अध्याय 50 में से 54पृष्ठ 606–619
फिजूल मुबाहात
फिजूल मुबाहात या ज़ाइद अज़ ज़रूरत जायज़ मुबाह चीजों के बारे में फ़रमाते हैं: ए फ़रज़न्द! काम यह है कि फिजूल मुबाहात से परहेज़ करना चाहिए और मुबाहात से क़द्र ज़रूरत पर इकतिफ़ा करना चाहिए वह भी इस नियत से कि वज़ाइफ़ की अदाइगी हो सके मिसाल के तौर पर खुराक से मकसूद उदाए ताआत की कुव्वत और पोशाक से मकसूद सत्र अव्रत और गर्मी व सर्दी को दफा करना और इसी पर बाक़ी मुबाहात को कयास कर लो।
अकाबिर नक़्श बंदेह क़ुद्दिस अल्लाह तआला इसरारहम ने अज़ीमत पर अमल किया और जहां तक हो सिक्का रुखसत से बचे और अज़ीमतों से ही है कि मिक़दार ज़रूरत पर इकतिफ़ा किया जाए, और अगर यह दौलत मयस्सर न हो तो पीर को दायरा मुबाहात से बाहर नहीं रखना चाहिए और मुहरमात व मुश्तबहात तक नहीं जाना चाहिए। हक़ सुब्हानहू व तआला ने कमाल कर्म से उत्तम व अकमल तरीका पर मुबाहात के साथ तनामात और फायदे उठाना जायज़ फ़रमा दिया है और उन तनामात के दायरे निहायत फ़राख़ और कुशादा कर दिया है। उन तनामात से क़ता नज़र कौन सा एश इस के बराबर है कि इस का मौला इस शख्स के किरदार से राजी और खुश
हो जाए और कौन सी जफ़ा इस के बराबर है कि इस का आका इस की वजह से नाराज़ी में हो। अल्लाह की रज़ा जन्नत में जन्नत से बेहतर है और अल्लाह की नाराजगी दोज़ख में दोज़ख से बुरी।(मक्तूब:3, दफ्तर:1)
तर्क दुनिया
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के मक्तूब:2, दफ्तर अव्वल का खुलासा यह है कि दुनिया को दीन के साथ जमा करना ऐसा है जैसे दो जिद्दों को जमा करना और यह मुमकिन नहीं, एक है तो दूसरी मफ़क़ूद। लिहाज़ा जो आख़िरत का तालिब हो इस के लिए तर्क दुनिया लाज़िम व ज़रूरी है। यह तर्क दो किस्म का है। एक तर्क हक़ीक़ी कि दुनिया से मुकम्मल अलाहिदगी ज़ाहिरन भी अपना ली जाए, यह इस वक़्त मुश्किल है, लिहाज़ा बजरूरत। तर्क हुक्मी जो दूसरी किस्म है, को अपना जाए। तर्क हुक्मी का मतलब यह है कि दुनयवी उमूर में हुक्म शरीअत के मुताबिक अमल किया जाए और खाने पीने की चीजों और मकानात में शरई हदूद की रियायत की जाए और उन हदूद से आगे न बढ़ा जाए। जिन मालों और जानवरों पर ज़कात फर्ज़ है वह दी जाए। जब अहकाम शरएहि से आरास्तगी हो जायेगी तो दुनिया के जरुर से निजात हासिल हो जायेगी और आख़िरत के साथ जमा हो जायेगी। और अगर यह तर्क हुक्मी भी मयस्सर न हो तो ऐसा शख्स बहस से खारिज है, मुनाफ़िक़ का हुक्म रखता है। सूरत ईमान यानी बजाहिर ईमान वाले की ज़बान से कलिमा गोई आख़िरत में फायदा मंद न होगी, इसी ज़ाहिरी ईमान का फायदा सिर्फ़ जान और दुनयवी अम्वाल की हिफाज़त है।
माल की मुज़म्मत
माल की मुज़म्मत और हुब्ब माल की बुराई, आयात:
۱۔یٰۤاَیُّہَا الَّذِیۡنَ اٰمَنُوۡا لَا تُلْہِکُمْ اَمْوَالُکُمْ وَ لَاۤ اَوْلَادُکُمْ عَنۡ ذِکْرِ اللہِ ۚ وَ مَنۡ یَّفْعَلْ ذٰلِکَ فَاُولٰٓئِکَ ہُمُ الْخٰسِرُوۡنَ (سورۃ النافقون: ۶۳؍۹)
तर्जुमा: ए ईमान वालो तुम्हारे माल न तुम्हारी औलाद कोई चीज़ तुम्हें अल्लाह के ज़िक्र से गाफिल न करे और जो ऐसा करे तो वही लोग नुकसान में हैं।’’
۲۔ اِنَّمَاۤ اَمْوَالُکُمْ وَ اَوْلَادُکُمْ فِتْنَۃٌ ؕ وَ اللہُ عِنۡدَہٗۤ اَجْرٌ عَظِیۡمٌ (سورۃ التغابن:
तर्जुमा: तुम्हारे माल और तुम्हारे बचे जांच ही हैं और अल्लाह के पास बड़ा सवाब है।’’
3। मनۡ कान युरीۡद उलहयात अलदनिया व ज़ीۡनितिहा (सूरत हौद: 11/15)
तर्जुमा: जो दुनिया की ज़िन्दगी और आराइश चाहता हो।’’
۴۔ کَلَّاۤ اِنَّ الْاِنۡسَانَ لَیَطْغٰۤی اَنۡ رَّاٰہُ اسْتَغْنٰی (سورۃ العلق: ۹۶؍۶،۷)
तर्जुमा: हां हां बे शक आदमी सुरक्षी करता है इस पर कि अपने आप को ग़नी समझ लिया।’’
अहादीस:
1। माल और बड़ाई की मुहब्बत दिल में मुनाफ़क़त पैदा करती है जैसे पानी सब्जी उगाता है।
2। दो भूके भेड़िये जो बकरियों के रेवड़ में छोड़ दिए जाएँ वह इस क़द्र नुकसान नहीं करते जितना नुकसान मुसलमान आदमी के दीन में जाह व मर्तबा और माल की मुहब्बत से होता है।
3। ज़्यादा माल वाले हलाक हुए, मगर जिस ने अपना माल अल्लाह तआला के बंदों में इस तरह और इस तरह कर दिया और ऐसे लोग बहुत कम हैं। (कंज़ उलअमाल, उलमाजम अलकबीर, मसंद इमाम अहमद)
4। तुम्हारे बाद अन्क़रीब कौम आयेगी जो दुनिया के मजे मजे के और रंग बिरंगे खाने खायें गे, उम्दा और तेज रफ़्तार घोड़ों पर सवार हूँ गे, खूब सूरत ऊरतों से निकाह करें गे और रंग बिरंग उम्दा कपड़े पहनें गे, उन के पेट थोडी चीज़ से सेराब नहीं हूँ गे और उन के नफ़्स ज़्यादा पर भी सब्र नहीं करें गे। वह दुनिया पर इस तरह से झुक जाएँ गे कि सुबह शाम वही मद नज़र
होगी। वह इसी को अपना रब और माबूद समझें गे, इसी की बात मानें गे और ख़ाहिशात की पैरवी करें गे। जो आदमी ऐसे जमाने को पाए वह तुम्हारे औलाद हो या औलाद की औलाद से उसे हज़रत मुहम्मद इब्न अब्द अल्ला ﷺ की तरफ़ से किस्म है कि ऐसे लोगों को सलाम न करे, न उन के मरीजों की इयादत करे, न उन के जनाज़ों के पीछे जाए और न उन के बड़ों की इज्जत करे जिस ने ऐसा किया इस ने इस्लाम को गिराने में मदद की। (उलमाजम अलकबीर)
मालूम हो कि माल को कुरआन पाक में खैर से ताबीर किया गया, इरशाद है:
उन्नۡ तर्क ख़ीۡरब्बा (सूरत अलबकर: 2/180)
तर्जुमा: अगर कुछ माल छोड़े।’’
وَ یَسْتَخْرِجَا کَنۡزَہُمَا ٭ۖ رَحْمَۃً مِّنۡ رَّبِّکَ (سورۃ الکہف: ۱۸؍۸۲)
तर्जुमा: और अपना खजाना निकालें आप के रब की रहमत से।’’
وَّ یُمْدِدْکُمْ بِاَمْوَالٍ وَّ بَنِیۡنَ وَ یَجْعَلۡ لَّکُمْ جَنّٰتٍ وَّ یَجْعَلۡ لَّکُمْ اَنْہٰرًا (سورۃ نوح: ۷۱؍۱۲)
तर्जुमा: और माल और बेटों से तुम्हारी मदद करे गाऔर तुम्हारे लिए बाग बनादे गा और तुम्हारे लिए नहरें बनाए गा।’’
इस से पहले आप मुज़म्मत पढ़ चुके, यह दोनों बातें माल में क्यों और कैसे जमा हुईं, इस को अहया उलउलूम शरीफ़ में तफ़सील से बयान फ़रमाया, हम इसी से अख़ज़ करके कुछ फ़वाइद और नुक़्सानात बयान करते हैं जिस से काफ़ी हद तक आप को माल के इस्तेमाल का सही तरीका और आख़िरत के लिए बेहतरीन मुआविन होना मालूम हो जाएगा।
माल के फ़वाइद
माल के फ़वाइद दो तरह के हैं: (1)दुनयवी फ़वाइद (2)दीनी फ़वाइद। दुनयवी फ़वाइद के ज़िक्र की हाजित नहीं क्यों कि मशहूर हैं और मख़लूक़ की तमाम अक़सा में मुश्तर्क हैं। अगर यह बात न होती तो वह इस की तलब में हलाक न होते। रहे
दीनी फ़वाइद तो वह तीन किस्म के हैं:
1। अपने आप पर या इबादत पर खर्च करे या इबादत पर मदद हासिल करने के लिए खर्च करे। इबादत पर खर्च जैसे हज के लिए, जिहाद के लिए खर्च करना है क्यों कि यह काम बग़ैर माल के नहीं होते और यह दोनों काम तमाम इबादात की असल हैं । फ़क़ीर आदमी उन की फ़ज़ीलत से महरूम रहता है और जो काम इबादत पर कुव्वत देता है वह खाना, लिबास, रिहायश, निकाह और दीगर जरूरीयात ज़िन्दगी हैं क्यों कि हाजितें जब हासिल नहीं होती हैं तो दिल उन की तदबीर में मसरूफ़ होता है और दीन के लिए फ़ारिग़ नहीं हो पाता है और जिस चीज़ के बग़ैर इबादत तक न पहुँच सके वह भी इबादत होती है। लिहाज़ा ज़रूरत के मुताबिक माल लेना दीनी फ़वाइद से है और ज़रूरत से ज़ाइद लेना फ़वाइद में दाखिल नहीं और अय्याशी इस में दाखिल नहीं क्यों कि वह महज़ दुनयवी हिस्सा है।
2। वह माल जो लोगों पर सिर्फ़ किया जाए इस की चार किस्में हैं: (1) सदक़ा देना (2)मुर्व्वत के तौर पर देना (3)इज्जत की हिफाज़त के लिए देना (4)ख़िदमत के लिए अजरत देना। सदक़ा का सवाब पोशीदा नहीं है। मुर्व्वत से हमारी मुराद यह है कि मालदार और माज़िज़ लोगों की मेहमान नवाजी पर खर्च कियाजाये या तोहफा या मदद की जाए, इस को सदक़ा नहीं कहते, बल्कि सदक़ा वह होता है जो ज़रूरत मंद लोगों को दिया जाए, लेकिन यह दीनी फ़वाइद में से है क्यों कि इस तरह इंसान को दोस्त और भाई मिल जाते हैं नीज़ इस तरह सिफ़त सखावत हासिल होती है क्यों कि सिफ़त सखावत से इस वक़्त मौसूफ़ होता है जब लोगों के साथ एहसान और मुर्व्वत का सुलूक करता है। इस अमल का भी सवाब बहुत बड़ा है। तहाइफ़, मेहमान नवाजी और मुहताजी व फक्र के बग़ैर खाना खिलाने के सिलसिले में बे शुमार अहादीस आई हैं। इज्जत बचाने से मुराद यह है कि आदमी इस लिए माल खर्च करे ताकि शोअरा और बे वक़ूफ़ लोग इस के खिलाफ़ बुरा कलाम इस्तेमाल न करें। इस तरह वह उन की जुबानें बंद करता और उन के शर को दौर करता
है। इस का फायदा अगरचे दुनिया में फौरी हासिल होता है, लेकिन इस का दीनी फायदा भी है।
हदीस में है: जिस माल के ज़रिया आदमी अपनी इज्जत की हिफाज़त करता है वह इस के लिए सदक़ा लिखा जाता है। यह खर्च दीनी क्यों नहीं होगा, जब कि इस के ज़रीआ ग़ीबत करने वाले को ग़ीबत और दुश्मन और हासिद को इस के ज़रिया हसद और दुश्मनी के शर से रोका जाता है।
जहां तक ख़िदमत का ताल्लुक है तो आदमी अपने असबाब की तैयारी में जिन कामों का मुहताज होता है वह बहुत ज़्यादा हैं। अगर वह ख़ुद ही तमाम करने लगे तो परेशानी होगी और आख़िरत की राह चलना दुश्वार होगा और ज़िक्र व फ़िक्र जो सालकेन के बुलंद मुक़ामात हैं उन की बजा आवरी न हो सकेगी।
3। किसी ख़ास आदमी पर माल खर्च करे, लेकिन इस से आम लोगों को फायदा हासिल हो जैसे मसाजिद, पल, सराय और बीमारों के लिए अस्पताल वगैरह बनवाना (या आज के जमाने में मदारिस अरबिया) पानी की सबीलें लगाना और इस के अलावा अच्छे मक़ासिद के लिए जमीन वक्फ करना, यह दाइमी खैरात है जिस का फायदा मरने के बाद भी हासिल होताहै और मुद्दतों नेक लोग इस फ़ौत शुदा के लिए दुआ करते हैं और दुआओं की बरकात उसे हासिल होती हैं। इस से बढ़ कर किया बेहतरी हो सकती है। यह दीन के ऐतबार से माली फायदे हैं, इस के अलावा दुनयवी फ़वाइद भी हैं मसलन वह मांगने की जिल्लत और फक्र की हिकारत से महफ़ूत रहताहै।
माल की आफतीं
माल की आफतीं दीनी भी हैं और दुनयवी भी। दीनी नुक़्सानात तीन किस्म के हैं:
1। माल गुनाह की तरफ़ ले जाता है क्यों कि ख़ाहिशात का तक़ाज़ा हमेशा जारी रहता है ओरमाल से अजुज़ बाज़ औकात आदमी और गुनाह के दरमियान हाइल हो जाता है और कादर
न होना भी बचने का एक ज़रिया है। माल गुनाहों की एक किस्म की ताकत है जो गुनाहों के शौक को हरकत देता है और फ़िस्क़ व फ़ुजूर में मुबतला करता है। अगर वह अपनी ख्वाहिश पर अमल पेरा होता है तो हलाक होता है और अगर सब्र करता है तो शिद्दत का सामना करना पड़ता है क्यों कि ताकत व कुव्वत के बावजूद सब्र मुश्किल है और फ़राखी की हालत में जो आज़माइश होती है वह तंगी की हालत की आज़माइश से ज़्यादा बड़ी होती है।
2। माल मुबाह कामों में एश व इशरत तक पहुँचाता है और यह सब से पहला दर्जा है तो मालदार आदमी से ऐसा कब हो सकता है कि वह जो की रोटी खाये, सख्त खुरदरे कपड़े पहने और लजीज खाने छोड़ दे जैसा कि हज़रत सुलेमानअलैहि अस्सलाम ने अपनी सल्तनत में ऐसा किया था। ऐसा आदमी तो दुनिया की नेअमतों से नफा उठाता है और इस का नफ़्स इस बात का आदी हो जाता है। यों इस को अय्याशी से उलफ़त होती है और वह इस का ऐसा महबूब बिन जाती है जिस से वह सब्र नहीं कर सकता है। इस तरह एक से दूसरी अय्याशी तक जाता है और जब इस से इंस पक्का हो जाता है और बाज़ औकात वह हलाल कमाई से इस तक नहीं पहुँच पाता तो शुबहात में पड़ता है और रियाकारी, मुनाफ़क़त, झूट और तमाम बुरी आदात में गौर व ख़ौज़ करता है ताकि इस का दुनयवी मामला मुनज़्ज़म हो और अय्याशी के लिए आसानी हो क्यों कि जिस का माल ज़्यादा होगा लोगों की रजामंदी हासिल करने के लिए अल्लाह तआला की नाफ़रमानी करता है।
अगर आदमी पहली आफत से बच भी जाए तो भी तो इस (लोगों की तरफ़ हाजित) से नहीं बच सकता और जब मख़लूक़ की तरफ़ हाजित हो तो दोस्ती और दुश्मनी भी पैदा होती है और इस से हसद, कीना, रिया, तकबर, झूट, चुगली, ग़ीबत और ऐसे तमाम गुनाह पैदा होते हैं जो दिल और ज़बान के साथ ख़ास हैं और फिर यह तमाम आज़ा की तरफ़ मुतअद्दी होते हैं और यह सब कुछ माल की नहूसत और इस की हिफाज़त और इसलाह की हाजित के
3। यह वह आफत है जिस से कोई भी नहीं बचता, वह यह कि माल की इसलाह उसे अल्लाह तआला के ज़िक्र से गाफिल कर देती है और जो काम बंदे को अल्लाह तआला से गाफिल कर दे वह नुकसान का बाइस है।
हज़रत ईसाअलैहि अस्सलाम ने फ़रमाया: माल में तीन आफतीं हैं। एक यह कि हराम तरीके से हासिल करे, अर्ज़ किया गया: अगर हलाल तरीके से हासिल करे तो? फ़रमाया: उसे नाहक इस्तेमाल करता है, पूछा: अगर सही मक़ाम पर खर्च करे तो? फ़रमाया: इस की इसलाह उसे अल्लाह तआला से गाफिल कर देती है।’’
यह लाइलाज मर्ज है क्यों कि इबादत की असल व मग़ज़ और राज़ अल्लाह तआला के ज़िक्र और इस के जलाल में तफ़कर है। इस का तक़ाज़ा यह है कि दिल फ़ारिग़ हो जब कि माल और साज़ व सामान वाला सुबह शाम किसी न किसी से उलझाव में रहता है या इस से हिसाब किताब होगा। इसी तरह शुरका के साथ पानी और जमीन की हदूद का झगड़ा रहता है। ख़राज के सिलसिले में हुकूमती कारिंदों से और तामीर में कोताही के सिलसिले में मजदूरों से इख़तिलाफ़ नीज़ काशित कारों से खयानत और चोरी के हवाले से झगड़ा रहता है। ताजिर को अपने शरीक की तरफ़ से खयानत की फ़िक्र रहती है नीज़ यह कि वह नफा ज़्यादा लेता है और काम में कोताही करता है। अलावा इस के माल को ज़ाए करता है। इसी तरह जानवरों का मालिक भी इसी किस्म के मिसाइल से दोचारहोता है, बल्कि माल की कोई भी सूरत हो यही परेशानी रहती है। हां दफ़ीनों में मशगूलियत कम होती है अगरचे यहाँ भी दिल का तर्दद बाक़ी रहता है कि कहां खर्च करे, इस की हिफाज़त कैसे करे, इस पर लोग मतला न हो जाएँ।
ग़रज़कि दुनयवी अफ़्क़ार की वादियों की कोई इन्तहा नहीं है और जिस आदमी के पास एक दिन का खाना हो वह उन तमाम बातों से महफूज़ है। यह दुनयवी आफतीं हैं। उन के अलावा
भी दुनियादारों को परेशानी, ग़म, ख़ौफ़, हासिदों के हसद को दौर करने की मशक्कत, माल की हिफाज़त और कमाई के सिलसिले में सख्त ख़तरात हैं। लिहाज़ा माल का तिरयाक़ (इलाज) यह है कि इस से गुज़र औकात लेने के बाद बाक़ी अच्छे कामों पर खर्च कर दे क्यों कि इस के अलावा जो कुछ है वह ज़हर और आफत है।
गुस्सा: आम तौर पर लोग जानते हैं कि गुस्सा किया है। अक्सर अहले इल्म इस के नुक़्सानात भी जानते हैं। इस में भी इबतलए आम है। हम गुस्से के ताल्लुक से चंद उमूर सुपुर्द कलम करते हैं। मज़ेद तफ़सील के लिए अहया उलउलूम देखिए।
गुस्सा पीने की फ़ज़ीलत:
1। ख़ुदावंद क़ुद्दूस जल व अला फरमाता है:
वाल्काज़मीۡन अलग़ीۡज़ (सूरत आल इमरान: 3/134)
तर्जुमा: और गुस्सा पीने वाले।’’
यह बात तारीफ़ के मक़ाम में फ़रमाई है।
अहादीस:
1। जो शख्स अपने गुस्से को रोकता है अल्लाह तआला इस से अपने अज़ाब को रोकता है और जो अल्लाह तआला की बारगाह में उज़्र पेश करता है अल्लाह तआला इस का उज़्र कबूल फरमाता है और जो अपनी ज़बान को रोकता है अल्लाह तआला इस के ऐबों पर पर्दा डालता है। (मजमा अल्ज़वाइद)
2। जिस ने गुस्सा पी लिया हालां कि अगर वह गुस्सा निकालना चाहता तो निकाल लेता बरोज़ कयामत अल्लाह तआला इस का दिल रज़ा से भर दे गा।(ईज़न)
3। किसी बंदे ने अज्र के ऐतबार से इस घोंट से बड़ा घोंट नहीं पिया जो गुस्सा का घोंट पिया जाए रज़ाए इलाही के लिए।(संन इब्न माजा)
4। बेशक जहनम का एक दरवाजा है जिस से वही शख्स दाखिल होगा जो अपने गुस्से को
अल्लाह तआला की नाफ़रमानी के साथ निकालता है।
5। जो शख्स गुस्सा निकालने की ताकत के बावजूद उसे पी जाता है अल्लाह तआला कयामत के दिन उसे बुला कर इख्तियार देगा कि जिस हूर को चाहे ले ले।(मसंद इमाम अहमद)
असबाब: हज़रत यहा अला नबीना व अलैहि अस्सलात वस्सलाम ने हज़रत ईसाअलैहि अस्सलाम से पूछा कि कौन सी चीज़ ज़्यादा सख्त है? फ़रमाया: अल्लाह तआला का गजब, पूछा: कौन सा काम इस गजब के क़रीब करता है? फ़रमाया: गुस्सा, पूछा: गुस्सा किस वजह से पैदा होता है, फ़रमाया: तकबर, फख्र, ख़ुद साख़ता इज्जत और झूटी हमीयत, ख़ुद पसंदी। मज़ाह, गैर संजीदगी, आर दिलाना, बात काटना, मुखालफत करना, धोका देना, ज़ाइद माल और जाह व मर्तबे की शदीद हिर्स गुस्सा दिलाने वाले असबाब हैं। यह सब घटिया और रजील आदतें हैं जो शरण मज़मूम हैं और जब तक यह असबाब मौजूद हूँ गे गुस्से से बचना ना मुमकिन है। लिहाज़ा ज़रूरत है कि असबाब गजब को ज़ाइल किया जाए। उन असबाब को कैसे दौर किया जाए, देखिए अहया उलउलूम, जिल्द सोम।
फायदा: मालूम रहे कि मज़कूरा बाला उमूर में जिन की वजह से गुस्सा आता है, जब यह उमूर ख़त्म हो जाएँ गे तो गलत गुस्सा ही नहीं आएगा और अगर असबाब ख़त्म न हूँ और गुस्सा आये तो हज़रत इमाम क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि सब्र व इस्तिक़ामत का रास्ता इख्तियार किया जाए ताकि वह बुरे तरीके से अमल पर मजबूर न हो जाए। जब गुस्से में जोश पैदा होजाता है इस का इलाज इल्म और अमल से होता है। इल्म के ताल्लुक से छ बातें हैं:
छ बातें:
(1)उन रिवायतों में गौर करे जो गुस्सा पी जाने, माफ़ करने और बुर्दबारी के बारे में आई हैं।
(2)ख़ुद को गजब इलाही से बायं तौर डराय मसलन कहे कि अल्लाह तआला मुझ पर ज़्यादा
ताकत रखता है जिस क़द्र में इस पर रखता हूँ, अगर में गुस्सा करूँ गा तो अल्लाह तआला मुझ पर गजब फरमाएगा और इस वक़्त माफी की ज़रूरत होगी।
(3)अगर नफ़्स आख़िरत का ख़ौफ़ न रखता हो तो उसे गुस्सा के दुनयवी अंजाम से डराय कि इस से अदावत और इंतिक़ाम का सामना करना पड़ेगा, दुश्मन मुक़ाबिल हो जाएगा, मक़ासिद ख़त्म करने की कोशिश करेगा और मसाइब का सामना करना पड़ेगा। ख़याल रहे कि इस का उखरवी आमाल से कोई ताल्लुक नहीं और न इस पर सवाब है। हां अगर यह नियत करे कि इस की वजह से दुनिया में इल्म व अमल के लिए फ़राग़त नहीं रहेगी और आख़िरत के लिए मदद मयस्सर नहीं आयेगी तो गुस्सा तर्क करने पर सवाब मिले गा।
(4)गुस्सा के वक़्त जो इस की अपनी शक्ल बिगड़ती है इस में गौर करे यानी याद करे कि हालत गजब में फलां की शक्ल कैसे बिन गई थी, बल्कि गुस्से की ज़ाती खराबी में गौर करे कि गुस्सा वाला बावले कुत्ते या हमला आवर जानवर की तरह हो जाता है और जो शख्स बुर्दबार, हिदायत याफताह और गुस्सा का तारक होता है वह अनबीए करामअलैहिम अस्सलाम और औलीए अजाम अलैहिम अलरहम व इलरिज़्वान के मुशाबेह होता हैये इस की पसंद कि वह कुत्तों औरघटिया इंसानों से मुशाबहत इख्तियार करता है या औलीए कराम और अनबीए कराम अलैहिम अस्सलाम की आदतों से।
(5)उन सब के बारे में गौर करे जो इंतिक़ाम की दावत और गजब पी जाने से रोकता है। यह तै है कि इस का कोई सबब जरूर होगा मसलन शैतान उसे यह कहता है कि अगर तुम नेइंतिक़ाम और बदला न लिया तो दूसरा शख्स उसे तुम्हारे अजुज़ और जिल्लत नफ़्स पर महमूल करेगा और तो लोगों की नजरों में हक़ीर व ज़लील होगा। ऐसी सूरत में नफ़्स से कहे कि ताजब है कि इस वक़्त तुम्हें बुर्दबारी अच्छी नहीं लगती और तुम कयामत के दिन ज़लील व रुस्वा होने से नफरत नहीं करते वगैरह वगैरह।
(6)गुस्सा वाले के जेहन में रहना चाहिए कि इस का गुस्सा इस वजह से है कि इस
का काम इस के रहने इरादे के मुताबिक नहीं हुआ, बल्कि अल्लाह तआला की मुराद के मुताबिक हुआ तो वह कैसे कह सकता है कि मेरी मुराद अल्लाह तआला की मुराद से ज़्यादा बेहतर है और क़रीब है कि इस पर अल्लाह तआला का गजब हो।
अमल:से मुराद यह है कि वह जो दुआ वगैरह पढ़े। हदीस शरीफ़ है कि गुस्से के वक़्त आऊۡज़ बिल्लाह मन अलशसीۡतान अलर्रजीۡम पढ़ना चाहियेनीज़ इस के अलावा भी दुआएं आई हैं। अगर इस तरह गुस्सा न जाए तो खड़ा हो तो बैठ जाए और अगर बैठा हो तो लेट जाए इस तरह इस जमीन से क़रीब हो जाए जिस से उसे पैदा किया गया और नफ़्स की जिल्लत पहचान ले।
हदीस शरीफ़ में है: बेशक गुस्सा एक शोला है जो दिल में भड़कता है, किया तुम इस की रगें फूलने और आंखों की सुर्खी को नहीं देखते तो जब तुम में कोई इस में से कोई बात पाए तो अगर खड़ा हो तो बैठ जाए और अगर बैठा हो तो सौ जाए।(शोब अलायमान)
उन के अलावा भी अक्सर हदीस में मज़ेद इलाज बताये गए हैं मसलन ठंदे पानी से वुज़ू या ग़ुस्ल करना इसी तरह खामोश हो जाना।
तंबीया:मालूम रहे कि गुस्सा के जहां बे शुमार नुक़्सानात हैं वहीं एक जबरदस्त नुकसान यह है कि जो आदमी बात बात पर गुस्सा करता है, लोग इस से भागने लगते हैं। इरशाद व इसलाह और दावत व तबलीग़ के कामों में बहुत बड़ी रुकावट बनता है, कुरआन शरीफ़ में है:
وَلَوْ کُنۡتَ فَظًّا غَلِیۡظَ الْقَلْبِ لَانۡفَضُّوۡا مِنْ حَوْلِکَ (سورۃ آل عمران: ۳؍۱۵۹)
तर्जुमा: ए महबूब तुम उन के लिए नरम दिल हुए और अगर तुंद मिजाज सख्त दिल होते तो वह जरूर तुम्हारी गिर्द से परेशान होजाते।’’
क़िबला आलम ख़्वाजा अहमद सईद मुहाजिर मदनी क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं: जब में वालिद
बुज़ुर्गवार के विसाल के बाद सजाह नशीन हुआ और इरशाद व हिदायत की जिम्मा दारियां आइद हुईं तो फ़िक्र हुई कि हमारे मिजाज में गुस्सा ज़्यादा है और यह इस काम के मुनाफ़ी है तो फ़रमाते हैं, दुआ माँगी, अल्लाह तआला के फजल व कर्म से गुस्सा सर्द पड़ गया। हर पीर व आलम को चाहिए कि गुस्सा व गर्मी से हरगिज़ हरगिज़ काम न ले।
हसद:हसद केने काऔर कीना गुस्सा का नतीजा है। हसद की बहुत सी मज़मूम फ़ुरूआत हैं जो शुमार से बाहर हैं और ख़ास हसद की मुज़म्मत में बहुत सी रवायात आई हैं:
1। हुज़ूर ﷺ फ़रमाते हैं: अलहसद याकुल उलहसनात कमा ताकुल अलनार अलहतब
हसद नेकियों को इस तरह खा जाता है जिस तरह आग लकड़ी को।(संन इब्न माजा)
2। दूसरी हदीस में है कि एक दूसरे से हसद न करू, एक दूसरे से क़ता ताल्लुक न करू, एक दूसरे से दुश्मनी न रखो और एक दूसरे से पीठ न फेरो (या जड़ें न काटू) और अल्लाह के बिंदु! भाई भाई हो जाओ।(बुखारी वगैरह)
3। हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया: अन्क़रीब मेरी उम्मत तक पहली उम्मतों की बीमारी पहुँचेगी, सहाबा करामरज़ि अल्लाह अन्हुम ने अर्ज़ किया: किया बीमारी है? फ़रमाया: अकड़, तकबर, कसरत माल की ख्वाहिश, एक दूसरे से दूरी और हसद हतिया कि सुरक्षी हो जाए और फ़ित्ना पैदा होगा।(अलमुस्तदरक ललहाकिम)
हसद हमेशा नेमत पर होता है जब तुम किसी की नेमत देखो तो तुम्हारी दो हालतें होती हैं। एक यह कि तुम इस नेमत को नापसंद करू, इस के ज़वाल को पसंद करू, इस हालत को हसद कहते हैं। गोया हसद नेमत को नापसंद करना और इनाम याफताह से नेमत का ज़वाल चाहना है। दूसरी हालत यह कि तुम इस का ज़वाल पसंद न करू और इस के बावजूद, दवाम को मकरूह न जानू, लेकिन तुम्हारा दिल चाहता हो कि तुम्हें भी इस किस्म की नेमत मिले उसे रषिक और मुनाफ़िस्त कहते हैं। बाज़ औकात हसद को मुनाफ़िस्त और मुनाफ़िस्त को हसद कहा जाता है।
पहली हालत हर हाल में हराम है। अलबत्ता किसी काफ़िर या बदकार को कोई नेमत मिले तो चों कि वह उसे फ़ित्ना अंगेज़ी के लिए इस्तेमाल करता है और लोगों को नुकसान पहुँचाता है, लिहाज़ा उसे नापसंद करे और इस के ज़वाल की तमन्ना करने में कोई हर्ज नहीं, मुनाफ़िस्त हराम नहीं, बल्कि वाजिब या मुस्तहब या मुबाह है।