अध्याय 45 में से 54पृष्ठ 543–554
तज़किया नफ़्स का दूसरातरीका
तज़किया का दूसरा तरीका जज़्ब विमहबत है, हज़रत क़ाज़ी सना अल्लाह पानी पत्ति रहमत अल्लाह अलैहि फ़रमाते हैं कि क़ुर्ब इलाही की इल्लत मोजिबा जज़्ब यानी अल्लाह तआला का बंदे को अपनी तरफ़ खींचना है यह जज़्ब कभी किसी अम्र के तवस्सुत के बग़ैर होता है,इस को इज्तिबा कहते हैं और अक्सर किसी अम्र के वास्ते से होता है और यह वास्ता बहकम इस्तिक़रार(यानी ततब्बो और तलाश के बाद यही दो चीजें वास्ता साबित हुईं) दो चीजें हैं एक इबादत और दूसरे इंसान कामिल की सोहबत,जो जज़्ब इलाही इबादत के तवस्सुत से होता है उसे समरा इबादत कहते हैं और जो सोहबत के तवस्सुत से होता है उसे तासीर शैख़ कहते हैं, यह कलाम इल्लत फ़ाइली में है और इल्लत काबिली इस्तिदाद है जिसे अल्लाह तआला ने इंसान में वदीअत की है।
क़ुर्ब इलाही के तीन मवाने हैं (1)नफ़्स के रिज़ाइल (2)जिंस अनासिर (3)लताइफ़ आलम अम्र की गफलत, यह भी मालूम रहे कि इबादत और इंसान कामिल की सोहबत दोनों चीजें जिस तरह हुसूल क़ुर्ब के लिए इल्लत हैं इसी तरह मवाने को
दफा करने के लिए भी इल्लत हैं,इस से मालूम हुआ कि नाक़िसों को तहसील कमाल केलिये दो चीजें ज़रूरी हैं एक कसब यानी शैख़ कामिल विमुकमल की तजवीज़ के माफ़िक़ इबादत वरियाज़ात कि मवाने को दौर करें और नफ़्स वानासिर का तज़किया और आलम अम्र के लताइफ़ का तसफ़ीया करे जो कि आलम ख़ल्क़ के लताइफ़ की मुसाहबत की वजह से ज़ुल्मानी और तारीक हो ग्ये हैं,और ख़ुद को और अपने ख़ालिक़ को भला दिया है।
दोम शैख़ कामिल विमुकमल का जज़्ब कि निस्बत और क़ुर्ब इलाही अता करता है और पस्ती से बुलंदी की तरफ़ ले जाताहै।
अक्सर सलासल के ओलिया सुलूक को जज़्ब पर मुक़द्दम जानते हैं इसी लिए वह मुरीद को अज़कार और रियाज़त नफ़्स का हुक्म देते हैं और अपने तसर्फ़ को इस की इमदाद में लगाये रहते हैं ताकि लताइफ़ आलम अम्र मज़की ٰومصفی ٰہو जाएँ और पसंदीदा अख़लाक़ मसला तौबा,अनाबत,ज़हद,तोकल,सब्रोरजा और बाक़ी मुक़ामात अशरा हासिल होजाएं इस तरह वह क़ुर्ब इलाही के लिए तैयार हो जाए गा इस वक़्त शैख़ मुरीद को अल्लाह तआला की जानिब खींचता है यानी जज़्ब करता है और क़ुर्ब इलाही अता करता है, इस सालिक को सालिक मजज़ूब कहते हैं और इस सैर को सैर आफ़ाक़ी कहते हैं इस लिए कि बुज़ुर्गान दीन अनासिर विनफ़स और लताइफ़ आलम अम्र के तज़किया का हुक्म इस वक़्त तक नहीं करते जब तक कि आलम मिसाल में अपने नफ़्स से खारिज में मुलाहिजा न फ़रमालें,हर लतीफ़ा का एक नूर है जब तक वह ज़ाहिर नहीं होता है इस लतीफ़ा के सफ़ाई का हुक्म नहीं देते हैं।क़ल्ब का नूर जर्द,रूह का सुर्ख,सर का स्याह,ख़फ़ी का सफेद और अख़फ़ा का सब्ज़ बताते हैं।
चूंकि यह सैर बहुत दूरदराज है और बा मशक्कत भी इस लिए कभी ऐसा होता है कि सोफी असनाए सुलूक में इंतकाल करजाता है औरमक़सूद से नाकाम रहता है लिहाज़ा हक़ तआला ने हज़रत ख़्वाजा नक़्शबंद क़ुद्दिस सिर्रहू को इलहाम फ़रमाया कि जज़्ब को सुलूक पर मुक़द्दम करू,मुरीद को पहले तवज्जो के ज़रिया लताइफ़ आलम अम्र में अलक़ा ज़िक्र करते हैं यहाँ तक
कि क़ल्ब,रूह,सर,ख़फ़ी और अख़फ़ा अपने उसूल में फ़ानी और मस्तहलक हो जाएँ इस सैर को सैर इंफ्सी कहते हैं, इस सैर इंफ्सी के ज़िमन में अक्सर सैर आफ़ाक़ी भी हासिल हो जाती है क्यों कि आलम अ मर के लताइफ़ की ज़ुल्मतें और कदूरतें भी बुर तरफ़ हो जाती हैं और क़ुर्ब भी हासिल होता है इस के बाद नफ़्स वक़ालिब के तज़किया के वास्ते मुरीद को रियाज़त का हुक्म देते हैं
पस मुरीद को रियाज़त और तवज्ज्हात शैख़ के ज़रिया नफ़्स वानासिर का तज़किया भी हासिल हो जाता है इस सालिक को मजज़ूब सालिक कहते हैं और इस सैर को इंद्राज अलनहाय फ़ी अलबदायह कहते हैं इस लिए कि जज़्ब जो कि आखिर का काम था इबतिदा ही में मुंदरज हो गया और चूंकि आलम अम्र के लताइफ़ की फना के बाद रियाज़त का हुक्म किया गया और लताइफ़ अम्र की मुजावृत की वजह से नफ़्स की सूलत विशिद्दत गुम हो गई और रियाज़त इस पर आसान हो गई और इबादात का सवाब फिनाए लताइफ़ के बाद ज़्यादा हो गया उन ही असबाब की वजह से यह सैर सहल तर और तेज तर हो गया औरागर मुरीद इस सैर में कमाल से पहले मरजाता है तब भी महरूम मुतअल्लिक़ नहीं रहता इस लिए कि ज़िक्र क़ल्ब अव्वल सोहबत में हाथ आज्ञा।
जज़्ब का पहलावास्ता यानी इबादत: आप पढ़ चुके कि इबादत जज़्ब कावास्ता है,इबादत के अन्वा वाक़साम काफ़ी तफ़सील के तालिब हैं ,आम तौर पर किताबों में इबादत की तरग़ीबात और मिसाइल वगैरह मज़कूर हैं लिहाज़ा हम यहाँ चंद उमूर सुपुर्दकलम करते हैं बग़ौर मुताला फरमाएं।(1)अल्लाह तआला जल शाना अली अलातलाक़ मुनइम हक़ीक़ी है जो कि बदाहित अक्ल से साबित है और मुनइम की ताज़ीम वितकरीम लाज़िम विवाजिब है लिहाज़ा इबादत अपने रब कायनात और मुनइम हक़ीक़ी जल वाला की ताज़ीम वितकरीम और तज़लल वाणिकसार यानी ख़ुद को इस के सामने ज़लील समझना और शिकस्तगी इख्तियार करने का नाम है।
(2)हक़ सुब्हानहू व तआला चूंकि ग़ायत तक़दस वितंजा में है और बंदे निहायत तदंस वितलौस यानी मेले कचेले ।गंदे,और आलूदा लिहाज़ा बंदों और ख़ालिक़ जल वालाके
दरमियान किसी तरह की कोई मुनासबत और ताल्लुक नहीं इस लिए वह अल्लाह तआला के बारे में कमा हुक्का नहीं जान सकते कि हक़ सुब्हानहू व तआला की ताज़ीम वितकरीम किस में है?लिहाज़ा ऐसा भी हो सकता है कि बहुत से बाज़ अलफ़ाज़ ऐसे हूँ जिसे लोग ताज़ीम वितकरीम ख़याल करें और वह दर हक़ीक़त इस के नज़दीक क़बीह और बुरे हूँ,यह ताज़ीम ख़याल करें और वह तौहीन हूँ,यह तकरीम तसोर करें और वह तहक़ीरहों,लिहाज़ा मालूम हुआ कि ताज़ीम वितकरीम वह होनी चाहिए जिस को रब तबारक व तआला ने ताज़ीम वितकरीम करार दिया है।
हज़रत मुजददक़दस सिर्रहू फरमातेहैं कि हक़ तआला की ताज़ीम व तकरीम वितौक़ीर जो कि इस मुक़द्दस बारगाह से हासिल हैहमारी ब निस्बत वही शरीअत हुक्का है अला मुसद्दिरहा अस्सलात वस्सलाम वालतहीत अगर ताज़ीम कलबी है तो भी शरीअत हुक्का में बयान करदी गई हैऔर लिसानी सना तव्य भी बयान है और आज़ा के आमाल वाफ़आल को भी साहिब शरीअत ने तफ़सील से बयान फ़रमादिया है पस इस तआला काष्कर शरीअत की बजा आवरी में मुनहसिर हो गया ब ऐतबार क़ल्ब वक़ालिब और बहसब एतिक़ादवामल और इस तआला की इबादत वित्ताजीम जो भी मा वराए शरीअत हो वह एतिमाद के लायक नहीं बल्कि बहुत सी दफ़ा हो सकता हैकि इस की इबादत वित्ताजीम के खिलाफ़ हो इस लिए कि वहमी नेकी दरहक़ीक़त बुराई हैप्स शरीअत पर अमल अकला भी वाजिब हुआ और इस मुनइम तआला के शकर की अदाएगी बग़ैर बजाआवरी शरीअत मुश्किल विमताज़र है ।
शरीअत के दो जुज़ हैं(1)एतिक़ादी(2)अमली, एतिक़ादी उसूल दीन से है जब कि अमली फ़ुरू दीन से है जिस को एतिक़ाद हासिल न हो वह अहले निजात से नहीं और अज़ाब आख़िरत से छुटकारा इस के हक़ में मुतसवरनहीं और जिस को अमल हासिल न हो इस के लिए निजात का एहतिमाल है कि इस का मामला अल्लाह तआला की मशीयत के सुपुर्द है अगर चाहे तो माफ़ करदे और चाहे तो बक़दर गुनाह अज़ाब दे।
(3)मजहब अहले सुन्नत के मुताबिक एतिक़ाद रखने के बाद आमाल सालहा की
बजाआवरी बे हदजरूरी है,कुरआन मजीद में जा बजा ईमान के साथ आमाल सालहा का ज़िक्र किया और उन दोनों पर अब्दी विसरमदी नेअमतों की बुनियाद रखी,आमाल सालहा की कसरत पर हसब इस्तिदाद वह मिलता है जिस को हर एक सोच नहीं सकता ।
हदीस शरीफ़ में पांच उमूर को इस्लाम के अरकान क़रारदिया गया , अव्वल :अलूहियत वरिसालत की गवाही यानी ईमान वेतिक़ाद ।दोम नमाज़।सोम ज़कात,चहारम सौम रमजान पंजिम हज , उन आमाल में सब से बेहतरीन इबादत नमाज़ है।
नमाज़: हज़रत मुजददक़दस सिर्रहू फ़रमाते हैं: नमाज़ हसन लजाता है इस के बुर खिलाफ़ बाक़ी इबादात का हसन ज़ाती नहीं,तहारत कामला के बादबगैर सस्ती नमाज़ अदा करना चाहिए और क़िरात,रुकवा,सुजूद,कौमा विजल्सा और तमाम अरकान को निहायत एहतियात के साथ बोजह कमाल अदा करना चाहिए और रुकवा विस्जोद,कौमा विजल्सा में सुकून वतमानीयत लाज़िम है सस्ती नहीं आनी चाहिए,नमाज़ को अव्वल वक़्त में अदा करना चाहिए और सस्ती वितजाहिल की वजह से ताख़ीर करना जायज़ न समझें,मकबूल बंदा वह है कि महज़ मौला जल वाला के हुक्म सेही इस का हुक्म बजा लाये,हुक्म की बजा आवरी में ताख़ीर करना सुरक्षी वबे अदबी है।
नमाज़ तहजद भी गोया इस राह की जरूरीयात से है कोशिश करें कि बे ज़रूरत तर्क न हो अगर आगाज़ में तहजद मुश्किल हो और इस वक़्त में बेदारी मयस्सर न हो तो ख़िदमत करने वालों की एक जमात इस के लिए मुक़रर कर दें कि इस वक़्त ख़्वाह ना ख़्वाह बेदार करदें और सोता न छोड़ें पंद्रह रोज़ के बाद बेदारी की आदत हो जायेगी,जो शख्स आखिर शब् में बेदार होना चाहे उसे चाहिए कि आगाज़ शब् में बाद नमाज़ इशा सौ जाए और बे फायदा उमूर में मशगूल न हो और इस्तिग़फ़ार वितौबा,उलहाह वज़ारी और गुनाहों,ख़ताओं को याद करना और नक़ाइस वायूब में गौर करना और अज़ाब उखरवी और अलम दाइमी का डर इस वक़्त में गनीमत जानें और हक़ तआला से मग़फ़िरत तलब करें और सोबार यह कलिमा इस्तिग़फ़ार कलबी तवज्जो के साथ ज़बान पर लाएं‘‘इस्तिग़फ़िरुल्लाह अलज़ी ला इला उला हो
उलही उलक़य्यूम वातोब इलिया सुब्हाना’’ दीगर नमाज़(अस्र) के बाद भी इस कलिमा को सोबार पढ़ें और तहारत वबलातहारत इस कलिमा का विरुद तर्क न करें,हदीस शरीफ़ में है‘‘तूबा लिमन वज्द फि सहीफ़्ता इस्तिग़फ़ार कसीर’’।
और नमाज़ चाश्त भी अदा कर ली जाए तो दौलत अज़ीम है कोशिश करें कि दाइमी तौर पर कम अज़ कम दो रकात चाश्त की अदा करें,चाश्त की भी नमाज़ तहजद की तरह बारह रकातें हैं वक़्त वहाल के मुताबिक जो कुछ अदा हो जाए गनीमत है(मक्तूब 17 जलदसूम)
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू दफ्तर अव्वल मक्तूब 260 में आलम अमरपुर आलम ख़ल्क़ की फ़ज़ीलत बयान करते हुए दूसरी वजह में फ़रमाते हैं"जो अमल कि फर्ज़ ,वाजिब और सुन्नत है इस की अदाएगी क़ालिब से ताल्लुक रखती है जो कि आलम ख़ल्क़ से है और वह जो आलम अम्र का नसीब है वह आमाल नाफ़िला से है पस जो क़ुर्ब उन आमाल की अदाएगी का समरा और नतीजा है आमाल के अंदाज़े सेहोगा पस लामुहाला जो क़ुर्ब कि अदाय फ़राइज़ का समरा है आलम ख़ल्क़ का नसीब हो गा और जो क़ुर्ब कि अदाय नवाफ़िल का फल है आलम अम्र का नसीब होगा और इस में कोई शक नहीं कि नफ़ल का फर्ज़ के मुक़ाबिल में कोई शुमार नहीं काश कि वह निस्बत होती जो कतरे को दरियेमुहीत से होती है बल्कि नफ़ल को सुन्नत के मुक़ाबिल भी यही निस्बत है अगरचे फर्ज़ और सुन्नत के दरमियान भी क़तरा और दरिया की निस्बत है पस उन दोनों क़ुरबों के दरमियान यहाँ से तफ़ावुत का अंदाजा करना चाहिए और आलम ख़ल्क़ का आलम अम्र पर ज्यादती इस तफ़ावुत से जानना चाहिए
अक्सर मख़लूकात चूंकि इस इल्म से कोई हिस्सा नहीं रखती इस लिए फ़राइज़ को खराब वबरबाद करके नवाफ़िल को रिवाज देने की कोशिश करते हैं सूफ़िया ख़ाम ज़िक्र वफ़कर को अहम मक़ासिद और जरूरीयात से जान कर फ़राइज़ वसंन की बजाआवरी में सस्तियां करते हैं और अर्बईनात(चले) और रियाज़तीं इख्तियारकरके जुमा
विजमाअत को छोड़ते हैं वह नहीं जानते कि एक फर्ज़ को जमात से अदा करना उन के हजारों चलूँ से बेहतर है हां ! ज़िक्र वफ़कर आदाब शरएहि की रियायत के साथ बेहतर औराहम तरहे और उलमाए बेसर अंजाम भी नवाफ़िल को रिवाज देने में कोशिश करते हैं और फ़राइज़ को बर्बाद वाबतर करते हैं मसला नमाजआशिवरा कि हज़रत सय्यद आलम ﷺसे बितरीक़ सेहत मुत्तसिल नहीं उसे जमात और कामिल हमीयत के साथ पढ़ते हैं हालाँकि जानते हैं कि फ़िक़ही रवायात जमात नाफ़िला की कराहट बताती हैं,और अदाय फ़राइज़ में सस्ती इख्तियार करते हैं।
बहुत कम लोग फर्ज़ को वक़्त मुस्तहब में अदा करते हैं बल्कि असल वक़्त से भी तजावुज़ करते हैं और जमात की भी पाबंदी नहीं करते हैं एक शख्स या दो शख्स की जमात पर क़नाअत कर लेते हैं बल्कि बहुत से ऐसे हैं जो तन्हा ही पढ़ लेते हैं जब इस्लाम के मुक़तदावपेशवा हज़रात यह मामला करें गे तो अवाम के बारे में किया कहीं इस अमल की बदबख़ती से इस्लाम में ज़ोफ़ विकमजोरी पैदा है और इस किरदार की ज़ुल्मत वतारीकी की वजह से हवाए नफ़्स वबद्दत हुवेदाहे।
फ़ज़ाइल नमाज़
फिर चंदस्तर बाद फ़रमाते हैं कि फ़राइज़ सारे के सारे अगरचे क़ुर्ब असली बख्शते हैं लेकिन उन में सब से अफ़ज़ल वाकमल नमाज़ है,अस्सलात मेराज उलमोमिन" नमाज़ मोमिन की मेराज है,सुना होगा और बंदा सब से ज़्यादा क़रीब नमाज़ में होता है(नीज़ सुना होगा) और हुज़ूर अकर्म ﷺके लिए वक़्त ख़ास था जिस की ताबीर "ली मा अल्लाह वक़्त "से फ़रमाई।फ़क़ीर के नज़दीक नमाज़ है कि बुराइयों से रोकती है और नमाज़ है कि फ़ुहशा औरमुनकर(बेहयाइयों और बुरी बातों से)से रोकती है और नमाज़ है कि हुज़ूर ﷺने अपनी राहत को इस में ढूँढा और फ़रमाया:"अरहनी या बुलाल"(एबलाल!मुझे राहत दो) और नमाज़ है कि दीन का स्तवन बनी है और नमाज़ है कि इस्लाम और कुफ्र के दरमियान फ़र्क़ करने वाली है।
मक्तूब 261जो मक्तूब मज़कूर से मुत्तसिल ख़ास नमाज़ के फ़ज़ाइल विकमालात मख़सूसा के बयान पर मुश्तमिल है इस में मुंदरजा जेल फ़ज़ाइल बयान फ़रमाए खुलासा मुलाहिजा हो:
(1)इस्लाम के पांच अरकान हैं और रुकन दोम नमाज़ है(2)नमाज़ सारी इबादतों की जामा हैवो अगरचे एक जुज़ है लेकिन जामईयत की वजह से कल का हुक्म रखती है(3) क़ुर्ब बख़्शने वाले सारे आमाल में सब से आला और बरतरनमाज़ है(4)सर्वरालम ﷺको मेराज की शब् जन्नत में दीदार इलाही की जो दौलत मयस्सर हुई थी दुनिया में आने के बाद इस जहान के मुनासिब वह दौलत आप को नमाज़ में मयस्सर होती इसी लिए फ़रमाया कि नमाज़ मोमिन की मेराज है इस लिए कि आप के कामिल इत्तिबा करने वालों को इस दौलत से इस दुनिया में हज़ वाफ़र विनसीब कामिल हासिल है अगरचे दीदार नहीं क्यों कि यह दुनिया इस की मुतहम्मिल नहीं अगर नमाज़ पढ़ने का हुक्म न होता तो मकसूद विमतलूब के चेहरे से नक़ाब कौन उठाता और तालिब को मतलूब तक रास्ता कौन दिखाता।
(5)नमाज़ ग़मगुसारों के लिए लज़्ज़त बख्श और बीमारान इश्क के लिए राहत बख्श है,अरहनी या बुलाल और कर एनी फ़ी अस्सलात में इसी तरफ़ इशारा है(6)अज़्वाक़ विमवाजीद,उलूम विमआरिफ़,अहवाल विमुक़ामात,अनवारवालवान,तमकीनात वितलव्यनात,तजल्लियात बा कैफ़ वबे कैफ़ और ज़हूरात मतलवना(गोनागों)वग़ैरमतलवना जो कुछ उन से नमाज़ से बाहर में मयस्सर होते हैं और हक़ीक़त नमाज़ से आगाही न होने से ज़ाहिर होते हैं उन का ,मंशा ज़लाल वामिसाल हैं बल्कि वहम विख़्याल से नाशी हैं जो नमाजी कि हक़ीक़त सला से आगाह है अदाय नमाज़ में गोया वह इस दुनिया से बाहर हो जाता है और आख़िरत के जहान में दाखिल हो जाता है इस लिए ला मुहाला अदाय नमाज़ के वक़्त में इस दौलत से जो आख़िरत के साथ मख़सूस हैनसीब हासिल होता है और बे शाइबा ज़लीयत से असल हिस्सा हाथ आता है क्यों कि यह दुनिया कमालात ज़ुली पर मुनहसिर है,जो
मामला ज़लाल से खारिज है वह आख़िरत के साथ मख़सूस है,तो जब आलम आख़िरत में दाखिल होगया तो लामुहाला मेराज होगई और वह मोमिनीन के हक़ में नमाज़ है,यह दौलत अपने रसूल आज़म ﷺकी तबईत में इसी उम्मत के साथ मख़सूस है क्यों कि आप ﷺ शब् मेराज में दुनिया से आख़िरत चले ग्ये और जन्नत में दाखिल हो ग्ये फिर दीदार इलाही की दौलत से मुशर्रफ़ और सआदत मंद हुए।
औलियाए कराम की एक जमात चूंकि हक़ीक़त नमाज़ और इस के कमालात मख़सूसा से मतला न होस्की इस लिए उन्हों ने अपने अमराज़ का इलाज दीगर उमूर से ढूँढा और अपनी मुरादों का हुसूल दूसरी अश्या से मरबूत किया बल्कि एक जमात ने तो दौर अज़कार समझ कर इस की बुनियाद गैरोगैरियत पर रखी और रोज़े को नमाज़ से अफ़ज़ल क़रारदिया उन का कहना है कि रोज़ों में खाना पीना छोड़ना है जो सिफ़त समदेत के साथ मुतहक़्क़ होना है जब कि नमाज़ में गैरोगैरियत में आना है और आबिदोमाबूदजानना है जैसा कि इब्न अलारबी क़ुद्दिस सिर्रहू ने सराहत की यह भी तौहीद वजूदी पर है।
इसी तरह एक जिम ग़फ़ीर जो कि हक़ीक़त नमाज़ से आगाह न था इस ने अपने इज़तिराब की तस्कीन समाव वनगमा और वजदूतवाजिद में ढूँढी और अपने मतलूब कोंगमा के पर्दों में मुताला किया इस लिए लामुहाला रक़्स वरक़ासी को अपनी आदत बनालिया जब कि सुना होगा कि अल्लाह तआला ने हराम में शिफा नहीं रखी हां‘‘उलग़रीक़ यताल्लुक़ बकल हशीष’’डूबने वालाहर तिनके का सहारा लेता है और‘‘हुब्ब उलशी यामी वीसम’’शी की मुहब्बत अंधा और बहरा करदेती है ।अगर उन पर नमाज़ के थोड़े बहुत कमालात ही मुनकशिफ़ हुए होते तो हरगिज़ समाव वनगमा में मशगूल न होते और वजदूतवाजिद को याद न करते। ए बिरादर! नमाज़ वनगमा के दरमियान जितना फ़र्क़ है इतना ही कमालात नमाज़ कि जिन का मंशा नमाज़ है और उन कमालात के दरमियान है कि जिन का मंशा नग़मा है।(माख़ूज़ अज़ मक्तूब 261)
नमाज़ की सूरत वहक़ीक़त
हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि जिस तरह
अक़ाइद की दुरुस्तगी ज़रूरी है इसी तरह आमाल सालहा की बजा आवरी ज़रूरी है और जामा तरिन इबादात और मुक़र्रब तरिन ताआत नमाज़ की उदाहे,फ़रमाते हैं नमाज़ दीन का स्तवन है तो जिस ने नमाज़ क़ायम की इस ने दीन क़ायम किया और जिस ने उसे छोड़ा इस ने दीन को ढादिया,और जिस शख्स को अदाय नमाज़ पर मुवाज़बत और पाबंदी की तौफ़ीक़ मिलती है उसे फ़ुहश और बुराई से बाज़ रखते हैं आयत करीमा:
اِنَّ الصَّلٰوۃَ تَنْہٰی عَنِ الْفَحْشَآءِ وَالْمُنۡکَرِ (سورۃ العنکبوت: ۲۹؍۴۵)
तर्जुमा: बेशक नमाज़ मना करती है बे हयाई और बुरी बात से।
इसी मानी की ताईद करती है और जो नमाज़ ऐसी न हो वह सूरत नमाज़ है हक़ीक़त नहीं रखती लेकिन जब तक हक़ीक़त हासिल न हो सूरत को हाथ से जाने न दें‘‘मालायदरक कल्ला लायतरक कल्ला’’ जो चीज़ पूरा पाई नहीं जा सकती तोरी छोड़ी भी नहीं जाएगी अकर्म अलाकरमैन अगर सूरत को हक़ीक़त के साथ ऐतबार करे तो बईद नहीं।
पस तुम पर लाज़िम है कि पाबंदी के साथ नमाज़ अदा करू ,जमातों और ख़ुशू वख़ुज़ू के साथ इस लिए कि निजात वफ़लाह का सबब है इरशाद ख़ुदावंदी है:
قَدْ اَفْلَحَ الْمُؤْمِنُوۡنَ الَّذِیۡنَ ہُمْ فِیۡ صَلَاتِہِمْ خٰشِعُوۡنَ (سورۃ المومنون: ۲۳؍۱،۲)
यकीना कामयाब हुए वह अहले ईमान जो अपनी नमाज़ों में ख़ुशू करते हैं।
काम वह है कि खतरा के बावजूद किया जाए, दुश्मन के ग़लबा के वक़्त जो सिपाही अगर थोडी भी आमद वरफ़त सरकार के कामों में रखते हैं तो वह बहुत ऐतबार रखती है,जवान लोगों की सलाह इस सबब से ऐतबार रखती है कि बावजूद ग़लबा शहवत नफ़सानी ख़ुद को सलाह में लाएं ,अस्हाब कहफ़ को यह सारी बुज़ुर्गियां इस लिए मिलें कि
उन्हों ने दीन मुख़ालिफ़ बादशाह की वजह से हजरत की, हदीस शरीफ़ में है कि फ़ित्ना वाशूब ऐसी इबादत है जैसे मेरी तरफ़ हजरत,तो जो चीज़ मुनाफ़ी इबादत है दरहक़ीक़त वही उएन बाइस है।(माख़ूज़ अज़ मक्तूब 58दफ्तर अव्वल)
नीज़ आप क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं इबादात में लज़्ज़त पाना और उन की अदाएगी में तकलीफ़ का उठ जाना हक़ तआला की बड़ी नेअमतों में से है ख़ास कर अदाय नमाज़ में,कि जो मनतही तालिब ख़ुदा के गैर को मयस्सर नहीं ख़ास कर अदाय फ़राइज़ नमाज़ क्यों कि आगाज़ निहायत में नमाज़ नफ़ल की अदा से लज़्ज़त बख्शते हैं और निहायत निहायत में यह निस्बत फ़राइज़ से वाबस्ता हो जाती है और अदाय नवाफ़िल में ख़ुद को बेकार जानते हैं इस के नज़दीक सिर्फ़ अदाय फ़राइज़ है,मालूम हो कि अदाय नमाज़ के वक़्त जो मजा और लज़्ज़त हासिल होती है नफ़्स का इस में बिलकुल भी हिस्सा नहीं होता है उएन इस लज़्ज़त में वह नाला वफ़ग़ां में होता है,सुबहान अल्लाह! किया मर्तबा है नीज़ मालूम हो कि दुनिया में अदाय नमाज़ का मर्तबा ऐसे है जैसे आख़िरत में दीदार इलाही, दुनिया में क़ुर्ब की इन्तहा नमाज़ में है और आख़िरत में इंतिहाए क़ुर्ब बवक़्त दीदार है नेज़तमाम इबादतें नमाज़ के लिए वसाइल हैं और नमाज़ मक़ासिद से है।(माख़ूज़ अज़ मक्तूब 137दफ़्तरावल)
हक़ीक़त काबा के मआरिफ़ बयान करते हुए फ़रमाते हैं "दुनयवी उरूजात वज़होरात की इन्तहा हक़ायक़ कोनी की इन्तहा तक है,हक़ायक़ इलाही जल शाना से नसीब और हिस्सा आख़िरत के साथ मख़सूस है मगर नमाज़ जो कि मोमिन की मेराज है और इस मेराज में बंदा दुनिया से आख़िरत तक जाता है तो जो हिस्सा आख़िरत में मयस्सर होगा वह इस मेराज में मयस्सर आता है ,में समझता हूँ कि नमाज़ में इस दौलत के हुसूल के लिए सब से उम्दा चीज़ नमाजी की तवज्जो जिहत काबा की तरफ़ है,जो काबा कि हक़ायक़ इलाही के ज़हूरात का महल है(तालत वित्तक़्दस्त)दुनिया में जो कुछ अजूबा है बजाहिर दुनिया से है और दर हक़ीक़त आख़िरत से है,काबा के तवस्सुत से नमाज़ भी यह निस्बत पैदा
करती है और सूरत वहक़ीक़त के साथ दुनिया वाख़िरत की जामा होगई है, और तहक़ीक़ के साथ मालूम होगया कि जो हालत कि अदाय नमाज़ में मयस्सर होती है वह उन तमाम हालतों पर फ़ौक़ियत रखती है जो खारिज नमाज़ हासिल होती हैं क्यों कि खारिज नमाज़ हालात दायरा ज़ुली से नहीं निकलती हैं अगरचे बुलंदी पैदा करलें और यह हालात असल से नसीबा रखती हैं जिस क़द्र फ़र्क़ ज़ुल और इस के दरमियान है इसी क़द्र उन (खारिज नमाज़)हालात और इस (दाखिल नमाज़)हालत में जानना चाहिए।