते हैं क्यों कि आदत है कि जो शख्स किसी कमाल का एतिक़ाद रखता है वह इस के फ़िक्र से खामोश नहीं रहता, लिहाज़ा इस की तारीफ़ करता है। इसी तरह इस जाह के नतीजे में ख़िदमत और मदद ली जाती है क्यों कि मोतक़िद अपने एतिक़ाद के मुताबिक इस की इताअत में बुख़ल से काम नहीं लेता है तो जिस तरह एक गुलाम अपने मालिक के अग़राज़ व मक़ासिद के लिए

इस के सामने मसख़र होता है इसी तरह यह भी जाह व मर्तबा का नतीजा, ईसार, ताज़ीम, सलाम में इबतिदा, मुहाफ़िल में आगे करना, बल्कि तमाम मक़ासिद में मुक़द्दम करता है।

ग़रज़कि किसी के कमाल का एतिक़ाद यह समरात लाता है कमाल ख़्वाह इल्मी हो या इबादत, हसन अख़लाक़, हसब व नसब, विलायत, ज़ाहिरी हसन, बदनी कुव्वत या हर वह कमाल की बात जिसे लोग कमाल समझते हैं। तो अव्वल इस शख्स का जाह व मर्तबा क़ायम हो जाता है क्यों कि मज़कूरा बाला औसाफ़ दलों में इस के मक़ाम की अज़मत को उजागर करते हैं, लिहाज़ा इस के जाह व मर्तबा के क़ायम होने का सबब हैं।

शहरत की तलब

शहरत व इज्जत की तलब के लिए आज अहले दुनिया जो जो करते हैं वह हर अक्ल मंद जानता है; चंदा देते हैं, गरीबों की उमदा करते हैं, रफ़ाह आम के काम करते हैं, लोगों को मुक़रर करते हैं कि वह उन की तारीफ़ करें, अख़बारात व रसाइल को इस्तेमाल करते हैं वगैरह वगैरह। मगर अक्सर अहले दीन भी इस में किसी से पीछे नहीं हैं; कोई तालीम व तदरीस के ज़रिया, कोई तसनीफ़ व तालीफ़ के ज़रिया, कोई अपने नारे लगवा कर, पुरजोर इस्तिकबाल करवा कर, दीनी मजलिसों में नाज़िमों के ज़रिया अपने ख़ुतबात पढ़वा कर तक़्वा व शहरत और बरतरी तलब कर रहा है। बहुत ऐसे हैं जो अपने फ़ज़ाइल अहले अकीदत में बज़ात ख़ुद बयान करते हैं और ऐसे तरीके पर कि लोग समझें बस सब से आला व अफ़ज़ल यही हैं। इस मामले में ग़ुलू इस क़द्र बढ़ता जा रहा है कि बयान से बाहर है। जरा भी ख़याल नहीं करते कि यह नफ़्स की कितनी गहरी चालें हैं, नफ़्स इमारा उन को कहां ले जा रहा है।

मशहूर उलमा की बाहम लड़ाइयां और मशाइख़ की हलक़ा बिंदियां ज़्यादा तर इसी का नतीजा हैं। हर पीर के ख़ुसूसी मुरीद इस काम के लिए मुख़तलिफ़ किस्म की जिद व जहद में मुबतला हैं, अगर किसी ने दस्त बोसी न की तो नाराज, शायान शान इस्तिकबाल न हुआ तो नाराज, अगर दीनी व दुनयवी जज़्बात रखते हैं उन को तफ़सील से न बयान किया तो नाराज। बात दर असल यह है कि आज

के दौर में तज़किया नफ़्स का काम तो बिलकुल ख़त्म हो गया,बल्कि इस के बरख़िलाफ़ नफ़्स ताकत वर करने की चीजें हर वक़्त इख्तियार की जा रही हैं, बल्कि नफ़्स की शरारतें पूरे तौर पर ज़ुहूर में आगई हैं। अब वह किताबें कहां पढ़ते हैं जिन में नफ़्स की शरारतें और बारीक चालें बयान की गई हैं, अमल तो बहुत दौर की बात है।

असबाब: शहरत व इज्जत वगैरह के लेओअपनी मदह वितारीफ़ के असबाब यह हैं:

1। सब से कवी सबब यह है कि तारीफ़ के बाइस नफ़्स समझता है कि मुझे कमाल हासिल है। जब नफ़्स को कमाल शऊर हासिल होता है तो उसे आराम मिलता है, लज़्ज़त हासिल होती है और तारीफ़ से कमाल का शऊर होता है। ख़याल रहे कि जिन औसाफ़ के ज़रिया तारीफ़ होती है वह दो किस्म के हैं। एक वह जो ज़ाहिर व वाज़िह हूँ, ऐसे औसाफ़ के ज़रिया लज़्ज़त कम हासिल होती है। दूसरे वह औसाफ़ जिन के बारे में शक हो। जब ऐसे औसाफ़ के ज़रिया तारीफ़ होती है तो लज़्ज़त ज़्यादा हासिल होती है जैसे कमाल इल्म या कमाल तक़्वा या हसन मुतअल्लिक़ पर तारीफ़ की जाए क्यों कि इंसान को बाज़ औकात अपने कमाल हसन, कमाल इल्म और कमाल तक़्वा में शक होता है और इस बात का शौक होता है कि शक ज़ाइल हो जाए और यकीन हो जाए कि उन उमूर में इस का कोई मसल नहीं, इस सेनफ़स को लज़्ज़त ज़्यादा हासिल होती है।

2। दूसरा सबब यह है कि मदह सराई इस बात पर दलालत करती है कि तारीफ़ करने वाले का दिल ममदूह की मलकियत बिन चुका है और यह इस का मुरीद, मोतक़िद और इस की मशीयत के तहत मसख़र है जब कि दलों का मालिक होना पसंदीदा और महबूब और इस के हुसूल का शऊर लजीज होता है। इसी लिए तारीफ़ करने वाला अगर ताकत वर हो और इस के काबू में आने से नफा हासिल हो जैसे अग़न्या को उमरा व वुज़रा और सलातीन तो लज़्ज़त और बढ़ जाती है क्यों कि इस में दलों की तसख़ीर है। और अगर तारीफ़ करने वाला कमजोर और

बे ऐतबार हो, कोई ताकत भी न रखता हो तो लज़्ज़त कम होती है क्यों कि इस किस्म के बे क़द्र इंसान के दिल का मालिक भी बिन जाए तो यह एक हक़ीर चीज़ पर कादर होना है। यह तारीफ़ ममदूह में कुदरत के नाक़िस होने पर दलालत करती है और इसी सबब से मुज़म्मत नापसंद होती है, दिल रंजीदा होता है और अगर अकाबिर में से कोई बुराई बयान करे तो रंज ज़्यादा होता है।

3। तारीफ़ इस बात का सबब बनती है कि सुनने वालों के दिल भी मोतक़िद हो जाएँ ख़ास कर जब कि तारीफ़ करने वाला ऐसा हो जिस की तरफ़ लोगों की तवज्जो होती है और इस की तारीफ़ काबिल ऐतबार हो। यह सब इस तारीफ़ के साथ ख़ास है जो मजमा में हो, मजमा जिस क़द्र ज़्यादा होगा इसी क़द्र लज़्ज़त ज़्यादा होगी।

4। तारीफ़ से मालूम होता है कि ममदूह बाराब शख्स है और तारीफ़ करने वाला तारीफ़ में मजबूर है ख़्वाह रगबत हो या जबरन इंसान को अपना दबदबा और रोब भी अच्छा लगता है और तारीफ़ से लज़्ज़त हासिल होती है।(माख़ूज़ अज़ अहया उलउलूम)

हुब्ब जाह का इलाज

हज़रत इमाम क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं: जिस के दिल पर जाह की मुहब्बत ग़ालिब आजाए इस का मक़सद सिर्फ़ मख़लूक़ की रियायत करना रह जाता है, लोगों के लिए दोस्ती और उन के लिए नुमाइश करना रह जाता है, वह अफ़आल व अक़्वाल में इस बात का ख़याल रखता है कि लोगों के दलों में इस का बड़ा मका म हो और यही बात मुनाफ़क़त का बीज और फसाद की जुड़ है और यह इबादात में सस्ती और दिखावे और ममनू कामों के इर्तिकाब का बाइस बनती है क्यों कि वह लोगों को अपनी तरफ़ रागब करना चाहता है; इसी लिए नबी अकर्म ﷺ ने शरफ़ व माल की मुहब्बत और उन की वजह से दीन चले जाने को नुकसान पहुँचाने वाले दो भेड़ियों के मुशाबेह करार दिया है और आप ﷺ ने यह भी फ़रमाया कि इस से नफ़ाक़ ऐसे उगता है जैसे पानी से सब्जी उगती हैकियों कि मुनाफ़क़त ज़ाहिर व बातिन के दरमियान फ़र्क़ का नाम है कौल से हो या फेअल से और जो शख्स लोगों

के दलों में मक़ाम व मर्तबा चाहता है वह मुनाफ़क़त पर मजबूर हो जाता है नीज़ वह बतकल्लुफ़ अच्छी ख़सलतीं ज़ाहिर करता है हालां कि वह उन से खाली होता है और यह मुनाफ़क़त है। पस जाह की मुहब्बत एक मोहलिक मर्ज है। लिहाज़ा इस का इलाज और दिल से इस का अज़ाला वाजिब है क्यों कि हुब्ब माल की वजह से यह भी एक फ़ित्री और तिब्बी अम्र है और इस का इलाज इल्म और अमल दोनों से मुरक्कब है।

इल्मी इलाज

इल्मी तरीका यह है कि वह सबब मालूम करे जिस की वजह से वह जाह व मर्तबा की चाहत रखता है और लोगों के जिस्मों और दलों पर मुकम्मल काबू चाहता है, उसे सूचना चाहिए कि वह जिस चीज़ का तालिब है अगर वह हासिल भी हो जाए तो ज़्यादा से ज़्यादा मौत तक रहेगी। यह उन आमाल सालहा से नहीं है जो बाक़ी रहते हैं, अगर मशरिक़ से मग़रिब तक तमाम रवे जमीन के तमाम लोग तुझे सजदा भी करें तो पचास साल गुज़रते गुज़रते वह न सजदा करने वालों में रहीं गे न यह और तुम्हारा माल भी ऐसे उन्ही लोगों की तरह होगा जो मर चुके हैं। लिहाज़ा इस के लिए दीन को न छोड़ा जाए जो अब्दी ज़िन्दगी है, कभी ख़त्म नहीं होगी और जो शख्स कमाल हक़ीक़ी और कमाल वहमी को समझ जाता है इस की निगाह में जाह व मर्तबा की कोई हैसियत नहीं रहती। हां जाह विमर्तबा की हिकारत उन्ही को हासिल होती है जिन की निगाह में आख़िरत बसी होती है।

अमली इलाज

अमली इलाज यह है कि ऐसा काम करे जिस पर मलामत की जाती है और इस तरह मख़लूक़ के दलों से इस का मक़ाम गर जाएगा, फिर इस की निगाहों में भी इस की वक़ात नहीं रहेगी, इस तरह क़बूलीयत की लज़्ज़त इस से जुदा हो जायेगी और वह गुमनामी और मख़लूक़ की तरफ़ से रोके जाने से मानूस होगा। अब वह सिर्फ़ ख़ालिक़ की क़बूलीयत पर क़नाअत करेगा। मलामती फ़िर्क़ा का यही मजहब है, वह ऐसे काम करते हैं जिस से लोगों की निगाहों से गर जाएँ और जाह की आफत से महफूज़ हो जाएँ , लेकिन जो शख्स मुक़तदा व पेशवा हो इस के लिए यह सूरत जायज़ नहीं क्यों कि इस से दलों

में दीन की बे वक़ाती पैदा होगी और जो पेशवा न हो उसे भी ममनू व नाजायज़ काम करना जायज़ नहीं। हां ऐसे काम कर सकता है जो जायज़ हूँ और उन से लोगों के दलों में क़द्र न रहे। हज़रत इमाम क़ुद्दिस सिर्रहू ने इस की कई मिसालें लिखी हैं और एक सब से मजबूत तरीका यह बयान किया है कि लोगों से अलाहिदगी इख्तियार कर के ऐसी जगह चला जाए जहां उसे कोई न जानता हो।

रियाकारी: रिया रवैत (देखना) और समा समाव (सुनना) से माख़ूज़ है। रियाकारी की तारीफ़ यह है कि अल्लाह तआला की इबादत के ज़रिया बंदों का इरादा किया जाए। जिन आमाल में रियाकारी और दिखावा होता है हज़रत इमाम क़ुद्दिस सिर्रहू ने उन्हें पांच इक़साम में तकसीम किया है:

रियाकारी के पांच इक़साम:

1। दीन के सिलसिले में बदन की नुमाइश करना यानी अपने बदन पर कमज़ोरी और जर्दी ज़ाहिर करना ताकि लोगों को वहम हो कि उसे दीन का बहुत दर्द है, बहुत ग़मगीन रहता है, इस पर आख़िरत का ख़ौफ़ ग़ालिब है, कमज़ोरी से पता चले यह बहुत कम खाना खाता है, जर्दी इस बात पर दलालत करे कि यह शब् बेदार है, मेहनती है, बाल वगैरह बिखरे हूँ यह तास्सुर देने के लिए कि ख़िदमत दीन में इन्हिमाक की वजह से बाल वगैरह सुधारने का वक़्त नहीं मिलता है।

2। लिबास और हैयत के ज़रिया दिखावा करना मसलन बाल बिखरे हुए हूँ, मूँछें कतरी या मंडी, चलते वक़्त गर्दन झुकी रखे, हरकत में ढीलापन, पेशानी पर सजदे के निशान पाक़ी रहता हो, मोटे कपड़े पहनना, अवनी जबह पहनना और उसे पिंडली तक लटकाना, मेले कचेले और फटे कपड़े रखना। मक़सद उन से यह हो कि लोग जानें कि यह बड़ा मुतबा सुन्नत है। इसी तरह पैवंद लगे कपड़े पहनना, सज्जादा पर नमाज़ यानी सूफ़िया की तरह नीले या दीगर रंगों के कपड़े पहनना हालां कि बातिन में तसव्वुफ़ से बिलकुल खाली

है। यों ही इमामा पर चादर ओढ़ना, आंखों पर पर्दा डालना ताकि मालूम हो कि निगाहों की बहुत हिफाज़त करता है। लबा में रियाकारी वावलों के कइ तबक़ात हैं।

3। गुफ़्तगू के ज़रिया रियाकारी औरणा म व नमूद करना, अहले दीन की नुमाइश वाज़ व नसीहत, हिक्मत भरी गुफ़्तगू, अखबार व आसार को याद करना ताकि रोज़ मर्राह की गुफ़्तगू में इस्तेमाल करे और लोगों को उन की इल्मी जलालत व अज़मत और अहवाल सल्फ की तरफ़ तवज्जो मालूम हो। ऐसे लोग लोगों के सामने ज़िक्र के साथ होंटों को हिलाते हैं, मख़लूक़ के सामने नेकी का हुक्म देते हैं और बुराई से रोकते हैं, बुराइयों पर सख्त गुस्से का इज़हार करते हैं और लोगों के किरदार पर अफसोस का इज़हार करते हैं, गुफ़्तगू में नरमी इख्तियार करते हैं, तिलावत कुरआन के वक़्त आवाज़ में रक्त पैदा करते हैं ताकि लोग जानें कि उन्हें बहुत ख़ौफ़ व ग़म है।

फ़क़ीर मुजद्दिदी अर्ज़ करता है कि आज इस तरह की रियाकारी बहुत आम है ख़ास कर उन तन्ज़ीमों और तहरीकों में जिन का मुतम्मा नज़र ही लोगों को अपनी तरफ़ माइल करना और उन के दलों में जगह बनाना है। अक्सर तबलीग़ करने वाले अनपढ़ और जाहिल हैं जो नफ़्स की शरारतों से बिलकुल वाकिफ़ नहीं न उन की कोई सही तरबीयत है, उन की सारी तग व दो सारी दुनिया को अपनी चंगुल में लेना है। अहले बातिल तो तस्बीह वगैरह के ज़रिया यह काम करते ही हैं, अहले हक़ को फांसने के लिए हर हर्बा इस्तेमाल करते हैं। बड़ी बड़ी बिल्डिंगों के मालिक करोड़पति हैं, लेकिन अपने मर्कज़ों में टाट पर बैठना चटाई पर सोना वगैरह कुछ इस मक़सद बातिल के लिए है, अहले हक़ भी उन रियाकारियों से खाली नहीं। बस उन से इतना फायदा है कि बहुत से लोग अहले बातिल की शरारतों से महफूज़ हैं।

4। अमल के ज़रिया रियाकारी और दिखावा करना जैसे देर तक क़याम और रुकवा व सुजूद वगैरह करना। इसी तरह रोज़े, हज, जिहाद और खाना खिलाने के ज़रिया रियाकारी वगैरह करना, बवक़्त मुलाक़ात आंखें नीची रखना, सर झुकाए रखना, वक़ार से कलाम करना, लोगों

के सामने ख़ुशू व ख़ुज़ू इख्तियार करना। इसी तरह लोगों के सामने नवाफ़िल और अज़कार व अशग़ाल ताकि लोग इबादत गुज़ार और आबिद व ज़ाहिद समझें।

5। अहबाब और मुलाक़ात करने वालों के ज़रिया दिखावा और नुमाइश करना कि दिखाए हमारे पास तो फलां फलां सेठ आते हैं, फलां फलां उलमा व मशाइख़ तशरीफ़ लाते हैं। ख़याल रहे आज के अक्सर पीर मालदार मुरीदों के ज़रिया भी यह नुमाइश करते हैं कि हम से लोग बरकत हासिल करते हैं, लोगों को इस तरह बावर किराये कि हमारा बड़ा मक़ाम है।