अध्याय 47 में से 54पृष्ठ 569–579
चंद बुरी ख़सलतीं
ज़बान: अल्लाह तआला की अता करदा नेअमतों में से एक ज़बान भी है बंदा अगर चाहे तो इसी ज़बान के ज़रिया अच्छी आवाज़ और इज्जत विवक़ार पैदा कर सकता है और इस के ज़रिया आख़िरत के बहुत से सवाब जमा कर सकता है,अगर यह मीठी रहे तो दलों को खींच लेती है इसी के ज़रिया उलूम दयनीय की तदरीस,ज़िक्र वितलावत,तस्बीह वितक़देस और अम्र बिलमारूफ़ और नही अन अलमनकर जैसे अहम उमूर अंजाम दिए जा सकते हैं और आख़िरत की बड़ी दौलत जमा की जा सकती है,घर से ले कर अंजुमन तक ख़लवत से ले कर जलवत तक दिन रात ज़बान के ज़रिया नेकियां हासिल की जा सकती हैं, और यही ज़बान है अगर इस का गलत इस्तेमाल हो तो बुराइयां ही बुराइयां फसाद ही फसाद,और इख़तिलाफ़ ही इख़तिलाफ़ रौनुमा हो जाए। ग़ीबत विच्गली इस के ज़रिया,गाली गलोच इस के ज़रिया,दिल आज़ारियां इस के ज़रिया,बहस वितकरार इस के ज़रिया और न मालूम किया किया इस के ज़रिया होजाए।इस की आफतीं बेशुमार हैं गानों में यह इस्तेमाल होती है,नाजायज़ ग़ज़लों में यह,फ़ुहश बातों में यह झूट और ला यानी बातें भी इसी के ज़रिया होती हैं,इस को काबू में रखना हर एक के बस की बात नहीं,इसी लिए हदीस शरीफ़ में आका अलैहि अस्सलाम ने फ़रमाया: जो ज़बान और शर्मगाह की जिम्मा दारी ले ले में इस के लिए जन्नत की जमानत लेता हूँ।
इमाम मुहम्मद ग़ज़ाली क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं: ज़बान अल्लाह तआला की बड़ी नेअमतों में से एक नेमत और इस की सिफ़ात अजीबा के लताइफ़ में से एक लतीफ़ा है,इस का
जिसम छोटा लेकिन इताअत वज्रम बड़ा है क्यों कि कुफ्र वायमान में तफ़रीक़ ज़बान की शहादत के बग़ैर नहीं होती और यह दोनों इताअत वनाफ़रमानी का इंतिहाई दर्जा हैं ।
फिर यह मौजूद विमादूम,ख़ालिक़ विमख़लूक़,मुतख़ील विमालूम,मज़नून व मौहूम का ताल्लुक ज़बान से है वह उसे साबित करती है या इस की नफ़ी करती है,जो कुछ भी इल्म में होता है ज़बान इस को बयान करती है चाहे वह हक़ पर हो या बातिल पर,और इल्म में हर चीज़ शामिल है, यह खासियत जिसम के दूसरे आज़ा को हासिल नहीं,वही शख्स ज़बान की शर से महफूज़ रह सकता है जो शरीअत की लगाम के ज़रिया उसे काबू में रखता है और उसे इसी बात के लिए इस्तेमाल करता है जो उसे दुनिया और आख़िरत में नफा दे और इस से रोक लेता है जिस से उन आमाल या मुस्तक़बिल में गुमराही का खतरा हो, इस की आफ़ात और गुमराहियों से बचने में लोग सस्ती करते हैं,इसी तरह इस के जालों और रस्सियों से भी नहीं बचते हालाँकि इंसान को गुमराह करने में ज़बान शैतान का सब से बड़ा हथियार है।
हज़रत इमाम क़ुद्दिस सिर्रहू ने अहया उलउलूम जिल्द सोम में ज़बान की बेस आफतीं बड़ी तफ़सील से बयान फ़रमाई हैं बड़ा अलमीया यह है कि लोग ऐसी किताबों को पढ़ते नहीं अवाम को तो कोई ताल्लुक नहीं ख़वास और अहले इल्म भी अक्सर उन कुत्ता बों से कोई दिल चस्पी नहीं रखते जिन से अख़लाक़ का ताल्लुक है अगर किसी में कुछ दिल चस्पी हैभी तो दरस्यात से या दीगर फ़ुतूओं वगैरह की कुतुब से,दरस्यात में बड़ी गफलत यह है कि अहादीस वगैरह में अक्सर उन अबवाब से बे एतिनाई बरती जाती है जिन का ताल्लुक अख़लाक़ीयात से है जब कि आज का दौर ऐसा है कि हर तरफ़ मुख़र्ब अख़लाक़ सामान मौजूद है,दौर का तक़ाज़ा था कि अख़लाक़ीयात पर काफ़ी तवज्जो दी जाती,अब तो ख़वास का हाल यह है कि इसी ज़बान के ज़रिया रात वदन बहुत गुनाह करते हैं और यह ख़याल भी नहीं होता कि हम गुनाह कर रहे हैं।
ज़बान की आफतीं
हज़रत इमाम क़ुद्दिस सिर्रहू की बयान करदा बेस आफतीं यह हैं।
(1)बे मकसदगुफ़्तगू
जान लो बेहतरीन हालत यह है कि अपने अलफ़ाज़ को उन आफतों मसला ग़ीबत,चुगली,झूट और झगड़े वगैरह से बचाव और ऐसी जायज़ गुफ़्तगू करू जिस में न तुम्हारा नुकसान हो और न ही किसी दूसरे मुसलमान का अगर तुम ऐसी गुफ़्तगू करोगे जिस की तुम्हें हाजित नहीं है तो इस तरह तुम अपना वक़्त ज़ाए करोगे और तुम्हारे इस जुबानी अमल के बारे में पूछ गुच्छ होगी और इस तरह तुम अच्छी चीज़ दे कर इस के बदले में बुरी चीज़ लेने वाले होगे,क्यों कि गुफ़्तगू पर सिर्फ़ होने वाला वक़्त गौर वफ़कर पर खर्च करू तो इस के नतीजे में तुम्हें फ़ुतूहात ग़ैबेह सेएसी चीज़ हासिल होगी जिस का नफा ज़्यादा होगा और अगर तुम अल्लाह तआला का ज़िक्र करू सुबहान अल्लाह और ला इला उला अल्लाह पढ़ो तो वह तुम्हारे लिए बेहतर है,कितने ही कलिमात ऐसे हैं की उन की वजह से जन्नत में महल बनाया जाता है और जो शख्स इस बात पर कादर हो कि खजानों में से कोई खजाना हासिल करे लेकिन वह एक गैर नाफ़े ढीला उठा ता है तो वह वाज़िह नुकसान उठाता है यह इस शख्स की मिसाल है जो अल्लाह तआला के ज़िक्र को छोड़ता हैऔर जायज़ लेकिन बे मक़सद कलाम में मशगूल होता है अगरचे वह गुनह गार नहीं होता लेकिन वह नुकसान उठाता हैकियों कि इस से वह बहुत बड़ा नफा ज़ाए हो गया जो उसे ज़िक्र ख़ुदावंदी के ज़रिया हासिल होता क्यों कि मोमिन की खामोशी फ़िक्र ,नितर इबरत और बोलना ज़िक्र होना चाहिए जैसा कि हदीस में है,जब कि बंदे का असल माल वक़्त है और जब वह उसे बे मक़सद काम में लगाता है और इस के ज़रिया आख़िरत का सवाब हा सल्ल नहीं करता है तो वह अपनेआसल माल को ज़ाए करता है,इसी लिए नबी अकर्म ﷺने इरशाद फ़रमाया: मिन हसन इस्लाम उलमर तर्क माला यानीय’’यानी इंसान के हसन इस्लाम में से लायानी बातों और बे मक़सद बातो M का छोड़देना है।
इस कलाम को बार बार पढ़ें और गौर करें कि आज कल लोग अगर ज़्यादा एहतियात करते
हैं तो बस इतनी कि हराम बोलियों से ख़ुद कोबचा लेते हैं बे मक़सद बातों और लायानी कामों से बचाने की तरफ़ तो ध्यान भी नहीं जाता ,अवाम को तो ज़बान के एहतियात से कोई ताल्लुक ही नहीं,रोज़ोशब् वह किया किया कहते हैं, किया किया करते हैं अलएअमान वालहफ़ीज़,आरिफ रोमी क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं؎
अहले दुनिया काफ़िरान मुतअल्लिक़ इंद
रोज़ विशब् दर्ज़िक़ ज़िक़ दरबक़ बक़ इंद
ख़वास का भी कुछ अजीब हाल है अक्सर हैं जिन्हें ज़बान की आफतों की फ़िक्र नहीं ख़्वाह अहबाब के साथ हूँ या अहले वयाल के साथ या दीगर अहले तिजारत वगैरह के साथ,जितनी देर जिस के साथ जो चाहते हैं बात करते हैं,यह ख़याल भी नहीं आता कि हम ला हासिल या बे मक़सद गुफ़्तगू कर रहे हैं,ज़ाइद गुफ़्तगू की कोई फ़िक्र नहीं हालाँकि चाहें तो ब आसानी ज़रूरी गुफ़्तगू पर इकतिफ़ा करकेबाकी औकात ज़िक्र वफ़कर और इबरत के लिए इस्तेमाल करसकते हैं नीज़ अहले वयाल और एज़ा वाक़्रबा और मेहमानों वगैरह के साथ बहुत सी गुफ़्तगू को हसन नियत के साथ हसन बनाया जा सकता है,उलमा को भी चाहिए कि अवाम की तरबीयत करें और इस तरह के मौज़ूआत वानवानात पर तकरीर करें कि जो उन के किए मुफीद हूँ, हज़रत इमाम ग़ज़ाली क़ुद्दिस सिर्रहू की यह नसीहत भी याद रखें और बा मक़सद भी बे महल न हो क्यों कि बहुत से गुफ़्तगू करने वाले बामक़सद बातें करते हैं लेकिन वह अपने महल पर नहीं होती हैं तो इस से खराबी पैदा होती है,किसी बुर्दबार और बे वक़ूफ़ से बहस न करू क्यों कि बुर्दबार तुम्हें दिल से बुरा समझे गा और बे वक़ूफ़ तुम्हें अज़ीयत पहुँचाए गा ,अपने भाई की पीठ पीछे इसी तरह ज़िक्र करू जिस तरह तुम्हें महबूब हो कि वह तुम्हाराजिकर करे और इस की उन बातों को माफ़ कर्दो जिन के बारे में तुम चाहते हो कि वह तुम्हें माफ़ करदे,अपने भाई से ऐसा मामला करू जैसा इस से चाहते हो और इस आदमी की तरह अमल करू जिस को यकीन है कि नेकी पर उसे बदला दिया जाए गा और जुर्म पर सजापाय गा।
(2)फिजूल कलाम
यह भी मज़मूम है और यह बे कलाम में मशगूल होने को भी शामिल है और इस कलाम को भी जो अगरचे फायदा मंद हो लेकिन ज़रूरत से ज़ाइद हो,अगर किसी को कोई बात कहना हो तो वह मुख़्तसर गुफ़्तगू के ज़रिया भी इस का ज़िक्र करसकता है और उसे बढ़ा भी सकता है कि बार बार ज़िक्र करे अगर एक कलिमा से इस का मक़सद हासिल हो सकता हो और वह दो कलिमे ज़िक्र करेतो दूसरा कलिमा फिजूल होगा यानी ज़रूरत से ज़ाइद होगा और वह भी मज़मूम है जैसा कि पहले गुज़र चुका अगरचे इस में कोई गुनाह या ज़रुरना हो, हज़रत अता बिन अबी रबाह फ़रमाते हैं: तुम से पहले लोग फिजूल कलाम को ना पसंद करते थे और इस कलाम को फिजूल समझते थे जो कुरआन पाक ,सुन्नत और अम्र बिलमारूफ़ और नही अन अलमनकर के अलावा हो या वह मआशी जरूरीयात से मुताल्लिक़ हो , किया तुम इस बात का इंकार करते हो कि तुम पर हिफाज़त करने वाले फरिश्ते करामन कातबेन हैं जो दायें बाएं कांधों पर मौजूद हैं इंसान जो गुफ़्तगू करता है इस के पास एक निगरां तैयार बैठा है किया तुम इस से हया नहीं करते कि जब तुम्हारा नामा आमाल सब के सामने खुले गा तो इस में अक्सर बातें वह हूँ गी जिन का दीन और दुनिया से कोई ताल्लुक न होगा।’’
हज़रत मुतरफ़ फ़रमाते हैं अल्लाह तआला की अज़मत का लिहाज रखा करू और कुत्ते गधे के ज़िक्र के वक़्त भी अल्लाह तआला का ज़िक्र न किया करू मसला यह कि अल्लाह तआला उसे हटादे वगैरह।
हज़रत यज़ीद बिन हबीब रहमत अल्लाह अलैहि फ़रमाते हैं:आलम के लिए फ़ित्ना यह है कि उसे सुनने के बजाए बोलना ज़्यादा पसंद है इस लिए जब कोई बोलने वाला मौजूद हो तो सुनने में ज़्यादा सलामती है और कलाम में जीनत दुनिया और कजी ज़्यादा पाई जाती है।
(3)बातिल में मस्रूफ़ियत
बातिल में मस्रूफ़ियत वह गुफ़्तगू है जिस का ताल्लुक गुनाह से है जैसे ऊरतों के खयालात,शराबों और बदकारों की मजालिस,मालदार लोगों की अय्याशी और उन की मज़मूम रस्मों और ना पसंदीदा हालात को ज़िक्र करना यह तमाम उमूर
वह हैं जिन में मशगूल होना जायज़ नहीं बल्कि हराम है,लेकिन बे फायदा बातों में मसरूफ़ होना या फायदा मंद गुफ़्तगू ज़्यादा करना हराम नहीं अलबत्ता छोड़ना ज़्यादा बेहतर है,हां वह शख्स जो बे फायदा गुफ़्तगू कसरत से करे वह बातिल में पड़ने से बे ख़ौफ़ नहीं हो सकता और अक्सर लोग तो अज़ाला ग़म के लिए गुफ़्तगू करते हैं लेकिन उन की गुफ़्तगू लोगों की इज़्ज़तों या बातिल में पड़ने से मुतजाविज़ नहीं होती,बातिल के इक़साम शुमार से बाहर हैं इस लिए उन से बचने की सूरत सिर्फ़ यह है कि दीन और दुनिया के हवाले से ज़रूरी गुफ़्तगू प्राकतिफ़ा किया जाए।
(4)दूसरों की बात काटना औरझगड़ा करना: इस से मना किया गया है,नबी अकर्म ﷺके चंदारशादात मुलाहिजा हूँ: (1)अपने भाई से न झगड़ा करू न मजाक और न वादा करके इस की खिलाफ़ वरज़ी करू(2) दूसरी रिवायत में है: जो शख्स हक़ पर होने के बावजूदझगड़ा छोड़देता है इस के लिए जन्नत के गुर्दोनवाह में घर बनाया जाता है(3)अल्लाह तआला की दी हुई हिदायत के बाद कोई कौम गुमराह नहीं हुई मगर उसे जदल यानी बाहम लड़ाई दी गई(4)कोई बंदा हक़ीक़त ईमान तक इस वक़्त तक नहीं पहुँचता जब तक झगड़ा न छोड़दे अगरचे हक़ पर हो,हज़रत लुक़मान अलैहि अस्सलाम ने अपने बेटे से फ़रमाया:उलमा से न झगड़ना वर्ना वह तुझ से अदावत करें गे,हज़रत उमरफ़ारूक़ आज़म रज़ि अल्लाह अन्हु ने फ़रमाया तीन बातों के लिए इल्म हासिल न करू एक यह कि झगड़ा करू दोम इस के ज़रिया दूसरों पर फख्र करू,सोम दिखावे के लिए औरइलम का हुसूल इस की तलब से हया करते हुए,इस से बेरग़बती करते हुए और जहालत को पसंद करने की वजह से तर्क न करू।
झगड़ा जिसे अरबी में‘‘मरा’’ कहते हैं यह है कि दूसरे की बात पर एतराज किया जाए यानी इस के अलफ़ाज़ या मआनी में खलल डालना या इस के इरादे में खलल डालनावर अगर इस पर एतराज न किया जाए तो यह झगड़े और बहस का तर्क है,तुम जो बात स
सुनो तो देखो अगर वह सच है तो इस की तस्दीक करू और अगर वह बातिल या झूट है और दलील से मुताल्लिक़ नहीं है तो खामोश रहो, दूसरे आदमी पर तान करना भी इस के अलफ़ाज़ में होता है मसलन नहवी ऐतबार से इस में खराबी निकालना या अरबीयत के ऐतबार से गलती निकालना या यह कि इस की तरतीब गलत है और इस में तक़दीम विताख़ीर है बाज़ औकात यह गलती इल्म की कमी केवजह से होती है या ज़बान की लग़्ज़िश से ऐसा हो जाता है जो भी वजह हो इस की गलती निकालना सही नहीं,माना पर एतराज की सूरत यह है कि मसला कहता है यह कलाम हक़ है मगर तुम्हारी नियत ठीक नहीं बल्कि इस में तुम्हारी ग़रज शामिल है अगर यह गलती इल्मी मसला में जारी हो तो बाज़ औकात उसे जदल का नाम दिया जाता है यह भी मज़मूम है बल्कि खामोशी वाजिब है,याकुछ फायदा हासिल करने केलिये सवाल करे इस में इनाद वाइतराज न हो बल्कि नरमी से आगाह करे और बतौर तान न बताये।
मजादला का यह मतलब होता है कि दूसरे के कलाम पर एतराज करके इस को आजिज़ और खामोश कर दिया जाए कि वह जाहिल और कम इल्म है इस की अलामत यह है कि उसे दूसरे अंदाज़ में समझाना अच्छा न लगता हो बल्कि वह यह पसंद करता है कि इस की गलती ज़ाहिर करे ताकि अपनी फ़ज़ीलत और दूसरों की खामी कोवाज़िह करे,इस खराबी से निजात का तरीका यह है कि हर इस बात से खामोशी इख्तियार करे जिस से खामोश होने में कोई गुनाह न हो,इस का बाइस अपने इल्म वफ़ज़ल के इज़हार के ज़रिया दूसरों पर बरतरी जताना और ख़ामियां निकाल कर उन पर रोब जमाना है और यह दोनों नफ़्स की बातिनी ख़ाहिशात हैं जो इस की तक़वियत का बाइस हैं,अफ़ज़लीयत का इज़हार या अपनी तहारत विपाकीजगी का बयान यह बंदे की सुरक्षी का तक़ाज़ा है कि वह बुलंदी और बड़ाई का दावा करता है हालाँकि यह दोनों बातें रबूबियत की सिफ़ात से हैं।
जहां तक दूसरों में कमी निकालने का ताल्लुक है तो यह दरिंदों की फितरत है कि वह दूसरों को फाड़ खाना चाहता है उन्हें अज़ीयत देता और फाड़ कर रख देता और तोड़नाचाहता
है,इस का इलाज यह है कि इस तकबर को तोड़े जिस की वजह से वह इस पर फ़ज़ीलत ज़ाहिर करता है इसी तरह इस दरिंदगी का भी खातमा करदे जो दूसरों की ऐब जोई का बाइस है।(माख़ूज़ अज़ अहया उलउलूम)
हज़रत इमाम क़ुद्दिस सिर्रहू के इस बयान से आज के अहले इल्म को सबक लेना चाहिए।
(5)ख़सूमत: यह भी काबिल मुज़म्मत है और यह जदाल विमरा के अलावा है,मरा दूसरों के कलाम पर तान वितशनीअ को कहते हैं यानी उन में खलल ज़ाहिर किया जाए और मकसूद सिर्फ़ इस की तहक़ीर और अपनी फ़ज़ीलत हो,जदाल मज़ाहिब के इज़हार और उन की तकरीर यानी उन में में बहस विमबाहिसा है जब कि ख़सूमत अपने कलाम पर डट जाना है ताकि इस के ज़रिया दूसरे का माल या हक़ हासिल किया जाए यह कभी इब्तिदा में होता है और कभी एतराज की सूरत में जब कि मरा सिर्फ़ गुज़शता कलाम पर एतराज की सूरत में होताहै,हज़रत आयशा रज़ि अल्लाह अन्हा से मर्वी है:
बेशक अल्लाह तबारक व तआला के यहाँ सब से ना पसंदीदा वह शख्स है जो बहुत झगड़ालू है।(सही बुखारी)
एक और रिवायत में है: जो शख्स बग़ैर इल्म के ख़सूमत में पड़ता है वह हमेशा अल्लाह तआला की नाराजगी में रहता है यहाँ तक कि उसे छोड़ दे।
हज़रत इमाम क़ुद्दिस सिर्रहू ने ख़सूमत की जो आफत ज़िक्र की है ज़बान की आफतों में वह बहुत आम है और इस बुला में अक्सर लोग मुबतला हैं।
(6)फ़ुहश कलामी और गाली गलोच
यह आफत भी बहुत आम है अवाम की तो गिनती ही किया है ख़वास की जुबानें भी इस गंदगी से बहुत आलूदा रहती हैं,मामूली गुस्सा में उलमा और तलबा गाली गलोच पर उतर आते हैं जब कि यह निहायत मज़मूम चीज़ है,हदीस शरीफ़ में है : अपने आप को फ़ुहश कला मि से बचाव बे शक अल्लाह ताली फ़ुहश कलामी और बतकल्लुफ़ फ़ुहश कलाम करने को पसंद नहीं फरमाता है।(मसंद इमाम अहमद)
इसी तरह आका अलैहि अस्सलाम ने जिंग बदर में मक़्तूल होने वाले मुशरिकीन को गाली देने से मना फ़रमाया,इरशाद हुआ: उन लोगों को गाली न दो जो कुछ तुम कहते हो वह उन तक नहीं पहुँचती है बल्कि ज़िंदों को तकलीफ़ पहुँचाते हो,खबरदार! बुरी बात कहना कमेंगी है।(अलमुस्तदरक ललहाकिम)
नीज़ रिवायत में है: मोमिन तान करने वाला,लानत भेजने वाला,फ़ुहश गोई और बद कला मि करने वाला नहीं होता।(अलसंन् अलकुबरा)
(7)ग़ीबत:ग़ीबत और चुगली ऐसी बुलाएं हैं जो अक्सर देनदार कहलाने वालों तक में पाई जाती हैं और अक्सर लोग यह गुनाह करते हैं मगर उन्हें इस के गुनाह होने का एहसास भी नहीं होता,चंद आयात वाहादीस इस की मुज़म्मत में मुलाहिजा फरमाएं:
وَلَا یَغْتَبۡ بَّعْضُکُمۡ بَعْضًا ؕ اَیُحِبُّ اَحَدُکُمْ اَنۡ یَّاۡکُلَ لَحْمَ اَخِیۡہِ مَیۡتًا فَکَرِہۡتُمُوۡہُ (سورۃ الحجرات: ۴۹؍۱۲)
और तुम एक दूसरे की ग़ीबत न करू किया तुम में से कोई एक चाहता है कि अपने मरे हुए भाई का गोश्त खाये और इस से तो तुम घन करते हो।’’
(1)नबी अकर्म ﷺने फ़रमाया: कल उलमुस्लिम अली उलमुस्लिम हराम दमा वमाला वारज़ा’’ यानी हर मुसलमान पर दूसरे मुसलमान का खून,माल और इज्जत हराम है, और ग़ीबत इज्जत से खेलना है।
(2)एक दूसरे से हसद न करू,बाहम दुश्मनी न करू,एक दूसरे की ऐब जोई न करू और न ही एक दूसरे की ग़ीबत करू,ए अल्लाह के बिंदु!भाई भाई बिन जाओ(मुस्लिम)
(3) अपने आप को ग़ीबत से बचाव बे शक ग़ीबत ज़िना से भी ज़्यादा सख्त है क्यों कि एक आदमी ज़िना करता है और तौबा कर लेता है तो अल्लाह तआला इस की तौबा कबूल फ़रमा
लेता है जब कि ग़ीबत करने वाले की बख़शिश विमग़फ़िरत इस वक़्त तक नहीं होती जब तक वह शख्स माफ़ न करदे जिस की ग़ीबत की है।(उलदरालमनसूर)
(3 )हज़रत इंस रज़ि अल्लाह अन्हु रावी की हुज़ूर अकर्म ﷺने फ़रमाया: में शब् मेराज ऐसी कौम के पास से गुज़रा जो अपने चेहरों को अपने नाख़ुनों से छील रहे थे,में ने कहा ए जिबरील अलैहि अस्सलाम यह कौन लोग हैं? उन्हों ने कहा यह वह लोग हैं जो लोगों की ग़ीबत किया करते थे और उन की इज़्ज़तों के पीछे पड़ते थे।(संन अबी दाऊद)मज़ेद तफ़सील के लिए अहया उलऊम देखें।
ग़ीबत यह है कि तुम अपने भाई का ज़िक्र उन अलफ़ाज़ के साथ करू कि अगर इस तक यह बात पहुँचे तो वह उसे ना पसंद करे चाहे इस की बदनी या नसबी ऐब का ज़िक्र करू या अख़लाक़ वामाल के ऐतबार से कोताही बयान करू,इस की दुनयवी खराबी का ज़िक्र करू या उखरवी का,हत्ता कि इस के कपड़े,मकान और जानवर के हवाले से नुक़्स बयान करना भी ग़ीबत है।
ग़ीबत की सूरतों
यह भी याद रहे कि मज़कूरा बाला तरीका पर ज़बान से ज़िक्र करना तो हराम है ही,हज़रत इमाम ग़ज़ाली क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं इस सिलसिला में इशारता गुफ़्तगू सरीह गुफ़्तगू की तरह है और फेअल कौल जैसा है।इशारा करना,आंख मारना,लिखना और हरकत करना वगैरह तमाम ऐसे तरीके जिन से मकसूद समझ में आता हो ग़ीबत में दाखिल और हराम हैं,इस सिलसिले में हज़रत आयशा सिद्दीक़ा रज़ि अल्लाह अन्हा का कौल है वह फरमाती हैं : हमारे पास एक अव्रत आई जब वह वापस जाने लगी तो में ने हाथ से इशारा किया कि इस का कद छोटा है,नबी अकर्म ﷺने फ़रमाया तुम ने इस की ग़ीबत की है।(उलदरालमनसूर)
किसी की नकल भी ग़ीबत में दाखिल है मसला लंगड़ा कर चलता है या जिस तरह वह दूसरा शख्स चलता है तो यह ग़ीबत है बल्कि ग़ीबत से भी ज़्यादा सख्त हैकियों कि इस के ज़रिया दूसरे की तस्वीर कशी ज़्यादा होती है।हुज़ूर ﷺने हज़रत आयशा
सिद्दीक़ा रज़ि अल्लाह अन्हा से फ़रमाया : मुझे यह बात पसंद नहीं कि में किसी दूसरे की नकल उतारों और मुझे फलां फलां चीज़ हासिल हो।
इसी तरह किताबत के ज़रिया भी ग़ीबत होती है क्यों कि कलम दो ज़बानों में से एक ज़बान है,अपनी तसनीफ़ में किसी मुईन आदमी का ज़िक्र करना और इस के कलाम की बुराई बयान करना भी ग़ीबत है अलबत्ता इस के ज़िक्र की कोई हाजित हो तो जायज़ है मसला यों कहे कि कुछ लोग इस तरह कहते हैं तो यह ग़ीबत नहीं है या यों कहे कि वह बाज़ लोग जिन का आज मेरे पास से गुज़र हुआ या जिन लोगों को आज में ने देखा हां यह इस वक़्त ग़ीबत है जब मुखातिब इस से किसी मुईन शख्स के बारे में समझ जाए क्यों कि उसे यह बात समझाना ही मना है और अगर मुईन शख्स का इल्म न हो पारहा हो तवजोयज़ है।
ग़ीबत सन कर खुश हो ना या इस की तरफ़ कान लगाना भी ग़ीबत है वह इस लिए खुशी वित्ताजब का इज़हार करता है कि ग़ीबत करने वाला होता है और ज़्यादा ग़ीबत करने के लिए तैयार होता है,गोया इस तरीके से वह ग़ीबत करवाता है मसला वह कहता है ताजब है हम तो ऐसा नहीं जानते थे,में तो अब तक उसे अच्छा आदमी समझता रहा,में तो उसे कुछ और ही समझता रहा।अल्लाह तआला हमें इस आज़माइश से बचाए यह सब कुछ ग़ीबत करने वाले की तस्दीक है और ग़ीबत की तस्दीक भी ग़ीबत होती है बल्कि खामोश रहने वाला भी ग़ीबत में शरीक होताहै।(अहया उलउलूम)