अध्याय 32 में से 54पृष्ठ 381–390
सूफ़िया ने पूरे दीन की हिफाज़त की
ख़याल रहे कि रब कायनात जल व अला ने चों कि दीन की हिफाज़त का वादा फ़रमाया, दीन अपनी खासियत के लिहाज से मुख़तलिफ़ शोबे और हिस्से रखता था; इस्लाम, ईमान और एहसान तो हदीस जिबरील में आका ﷺ से मर्वी हैं कुरआन की हिफाज़त इस के अलफ़ाज़ और तफसीरात और इस के मुताल्लिक़ा उमूर के साथ इसी तरह अहादीस की हिफाज़त कुरआन व हदीस में बयान शुदा अक़ाइद हुक्का की हिफाज़त और फिर आमाल सालहा की हिफाज़त और हर दौर में इस की तफ़सील व तौज़ीह और मुबतलेन की गलत तावीलात और उन की तहरीफ़ात के जवाबात और उन के अबताल और हर दौर में बका व तोहफ़्ज़ और दीन की नशर व इशाअत के अल्लाह तआला ने जहां इंतिज़ामात फ़रमाए हैं, मुख़तलिफ़ जमातों और इंसानों के दलों में चाहत और तवज्जो पैदा कर दी और हर एक के दिल में किसी ख़ास शोबे से ख़ास दिलचस्पी और ख़िदमत का एहसास पैदा कर दिया।
इसी तरह एक जमात को बातिन दीन की हिफाज़त और आमाल सालहा में इस्तिक़ामत, ज़िक्र व फ़िक्र वगैरह की कसरत, इबादत व रियाज़त, इश्क व मुहब्बत, तोकल व क़नाअत, तौबा व अनाबत, तसफ़ीया क़ल्ब व तज़किया नफ़्स वगैरह की ज़रूरत का एहसास पैदा कर
दिया और इसी तरह हर जमात के सुपुर्द जो काम किया था उसे निहायत इन्हिमाक और तदबर और जफ़ा कशी व मेहनत से किया।इसी तरह इस मुबारक जमात ने भी इस जिम्मा दारी को पूरे तौर पर निभाया और जिस तरह दीगर हज़रात ने अपनी ख़ास खिदमतों के लिए राहें मुतय्यन कीं इसी तरह इस जमात ने भी कीं और जमातें मुख़तलिफ़ नामों मसलन फ़िक़हा, मुफ़स्सिरीन, मुहद्दिसीन और मुतकल्लिमैन वगैरह से पहचानी गईं। इसी तरह यह जमात सूफ़िया के नाम से मशहूर व मारूफ़ हुई। उन्हों ने पूरी तवज्जो दी कि आमाल सालहा में इस्तिक़ामत और कसरत कैसे पैदा की जाए, ईमान में इस्तिहकाम और जिला किस तरह हो और क़ल्ब व क़ालिब से मुताल्लिक़ा मामूरात शरा पर अमल, मुंहयात व ममनूआत से कराहट व नफरत किस तरह पैदा हो और वह ख़सलतीं कैसे पैदा हूँ जो साहिब ख़ल्क़ अजीम ﷺ ने अपने अस्हाब करामरज़ि अल्लाह अन्हुम में पैदा कीं।
जिस तरह और जमातों ने जब अपने अपने शोबों में गहराई, गेराई, फ़िक्र व तदबर और मेहनत व जाँ फ़िशानी से काम लिया तो उन पर इस से मुताल्लिक़ नये नये उलूम और हक़ायक़ व दक़ायक़ वगैरह उन पर मुनकशिफ़ हुए, इसी तरह इस जमात सूफ़िया पर भी मुजाहिदात व रियाज़ात और कसरत इबादात और सफ़े क़ल्ब व नफ़्स वगैरह नये नये ऐसे उलूम और मआरिफ़ व हक़ायक़ ज़ात व सिफ़ात वगैरह मुनकशिफ़ हुयजन को किसी भी तरह से नज़र व इस्तिदलाल वगैरह जाना नहीं जा सकता है। उन बुजुर्गों ने जो रियाज़त की इस पर उन्हें कोई न कोई नयी चीज़ हाथ आई और फिर उन का ऐसा निजाम बनता चला गया कि उन का तरीका एक मुदव्वन इल्म बिन गया, हम इस को एक अलग तहरीर में क़दरे तफ़सील से बयान कर चुके हैं।
आला कमालात और तक़र्ब वगैरह के लिए जिन अख़लाक़ व आमाल से आरास्ता होने की ज़रूरत थी और जिन को हुज़ूर ﷺ ने अपनी उम्मत को दिए थे उन से आरास्ता करना कोई मामूली तवज्जो का तालिब न था, हम समझते हैं इल्म पर अमल किस क़द्र कठिन है इतनी तहसील कठिन नहीं। आज मुशाहिदा है इल्म वाले बहुत हैं, लेकिन अमल से अक्सर कोरे
हैं और जिन में है भी तो नाक़िस है। सूफ़िया कराम का कमाल रहा कि उन्हों ने अपनी हिक्मत बालग़ा से अमल के ऐसे पीकर पैदा कर दिए जो पूरे दीन (ज़ाहिर व बातिन के साथ) की चलती फिरती तस्वीर थे। जो आला मक़सद उन के सामने था ख़ास बुनियाद इस बात पर थी कि दिल से हर ख्वाहिश, हर मुहब्बत, हर चाहत को दौर करके अल्लाह जल व अला और इस के रसूल ﷺ की चाहत व मुहब्बत और उन की तरफ़ तवज्जो पैदा कर दी जाए। लिहाज़ा यही सब का इलाज था। यह इतना बड़ा काम था कि इस की गहराई पर जिन की नज़र है वह इस की कठिनाई से भी वाकिफ़ हैं । यही एक रास्ता था जिस से मुकम्मल दीन पर अमल, इस्तिक़ामत और क़ुर्ब ख़ुदावंदी की नेमत का हुसूल हो सकता था। लिहाज़ा फक्र वगैरह भी तसव्वुफ़ का एक जुज़ बिन गया और उन्हों ने हाजित पर इकतिफ़ा करके पूरी तवज्जो अपने रब जल व अला की तरफ़ कर दी और इस के बंदों की इसलाह व इरशाद और उन के रब से क़रीब करना अपना शआर बना लिया।
उन मुजाहिदात व रियाज़ात की बदौलत उन के ख़ुदा ने जो उन पर अनिवार व तजल्लियात और गोनागों मआरिफ़ व हक़ायक़ और उलूम व अहवाल अता किए तो इस से उन की दिलचस्पी बढती चली गई औरफ़क़र वगैरह कहीं से कहीं पहुँच गया। सूफ़िया कराम के अहवाल पढ़िए और उन के हालात देखिए तो पता चलता है कि उन्हों ने उन कमालात और मुक़ामात और अख़लाक़ हसना की तहसील के लेकिकस क़द्र मेहनतीं कीं और जो कुछ किया वह अपने मौला जल व अला की रज़ा व ख़ुशनुदी के लिए किया और दीन कामिल की कामिल हिफाज़त और नशर व इशाअत के लिए किया। उम्मत को चाहिए था कि उन की तहसीन करती, उन की मदह करती, उन के कारनामों की सताइश करती, लेकिन जो शिक़ावत अज़ली के शिकार थे वह कैसे उसे अच्छाई की नज़र से देखते।
आज सूफ़िया के फ़िक्रू ज़हद पर ज़बान तान दराज़ करने वालेपने गिरेबान में मुँह डाल कर देखें कि वह कितने दीन पर आमिल हैं और गुना व मालदारी की तहसील और इस की
दावत से वह ख़ुदा से कितने क़रीब हुए कि दौर आज का मुशाहिदा साबित है कि जब तक सूफ़िया कराम और उन का तसव्वुफ़ ग़ालिब रहा या राइज रहा तब तक दीन अपनी असली हक़ीक़त व हालत के साथ ज़िंदा रहा और क़ायम रहा, अब सिर्फ़ ढांचा ही ढांचा है वह भी अधूरा, वह भी बहुत कम लोगों में बाक़ी, वह कहां है, रूह तो बिलकुल ख़त्म सी हो गई है।
आज के जमाने में इलाज
हमारी नज़र में दुनिया व मा फ़ीहा की मुहब्बत सेआजादी और अख़लाक़ हसना से आरास्तगी इबादत व रियाज़त और ज़िक्र व फ़िक्र वगैरह की कसरत का सिर्फ़ एक ही रास्ता है वह हैतरीक़ तसव्वुफ़। ख़याल रहे कि इस का सही तरीका यह है कि उलूम शरएहि और अहकाम शरएहि ख़्वाह अक़ाइद हूँ या आमाल सब की बाज़ाबता तालीम हो और बक़दर ज़रुरवर्त हर मुकल्लिफ़ इल्म ज़ाहिरी हासिल करे और ऐसे अफराद जो अनिवार व तजल्लियात और क़ुर्ब व इरफान के हामिल हूँ पैदा हूँ जो इल्म तसव्वुफ़ से कमा हुक्का वाकिफ़ और तरक तरबीयत से आगाह और अपनी तवज्ज्हात से क़ुलूब का तसफ़ीया और नफ़ूस का तज़किया कर सकते हूँ वह एक तरफ़ तसव्वुफ़ बहैसीयत इल्म भी सिखाएं और दूसरी तरफ़ अमली तसव्वुफ़ से तवज्ज्हात के ज़रिया आरास्ता करें । अगर ऐसा हो जाए तो न गुना और मालदारी नुकसान देगी और न फक्र की वजह से जो बुराइयां पैदा होती हैं वह मुज़िर हूँ गी, मगर यह अज़ीम काम करने के लिए अज़ीम कसीर अफराद की ज़रूरत है जो इस जमाने में बहुत नादिर हैं, लिहाज़ा बहुत मुश्किल है।
दुनिया विमा फ़ीहा की हिर्स व हवस और मुहब्बत ने आज लोगों को जिस दलदल में ढकेल दिया है इस से निकालना हर किस व नॉक्स का काम नहीं। तसफ़ीया क़ल्ब व तज़किया नफ़्स के बग़ैर यह काम नामुमकिन है। वह हुब्ब दुनिया और हिर्स व हवस की वजह से जिस क़द्र दीन से दौर और अख़लाक़ रज़ीला के घनावने अफ़आल व किरदार का शिकार हो गए हैं इस का इलाज सिर्फ़ वही है जो हमारे आका व मौला ﷺ ने जिसे सलाह क़ल्ब से और कुरआन ने जिसे तज़किया नफ़्स से ताबीर किया है।
इस हिर्स व हवस और हुब्ब दुनिया व मा फ़ीहा वगैरह से आजाद और पाक करने का दूसरा नाक़िस एक रास्ता यह भी हो सकता है कि उन्हें वह आयात व अहादीस सुनाई जाएँ जिस का ताल्लुक इबादत व ताअत और ज़िक्र व फ़िक्र की कसरत और अख़लाक़ हसना की तरग़ीब और अख़लाक़ रज़ीला से निजात वगैरह से है। आख़िरत की अहमियत व इफ़ादीयत और इस की अब्देत और दुनिया की मुज़म्मत व फिनाईयत और इस के नुक़्सानात वगैरह का बाज़ाबता दर्स व तालीम हो, अख़लाक़ रज़ीला और अमराज़ कलबेह का इलाज, नफ़्स की शरारतें और उन से इजतिनाब के तरीके बताये जाएँ नीज़ जोर दिया जाए कि दुनिया की हाजित की वजह से वह शरई तरीके पर हासिल करें, क़ल्ब को इस की मुहब्बत से आजाद करें, इस के मुक़ाबिल अल्लाह तआला और इस के रसूल ﷺ की मुहब्बत और इस की तहसील की राहों की निशान दही की जाए नीज़ माल वगैरह के खर्च के सही और जायज़ तरीके बताये जाएँ और हर खर्च में एतिदाल, इसराफ़ से दूरी बताई जाए और इसराफ़ व मुहरमात से बचाया जाए।अगर यही हो जाए तो थोडा माल भी काफ़ी किफायत कर सकता है।
शादी ब्याह की रसूमात और फिर जहेज़ की कसरत नीज़ अकीक़ों ख़तनों वगैरह में माल के बेजा खर्च और फिर मकानात वगैरह की तज़ईन व तौसीअ वगैरह में जो इसराफ़ होता है, अगर कौम इस से बच जाए तो गरीबों की बहुत कुछ मदद भी हो सकती है और वह ख़ुद भी बहुत सी चीजों की हिर्स और बेजा फ़िक्र से बच सकते हैं । इसी तरह वह कौम व मिलित की इमदाद व इआनत भी कर सकते हैं और आख़िरत संवार सकते हैं । यह सब कुछ जिस की तरफ़ इशारे किए हैं उन्हें करने के लिए बहुत से अफराद उन्ही औसाफ़ के हामिल अहले इल्म व अमल तैयार करना हूँ गे जिन का शआर ही दावत हक़ और इसलाह व इरशाद हो।
अगर मशाइख़ और पैरान तरीक़त अपने इस्लाफ़ और बुजुर्गों के उसूलों और तरीकों पर क़ायम हो जाएँ और मुशेख्त की जिम्मा दारी संभाल लें और शरीअत व तरीक़त की बाज़ाबता तालीम और इस पर अमल और अशग़ाल व अज़कार सिखाएं और आमिल बनाएं , इसी तरह उलमा-ए
कराम इल्म व अमल को अच्छा बनाएं , इस मामले में मदारिस अरबिया के जिम्मा दारान हज़रात तवज्जो दें और मदारिस की चहार दीवारी में तलबा की तालीम व तरबीयत बेहतरीन हो और उन्हें सूफ़िया कराम के अख़लाक़ व औसाफ़ का हामिल बनाएं और दावत व तबलीग़ और इसलाह व इरशाद का जज्बा उन में कोट कोट कर भर दें और उन्हें अहम मौज़ूआत पर तकरीरी मश्क़ करायें, अक़ाइद हुक्का अहले सुन्नत की अहमियत और हुब्ब दुनिया व हुब्ब जाह व मन्सब वगैरह के नुक़्सानात और उन का अज़ाला और दुनिया और मालदारी व गुना का सही इस्तेमाल बताएं और उन की वह तबलीग़ करें नीज़ जिन मशाइख़ से जो उलमा वाबस्ता हैं मशाइख़ उन की मज़कूरा ख़ुतूत पर तरबीयत करें तो भी काम की उम्मीदें हैं।
इसी तरह ऐसी ही किताबें भी पढ़े लिखे लोगों तक पहुँचाई जाएँ जो ख़ास कर बुजुर्गों के तरीका, उन का तक़्वा व परहेज़गारी, इश्क व मुहब्बत, ख़ौफ़ व ख़शीयत, इमदाद व इआनत, तबलीग़ व दावत, ताअत व इबादत, मुजाहिदा व रियाज़त, दुनिया व मा फ़ीहा से आराज़ व नफरत और उन की इसलाह तरबीयत दीन की हिफाज़त वगैरह पर मुश्तमिल हूँ। यह सब काम ज़ाहिर है मुश्किल भी हैं और अगर लोग तैयार हो जाएँ तो आसान भी। यह तो तै है कि आज के इस तूफान और सैलाब का न मुकाबला आसान है और न सब को बचाया जा सकता है, मगर फिर भी काफ़ी हद तक ग़ुरबा और औसत दर्जे के लोगों को काफ़ी देनदार बनाया जा सकता है और मालदारों को भी बहुत कुछ मुतास्सिर किया जा सकता है।
आज मालदारों ने जो मकानात वगैरह की तज़ईन व तौसीअ और रसूमात में इसराफ़ और दुनियादारी अपना ली है, फिर शादी ब्याह की ख़ास रस्मों में जो कुछ वह कर रहे हैं। जहेज़ से ले कर विलेमों और दावतों और इस से मुताल्लिक़ा दीगर रस्मों में इस की वजह से गरीबों ख़ास कर मुतवस्सित दर्जे के लोगों के लिए बड़े मसले खडे हो गए हैं । माल को जायज़ व नाजायज़ तरीकों से हासिल करना आम लोगों की एक ज़रूरत बिन गया है। हद तो यह है कि इस हिर्स व हवस से बचाने और इस बुला से निजात
दिलाने का काम जो तबका कर सकता था वह ख़ुद इसी में मुबतला है, इस के लिए इस के पास सौ हीले हैं । दुनिया की मुहब्बत व हिर्स वगैरह अब ऐसी चीजें हो गई हैं कि उन की बुराई तो कजा वही भलाई तसोर की जा रही है। अब खुले आम इसी की तलक़ीन की जा रही है, इस को हासिल करने की राहें बताई जा रही हैं , इस की मुहब्बत का दर्स दिया जा रहा है और उसे मुख़तलिफ़ बहानों से मांगा जा रहा है। हज़रत हज उलइस्लाम क़ुद्दिस सिर्रहू के बयान करदा कुछ आदाब वगैरह हम आखिर में बयान करते हैं जिन्हें अपना लिया जाए तो भी आज के अहले फक्र का काफ़ी हाल सुधर सकता है।
आका ﷺ की सीरत व फ़ज़ीलत फक्र:
1। दुनिया विमा फ़ीहा के सिलसिले में कुरआन के इर्शादात और आका ﷺ के इर्शादात आप की सीरत तैबा और फक्र के फ़ज़ाइल और इस के फायदे कसरत से बयान किए जाएँ और मुतअल्लिक़ फक्र और ख़ास फ़िक़रा ; राजी, क़ाने और सादिक की फ़ज़ीलत जुदा जुदा बताई जाए।
2। गुना पर फक्र की बरतरी और फ़ौक़ियत की रोष और इस सिलसिले में उन के मुजाहिदात व रियाज़ात और उन्हों ने दुनिया के जौनुक़्सानात बयान किए हैं बताये जाएँ और यह कि उन्हों ने तर्क दुनिया करके किया किया मुरातिब हासिल किए सीरत तैबा और फ़ज़ाइल फक्र कुरआन व हदीस से बासानी जमा किए जा सकते हैं। नीज़ हयात दुनिया की नापाइदारी और इस से मुहब्बत के नुक़्सानात, क़ुरआनी आयात की फिहरिस्त नीज़ मुश्कात शरीफ़ की किताब अलरक़ाक़ और फजल फ़िक़रा वगैरह इसी तरह अहया उलउलूम शरीफ़ जिल्द सोम का छटा और सातवां बाब जो कि दुनिया की सिफ़त और इस की मुज़म्मत और इस की हक़ीक़त, बुख़ल और इस का इलाज और माल की मुज़म्मत, माल की आफ़ात, हिर्स व तमा की मुज़म्मत और उन का इलाज, क़नाअत की तारीफ़ और इस के हुसूल की दुआ और सखावत वगैरह की फ़ज़ीलत पर मुश्तमिल हैं सुनए जाएँ और उन के मुताबिक तरतीब दी जाए।
3। हज़रत इमाम हज उलइस्लाम क़ुद्दिस सिर्रहू ने अहया उलउलूम जिल्द चहारम में फ़ज़ीलत फक्र और इस के आदाब वगैरह तफ़सील से बयान फ़रमाए। तालीम याफताह लोगों की उन्ही आदाब पर तरतीब की जाए। चंद आदाब यह हैं: आप क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं: फ़क़ीर के लिए ज़ाहिरी और बातिनी कुछ आदाब हैं वह लोगों से इख़तिलात और मेल ज्वल के ऐतबार से भी और आमाल के ऐतबार से भी , बातिनी यह है कि अल्लाह तआला ने जिस फक्र में मुबतला किया हैउसे नापसंद न करे यानी इस ऐतबार से कि वह अल्लाह तआला का फजल हैनापसंद न करे अगरचे फक्र उसे पसंद न हो और इस से बुलंद अदब यह है कि फक्र को नापसंद न करे,बल्कि इस पर राजी हो। इस से भी बुलंद मर्तबा यह है कि फक्र का तालिब हो और इस पर खुश हो। जब गुना की खराबियों से वाकिफ़ होगा और बातिनी तौर पर अल्लाह तआला पर तोकल और भरोसा होगा तो उसे फक्र पर खुशी होगी। वह इस बात पर पुख्ता यकीन रखे कि जो कुछ इस के मुक़द्दर में है इस तक जरूर पहुंचेगा और ज़रूरत से ज़ाइद को नापसंद करे।
हज़रत अली कर्रम अल्लाह वझा फ़रमाते हैं कि फक्र पर अल्लाह तआला की कुछ सजाएं हैं और कुछ इनामात भी। सवाब और इनामात की अलामत यह है कि फक्र पर आदमी की आदत को अच्छा कर दे, रब की इताअत करे और शकर भी। और सज़ा की अलामत यह है कि आदमी बदाख़लाक़ हो जाए, इबादत को तर्क कर दे, नाफ़रमानी पर उतर आये और शिकवा व शिकायत करे और इस के फैसले पर नाराज हो।
हज़रत इमाम क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि यह कौल इस बात की दलील है कि हर फक्र काबिल तारीफ़ नहीं होता, बल्कि काबिल तारीफ़ फक्र वह है जिस पर फ़क़ीर नाराज न हो, बल्कि राजी और फक्र पर खुश हो। फ़क़ीर को चाहिए कि फ़वाइद फक्र से वाकिफ़ हो। कहा गया कि बंदे को जब दुनिया दी जाती है तो इस से कहा जाता है उसे तीन हिस्सों पर लो क्यों कि यह तीन बातें पेश आएं गी; मशगूलियत, फ़िक्र और तवील हिसाब।’’
फक्र के ज़ाहिरी आदाब यह हैं कि दूसरों के सामने दस्त सवाल दराज़ न करे
और अच्छी हालत ज़ाहिर करे, शिकवा और फक्र का इज़हार न करे, बल्कि फक्र को छिपाए और यह भी ज़ाहिर न होने दे कि वह फक्र को छिपा रहा है।
आमाल में फक्र का अदब यह है कि किसी मालदार के सामने इस की मालदारी की वजह से तवाज़ा न करे, बल्कि ख़ुद को बड़ा समझे। इस सिलसिले में कम अज़ कम यह करे कि मालदारों से मेल ज्वल न रखे और न ही उन की मजालिस में रगबत रखे क्यों कि यह तमा की बुनियाद है।
हज़रत सफ़ियान सौरीरज़ि अल्लाह अन्हु फ़रमाते हैं: जब फ़क़ीर मालदारों से मेल ज्वल रखता है तो जान लो कि यह रियाकार है, जब वह बादशाह से ताल्लुक रखे तो समझ लो कि यह चूर है। बाज़ आरिफ़ैन ने फ़रमाया: जब फ़क़ीर मालदारों से मिलता है तो इस का एतिमाद ढीला हो जाता है और जब उन से तमा रखता है तो इस की अज़मत ख़त्म हो जाती है और जब उन में सुकूनत इख्तियार करता हैतो गुमराह हो जाता है।
फ़क़ीर मुजद्दिदी अर्ज़ करता है कि आज का दौर बड़ा अजीब दौर है, हर बातिल फ़िर्क़ा और जमात मालदारों को हथियाने और शिकार करने में लगी हुई है और यह काम निहायत गहराई और स्कीम के तहत कर रहे हैं और वह मालदारों को बहुत मुनज़्ज़म करके, ज़कात व गैरह पर उभार कर अपने बातिल अक़ाइद की तरवेज का सामान फ़राहम कर रहे हैं। आज हर मजहब बातिल की इशाअत का ख़ास मदार माल ही है। माल का लालच दे कर हक़ से तोड़ते हैं, उदारे क़ायम करते हैं, उन में तलबा को वज़ाइफ़ देते हैं , इजतिमाआत में ले जाते हैं , तालीम, किताबें और दीगर अख़राजात; क़याम व तआम और सफर वगैरह इसी माल से पूरे होते हैं। अवाम को भी बहकाने का ज़रिया ज़्यादा तर माल ही बना हुआ है और इस माल से काफ़ी कुछ हासिल कर रहे हैं।
हम समझते हैं कि अपने अफराद इस क़द्र पुख्ता कर दिए जाएँ कि वह किसी भी मालदार की किसी भी चीज़ से मुतास्सिर न हूँ, बल्कि उन पर अपना असर डालें और उन्हें नेक राह पर लाएं ताकि
उन के अक़ाइद भी महफूज़ रहीं और नेकी भी मिलेऔर उन की स्रोत व दौलत से इस्लाम व संयत को फायदा पहुँचे। नीज़ अहले गुना से रवाबित व ताल्लुकात और उन से मिलना जलना इस तरीके पर होक्का आम आदमियों की नज़र में मतऊन न हो और न गरीबों का दिल दिखे, बल्कि गरीबों की मदद हो। ग़रज़कि हसन नियत से अगर मालदारों से मिले या उन को मुनज़्ज़म तौर पर पकड़ा जाए तो बुजुर्गों ने इस की इजाजत दी है। इस जमाने में हालात ऐसे हो गए हैं कि मुख़ालिफ़ीन का जवाब बग़ैर माल के भी नहीं हो सकता है।
हज़रत इमाम क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि फ़क़ीर को चाहिए कि मालदारों की खातिर और उन के अतीया के तमा की वजह सेज़कर इलाही से गफलत न बरते।’’
इस बात पर भी बहुत ध्यान देने की ज़रूरत है कि अब मालदारों की इज्जत और उन की तरफ़ मेलान और उन की आमद पर क़ल्ब को खुशी और उन की खातिर व मदारात वगैरह पर इस क़द्र इन्हिमाक और तवज्जो हैकि क़ल्ब गाफिल हो जाता है औरेअकसर लोग पूरे तौर पर उन्ही की तरफ़ मुतवज्जा हो जाते हैं।
अफ़आल में अदब यह है कि फक्र की वजह सेइबादत में सस्ती न करेऔर जो कुछ इस के अख़राजात से बचे चाहे वह थोड़े ही हो उसे खर्च करने से दरेग़ न करे क्यों कि यह कम माया की कोशिश है और इस का सवाब उन ज़्यादा मालों के खर्च से ज़्यादा हैजो मालदारी की हाजित में दिए जाएँ और मुनासिब यह है कि माल जमा न करे, बल्कि ज़रूरत के मुताबिक रखे और बाक़ी राह ख़ुदा में खर्च कर दे।