अध्याय 41 में से 54पृष्ठ 487–507
भूक के फायदे
हज़रत इमाम मुहम्मदग़ज़ाली क़ुद्दिस सिर्रहू ने भूक के दस बड़े फायदे ज़िक्रकिये हैं(1)दिल की सफ़ाई,तबीअत की तेजी औरबसीरत का कमाल,क्यों कि सैर होकर खाने से जेहन कंद और दिल अंधा होता है नीज़ दिमाग मैन बुखार नशे की तरह बढ़ता है हत्ता कि वह सोच वफ़कर के मुक़ामात को घेर लेता है और यों इस के सबब दिल फ़िक्र से मुबर्रा ही हो जा ता है जिस की वजह से वह फौरी तौरपर किसी चीज़ का इदराक नहीं कर सकता है,हज़रत सुलेमान दारानी क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं"भूक इख्तियार करू यह नफ़्स को ज़लील और दिल को नरम करती हैऔरासी से आसमानी इल्म हासिल होता है। हदीस शरीफ़ में है: हर चीज़ की ज़कात है और बदन की ज़कात भूक है।’’
हज़रत शैख़ शिबली क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं: में अल्लाह तआला के लियागर एक दिन भी भूका रहता हूँ तो अपने इंद्रहकमत वाबरत का एक दरवाजा खुला पाताहों। ’’ यह बात मख़फ़ी नहीं कि इबादत का मक़सद एक ऐसी फ़िक्र है जो मार्फत ख़ुदावंदी तक पहुँचाती और हक़ायक़ दिखाती है।शिकम सीरी इस से रोकती है जब कि भव क इस के दरवाजे को खोलती है। मार्फत जन्नत के दरवाजों में से एक दरवाजा है लिहाज़ा मुनासिब है कि हमेशा भूक के ज़रिया जन्नत का दरवाजा खटखटाया जाए इसी लिए हज़रत लुक़मान अलैहि अस्सलाम ने अपने बेटे से फ़रमाया:ए बेटे जब मादा भरा हुआ होगा तो फ़िक्र सौ
जाएगी,हिक्मत बे खबर होगी और आज़ा इबादत से बैठ जाएँ गे।
(2) कम खाने से दिल नरम होता है औरइस की सफ़ाई हासिल होती है जिस के ज़रिया उसे लज़्ज़त दवाम के इदराक औरजिकिर से मुतास्सिर होने की इस्तिदाद हासिल होती है,कई बार ज़बान पर ज़िक्र जारी होता है और दिल भी हाजिर होता है मगरदल को न तो इस सेलज्जत हासिल होती हैऔर न ही इस का असर होता है क्यों कि इस के सामने दिल की सख्ती का हिजाब होता है और बाज़ हालात में अगर दिल नरम होता है तो इस पर ज़िक्र का असर होता है और मुन्ना जात में लज़्ज़त हासिल हो ती है जिस का वाज़िह सबब मादे का खाली हो ना है।
(3)कम खाने का तीसराफायदा इन्किसारी और तवाज़ा है ,इस की वजह से अकड़,गुर्वरावर वह खुशी चली जाती हैजो सुरक्षी और अल्लाह तआला से गफलत का बाइस है,भूक से नफ़्स को जिस क़द्र इन्किसारी हासिल होती हैवो किसी दूसरी चीज़ से नहीं, भूक के वक़्त बंदा अपने रब के सामने झुकता हैऔर अपनी कमज़ोरी विजिल्लत को पहचान लेता है क्यों कि इस की कुव्वत कमजोर होजाति है और इस का हीला चला जाता है इस लिए कि जब उसे रोटी का टुकड़ा नहीं मिलता और पानी की एक घोंट के लिए तरसता है तो दुनिया इस की नज़र में तारीक हो जाती है,जब तक इंसान अपने नफ़्स की जिल्लत और इस की कमज़ोरी का मुशाहिदा न करे वह अपने मौला के कहर और ग़लबा को नहीं देख सकता ,इस की सआदत इसी बात में है कि वह अपने नफ़्स को हमेशा जिल्लत और अजुज़ की निगाह से देखता रहे और अपने मालिक को इज्जत,कुदरत और कहर की निगाह से देखे।
लिहाज़ा उसे हमेशा भव का और अपने रब की तरफ़ मजबूर रहना चाहिए ताकि इज़तिरार ज़ौक़ का मुशाहिदा करे इसी लिए जब नबी अकर्म ﷺके सामने दुनिया को पेश किया गया तो आप ने फ़रमाया:ला बल अजू योमा वाशबा योमा फ़ाज़ाजात सुब्रत वितज़रअत वाज़ा शबात शुक्रित
नहीं बल्कि में एक दिन भव का रहूँ गा और एक दिन शिकम सैर हूँ गा पस जब में भूका हूँ गा तो सब्र करूँ गा और अपने रब के हुज़ूर गिड़गिड़ाओं गा और शिकम सैर हूँ गा तो शुक्रिकरों गा(मसंद इमाम अहमद)
फ़क़ीर मुजद्दिदी कहता है यहाँ शिकम सीरी से मुराद इतना खाना है जितना आप ﷺ ने उम्मत के लिए पसंद फ़रमाया करते थे यानी तिहाई पेट।
(4)भूक का चौथा फायदा यह है कि इंसान अल्लाह तआला की आज़माइश और अज़ाब को नहीं भूलता और न ही उन लोगों को जोआज़माइश में डाले गए,क्यों कि पेट भर कर खा ने वाला भूके आदमी को भूल जा ता हैऔर अक्लमंद इंसान जब किसी को मुसीबत में देखता है तो उसे आख़िरत की परेशानी याद आजाती है।जब वह प्यासा हो ता है तोमेदान कयामत में लोगों की प्यास याद आजाती है इसी तरह भूका होता है तो उसे अहले जहनम की भूक याद आजाती हैकियों कि जब जहनमियों को भूक लगेगी तो उन्हें ख़ारदार दरख्त खाने के लिए दिया जाए गा जब कि पीने के लिए पीप दी जा ए गी।बंदा से आख़िरत की तकलीफ़ें और अज़ाब गायब नहीं होना चाहिए यही चीजें ख़ौफ़ दिलाती हैं,जो शख्स जिल्लत,बीमारी औरआज़माइश से खाली हो वह आख़िरत के अज़ाब को भूल जाताहै और इस के दिल में इस का ख़याल भी नहीं होताहै और न ही तलब रहती हैलिहाजा बंदे को मुसीबत में रहना और इस का मुशाहिदा करते रहना चाहिए, और भूक बर्दाश्त के सब से ज़्यादा लायक है क्यों कि याद आख़िरत के अलावा इस के और भी फायदे हैं,यह उन असबाब में से एक है जो मसाइब वाबतला को अंबियाए कराम अलैहिम अस्सलाम के साथ ख़ास करता है इसी तरह दूसरे लोग दर्जा बदरजा हैं।
(5)भूक के ज़रिया शहवतें टूटती हैं और इंसान नफ़्स इमारा पर ग़ालिब आता है जो कि सब से बड़ा फायदा है क्यों कि तमाम गुनाहों की बुनियाद शहवतें और नफ़्स इमारा की कुव्वत है जब कि इस कुव्वत विषहवत की बुनियाद यकीना खाने में है,लिहाज़ा इस की कमी
तमाम शहवत वक़्व्वत को कमजोर करदेती है,और कामिल सआदत यह है कि इंसान अपने नफ़्स पर काबू पाले,एक बुजुर्ग से पोछागिया कि आप बुढ़ापे में नफ़्स की ख़िदमत क्यों नहीं करते वह तो कमजोर होचुका है?उन्हों ने फ़रमाया: इस लिए कि यह जल्दी अकड़ने लगता हैऔर बहुत ज़्यादा शरारत करता है तो मुझे डर है कि कहीं यह सुरक्ष हो कर मुझे गुनाह के कुँवें में न डाल दे लिहाज़ा मेरा उसे सख्ती में मुबतला रखना इस से बेहतर है कि यह मुझे बुराइयों पर आमादा करे।’’
यह एक फायदा नहीं बल्कि इसमें फ़वाइद के ख़ज़ाने हैं इसी लिए कहा गया है कि भूक अल्लाह तआला के खजानों में से एक खजाना है और भूक की वजह से सब से अदना चीज़ जो दौर होती है वह वह शर्मगाह और कलाम की शहवत है क्यों कि भूका आदमी फिजूल कलाम की ख्वाहिश नहीं रखता है। इस तरह वह ज़बान की आफ़ात से बचा रहता है जैसे ग़ीबत,फ़ुहश कलामी,झूट और चुगली वगैरह भूक उन तमाम बातों से बचाती है और जब वह शिकम सैर होता है तो वह दिल लगी की ज़रूरत महसूस करता है और यों वह लोगों की इज़्ज़तों के पीछे पड़ जाताहै।
जहां तक शर्मगाह की शहवत का ताल्लुक है तो इस की बुराई पोशीदा नहीं है,भूक इस के शर कोदूर करदेती है,जब आदमी शिकम सैर हो तोवो अपनी शर्मगाह पर कंट्रोल नहीं करसकता है,अगर तक़्वा उसे बचा भी ले तो वह अपनी आंखों को नहीं बचा सकता और अगर आंखों को भी बचा ले तो सोच वफ़कर पर कंट्रोल नहीं कर सकता और उसे घटिया किस्म के तफ़करात घेर लेते हैं,दिल में शहवत के असबाब जन्म लेते हैं जिस से इस की मुनाजात में खलल वाक़्य होता है और बाज़ औकात नमाज़ के दौरान यह बात पेश आजाती है।हम ने यहाँ ज़बान और शर्मगाह की आफत बतौर मिसाल ज़िक्र की हैवर्ना तमाम आज़ाके गुनाहों कासबब वह कुव्वत है जो पेट भर खाने से पैदा होती है।
(6)कम खाने से नींद दौर होती है इस लिए कि जो आदमी सैर होकर खाता है वह
पानी बहुत पीता है जिस से नींद ज़्यादा आती है,बाज़ मशाइख़ के पास जब खाना हाजिर होता तो वह फ़रमाते"ए गिरोह मुरीदैन!ज़्यादा न खाओ इस लिए कि ज़्यादा खाकर पानी भी ज़्यादा पियोगे फिर नींद भी ज़्यादा आये गी जिस से नुकसा न उठाओगे।’’
सत्र सिद्दीक़ीन का इत्तफाक़ है कि पानी की कसरत नींद का बाइस है और कसरत नींद से ज़िन्दगी ज़ाए हो जाती है,तहजद की नमाज़ रह जाती है,तबीअत ग़बी और दिल सख्त हो जाता है।ज़िन्दगी एक बेहतरीन जौहर और असल माल है जिस से इंसान तिजारत करता है जब कि नींद मौत है लिहाज़ा नींद की कसरत उम्र को कम करदेती है,फिर तहजद की फ़ज़ीलत पोशीदा नहीं जो सोने की वजह से फ़ौत हो जाती है,अगर नींद के ग़लबे में तहजद पढ़ता भी है तो इबादत की हलाक़त विचाशनी नहीं मिलती।गैर शादी शुदा आदमी अगर शिकम सैर होकर सोता है तो एहतिलाम होता हैजो कि तहजद में रुकावट है इस लिए कि उसे ग़ुस्ल की ज़रूरत होती है अब अगर पानी ठंडा होगा तो वह अज़ीयत या हमाम में जाने की ज़रूरत महसूस करे गाबल्कि बसा औकात रात में नहीं जा सकता है, अगर वित्तर रात को नहीं पढ़ी तो वह भी जा सकती है,हज़रत अबू सुलेमान दारानी रहमत अल्लाह अलैहि फ़रमाते हैं कि एहतिलाम एक अज़ाब है,इस की वजह यही है कि वह बहुत सारी इबादतों में रुकावट बनता है।
(7)कम खाने से इबादत प्रदवाम आसान हो जाता है क्यों कि खाना ज्यादती इबादत से रोकता है,ख़ुद खाने में मशगूलियत भी वक़्त चाहती है और बाज़ औकात खाना खरीदने और पकाने में वक़्त सिर्फ़ हो जाता है,फिर हाथों का धोना और दाँतों का ख़लाल भी वक़्त चाहता हैफिर पानी वगैरह के लिए आना जाना पड़ता हैज़ाहिर है जो वक़्त उन कामोन में सिर्फ़ होता हैउगर उसे ज़िक्र ख़ुदावंदी,मुनाजात औरदीगर इबादात में सिर्फ़ किया जाए तो इस का नफा ज़्यादा होगा।हज़रत सुरी सुक़ती रहमत अल्लाह अलैहि फ़रमाते हैं: में ने हज़रत अली जर्जानी को सत्त्व फांकते देखा तो पूछा
आप ऐसा क्यों करते हैं? उन्हूँ ने फ़रमाया मेरा ख़याल है कि चबाने औरफांकने के दरमियान सत्र तस्बीहात का वक़्त होता है इसी लिए में ने चालीस साल से रोटी नहीं चबाई।
ज़िन्दगी का हर लम्हा एक नफीस जो हर है जो निहायत बेश कीमत हैलिहाजा इस से ऐसा खजाना हासिल किया जाए जो आख़िरत में बाक़ी रहे,यह इसी सूरत में हो सकता है जब अपने वक़्त को ज़िक्र इलाही और इबादत के लिए वक्फ करदे।ज़्यादा खाने से जो काम मुश्किल हो जाते हीन उन में एक तहारत और मस्जिद में ठहरना है क्यों कि ज़्यादा खाने की सूरत में पानी पीने और पेशाब के लिए बाहर निकलने की ज़रूरत पेश आती है,इसी तरह ऐसे आदमी के लिए रोजा भी मुश्किल होता है,भूक की शिद्दतें बर्दाश्त करने से रोजा आसान हो जाता है,रोजा की वजह से हमेशा बावुज़ू रहनेऔरखाने पीने और इस के असबाब में खर्च होने वाले औकात को इबादत में सिर्फ़ करने जैसे बे शुमार्फ़वाइदहासिल होते हैं,उन कामों को वही लोग मामूली जानते हैं जो दीनी क़द्र नहीं पहचानते बल्कि दुनिया की ज़िन्दगी पर राजी ओरमुतमइन हैं।
हज़रत अबू सुलेमान क़ुद्दिस सिर्रहू ने शिकम सीरी की छ आफतों की तरफ़ इशारा किया है(1)मुनाजात ख़ुदावंदी की चाशनी से महरूमी(2)हिक्मत की हिफाज़त का मुश्किल होना(3)मख़लूक़ पर शफकत से महरूमी क्यों कि जब वह पेट भर कर खाताहै तो ख़याल करता हैकि सब ने ही पेट भर करखाया है (4)इबादत एक बोझ बिन जाती है (5)ख़ाहिशात ज़्यादा होती हैं (6)और लोग मसाजिद का चक्र लगाते हैं और यह पेट भर कर खा ने वाले गंदी जगहों के इर्द गिर्द चक्र लगाते हैं।
(8)कम खाने से बदन की कीमत बरकरार रहती है,बीमारियां दौररहती हैं चूंकि बीमारियों कासबब ज़्यादा खानाहे नीज़ इस की वजह सेमादे और रगों में फिजूल इख़लात जमा रहते हैं फिर बीमारी इबादत से रोकती और दिल को परेशान करती है नीज़ वह ज़िक्र वफ़कर
के रास्ते में भी रुकावट है,इस की वजह से ज़िन्दगी तल्ख़ होजाति है,बीमारी की वजह से इंसान फ़ासद खून निकलवाने, दवाई और डाक्टर का मुहताज हो ता है और यह तमाम चीजें रुपया मांगती हैं और इस सिलसिला में इंसान थकावट के साथ तरह तरह केगुनाहों और ख़ाहिशात का शिकार होताहै जब कि भूक में यह सारी बातें ओझल होती जाती हैं।
(9)कम खाने की वजह से मशक्कत कम उठाना पड़ती हैकियों कि कम खाने वाले को थोडा माल भी किफायत करता है,इस के बुर खिलाफ़ ज़्यादा खाने वाले को इस का पेट पकड़े रहता है और रोज़ गर्दन पकड़ कर कहता है कि आज किया खाओगे?लिहाज़ा मुख़तलिफ़ मुक़ामात पर जाने का मुहताज होताहै,इस तरह वह हराम कामों में पड़ कर नाफ़रमानी करता है,लालच बढ़ता है।हज़रत इमाम क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं: लोगों की हलाकत का बाइस दुनिया काहिर्स है और दुनयवी हिर्स का बाइस पेट और शर्मगाह है,शर्मगाह की शहवत का बाइस पेट की ख्वाहिश है जब कि कम खा ने से यह सारी चीजें ख़त्म हो जाती हैं।’’
(10)कम खा ने से बचा हुआ खा ना गरीबों,यतीमों और मसाकेन को दिया जा सकता है जिस से सदक़ा का सवाब पाए गा।
खया ल रहे कि मुतक़द्दिमीन से बड़े बड़े होशरुबा मजा हदात मनक़ूल हैं। आज के बवालहोस नादान और एश इशरत के दिलदादा उन के मजा हदात पर नुक्ता चीनियाँ करते हैं,जिन बुजुर्गों ने ख़ुदा वरसौल जल वाला व ﷺकी मुहब्बत में और दाइमी ज़िक्र के लिए सब कुछ छोड़ दिया और सब से कट कर अल्लाह ही के हो रहे ऐसे नफ़ूस क़ुदसिया पर जो जाहिलाना तन्क़ीद करें हमारी नज़र में वह इस लायक नहीं कि उन की बा तों पर ध्यान दिया जाए बल्कि आज के दौर जहालत में शैतान बहुत वस्वसे पैदा करदेता है इस लिए हम चंद उमूर ज़िक्र करते हैं उन्हें जेहन में रखें गे तो उम्मीद है कि उन
खासान ख़ुदा के बारे में कम अज़ कम खुश अक़ीदा लोग तो महफूज़ रहीं गे।
चंद अहम फायदे
(1)क़ुर्ब ख़ुदावंदी की असल इल्लत जज़्ब है यानी अल्लाह तआला का बंदे का अपनी तरफ़ खींचना यह अगर बुला वास्ता हो तो इज्तबा कहते हैं और बालवासता हो तो अनाबत कहते हैं।सारे अंबियाए कराम अलैहिम अस्सलवात वालतसलीमात इसी राह इज्तिबा से वासल होते हैं इस राह से वासल होने वाले मुराद विमहबूब होते हैं।अंबियाए कराम अलैहिम अस्सलाम के जुमला कमालात नुबुव्वत वरिसालत और तमाम कमालात विलायत वहबी होते हैं कसब वामल को उन में कोई दखल नहीं होता है, जैसा कि हज़रत मुजद्दिद अल्फ़ सानी क़ुद्दिस सिर्रहू ने अपने मक्तोबात क़ुदसी आयात में उसे तफ़सीला बयान फ़रमाया है कि उन के मुजाहिदात वरियाज़ात तहसील कमाल के लिए नहीं बल्कि इनामात इलाहीह के शकर के लिए हो ते हैं।
(2)अंबियाए कराम अलैहिम अस्सलाम के इमितियों को उन्हें के कमालात से बतौर तबईत विरासत हिस्सा मिलता है जो जिस क़द्र सलाहीयत वास्तेदाद का मालिक होता है बक़दर ज़र्फ़ इत्तिबा के ऐतबार से कमालात विलायत विनबूत से फ़ैज़ पाताहै। उन औलियाए कराम में कुछ मुराद होते हैं और कुछ मुरीदैन,मुरादों के मामलात मुरीदैन से जुदा होते हैं,हज़रत कुतुब उलहक़ीक़त हुज़ूर मुजद्दिद अल्फ़ सानी क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं: जान लो इस राह के सालिक हज़रात दो हाल से खाली नहीं हैं मुरीद हैं या मुराद अगर मुराद हैं तो खुशखबरी है उन के लिए कि उन्हें इंजज़ाब मुहब्बत के रास्ते कुषाण कशां ले जा ते हैं और मतलब आला तक पहुँचादें गे और जो भी अदब उन को दरकार होगा बवास्ता या बुलाबास्ता उन को सिखादें गे अगर उन से कोई लग़्ज़िश सरज़द हो गी तो जल्दी आगाह फ़रमा दें गे और उन से मुवाख़िज़ा न करें गे,अगर पेरजाहिर की हाजित होगी तो बग़ैर उन की कोशिश विमेहनत कयास दौलत की रहनुमाई कर दें गे खुलासा यह कि इनायत अज़ली जल सुल्ताना उन बुज़ुर्गवारों के हाल की कफ़ील होती है सबब और बुला सबब उन के
काम की किफायत करें गे‘‘वाल्लाह यज्तबी इलिया मिन यशा’’अल्लाह तआला चुन लेता है अपनी तरफ़ जिसे चाहता है।और अगर मुरीद हैं तो उन का काम कामिल व मुकम्मल पीर के वसीले के बग़ैर दुश्वार है।’’(मक्तूब 292 दफ्तर अव्वल)
आप ने इस से समझ लिया होगा कि मुरादों को ज़्यादा रियाज़ात विमुजाहिदात की ज़रूरत नहीं होती।
(3)इस के बा वजूद अंबियाए कराम अलैहिम अस्सलाम की दुनयवी ज़िंदगियां मुजाहिदात से भरी पड़ी हैं,हम अपने आकावमूला मुरादों विमहबूबों के सरदारअल्य अस्सलात वस्सलाम को लेते हैं,आप अलैहि अस्सलाम की हयात तैबा को किसी भी पहलू से लें मुजाहिदात ही मुजाहिदात नज़र आएं गे,ज़िक्र इलाही में यह हाल कि हज़रत आयशा रज़ि अल्लाह अन्हा फरमाती हैं:कान रसूल अल्ला ﷺयुज़िक्र अल्लाह फ़ी कल अहियाना
यानी हुज़ूर ﷺतमाम औकात ज़िक्र इलाही करते,हर हाल में वुज़ू बे वुज़ू,जनाबत और गैर जनाबत सब में ज़िक्र इलाही करते।’’
आप इबतिदा में पढ़ चुके हैं कि इरशाद ख़ुदावंदी है:
जब तुम नमाज़ अदा करलू तो ज़िक्र इलाही करू खडे,बैठेओरलेटे।’’
हुज़ूर ﷺका ख़ल्क़ ही कुरान था,इबादत देखिए तो अल्लाह अकबर! इसकदर कि पीर सूज जाते वर्म आजाता ,सहाबा अर्ज़ करते: आप मासूम हैं इस क़द्र मशक्कत क्योंकर उठा ते हैं? आप अलैहि अस्सलाम फ़रमाते: अफला इकोन अबदा शकूरा’’ किया में अल्लाह तआला का शकर गुज़ार बंदा न बनों,यानी में अपने दर्जात यात्रक़्क़्यात के लिए नहीं बल्कि इस ख़ालिक़ विमालिक जल वाला नेजो मुझे इतना नवाजाहे इस के बे शुमार एहसानात का शकर अदा करने के लिए इबादत करता हूँ।शब् बेदारी का यह आलम कि आप अक्सर आधी रात के बाद उठ पड़ते औरकुछ मख़सूस करानी तिलावत फ़रमाते और तलूअ फ़ज्र तक नमाज़ तहजद इतनी लंबी क़िरात से पढ़तेकि बयान से बाहर है,आखिरहयात नबवी में जब आप का जिसम अक़्दस
बोझिल होगया तो बैठ कर पढ़ते,क़िरात करते फिर खडे हो जाते और तीस चालीस आयात हालत क़याम में पढ़ते फिर रुकवा विस्जोद फ़रमाते,सफर के आगाज़ में नमाज़ परहते और जिस मंज़िल पर क़याम करते नमाज़ परहते,सवारी पर बैठे बैठे इशारे से नवाफ़िल पढ़ते,उम्मत को तरह तरह से तरग़ीब देते।
भूक का मुजाहिदा उन रिवायतों से समझ सकते हैं जो फक्र के बयान में मज़कूर हैं,कभी कभी तो पेट पर कई कई पत्थर बांद भते,रोज़ों का हाल यह कि रमजा न के अलावा कभी इस क़द्र रखते कि कि सहाबा फ़रमाते हैं कि हम गुमान करते कि शायद अब छोड़ें गे नहीं,सहाबा कराम ने कसरत से रोज़े रखने की इजाजत चाहि तो सौम दाऊद की इजाजत दी यानी एक दिन रोजा और एक दिन इफ्तार और ख़ुद यह हाल कि सौम विसाल रखते हैं,सहाबा कराम ने रखना चाहा तौफ़रमाया तुम इस की इस्तिताअत नहीं रखते हो में अपने रब के पास रात गुज़ारता हूँ वह मुझे खुला ता और पिलाता है।
इस से आप के भूक के मुजाहिदा का अंदाजा लगाया जा सकता है,दीन की इशाअत और तबलीग़ वितरवेज की मशक्कतें जो आप ने झीलें वह आप ही का हिस्सा थीं,इस्लामी निजाम के क़याम के लिए जिहाद मा अलकुफ़्फ़ार में जो जिद वजहद और मेहनत विमशक्कत बर्दाश्त की हैं वह किसी दूसरे के बस की बात न थीं,यह चंद इशारे हैं जिन से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि हर पहलू से आप की हयात तैबा मुजाहिदात वरियाज़ात से मालामाल है ख़याल रहे कि उन मुजाहिदात वरियाजात का मक़सद माबूद बरहक़ की नेअमतों का शुक्रिया अदा करना और उसे राजी रखना था।
अंबियाए कराम के रियाज़ात विमुजाहिदात के बारे में हामिल विलायत मुहम्मदी शैख़ अहमदसरहंदी मुजद्दिद अल्फ़ सानी क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं: में समझता हूँ कि अंबियाए कराम अलैहिम अस्सलाम के मुजाहिदात वरियाज़ात और ख़ुद हर दायरा मुबाहात को तंग कर लेने का मक़सद असली ज़ुहूर ख़वारिक़ की तहसील जो कि उन पर वाजिब और उन की नुबुव्वत की शर्त
थी,दर्जात क़ुर्ब इलाही तक वसूल औरपहुँचना(मक़सद) नहीं क्यों कि अनबया अलैहिम अस्सलाम मुज्तबा और बर्गुज़ीदा हैं की जज़्ब मुहब्बत के ज़रिया उन को कशां कशां ले जाते हैं और उन की मशक्कत के बगैरदर्जात क़ुर्ब तक पहुँचा देते हैं,वह तो अनाबत वारादत है कि दर्जात क़ुर्ब इलाही तक वसूल के लिए इस में रियाज़ात विमुजाहिदात की ज़रूरत है जो कि मुरीदों का रास्ता है जब कि इज्तिबा मुरादों का। मुरीद लोग मेहनत विमशक्कत के साथ अपने पैरों के ज़रिया चल के जा ते हैं और मुरादों को नाज़ वतनाम के साथ ले जाते हैं और उन की मशक्कत के बग़ैर दर्जात क़ुर्ब तक पहुँचा देते हैं।
जान लेना चाहिए कि मुजाहिदात वरियाज़ात राह अनाबत की शर्त हैं और राह इज्तिबा में मुजाहिदात शर्त नहीं मगर फिर भी नफा बख्श और सूद मंद हैं,मिसाल के तौर पर वह शख्स कि जिसे कशां कशां ले जाते हैं और वह शख्स इस कशिश के साथ अपनी मेहनत विमशक्कत को काम में लाता है तो जिल्द तर मतलब तक पहुँचता है औरदूर तक जाता है,और जो इस मेहनत वकोशिश को काम में नहीं रखता हो सकता है कि कभी तन्हा कशिश विजज़िब इलाही जो कवी तर हो ज़्यादा काम करदे पस सई विमशक्कत वितरदद राह इज्तिबा में कमाल शर्त वसूल भी नहीं जैसा कि नफ़्स वसूल की शर्त नहीं है हां नफा का एहतिमाल रखती है।
मालूम हो कि अहले इज्तिबा के लिए रियाज़ात विमुजाहिदात का फायदा आप ने हज़रत मुजददक़दस सिर्रहू के कलाम से पढ़ा उन के अलावा भी हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि इस के बहुत सारे मनाफ़े वफ़वाइद हैं एक तो जिहाद अकबर(नफ़्स के साथ जिहाद)दोम दुनिया की आलूदगियों से नफ़्स की तहारत वनज़ाफ़त सोम उखरवी मउआख़िज़ा व मुहासिबा की कमी चहारम उखरवी दर्जात की बुलंदी।
हज़रत मुजददक़दस सिर्रहू यह भी फ़रमाते हैं: ज़रूरी मुबाहात पर इकतिफ़ा वाक़तिसार का नाम रियाज़त विमुजाहिदा है।’’ आप क़ुद्दिस सिर्रहू के नज़दीक हवाइज जरूरीया दुनिया में दाखिल नहीं और जो ज़रूरी हवाइज से फिजूल वज़ाइद है वह दुनिया में दाखिल है ,यह भी फ़रमाते
हैं कि जिस क़द्र दुनिया में मेहनत है इसी के ऐतबार से आख़िरत में कई गुना ज़्यादा राहत विमसर्रत है।मज़कूरा बाला फ़वाइदके अलावा अंबियाए कराम अलैहिम अस्सलाम के लिए यह फायदे भी हैं।फ़रमाते हैं : वाज़िह हो गया कि मुबाहात जरूरीया पर इक़तिसार वाकतिफ़ा करलेने के मुजाहिदात वरियाज़ात गो कि राह इज्तिबा में वसूल के किए शर्त नहीं लेकिन वह अपनी ज़ात में महबूब विमुस्तहसिन हैं बल्कि मज़कूरा फ़वाइद की तरफ़ नज़र करते हुए लाज़िम वज़रूरी हैं।(मक्तूब 86/दफ्तरसूम)
इस कलाम बलाग़त निजाम से तो आप ने समझ लिया होगा कि अहले अनाबत मुरीदों के लिए तोमुजाहिदात वस्ल अली अल्लाह का लाजिमी शर्त हैं जब कि अहले इज्तिबा मुरीदों के लिए गो कि शर्त वसूल नहीं बल्कि जो फ़वाइद वुमुनाफा रियाज़तों से मुताल्लिक़ हैं उन के ऐतबार से वह महमूद विमुस्तहसिन ही नहीं बल्कि लाज़िम वज़रूरी भी हैं।
सूफ़ियाए कराम पर तन्क़ीद करने वाले संजीदगी के साथ इस पर गौर करें कि वह कैसी बातें और किस मुक़द्दस जमात के बारे में कह रहे हैं? उन बुजुर्गों ने अपने मौला इज़ विजल को राजी करने के लिए जो मुजाहिदात किए वह कितनी दीनी सूझ बोझ पर मबनी थे?फिर ऐसा नहीं कि उन्हों ने अपने से गढ़ लिए बल्कि उन के सामने उन के प्यारे आकावमूला ﷺऔर उन के अस्हाब बा सफ़ा की ज़िंदगियां थीं,उन के मुजाहिदात के नमूने थे और वह अपने अंदर इस की ताकत भी पाते थे।उन ही मुजाहिदात की वजह से वह दीन का इतना बड़ा काम कर ले ग्ये कि आज निरे लोग भी मिल कर नहीं कर पा रहे हैं,उन्हें मुजाहिदात वरियाज़त और तक़्वा वतहारत वगैरह औसाफ़ आलीया की बदौलत उन की ज़िंदगियां इस क़द्र पर कशिश हो गई थीं कि दिल खिंचे जाते थे,लोग उन के यहाँ हक़ीक़ी माना में इस्लामी रंग,इस्लामी ज़ौक़ और इस्लाम की सही तस्वीर पाते थे जिस से लोग इस क़द्र मुतास्सिर होते कि कुफ़्फ़ारोमशरिकीन ईमान लाते और फिसाक़ वफ़जार उन के हाथों पर तौबा करते,जिन्हों ने ब नज़र इंसाफ तारीख के औराक़ पढ़े
हैं उन पर यह हक़ीक़त अच्छी तरह वाज़िह है।
यह भी ध्यान रहे कि खिलाफत राशिदा जब मलुकेत में तब्दील हुई और दुनिया के माल विमता ऊरजाह विमन्सब की तरफ़ जो रुजहान बढ़ा और इस के नतीजे में जो बाहमी तहासिद वतबाग़ज़ और कशमकश शुरू हुई फिर फरेब और जुल्म के दरवाजे खुलना शुरू हुए और अपनी इज्जत नफ़्स की खातिर अहले इल्म में जो मजादले और मुबाहिसे वजूद में आये उन उद्वार की इस्लामी तारीख पढ़ें और फिर सूफ़िया के अहवाल पर नज़र डालें तो यकीन हो ता हैकि उन बुजुर्गों ने जिस तरह दुनिया से मुँह फेरा,जाह विमन्सब को लात मारी और इबादत वरियाज़त को अपना शआर बनाया यह इस्लाम की असल ख़िदमत और इस्लाम को इस के ज़ाहिरी वबातिनी खद वख़ाल के साथ बाक़ी रखने कासिब से ज़्यादा मुनासिब तरीका था।
जिन को अल्लाह तआला ने अक्ल विशऊर की नेमत बख्शी है वह खूब जानते हैं कि क़ाइद विरहनुमा जब तक ख़ुद पर सख्ती नहीं करता और उन आमाल व अख़लाक़ कुकसरत से नहीं अपनाताहै जिन्हें वह अपने मुतबईन में पैदा करना चाहता हैतो वह क़ियादत का सही का म नहीं करसकता है।हक़ीक़त यह है कि इस दुनिया तलबी के भयानक दौर में सूफ़ियाए कराम ने जिस अंदाजसे दुनिया को तर्क कियावह उएन सवाब और बालिग नज़री पर मबनी था।
(4)यह कुरआन वहदेस से साबित है कि नेकियां नेकियों की तरफ़ ले जा ती हैं,जब मुर्शद कामिल के ज़ाहिर वबातिन का अक्स विपरितो मुरीद के ज़ाहिर वबातिन पर पड़ता है तो ज़ाहिर भी अहकाम का पाबंद बिन जाता है और बातिन भी साफ विशफ़्फ़ाफ़ होता चला जाताहै फिर तो मुजाहिदात वरियाज़ात के फायदे नज़र में कसरत से आने लगते हैं अवरोह जिस मक़सदासली की तहसील में होते हैं उन पर उन के इसरारवरमोज़ खिलने लगते हैं और फिर वह रफ़्ता रफ़्ता पूरे तौर पर ख़ुदा की तरफ़ मुतवज्जा हो जाते हैं,हर ख्वाहिश उन के दिल से दौर हो जाती हैऔर उन्हें दुनिया के कामों से वहशत होने लगती है,वह हर इस चीज़ से किनारा कशी कशी इख्तियार करते चले जाते हैं जो उन के ज़िक्र वफ़कर और
इबादत वरियाज़त में मुख़ल होती है,अब मुर्शद जिस क़द्र कवी इलतवज्जा और अनिवार वितजल्लियात का हामिल हो गा इसी क़द्र सफ़े क़ल्ब का काम ज़्यादा हो गा,फिर मुर्शद के मुर्शद हुज़ूर ﷺकी एक ही तवज्जो पूरे सफ़ाए क़ल्ब का काम तमाम करदेती थी लिहाज़ा सहाबा में तलब इस क़द्र मोजज़िन होती कि कोई तिब्बतल वानक़ता इख्तियार करते कोई हमेशा रोज़े रखते तो कोई रात रात भर इबादत करने की ख्वाहिश करते,आका ए क्रीम ﷺकी शान ही अलग थी आप की इजाजत शरीअत का कानून बनती,ज़ाहिर है हर उम्मती इस का अहले न था लिहाज़ा यह आप की रहमत थी कि आप ने आम उम्मत को निहायत आसानी में रखावह जो भी अमल खैर करें गे वह उन का अपना फेअल होगा जिस के फायदे उन्हें नसीब होंगे लेकिन वह शरीअत का कानून नहीं हो सकता था।
फिर यह भी ध्यान रहेकि उन बुजुर्गों ने जो दस्तूर मुजाहिदात अपनाए उन का फायदा इसलाह व इरशाद में इस क़द्र काम आया कि उन के मुरीदों ने अपने मशाइख़ केऔसाफ़ वाख़लाक़ निहायत खूबी के साथ अपने अंदर पैदाकिये,उमरा वसलातीन और उलमाए ज़ाहिर की जानिब इस क़द्र लोगों का रुजहान या अकीदत न थी जो उन बुजुर्गों के साथ थी,लिहाज़ा अपने अक़ाइद वामाल में उन बुजुर्गों से सबक लेते रहे और बिद्दत वज़लालत से ख़ुद को महफूज़ रखते रहे।
फ्रीय भी ध्यान रहे कि हुज़ूराक़दस ﷺके जो गोनागों औसाफ़ विकमालात भी उन के ज़ुहूर की ताब किसी एक कौम या क़र्न के लोगों में न था,आप के कुछ कमालात जसदी थे जो जसद मुबारक से ताल्लुक रखते थे जिन का ज़ुहूर ज़्यादा तर सहाबा में हुआ इसी लिए जिहाद बाकफ़्फ़ार के लिए मैदान में उतर पड़े ओरचंद बरसों में इस्लाम को कहीं से कहीं पहुँचा दिया,बाद की उम्मत में आप के इस कमाल का ज़ुहूर हुआ जिन का ताल्लुक रूह,क़ल्ब और नफ़्स वगैरह से था,उन मुतक़द्दिमीन सूफ़िया के दौर में ही सहाबा की बरकतों से इस क़द्र इस्लाम फैल चुका था और मुसलमानों की तादाद इस क़द्र ग़ालिब हो गई
थी कि अब हर मुसलमान को जिहाद मा अलकुफ़्फ़ार की ज़रूरत नहीं रही थी,हुकूमत इस्लामीया बाज़ाबता मुनज़्ज़म हो चुकी थी,बड़ी तादाद में फौज तैयार हो चुकी थी और हर पहलू पर ख़िदमत करने वालों की बड़ी बड़ी जमातें तैयार हो चुकी थीं,अहले इल्म के मुख़तलिफ़ गिरोह मुज्तहिदयन,मुफ़स्सिरीन,मुहद्दिसीन और मुतकल्लिमैन वगैरह अलग अलग महाज़ों प्रकाम संभाले हुए थे,हुकूमत कुछ न कुछ अपने फ़राइज़ अंजाम दे रही थी ऐसे हालात में दीन का जो पहलू काम करने के लिए तिश्न था वह वही थाकि बंदों के ज़ाहिर वबातिन की तामीर उन्हें ख़ुतूत पर की जाए जिन पर सहाबा की हुई थी,यह वह अज़ीम काम था जो उन बुजुर्गों नैसब कुछ तर्क करके किया ख़लवत विजलोत में इत्तिबा सुन्नत,ख़ौफ़ वख़शीयत,तक़्वा वतहारत,तौबा वानाबत,ख़ौफ़ वर्जा,इश्क विमहबत,ईसार वस्खावत,रहमत विशफ़क़त, इख़लास वललाहीत, ज़हद व क़नाअत, सब्रोत्विकल और रज़ा बालक़ज़ा वगैरह औसाफ़ आलीया की जो कसरत सूफ़िया और उन के हम सोहबत बुजुर्गों और अहले इरादत में मिले गी वह न हुक्काम वामरा में थी और न आम उलमाए ज़ाहिर में।
(5)रसूल और नबी की तादाद में रवायात मुख़तलिफ़ हैं मशहूर है कि रसूल तीन सौ तेरह और अंबिया कम वाबेश एक लाख चौबीस हजार हैं।
नबी और रसूल की तारीफ़: में मुख़तलिफ़ अक़्वाल हैं मशहूर तहक़ीक़ी कौल यह है कि रसूल वह इंसान है जिस की तरफ़ वही शरीअत की गई हो और वह मामूर बिलतबलीग़ हो जब कि नबी आम है मामूर बिलतबलीग़ हो या न हो उलमातक़दालमुंतक़िद और इस के हाशिया इमाम अहमद रज़ा में उसे तफ़सील से बयान किया गया है,जो रसूल हो गा वह नबी भी होगा और हर नबी रसूल नहीं हो सकताहै एक वक़्त में कई कई नबी हुए हैं,हमारा मतलब इस से यह है कि जब हर नबी पर तबलीग़ वाजिब नहीं तो हरसूफी वोली पर तबलीग़ कैसे ज़रूरी हो जाएगी जब कि एक शहर में कई कई उलमा और इस्लाम वसनीयत के दाई और मबलग़ मौजूद हूँ।
यह हमारे नबी ﷺका फ़ैज़ान नुबुव्वत था कि इल्म वारफान के ऐसे चश्मे बहे कि
इस्लाम की एक सदी पूरी होते होते एक से एक बड़े मुज्तहिद,मुफ़स्सिर,मुहद्दिस और उलमा कसरत से तैयार होग्ये हुकूमत इस्लामीया के ज़रिया जो काम हो रहा था यह अलग था हर तरफ़ इस्लाम वसंत के दाई फैल ग्ये थे,ऐसे हालात में उन बे चारे सूफ़िया पर इल्जाम लगाना कि वह कसरत मुजाहिदात की वजह से कमजोर होग्ये,तर्क वितजरीद का रास्ता इख्तियार करकेसब से इलियाहदगी इख्तियारत करली जिस से दावत वितबलीग़ के काम में फ़र्क़ पड़ा यह सब तारीख से जहालत और अहकाम शरा से ना वाक़फ़ी का नतीजा है,पहली बात तो यह कि सूफ़िया में ऐसे बहुत कम हुए जिन्हों ने अपने आप को ऋषिदोहिदायत के काम से दौर रखाहु वह अपने अंदर मुजाहिदात की कुव्वत रखते थे और इस क़द्र रियाज़त शाक़ा के बावजूद अहकाम शरा की अदाइगी में उन से कभी फ़ुतूर वाक़्य न होता बल्कि उन्हों ने अपने रब तआला की मुहब्बत में सब से पाक करके इस के मुकम्मल हवाले करदिया वह चाहते थे कि हमारा कोई लम्हा याद इलाही से गाफिल न हो,वह हर इस चीज़ से दूरी इख्तियार कर लेते थे जो उन के इस काम में रुकावट बनती थी,कुरआन वसंत की रोशनी में कोई यह साबित नहीं कर सकता कि उन्हों ने ऐसे इक़दामात किए हूँ जो खिलाफ़ शरा हैं।
यह भी ध्यान रहे कि जब सारे अंबियाए कराम तबलीग़ के मामूर नहीं होते हैं फिर भी उन्हें मबऊस किया जाता है और कमालात विलायत विनबूत से सरफ़राज़ किया जाताहै,मालूम हो कि अहकाम शरा की दावत वितबलीग़ के अलावा भी बहुत काम हैं जो क़ुर्ब बंदा से मुताल्लिक़ होतेहैं ,यह काम किया होते हैं अल्लाह तआला ही बेहतर जानता है हमारे सामने बुजुर्गों की कोई ऐसी तहरीर नहीं जिस से हम समझ लें कि उन की बिअसत फलां फलां काम के लिए होती है,ज़ाहिर है कि ऐसी अज़ीम हस्तियों का वजूद बेफायदा तो नहीं हो सकता है।
फ़क़ीर मुजद्दिदी की नज़र में उन नफ़ूस क़ुदसिया के वजूद से एक बड़ा काम तो यह हो सकता है कि नफ़ूस इमारा का तज़किया उन से मुताल्लिक़ रहताहै,जब औलीए कराम अपनी बातिनी
तवज्ज्हात से नफ़ूस वकिलोब का तज़किया वितसफ़िया करते हैं तो उन बुज़ुर्गवारों की तवज्ज्हात से यह काम बतौराहसन अंजाम पाताहुगा।
दोम निरे वह उमूर हैं जिन का ताल्लुक इंतजाम आलम से होता है उन मुक़रबीन बारगाह से ऐसे उमूर भी मुताल्लिक़ हो सकते हैं जैसे औलियाए कराम में एक वह होते हैं जिन से इरशाद वासलाह का काम होता है उन्हें औलियाए इशरत कहा जाता है और एक वह जिन का ताल्लुक इंतजाम आलम से मुताल्लिक़ होता है जो अक्सर मख़फ़ी रहते हैं,उन्हें औलियाए अजिलित कहा जाताहै ।बहुत सारी अहादीस से साबित है कि अल्लाह तआला के मुक़र्रब बंदों के वजूद से बुलाएं दफा होती हैं ,बारिशें होती हैं और अहले हक़ को फतेह विंसरत नसीब होती है,उन बुजुर्गों की तवज्ज्हात से अज़ाब दफा हो जाते हैं ,गुनाहों की मग़फ़िरत होती है,बीमारियों से निजात मिलती है और लोगों की मुश्किलें हल हो ती हैं,उन में कुछ ऐसे भी होते हैं जो आलम के वजूद वबकाकासबब बनते हैं औलियाए कराम के बहुत सारे इक़साम हैं और उन की जुदा जुदा ख़िदमात हैं और इलियाहदा इलियाहदा मन्सब हैं उन में बहुत से उमूर अहादीस करीमा से साबित हैं और अर्बाब कश्फ़ ओलिया के तो इसी क़द्र मुशाहदात हैं ,सारे औलियाए कराम का इजमा है कि ऐसे बंदे दुनिया में होते हैं,अब ऐसे नफ़ूस क़ुदसिया की शहादतों को मुस्तर्द करदेना और उन के इजमा को ठुकराना कोई बड़ा मुआनद ही कर सकताहै,हैरत तो यह कि तन्क़ीद पर कलम चलाने वाले जब इल्म अहादीस के इंकार पर आते हैं तो इब्न तिमीह जैसे बदनाम कासहारा और नाम ले कर अहादीस ज़आफ़ तो कजा अहादीस सहीहा का इंकार कर बैठते हैं क्यों कि वह अहादीस बुजुर्गों और सूफ़ियों के मामूलात में मिलती हैं यातसोफ़ के किसी हिस्से का उन से सबूत होताहै,और दूसरी तरफ़ जिन वाक़ियात से बुजुर्गों पर एतराज़ात का मौका मिलता था या तन्क़ीद की जा सकती थी वहाँ रिवायत विद्रायत के सारे वसूल बालाए ताक रख कर बे जा तन्क़ीद करते चले ग्ये।
ख़ुर्द वनोश के दीवानों से कोई पूछे कि वह दीन की किया किया खिदमतें करते हैं? किस क़द्र तबलीग़ करते हैं? किया इबादत करते हैं? कितने लम्हात ज़िक्र इलाही में बसर करते हैं?किस क़द्र कौम उन से जड़ी हुई है? ख़ुद उन के अंदर कितना तशरा है,उन के सीने किस क़द्र कैनों से पाक हैं,किस क़द्र रिज़ाइल नफ़्स के वह असीर हैं? परवरदिगार आलम हिदायत दे ,इआमीन।
यह हमेशा ध्यान में रहे कि बुजुर्गों का तर्क तआम मुजाहिदा का रुकन नहीं कि आदमी खाना छोड़ दे,बल्कि तक़लील तआम है यानी कम खाना इस की भी एक मिक़दार है,फिर यह अरकान मक़ासिद में से नहीं हैं,तज़किया नफ़्स जिस का कुरआन मजीद हुक्म देता है और इस पर फ़लाह को मुरक्कब करनेका एक तरीका है अगर मुजाहिदा के बग़ैर तज़किया हासिल हो जाए जिस का ज़िक्र आगे आये गा तो मुजाहिदा की ज़रूरत नहीं,हां हर मामला में सुन्नत का इल्तिज़ाम हर हाल में ज़रूरी है।
यह भी ध्यान में रहे कि बाज़ बुजुर्गों ने बाज़ इश्याय को तर्क किया और उन के खाने से परहेज़ किया ,आज भी बाज़ आमाल वाहिज़ाब में तर्क जमाली विजलाली करना पड़ता है,मोतरिजीन नेइस पर ला ताइल बहसें शुरू कर दें और इस का रिश्ता तहरीम माआहिल अल्लाह से जोड़ दिया यानी अल्लाह तआला की हलाल करदा चीजों को हराम ठहराना और फिर इस पर हुज़ूर ﷺके वाक़ा शहद और कुरआन की हिदायत के ज़रिया इस की क़बाहत विष्णुआअत के ज़रिया मुख़ालिफ़ीन का एतराज करना अजब मुज़हका ख़ेज़ है,कहां तहरीम माआहिल अल्लाह और कहां बतौर इलाज यह तर्क,तमाम लोगों का मुशाहिदा है कि आये दिन अत्बा और डाक्टर मरीजों को उन के मर्ज के ऐतबार से चीजें मना करते रहते हैं ,नरी चीजें हैं जो मिजाज के खिलाफ़ होती हैं और खाने पर बीमारी का सबब बनती हैं तो किया यह सब तहरीम मा अहल अल्लाह है?
(6)हज़रत मुजददक़दस सिर्रहू का इरशाद: हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू ने खाने
के मुजाहिदे के ताल्लुक से जो इरशाद फ़रमाया है उसे जरूर जेहन में रखें सवाल विजवाब का खुलासा हाजिर है।
सवाल: सिलसिला आलीया नक़्शबंदिया में इत्तिबा सुन्नत का इल्तिज़ाम है और तरीके का मदार ही इत्तिबा सुन्नत पर है हालाँकि सर्वर कोनेन ﷺने अजीब ग़रीब रियाज़तीं कीं और सख्त भूक बर्दाश्त किए जैसे तूल क़याम लील और शब् बेदारी इस हद तक कि पैरों पर वर्म आजाता,सौम विसाल,जिहाद बाकफ़्फ़ार,शिद्दत की गर्मियों में बराए तरवेज दीन दौर दराज़ के सफर जब कि तरीका नक़्शबंदिया में रियाज़तों से मना करते हैं बल्कि चूंकि रियाज़तों से सूरतों के किशोफ़ का ज़ुहूर होता है इस लिए मुज़िर और नुकसान दह ख़याल करते हैं,यह अजीब बात है जब रियाज़त विमुजाहिदे सुन्नत हैं तो सुन्नत में एहतिमाल जरुर कैसे हो सकता है?
जवाब:किस ने कह दिया कि तरीका नक़्शबंदिया में रियाज़तीं ममनू हैं और कहां से सन लिया कि नक़्शबंदी रियाज़तों को नुकसान दह ख़याल करते हैं इस तरीका के मुजाहिदात वरियाज़ात यह हैं(1)मुहाफ़ितत सुन्नत का दवाम(2) मुताबेत सुन्नत का इल्तिज़ाम अला साहबहा अस्सलात वस्सलाम (3)सत्र अहवाल यानी अहवाल छिपाने में सई वकोशिश करना(4)खाने और लिबास में तवस्सुत और हद एतिदाल की रियायत करना यह सब उमूर दुश्वार विकठन मुजाहिदे और रियाज़तीं हैं,ज़्यादा से ज़्यादा यह कि अवाम कालानाम उन उमूर कोरियाज़त नहीं शुमार करते और न ही मुजाहिदात समझते हैं,बल्कि भूका रहने और भूक की ज्यादती विकसरत उन के नज़दीक बड़ी क़द्र वाली चीज़ है इस लिए कि बहाइम सफ़तों के नज़दीक खाना सब से अहम चीज़ और सब से बड़ा मकसदहे तो ला मुहाला इस कातरक ही रियाज़त शाक़ा और मुजाहिदा शदीदा होगा,इस के बुर खिलाफ़ मुहाफ़िज़त सुन्नत का दवाम और मुताबेत सुन्नत अला साहबहा अस्सलात वस्सलाम का इल्तिज़ाम और इस जैसी दीगर चीजों का अवाम की नज़र में कोई क़द्र नहीं और न ही कोई शुमार कि उन के तर्क को मुनकरात या बुराइयों से
जान कर रियाज़ात में से शुमार करें,पस इस तरीका के अकाबिर पर लाज़िम है कि सत्र अहवाल में कोशिश करें और इस रियाज़त को तर्क करें जो अवाम की नज़र में बड़ी क़द्र वाली है,कबूल ख़ल्क़ का सबब है, शहरत को मुस्तलिज़्म है जो(शहरत)कि आफत को मुतज़िमन और शरारत का समरा देती है।हुज़ूर अकर्म सिल्ली अल्लाह अलैहि वस्म ने इरशाद फ़रमाया:आदमी की बुराई के लिए इतना ही काफ़ी है कि इस की दीन वदुनिया में उँगुलियों से इशारा किया जाए।’’
मगर अल्लाह तआला जिसे महफूज़ रखे,फ़क़ीर(हज़रत मुजददक़दस सिर्रहू) के नज़दीक माकूलात(खानों) में हद एतिदाल की रियायत ब मुक़ाबिल बहुत ज़्यादा भव का रहने के ज़्यादा आसान है और बहुत सहूलत रखता है और फ़क़ीर पाता है कि तवस्सुत हाल की रियायत कसरत जू की रियाज़त से ज़्यादा है ,हज़रत वालिद बुज़ुर्गवार क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते थे कि इल्म सुलूक में में ने रिसाला देखा है कि जिस में लिखा था कि माकूलात में एतिदाल की रियायत रखना और मियाना रवी पर निगाह रखनामतलूब तक वसूल में काफ़ी है,इस मुराआत के साथ ज़िक्रोफ़िकर की कुछ हाजित नहीं ,हक़ यह है कि मताऊमात विमलबूसात में तवस्सुत हाल और मिया न रवी बहुत अच्छी चीज़ है।
न चंदाँ ख़ौर कज़ दहांत बुर आयेद
न चंदाँ की अज़ ज़ोफ़ जानत बुर आयेद
यानी इतना न खाओ कि मुँह से निकलने लगे और न इतना कम कि कमज़ोरी की वजह से जान निकल जाए। हमारे हुज़ूर ﷺको अल्लाह तआला ने चालीस मुर्दों की ताकत अताफ़रमाई थी कि इस ताकत की वजह से कठिन और दुश्वार भूकों को बर्दाश्त कर लेते थे,और सहाबा कराम रिज़वान अल्लाह अलैहिम अजमईन भी हज़रत खैर अलबशर ﷺकी सोहबत की बरकत की वजह से इस बोझ को बर्दाश्त कर ले ग्ये और उन के आमाल वाफ़आल में किसी तरह का खलल वफ़्तूर वाक़्य न हुआ,भूक के बावजूद आदा और दुश्मनान दीन के साथ जिंग की ताकत वक़्दरत इस नहज प्ररखते थे कि सीरशिकम और पेट भरे लोग दसवीं हिस्से को
भी नहीं पहुँचीं गे,यही वजह है कि अहले सब्र से बेस लोग दो सौ काफ़िरों पर ग़ालिब आगीएऔर सौ अश्ख़ास ने हजार लोगों पर ग़लबा हासिल किया जब कि सहाबा के अलावा दूसरे भूक झेलने वाले लोग जिंग तो जिंग क़रीब है कि आदाब वसंन की बजा आवरी में आजिज़ रह जाएँ बल्कि बहुत मुमकिन है कि अदाय फर्ज़ की जिम्मा दारियां बतकल्लुफ़ पूरी कर सकें,बुला ताकत इस मामला में सहाबा कराम की तक़लीद करना फ़राइज़ वसंन की अदाएगी में ख़ुद को आजिज़ करना है।
मनक़ूल है कि हज़रत अबूबक्रसिद्दीक़ रज़ि अल्लाह अन्हु ने रसूल अकर्म ﷺकी तक़लीद की और सौम विसाल रखने लगे और ज़ोफ़ वनातवानी की वजह से बे इख्तियार जमीन प्रगरपड़े,हुज़ूर ﷺने बितरीक़ एतराज फ़रमाया:तुम में हमारी मसल कौन है? में अपने रब के पास रात गुज़ारताहों और वहीं से खातापीता हूँ।’’पस बे ताकत तक़लीद करना अच्छा नहीं जाना।
नीज़ सहाबा खेरालानाम ﷺकी बरकत सोहबत की वजह से कसरत जू के पोशीदा असरात बद से महफूज़ विमामून थे जब कि दूसरों को यह अमान मयस्सर नहीं है,इस का बयान यह है कि भूक की कसरत जरूर सफ़ाबख्श है किसी गिरोह को सफ़ाए क़ल्ब बख्शती है और किसी दूसरे गिरोह को सफ़ाए नफ़्स,सफ़ाए क़ल्ब हिदायत अफ़्ज़ा और नूर बख्श है और सफ़ाए नफ़्स ज़लालत नुमा और ज़ुल्मत अफ़्ज़ा,यूनान के फ़लसफ़ियों और हिंदोस्तान के जोगियों और ब्राह्मणों को भूक ने सफ़ाए नफ़्स बख्श कर गुमरही और ख़सारा की रहनुमाई की,बे खुर्द अफलातून ने अपने सफ़ाए नफ़्स पर भरोसा और एतिमाद किया अंजाम कार कशफ़ी और खयाली सूरतों को अपना मुक़तदा और पेशवा बना कर अजब और खुदबीनी का शिकार हुआ और हज़रत ईसा अलैहि अस्सलाम जो कि इस वक़्त में मबऊस थे की इताअत इख्तियार न की और कहा:
नहन कौम महदेवन ला हाज बना अला मिन यहुदेना।(हम हिदायत याफताह कौम हैं