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Allama Afaque Ahmad Mujaddidiतसव्वुफ़ और इस के फ़वाइदघर बैठना अफ़ज़ल है या कमाना

अध्याय 35 में से 54पृष्ठ 413–422

घर बैठना अफ़ज़ल है या कमाना

हज़रत इमाम क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं: अगर वह कसब मआश को ज़िक्र व फ़िक्र, इख़लास और इबादत में मस्रूफ़ियत के लिए छोड़ता है और कसब मआश उन उमूर में मुख़ल होता है और इस के बावजूद वह शख्स लोगों के इंतजार में नहीं रहता कि वह इस के पास कुछ लाएं, बल्कि सब्र और तोकल अली अल्लाह में इस का दिल मजबूत है तो ऐसे शख्स के लिए घर में बैठना अफ़ज़ल है। और घर में बैठ कर दिल परेशान है, मुंतशिर है और इंतजार करता है कि लोग लाएं तो ऐसे शख्स के लिए कमाना अफ़ज़ल है। पहले के मत्विकलीन उन चीजों को नहीं लेते थे जिन का नफ़्स इंतजार करता था।

यह भी ध्यान रहे कि कसब मआश करने वाला कसब के आदाब और इस की नियत की शर्तों की रियायत करे यानी ज़्यादा माल जमा करने का इरादा न करे और इस का एतिमाद अपने सरमाया और किफायत पर न हो तो वह भी मुतविकल है। और सरमाया और किफायत पर तोकल की अलामत यह है कि अगर इस का माल चोरी हो जाए या तिजारत में नुकसान हो जाए या कोई काम बंद हो जाए तो वह इस पर राजी रहे और इस का इतमीनान ख़त्म न हो और न ही दिल परेशान हो, बल्कि इस का सुकून जो नुकसान से पहले था अब भी वही रहे क्यों कि

जिस को जिस चीज़ के ज़रिया सुकून नहीं होता वह इस के चले जाने पर परेशान नहीं होता और किसी क्षे के चले जाने पर परेशान होना इस बात की अलामत है कि इस के ज़रिया उसे सुकून था।

रह गया यह सवाल कि सरमाया हो और इस के ज़रिया उसे सुकून न मिले ऐसा कैसे हो सकता है, बल्कि वह जानता है कि कसब भी सरमाया से ही हासिल होता है। हज़रत इमाम क़ुद्दिस सिर्रहू इस के जवाब में फ़रमाते हैं कि अल्लाह तआला जिन लोगो M को बग़ैर सरमाया के रोज़ी देता है वह ज़्यादा हैं और जिन के पास सरमाया है और वह चोरी हो जाता है और हलाक हो जाता है तो ऐसे लोग भी बहुत हैं।

यह भी यकीन रखना चाहिए कि अल्लाह तआला इस के साथ वही सुलूक करता है जो इस के हक़ में बेहतर है। मक़सद यह कि सरमाया कोई ऐसी चीज़ नहीं जिस पर एतिमाद और भरोसा हो और इस के ज़रिया सुकून हासिल हो, अगर अल्लाह तआला सब कुछ हलाक कर दे तो उसे समझना चाहिए कि इस के लिए यही बेहतर था, हो सकता है सरमाया की बका से इस का कोई ज़हनी नुकसान हो जाता। लिहाज़ा इस का कर्म है कि वह उसे आख़िरत देना चाहता है। ज़्यादा से ज़्यादा यही हो सकता है कि यह भूक से मर सकता है। तब भी यही समझना चाहिए कि इस हालत में मर जाना आख़िरत के मामले में हमारे लिए बेहतर है।

हदीस शरीफ़ में है कि एक शख्स रात को किसी तिजारती मामले का क़सद करता है और वह काम ऐसा होता है कि अगर करे तो इस में इस की हलाकत है तो अल्लाह तआला उसे अर्श के उपर देखता है और उसे इस काम से फेर देता है, सुबह के वक़्त वह ग़मगीन परेशान होता है और अपने हम साये और चचाजाद भाई की बदशगुनी लेता है कि कौन मेरे आगे आया, किस ने मुझ पर मुसीबत डाली हालां कि यह अल्लाह तआला की रहमत है जो इस पर फ़रमाई है।(हलीत उलावलिया)

इसी लिए हज़रत उम्र फ़ारूक़रज़ि अल्लाह अन्हु ने फ़रमाया: मुझे इस बात की प्रवाह नहीं कि में

मालदारी की हालत में सुबह करता हूँ या फक्र की हालत में, क्यों कि मुझे मालूम नहीं है कि मेरे लिए उन में किया चीज़ बेहतर है।

जिस शख्स को उन उमूर का कामिल यकीन न हो इस से तोकल का तसोर नहीं हो सकता। हर बंदे पर लाज़िम है कि वह ईमान रखे कि अल्लाह तआला के सिवा कोई फ़ाइल व राज़िक़ नहीं और जो इस ने बंदे के लिए फक्र व गुना और मौत व हयात मुक़द्दर फ़रमाई है वह इस के लिए इस से बेहतर है जो वह तमन्ना करता है, यह जब होगा तो हाल तोकल मुकम्मल होगा। इसी तरह तमाम दीनी मुक़ामात ख़्वाह अक़्वाल हूँ या आमाल सब की बुनियाद ईमान है।

बेहतरीन नुस्खा

हज़रत इमाम क़ुद्दिस सिर्रहू ने एक नुस्खा बयान फ़रमाया कि जिस से दुनयवी असबाब ज़ाहिरी से दिल को फेरा जा सकता है और खुफिया असबाब को आसान करके अल्लाह तआला के बारे में हसन ज़न हासिल किया जा सकता है वह नुस्खा यह है कि इस बात को यकीन के साथ जेहन में रखो कि बदगुमानी शैतान की तरफ़ से होती है और हसन ज़न अल्लाह तआला की तरफ़ से अल्का होता है, इरशाद ख़ुदावंदी है:

اَلشَّیۡطٰنُ یَعِدُکُمُ الْفَقْرَ وَیَاۡمُرُکُمۡ بِالْفَحْشَآءِ ۚ وَاللہُ یَعِدُکُمۡ مَّغْفِرَۃً مِّنْہُ وَفَضْلًا (سورۃ البقرۃ: ۲؍۲۶۸)

तर्जुमा: शैतान तुम्हें अंदेशा दिलाता है मुहताजी का और हुक्म देता है बे हयाई का और अल्लाह तुम से वादा फरमाता है बख़शिश और फजल का।’’

ख़याल रहे कि आज ईमान की कमज़ोरी किस क़द्र बढ़ गई है कि वह ख़ुदा जिस ने फ़रमाया:

وَمَا مِنۡ دَآبَّۃٍ فِی الۡاَرْضِ اِلَّا عَلَی اللہِ رِزْقُہَا (سورۃ ھود: ۱۱؍۶)

तर्जुमा: और जमीन पर चलने वाला कोई ऐसा नहीं जिस का रिज़्क़ अल्लाह के जिम्मा कर्म पर न हो।’’

मुतअद्दिद अहादीस में बार बार ज़िक्र आया है कि मां के पेट में ही अल्लाह तआला के

हुक्म से फरिश्ता लिख देता है कि उसे कितना रिज़्क़ मिलेगा। आज कल दुनिया की मुहब्बत और ईमान की कमज़ोरी का नतीजा है कि रोज़ी के सिलसिले में अल्लाह तआला की ज़ात पर तोकल व एतिमाद ख़त्म सा हो गया है। अब अवाम बजाए ख़वास तक को इतमीनान नहीं, वह तरह तरह की बातें करते हैं और मुख़तलिफ़ नाजायज़ और जायज़ हियलों से माल हासिल करते हैं। अब ख़वास की मजलिसों में तोकल अली अल्लाह और इस की ज़ात पर भरोसा और एतिमाद की बातों की बजाए यही सिखाया जाता है कि ऐसा करू वैसा करू।

अफसोस, सद अफसोस! अगर इस्लाफ़ की तारीख पढ़ें और बुजुर्गों की सीरत का मुताला करें तो उन्हें मालूम होगा कि वह अपने रब पर कैसा ईमान रखते थे और उन्हें इस की ज़ात पर कैसा भरोसा और एतिमाद था। कभी वह दुनियादारों के सामने हाथ नहीं फैलाते थे। उन के यकीन की बुनियाद पर ग़ैब से रोज़ी मिला करती थी।

हज़रत इमाम क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि इंसान फ़ित्री तौर पर शैतान के डराने पर कान धरता है और जब इस के साथ बुज़दिली, ज़ोफ़ क़ल्ब और ज़ाहिरी असबाब और उन को ब्रांगेख़्ता करने वाले उमूर को देख लेता है तो बदगुमानी मज़ेद ग़ालिब आजाती है और तौहीद कली तौर पर बातिल हो जाती है, बल्कि हुसूल रिज़्क़ को पोशीदा और मख़फ़ी असबाब की तरफ़ से देखना भी तोकल को बातिल कर देता है। इस का इलाज यह है कि वह हिकायात पढ़ी और सन्नी जाएँ जिन में बंदों तक रिज़्क़ पहुँचने के सिलसिले में अल्लाह तआला की अजीब सनात का ज़िक्र है और जिन में ताजिरों और मालदार लोगों के मालों को हलाक करके उन को भूका मारने का तज़किरा है जैसे:

हज़रत हुज़ैफ़ा मराशी जो कि हज़रत इब्राहिम उधमरहमत अल्लाह अलैहि की ख़िदमत में कई साल रहे, फ़रमाते हैं: हम कई दिन के भूके प्यासे कूफ़ा में एक वीरान मस्जिद में दाखिल हुए। हज़रत इब्राहिम उधम ने फ़रमाया कि ए हुज़ैफ़ा! मेरा ख़याल है कि तुम भूके हो। आप ने कागज़ और दवात मंगाई और एक रुक़ा लिखा और फ़रमाया: जाओ, दिल को गैर

ख़ुदा के साथ मुअल्लक़ न करना और जिस से पहले मुलाक़ात हो उसे यह रुक़ा दे देना। फरमातेहैं: सब से पहले जिस से मुलाक़ात हुई वह खच्चर पर सवार था। में ने वह रुक़ा उसे दिया, पढ़ा तो रो पड़ा और पूछा कि जिन्हों ने लिखा है वह कहां हैं? में ने कहा: फलां मस्जिद में। इस ने एक थैली दी जिस में सौ देनार थे। फिर मेरी मुलाक़ात एक दूसरे शख्स से हुई। इस खच्चर सवार के बारे में इस से पूछा तो बताया कि वह इसाई है। हज़रत इब्राहिम की बारगाह में पहुँच कर सारा वाक़ा अर्ज़ किया। आप ने फ़रमाया: देनारों को हाथ न लगाना, वह अभी आएगा। चनां चह कुछ देर के बाद वह नसरानी अंदर आया और हज़रत के सर को झुक कर बोसा दिया और इस्लाम कबूल कर लिया। मज़ेद तफ़सील के लिए देखिए अहया उलउलूम शरीफ़।

मालूम हो कि तोकल व क़नाअत और फक्र व ज़हद वगैरह के सिलसिले में ओलिया और सालहीन की सीरतें पढ़ें तो आप को उन बातों का सही इल्म हो जाएगा जिन की तरफ़ हज़रत इमाम ने इशारा किया है। उन की सीरत से कुव्वत यकीन और एतिमाद को ताकत हासिल होती है और अमल के जज़्बात उभरते हैं।

हज़रत मिर्ज़ा मज़हर जान जानां : हम अढ़ाई सदी क़ब्ल के बुजुर्ग हज़रत मिर्ज़ा मज़हर जान जानां देहलवी शहीद (म1195ह) क़ुद्दिस सिर्रहू और उन के ख़लीफ़ा ख़ास और जानशीन हज़रत गुलाम अली देहलवी क़ुद्दिस सिर्रहू की हयात तैबा का वह पहलू जिस का ताल्लुक इसी बाब से है, सुपुर्द कलम करते हैं, आप देखें कि सच्चे मुसलमान कौन थे और तोकल व एतिमाद वगैरह की दौलत से वह कैसे माला माल थे और इस दौलत ने उन्हें कण मंजिलों तक पहुँचा दिया।

1। मुहम्मद शाह बादशाह वक़्त ने अपने वजीर क़मर उद्दीन ख़ाँ की जुबानी कहला भेजा कि अल्लाह तआला ने हमें मुल्क अता किया है आप जो चाहें बतौर ह्दय कबूल फरमाएं, आप ने जवाबन फ़रमाया: अल्लाह तआला फरमाता है:

क़ुल मता अलदनिया कुलीۡलٌ (सूरत अलनिसा: 4/77)

तर्जुमा: तुम फ़रमाद व कि दुनिया का बरतना थोडा है।’’

गोया सात विलायतों की दौलत को कम फ़रमाया है, तुम्हारे पास इस क़लील का सिर्फ़ सातवां हिस्सा यानी एक अक़लेम हिंदोस्तान है, तुम्हारे पास देने के लिए रखा ही किया है? कि फ़िक़रा का सर हिम्मत झुक सके।

2। एक अमीर ने हवेली और खानगाह बनवा कर फ़िक़रा के लिए वजह मआश मुहैया की, इस ने आप से अर्ज़ किया तो आप ने दरख़ास्त कबूल न फ़रमाई और इरशाद हुआ कि चों कि मकान छोड़ना ही है इस लिए मकान का अपना या पराया होना बराबर है और रोज़ी जो इल्म इलाही में मुक़रर है वह मिल कर ही रहेगी, फ़िक़रा के लिए सब्र व क़नाअत का खजाना काफ़ी है।

3। एक मर्तबा सख्त सर्दी में आप प्रानी चादर ओढ़े हुए थे, वहाँ नवाब फिरोज जिंग भी मौजूद थे, वह यह मंज़र देख कर आबदीदा हो गए, उन्हों ने एक मुसाहिब से कहा कि हम गुनह गारों की कितनी बद बुख़ती है कि जिस बुजुर्ग से हमारी इरादत बंदगी साबित है वह हमारा नयाज़ मंदाना तोहफा कबूल नहीं करते, आप ने फ़रमाया:

हजार हैफ़ कि गुल कुर्द बेनवाई मा

ब चश्म आबला आमद ब्रहना पाई मा

फ़क़ीर ने उमरा से नयाज़ न कबूल करने का रोजा रखा है, अब जब कि ज़िन्दगी का इख़तताम है और रोजा तोड़ों तो दस लाख रुपया दरकार होगा तब जाकर मेरे हमसाइयों की ऊरतों का चूल्हा गरम होगा।’’

4। नवाब निजाम उलमलिक तीस हजार रूपए नकद बतौर नयाज़ लाया, लेकिन आप ने कबूल न किए तो इस ने कहा कि आप हाजित मंदों में ही तकसीम फ़रमादें, आप ने फर माया कि में तुम्हारा ख़ान सामां नहीं हूँ, यहाँ से बाहर जाकर इस की तकसीम शुरू करू, मगर पहुँचने तक ख़त्म हो जाएगा।

5। इसी तरह अफगानों के एक सरदार ने तीन सौ अशर्फियाँ भेजें तो आप

ने वापस कर दिया और फ़रमाया कि अगरचे ह्दय रद्द करने की मुमानियत की गई है, लेकिन इस लेने को वाजिब भी करार नहीं दिया गया। अगर ह्दय हलाल होना मुतय्यन हो तो इस का ले लेना बाइस बरकत है। फ़क़ीर अपने उन अस्हाब से जो इख़लास और एहतियात के साथ तहाइफ़ लाते हैं कबूल कर लेता है, लेकिन उमरा और अग़न्या जिन की दौलत अक्सर मुश्तबा होती है और लोगों के हुक़ूक़ उन से मुताल्लिक़ होते हैं इस लिए तहाइफ़ कबूल करने में तामिल लाज़िम है।

6। एक अमीर ने आप की ख़िदमत में आमों का ह्दय भेजा, आप ने उसे रद्द कर दिया, इस ने दुबारा बसद इल्तिजा भेजे, आप ने दो आम ले लिए, बाक़ी तमाम वापस कर दिए कि मेरा दिल उन को कबूल करने से इंकार करता है। इस वक़्त एक बाग़बाँ आप के पास शिकायत ले कर आया कि फलां अमीर ने मेरे आम जबरन ले लिए हैं और उन में से कुछ आप की ख़िदमत में भेजे हैं, इस मज़लूम की हिमायत फ़रमा दें, आप ने फ़रमाया: सुबहान अल्लाह! यह आकबत ना अंदेश मन्सूबा बंदियों से फ़क़ीर का बातिन तारीक करना चाहते हैं।’’

आप के वाक़ियात इस किस्म के बहुत हैं। यह सब ज़हद व तोकल और कमाल दर्जा के एहतियात पर दलालत करते हैं जब कि आप की खानगाह में बड़ी तादाद में तालिबान हक़ और अहले सुलूक रहा करते थे और सब का ख़ुर्द व नोश खानगाह की तरफ़ से था, बजाहिर कोई ज़रिया आमदनी भी न था। सफ़े क़ल्ब की हिफाज़त काइस क़द्र एहतिमाम था कि इस क़द्र पाक और हलाल लुक़्मे अहले सुलूक के पेट में जाएँ कि किसी तरह उन का बातिन तारीक और मुकदर न होने पाए। यह कोई मामूली बात नहीं, आप के जानशीन हज़रत शाह गुलाम अली क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं:

आप ने फक्र को दौलत मंदी पर तरजीह दी और सब्र व क़नाअत को पसंद किया, तसलीम व रज़ा को अपनी मर्जी की खासियत के मुताबिक बना कर क़ज़ाए माफ़िक़ व ना माफ़िक़ के मुताबिक बना लिया था

और दुआए नबवी ﷺ के मुताबिक ‘‘अललहम् अजाल रिज़्क़ आल मुहम्मद क़फ़्फ़ाफ़्न’’ (ए अल्लाह, आल मुहम्मद की रोज़ी बक़दर ज़रूरत बना) बशरियत के लिए जो कुछ ज़रूरी है इस पर किफायत करके और अपने अस्हाब के लिए भी यही दुआ करते थे कि वह इस क़द्र दौलत मंद न हूँ कि फिजूल खर्ची करने लगीं और न इस क़द्र मुफलिस हूँ कि नौबत कर्ज तक पहुँचे।

हज़रत शाह गुलाम अली क़ुद्दिस सिर्रहू: मौलाना अब्द अलहकीम ख़ाँ अख्तर शाहजहाँ पूरी ने हज़रत शाह गुलाम अली क़ुद्दिस सर ह के मलफ़ूज़ात ‘‘उलमारफ़’’ पर बड़ा मुफीद आप का तआरुफ़ लिखा है, इस में फ़रमाते हैं: शाह गुलाम अली नक़्श बंदीरहमत अल्लाह अलैहि ‘‘अलफ़क़र फ़ख़्री’’ का मुँह बोलता सबूत और सब्र व क़नाअत का पीकर थे। आप के खानक़ाही निजाम के बारे में सर सय्यद अहमद ख़ान साहिब ने यह वज़ाहत भी फ़रमाई है: सुबहान अल्लाह! किया आजादी थी कि मुतअल्लिक़ दुनिया का लगाव न था, अल्लाह अल्लाह किया इताअत सुन्नत थी कि सर मो फ़र्क़ न था, तोकल तो इस दर्जा पर था कि कभी किसी तरह का ख़याल दिल में न आता।उमरा और बादशाह दिल में आरज़ू रखते थे कि हम खानगाह के फ़िक़रा के लिए कुछ वज़ीफ़ा मुक़रर करें, हरगिज़ आप मंजूर न फ़रमाते। एक दफ़ा नवाब अमीर अद्दौला, अमीर मुहम्मद ख़ान वाली टोंक ने बहुत इल्तिजा से दरख़ास्त तक़र्र वज़ीफ़ा की, इस के जवाब में आप ने सिर्फ़ यह शेअर लिख भेजा؎

मा आबरुए फक्र व क़नाअत निमी ब्रेम

बामीर ख़ाँ बगुई कि रोज़ी मुक़रर अस्त

खानगाह में रहने वाले फ़िक़रा, तालिबेन और सालकेन और ख़ुद गुलाम अली देहलवीरहमत अल्लाह अलैहि की बूद व बाश और ख़ुर्द व नोश वगैरह में यकसानियत का ज़िक्र करते हुए सर सय्यद अहमद ख़ान साहिब ने यह भी लिखा है: हज़रत की खानगाह में पांच सौ से कम फ़क़ीर नहीं रहते थे और सब का रोटी कपड़ा आप के जिम्मा था और बावजूदिके कहीं से एक हब्बा मुक़रर न था, अल्लाह तआला ग़ैब अलग़ीब से काम चलाता था, इस पर फ़य्याज़ी और सखावत इस क़द्र थी कि कभी साइल को महरूम न फेरा, जो इस ने मांगा वही दिया, जो चीज़ उम्दा और तोहफा आप के पास आई इस को

बेच कर फ़िक़रा पर सिर्फ़ करते और जैसा गज़ी, गाढ़ा मोटा तमाम फकीरों को मयस्सर होता वैसा ही आप भी पहनते और जो खाना सब को मयस्सर होता वही आप खाते, भला गौर करू कि बशर की ताकत है कि ऐसी बात कर सके।’’

उन बुजुर्गों की रोष में अहले मदारिस और अहले खानगाह के लिए किस क़द्र इबरत है, अगर वह उन मुक़द्दस नफ़ूस की राह अपनाते तो तहसील माल व ज़र के लिए उन्हें मुतकबर सेठों के दरवाजों पर ऐसी कतार नहीं लगानी पड़ती और न वह घनावना किरदार अपनाना पड़ता जो अपनाते हैं। बुजुर्गों के इस तोकल व क़नाअत ने दुनिया दारों से कैसा बे नयाज़ कर दिया था और इल्म व इरफान की कैसी अज़मत उन के दलों में बिठा दी थी और उन को दुनिया की हक़ीक़त जता दी थी। यहाँ से वह लोग भी इबरत हासिल करें जो बाज़ बुजुर्गों को मिसाल में पेश कर के औलिया अल्लाह और सूफ़िया कराम के बारे में यह जेहन देते हैं कि वह दुनिया से भागे, जंगलों का रास्ता इख्तियार किया और इस तरह वह कोई दीन का काम नहीं कर सके।

हैरत होती है जब अहले इल्म ऐसी बातें करें गे और तारीख से नाइंसाफ़ी से काम लें गे तो जाहिलों से किया शिकायत का मौका है। उन सूफ़िया ने कौम में रह कर जो इंसानियत साज़ी का काम किया है और शरीअत हुक्का से जिस तरह इंसानों के ज़ाहिर व बातिन की तामीर और क़ल्ब व जेहन की ततहीर का काम किया है वह खैर उलक़ुरून के बाद कण दर्स गाहों ने किया है। अगर वह काम न करते तो हर दौर में तसलसुल के साथ सालहीन और ओलिया का वजूद किस तरह होता और रूहानियत व तसव्वुफ़ का तोहफ़्ज़ किस तरह होता। सब इंसान एकसां नहीं होते और न सब की कैफीतें एकसां होती हैं। हालात मुख़तलिफ़ होते हैं। सूफ़िया कराम ने ख़ुद को मुकम्मल अख़लाक़ नबवी ﷺ से आरास्ता किया और हर दौर में जहां ज़रूरत हुई ख़िदमत दीन के लिए सब कुछ छोड़ कर वहीं रह गए और इलाक़े के इलाक़े सुधार दिए।

हां यह जरूर है कि बाज़ ने तर्क व तजरीद की ज़्यादा बुलंद चोटी पर पहुँच कर ख़ुद को सब से अलाहदा भी कर लिया, वह उन के हालात थे, वह अपनी कैफ़ीयतों या रूहानियत व तरीक़त की हिफाज़त के लिए जुदा भी हुए तो इस में भी वह नेक नियत थे और न वह तारक फर्ज़ हुए। यह कहां है कि दावत व तबलीग़ फर्ज़ उएन है और हर इंसान इस का मुकल्लिफ़ है। वह जिस वक़्त जिन हालात में आबादियों को छोड़ कर जंगलों को गए हैं इस वक़्त भी उन के अलावा दावत का काम करने वाले उन की बस्तियों तक में बहुत होते थे। फिर वह जंगलों में भी अपने अपने हलक़ा इरादत में तामीर ज़ाहिर व बातिन का काम करते रहे।

यहाँ यह भी ध्यान रहे कि औलीए कराम दो किस्म के होते हैं:

1।औलीए इशरत जो क़ौमों और आबादियों में रह कर दीन के ज़ाहिर वबातिन की दावत का काम करते हैं और अक़्वाम की इसलाह व इरशाद उन के सुपुर्द होती है।

2। औलीए अजिलित, यह अक्सर इंतजाम आलम के उमूर की अंजाम दही में मसरूफ़ रहते हैं और अक्सर ख़ल्क़ से जुदा रहते हैं, वह जो भी करते हैं अपने रब तआला के इलहाम और मर्जी से काम करते हैं ।

उन बुजुर्गों पर एतराज़ात निहायत दर्जा महरूमी की अलामत है। हर इंसान को चाहिए कि वह ख़ुद अपने आमाल व अफ़आल को देखे। मुतक़द्दिमीन पर तन्क़ीद या एतराज़ात भी कयामत की अलामतों से है। अल्लाह तआला के उन नफ़ूस क़ुदसिया पर हर्फ़ ज़नी जिल्लत व रुसवाई की अलामत होती है और उन से दौर करना यह दीन से दौर करना है और ख़ुदावंद क़ुद्दूस से लड़ाई मूल लेना है।