अध्याय 34 में से 54पृष्ठ 403–413
अलामात ज़हद
हज़रत इमाम क़ुद्दिस सिर्रहू ने ज़हद की तीन अलामतें ज़िक्र फरमाएं:
1। मौजूदा चीज़ पर खुश न हो और न ही गैर मौजूद पर ग़मगीन हो जैसे इरशाद ख़ुदावंदी है:
لِّکَیۡلَا تَاۡسَوْا عَلٰی مَا فَاتَکُمْ وَ لَا تَفْرَحُوۡا بِمَاۤ اٰتٰىکُمْ (سورۃ الحدید: ۵۷؍۲۳)
तर्जुमा: इस लिए कि ग़म न खाओ इस पर जो हाथ से जाए और खुश न हो इस पर जो तुम को दिया।’’
बल्कि इस का ब्रअक्स हो यानी मौजूद माल पर दुख हो और जो नहीं मिला इस पर खुश।
2। इस के नज़दीक मदह व जिम दोनों बराबर हूँ। पहली माल में ज़हद की अलामत है और दूसरी जाह में।
3। अल्लाह तआला से इंस व मुहब्बत हो और इस के दिल पर इताअत ख़ुदावंदी की हलावत और मिठास ग़ालिब हो क्यों कि दिल हलावत मुहब्बत से खाली नहीं होता या तो दुनिया की होगी या अल्लाह तआला की और उन दोनों का ताल्लुक दिल से ऐसा होता है जैसे प्याले से पानी और हुआ का। जब पानी दाखिल होता है तो हुआ खारिज हो जाती है दोनों जमा नहीं होते। जिस को अल्लाह तआला से सही मुहब्बत होगी उसे इस के गैर से नहीं होगी।’’
आज सूफ़िया कराम के तरीका को ज़िंदा करने की ज़रूरत है। निहायत बालिग नज़री से उन्हों ने एक नताम मुरत्तिब किया कि दलों को दुनिया व माफ़ीहा की मुहब्बत व रगबत से कैसे आजाद किया जा सकता है ताकि वह अपने ख़ालिक़ जल व अला के हवाले हो सकें।
यह नुक्ता हमेशा याद रखें कि दुनिया की कोई चीज़ नफ़्स की ख्वाहिश और इस की मनफ़ात
के लिए लेना और चीज़ है और बतौर हाजित लेना और चीज़ है।
हज़रत इमाम क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं: दुनिया से अल्लाह तआला की तरफ़ फिरने का मतलब यह है कि इंसान का दिल मुकम्मल तौर पर अल्लाह तआला के ज़िक्र व फ़िक्र की तरफ़ मुतवज्जा हो और यह इसी वक़्त हो सकता है जब इंसान दुनिया में रहे और रहने और बका के लिए जरूरीयात नफ़्स का होना ज़रूरी है और दुनिया से जब तुम इसी क़द्र लोगे कि बदन से इस को हलाक करने वाले उमूर दौर करू और तुम्हारी ग़रज बदन से इबादत पर मदद लेना हो तो तुम गैर ख़ुदा में मशगूल नहीं करार दिए जाओगे क्यों कि जो चीज़ किसी चीज़ तक पहुँचने का वसीला हो वह इसी से होती है। तुम अपने बदन को खाना पीना इस लिए दो ताकि भूक और प्यास से वह हलाक न हो जाए, लिबास और रिहायश इस लिए मुहैया करू ताकि हलाकत ख़ेज़ गर्मी और सर्दी से बचाए। पस तुम ज़रूरत की मिक़दार पर किफायत करू और उसे लज़्ज़त पहुँचाने का क़सद न करू, बल्कि इबादत पर कुव्वत पहुँचाओ।(माख़ूज़)
हसन नियत
हदीस शरीफ़ में फ़रमाया गया: डेनुमा अलामाल बालनियात (आमाल का सवाब नीयतों पर है) कोई भी अमल बग़ैर हसन नियत के काबिल सवाब नहीं होता। फ़राइज़ व वाजिबात का सवाब भी नियत पर मौक़ूफ़ है हतिया कि मुबाहात भी हसन नियत से हसन, क़बह नियत से क़बीह हो जाते हैं। हसन नियत से बीवी के मुँह में लुक़मा रखना भी काबिल सवाब है। दर असल इसी नियत को संभालने की ज़रूरत है। नियत में हसन होगा, रज़ाए इलाही का क़सद होगा तो लज़्ज़त भी जो नफ़्स को हासिल होगी बुरी नहीं।
हज़रत इमाम क़ुद्दिस सिर्रहू ने इस सवाल का कि जब आदमी भूक की हालत में होता है खाना खाता है तो लाजिमी तौर पर उसे लजीज मालूम होता है यानी यह ज़हद के खिलाफ़ है, फ़रमाते हैं कि इस से तुम्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचता जब कि तुम्हारा मक़सद लज़्ज़त हासिल करना न हो क्यों कि ठंडा पानी पीने वाले को भी लज़्ज़त हासिल होती
है, लेकिन इस का मक़सद तो प्यास की तकलीफ़ को ज़ाइल करना है और जो शख्स अपनी हाजित को पूरा करता है उसे इस से राहत पहुँचती है, लेकिन इस के नज़दीक यह इस का मकसूद व मतलूब नहीं । लिहाज़ा इस का दिल इस की तरफ़ मुतवज्जा नहीं होता। इंसान बाज़ औकात रात को इबादत के लिए खड़ा होता है तो उसे सहरी की खुश ग्वार हुआ और परिंदों की आवाज़ से राहत पहुँचती है, लेकिन इस किस्म की राहत केलिये कोई मुनासिब जगह तलाश न करे तो किसी क़सद के बग़ैर जो कुछ इस तक पहुंचेगा उसे नुकसान नहीं पहुँचाता।
औलीए कराम का एहतियात
अल्लाह तआला से डरने वाले लोगों में ऐसे लोग भी थे जो ऐसी जगह तलाश करते जहां बाद नसीम न पहुँचे क्यों कि इस के ज़रिया पहुँचने वाली राहत से डरते थे और उन्हें दिल के साथ इस का खतरा रहता था, उन्हें डर था कि इस तरह दुनिया से कहीं इंस न हो जाए और अल्लाह तआला के इंस में कमी आजाए। यही वजह है कि हज़रत दाऊद ताईरहमत अल्लाह अलैहि का एक नंगा कुँआँ था जिस का पानी धूप पड़ने से गरम हो जाता था, वह गरम पानी पीते और फ़रमाते: जो ठंडे पानी की लज़्ज़त हासिल करता है इस के लिए दुनिया को छोड़ना मुश्किल हो जाता है। पस एहतियात से काम लेने वाले इस तरह डरते थे। उन सब सूरतों में एहतियात ही मुनासिब है, क्यों कि यह अगरचे मुश्किल है, लेकिन अब्दी नेअमतों के लिए थोडी मुद्दत तक परहेज़ करना अहले मार्फत पर भारी नहीं होता है। वह शरई सियासत के साथ अपने नफ़सों को मग़्लूब करते हैं और दीन व दुनिया के दरमियान इख़तिलाफ़ की पहचान करने के लिए यकीन की इस रसी को मजबूती से पकड़ते हैंरज़ि अल्लाह अन्हुम।
अहकाम ज़हद
आखिर में ज़हद के अहकाम हज़रत इमाम क़ुद्दिस सिर्रहू की ज़बान से समाअत फ़रमा लें, फ़रमाते हैं कि ज़हद के अहकाम फर्ज़, नफ़ल और सलामती में तकसीम होते हैं। फर्ज़ ज़हद हराम से बचने में है और नफ़ली ज़हद हलाल में होता है और सलामती शुबहात से इजतिनाब में है। वरा व तक़्वा के दर्जात भी ज़हद में दाखिल हैं
जिन को तफ़सील से अहया उलउलूम के हलाल व हराम के बाब में आप ने ज़िक्र फ़रमाया है। और खुफिया उमूर के हवाले से देखा जाए तो उन की कोई इन्तहा नहीं, बिलख़सूस रियाकारी के खुफिया उमूर तो बेशुमार हैं और उन पर स्वाए बड़े बड़े उलमा के कोई मतला नहीं हो सकता है, बल्कि ज़ाहिरी अम्वाल में भी ज़हद के दर्जात गैर मुतनाही हैं। ग़रज़कि ज़ाहिरी और बातिनी तौर पर ज़हद के दर्जात बेशुमार हैं और सब से कम दर्जा हर मुश्तबा चीज़ में ज़हद इख्तियार करना।’’ ज़हद की मुकम्मल तफ़सील केलिये देखिए अहया उलउलूम शरीफ़, जिल्द चहारम।
तोकल (आठवां मक़ाम)
फ़ज़ाइल, क़ुरआनी आयात:
۱۔ وَعَلَی اللہِ فَتَوَکَّلُوۡۤا اِنۡ کُنۡتُمۡ مُّؤْمِنِیۡنَ (سورۃ المائدہ: ۵؍۲۳)
तर्जुमा: और अल्लाह ही पर भरोसा करू अगर तुम्हें ईमान है।
2। वाली अल्ला फलेतविक्षल अलमतुकेलोۡन (सूरत इब्राहिम: 14/12)
तर्जुमा: और भरोसा करने वालों को अल्लाह ही पर भरोसा चाहिए।
۳۔ وَ مَنۡ یَّتَوَکَّلْ عَلَی اللہِ فَہُوَ حَسْبُہٗ (سورۃ الطلاق: ۶۵؍۳)
तर्जुमा: और जो अल्लाह पर भरोसा करे तो वह उसे काफ़ी है।
4। अन् अल्ला यहब अलमतुकेलीۡन (सूरत आल इमरान: 3/159)
तर्जुमा: बे शक तोकल वाले अल्लाह को प्यारे हैं।
यह चंद आयात हैं जिन से बासानी समझ सकते हैं कि सच्चे मोमिन होने की ख़सलत अल्लाह पर तोकल है नीज़ जिसे भरोसा और तोकल करना है वह अल्लाह ही पर करे, अल्लाह पर तोकल हर मुश्किल का हल है। फिर यह कितनी बड़ी दौलत है कि अल्लाह तआला तोकल करने वालों से मुहब्बत करता है, यह कितनी बड़ी नेमत है कि अल्लाह मुहब्बत करे।
1। हज़रत इब्न अब्बासरज़ि अल्लाह अन्हुमा रावी कि रसूल अल्ला ﷺ ने फ़रमाया:मेरी उम्मत के सत्र हजार अफराद बग़ैर हिसाब जन्नत में दाखिल हूँ गे, जो ऐसे हूँ गे उन की सिफ़त यह है: हम अलज़ीन ला यस्तरक़ून विला युत्तेरोन व अला रब्लहम युतोक्लोन (जो झाड़ फूँक नहीं करते, फाल के लिए चिड़िया नहीं उड़ाते और अपने रब पर तोकल करते हैं)
हदीस के उन अलफ़ाज़ की शरह करतेहुए हज़रत मिला अली क़ारीरहमत अल्लाह अलैहि फ़रमाते हैं कि वह जो अल्लाह ही पर भरोसा और तोकल करते हैं इस तमाम में जो वह करते हैं और जो छोड़ते हैं । हज़रत अल्लामा एनीरहमत अल्लाह अलैहि ने फ़रमाया कि दोनों जमा ‘लायस्तरक़ून व ला युत्तेरोन’ के दरमियान जमा करना चों कि इस निशानी से हैं जिन से इस्तेआब मुराद लिया जाता है जैसे कहा जाता है ‘‘लायनफा ज़ैद व ला अमरो’’ इस का मानी होता है कि कोई भी इंसान नफा नहीं पहुँचा सकता है। मतलब यह हुआ कि वह किसी भी मामले में कोई दुनयवी असबाब इख्तियार नहीं करते।
साहिब अलनहाय ने फ़रमाया कि यह उन ओलिया की सिफ़त है जो दुनिया के असबाब और इस के अवायक़ से ऐसा आराज़ करते हैं और मुँह फेरते हैं कि इस के इलायक व मुताल्लिक़ात की तरफ़ बिलकुल इलतिफ़ात नहीं करते। यह ख़वास का दर्जा है जहां तक उन का गैर नहीं पहुँच सकता। लेकिन अवाम तो उन के लिए दुआ व इलाज और झाड़ फूँक वगैरह की रुखसत है और जिस ने परहेज़ किया और अल्लाह तआला से इस की कुशादगी चाहि दुआ के ज़रिया तो वह भी ख़वास और ओलिया से है और जिस ने सब्र नहीं किया तो इस के लिए झाड़ फूँक और दुआ की रुखसत है।
इसी हदीस में यह भी है कि आका ﷺ ने यह फ़रमाया तो हज़रत अक्काशा इब्न महद्दिन खडे हो गए, अर्ज़ किया: या रसूल अल्ला ﷺ, अल्लाह से दुआ कर दें कि हमें
उन्ही (सत्र हजार) से बना दे, आप ने दुआ फ़रमाई: अललहम् अजाला मुंहम (ए अल्लाह अक्काशा को उन्ही से बना दे) फिर दूसरे साहिब ने खडे होकर अपने लिए दुआ चाहि, आका ﷺ ने फ़रमाया: अक्काशा तुम पर सबक़त ले गए।(बुखारी व मुस्लिम)
हदीस कितनी साफ व सरीह है कि सब लोग एकसां नहीं हैं, एतिमाद में मुख़तलिफ़ मंजिलें हैं, अहकाम भी सब जुदा जुदा हैं। हज़रत मिला अली क़ारी अलैहि रहमत अलबारी ने इसी मक़ाम पर बयान फ़रमाया कि हज़रत अबू बुकर सिद्दीक़रज़ि अल्लाह अन्हु ने अपना सारा माल सदक़ा कर दिया तो हुज़ूर ﷺ ने कुछ मलामत न की और एक दूसरे साहिब को कुछ मिक़दार सोना लाने पर मलामत की है।
2। हज़रत उम्र फ़ारूक़रज़ि अल्लाह अन्हु ने फ़रमाया कि आका ﷺ को में ने सुना कि फ़रमाते थे कि अगर तुम अल्लाह पर ऐसा तोकल करू जैसा कि इस का हक़ है तो वह तुम्हें इस तरह रोज़ी देगा जिस तरह परिंदों को देता है कि वह सुबह को भूके होते हैं और शाम को शिकम सैर होकर लौटते हैं।(तिरमिज़ी व इब्न माजा)
3।हज़रत अमरो इब्न उल्लासरज़ि अल्लाह अन्हु ने कहा कि रसूल अल्ला ﷺ ने फ़रमाया कि इंसानी दिल के हर जंगल में एक शाख है तो जो अपने दिल को उन तमाम शाखों के पीछे डाल दे अल्लाह प्रवाह नहीं करेगा कि किस जंगल में हलाक करदे और जो अल्लाह पर तोकल करे अल्लाह उसे घाटियों से बचाएगा।
4।हज़रत अबू हुरीरारज़ि अल्लाह अन्हु ने कहा: एक , मर्द अपने घर वालों के पास गया, जब उन की मुहताजी देखी तो जंगल की तरफ़ निकल गया, जब इस की बीवी ने यह देखा तो वह चुकी की तरफ़ उठी, उसे रखा और तंवर की तरफ़ गई, उसे झोंक दिया, फिर बोली: ए अल्लाह हमें रोज़ी दे तो इस ने देखा कि प्याला भर गया है और वह अव्रत तंवर की तरफ़ गई तो उसे भरा हुआ पाया। फ़रमाते हैं: फिर शौहर लौटा तो कहा: किया तुम ने मेरे पीछे कुछ पाया, इस की अव्रत ने कहा: हां, अपने रब की तरफ़ से, और वह शख्स चुकी की तरफ़
खड़ा हुआ। यह वाक़ा नबी ﷺ से अर्ज़ किया गया तो आप ने फ़रमाया: यक़ीनन अगर वह शख्स उसे न उठाता तो वह चुकी कयामत तक घूमती रहती।(अहमद)
साहिब मुश्कात ने बाब तोकल व सब्र में यह वाक़ा बयान किया।मालूम हुआ तोकल करने वालों को बुला असबाब ग़ैब से रोज़ी मिलती है।
5। आप ﷺ फ़रमाते हैं: जो शख्स सब से ताल्लुक तोड़ कर अल्लाह तआला से रिश्ता जोड़ता है अल्लाह तआला उसे हर मशक्कत में किफायत करता है (और जरूरतों को पूरा करता है) और उसे वहाँ से रिज़्क़ अता फरमाता है जिस जगह का उसे गुमान भी नहीं होता और जो शख्स दुनिया का हो रहता है अल्लाह तआला उसे दुनिया के सुपुर्द कर देता है।(शोब अलायमान)
6। जो शख्स इस बात को पसंद करता है कि वह लोगों में सब से ज़्यादा मालदार हो जाए तो उसे अपने पास मौजूद माल के मुकाबले में इस चीज़ पर ज़्यादा एतिमाद होना चाहिए जो अल्लाह तआला के पास है।
मानी व हक़ीक़त
लफ़्ज़ तोकल ‘विकल’ या ‘वकुल’ से बना है जिस के मानी हैं अपना काम दूसरे के सुपुर्द कर देना, इसी से तकलान है। शरा में तोकल नाम है अपने कामों को ख़ुदा के हवाले करने का। तोकल दो किस्म का है। (1)तोकल अवाम, असबाब पर अमल करके नतीजा ख़ुदा के हवाले कर देना (2)तोकल ख़वास, असबाब छोड़ कर मुसबब अलासबाब पर नज़र करना।
हज़रत इमाम ग़ज़ाली क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि तोकल ईमान का एक बाब हैऔर ईमान के तमाम अबवाब इल्म, हाल और अमल से बनते हैं, इसी तरह तोकल भी। इल्म असल है, अमल नतीजा है और हाल से मुराद ख़ुद तोकल है।
मालूम हो कि तोकल की तारीफ़ और हक़ीक़त में बुजुर्गों के बहुत अक़्वाल हैं जैसे ज़हद वगैरह में हैं। हज़रत इमाम क़ुद्दिस सिर्रहू के नज़दीक हर एक ने अपने ज़ाती
मक़ाम के हवाले से बात करते हुए तोकल की तारीफ़ की है जिस तरह कि अहले तसव्वुफ़ की आदत है। फिर आगे चल कर फ़रमाते हैं: अगर कश्फ़ या पुख्ता अकीदे के ज़रिया तुम्हारे दिल में यह साबित हो जाए कि अल्लाह तआला के सिवा कोई फ़ाइल नहीं और इस के साथ साथ तुम्हारा यह एतिक़ाद भी हो कि वह बंदों की किफायत के लिए मुकम्मल इल्म और कुदरत रखता है, फिर इस का लुत्फ़ व इनायत और रहमत तमाम बंदों को इजतिमाई और इन्फ़िरादी तौर पर शामिल है और इस की कुदरत से बढ़ कर कोई कुदरत नहीं और न ही इस के इल्म के उपर कोई इल्म है। इसी तरह इस की इनायत व रहमत से बढ़ कर कोई रहमत व इनायत नहीं तो ला मुहाला तुम्हारा दिल सिर्फ़ इसी ज़ात पर तोकल करेगा और दूसरे की तरफ़ बिलकुल तवज्जो नहीं करेगा, बल्कि अपनी ज़ात व कुव्वत पर भी नज़र न करेगा।
दर्जात तोकल:
1। पहला दर्जा यह है कि अल्लाह तआला और इस की कफ़ालत व इनायत के सिलसिले में इस का हाल वही हो जो दलील पर एतिमाद का होता है।
2।दूसरा दर्जा अल्लाह तआला के साथ इस की हालत इस तरह हो जिस तरह बचे की इस की मां के साथ होती है कि वह इस के सिवा न किसी को जानता है न ही किसी दूसरे से फरियाद करता है और इसी पर एतिमाद करता है, जब देखता है इस से लिपट जाता है और किसी हाल में छोड़ता नहीं, अगर मां की अदम मौजूदगी में कोई बात उसे पेश आती है तो इस की ज़बान पर सब से पहले मां ही का नाम आता है।
3। दर्जा सोम जो सब से आला है वह यह कि बंदा अल्लाह तआला के सामनेएसे हो जैसे मुर्दा बदस्त गुस्साल,वह यकीन रखे कि मुझे कुदरत अज़लेय हरकत दे रही है, यह वह शख्स है जिसे यकीन है कि हरकत देने वाला कुदरत, इरादे, इल्म और दीगर तमाम सिफ़ात का मालिक अल्लाह तआला है।
अब रह गई यह बात कि उन अहवाल में बंदे के साथ तदबीर व असबाब का ताल्लुक बाक़ी रहता है या नहीं? तो इस का जवाब यह है कि तीसरा दर्जा तो तदबीर की बिलकुल नफ़ी करता है जब तक यह हालत बाक़ी हो, बल्कि ऐसा आदमी हैरान व परेशान शख्स की तरह होता है। और दूसरे दर्जे में तदबीर की तो नफ़ी होती है, अलबत्ता अल्लाह तआला से फरियाद करना और सवाल करना बाक़ी रहता है जैसे बच्चा अपनी मां से ताल्लुक रखता है। और पहले दर्जे में तदबीर व इख्तियार की बिलकुल्लिया नफ़ी नहीं होती है जैसे कोई मुकुल शख्स अपने मुक़द्दमात में वकील पर तोकल करता है, लेकिन वकील जिस तदबीर की तरफ़ इशारा करे उसे अपनाता है और इख्तियार करता है या उसे तजुर्बे से मालूम होता है कि यह वकील की आदत है और वह वाज़िह इशारा नहीं करता है।
चार अहम उमूर
बंदे की जुमला हरकात का मकसूद या तो हुसूल नफा होगा या ख़ुद को नुकसान से बचाना या जरुर को दौर करना। उन चारों उमूर में तोकल के शराइत और दर्जात हैं जो शरई दलायल के साथ मुज़य्यन हैं।
अम्र अव्वल
यानी बफ़ा हासिल करना, ख़याल रहे कि इस के असबाब तीन दर्जात पर हैं या तो क़तई व यक़ीनी हूँ गे या ज़न ग़ालिब जिन पर एतिमाद किया जाता है या मौहूम हूँ गे यानी उन का सिर्फ़ वहम होगा जिस पर नफ़्स मुकम्मल एतिमाद नहीं करता और न ही मुतमइन होता है। पहला दर्जा जो क़तई है उन असबाब के मसल है जिन के साथ मुसबबात अल्लाह तआला की तक़दीर और मशीयत के साथ इस तरह वाबस्ता और मरबूत हैं कि वह राबिता हमेशा क़ायम रहता है जैसे खाना सामने रखा हो और तुम भूकेहो, खाने की हाजित है,लेकिन तुम इस की तरफ़ हाथ नहीं बढ़ाते, बल्कि कहू कि में तो मुतविकल हूँ, अल्लाह पर तोकल है और तोकल की शर्त है कि हरकत और कोशिश छोड़ दी जाए। इसी तरह चबाना और दोनों जबड़ों को मिलाना और फिर निगलना भी एक काम है और यह तोकल के खिलाफ़ है।’’
तो ऐसा सूचना महज़ पागल पन है, तोकल का इस से कोई ताल्लुक नहीं। अगर तुम्हारे
जेहन में यह हो कि अल्लाह तआला रोटी के बग़ैर सैर कर देगा या रोटी ख़ुद उठ कर तुम्हारे मुँह तक आजाएगी या किसी फरिश्ते को हुक्म देगा कि रोटी इस के मुँह तक पहुँचा दो। ऐसा सूचना इस बात की दलील है कि तुम अल्लाह तआला के तरीके से नावाकिफ़ हो।
इसी तरह तुम जमीन में कुछ बोओ न और तमा रखो कि बग़ैर बीज के सब्जी हक़ तआला उगाएगा या हम बस्तरी के बग़ैर तुम्हारी बीवी बच्चा जनेगी तो यह सब बातें खिलाफ़ अक्ल हैं, इस तरह की बातें बे शुमार हैं। इस मक़ाम पर तोकल अमल के साथ नहीं,बल्कि हाल और इल्म के साथ होता है। इल्म यह कि बंदा जान ले कि अल्लाह तआला ने खाना, हाथ,दाँत और कुव्वत व हरकत पैदा फ़रमाई है और वही तुम्हें खिलाता और पिलाताहै और हाल का मतलब यह कि तुम्हारा दिल अल्लाह तआला पर एतिमाद करे और उसे इतमीनान व सुकून हो, हाथ और खाने पर न हो। हाथ पर एतिमाद हो भी कैसे सकता है जब कि बाज़ औकात वह खुश्क हो जाता है, फ़ालिज का शिकार हो जाता है और ताकत पर कैसे एतिमाद कर सकते हैं जब कि बाज़ औकात अक्ल ज़ाइल हो जाती है जिस से कुव्वत व हरकत भी बातिल हो जाती है या खाने के वजूद पर कैसे एतिमाद हो सकता है जब कि तुम पर कोई ग़ालिब आजाए या मूज़ी व मोहलिक जानवर जैसे साँप वगैरह आजाए तो खाना छोड़ कर भाग जाना पड़े।
दूसरे वह असबाब जो यक़ीनी नहीं, लेकिन ग़ालिब गुमान यही है कि मुसबबात उन के बग़ैर हासिल नहीं होते जैसे वह शख्स जो शहरों और काफिलों से दौर हो जाए और ऐसे जंगल में सफर कर रहा हो जहां लोगों की आमद व रफ्त बहुत कम हो और वह ऐसे सफर में ज़ाद राह साथ न ले तो यह तोकल नहीं है, बल्कि सल्फ का तरीका यह था कि वह सफर में ज़ाद राह ले जाते थे और जब अल्लाह तआला की ज़ात पर भरोसा हो, सामान सफर पर न हो तो ऐसी सूरत में सामान साथ ले जाने में तोकल ज़ाइल नहीं होता और अगर ले जाए तो यह भी जायज़ है और यह तोकल का आला मक़ाम है।
तीसरा दर्जा यह है कि ऐसे असबाब इख्तियार करे जिन के बारे में वहम हो कि यह
मुसबबात तक ले जाते हैं , ज़ाहिर पर एतिमाद नहीं होता जैसे माल हासिल करने के लिए बारीक तदाबीर इख्तियार करना। यह मुतवहम असबाब इख्तियार करना तोकल के तमाम दर्जात से बंदे को खारिज कर देता है, ऐसा शख्स किसी भी मरहले में तोकल करने वाला शुमार न होगा। आम लोगों का यही हाल है यानी वह लोग जो जायज़ माल जायज़ तरीके से बारीक हियलों से हासिल करते हैं और माल को ऐसे तरीके से लेना जो शुबहा वाला है यानी इस का हलाल व हराम होना मुश्तबा है तो माल या इस के तरीका हुसूल के मुश्तबा होने की सूरत में माल लेना इंतिहाई हरीस होने की अलामत है और असबाब पर मुकम्मल एतिमाद की निशान दही करता है। इस सूरत में तोकल बातिल है।