अध्याय 30 में से 54पृष्ठ 361–371
काबिल रषिक मालदार
हां वह अमीर जो माल व गुना की वजह से न किसी दाम का इर्तिकाब करे न ही बदाख़लाक़ी का शिकार हो, अर्बाब हुक़ूक़ के हुक़ूक़ के साथ साथ माल व ज़र को हर वक़्त हक़ की राहों में खर्च करने पर मुसल्लत हो, हर मोड़ पर हक़ की मदद करता हो ऐसा मालदार निहायत खुश नसीब है, ऐसे को हदीस शरीफ़ में काबिल रषिक करार दिया गया जो मालदार भी हो, हर वक़्त हक़ का मददगार भी हो और तहसील माल की वजह से कमालात से महरूम न रहा हो ऐसे मालदार का किया कहना, मगर तूल हिसाब से यह भी नहीं बच सकता है। चाहे उन फ़िक़रा के मुक़ाबिल दीगर नेकियों में इस के हम पल्ला और बराबर हूँ।
तहसील गुना में कण उमूर का लिहाज ज़रूरी है
ग़रज़कि एक दर्जा गुना का यह
है कि इंसान को बक़दर कफ़्फ़ाफ़ रोज़ी मिले और इस की दुनयवी हाजात पूरी होती रहीं । रहने के लिए मकान, खान पीना और रोज़ मर्राह के अख़राजात जो सब एतिदाल पर मबनी हूँ , बक़दर कफ़्फ़ाफ़ रोज़ी जिस से अहले व अयाल की परवरिश हो सके बहसन नियत बहुत सवाब रखती है। इस क़द्र रोज़ी के लिए हलाल ज़राए इख्तियार करना और वह इसी तरीका पर जो कुरआन शरीफ़ में बयान हुआ:
رِجَالٌ ۙ لَّا تُلْہِیۡہِمْ تِجَارَۃٌ وَّ لَا بَیۡعٌ عَنۡ ذِکْرِ اللہِ وَ اِقَامِ الصَّلٰوۃِ وَ اِیۡتَآءِ الزَّکٰوۃِ (سورۃالنور: ۲۴؍۳۷)
तर्जुमा: वह मर्द जिन्हें गाफिल नहीं करता कोई सौदा और न खरीद व फरोख्त अल्लाह की याद और नमाज़ बरपा रखने और ज़कात देने से।’’
मुख़्तसर यह कि इस रोज़ी के लिए न ज़िक्र इलाही से गफलत हुई और न हिर्स और नफ़्स की लालच। मुतअद्दिद अहादीस में अशराफ़ नफ़्स के साथ माल हासिल करने की मुज़म्मत आई है जो बुला लालच मिले वह ले।
तीसरे,हदीस शरीफ़ में है कि हज़रत अयूबअलैहि अस्सलाम ग़ुस्ल फ़रमा रहे थे कि सोने की टिडियां बरसें, वह दामन में जमा करने लगे, ग़ैब से आवाज़ आई: किया हम ने तुम्हें ग़नी और बे नयाज़ नहीं किया? अर्ज़ किया: हां, लेकिन ला ग़ना ली अन बरकतक (ए अल्लाह तेरी बरकत से कभी भी गुना नहीं) मालूम हुआ जब अल्लाह तआला दे तो मुँह न फेरे कोई भी नेमत हो।
चौथे, तकासर न हो कि यह गफलत का बाइस है, इरशाद इलाही है:
इलहाकम इलत्तकासर हत्ताई ज़रतुम उलमुक़ाबर (सूरयलतकासर: 102/1,2)
तर्जुमा: तुम्हें गाफिल रखा माल की ज़्यादा तलबी ने यहाँ तक कि तुम ने कब्रों का मुँह देखा।’’
पाँचवीं, तफ़ाख़ुर न हो। मज़कूरा बाला आयात आप पढ़ चुके कि दुनिया की ज़िन्दगी खेल कूद
जीनत और आपस में फख्र करना और माल व औलाद में कसरत हासिल करने का नाम है। छुटे माल की वजह से जो बदाख़लाक़ीयां पैदा होती हैं उन से बचे जैसे तकबर, गरीबों को हिकारत से देखना, रियाकारी के लिए खर्च करना, खर्च पा या ऐसे ही मदह और ताज़ीम का हर जगह ख़ाहां रहना, हुब्ब दुनिया जिस से दीगर तमाम बीमारियां बुख़ल वगैरह पैदा होती हैं । सातवें, चाहिए कि रहने सहने खाने पीने वगैरह में एतिदाल मलहूज़ रहे।
इसराफ़: आज मकानात की तज़ईन व तौसीअ और जायदादों की कसरत का हाल हमारे सामने है। मकानात की तज़ईन के बारे में आप पढ़ चुके, बड़े बड़े मालदारों के हालात देखें कि उन की तामीरात में किस क़द्र इस्तिहकाम की खातिर रूपए होते हैं, फिर उन की मुख़तलिफ़ तरह से तज़ईन, प्लास्टर, रंगाई, पुताई, पानी के नल ओर्टूटियां, फर्श और लाइट वगैरह, ग़ुस्ल ख़ानों और बीत उलख़ला से ले कररहायश के ख़ास कमरों तक, फिर माकूलात में अल्लाह अल्लाह कई कई किस्म के खाने। उन में कीमती मेवा जात, फिर जिस चीज़ की ख्वाहिश जिस वक़्त हुई ख़्वाह वह कितने ही रूपए की हो, मुहैया की जाती है। हदीस शरीफ़ में है कि यह भी इसराफ़ है कि तुम हर वह चीज़ खाओ जिस की तुम्हें ख्वाहिश हो। फिर खाना भी निहायत तकब्राना अंदाज़ में , बर्बादी और उसे फेंकना।
फिर एक गाड़ी की ज़रूरत है, कई कई गाड़ियां वह भी निहायत महंगी, निरे निरे मकानात, प्लाटों पर प्लाट खरीदे जा रहा है। अगर सारी चीजों में एतिदाल बरत कर अल्लाह ताली की इस नेमत माल की क़द्र की होती तो यही माल हुसूल सवाब का ज़रिया बिन जाता, लेकिन वह जीनत व तफ़ाख़ुर व तकासर का ज़रिया है। फिर इस से उपर मुहरमात वगैरह का इर्तिकाब। ग़रज़कि कहां तक बयान किया जाए। गुना आने के बाद एतिदाल पर क़ायम रहना और फिर इस को आख़िरत का वसीला बना लेना, हक़ की तमाम राहों में खर्च करना यह दुनियादारों के बस की बात नहीं ख़्वाह वह आज के जमाने में कितने ही बजाहिर दीन दार कहलाते हूँ उन के हालात सब पर अयाँ हैं।
दीन दार
इस के बरख़िलाफ़ वह मुबारक लोग जो अल्लाह तआला और इस के रसूल ﷺ की इताअत और मुहब्बत में कामिल हैं और जाँ निसारी का जज्बा रखते हैं इस दौर लादेनी और इलहाद में भी एक हद तक अपने नबी ﷺ की संतों का पास व लिहाज करते हैं ख़्वाह मालदार हूँ या न हूँ, इसराफ़ व ग़ुलू से महफूज़ रखने की कोशिश करते हैं। अगर उन के पास माल व मता भी है तो भी उसे जायज़ तरीके से हासिल किया, जायज़ ही में खर्च करते हैं और जायदाद व मकानात या माकूलात व मशरूबात और मलबूसात वगैरह में हद एतिदाल पर यक गुना क़ायम हैं, मगर अब ऐसे लोग कम हैं कि गुना होते हुए भी मज़कूरा बाला उमूर में एतिदाल पर रहीं।
चंद तंबीहात:
1। फिर यह भी ध्यान रहे कि इसराफ़ व ग़ुलू वगैरह ऐसे उमूर हैं कि उन में सिर्फ़ अग़न्या ही मुबतला नहीं हैं , बाज़ मामलात, बल्कि अक्सर में गैर अग़न्या भी अग़न्या के क़दम ब क़दम हैं। दावतों में बे एतिदालियां देखने में आती हैं, किस क़द्र खाते हैं और अच्छा अच्छा छांट कर खाते हैं, रोटियां और बूटियां बर्बाद करते हैं। आज के दौर में नयी नयी मसनूआत, बाजार में मस्नूई प्लेटें, मस्नूई प्याले, मस्नूई ग्लास, मस्नूई ख़लाल, मस्नूई दस्तरख़्वान वगैरह उन सब में निहायत बे जा अख़राजात होते हैं और इस्तेमाल करने वाले ख़्वाह अग़न्या हूँ ख़्वाह गैर अग़न्या एक एक आदमी कई कई इस्तेमाल करता है। खाना वगैरह हवस में ज़्यादा निकाल लें गे, फिर छोड़ दें गे। हद तो यह है कि वुज़ू वगैरह में बहुत इसराफ़। आज के दौर में बजाए लौटों और बदनों से आम तौर पर नलों की टूटियों से वुज़ू करते हैं, खोल देते हैं, पानी मोटी धार से बहता रहता है, वह आराम से हाथ पीर और दाँत मिलते रहते हैं, एक एक वुज़ू करने वाला ना मालूम कितने कितने लौटे पानी बहा देता है। चीजें बहुत हैं , सिर्फ़ नाज़रीन की तवज्जो मबज़ूल कराने के लिए चंद चीजें ज़िक्र कर दें। अहले इल्म को तवज्जो
दीनी चाहिए और अंग्रेजियत और फ़ैशन परस्ती के सैलाब को रोकने की हर मुमकिन कोशिश करनी चाहिए।
2। यह भी ख़याल रहे कि हम ने मोमिनीन की जो तीन किस्में ज़िक्र की हैं और फ़िक़रा को हर किस्म में अग़न्या पर तरजीह दी है, यह इस वक़्त है जब कि हर किस्म में उमरा और फ़िक़रा को आमाल और क़ुर्ब में बराबर फर्ज़ किया जाए, लेकिन इस सूरत में भी अग़न्या अगर अपनी रक़ूमात को बजाए दुनिया के दीन के लिए इस्तेमाल करें और दीगर आमाल सालहा में भी फ़िक़रा के मुसावी हूँ तो वह इस ख़ुसूसीयत में फ़िक़रा पर फ़ज़ीलत ले जा सकते हैं जैसा कि एक हदीस से त्रिशह, बल्कि वाज़िह होता है।
मुख़्तसर यह कि यह मक़ाम बड़ी तफ़सील का तालिब है, असल फ़लाह व कामरानी और फ़ज़ीलत का मदार क़ुर्ब ख़ुदावंदी पर है, क़ुर्ब ख़ुदावंदी जिस क़द्र जिस को हासिल है वह इतना ही अफ़ज़ल है, इस से जिस पर ज्यादती क़ुर्ब रखता है। ऐसा भी हो सकता है कि बाज़ आमाल में फ़िक़रा अग़न्या पर और बाज़ उमूर में अग़न्या पर फ़ौक़ियत रखें जैसे माल के ज़रिया हक़ और अहले हक़ की नुसरत व मदद, गरीबों की दिलजोई, यतीमों की परवरिश, बेवाओं की इमदाद, मसाजिद व मदारिस की तामीरात वगैरह अगर हसन नियत और इख़लास के साथ हूँ। ग़रज़कि क़तई यह फैसला कि कौन किस से अफ़ज़ल है, हर जगह मुश्किल है। बाज़ अग़न्या और उमरा व सलातीन ऐसे भी हुए हैं कि हुक्मरां हो कर, ताज व तख़्त के मालिक हो कर भी अपने हाथों की कमाई से गुज़र औकात कर के फकीराना ज़िन्दगी बसर कर दी, मुल्की इंतिज़ामात की जिम्मा दारियां रखते हुए भी क़ुर्ब ख़ुदावंदी की तहसील करते रहे और हर तरह से नुसरत दीन और हिमायत मुसलमीन का काम अंजाम देते रहे, मगर ऐसे अग़न्या का वजूद गोया नादिर है। अक्सर ऐसा ही होता है कि दुनिया आने पर दुनिया के असरात बद से मुतास्सिर हो ही जाता है और फिर वही होता है जो हम पहले ज़िक्र कर चुके।
3। यह भी ध्यान में रखने की चीज़ हैकि अल्लाह तआला के मुक़र्रब बंदों में
अग़न्या का वजूद न होने के बराबर है ख़्वाह आप अंबियाअलैहिम अस्सलाम को ले लें या सहाबा कराम व औलीए अजाम को, अर्बाब गुना बहुत ही कम बिलकुल ही नादिर मिलें गे।
4। यह भी ध्यान रहे कि गुना और मालदारी कभी जहां फ़रोग़ दीन का सबब बनती हैऔर कौम मिलित की तरक्की का बाइस जिस से साहिब गुना सवाब हासिल करता है इसी तरह यह गुना और मालदारी कभी बातिल और अहले बातिल की इआनत व इमदाद का भी सबब बनती है। अगर ग़नी अर्बाब हक़ से है तो हक़ और अहले हक़ की मदद करता है और अहले हक़ से नहीं तो वह बातिल और अहले बातिल की मदद करता है और बातिल की इमदाद व इआनत में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेता है। अहले सुन्नत अहले हक़ के सिवा हर बातिल फ़िरक़े से मुंसलिक अर्बाब गुना का यही हाल है। यह मालदारी और गुना कयामत के दिन बहुत महंगा पड़ेगा, बल्कि अर्बाब गुना ऐसे होते हैं जो सब से अलग, आजाद ख़याल, उन का मजहब व मसलक ही सब से बेज़ारी या सब को हक़ पर हतिया कि अहले कुफ्र व शिर्क को भी सही मानते हैं। यह कुफ्र व काफ़िरों और उन के इबादत ख़ानों की भी इमदाद व इआनत है, कोई गुरेज नहीं करते हैं। अर्बाब गुना की तरफ़ से जुल्म व ज्यादती भी बहुत आम है और गुस्ताखी व बे अदबी भी। यह भी लम्हा फ़िक्रिया है कि अर्बाब गुना का औसत जो फ़र्क़ बातिला में है वह अहले हक़ में नहीं है। अल्लाह तआला और इस के रसूल ﷺ ने यों ही फक्र और फ़िक़रा की फ़ज़ीलत बयान नहीं की और दुनिया और अहले दुनिया की मुज़म्मत बे सबब नहीं फ़रमाई।
5। फिर यह भी ध्यान रहे कि दुनिया की तरफ़ मेलान तिब्बी है और नफ़्स अम्मारा की ख़ास ख़सलत है। लिहाज़ा आम तौर पर इंसान इस में मुबतला है और इस का तालिब है और इस की तहसील के लिए हर कोशिश, हर मेहनत, हर फरेब करने के लिए तैयार है। तो हमें गुना या अर्बाब गुना की फ़ज़ीलत बयान करने की ज़रूरत नहीं , बल्कि अग़न्या और गैर अग़न्या को इस के मख़फ़ी असरात बद और गंदा ख़सलतों से आगाह करने की ज़रूरत है, फ़िक़रा को तसलियों की ज़रूरत है और यह बताना कि यह तुम्हारे हक़ में किस क़द्र रहमत
हैताकि वह इस मुसीबत पर सब्र करके अज्र हासिल करसकें। अर्बाब गुना की सही रहनुमाई की ज़रूरत है कि वह किस राह पर चलें कि गुना उन पर बोझ न बने और कब्र व हश्र रुसवाई या अज़ाब व उक़ाब का सबब न हो, बल्कि इस के ज़रिया अब्दी राहतें हासिल करने की ज़रूरत है। उन्हें भी समझाया जाए कि यह तुम पर नेमत इलाहीह है, इस को सही इस्तेमाल करू ताकि यह दोनों जहान में रहमत वनेमत ही रहे, जहमत न बने, अग़न्या अगर राह रास्त पर रहीं तो ख़ुद उन का और कौम विमलत का बहुत भला हो।
हक़ीक़त फक्र और इस की पांच हालतें: हज़रत इमाम हज उलइस्लामरज़ि अल्लाह अन्हु फ़रमाते हैं: फक्र का मतलब इस चीज़ का न होना है जिस की हाजित हो, लेकिन जिस की हाजित न हो इस का न होना फक्र नहीं कहलाता और अगर वह चीज़ जिस की हाजित है मौजूद भी हो और इंसान के बस में भी हो तो वह फ़क़ीर नहीं कहलाता। आप फ़रमाते हैं कि यक़ीनी बात है कि अल्लाह तआला के सिवा जो भी मौजूद है वह फ़क़ीर है क्यों कि उसे दूसरे वक़्त मौजूद होने की हाजित है। पस अगर ऐसा कोई वजूद मौजूद हो जो किसी दूसरे का मुहताज न हो तो वह मुतअल्लिक़ ग़नी है और ऐसा अल्लाह तआला के सिवा किसी के लिए मुतस्व्वर नहीं हो सकता है। पस एक ही ग़नी मौजूद है और बाक़ी जो कुछ है वह सब इस के मुहताज हैं कि वह उन को दाइमी वजूद में मदद दे। इसी हिसर की तरफ़ इस कौल कुरआन में इरशाद है:
व अल्ला अलग़नी व उन्नۡतुम अल्फ़िक़रा (सूरत मुहम्मद: 47/38)
तर्जुमा: और अल्लाह बे नयाज़ है और तुम सब मुहताज।’’
फक्र मुतअल्लिक़ के मानी वही हैं जो मज़कूर हुए, हम ख़ुसूसी फक्र यानी माल के ऐतबार से मुहताजी का ज़िक्र करते हैं वर्ना हाजात के ऐतबार से बंदे के फक्र की इन्तहा नहीं हैकियों कि हाजात बे शुमार हैं, उन में बाज़ हाजितें वह हैं जिन तक रसाई माल के ज़रिया होती है, इस वक़्त इसी का बयान मतलूब है। मालूम हो कि जिस आदमी के पास माल न हो उसे इसी माल की निस्बत से फ़क़ीर कहते हैं जो इस के पास नहीं
है, लेकिन शर्त यह है कि वह इस का मुहताज हो। फिर फक्र के वक़्त पांच हालतों का तसोर होता है:
पहली हालत: यह सब से बुलंद है यानी जब इस के पास माल आये तो उसे नापसंद करे और इस से अज़ीयत महसूस करे, कबूल करने से भागेइस के शर और में मशगूलियत से बचे,यह ज़हद है है और ऐसे शख्स को ज़ाहिद कहते हैं।
दूसरी हालत: माल में ऐसी रगबत न हो कि इस के मिलने पर खुश हो और न इस तरह नापसंद करता हो कि इस से अज़ीयत हासिल हो या अगर हासिल हो तो छोड़दे, ऐसे हालत वाले को राजी कहते हैं।
तीसरी हालत: माल के न होने मुक़ाबिल में इस का पाया जानाआसे पसंद हो क्यों कि वह इस में रगबत रखता है, लेकिन इस की मुहब्बत इस हद तक नहीं कि इस की तलब में सरगर्मी दिखाए, बल्कि अगर आसानी से बुला मेहनत मिल जाए तो खुश होता है और अगर तहसील माल में मेहनत करना पड़े तो इस में मशगूल नहीं होता, ऐसे शख्स को क़ाने यानी सब्र करने वाला कहते हैं क्यों कि इस ने मौजूद पर क़नाअत की।
चौथी हालत: आजिज़ी की वजह से माल की तलब छोड़दे, लेकिन वह इस में ऐसी रगबत रखता है कि अगर इस की तलब तक रास्ता मिले अगरचे थकावट के साथ हो तो वह उसे तलब करे या इस की तलब में मशगूल हो तो ऐसी हालत वाले को हरीस कहते हैं।
पाँचवीं हालत: इस के पास जो माल नहीं है वह इस की तरफ़ मजबूर हो जैसे भूका शख्स जिस के पास रोटी न हो और ब्रहना जिस के पास कपड़ा न हो ऐसे शख्स को मुज़्तर (मजबूर) कहते हैं चाहे माल की रगबत ज़ईफ़ हो या कवी। यह हालत रगबत से बहुत कम जुदा होती है।
ख़याल रहे उन पांच हालतों में सब से आला ज़हद है और अगर इज़तिरार के साथ
ज़हद भी हो और इस का तसोर हो सके तो यह ज़हद का सब से आला दर्जा है। उन पांच से भी उपर एक हालत है जो ज़हद से भी आला है यानी इंसान के पास माल का होना न होना बराबर हो, अगर माल मिल जाए तो वह खुश नहीं होता और न ही इस से अज़ीयत पहुँचती है और अगर माल न मिले तो भी यही सूरत हाल होती है, बल्कि इस की हालत हज़रत आयशारज़ि अल्लाह अन्हा की हालत की तरह होती है।
उन के पास एक लाख दिरहम बतौर अतीया आये तो आप ने ले लिए और इसी दिन तकसीम कर दिए, ख़ादिमा ने अर्ज़ किया: अगर आज के दिन दरहमों से एक दिरहम का गोश्त ले लेतें तो इस से रोजा इफ्तार कर लेते, आप ने फ़रमाया: अगर तुम पहले याद दिलातें तो में ऐसा ही करती।’’
जिस शख्स की यह हालत हो अगर तमाम दुनिया इस के कब्जे और ख़ज़ाने में हो तो भी उसे कोई नुकसान नहीं पहुँचता, ऐसा शख्स सब कुछ अल्लाह के ख़ज़ाने में जानता है, अपने कब्जे में नहीं, ऐसी हालत वाले को मस्तग़नी कहना ज़्यादा मुनासिब है क्यों कि वह माल के होने न होने दोनों से बे नयाज़ होता है। (माख़ूज़)
हज़रत इमाम का यह कलाम उन लोगों को बारबार पढ़ना चाहिए जो उन औलीए कराम के बारे में तरह तरह की बातें कर जाते हैं जिन के पास बजाहिर माल बहुत था। उन बुजुर्गों की अगर ऐसे लोग सीरत पढ़ते तो उन्हें मालूम हो जाता कि वह इसी हालत पर थे जिसे हज़रत इमाम ज़हद से भी आला करार दे रहे हैं।
हज़रत ज़क्रिया मुल्तानी
मिसाल के तौर पर हज़रत ग़ौस अलालम ख़्वाजा बहा उद्दीन ज़क्रिया मुल्तानी सर हलक़ा मशाइख़ सुह्रवर्दीय का हाल पढ़ें तो शाहाना ठाठ मिलें गे, मगर हाल यह था कि सय्यद कमाल उद्दीन शीराज़ी बहुत मतमूल ताजिर थे, जवाहरात तिजारत करते थे और आप के मुरीद थे, एक दिन बहुत सा ज़र व जवाहरात ले कर अदन से जहाज़ में सवार हुए, कुछ दौर पहुँच कर जहाज़ गर्दाब में फँस गया, उन्हों ने पुकारा ‘‘या
शैख़ मदद कीजिए’’ सब ने हज़रत ज़क्रिया क़ुद्दिस सिर्रहू को देखा कि सामने से आरहे हैं, तूफान थम गया और आप गायब हो गए, सूरत पहुँच कर जहाज़ के तमाम सौदागरों नेशेख़ फख्र उद्दीन गिलानी के हाथ सात लाख अशर्फियाँ बतौर नज़राना रवाना कीं, गिलानी साहिब ने कभी आप को देखा न था, मगर सामने पहुँचते ही पहचान लिया क्यों कि तूफान के वक़्त आप ही को किश्ती में आते देखा था, मख़दूम साहिब ने नज़राना कबूल करके उन के सामने ही इसी वक़्त सब का सब राह ख़ुदा में लिट्टा दिया, गिलानी साहिब बज़ात ख़ुद काफ़ी बड़े ताजिर थे, हज़रत की यह सखावत व करामत देख कर इस क़द्र मुतास्सिर हुए कि सारा ज़र व जवाहर लिट्टा कर आप के मुरीद हो गए और मर्तबा कमाल को पहुँचे।
सुह्रवर्दियों के यहाँ कमाल
हालात से पता चलता है कि उन सुह्रवर्दी बुजुर्गों के यहाँ मयार मुतशरा ज़िन्दगी थी, वह इस बात के कायल थे कि हर मामले में नबी कोनेन ﷺ की कमाल इत्तिबा की जाए, तर्क असबाब दुनिया या तर्क दुनिया या तर्क दौलत उन के यहाँ ज़रूरी न था, उन का ख़याल था कि तमाम लज़ाइज़ व नफ़ाइस और दुनयवी असबाब होते हुए याद ख़ुदा और इत्तिबा सुन्नत से गफलत न बरती जाए, उन केदिल सिर्फ़ अल्लाह जल व अला और इस के रसूल ﷺ की मुहब्बत से लबरेज़ थे, किसी गैर की गुंजाइश न थी, यह दुनिया को भी दीन के लिए इस्तेमाल करते थे, बजाहिर तमाम तर रानाइयों के साथ दुनिया उन के यहाँ होती थी, मगर कभी उन की तरफ़ इलतिफ़ात व तवज्जो न थी, वह इस की मुहब्बत, इस की आलाईशों से बिलकुल पाक थे। सच यह है कि उन्हों ने हमें इस के इस्तेमाल का सही तरीका बताया।
मदर्रिसा या यूनिवर्सिटी
हज़रत ग़ौस अलालम क़ुद्दिस सिर्रहू हैं कि आप ने मुलतान शरीफ़ में अज़ीम उलशान रफ़ी अलमंजिलत मदर्रिसा बनाया, खानगाह बनाई, वसीअ व अरीज़ लंगर ख़ाना तामीर फ़रमाया, प्रशिकोह मजलिस ख़ाना और खूब सूरत और आली शान महल सराएं और मसाजिद तामीर फरमाएं। आप का मदर्रिसा इतना बड़ा था कि इस वक़्त वह मुलतान की सब से बड़ी
यूनिवर्सिटी था। जुमला उलूम मनक़ूलात की तालीम होती थी। बड़े बड़े मुहक़्क़ यकताए ज़माना मदर्स व मुअल्लिम थे। तफसीर व हदीस और फ़िक़्ह की आला तालीम होती थी। इस के साथ साथ अदब व इंशा, मंतिक़ व फलसफा और रियाज़ी व हैयत तक की तालीम दी जाती थी। आप ख़ुद इस के सदर उलमदरसेन थे। न सिर्फ़ हिंदोस्तान, बल्कि बिलाद एशिया, इराक, शाम और हिजाज़ तक के तलबा जीर तालीम थे और तलबा की इस क़द्र कसरत थी कि हिंदोस्तान में इस की नज़ीर नहीं मिलती। ख़ास बात यह है कि उन कई हजार तलबा को न सिर्फ़ आप के लंगर ख़ाने से खाना मिलता , बल्कि तालीम से मुताल्लिक़ा जुमला उमूर की भीक आप के ही दर से मिलती थी। इस जमाने की इस मुलतान यूनिवर्सिटी से बड़े बड़े नामवर उलमा व फुज़िला पैदा हुए। एक अकेले के दम पर इतना बड़ा जामिआ व इदारा चलाना आप ही के सर था। इस की न कोई कमेटी थी न वसूल्याबी करने वाले और चंदा लाने अफराद थे।