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अध्याय 44 में से 54पृष्ठ 532–543

आदमियों के इक़साम

आदमी तीन तरह के होते हैं (1)मुफीद जो दूसरों को इल्मी और अमली फायदा पहुँचा सकता है (2)मुस्तफ़ीद जो अभी तालीम व तरबीयत में इस्तिफ़ादा का मुहताज है (3)मुनफ़रद जो ख़ुद ज़रूरी तालीम वितरबैत से आरास्ता है और दूसरों को फायदा नहीं पहुँचा सकता है अववल दो किस्म के लोगों के लिए ख़लवत नाजायज़ है ।तीसरे के लिए जायज़ है ।

ख़याल रहे कि इंसान को इल्म ज़ाहिर की भी ज़रूरत है और बातिन की भी इमाम अहमद रज़ाखान रहमत अल्लाह अलैहि ने तसव्वुफ़ बे इफ़रात को फर्ज़ उएन लिखा यानी हरमुसलमान मर्द व अव्रत आक़िल व बालिग पर फर्ज़ है यह सिर्फ़ आला हज़रत अलैहि अर्रहमा की ही बात नहीं बल्कि आम उलमा विमहक़्क़ीन ने भी उसे फर्ज़ व लाज़िम करार दिया है अब जो शख्स उन उलूम से

लोगों को फायदा पहुँचा सकता है लोग इस के मुहताज हैं इस मामला में इस शहर और दिया रमें फायदा पहुँचाने वाला है नहीं लहज़ा ऐसा शख्स ख़लवत इख्तियार कर के ख़ुद भी सवाब से महरूम रहे गा और दूसरों का तो बहुत बड़ा ख़सारा होगा।इसी तरह जवाभी इस्तिफ़ादा के मरहले में है इस का भी हाल है ख़ास कर आज के दौर में जहालत ग़ालिब है जो अहले इल्म कहलाते हैं और मदारिस से आलमीयत व फ़ज़ीलत के अस्नाद की डिग्रियां ले कर निकल रहे हैं उन का भी हाल अजीब है ज़रूरी अक़ाइद व आमाल से वाकिफ़ नहीं फ़राइज़ व वाजिबात नहीं जानते और संन व मुस्तहबात तो बड़ी चीजें हैं ग़रज कि इस क़द्र इन्पतात का दौर है कि बयान से बाहर है ।

उलूम बातिन के हामिलियन जो तसव्वुफ़ व सुलूक से वाकिफ़ हैं और मनाज़िल व मराहिल सुलूक तै करा सकते हैं वह भी अन्क़ा हैं फिर जिन को इल्म ज़ाहिर है भी और वह लिया कत् रखते हैं तो अक्सर गैर तरबीयत याफताह और अमल के मैदान में बे पनाह कमजोर हैं नमाज़ों की पाबंदी नहीं अक्सर दुनिया दारी में अ शतग़ाल रखते हैं इस के बावजूद दूसरों की तालीम व तरबीयत की कोई फ़िक्र नहीं पहले के उलमा थे कि उन की मजालिस में बैठने वाले और उन की ज़बान से ज़बान से मिसाइल सन सन कर अहले इल्म होजाते थे उन उलमा की मजालिस इल्म व हिदायत पर होती थीं उन्हें अवाम और ख़वास दोनों की फ़िक्र थी जब कि इस दौर में सही तालीम व ताल्लुम और तरबीयत की बे पनाह जरूर त है अहले बातिल शहर शहर क़र्या क़र्या घूम रहे हैं हक़ से फेर रहे हैं जहालतों से खूब फायदे अठारहे हैं।

अवाम है कि उलमा से उन की दिलचस्पियाँ ख़त्म होती जा रही हैं उन के अगर कुछ रवाबित भी हैं , मजालिस उलमा में आना जाना भी तो अपनी दुनयवी मुफ़ादात के लिए मसला तावीजात वगैरह के लिए उलमा हैं कि अवाम की जरूरतों के भी फायदे नहीं उठा पा रहे हैं कि इसी के ज़रिया उन्हें नसीहत करें बल्कि एक तरह के ख़िदमात अंजाम देने वाले उन चीजों को तहसील माल व ज़र का ज़रिया बनाए हुए हैं जो यह काम कर भी रहे

हैं उन का औसत बहुत कम है लहज़ा गुज़ारिश है कि जो इल्म व अमल का फायदा पहुँचा कर अक़ाइदो आमाल की इसलाह का काम कर सकते हैं वह ख़ुदा के वास्ते ख़ुद को माफ़ न रखें बल्कि ज़्यादा ध्यान दें और आज के उलमा व मशाइख़ को भी इस काम की रगबत दिलाएं और अवाम को भी तरग़ीब दें ।हां तरबीयत करने वालों से अर्ज़ है कि वह ऐसे पुख्ता और बा अमल तक़्वा व तहारत के धनी अफराद तिया र करें जिन में अपना असर डालने की भर पुर सलाहीयत हो और वह दूसरों का असर जिल्द कबूल न करें ।वह दुनिया दारों की बिल्डिंगें, आराईशें और राहतों को देख कर मुतास्सिर न हूँ उन्हें अपनी आंखों कानों और ज़बानों पर भर पुर काबू हो दिल भी मजबूत होऔर काश ज़िक्र व फ़िक्र और रूहानियत के हामिल हूँ तो किया कहना ऐसे अफराद बग़ैर तसफ़ीया क़ल्ब और तज़किया नफ़्स बहुत मुश्किल है कि तैयार होसकीं ।बह्र हाल ऐसे मुफीद और मुस्तक़ीम हज़रात के लिए ख़लवत किसी तरह मुनासिब नहीं जो लोग आखिर त के ख़ाहां हूँ उन्हें भी चाहिए कि लायक अफराद चुनें उलमा और मशाइख़ में उन्हें की सोहबत इख्तियार करें जिन से आख़िरत मिल सकती हो , इल्म व अमल की बरकतें हासिल होसकती हूँ और तसव्वुफ़ व रूहानियत का नूर मयस्सर आसकता हो।

2।इख़तिलात का दूसरा फायदा नफा पहचाना और नफा हासिल करना है माल कमाना नहीं दीन वगैरह इख़तिलात से ताल्लुक रखता है अब अगर वह शरीअत के मुताबिक चले तो मेल ज्वल में काफ़ी तकलीफ़ उठाना पड़े गी अगर इस के पास माल हो और इस पर सब्र कर के किफायत कर सकताहु तो इस के लिए तन्हाई अफ़ज़ल है क्यों कि आम तौर पर तिजारत के रास्ते शरीअत की ना फरमानी के बग़ैर बंदहोते हैं और अगर इस का मक़सद यह हो कि माल कमा कर सदक़ा करे गा और फिर हलाल तरीके पर कमाए और सदक़ा करे तो यह इस ख़लवत से अफ़ज़ल है जो नफ़ली इबाद त के लिए हो ।लेकिन जब ख़लवत मार्फत अलहि के लिए और उलूम शरएहि की पहचान के सिलसिले में हो तो कसब अफ़ज़ल नहीं इसी तरह जब ख़लवत का मक़सद अल्लाह की तरफ़ तवज्जो और ज़िक्र व फ़िक्र के लिए अलैहदगी इख्तियार की जाए ताकि

कश्फ़ व बसीरत हासिल हो महज़ वहम और खयालात फ़ासदा न हूँ तो ख़लवत अफ़ज़ल है।

जहां तक लोगों को नफा पहुँचाने का ताल्लुक है तो यह नफा रसानी माल से होगी या ज़िक्र से तो ज़ाहिर है कि किसी अजरत के बग़ैर इख़लास के साथ मुसलमानों की हाजितों को पूरा करने का सवाब मिलता है और यह इख़तिलात ही से हो सकता है जो शख्स हदूद शरीअत की पाबंदी के साथ ऐसा कर सके तो यह तन्हाई और ख़लवत से अफ़ज़ल है जब कि ख़लवत नवाफ़िल में मशगूलियत के लिए हो और बदनी इबादत तक ही महदू दहो और अगर वह ऐसा शख्स हो जिस के लिए दाइमी ज़िक्र व फ़िक्र से कलबी अमल का दरवाजा खिलता हो तो कोई दूसरा अमल इस के बराबर नहीं हो सकता।

3। तीसरा फायदा अदब हासिल करना और दूसरों को अदब सिखाना इस से मुराद हैकि लोगों की तरफ़ से पहुँचने वाली अज़ीयतों अवर्तकलीफ़ों को नफ़्स बर्दाश्त करने के काबिल हो दिल से नफ़्स को यों कुचल दे कि ख़ाहिशात मिट जाएँ और तकालीफ़ बर्दाश्त की जास कीं यह इख़तिलात के फायदों से है लेकिन यह इस के हक़ में है जो अभी तक अपने अख़लाक़ को मुहज़्ज़ब नहीं करस्का और ख़ाहिशात हदूद शरा के ताबे नहीं हुईं इसी लिए खानक़ाहों में सूफ़िया की ख़िदमत करना मुस्तहब है ताकि नफ़्स की सर कशी टूट जाए और सूफ़िया कराम की बरकत से मदद हासिल हो अगर इस से रियाज़त नफ़्स मंजूर हो तो यह ख़लवत से बेहतर है जब तक रियाज़त नफ़्स हासिल न हो।

4।लोगों से मानूस होना और उन्हें मानूस करना। विलेमों और दावतों में हाजिरी का मक़सद यही होता है इसी तरह दीगरमुक़ामात जहां मेल ज्वल और इंस होता है इस का फौरी फायदा लज़्ज़त नफ़सानी का वजूद और बाज़ औकात यह हराम तरीका पर होती है और बाज़ औकात दीनी मक़ासिद का यह इख़तिलात मुस्तहब हो ता है जैसे किसी शख्स के दीनी हालात और अक़्वाल के मुशाहिदा से इंस हासिल करना बाज़ औकात इस का ताल्लुक ख़ाहिशात नफ़सान्य की तकमील होती है लेकिन दिल को आराम पहुँचाना हो तो यह मुस्तहब है क्यों

कि इबादत में दिलचस्पी के असबाब उभरें और बाज़ औकात तन्हाई में वहशत होती है और मजलिसों के ज़रिया वह इंस हासिल करता है जो दलों को आराम पहुँचाता है और यह ज़्यादा बेहतर है क्यों कि इबादत में नरमी बरतना एहतियात इबादत से है ।

(5)सवाब हासिल करना और दूसरों के लिए सवाब का बाइस बनना, जहां तक सवाब का ताल्लुक है तो जनाज़ों में हाजिरी ,बीमारों की इयादत,नमाज़ जुमा और यौमिया मांचों नमाज़ों में शामिल होने से मिलता है।

(6)इख़तिलात में चूंकि एक बड़ा फायदा तवाज़ा इख्तियार करना होता है और यह बेहतरीन मर्तबा है जो ख़लवत से हासिल नहीं होता है इसी तरह कभी इख़तिलात तजुर्बात की तहसील के लिए बेहतर होता है क्यों कि तजुर्बात मेल ज्वल ही से हासिल होते हैं,क्यों कि लोगों से मुलाकातें रहीं,हालात देखे जाएँ तो तजुर्बात बढ़ते हैं,ख़याल रहे कि दीन वदुनिया की मस्लहतों को समझने के लिए सिर्फ़ अक्ल तिब्बी ही काफ़ी नहीं बल्कि तजुर्बात और महारत की ज़रूरत होती है,जो शख्स अच्छा तजरबा कार न हो इस की गोशा नशीनी में कोई भलाई नहीं,अगर बच्चा ख़लवत इख्तियार करले तो वह नातजुर्बा कार और जाहिल रहे गा ,बल्कि उसे तहसील इल्म करना चाहिए इस अरसा में ज़रूरी तजुर्बात हासिल हूँ गे और इस के लिए यह काफ़ी है,फिर हालात सुनने से बाक़ी तजुर्बात होजाएं गे,फिर इख़तिलात की ज़रूरत नहीं रहे गी।

सब से अहम तजरबा यह है कि अपने नफ़्स,अख़लाक़ और बातिनी सिफ़ात का तजरबा करता रहे,हर वह शख्स जो गुस्सा करता हैया कीना प्रवर या हासिद है जब वह तन्हाई में होता है तो इस से ख़बासत ज़ाहिर नहीं होती है और यह मोहलिक आदत नहीं रहती जिस का ख़त्म करना ज़रूरी है,अहले सुलूक जो दलों की सफ़ाई और पाकी चाहते थे वह अपने नफ़ूस का तजरबा करते थे और जो शख्स अपने दिल में तकबर का बो पाता था तो उसे मिटाने की कोशिश करता हत्ता कि बाज़ बुजुर्ग लोगों के सामने पानी का मुश्कीज़ा उठाते या पीठ

पर लकड़ियों का गठर उठाकर बाजारों में आते जातेताकि अपने नफ़्स का तजरबा करें क्यों कि नफ़्स की खराबियां और शैतान की मकारियां पोशीदा और मख़फ़ी होती हैं जिन्हें बहुत कम लोग समझ पाते हैं इसी लिए बाज़ बुजुर्गों ने फ़रमाया है कि में ने तीस साल की नमाज़ों को लौटाया है हालाँकि में पहली सफ़ में नमाज़ पढ़ता था लेकिन एक दिन किसी उज़्र की वजह से ताख़ीर होगई और दूसरी सफ़ में खड़ा होगया तो में ने महसूस किया कि लोग मुझे देख रहे हैं जिस से मुझे शर्मिंदगी महसूस हो रही है इस से मुझे अपनी रिया कारी समझ में आई।

फायदा:फ़क़ीर मुजद्दिदी अर्ज़ करता है कि अब खानक़ाही निजाम क़रीब क़रीब ख़त्म होगया है अगरचे नाम की खानक़ाहें बाक़ी हैं और खानक़ाहों के नाम पर मशाइख़ ज़माना के यहाँ इमारतें भी तामीर होरही हैं, अब आम तौर पर न सुलूक वत्सलेक है और न ही ज़िक्रोफ़िकर के ज़रिया मनाज़िल विमराहिल तै कराना इस लिए मारूफ़ ख़लवतें भी ख़त्म होगईं,मज़कूरा बाला अरकान अर्बा की क़दरे तफ़सील से आज के ज़ाकिरेन को भी दर्स मिलता है कि वह उन की रोशनी में अपना निजाम ज़िन्दगी मुक़रिर्करसकते हैं,नीज़ जो लोग भी देनदार बनना चाहें और आज के मस्रूफ़ियत के दौर में इख़तिलात के बावजूद ख़ुद को संभालना चाहें और मेल ज्वल के बावजूदापने औकात शब् विरोज़ दीन के साथ गुज़ारना चाहें तो वह इस से सबक हासिल करसकते हैं और इख़तिलात के पूरे पूरे फायदे उठा सकते हैं,नीज़ आज भी जो लोग ज़िक्रोफ़िकर से शग़फ़ रखते हैं और हसन इत्तफाक़ से उन्हें शैख़ कामिल या इस दौर में कुछ रूहानियत का हामिल शैख़ नाक़िस ही मिल जाए तो वह इस्तिफ़ादा की मंज़िल में मज़कूरा ख़लवत इख्तियारकरके ख़लवत का फायदा अठासकते हैं,ख़लवत बायं माना कि सिर्फ़ शैख़ और इस के बताये हुयाशग़ाल वावराद से ताल्लुक रखें और जो ख़लवत का सही तरीका है इस पर आमिल रहीं तो यह ख़लवत रूहानी तरक्की के लिए काफ़ी मुफीद हो सकती है।

नक़्श बंदी बुजुर्गों का तरीका ख़लवत

यह भी याद रहे कि नक़्शबंदी बुजुर्गों ने इस मारूफ़ ख़लवत के बजाए ख़लवत दरांजुमन इख्तियार की यानी बातिन को हक़ के साथ रखे औरजाहिर में ख़ल्क़ के साथ रहे,बातिन हमेशा ज़िक्रहक़ में मशगूल रहे, हज़रत सय्यदना शाह गुलाम अली देहलवी क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि ख़लवत में शहरत है और शहरत में कमजोर आदमी नफ़्स को संभाल नहीं सकता है,नफ़्स की चालें बहुत बारीक होती हैं,नीज़ उन्हों नेखुद को पोशीदा रखने की बड़ी लायक तदबीरें इख्तियार कीं वह जंगलों और बियाबानों में नहीं ग्ये बल्कि कौम में रह कर ऐसे नेक और फ़लाह आम के तरीके इख्तियार किए जिन की वजह से लोग उन की दरवेशी वफ़क़ीरी और विलायत विबुज़ुर्गी से आगाह नहीं होपाते थे मसला बच्चों और तलबा की तालीम वितदरीस।

हज़रत ख़्वाजा मुहम्मद दरवेश रहमत अल्लाह अलैहि की शहरत का सबब बयान करते हुए उन के फ़रज़न्द वजानशीन हज़रत ख़्वाजा इमकंगी क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि एक रोज़ आप के रूबरू एक दरवेश ने शैख़ नुरुद्दीन ख़वानी क़ुद्दिस सिर्रहू के कमालात का ज़िक्र किया ,हज़रत वाला ने मेरी तरफ़ मुखातिब हो कर फ़रमाया: ए फ़रज़न्द! शैख़ बहुत बुजुर्ग मालूम होते हैं उन हदूद से गुज़र होगा तो मुलाक़ात करूँ गा ,इत्तफाक़ से शैख़ मज़कूर चंद रोज़के बाद अमकना तशरीफ़ लाये,आप ने खबर सन्नी फ़रमाया कि आज दही और मलाई ज़्यादा तैयार क्रुकल इंशा अल्लाह हम शैख़ की मुलाक़ात के लिए जाएँ गे,दूसरे दिन जब मुलाक़ात के लिए उन के यहाँ पहुँचे तो शैख़ मज़कूर इस वक़्त टोपी और कुर्ता पहने हुए ब तकल्लुफ़ बैठे हुए थे ,आप को देख कर उठे और सख्त मुअनिक़ा किया और बड़ी देर तक बगल गीर रहे फिर अपनी दस्तार विजबह मंगा कर पहना और बाअदब दोजानु मुराक़ब हो कर बैठ गए,आप उन के मुराक़बे तक बैठे रहे फिर जाने की इजाजत चाहि,शैख़ मज़कूर ने चंद क़दम चल कर आप को रुखसत किया इस के बाद शैख़ मज़कूर मुराक़ब रहे और लोगों से पूछा कि उन बुजुर्ग के पास तालिबान तरीक़त की बड़ी आमदरफ़्त होगी ?लोगों ने

कहाकि यह तो कोई शैख़ नहीं हैं बल्कि एक मिला हैं और कुरआन की तालीम देने में मसरूफ़ रहते हैं,यह सन कर शैख़ नुरुद्दीन रहमत अल्लाह अलैहि ने फ़रमाया: सुबहान अल्लाह! यहाँ के लोग अजीब नाबीना और मुर्दा दिल लोग हैं ऐसे दरवेश कामिल विमुकमल से फायदा वफ़ीज़ हासिल नहीं करते। (माख़ूजाज़ हज़रात अलक़ुद्स जलदावल)

ख़ुद कोछिपाने का यह तरीका तदरीस वित्तालीम सिर्फ़ आप ही का नहीं रहा बल्कि अक्सर बुजुर्गों का यही अमल रहा,ख़ुद हज़रत मुजद्दिद अल्फ़ सानी क़ुद्दिस सिर्रहू और उन के बाद उन के नसबी वरूहानी फ़र्रज़िंदों का भी यही शगल रहा वह अपनी खानक़ाहों में उलूम ज़ाहिर और बातिन दोनों की तालीम वितरबैत देते थे और निहायत अहम अहम कुतुब दरसेह और कुतुब तसव्वुफ़ अहले सुलूक को पढ़ाते थे,सीरत वाख़लाक़ नबवी अली ٰ साहबहा अस्सलात वस्सलाम का दर्स विमुताला लाज़िम करते और तहरीर वितकरीर और अपने अफ़आल वामाल और किरदार के ज़रिया भी संन सिखाते और अमल की तरग़ीब देते,खिलाफ़ सुन्नत काम हरगिज़ बर्दाश्त न करते इस तरह तामीर ज़ाहिर वबातिन और उलूम दयनीय की नश्रवाशाअत और इत्तिबा सुन्नत का काम करते और ताकीद फ़रमाते कि दर्स हदीस से निस्बत पुख्ता होती है।

तालिबान ख़ुदा की तालीम वितरबैत

चनां चह ख़्वाजा मुहम्मद मासूम क़ुद्दिस सिर्रहू ने अपने मक्तोबात में जाबजा इस की ताकीद वतंब्य फ़रमाई है वह आने वाले तालिबान ख़ुदा को किसी दरसगाह में भेजने के बजाए ख़ुद दर्स देते और उन की इस्तिदाद के मुताबिक उलूम ज़ाहिर में भी हद कमाल तक पहुँचाते साथ में पहले बुजुर्गों की मोतबर कुतुब तसव्वुफ़ का दर्स देते और अपने लताइफ़ वहक़ायक़ से भी आरास्ता करते और मुख़तलिफ़ फिया मिसाइल निहायत दकीक़ तहक़ीक़ से समझाते और क़ल्ब वजहन में उतारते, सूफ़िया कराम के अक़्वाल की बेहतरीन तवज्जीया करते और शतहयात सूफ़िया के असबाब बयान करके उन के सही मुहामिल बताते और जहां उन्हें इल्मी या कशफ़ी तौर पर इख़तिलाफ़ होता तो उन बुजुर्गों के हिफ़्ज़ मुरातिब का ख़याल रखते हुए इख़तिलाफ़ात और अपनी तहक़ीक़ात विशावदात से भी इफ़ादा करते।

सुबहान अल्लाह ! उन की तहरीरें देखने से नसीहत हासिल हो ती है वह अपने आला कश्फ़ विषहूद की बुनियाद पर उन बुजुर्गों के मुरातिब से वाकिफ़ होते थे और उन से इख़तिलाफ़ की सूरत में भी उन के बातिनी मुरातिब से आगाह करते ताकि उन के खिलाफ़ तहक़ीक़ अक़्वाल की वजह से उन की बातिनी अज़मत सामे के जेहन से न निकलने पाए और सुनने वाले के दिल में उन की बुलंदी शान बरकरार रहे और वह उन का अदब मलहूज़ रखे,इस मामले में ज़र्रा बराबर नफ़्स को दखल न होता,नफ़्स की बारीक चालों से हमेशा होशियार रहते ,सूफ़िया के मामले में उन्हों ने आज के उलमा की तरह यह नहीं देखा कि कौन हमारा रिश्ता दार है या बाप है यासिलसिले का है बल्कि उन तमाम रिश्तों से बालातर होकर हर एक का क़ुर्ब वफ़ज़ल देखा ।

आज हम बड़े बड़े उलमओमशाइख़ को देखते हैं कि उन्हों ने मज़कूरा रिश्तों के ऐतबार से जिसे अपना समझा इस की तारीफ़ में हद से ज़्यादा मुबालग़ा से काम लिया और जिसे अपना नहीं समझा इस की तमाम अज़्मतों के बावजूद बवक़्त ज़रूरत सरसरी तौर पर ज़िक्र करदिया यह आज की नहीं बल्कि काफ़ी पहले की रोष है जो आज नुकता आखिर को पहुँच गई है इस से कोई मामूली ख़सारा नहीं हुआ बल्कि इस के नताइज आज सामने हैं उन के मुतबईन में भी यही रोष परवान चढ़ी ,दूसरों को शिकायतों के मौके मिले और वह दौर होते चले गए,इस से एक बड़ा नुकसान यह हुआ कि आज एक हलक़ा वाला दूसरे हलक़ा के इल्म वफ़ज़ल के इस्तिफ़ादा से महरूम होगया ।

अब तो लोगों ने बुजुर्गों को भी बांट लिया है कि वह फलां के हैं और वह फलां के हैं,आज के उलमा के इख़तिलाफ़ात का भी यही नतीजा निकल रहा है कि एक के मोतक़िदीन दूसरे की किसी खूबी को तसलीम करने के लिए तैयार नहीं इस्तिफ़ादा इल्मी तो बड़ी चीज़ है।

इल्म ज़ाहिर का एहतिमाम

हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू उलूम वफ़नून में दर्जा इजतिहाद पर फ़ाइज़

थे ,इल्म कलाम के सिलसिले में तो हुज़ूर ﷺने उन्हें मुज्तहिद फ़रमाया था,आप ने अपने फ़र्रज़िंदों को भी उलूम वफ़नून में हद कमाल तक पहुँचाया,हज़रत अल्लामा बदरुद्दीन सरहंदी रहमत अल्लाह अलैहि आप के फ़र्रज़िंदाकबर के बारे में रक़मतराज़ हैं कि हज़रत मख़दूम ज़ादा उलूम अक्लिया विनक़ल्य के जामा थे और अक्सर उलूम हज़रत मुजद्दिद ही से हासिल किए थे,अरबी उलूम में कुछ मौलाना ताहिरलाहुरी और उलूम हिक्मत में कुछ मौलाना मासूम काबुली से हासिल किएथे और अठारह साल की उम्र में तमाम उलूम ज़ाहिरी से फ़ारिग़ होचुके थे बल्कि तमाम उलूम मतदावला बहुत मतानित और गहराई से पढ़ाने लगे थे,इस हक़ीर ने मतूल मा हाशिया मीर और शरह अक़ाइद मा हाशिया खयाली ,तहरीराक़लेदस और शरह मुताले मा हाशिया मीर हज़रत मुजददक़दस सिर्रहू और मख़दूम ज़ादों की ख़िदमत में पढ़ें और हज़रत मख़दूम ज़ादा के इंतकाल (1025ह) के बाद शरह मवाकिफ़, तफसीर बैजई और हाशिया अज़दी हज़रत मुजद्दिद से पढ़ी हैं,वह मख़दूम ज़ादा तशरीह में बहुत दौर तक जाते थे और मुख़तलिफ़ मुतालिब बयान करते थे और अपनी सलेम और नुक्ता रस तबीअत से बड़ी बारीकियां पैदा करते थे और कभी किताबों पर हाशिया भी तहरीर फ़रमाते थे।

एक दिन एक बहुत बड़ा आलम शीराज़ से हिंदोस्तान आयावह माक़ूलात में अपनी नज़ीर न रखता था इस से आप ने उलूम अक्लिया के दक़ायक़ में से चंद मुश्किलात का ज़िक्र किया वह बहुत मुतास्सिर हुआ और आप की बड़ी तारीफ़ की और कहा कि मुझे यह गुमान न था कि हिंदोस्तान में कोई आलम ऐसा है जो उलूम अक्लिया के इदराक की इस क़दरस्लाहीयत रखता हो और फिर इस की लाजवाब बहसूँ में इस क़द्र निद्रित और महारत रखता हो लेकिन जब में ने इस जवान को देखा तो मुझे यकीन आया कि इस मुल्क में ऐसे फुज़िला मौजूद हैं। इस किस्म की कसीर शहादतें फकीरमजद्दी की किताब‘‘तज़किरा मशाइख़ मुजद्दिदय’’ में मिलें गी,ग़रज़कि मतलब यह है कि अगर हम सलाह वफ़लाह का रास्ता इख्तियार करें और ज़ाहिरोबातिन की तकमील करना

चाहें तो ऐसे बहुत तरीके हैं कि नफ़्स की बहुत सी आफतों से बच कर ख़ल्क़ में रह कर ख़ुद को और दूसरों को नफा पहुँचा सकते हैं शर्त वही है जो हम पहले ज़िक्र करचुके हैं कि ख़ुद को इतना पुख्ता करले कि दुनिया और दुनिया वालों की किसी बुराई से मुतास्सिर न हो बल्कि अपना नेक असर लोगों पर छोड़े।

मदावमत के साथ उलूम दयनीय की तालीम वितदरीस बेहतरीन शगल है और इस के ज़रिया निहायत बासलाहीयत ,सालिह दाई विमबलग़ और उलमा विमशाइख़ तैयार किए जा सकते हैं जिस के ज़रिया इस्लाम वसनीयत की तरवेज वाशाअत और बका वितहफ़्ज़ का बड़ा काम किया जा सकता है,यह तजरबा गवाह है कि उलूम वफ़नून के हामिलियन अगर तक़्वा विपर हेज़गारी से आरास्ता हो कर इरशाद व्हिदायत का काम करें तो ख़ुद उन का भी भला होगा ,संयत का भी और कौम का भी ,बग़ैर इल्म के आज के दौर में मुशेख्त कोई ख़ास असर और एतिमाद पैदा नहीं करपाई है क्यों कि रूहानियत है नहीं जो कशिश का बाइस हो।

अहले सुलूक के लिए ख़लवत की वह नवो भी बहुत मुफीद है जिसे हदीस शरीफ़ में इस उम्मत की रहबानीयत क़रारदिया गया है यानी जुलूस फ़ी उलमसाजिद,हदीस शरीफ़ में हुक्म दिया गया है कि हम जमात से पहले मस्जिदों में जाएँ और नमाज़ों से फ़राग़त के बाद भी ठहरे रहीं नीज़ नमाज़ फ़ज्र से अशराक़ तक ,अस्र से मग़रिब तक ज़िक्र वफ़कर के साथ बैठना, यह सब नबी क्रीम ﷺकी पसंदीदा सुनतीं हैं इस तरह आदमी उन फ़ित्नों से भी बच सकता है जो सड़कों पर निकलने और राहों पर चलने से पैदा होते हैं,आंख कान की हिफाज़त और ज़िक्रोफ़िकर में यकसूई हासिल करने का निहायत कामयाब तरीका है इस्तिफ़ादा करने वाले इस के ज़रिया ज़ाहिरोबातिन का इस्तिफ़ादा करसकते हैं और इफ़ादा यानी फायदा पहुँचाने वाले फायदा पहुँचा सकते हैं।

मुख़्तसर यह कि ऐसी ख़लवतें भी ज़रूरी हैं जिन के ज़रिया गुनाहों से बचा जाए जिस में आंख ,कान और दिल की हिफाज़त हो क़सदा किसी गैर का ख़याल दिल में न लाये

अगराजाए तो ज़िक्र में मशगूल होकर या उन तरीकों पर अमल करके जो बुजुर्गों ने इरशाद फ़रमाए हैं खयालात दफा करे।

इख़तिलात में अगरचे बहुत फायदे हैं जैसा कि आप ने पढ़ा मगर नुक़्सानात भी हैं , हरादमी ख़ुद को गुनाहों से नहीं बचा सकता है,इख़तिलात में तक़लील कलाम भी मुश्किल है अक्सर फिजूल बातें होजाति हैं,यह बड़े लोगों के मामलात हैं कि इख़तिलात में भी ख़ुद को पूरे तौर परगुनाहों सेमहफूज़ रख कर इख़तिलात के सिर्फ़ फायदे उठाते हैं,जो लोग इस मंज़िल के नहीं होते हैं और वह ख़लवत भी नहीं इख्तियार करते उन का क़ल्ब अनिवार से खाली होजाता है,ख़लवत में जब तक दिल ख़ुदा के साथ रहे बैठें और जब इंतिशार वख़तरात का हुजूम और ग़लबा होने लगे तो नेक लोगों में बैठ कर नेक बातें करें इस से ख़तरात दफा हूँ गे।