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Allama Afaque Ahmad Mujaddidiतसव्वुफ़ और इस के फ़वाइदसलाहीयतों की बेदारी: (दसवां फायदा)

अध्याय 5 में से 54पृष्ठ 78–91

सलाहीयतों की बेदारी: (दसवां फायदा)

मालूम रहे कि तसव्वुफ़ का काम सिर्फ़ इतना नहीं कि इस से अख़लाक़ नुबुव्वत या कैफियात मज़कूरा की हिफाज़त हुई और इल्म बातिन की बका व तोहफ़्ज़ वगैरह का ज़रिया बना, बल्कि इंसान जिन मुख़तलिफ़ सलाहीयतों और कुव्वतों से नवाज़ कर इस के परवरदिगार जल व अला ने खिलाफत के लायक बनाया था इस का सही पता लगायाऔर उन का सही इस्तेमाल करके इंसानी मिजाज का पता बता दिया और ख़ुदा विंद क़ुद्दूस की अज़्मतों और क़ुदरतों का सच्चा असास अता कर दिया। हम क़दरे तफ़सील से इस मौज़ू पर कलाम करते हैं ताकि आप सही इंसान समझ सकें और इस की सलाहीयतों का अंदाजा लगा सकें। नीज़ देख कर अगर इस की फ़िक्र दुरुस्त न की जाए तो वह किस क़द्र बारगाह अज़मत जल व अला से दौर हो कर मलऊन व मत्रूद हो सकता है और इस के बिगड़ने के इमकानात किस क़द्र वाफ़र तौर पर मौजूद हैं।

तारीफ़ात तसव्वुफ़

तसव्वुफ़ की बहुत सी तारीफ़ात सूफ़िया कराम रहिमहुम अल्लाह से मनक़ूल हैं। आप पढ़ें और देखें कि सूफ़िया कराम दरअसल कण फ़ज़ीलतों और आदाब से मुत्तसिफ़ थे और तसव्वुफ़ के ज़रिया उन्हों ने उन्हें कैफ़ीयतों और औसाफ़ को बरकरार रखा जो कुरआन व हदीस तलब करते हैं। नीज़ यह भी देखें कि सूफ़िया ने जिस बालिग नज़री सेइन को महफूज़ रखा हैवो उन्ही का हिस्सा है, बल्कि अल्लाह तआला ने उन्हें इलहाम फ़रमाया वर्ना आज आप देखें अहले इल्म एक से एक काबिल, बासलाहीयत और फ़िक्र व फन के

मालिक हैं, मगर मज़कूरा औसाफ़ और ख़सलतों को आप उन में गहराई से देखें तो आप यकीन कर लें गे कि महज़ तालीम व ताल्लुम से वह खूबियां पैदा नहीं हो सकती हैं।

1। आका ﷺ का इरशाद है: हर क्षे की एक कुंजी है और जन्नत की कुंजी सालकेन और सब्र करने वालों से मुहब्बत करना हैकि यह लोग कयामत केदिन अल्लाह तआला के हम नशीन हैं।’’

यही फक्र तसव्वुफ़ की असास और बुनियाद है।

2। हज़रत रोयम फ़रमाते हैं कि तसव्वुफ़ तीन ख़सलतों पर मबनी है: अव्वल फक्र व मुहताजगी को मजबूत थामना। दोम बज़ल व ईसार होना। सोम तारज़ व इख्तियार को तर्क करना यानी मशगूलियत को छोड़ देना।

3। हज़रत जुनेद क़ुद्दिस सिर्रहू ने फ़रमाया: अल्लाह तआला के साथ बग़ैर इलाक़ा के रहने का नाम तसव्वुफ़ है।

4। हज़रत मारूफ़ करख़ी क़ुद्दिस सिर्रहू ने फ़रमाया कि तसव्वुफ़ नाम हक़ायक़ के हुसूल और ख़लाइक़ के माल व मता से नाउम्मीदी का और जो शख्स साहब फक्र नहीं साहब तसव्वुफ़ नहीं।

5। हज़रत शिबली क़ुद्दिस सिर्रहू से पूछा गया कि फ़क़ीर कौन है? फ़रमाया: जो अल्लाह तआला के सिवा किसी की प्रवाह न करे।

6। हज़रत अबू उलहसन नूरी क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं: फ़क़ीर की सिफ़त यह है कि जब इस के पास कुछ न हो तो प्रसुकून हो, मुज़्तरिब न हो और जब कुछ मौजूद हो तो बज़ल व ईसार से काम ले।

यह और इस तरह की और तारीफ़ात हैं जो हर एक ने अपने ज़ौक़ के मुताबिक सवाल करने पर जवाब दिए। हज़रत सुह्रवर्दी फ़रमाते हैं:

उन में कोई तारीफ़ जामा व माने नहीं, बल्कि हर बुजुर्ग ने अपने मजाक की बुनियाद पर

तसव्वुफ़ के मुक़ामात में से किसी ख़ास मक़ाम की तारीफ़ बयान की है और बाज़ हज़रात ने ज़हद, फक्र, तसव्वुफ़ तीनों को ख़लत मिल्लत कर दिया है, हालां कि यह तीनों तीन मुख़तलिफ़ चीजें हैं। तसव्वुफ़ दर हक़ीक़त ज़हद, फक्र और बाज़ और औसाफ़ के मजमूआ का नाम है।

हज़रत इमाम ग़ज़ाली क़ुद्दिस सिर्रहू के कौल का खुलासा यह है कि तसव्वुफ़ शरीअत की तरह दो चीजों से मुरक्कब है: इल्म और अमल, लेकिन यह फ़र्क़ है कि शरीअत में इल्म के बाद अमल पैदा होता है । इस के बरख़िलाफ़ तसव्वुफ़ में अमल के बाद इल्म पैदा होता है।

इस इजमाल की तफ़सील यह है कि इंसान को ईसार का जो इदराक होता है इस का आम तरीका यह है कि इस्तिंबात, इस्तिदलाल, तालीम व ताल्लुम से हासिल होता है, लेकिन कभी ऐसा होता है कि गौर व फ़िक्र के बग़ैर दफ़्फ़ातन इस क्षे का इदराक हो जाता है और कुछ मालूम नहीं होता कि कहां से हुआ और क्यों कर हुआ इस्तिलाह तसव्वुफ़ में इस का नाम इदराक है।

इस किस्म का इदराक सिर्फ़ रियाज़त व मुजाहिदा और तज़किया नफ़्स से होता है (फिर तरीका मुजाहिदा लिखने के बाद उलग़ज़ाली में है) मकाशफा से उन तमाम अश्या की हक़ीक़त खिल जाती है जिन का तसोर महज़ तक़लीदी और इजमाली तौर पर था। मसलन नुबुव्वत, वही, मलाइका, शैतान, जन्नत, दोज़ख, कब्र का अज़ाब व सवाब, पल स्रात, मेज़ान, हिसाब। उन अश्या के मुताल्लिक़ मुख़तलिफ़ आरा हैं।

बाज़ उन चीजों को तमसलात खयाली करार देते हैं, बाज़ अ न को बिलकुल ज़ाहिरी माअनों पर महमूल करते हैं, लेकिन जब मकाशफा हासिल होता है तो उन अश्या की जो कुछ हक़ीक़त है वह गोया आंखों के सामने आजाती है।

ज़ाहिर बीनों को यहाँ शुबहा पैदा होगा कि इंसान को जो इदराक होता है वह सिर्फ़ हवास के ज़रिया होता है। यह नामुमकिन महज़ हैकि हवास मुअत्तल हो जाएँ और दिल

के ज़रिया इदराक हो । दिल अव्वल तो महल इदराक नहीं और अगर हो भी तो इस का इदराक उन्ही चीजों पर मुतफ़रा होगा जो हवास ख़मसा ने उन के सामने पेश कीं।

इमाम साहिब इस शुबहा से बे खबर न थे , उन्हों ने अहया उलउलूम, जिल्द दोम, दीबाचा, बयान अलफ़र्क बेन उलमक़ामीन में ख़ुद इस शुबहा को ज़िक्र किया, लेकिन इस शुबहा का जवाब क़ाल नहीं, बल्कि हाल है।

इसरार अलक़लब ला यसमह बल करा फ़ी इल्म उलमामल

इमाम साहिब ने इस को मिसाल से यों समझाया है कि एक दफ़ा रोम और चेन के नक़्क़ाशों में मुकाबला हुआ, दोनों अपनी अपनी फ़ज़ीलत के मुद्दई थे, बादशाह वक़्त ने आमने सामने की दो दीवारें दोनों गिरोह के लिए मुक़रर कर दें कि हरेक अपने हिस्से की दीवार पर अपनी सिफ़त का नमूना दिखाए। बेच में पर्दा डाल दिया गया ताकि एक दूसरे की नकल न उतार पाएं। चंद दिनों बाद रोमी मसूरों ने बादशाह से अर्ज़ की कि हम अपने काम से फ़ारिग़ हो चुके। चीनियों ने कहा कि हम भी फ़ारिग़ हो चुके। पर्दा उठाया गया तो दोनों में सर मो फ़र्क़ न था। मालूम हुआ कि रोमियों ने बजाए नक़्क़ाशी के सिर्फ़ यह किया था कि दीवार को सीक़ल (मांझ) कर आईना बना दिया था, पर्दा उठा तो सामने की दीवार के तमाम नुक़ूश इस में उतर आये। सूफ़िया के उलूम की यही मिसाल है, वह क़ल्ब को इस क़द्र साफ और मजलिया कर देते हैं कि तमाम मालूमात ख़ुद इस में मुनक़श हो जाते हैं।

7। इलतसूफ़ हो इल्म तार्फ अहवाल तज़किया उलनफ़ूस व तसफ़ीत अलख़लाक़ व तामीर अलजाहिर बालबातिन

यानी तसव्वुफ़ वह इल्म है जिस के ज़रिया तज़किया नफ़ूस और तसफ़ीया अख़लाक़ और ज़ाहिर व बातिन की तामीर के अहवाल पहचाने जाएँ। इस का मौज़ू तज़किया व तसफ़ीया और तामीर मज़कूर है और इस की ग़ायत अब्दी सआदत पाना और इस के मिसाइल वह मक़ासिद हैं जो

कुतुब तसव्वुफ़ में मज़कूर हैं। (रिसाला कशीर्य)

सैर वसलोक और तसव्वुफ़ में फ़र्क़

अल्लामा मुहम्मद ज़ाहिद हनफ़ीरहमत अल्लाह अलैहि इदग़ाम उलमुरीद में फ़रमाते हैं: अव्वल यह जान लो कि जो अपनी ज़ात और अहवाल नफ़्स पर गहरी नज़र और तामिल करताहै वह अपने नफ़्स को ज़ात नफ़्स के ऐतबार सेनाक़िस तहसील कमाल में (ख़ुद को) गैर का मुहताज पाता है। जब मर्द इस पर वाकिफ़ होता है तो लामुहाला इस के बातिन से कमाल का शौक उभरता है। अब वह इस के ज़राए व असबाब को तलाश करता है। इस वक़्त वह मर्द तलब कमाल में एक हरकत का मुहताज होता है। अहले तरीक़त इसी हरकत को सैर व सुलूक कहते हैं।

इक़साम कमालात

कमालात या तो इल्मी हूँ गे या अमली और सुलूक दोनों का मुतकल्लिल है; इस लिए कि क़द्र व मंजिलत के लिहाज से उलूम में अशरफ औरमनफ़ात के ऐतबार सेहज़ीम तर वह मआरिफ़ रबानी हैं जिन की ताबीर इल्म विलायत से की जाती है जो तक़्वा का नतीजा होते हैं और जिन के इज़हार व अदम इज़हार में नबी ﷺ को शब् मेराज इख्तियार दिया गया था जैसा कि हदीस में वारद हुआ है।

उलूम अनबीए करामअलैहिम अस्सलाम के अलावा उलूम का मंतहा यही इल्म विलायत है, इस का हुसूल सही सुलूक और सही मुजाहिदा से होता है, न कि महज़ आमाल फ़िक्रिया और तबीअत से और वह कमालात अमलीय जिन से नफ़ूस तज़किया से आरास्ता होते हैं उन की ग़ायत अख़लाक़ की ऐसी तहजीब है जो इस बारगाह क़ुद्दिस के लायक हो और यही वह फायदा है जो सैर व सुलूक पर मुरत्तिब होता है।

ग़ायत: सुलूक की ग़ायत यह है कि नफ़्स इंसानी को ऐसा मलिका हासिल हो जाए जिस की वजह से अफ़आल इराद्य तमाम के तमाम उम्दा सादर हूँ । अब जो इल्म अहवाल सुलूक से बहस करता है इस का नाम इल्म तसव्वुफ़ है। तसव्वुफ़ पर मुरत्तिब होने वाला फायदा वही हैजो सुलूक पर मुरत्तिब होता है। फिर माहेत तसव्वुफ़ उन अलफ़ाज़ में बयान

फ़रमाई:

फही अलालम बाहवाल उलनफ़स अलबेंसानेमन झत सदूर इलाफ़आल अलफ़रादे अनहा जमीललाव गैर जमील

यानी नफ़्स इंसानी के अहवाल का इल्म अफ़आल इराद्य के सदूर की जिहत से कि वह उम्दा हैं या गैर उम्दा। इस इल्म का मौज़ू यही नफ़्स इंसानी है। इसी मज़कूरा हक़ीक़त के ऐतबार से।

इस सब से मालूम हुआ कि तज़किया नफ़्स व तसफ़ीया अख़लाक़ के अहवाल जिस से जाने जाएँ वह तसव्वुफ़ है। यह कमालात इलमीया व अमलीय दोनों के हुसूल का ज़रिया है और शरीअत में सब का हुक्म है। पस तसव्वुफ़ व सुलूक उन के हुसूल का ज़रिया हैं। नीज़ मालूम हुआ कि अमली कमालात जो आला लोगों को हासिल होते हैं उन का मक़सद यह है कि ऐसे उम्दा अख़लाक़ हासिल हो जाएँ जो इस बारगाह क़ुद्दिस के लायक हूँ । इस तारीफ़ के तनाज़ुर में अहवाल सूफ़िया देखें और उन के बुलंद व बाला अख़लाक़ व आमाल मुलाहिजा करें तो तसव्वुफ़ समझ में आजाएगा।

हमारी इस तकरीर से तसव्वुफ़ और सैर व सुलूक का फ़र्क़ व ताल्लुक भी आप समझ गए हूँ गे। नफ़्स का तज़किया और क़ल्ब का तसफ़ीया हम आगे चल कर बयान करें गे। सर्दसत सैर व सुलूक के इक़साम और इस से मुताल्लिक़ चंद अमोर्मलाहिजा फरमाएं:

सैर व सुलूक की किस्में

सैर व सुलूक की मुतअद्दिद इक़साम हैं, हज़रत इमाम रबानी मुजददु मनोर अल्फ़ सानी क़ुद्दिस सिर्रहू मक्तूब: 144, जिल्द अव्वल में फ़रमाते हैं:

सैर अली अल्लाह

इल्म में हरकत (इंतकाल इल्मी) का नाम सैर व सुलूक है जो कि मक़ूला कैफ़ से है। हरकत अपनी (इंतकाल मकानी) इस जगह गुंजाइश नहीं रखता है। पस सैर मक्ली अल्लाह इस इल्मी हरकत का नाम हैजो इल्म असफल से इल्म आला तक जाती है और इस आला से दूसरे आला तक यहाँ तक कि तमाम मुम्किनात के उलूम तै करने और उन

सब के ज़वाल के बाद इल्म वाजिब तक मनतही होती है और यही वह हालत है जिस की ताबीर फना से की जाती है।

सैर फ़ी अल्लाह

असमा व सिफ़ात, शेवन व एतबारात और तक़दीसात व तंज़ीहात के मुरातिब वजूद में इल्मी हरकत का नाम है यहाँ तक कि यह इस मर्तबा तक मनतही होती है जिस की ताबीर न किसी इबारत से की जा सकती है और न इस की जानिब कोई इशारा किया जा सकता है, न इस का कोई नाम रखा जा सकता है और न हो सकता है, न उसे कोई आलम जान सकता है और न इदराक करने वाला इदराक कर सकता है। इस सैर का नाम बका है।

सैर अन अल्लाह बिल्लाह

यह तीसरी सैर है। नीज़ इल्मी हरकत का नाम है जो कि इल्म आला से इल्म असफल की तरफ़ आती है और इस असफल से दूसरे असफल तक यहाँ तक कि उलटे पीर लौट आती हैऔर तमाम मुरातिब वजूब के उलूम से उतर आती है। यह वही आरिफ है जिस पर अल्लाह तआला का फ़ैज़ान हुआ। अल्लाह तआला की वजह से और अल्लाह तआला सेलोटा अल्लाह तआला के साथ और वह आरिफ व वाजिद (पाने वाला) फ़ाक़द (गुम करने वाला) और ऐसा हासिल है जो हिज्र व फिराक का शिकार और वह क़रीब व बईद है।

सैर दर अश्या

और चौथी सैर कि अश्या में सैर हैबतदरीज उलूम अश्या के हुसूल का नाम है सैर अव्वल में तमाम अश्या के उलूम के ज़वाल के बाद। पस चौथी सैर, सैर अव्वल के मुक़ाबिल है और तीसरी सैर, सैर दोम के मुक़ाबिल जैसा कि तुम देख रहे हो। सैर मक्ली अल्लाह और सैर फ़ी अल्लाह नफ़्स विलायत की तहसील की खातिर हैं जो कि फना व बका का नाम है। तीसरी और चौथी सैर मक़ाम दावत के हुसूल के वास्ते जो कि अंबिया व मर्सलीन के साथ ख़ास है सलवात अल्लाह तआला व तसलीमाता अला जमीहम व अला अफ़ज़लहम ख़ुसूसन और कामिल ताबईन को भी उन बुजुर्गों के मक़ाम से हिस्सा है अलैहम अस्सलवात व इलतसलीमात जैसा कि अल्लाह तबारक व तआला ने फ़रमाया:

قُلْ ہٰذِہٖ سَبِیۡلِیۡۤ اَدْعُوۡۤ اِلَی اللہِ عَلٰی بَصِیۡرَۃٍ اَنَا وَمَنِ اتَّبَعَنِیۡ ؂

तर्जुमा: तुम फ़रमाओ यह मेरी राह है में अल्लाह की तरफ़ बुलाता हूँ में और जो मेरे कदमों प्रचलें दिल की आंखें रखते हैं।’’

यह आगाज़ व अंजाम की बात है कि जिस से मक़सद तालिबान ख़ुदा को बुलाना और शौक दिलाना है।

चंद फ़वाइद:

1। मालूम रहे कि सैर अव्वल जिसे सैर मक्ली अल्लाह कहते हैं इस सैर की इन्तहा इस असम तक वसूल से है कि सालिक जिस का मज़हर है मुंतहाए सैर, इस को किसी ऐतबार से कहा गया है वर्ना इस सैर के बाद जब अ स असम से गुज़र कर इस के मुसम्मी हक़ीक़ी तक पहुँच जाता है और इस में फना व बका पैदा कर लेता है तो इस वक़्त वह मुंतहाए हक़ीक़ी है और दर हक़ीक़त सैर मक्ली अल्लाह की इन्तहा इसी सूरत में हैऔर पहली इन्तहा कि इस असम तक इन्तहा है इस को भी सूफ़िया ने सैर मक्ली अल्लाह ऐतबार किया है और मर्तबा में जो फना व बकाहासिल हो ती है इस के ऐतबार से विलायत का नाम दिया है।

2। कहा जाता है कि सैर फ़ी अल्लाह की इन्तहा नहीं है, यह गैर मुतनाही सैर वक़्त बका में और मनाज़िल उरूज तै करने के बाद है। इस सैर के बे इन्तहा होने के यह माना हैं कि सैर इस असम में वाक़्य हो और इस तफ़सील से मुत्तसिफ़ होजो कि उन शिवनात से मुताल्लिक़ है जो इस असम में मुंदरज हैं। ऐसी सूरत में कभी भी इस की इन्तहा तक नहीं पहुँच सकता है; क्यों कि हर असम बे इन्तहा शिवनात मुंदरजा पर मुश्तमिल है, लेकिन वक़्त उरूज में अगर चाहें कि इस सालिक को इस असम से गुज़ार दें तो हो सकता हैकि एक क़दम इस असम को तै कर के नहाय अलनहाय तक पहुँच जाएँ। अगर इस जगह मस्तहलक हो जाए तो किया ही अच्छी शराफत है और अगर ख़ल्क़ की तरबीयत के वास्ते वापस करें तो

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। सूरत यूसुफ: 12/108

किया ही फ़ज़ीलत है। यह न समझना कि इस असम तक पहुँचना आसान काम है, जान खपाना पड़ती हैतब इस दौलत से मुशर्रफ़ करते हैं और देखो लोगों में किस को इस नेमत से सरफ़राज़ करते हैं। इंसान को पहले आसमानों के तमाम के तबक़ात हत्ती कि अर्श आज़म से गुज़रना चाहिए और पूरे तौर से लवाज़म इमकान से बाहर आना चाहिए। इस के बाद आलम अर्वाह की लामकानीयत के मुरातिब भी तै करना चाहिए तब असम तक रसाई होती है। इस आलम ख़ल्क़ के मावरा आलम अम्र और इस के मावरा असमा व शिवनात के मुरातिब हैं। बतौर ज़लीयत व असालित और इजमाल व तफ़सील की हैसियत से और उन मुरातिब ज़ुली व असली, कोनी व इलाही , इजमाली व तफ़सीली के मावरा मतलूब हक़ीक़ी को तलाश करना चाहिए।

3। सुलूक चंद किस्म का होता है। बाज़ हज़रात के सुलूक पर जज्बा मुक़द्दम नहीं होता है और बाज़ के सुलूक पर जज्बा मुक़द्दम होता है। किसी जमात को मनाज़िल सुलूक तै करने के दौरान जज्बा हासिल होता है और किसी जमात को मनाज़िल सुलूक तै करना मयस्सर आजाता है, लेकिन हद जज्बा तक नहीं पहुँचते हैं। महबूबों के सुलूक पर जज्बा मुक़द्दम होता है और बाक़ी इक़साम मुहबीन से ताल्लुक रखती हैं।

मुहबीन का सुलूक मुक़ामात अशरा मशहूरा (तौबा, ज़हद, तोकल, सब्र, शकर, फक्र,ख़ौफ़, रजा,हुब्ब, रज़ा) को तरतीब व तफ़सील से तै करने का नाम है और महबूबों के सुलूक में मुक़ामात अशरा का खुलासा हासिल होजाता है, तरतीब व तफ़सील से कोई ताल्लुक नहीं होता है, वहदत वजूद और इस जैसे दीगर अमोराहाता व सरयान मईयत ज़ातीय का ताल्लुक जज्बा मुतक़द्दिम या मुतवस्सित से है। सुलूक नाक़िस और मनतही हज़रात के जज्बा को इस किस्म के उलूम से कोई मुनासबत नहीं होती है। नीज़ मनतही हज़रात के हक़ अलीक़ीन को भी उन उलूम से मुनासबत नहीं जो कि तौहीद वजूद के मुनासिब हैं। अर्बाब तौहीद के मुनासिब मक़ाम में जहां हक़ अलीक़ीन बयान किया हैवो हक़ अलीक़ीन मुबतदी या मुतवस्सित मजज़ूबों के लिए है।

4। सैर आफ़ाक़ी व इंफ्सी

सूफ़िया करामरहिमहुम अल्लाह के नज़दीक सैर आफ़ाक़ी व इंफ्सी किया है? इस को हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने निहायत तहक़ीक़ से बयान किया है और इस को हर तरह से मुनक़ह फ़रमाया है। हम उन्ही की जुबानी मक्तूब: 42/ जिल्द दोम से नकल करते हैं, फ़रमाते हैं:

गोश् होश से सुनो कि जब सालिक नियत को सही कर लेता है और आरज़ू को खालिस कर लेता है, फिर अल्लाहअज़्ज़ व जल्ल के ज़िक्र में मशगूल होता है और रियाज़ात शाक़ा व मुजाहिदात शदीदा इख्तियार करता हैऔर तज़किया हासिल करलेता है, इस के अख़लाक़ रज़ीला अख़लाक़ हसना में तब्दील होजाते हैं, इस को तदबर व अनाबत मयस्सर आजाती है, दुनिया की मुहब्बत इस के दिल से खारिज हो जाती है, सब्रो तोकल और रज़ा हासिल हो जाती है और उन हासिल शुदा मआनी को बतदरीज व तरतीब आलम मिसाल में मुशाहिदा करता है और ख़ुद को लावारिस बशरियत और इस की रजील सिफ़ात से पाक व मुसफ़आ देखता है तो सैर आफ़ाक़ी तमाम कर लेता है।

एक गिरोह ने इस मक़ाम में एहतियात से काम लिया और इंसान के सात लताइफ़ से हर लतीफ़ा को आलम मिसाल में लताइफ़ के मुनासिब अनिवार से एक नूर की सूरत में करार दिया हैऔर हर लतीफ़े की सफ़ाई की अलामत उन अनिवार मिसाली से किसी नूर के ज़ुहूर को मुक़रर किया है और इस सैर की इबतिदा लतीफ़ा क़ल्ब से करके बतदरीज व तरतीब लतीफ़ा अख़फ़ा तक कि लताइफ़ का मंतहा है पहुँचाया है। मिसाल के तौर पर क़ल्ब सालिक की सफ़ाई की यह अलामत करार दी है कि आलम मिसाल में नूर सुर्ख की सूरत में क़ल्ब का ज़ुहूर होऔर सफ़े रूह की अलामत नूर जर्द की सूरत में ज़ुहूर करार दिया है। इसी तरह बाक़ी को कयास कर लो।

पस सैर आफ़ाक़ी का हासिल यह हुआ कि सालिक अपने तबदील औसाफ़ और तग़य्र अख़लाक़ को मिसाल के आईने में मुशाहिदा करे और अपनी ज़ुल्मतों और कदूरतों के ज़वाल को इस आलम में महसूस करे यहाँ तक कि उसे अपनी सफ़ाई का यकीन हासिल होऔर इस को अपने

तज़किया के ज़रिया साबित करे। और चों कि इस सैर में सालिक साअत फसाअत अपने अहवाल व अत्वार को आलम मिसाल में कि ख़ुद आफ़ाक़ से है, मुशाहिदा करता हैऔर अपने मुंतक़िल होने को एक हैयत से दूसरी हैयत की तरफ़ आलम मिसाल में देखता है गोया आफ़ाक़ में सेरकर्ता है।

अगरचे यह सैर दर हक़ीक़त नफ़्स सालिक में हैऔर अपने औसाफ़ व अख़लाक़ में हरकत कैफी है यानी एक कैफियत से दूसरी कैफियत की तरफ़ इंतकाल हैपनी (इंतकाल मकानी) नहीं है कि एक जगह से दूसरी जगह की जानिब इंतकाल हो, लेकिन चों कि दौर बेनी की वजह से सालिक का मुतम्मा नज़र आफ़ाक़ है, इनफ्स नहीं; इस लिए सैर भी आफ़ाक़ से मंसूब हुई जो सैर कि आफ़ाक़ से मंसूब है इस की तमामीत सैर मक्ली अल्लाह का तमाम होना करार दिया है और फना को इसी सैर से वाबस्ता रखा है और सुलूक की ताबीर इसी सैर से की है।

इस सैर के बाद जो सैर वाक़्य होती है इस को सैर इंफ्सी कहते हैं और इस को सैर फ़ी अल्लाह भी कहते हैं और बका बिल्लाह को इसी मक़ाम में साबित करते हैं और इसी मक़ाम में सुलूक के बाद जज्बा का हुसूल जानते हैं। चों कि सालिक के लताइफ़ पहली सैर में तज़किया पा चुके और बश्री कदूरतों से छुटकारा हासिल कर चुके और इस अम्र की सलाहीयत व काबिलियत पैदा कर चुके कि असम जामा जो कि सालिक का रब (परवरिश कनुंदा) है के ज़लाल व अकूस उन लताइफ़ के आईनों में ज़ाहिर हूँ और यह लताइफ़ इस असम जामा के जज़ईआत की तजल्लियात व ज़हूरात का महल वरूद हूँ। इस सैर को सैर इंफ्सी इस लिए कहते हैं कि इनफ्स असमा के ज़लाल व अकूस के आईने हो गए हैं; इस लिए नहीं कि सालिक की सैर नफ़्स में है जैसा कि सैर आफ़ाक़ में गुज़रा कि आईना दारी की वजह से इस को सैर आफ़ाक़ी कहा जाता है, इस लिए नहीं कि आफ़ाक़ में सैर है। इस सैर में दर हक़ीक़त इनफ्स के आईनों में ज़लाल असमा की सैर है; इसी लिए इस सैर को ‘‘सैर माशूक़ दर आशिक’’ कहा जाता

है। इस सैर को सैर फ़ी अल्लाह इस ऐतबार से कहा जा सकता हैकि सूफ़िया ने कहा: इस सैर में सालिक अख़लाक़ इलाही से आरास्ता व मुतख़ल्लक़ हो जाता है और एक ख़लक़ से दूसरे ख़ल्क़ की तरफ़ मुंतक़िल होता है; क्यों कि मज़हर को ज़ाहिर के बाज़ औसाफ़ से नसीब है अगरचे बाज़ ऐतबार से ही सही। पस गोया इस तआला के असमा में सैर मुतहक़्क़ हो गई है (फिर चंद स्तर बाद फ़रमाते हैं:)

सैर आफ़ाक़ी में गोया रिज़ाइल से तख़लिया हासिल हो गया था (यानी गैर हक़ से क़ता ताल्लुक हो गया) और सैर इंफ्सी में अख़लाक़ हमीदा के साथ तजलीय है। हक़ तआला के साथ वस्ल होना और आईना सालिक में असमा व सिफ़ात का ज़ुहूर होना।

ख़याल रहे कि तख़लिया के लुगवी माना खाली करना और तजलीय बमाना रोशन करना है; क्यों कि तख़लिया मक़ाम फना के मुनासिब है और तजलीय बका के मुनासिब और इस सैर इंफ्सी की इन्तहा नहीं जाती है। सालिक को अगरचे उम्र अब्दी मयस्सर हो जाए तब भी इस सैर के मुनक़ते न होने का हुक्म लगाया है। सूफ़िया कराम ने कहा है कि महबूब के शमाइल व औसाफ़ की इन्तहा नहीं है। पस दाइमी तौर पर इस सालिक के आईने में जो अख़लाक़ इलाही से आरास्ता व मुतख़लक़ हैहक़ तआला की सिफ़ात से किसी सिफ़त की तजल्ली होगी और इस के कमालात से किसी कमाल का ज़ुहूर होता रहेगा तो अनुक़्ता कहां और इन्तहा किस तरह मयस्सर आयेगी और इस फना व बका के तवस्सुत से जो सैर आफ़ाक़ी व इंफ्सी के ज़रिया हासिल हुई, सूफ़िया असम विलायत का इतलाक़ करते हैं और इंतिहाए कमाल इसी जगह तक जानते हैं, इस के बाद अगर सैर वाक़्य होती है तो वह उन के नज़दीक सैर रुजूई है जिस की ताबीर सैर अन अल्लाह बिल्लाह से की जाती है।

इस तरह चौथी सैर कि जिस को सैर फ़ी अलदन्या कहा है। नीज़ नुज़ूल से ताल्लुक रखती है और उन दोनों सीरों को तकमील व इरशाद के वास्ते करार दिया है जैसा कि पहली दो सैर नफ़्स विलायत व कमाल के लिए हैं।

मशाइख़ की एक जमात का कहना है कि सत्र हजार पर्दे कि खबर में आया है ‘‘कि बेशक अल्लाह तआला के लिए नूर व ज़ुल्मत के सत्र हजार पर्दे हैं’’ सैर आफ़ाक़ी में उठना चाहिए; क्यों कि सात लताइफ़ (अनासिरो नफ़्स और क़ल्ब, रूह, सैर, ख़फ़ी, अख़फ़ा) से हर लतीफ़े में दस दस हजार पर्दे उठते हैं और जब वह सैर मुकम्मल हो जाती हैतो तमाम पर्दे उठ जाते हैं और सालिक सैर फ़ी अल्लाह से मुतहक़्क़ हो जाता है और मक़ाम असल तक पहुँच जाता है।

मालूम रहे कि सूफ़िया कराम ने मज़कूरा बाला सीरों में जो कुछ फ़रमाया है इस की सब से ज़्यादा तहक़ीक़ व तन्क़ीह यह है जो आप ने हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के कलम से समाअत फ़रमाई। फिर आप क़ुद्दिस सिर्रहू ने इस पर मुजददाना व मुज्तहिदाना कलाम फ़रमाया है जो आप के उल्लू मर्तबत, रसाई और दिक्कत इदराक वगैरह की बेन व वाज़िह दलील है। तफ़सील के लिए मुलाहिजा हो मक्तूब: 42, जिल्द दोम । पहली बहस के चंद अहम यह हैं:

1। अल्लाह तआला जो कि बे मसल व बे कैफ़ है जैसा कि आफ़ाक़ से विरा है ऐसे ही इनफ्स से भी विरा है। लिहाज़ा सैर आफ़ाक़ी को सैर मक्ली अल्लाह और सैर इंफ्सी को सैर फ़ी अल्लाह कहना कोई माना नहीं रखता है, बल्कि दोनों सैर, सैर मक्ली अल्लाह में दाखिल हैं और सैर फ़ी अल्लाह, सैर आफ़ाक़ी व इंफ्सी से कोसों दौर है और वरा अलवरा है।

2। यह जो कहा गया कि सैर आफ़ाक़ी में तमाम ज़ुल्मानी व नूरानी हिजाबात उठ जाते हैं। हज़रत मुजद्दिद अल्फ़ सानी क़ुद्दिस सिर्रहू के मशहूद के खिलाफ़ है। आप के नज़दीक ज़ुल्मानी हिजाबात का ज़वाल जमी मुरातिब इमकान को तै करने से वाबस्ता है और जुमला मुरातिब का तै होना सैर आफ़ाक़ी व इंफ्सी से मयस्सर आता है और नूरानी हिजाबात का इर्तिफ़ा व ज़वाल असमा व सिफ़ात वाजिबी की सैर से वाबस्ता हता कि सालिक इस मंज़िल पर पहुँच जाता है कि इस की नज़र में न असम है , न सिफ़त, न शान, न ऐतबार। इस वक़्त तमाम नूरानी हिजाबात मुर्तफ़ा होते हैं और वस्ल रबानी से सालिक मुशर्रफ़ हो जाता है।

3। सैर व सुलूक जज्बा और तसफ़ीया से, मकसूद अख़लाक़ रदीय और औसाफ़ रज़ीला से नफ़्स की ततहीर है कि उन तमाम बुरे और मज़मूम औसाफ़ का रईस व सरदार नफ़्स के साथ लगाव और गिरफ्तारी है और नफ़्स की ख़ाहिशात व मुरादात का हुसूल है। पस सैर इंफ्सी हर हाल में ज़रूरी है और सिफ़ात ज़मीमा से सिफ़ात हमीदा तक जाना लाबद्दी है और सैर आफ़ाक़ी मकसूद से खारिज है और मोतद ब ग़रज इस से मुताल्लिक़ नहीं है; क्यों कि आफ़ाक़ के साथ गिरफ्तारी, गिरफ्तारी इनफ्स की वजह से है; क्यों कि इंसान जिस किसी को भी दोस्त रखता है ख़ुद अपनी वजह से रखता है। अहले व अयाल, फ़रज़न्द व माल सब को इस वजह से चाहता है कि उन से उसे नफा व फायदा हासिल होता है औरजब सैर इंफ्सी में हक़ सुब्हानहू के ग़लबा मुहब्बत के सबब अपनी मुहब्बत ख़त्म हो गई तो उन अश्या की भी मुहब्बत ख़त्म हो गई जिन को अपनी वजह से चाहता है।