अध्याय 38 में से 54पृष्ठ 445–463
सब से आली लज़्ज़त मार्फत इलाही है
हज़रत इमाम ग़ज़ाली क़ुद्दिस सिर्रहू ने इस मुद्दा पर भी पर अज़ हक़ायक़ कलाम फ़रमाया है जिस का इख़तिसार यह है कि लज़्ज़तें इदराकात के ताबे हैं और इंसान बहुत सी कुव्वतों का और तबीअतों का जामा है और हर कुव्वत व तबीअत के लिए एक लज़्ज़त है जैसे खाने की ख्वाहिश की तबीअत हुसूल ग़ज़ा के लिए इसी तरह देखने सुनने वगैरह की तबीअतें। इसी तरह दिल के अंदर एक तबीअत है जिसे नूर अलहि कहा जाता है, इरशाद ख़ुदावंदी है:
اَفَمَنۡ شَرَحَ اللہُ صَدْرَہٗ لِلْاِسْلَامِ فَہُوَ عَلٰی نُوۡرٍ مِّنۡ رَّبِّہٖ (سورۃالزمر: ۳۹؍۲۲)
तर्जुमा: तो किया वह जिस का सीना अल्लाह ने इस्लाम के लिए खोल दिया तो वह अपने रब की तरफ़ से नूर पर है।’’
इस कलबी कुव्वत को अक्ल भी कहा जाता है। कभी उसे बातिनी बसीरत और कभी नूर ईमान और यकीन भी कहा जाता है। पस क़ल्ब बदन के आज़ा से मुख़तलिफ़ होता है। क़ल्ब के ज़रिया उन मआनी का इदराक होता है जो न तो ख़याल में आ सकते हैं न महसूस हो सकते हैं जैसेआलम का पैदा होना, इस का साने का मुहताज होना जो साने क़दीम मदबर और हकीम है। इस तबीअत को हम अक्ल का नाम देते हैं बशर्तिके लफ़्ज़ अक्ल से वह चीज़ न समझी जाए जिस के ज़रिया मजादले और मुनाज़रे का तरीका आता है क्यों कि अक्ल इसी नाम से मशहूर है और यह सिफ़त अक्ल इस लिए पैदा की गई कि इस के ज़रिया तमाम उमूर के
हक़ायक़ मालूम किए जाएँ। तो इस की तबीअत का मुक़तज़ा इल्म और मार्फत है और यही इस की लज़्ज़त है (फिर इल्म व मार्फत में लज़्ज़त साबित करने के बाद फ़रमाते हैं)
वाज़िह हुआ कि जो मआरिफ़ अशरफ हैं वह ज़्यादा लजीज हैं और इल्म व मार्फत का शरफ़ मालूम के ऐतबार से होता है, मालूम जितना अशरफ होगा इस से मुताल्लिक़ इल्म भी इतना ही अशरफ होगा। अगर मआरिफ़ व मालूमात में ऐसी चीज़ हो जो निहायत बुज़ुर्गी और कमाल की हामिल है और अशरफ व आज़म है तो इस का इल्म ला मुहाला लजीज तरिन और निहायत शरफ़ का हामिल और बहुत अच्छा होगा। पस अल्लाह ताली की ज़ात से किस का वजूद अर्फ़ा, आली और अशरफ व अकमल और आज़म हो सकता है जो सब का ख़ालिक़ है, जीनत देने वाला और उन की तदबीर व तरबीयत करने वाला है। वह ख़ुदा जिस का कमा हुक्का वस्फ़ बयान नहीं किया जा सकता है। जब तुम्हें उन पर यकीन है तो यह भी यकीन कर लो कि इसरार रबूबियत पर इत्तिला और तमाम मौजूदात को अहाता करने वाले उमूर अलहिह के तरत्तिब का इल्म मआरिफ़ व इत्तिलाआत की तमाम अन्वा में सब से आला, लजीज तर, सब से पाकीज़ा, सब से चहेता और सब से ज़्यादा लायक है इस लिए कि नफ़ूस इस के साथ इतसाफ़ के वक़्त इस के कमाल व जमाल का शऊर हासिल करें, खुश हूँ और राहत हासिल करें। पस अल्लाह ताली की ज़ात व सिफ़ात और इस के अफ़आल अर्श से तहत अलसरा ममलकत में हैं इस की तदबीर का इल्म सब से ज़्यादा लजीज है।
हज़रत इमाम क़ुद्दिस सिर्रहू इसी सिलसिले में बयान फ़रमाते हैं: अगर किसी शख्स को इख्तियार दिया जाए कि वह मोटा ताजे मुर्ग़ या हलवा की लज़्ज़त हासिल करके या रियासत, दुश्मनों पर ग़लबा और बुलंदी का दर्जा पाने से लुत्फ़ अंदोज़ हो तो अगर इस की हिम्मत ख़सेस (घटिया) है, दिल मुर्दा और हिर्स व लालच का शिकार है तो वह गोश्त और हलवे को इख्तियार करेगा और अगर इस की फ़िक्र बुलंद और अक्ल कामिल है तो रियासत को इख्तियार करेगा और इस के लिए भूक और कई दिन ज़रूरी ग़ज़ा से सब्र करना इस के लिए आसान होगा। तो रियासत का
इख्तियार करना यह बता रहा है कि इस शख्स के नज़दीक खानों की लज़्ज़त से बढ़ कर रियासत की लज़्ज़त है और बुलंद हिम्मत और अक्ल कामिल के मालिक के लिए रियासत व हुकूमत की लज़्ज़त ग़ालिब होती है। इसी तरह अल्लाह ताली की मार्फत, इस के दरबार रबूबियत के जमाल का मुताला और उमूर अलहिह के इसरार की तरफ़ नज़र करना इस रियासत से ज़्यादा लजीज होता है जो रियासत मख़लूक़ पर ग़ालिब लज़्ज़तों में सबब से बड़ी और आला है।
इस की ताबीर इस से की जा सकती है जो फ़रमाया गया: कोई नफ़्स नहीं जानता जो इस के लिए आंखों की ठंडक छुपाई गई और बेशक अल्लाह तआला ने उन के लिए वह तैयार किया है जो न किसी आंख ने देखा और न किसी कान ने सुना और न किसी क़ल्ब बशर पर इस का ख़याल गुज़रा और यह वह चीज़ है जिसे वही पहचान सकता है इस वक़्त जिस ने दोनों लज़्ज़तों (लज़्ज़त मार्फत और लज़्ज़त रियासत) को चखा वह ला मुहाला तिब्बत्तल व अनुक़्ता तन्हाई और ज़िक्र व फ़िक्र इख्तियार करेगा और मार्फत के समंदर में गर्क होगा और दुनिया की रियासत व हुकूमत को छोड़ देगा और हक़ीर जानेगा क्यों कि वह जानता है कि रियासत फ़ानी और जिन पर रियासत व हुकूमत है वह भी फ़ानी और यह रियासत उन तमाम कदूरोतों और गंदगियों से मिली हुई है जिन से किसी हाल में यह पाक नहीं हो सकता है। जब उन सारी चीजों को गहराई से देखेगा तो और मौत को पहचानेगा तो ला मुहाला मार्फत इलाही और उन की सिफ़ात व अफ़आल के मुताला और आला अल्येन से ले कर असफल सॉफिलीन तक इस के निजाम ममलकत की लज़्ज़त ज़्यादा बड़ी मालूम होगी।
फिर यह भी ध्यान रहे कि दुनिया की सब लज़्ज़तें फ़ानी और यह सब लज़्ज़तें अब्दी हैं, मौत से ख़त्म नहीं होतीं क्यों कि मौत महल मार्फत को ख़त्म नहीं करती और महल मार्फत रूह है जो अम्र रबी आसमानी है। मौत इस के अहवाल में तब्दीली पैदा करती है और इस के मशाग़ुल और रुकावटों को दौर करके कैद से आजाद करती है, उसे
मिटाती नहीं, शुहदा के हक़ में इरशाद ख़ुदावंदी है:
وَلَا تَحْسَبَنَّ الَّذِیۡنَ قُتِلُوۡا فِیۡ سَبِیۡلِ اللہِ اَمْوَاتًا ؕ بَلْ اَحْیَآءٌ عِنۡدَ رَبِّہِمْ یُرْزَقُوۡنَ فَرِحِیۡنَ بِمَاۤ اٰتٰہُمُ اللہُ مِنۡ فَضْلِہٖ ۙ وَیَسْتَبْشِرُوۡنَ بِالَّذِیۡنَ لَمْ یَلْحَقُوۡا بِہِمۡ مِّنْ خَلْفِہِمْ (سورۃآل عمران: ۳؍۱۶۹،۱۷۰)
तर्जुमा: और जो अल्लाह की राह में मारे गए हरगिज़ उन्हें मुर्दा न ख़याल करना बल्कि वह अपने रब के पास ज़िंदा हैं रोज़ी पाते हैं। शाद हैं इस पर जो अल्लाह ने उन्हें अपने फजल से दिया और खुशियाँ मनारहे हैं अपने पिछलों की जो अभी उन से न मिले।’’
हज़रत इमाम क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि तुम यह गुमान न करना कि यह एज़ाज़ शुहदा के साथ ख़ास है क्यों कि आरिफ को हर सांस में एक शहीद का दर्जा मिलता है। और हदीस शरीफ़ में है कि शहीद तमन्ना करें गे कि उसे दुनिया की तरफ़ लौटाया जाए ताकि वह दुबारा शहीद हो। इस की वजह यह है कि उसे बहुत बड़ा सवाब मिलेगा और शुहदा तमन्ना करें गे कि काश वह उलमा (आरिफ़ैन) होते क्यों कि वह देखें गे कि उलमा-ए आरिफ़ैन का मर्तबा बहुत बुलंद है।
मुहब्बत को कुव्वत देने वाले असबाब
पहला सबब
हज़रत इमाम क़ुद्दिस सिर्रहू ने मुहब्बत बढ़ाने के दो सबब बयान फ़रमाए:
1। दुनिया से ताल्लुक तोड़ना और गैर अल्लाह की मुहब्बत दिल से निकाल देना क्यों कि दिल बर्तन के मसल है, जब तक इस से पानी न निकले सर के की गुंजाइश नहीं होती, इरशाद ख़ुदावंदी है:
مَا جَعَلَ اللہُ لِرَجُلٍ مِّنۡ قَلْبَیۡنِ فِیۡ جَوْفِہٖ (سورۃ الاحزاب: ۳۳؍۴)
तर्जुमा: अल्लाह ने किसी आदमी के अंदर दो दिल न रखे।’’
कमाल मुहब्बत यह है कि पूरे दिल के साथ अल्लाह तआला से मुहब्बत करे और जब तक गैर की तरफ़ मुतवज्जा रहेगा इस के दिल का एक ज़ावीया अल्लाह तआला के गैर में मशगूल होगा और जिस क़द्र गैर में मशगूलियत होगी इसी क़द्र अल्लाह तआला से मुहब्बत में नुकसान होगा। अल्लाह तआला की मुहब्बत दलों में कमजोर होने की एक वजह दुनयवी कुव्वत है और इस में अहले व अयाल, माल, औलाद, रिश्ता दारों, जमीन, जानवरों, बागों और सैर व सयाहत की मुहब्बत भी शामिल है हतिया कि जो शख्स परिंदों की उम्दा आवाजों और नसिएम सहरी की हरकत से सर्वर हासिल करता है वह दुनयवी नेअमतों की तरफ़ मुतवज्जा होता है और इस से मुहब्बत इलाही में नुकसान होता है। दिल से मुहब्बत दुनिया इसी वक़्त दौर हो सकती है जब ज़हद के रास्ते पर चले, हमेशा सब्र इख्तियार करे और ख़ौफ़ व रजा से आरास्ता हो और उन मुक़ामात तौबा, ज़हद वगैरह को हासिल करे। यह मुक़ामात सब मुक़द्दमात हैं ताकि उन के ज़रिया मुहब्बत के किसी एक रुकन को हासिल करे और गैर अल्लाह से दिल को खाली करना, इस का आगाज़ अल्लाह तआला पर और आख़िरत, जन्नत, दोज़ख पर ईमान लाना है। फिर इस से ख़ौफ़ व रजा की शाखें फूटती हैं और उन दोनों से तौबा और सब्र निकलता है। फिर यह दुनिया, माल व जाह और तमाम दुनयवी फ़वाइद से ज़हद की तरफ़ ले जाता है हतिया कि उन तमाम बातों की वजह से दिल गैर अल्लाह से पाक हो जाता है यहाँ तक कि इस के दिल में अल्लाह तआला की मार्फत व मुहब्बत के नुज़ूल के लिए वसात पैदा हो जाती है और यह सब बातें ततहीर क़ल्ब के मुक़द्दमात हैं और यह मुहब्बत के दो रुकनों में से एक रुकन है।
दूसरा सबब
दूसरा सबब अल्लाह तआला की मार्फत का कवी व वसीअ होना नीज़ इस का दिल पर ग़ालिब होना है और यह इस वक़्त होता है जब दिल को तमाम दुनयवी मशाग़ुल और ताल्लुकात से पाक किया जाए, यह इसी तरह है जैसे जमीन को घास फूस से पाक करने के बाद इस में बीज डाला जाता है और यह मुहब्बत का दूसरा रुकन है। फिर इस बीज से मुहब्बत व
मार्फत का बीज उगता है और वह बीज कलिमा तैबा है और अच्छा अमल इस मार्फत के लिए जमाल और ख़ादिम की तरह है। अच्छे आमाल सब के सब पहले दिल को दुनिया से पाक करते हैं,फिर इस तहारत को बाक़ी रखने का सबब बनते हैं, पस अमल से यही मार्फत मकसूद होती है। जहां तक कैफियत अमल के इल्म का ताल्लुक है तो वह अमल के लिए मकसूद होता है। पहले इल्म मामला है जिस से अमल मकसूद होता है, मामला का मक़सद दिल की तहारत व तज़किया है ताकि इस में हक़ की तजल्ली हो और इल्म मार्फत से मुज़य्यन हो और यह इल्म मकाशफा है और जब यह मार्फत हासिल हो जाती है तो इस के पीछे मुहब्बत आती है।
यह भी ख़याल रहे कि श्वागुल दुनिया से जुदा होने के बाद इस मार्फत तक इस वक़्त पहुँच सकता है जब कि उसे साफ सुथरी फ़िक्र और दाइमी ज़िक्र, तलब में बलेग़ कोशिश और अल्लाह तआला और इस की सिफ़ात और इस के मलकूत आसमान और बाक़ी मख़लूकात में दाइमी नज़र हो। इस मार्फत तक पहुँचने वाले दो किस्म के लोग हैं: (1)अक़्विया यानी अस्हाब कुव्वत व ताकत जिन को पहले अल्लाह तआला की मार्फत होती है, फिर इस के ज़रिया इस के गैर को पहचानते हैं। (2) ज़ोफा यानी कमजोर लोग जिन को पहले अफ़आल की मार्फत होती है, फिर इस से वह फ़ाइल तक तरक्की करते हैं। दोनों के शवाहिद क़ुरआनी आयात में मज़कूर हैं।
अलामात मुहब्बत
हज़रत इमाम क़ुद्दिस सिर्रहू की बयान करदा अलामात का खुलासा यह है:
1। दार उलइस्लाम में महबूब की मुलाक़ात कश्फ़ व मुशाहिदा के तौर पर चाहे। जब उसे मालूम है कि इस तक मौत के ज़रिया दुनिया से कोच करना और उसे छोड़ना जरुई है तो उसे चाहिए कि मौत को पसंद करे, भागे न, क्यों कि मुहब् अपने महबूब के ठिकाने तक जाने को बोझ महसूस नहीं करता क्यों कि वह इस के मुशाहिदे से
लुत्फ़ अंदोज़ होता है और मौत मुलाक़ात की कुंजी और मुशाहिदा में दाखिल होने का दरवाजा है, नबी अकर्म ﷺ ने फ़रमाया:
मिन अहब लिक़ा अल्लाह अहब अल्ला लिक़ाआ (जो शख्स अल्लाह तआला से मुलाक़ात चाहता है अल्लाह तआला इस की लिक़ापसंद करता है)
ख़याल रहे कि अक्सर बंदे मौत को पसंद नहीं करते, इस का सबब अहले व अयाल और माल व दौलत वगैरह की जुदाई का अफसोस होता है। यह कमाल मुहब्बत के मुनाफ़ी है, कमाल मुहब्बत वही है जो पूरे तौर पर दिल को घेर ले, हां माल व औलाद की मुहब्बत के साथ कमजोर मुहब्बत जमा हो सकती है। इस का दूसरा सबब यह होता है कि बंदा फ़ी अलहाल मुहब्बत के इबतिदाई मराहिल में होता है, वह ,मौत को नापसंद नहीं करता, बल्कि वह अल्लाह तआला की मुलाक़ात की तैयारी के लिए मौत के आने को पसंद करता है तो यह मुहब्बत की कमज़ोरी पर दलालत नहीं करती, न इस मक़सद के तहत मौत को नापसंद करना कमाल मुहब्बत के मुनाफ़ी है।
2। दूसरी अलामत यह है कि जिस बात को अल्लाह तआला पसंद करता है उसे अपनी महबूब चीजों पर, ज़ाहिरी व बातिनी तौर पर तरजीह दे। पस उसे अमल का शौक हो और ख़ाहिशात की इत्तिबा से बचता रहे, सस्ती को क़रीब न आने दे, वह हमेशा फ़रमां बरदारी में रहे और नवाफ़िल के ज़रिया इस का क़ुर्ब हासिल करता रहे, अल्लाह तआला के यहाँ दर्जात क़ुर्ब का ख़ाहां रहे जैसे मुहब् अपने महबूब के दिल में मज़ेद क़ुर्ब की तलब करता है।
मालूम रहे कि मुहब्बत नाफ़रमानी के साथ भी जमा हो जाती है, नाफ़रमानी कमाल मुहब्बत की ज़िद है, असल मुहब्बत की नहीं। कितने ही लोग ख़ुद से मुहब्बत करते हैं और वह बीमार होने की सूरत में सेहत के ख्वाहिश मंद होते हैं,लेकिन वह चीज़ खाते हैं जो नुकसान दह है हालां कि वह जानते हैं कि यह जरुर रसां है तो इस का मतलब यह
नहीं कि ख़ुद से मुहब्बत नहीं करते। इसी पर वह रिवायत दलालत करती है कि हज़रत नईमान ने चंद बार एक मासियत का इर्तिकाब किया, बार बार उन्हें हद लगायी गई, एक साहिब ने उन पर लानत की तो हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया:
लातलाना फ़िग़ुना यहब अल्लाह व रसोलह (उन पर लानत न करू क्यों कि वह अल्लाह और इस के रसूल ﷺ से मुहब्बत करते हैं)
3। तीसरी अलामत मुहब्बत यह है कि ज़िक्र इलाही का बहुत हरीस हो, इस की ज़बान इस सिलसिले में कभी कोताही न करे और न खाली रहे। कहा जाता है: मिन अहब शीयन अक्सर जिक्रा (जो किसी चीज़ से मुहब्बत करता है इस का ज़िक्र कसरत से करता है) बल्कि इस के मुताल्लिक़ीन का भी ज़िक्र करता है। तो मुहब्बत इलाही की अलामत इस के ज़िक्र और कुरआन से, हुज़ूर ﷺ से और दीगर तमाम चीजें जो अल्लाह तआला की तरफ़ मंसूब हैं सब से मुहब्बत करे।मुहब्बत का तो फ़ैज़ान यह होता है कि जो जिस से मुहब्बत करता है वह इस के महल के कुत्तों से भी मुहब्बत करता है। मुहब्बत जब मुस्तहकम होती है तो वह महबूब से तजावुज़ करके हर इस चीज़ तक पहुँच जाती है जिस का महबूब से ताल्लुक हो। जिस आदमी के दिल पर मुहब्बत इलाही ग़ालिब होती है वह कभी तमाम मख़लूक़ से मुहब्बत करता है इस हैसियत से कि वह अल्लाह की मख़लूक़ है। तो कुरआन पाक और हुज़ूर ﷺ और अल्लाह तआला के नेक बंदों से मुहब्बत कैसे नहीं करेगा। इसी लिए अल्लाह तआला ने फ़रमाया:
قُلْ اِنۡ کُنۡتُمْ تُحِبُّوۡنَ اللہَ فَاتَّبِعُوۡنِیۡ یُحْبِبْکُمُ اللہُ (سورۃ آل عمران: ۳؍۳۱)
तर्जुमा: ए महबूब तुम फ़रमादु कि लोगो अगर तुम अल्लाह को दोस्त रखते हो तो मेरे फरमाँबरदार होजाओ अल्लाह तुम्हें दोस्त रखे गा।’’
हज़रत सफ़ियानरहमत अल्लाह अलैहि ने फ़रमाया: जो शख्स इस इंसान से मुहब्बत करता हैजो अल्लाह तआला से मुहब्बत करता है तो वह अल्लाह तआला से मुहब्बत करता है और जो अल्लाह तआला की
ताज़ीम करने वाले की ताज़ीम करता है वह अल्लाह तआला की ताज़ीम करता है।
4। मुहब्बत इलाही की एक अलामत यह है कि गोशा नशीनी, अल्लाह तआला से मुहब्बत, और कुरआन पाक की तिलावत से इंस हासिल करे, हमेशा तहजद पढ़े, रात के सुकून और मशाग़ुल से अनुक़्ता के ज़रिया वक़्त के खालिस होने को गनीमत जाने। मुहब्बत का कम अज़ कम दर्जा महबूब की ख़लवत से लज़्ज़त हासिल करना और इस की मुनाजात से लुत्फ़ अंदोज़ होना है जिस शख्स के नज़दीक नींद और गुफ़्तगू में मशगूलियत मुनाजात ख़ुदावंदी के मुकाबले में ज़्यादा लजीज हो तो इस की मुहब्बत कैसे सही होगी। उलहासिल मुहब्बत की अलामत महबूब से कमाल दर्जा का इंस और मुनाजात है नीज़ ख़लवत व तन्हाई से लुत्फ़ अंदोज़ होना और जिस काम से ख़लवत में नुक़्स और मुनाजात में कमी और तकदर पैदा हो वह कामिल वहशत है। इंस की अलामत यह है कि अक्ल व फ़हम मुकम्मल तौर पर लज़्ज़त मुनाजात में मुस्तग़र्क हूँ जैसे कोई अपने माशूक़ को पुकारता और हम कलाम होता है।
बाज़ हज़रात में यह लुत्फ़ व लज़्ज़त इन्तहा को पहुँच जाती है। मनक़ूल है कि एक बुजुर्ग नमाज़ पढ़ रहे थे और उन का घर जल गया, लेकिन उन्हें पता न चला और एक बुजुर्ग के पावं में तकलीफ़ थी तो हालत नमाज़ में उन का पावं काटा गया, लेकिन उन को खबर न हुई।
5। पाँचवीं अलामत यह है कि अल्लाह तआला के सिवा बाक़ी जो कुछ भी इस से चला जाए इस पर अफसोस का इज़हार न करे और जिस वक़्त ज़िक्र इलाही न कर सके और ताअत न हो पाए इस पर बहुत ज़्यादा अफसोस करे। मुहब् को चाहिए कि जब वह किसी वक़्त गफलत का शिकार होने बाद इस से रुजू करे तो महबूब की तरफ़ रुजू करे औरइसी की तरफ़ मुतवज्जा हो, इस के इताब को दौर करे, अल्लाह तआला से सवाल करे और कहे कि या अल्लाह तो ने मेरे किस गुनाह के सबब अपना एहसान दौर किया, बारगाह से दौर किया, मुझे मेरे नफ़्स व शैतान की इत्तिबा में लगाया। इस तरह ज़िक्र ख़ुदावंदी की सफ़ाई और रक्त
क़ल्ब पैदा होगी और साबिक़ा गफलत का कफ़्फ़ारा होगा और यह लग़्ज़िश नये ज़िक्र औरकलबी सफ़ाई का ज़रिया होगी और जब मुहब् ,महबूब के मासवा से सिर्फ़ नज़र कर लेता है और सब कुछ इसी की तरफ़ से देखता है तो न अफसोस करता है और न शक, बल्कि मुकम्मल तौर पर राजी होता है और यकीन रखता है कि इस के महबूब ने जो कुछ इस के लिए मुक़द्दर किया है इस की भलाई इसी में है।
6। मुहब्बत की यह अलामत भी है कि इताअत ख़ुदावंदी से आराम पाए, इस को बोझ न समझे, और न इस में थकावट महसूस होजीसे किसी बुजुर्ग का कौल है कि हम ने बेस रात को मशक्कत बर्दाश्त की, फिर बेस साल इस से आराइश हासिल की।
7। सातवें अलामत यह है कि अल्लाह तआला के तमाम बंदों पर शफ़ीक़ व मेहरबान और इस के दुश्मनों पर और उन तमाम लोगों पर सख्त हो जो इस की मर्जी के खिलाफ़ करते हैं, इरशाद ख़ुदावंदी है:
اَشِدَّآءُ عَلَی الْکُفَّارِ رُحَمَآءُ بَیۡنَہُمْ (سورۃ الفتح: ۴۸؍۲۹)
तर्जुमा: काफ़िरों पर सख्त हैं और आपस में नरम दिल।’’
इस सिलसिले में मलामत से न डरे, अल्लाह की खातिर गजब व गुस्सा से कोई अमल उसे फेर न सके, ख़ुदावंद क़ुद्दूस के दोस्तों का यही वस्फ़ होता है।
इस आखिरी अलामत को बार बार गौर से पढ़ें, समझें कि सूफ़िया का तरीका सुलह कल का न रहा और न वह बद मज़हबों से कोई ताल्लुक रखते थे। बाज़ सूफ़िया से जो मुहब्बत व शफकत की बातें मनक़ूल हैं, वह भी मस्लिहत दीनी से खाली न थीं और उन्हों ने दौर के तक़ाज़ों को मलहूज़ रखते हुए तरीका तबलीग़ इख्तियार किया। बाज़ बुजुर्गों की कुछ अपनी कैफीतें थीं जिन से मग़्लूब हो कर उन की रोष मस्लिहाना रही वर्ना यह कैसे हो सकता है कि ख़ुदा को चाहने वाले इस के दुश्मनों से यारी रखें। यही हाल हुज़ूर सर्वर कोनेन ﷺ से मुहब्बत का है कि जिसे आप से सच्ची और हक़ीक़ी मुहब्बत होगी वह आप के
दुश्मनों, तौहीन व तन्क़ीस करने वालों, आप के ज़िक्र को मिटाने वालों से, आप की अज़मत व मुहब्बत निकालने वालों से कभी भी न रिश्ता करेगा न दोस्ती न ताल्लुकात रखेगा। दरअसल यह सब कुछ सच्चे मुहब् ही कर सकते हैं जो अल्लाह तआला और इस के रसूल ﷺ की बजाए अपने दुनयवी मनाफ़े का दीवाना होगा वह सिर्फ़ अपना नफा देखेगा, जहां से मिले, उसे ख़ुदा व रसूल ﷺ के दुश्मनों और दोस्तों से कोई ताल्लुक न होगा।
8। मुहब्बत की एक अलामत यह है कि अल्लाह तआला की मुहब्बत में ख़ाइफ़ हो और इस की हैबत व ताज़ीम में दुबला पतला हो जाए। बाज़ औकात ख़याल किया जाता है कि ख़ौफ़ मुहब्बत की ज़िद है जब कि ऐसा नहीं, बल्कि अज़मत इदरा क हैबत पैदा करती है जिस तरह जमाल के इदराक से मुहब्बत पैदा होती है और ख़ास मुहबीन के लिए मक़ाम मुहब्बत में ऐसे ख़ौफ़ होते हैं जो दूसरों के लिए नहीं होते और बाज़ ख़ौफ़ बाज़ से सख्त होते हैं। पहला ख़ौफ़ अदम तवज्जो का है, इस से सख्त हिजाब का ख़ौफ़, इस से से भी सख्त अपने आप से दौर करने का ख़ौफ़ है। हां बाद और दौर ई का ख़ौफ़ इसी के दिल में होता है जो क़ुर्ब से मानूस और लुत्फ़ अंदोज़ हो। जिन को दौर कर दिया गया है उन की बातें सन कर अहले क़ुर्ब व मुहब्बत बूढ़े हो जाते हैं और जिसे दूरी से इंस हो क़ुर्ब का मुश्ताक कैसे हो सकता है और जिस के लिए क़ुर्ब की बिसात मुमकिन न हो वह दूरी के ख़ौफ़ से नहीं रोता।
जोख़ौफ उपर ज़िक्र किए गएइन के अलावा अहले क़ुर्ब मुहब्बत को यह भी ख़ौफ़ होता है कि कहीं हमारी मंज़िल रुक न जाए, में तरक्की से महरूम न हो जाऊं। क़ुर्ब के दर्जात बेशुमार हैं, बंदेपुर लाज़िम है कि वह हर वक़्त तरक्की की कोशिश करे, कहा जाता है: मन अस्तवा योमाह फहू मग़बूनٌ व मिन कान यूमा श्रन मिन उमसा फहू मलऊनٌ (जिस आदमी के दो दिन बराबर हैं(यानी तरक्की न हो) वह घाटे में है और जिस
का आज कल के मुकाबले में बुरा हो वह रहमत से दौर है।
इसी तरह अहले मुहब्बत को महबूब से बे ग़म हो जाने या भूल जाने का ख़ौफ़ होता है इस लिए कि सच्चा मुहब् हमेशा शौक, तलब और हिर्स में रहता है, मज़ेद दर्जात की तलब में कोताही नहीं करता है, उसे लुत्फ़ जदीद और नयी नयी नवाज़िशात से खुशी और तसल्ली होती है। अगर ऐसा न हो तो यह इस के रुक जाने या रुजू का सबब होता है क्यों कि यह चीज़ भी कभी इस अंदाज़ से आती है कि वह जान नहीं पाता है जिस तरह कभी इस जगह से आजाती है कि यह समझ नहीं पाता है। उन तब्दीलीयों के लिए मख़फ़ी आसमानी असबाब होते हैं, बशर की ताकत नहीं कि उन पर मतला हो सके। जब अल्लाह तआला इस पर खुफिया तदबीर या इस्तिदराज और ढील का इरादा करता है तो उसे बे ग़म कर देता है और पोशीदा रखता है। बंदा उम्मीद में रहता है और हसन नज़र या ग़लबा गफलत या ख्वाहिश या भूल की वजह से धोका खाता है।
यह सब शैतानी लश्कर हैं, फरिश्तों के लश्करों यानी इल्म, अक्ल,ज़िक्र और बयान पर ग़ालिब आजाते हैं और वह औसाफ़ इलाहीह जो ज़ाहिर हैं जोश मुहब्बत का तक़ाज़ा करते हैं, वह औसाफ़ लुत्फ़, रहमत और हिक्मत हैं। इसी तरह बंदे के बाज़ औसाफ़ जो रोशन होते हैं वह बे ग़म होने का सबब बनते हैं जैसे सब्र, इज्जत और इस्तिग़ना वगैरह और यह खुफिया तदबीर बद बुख़ती और महरूमी के मुक़द्दमात हैं। तो मुहब् ख़ौफ़ से खाली नहीं होता है और ख़ौफ़ करने वाला मुहब्बत से खाली नहीं होता है, लेकिन जिस आदमी पर मुहब्बत ग़ालिब हो हतिया कि इस में फैल जाए और ख़ौफ़ मामूली हो तो कहा जाता है कि यह मक़ाम मुहब्बत में है और वह मुहबीन से शुमार होता है और ख़ौफ़ की आमेज़िश मुहब्बत के नशे को कुछ तस्कीन देगी। पस अगर मुहब्बत ग़ालिब हो और मार्फत भी ज़्यादा हो तो बश्री ताकत इस को बर्दाश्त नहीं कर सकती। अलबत्ता ख़ौफ़ की वजह से इस में कुछ एतिदाल आजाता है और दिल पर इस का वक़ूअ ख़फ़ीफ़ होता है।
9। नवें अलामत यह है कि मुहब्बत को छिपाए और दावाए मुहब्बत से परहेज़ करे और महबूब की ताज़ीम, हैबत और उजलाल की वजह से वजह को ज़ाहिर करनेसे बचे क्यों कि इस के राज़ को ज़ाहिर करना इस की ग़ैरत के खिलाफ़ है और मुहब्बत भी इसरार से है। और बसा औकात दावा में असल बात से ज़ाइद बात निकल जाती है और यह बोहतान होगा जिस का नतीजा आख़िरत में बुरा है और दुनिया में भी आज़माइश होती है। हां बसा औकात मुहब् नशे मुहब्बत में मदहोश हो जाता है और इस के अहवाल में इज़तिराब पैदा हो जाता है इस वक़्त मुहब्बत ज़ाहिर हो जाती है। अगर इस किस्म का इज़हार किसी तकल्लुफ़ और इख्तियार के बग़ैर सरज़द हो तो वह मजबूर होगा क्यों कि वह मग़्लूब हुआ। और बाज़ औकात आतिश मुहब्बत शोला ज़िन होती है कि किसी को इस की ताब नहीं होती और कभी इस से दिल बह जाता है तो इस बिहाव को रोका नहीं जा सकता।
ख़याल रहे कि मुहब्बत काबिल तारीफ़ है और इस का इज़हार भी महमूद, अलबत्ता बतकल्लुफ़ ज़ाहिर करना बुरा है क्यों कि इस में दावा और तकबर है और मुहब्बत का हक़ तो यह है कि इस की पोशीदा मुहब्बत अफ़आल व अहवाल से ज़ाहिर हो, अक़्वाल से नहीं, और मुनासिब यह है कि इस की मुहब्बत क़सद व इरादे के बग़ैर ज़ाहिर हो, और वह ऐसे फेअल को भी ज़ाहिर न करे जो मुहब्बत पर दलालत करता है, सिर्फ़ महबूब मतला हो, दूसरों को इत्तिला करना मुहब्बत में शिर्क है और खलल पैदा करना है।
10। मुहब्बत की अलामतों से इंस व रज़ा भी है जिस का बयान आगे आएगा। खुलासा यह कि दीन के तमाम मुहासिन व मक्कारम अख़लाक़ मुहब्बत का समरा हैं और अगर मुहब्बत का समरा न हो तो वह ख्वाहिश की इत्तिबा है और यह निहायत बुरे अख़लाक़ से है। हां बाज़ औकात आदमी अल्लाह तआला से इस के एहसानात की वजह से और बाज़ औकात इस के जलाल व जमाल की वजह से मुहब्बत करता है। मुहब्बत करने वाले उन दोनों किस्मों से बाहर नहीं होते।
इसी लिए सय्यद अलताइफा हज़रत जुनेद बग़दादी क़ुद्दिस सिर्रहू ने फ़रमाया कि अल्लाह तआला की मुहब्बत में बंदे आम भी हैं ख़ास भी। आम लोगों ने यह मर्तबा इस लिए पाया कि वह हमेशा इस के एहसानात और नेअमतों की कसरत को देखते हैं तो वह उसे राजी किए बग़ैर नहीं रह सकते, अलबत्ता इनामात व एहसानात की कमी ज्यादती से उन की मुहब्बत भी कम ज़्यादा होती है, लेकिन ख़ास लोगों ने अल्लाह तआला की कुदरत, इल्म, हिक्मत और सल्तनत में यकताई के बाइस, इस की अज़मत के बाइस, इस की अज़मत के पेश नज़र मुहब्बत का मक़ाम हासिल किया।
यह भी ध्यान रहे कि बाज़ लोग अपनी ख़ाहिशात नफ़सान्य और शैतान लिएन से मुहब्बत करते हैं जो अल्लाह का दुश्मन है वह अल्लाह तआला से मुहब्बत का दावा करते हैं हालां कि उन लोगों में मुहब्बत की कोई अलामत नहीं पाई जाती है और अगर होती है तो महज़ मुनाफ़क़त, रियाकारी और शहरत की वजह से ऐसा दिखाते हैं, उन की ग़रज दुनिया का नकद नफा होता है जैसे उलमा-ए स्वावर क़ारी।
इंस: मालूम हो कि इंस, ख़ौफ़ और शौक मुहब्बत के आसार में से है, लेकिन यह आसार मुख़तलिफ़ हैं जो मुहब् पर मुख़तलिफ़ होते हैं, इस की नज़र और ग़लबा वक़्त की वजह से जब ग़ैब के पर्दों के पीछे मुंतहाए जमाल तक इस पर इत्तिला हासिल करने का ग़लबा होता है और वह हक़ीक़त जलाल पर इत्तिला से ख़ुद को क़ासिर समझता है तो दिल इस की तलब में ब्रांगेख़्ता होता है और जोश मारता है। इस हालत को शौक कहते हैं। इस पर यह अम्र गायब की निस्बत से होता है। और इस क़ुर्ब और मुशाहिदा हुज़ूर की खुशी ग़ालिब हो जो कश्फ़ से हासिल हुआ और इस की नज़र मुताला जमाल पर महसूर हो तो इस खुशी को इंस कहते हैं, और अगर इस की नज़र सिफ़ात इज्जत, इस्तिग़ना और बे प्रवाही और ज़वाल बाद के इमकान के खतरे पर हो तो इस शऊर से दिल में दुख पैदा होता है और इस दुख का नाम ख़ौफ़ है।
तो यह अहवाल उन मुलाज़ात के ताबे हैं और मुलाहज़ात उन असबाब के ताबे हैं जो उन मुलाहज़ात का तक़ाज़ा करते हैं और यह बे शुमार हैं। तो इंस का मानी मुताला जमाल से दिल को खुश होना है हतिया कि जब यह खुशी ग़ालिब हो और जो कुछ गायब है इस का ख़याल न रहे और न खतरा ज़वाल हो तो इस की लज़्ज़त और फरहत बढ़ जाती है। यही वजह है कि एक बुजुर्ग से पूछा गया कि किया आप मुश्ताक हैं? उन्हों ने जवाब दिया: नहीं, शौक तो गायब चीज़ का होता है, जब गायब हाजिर हो जाए तो किस का शौक होगा। यह इस शख्स का कौल है जो हासिल शुदा पर खुशी में डूबा हुआ था, मज़ेद लुत्फ़ व कर्म जो मुमकिन है उन की तरफ़ तवज्जो न थी और जिस आदमी पर इंस ग़ालिब हो इस की ख्वाहिश तन्हाई और गोशा नशीनी की तरफ़ होती है।
अलामत: इंस की ख़ास अलामत यह है कि लोगों की मजलिस से इस का दिल तंग हो और उन से घबराहट हो नीज़ ज़िक्र ख़ुदावंदी की शेरेनी का बहुत ज़्यादा हरीस हो। इस सूरत में अगर वह मिलेगा तो वह जमात में तन्हा, ख़लवत में मुजतमा, वतन में अजनबी, सफर में मुकीम, गायब होने की हालत में हाजिर और हाजिरी की हालत में गायब होता है, बदन से मेल ज्वल रखता है, लेकिन कलबी तौर पर तन्हा होता है। वह अल्लाह तआला के ज़िक्र की मिठास में डूबा हुआ होता है।
नतीजा: जब इंस दाइमी, ग़ालिब और मुस्तहकम हो और शौक की परेशानी या तब्दीली और हिजाब का ख़ौफ़ उसे गुदला न करे तो इस से अक़्वाल व अफ़आल और अल्लाह तआला से मुनाजात में कुशादगी पैदा होती है। बाज़ औकात बजाहिर यह बुरा होता है क्यों कि इस में जुरात होती है और हैबत कम होती है, लेकिन जो शख्स मक़ाम इंस में होता है इस से यह बात बर्दाश्त की जाती है और जो आदमी इस मक़ाम में नहीं होता, बल्कि फेअल व कलाम में उन लोगों की मुशाबहत इख्तियार करता है तो वह हलाक होता है और कुफ्र के क़रीब हो जाता है।
ख़याल रहे इस सिलसिले में हज़रत इमाम ग़ज़ाली क़ुद्दिस सिर्रहू ने मुतअद्दिद बुजुर्गों की मिसालें ज़िक्र की हैं। हज़रत जुनेद बग़दादी क़ुद्दिस सिर्रहू का यह कौल भी नकल फ़रमाया है कि अहले इंस ख़लवत में अपने कलाम और मुनाजात में ऐसी बातें करते हैं जो आम लोगों के नज़दीक कुफ्र हैं। और एक मर्तबा फ़रमाया: अगर तमाम लोग यह बातें सुनें तो उन को काफ़िर करार दें हालां कि वह उन बातों से अपने मामलात में तरक्की पाते हैं, उन से यह बातें बर्दाश्त भी की जाती हैं और यह उन के लायक भी हैं।
हज़रत इमाम क़ुद्दिस सिर्रहू फरमातेहैं: इस बात को बईद न जानू कि अल्लाह तआला किसी बंदे की एक बात पर राजी होता है जब कि वही दूसरे से नापसंद होती है, लेकिन यह इस वक़्त होता है जब उन का मक़ाम मुख़तलिफ़ हो। कुरआन पाक में उन मआनी पर तंबीहात हैं अगर तुम समझो क्यों कि कुरआन पाक में मज़कूर तमाम वाक़ियात अस्हाब बसीरत व बसारत के लिए तंबीहात हैं कि वह उन से इबरत पकड़ें और ऐसे लोगों के लिए यह महज़ नाम हैं। फिर आप ने मुतअद्दिद मिसालें क़ुरआनी आयात से बयान की हैं मसलन हज़रत मूसा अली नबीना व अलैहि अलसलो वस्सलाम का कौल कुरआन ने नकल किया कि:
اِنْ ہِیَ اِلَّا فِتْنَتُکَ ؕ تُضِلُّ بِہَا مَنۡ تَشَآءُ وَتَہۡدِیۡ مَنۡ تَشَآءُ (سورۃ الاعراف: ۷؍۱۵۵)
तर्जुमा: वह नहीं मगर तेरा आजमाना तो इस से बहकाए जिसे चाहे और राह दिखाए जिसे चाहे।’’
यह कौल इंबिसात और कुशादगी की दलील है। हज़रत मूसा अली नबीना व अलैहि अलसलो वस्सलाम की बाज़ और बातें नकल करके हज़रत इमाम क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि मूसा अलैहि अस्सलाम के अलावा कोई शख्स यह बातें कहता तो बे अदबी शुमार होतीं क्यों कि जो शख्स मक़ाम इंस में होता है इस से नरमी बरती जाती है और इस की बातें बर्दाश्त की जाती हैं। हज़रत यूनुस अली नबीना व अलैहि अलसलो वस्सलाम जब मक़ाम कब्ज व हैबत में थे तो उन
से इस कम बात भी बर्दाश्त नहीं की गई और उन को मछली के पेट में तीन अंधेरों की कैद में डाल दिया गया और कयामत तक उन के हक़ में यह निदा दी गई:
لَوْ لَاۤ اَنۡ تَدٰرَکَہٗ نِعْمَۃٌ مِّنۡ رَّبِّہٖ لَـنُبِذَ بِالْعَرَآءِ وَ ہُوَ مَذْمُوۡمٌ (سورۃ القلم: ۶۸؍۴۹)
तर्जुमा: अगर इस के रब की नेमत इस की खबर को न पहुँच जाती तो जरूर मैदान पर फेंक दिया जाता इल्जाम दयाहुआ।’’
उन इख़तिलाफ़ात में से बाज़ इख़तिलाफ़ अहवाल व मुक़ामात के ऐतबार से हैं और बाज़ इस वजह से हैं कि अज़ल में बंदों को एक दूसरे पर फ़ज़ीलत दे दी गई और उन की किस्मत में तफ़ावुत रखा गया। हज़रत ईसाअलैहि अस्सलाम भी उन्ही अनबीए कराम अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात में से थे जिन को फ़ज़ीलत दी गई और इसी नाज़ की वजह से उन्हों ने अपनेआउपर सलाम भेजा, इरशाद है:
وَالسَّلٰمُ عَلَیَّ یَوْمَ وُلِدۡتُّ وَ یَوْمَ اَمُوۡتُ وَ یَوْمَ اُبْعَثُ حَیًّا (سورۃ مریم: ۱۹؍۳۳)
तर्जुमा: और वही सलामती मुझ पर जिस दिन में पैदा हुआ और जिस दिन मरों गाऔर जिस दिन ज़िंदा उठाया जाऊं गा।’’
आप ने मक़ाम इंस देखा तो जुरात की और नाज़ के तौर पर यह बात फ़रमाई। इस के बरख़िलाफ़ हज़रत ज़क्रियाअलैहि अस्सलाम मक़ाम हैबत व हया में थे तो उन्हों ने ख़ुद अपने उपर सलाम नहीं भेजा, बल्कि रब तआला ने उन की तारीफ़ करते हुए फ़रमाया: व सलामٌ अलैह (उन पर सलाम हो) मज़ेद तफ़सील के लिए देखिए अहया उलउलूम शरीफ़।
ख़याल रहे कि इस तरह की मिसालें बुजुर्गों की किताबों में भी बहुत मिलें गी, अहले बातिल ने एक यह भी धोका खाया कि उन्हों ने अश्ख़ास व अफराद के अहवाल व मुक़ामात के इख़तिलाफ़ को नहीं समझा और सब को एक ही मेज़ान में तौलना शुरू कर दिया और अपनी नाक़िस अक्ल व इल्म के ज़रिया तन्क़ीद शुरू कर दी।
रज़ा के फ़ज़ाइल:
आयात:
1। रज़ी अल्ला अन्हुम व रिज़ूۡअ अन्ना (सूरत अलबीना: 98/8)
तर्जुमा: अल्लाह उन से राजी और वह इस से राजी।’’
وَمَسٰکِنَ طَیِّبَۃً فِیۡ جَنّٰتِ عَدْنٍ ؕ وَرِضْوَانٌ مِّنَ اللہِ اَکْبَرُ (سورۃ التوبۃ: ۹؍۷۲)
तर्जुमा: और पाकीज़ा मकानों का बसने के बागों में और अल्लाह की रज़ा सब से बड़ी।’’
इस आयत में जिन्नात अदन के मुकाबले में रज़ा का मक़ाम बढ़ कर फ़रमाया जैसे अपने ज़िक्र को नमाज़ से उपर करार दिया, इरशाद है:
اِنَّ الصَّلٰوۃَ تَنْہٰی عَنِ الْفَحْشَآءِ وَالْمُنۡکَرِ ؕ وَلَذِکْرُ اللہِ اَکْبَرُ (سورۃ العنکبوت: ۲۹؍۴۵)
तर्जुमा: बेशक नमाज़ मना करती है बे हयाई और बुरी बात से और बेशक अल्लाह का ज़िक्र सब से बड़ा।’’
अहादीस:
1। नबी अकर्म ﷺ ने सहाबा करामरज़ि अल्लाह अन्हुम की एक जमात से पूछा कि तुम किया हो? उन्हों ने कहा: हम मोमिन हैं, आप ने फ़रमाया: तुम्हारे ईमान की अलामत किया है? उन्हों ने अर्ज़ किया कि हम आज़माइश के वक़्त सब्र करते हैं, फ़राखी के वक़्त शकर अदा करते हैं और अल्लाह तआला के फैसलों पर राजी रहते हैं, आप ने फ़रमाया: रब काबा की किस्म तुम मोमिन हो।(मुअज्जम कबीर)
2। इस शख्स के लिए खुश खबरी है जिस को इस्लाम की हिदायत दी गई और ज़रूरत के मुताबिक रिज़्क़ दिया गया और वह इस पर राजी है।(मसंद अहमद)
3। जो शख्स अल्लाह तआला की तरफ़ से मिलने वाले थोड़े रिज़्क़ पर राजी होताहै अल्लाह तआला इस से थोड़े अमल पर राजी होता है।