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Allama Afaque Ahmad Mujaddidiतसव्वुफ़ और इस के फ़वाइद5।सगीरा गुनाह कबीरा कैसे बनते हैं

अध्याय 21 में से 54पृष्ठ 256–268

5।सगीरा गुनाह कबीरा कैसे बनते हैं

सगीरा के कबीरा होने के मुतअद्दिद असबाब हैं:

(अल्फ़)इसरार यानी गुनाह पर डटा रहना, उसे बार बार करना, अगर ऐसा हो सके कि एक कबीरा के बाद आदमी बाज़ रहे, दूसरा कबीरा न करे तो इस सगीरा गुनाह के मुकाबले में माफी की ज़्यादा उम्मीद है जिस पर वह इसरार कर रहा है।

(ब)गुनाह को हक़ीर और मामूली समझना। जब गुनाह को बड़ा समझा जाता है तो अल्लाह तआला के यहाँ वह छोटा होता है और जब छोटा समझा जाता है तो वह इस के यहाँ बड़ा होता है क्यों कि बड़ा समझना इस बात की दलील है कि वह इस से नफरत करता है, इस के ब्रअक्स छोटा समझना उलफ़त पर दलालत करता है। हदीस शरीफ़ में है: मोमिन अपने गुनाह इस तरह देखता है जैसे इस के उपर पहाड़ हो और इस के गिरने का डर हो और मुनाफ़िक़ अपने गुनाह को मक्खी की तरह देखता है जो इस की नाक पर गुज़रती हैतो वह उसे उड़ा देता है।

(ज)सगीरा गुनाह पर खुश होना और फख्र करना भी कबीरा करता है नीज़ यह कहना कि मुझ से यह काम नेमत ख़ुदावंदी की वजह से हुआ है हालां कि वह इस बात से गाफिल है कि इस का सबब बदबख़ती है। पस जब भी बंदे को सगीरा गुनाह की लज़्ज़त हासिल होती हैतो वह कबीरा हो जाता है और दिल की स्याही में इस का असर ज़्यादा होता है।

(द)अल्लाह तआला बंदों के गुनाहों की पर्दा पोशी करे और हुलम से काम ले और ढील दे, बंदा इस को मामूली समझे और उसे मालूम न हो सके कि यह ढील सज़ा है ताकि इस तरह इस का गुनाह बढ़ जाए और बंदा समझे कि गुनाहों पर इस की ताकत व

कुदरत अल्लाह तआला की इनायत है।

(ह)गुनाह करके उसे ज़ाहिर करना भी सगीरा कोकबीरा बना देता है, इस के इस अमल से दूसरों को गुनाह की रगबत होती हैऔर इस के ज़रिया वह अपने फेअल गुनाह प्रदूसरे को गवाह भी बनाता है और यह दोनों ही बातें जुर्म हैं। इस तरह सगीरा को ताकत मिल जाती है और वह कबीरा होजाता है। हदीस शरीफ़ में है: तमाम लोगों के लिए माफी है, लेकिन गुनाह को ज़ाहिर करने वालों के लिए नहीं , तुम में से कोई गुनाह की हालत में रात गुज़ारता है जिस पर अल्लाह तआला ने पर्दा डाल दिया होता है और वह बंदा पर्दे को फाड़ देता है और अपना गुनाह बयान करता फिरता है। (बुखारी शरीफ़)

(व)गुनाह करने वाला आलम हो और लोग इस की इक़तिदा व पैरवी करते हूँ। जब वह इस का इर्तिकाब यों करे कि लोग देख रहे हूँ तो यह कबीरा गुनाह हो जाएगाजैसे कोई आलम रेशमी कपड़ा पहने, सोने की सवारी पर सवार हो, बादशाहों से शुबहा के तौर पर माल हासिल करे, बादशाहों के पास आमद व रफ्त रखे और उन के माल को बराबर जाने, बल्कि उन की मदद करे। मुसलमानों की इज्जत के खिलाफ़ ज़बान खोले, मुनाज़रात में हद से तजावुज़ करे और मकसूद दूसरे फ़रीक़ की तौहीन करना हो, ऐसे उलूम में मशगूल हो जिन का मक़सद महज़ मर्तबे का हुसूल हो जैसे जदल व मुनाज़रा का इल्म। यह वह गुनाह हैं जिन में आलम की इत्तिबा की जाती है, अब वह आलम दुनिया से रुखसत हो जाता है, लेकिन इस की बुराई बाक़ी रहती है और अरसा दराज़ तक दुनिया में फैलती रहती है।

फ़क़ीर मुजद्दिदी अर्ज़ करता है कि यह तो हज़रत इमाम ने अपने दौर के लिहाज से उन उलमा के अफ़आल ज़िक्र फ़रमाए जिन्हें आम तौर पर गुनाह नहीं समझतेथे, वर्ना अब तो हाल यह है कि सगीरा तो कजा कबीरा का इर्तिकाब खुल्लम खुला बरसरेआम होता है। दर्स गाहों में नज़र बाजी, गैर मुहर्रमों के साथ हँसी मजाक, ग़ैबतें, चुगलियां, दुनिया के माल व मता और जाह व मन्सब की तरग़ीब, फिसाक़ व फ़िजार और काफ़िर व मुस्लिम नेताओं की ताज़ीम व तकरीम, अप

अपने काम के बदले रूपए तलब करना, मनबरों और स्टेजों पर एक दूसरे की तज़लील व तहक़ीर, मशरबी सुबाई असबीयतें, किसी से बुग़ज़ व इनाद को शरई रूप देना, और इस के खिलाफ़ इश्तिहारात शाय करना, नमाज़ का तर्क, जमातों से लापरवाही वगैरह वगैरह।

किया किया गुना जाए, क़ल्ब व क़ालिब से मुताल्लिक़ा ना मालूम कितने जराइम का अवाम के सामने इज़हार ही नहीं होता, नाजायज़ कामों को जायज़ साबित करते हैं और लोगों को मुआवनत पर उभारते हैं, अपनी बुराइयां छिपाने के लिए दूसरों के तक़्वा का मजाक उड़ाते हैं। इस का नतीजा है कि अवाम गुनाहों पर दिलेर हो गए और वह साफ साफ कहते हैं कि जब मौलाना लोग ऐसा कर रहे हैं तो हमें किया हर्ज है। दुनयवी माल व मता की खातिर इलेक्शन लड़ते हैं, मुख़तलिफ़ पार्टियों में शमूलीयत इख्तियार करते हैं और उन की बेजा हिमायतें करते हैं। अल्लाह तआला अमान में रखे। तौबा की बहस में हम ने निहायत इख़तिसार के साथ जराइम और उन की सजाएं वगैरह इसी लिए दर्ज कीं ताकि गुनाह को गुनाह समझें और उन की क़बाहत और उखरवी वबाल पर मतला हो कर तौबा करें। बहुत से निरे गुनाहों को गुनाह ही नहीं समझते और बाज़ ऐसे हैं जो सब को सगीरा ही समझते हैं। फिर बंदों की रज़ा के तालिब बहुत से वाइजीन व मुक़ररीन उन गुनाहों के बावजूद उन्हें जन्नत की बशारतें देते रहते हैं।

हज़रत इमाम हज उलइस्लाम क़ुद्दिस सिर्रहू हदीस पाक का यह हिस्सा ‘‘जिस ने कोई बुरा तरीका जारी किया इस पर इस का गुनाह होगा और उन लोगों का गुनाह भी जो इस पर अमल करें गे, लेकिन उन के गुनाह में भी कमी न होगी। नीज़ इरशाद ख़ुदावंदी:

وَ نَکْتُبُ مَا قَدَّمُوۡا وَ اٰثَارَہُمْ (سورۃ یٓس: ۳۶؍۱۲)

तर्जुमा: और हम लिख रहे हैं जो उन्हों ने आ गे भेजा और जो निशानियां पीछे छोड़ गए।’’

आसार से मुराद वह आमाल हैं जो इसी अमल करने वाले और इस के अमल के ख़त्म हो जाने के बाद वजूद में आते हैं। हज़रत इब्न अब्बासरज़ि अल्लाह अन्हु फ़रमाते हैं: आलम के लिए खराबी इस की इत्तिबा की वजह से होती है, इस से कोई लग़्ज़िश हो जाती है। फिर वह इस से रुजू कर लेता है, लेकिन लोग इस काम को करने लगते हैं और पूरे आलम में फैला देते हैं। बाज़ बुजुर्गों का कहना है: आलम की लग़्ज़िश किश्ती के टूटने की तरह है, वह ख़ुद भी डूबती है और जो इस में सवार हैं वह भी डूबते हैं।

इस से वाज़िह होता है कि उलमा का मामला ज़्यादा खतरनाक है। लिहाज़ा उन पर दो जिम्मा दारियां हैं। एक तर्क गुनाह, दूसरे छुपाना और जैसा कि गुनाहों की वजह से उलमा की सज़ा ज़्यादा है इसी तरह उन की नेकियों का सवाब भी ज़्यादा है अगर शरीअत के मुताबिक चलें। पस जब वह ज़ेब व जीनत और दुनिया की तरफ़ मेलान छोड़ दें और थोड़े माल पर क़नाअत कर लें, हसब ज़रूरत रिज़्क़ और सादे कपड़ों पर सब्र कर लें और लोग उन की इत्तिबा करें तो इत्तिबा करने वालों के बराबर सवाब मिलेगा। और अगर उन का ज़ेब व जीनत की तरफ़ मेलान हो तो इस से निचले दर्जे के लोगों की तबीअत इस से मुशाबहत की तरफ़ मेलान रखे गी और फिर उन के लिए वह मुख़तलिफ़ हियलों से दौलतीं जमा करें गे।

सच्ची तौबा

बह्र हाल इंसान को चाहिए कि वह गुनाहों की तफ़सील जाने और मालूम करे कि किस गुनाह से तौबा का किया तरीका है। तौबा हर गुनाह के अज़ाले के लिए काफ़ी व वाफ़ी है। कोई गुनाह ऐसा नहीं कि सच्ची तौबा के बाद बाक़ी रहे यहाँ तक कि कुफ्र व शिर्क भी। सच्ची तौबा के यह मानी हैं कि गुनाह पर इस लिए कि वह इस के रब इज़ व जल की नाफ़रमानी नादिम व परेशान हो कर फ़ौरन छोड़ दे और आइंदा कभी इस गुनाह के पास न जाने का सच्चे दिल से पूरा अज़म करे। जो चारा कार इस की तलाफ़ी कापने हाथ में हो बजा लाये मसलन नमाज़ रोज़े के तर्क या गजब, सरक़ा (चोरी) रिश्वत, रब्बा (सूद) कि

सिर्फ़ आइंदा के लिए उन जराइम का छोड़ देना ही काफ़ी नहीं, बल्कि इस के साथ यह भी ज़रूरी है कि जो नमाज़ रोज़े नाग़ा किए उन की क़ज़ा करे, जो माल जिस से छीना, चुराया, रिश्वत, सूद में लिया उन्हें और वह न रहे हूँ तो उन के वारिसों को वापस कर दे या माफ़ किराये, पता न चले तो इतना माल तसदक़ कर दे और दिल में नियत रखे कि वह लोग जब मिलें अगर इस तसदक़ पर राजी न हुए तो अपने पास से उन्हें फिर दों गा। (फतावा रिज़वीह बहवाला शरह फ़िक़्ह अकबर)

तौबत अलसर्र व तौबत अलऐलान

तन्हाई में गुनाह किया तो इस की तौबा भी तन्हाई में काफ़ी है और मजमा और लोगों के सामने किया तो इस की तौबा भी मजमा में ज़रूरी है। इमाम अहले सुन्नत आला हज़रत अलैहि अलरहम व इलरिज़्वान के जामा कलाम का खुलासा दर्ज है, फ़रमाते हैं कि वह गुनाह जो ख़ल्क़ पर भी ज़ाहिर हो जिस तरह ख़ुद इस के लिए । इस के दो ताल्लुक हैं; एक बंदे और ख़ुदा में कि अल्लाह इज़ व जल की नाफ़रमानी और इस कासमरा जल व अला की मआज़ अल्लाह नाराजगी इस के अज़ाब मुनक़ते या अब्दी का इस्तिहक़ाक़। दूसरा बंदे और ख़ल्क़ में कि मुसलमानों के नज़दीक वह आस्म (गुनह गार) व ज़ालिम या गुमराह व काफ़िर गुनाह की हैसियत के ऐतबार से ठहरे और इस के लायक सलाम व कलाम व ताज़ीम व इकराम व इक़तिदए नमाज़ वगैरहा उमूर व मामलात में इस के साथ उन्हें बरताव करना हो। यों ही इस से तौबा के लिएभी दो रुख हैं। एक तरफ़ ख़ुदा इस का रुकन आज़म बसदक़ दिल इस गुनाह से नदामत है, फ़ी अलहाल इस का तर्क और इस के आसार मिटाना और आइंदा कभी न करने का सही अज़म है। यह सब बातें सच्ची पशेमानी को लाज़िम हैं; इसी लिए रसूल अल्ला ﷺ ने इरशाद फ़रमाया: अलंदम तौबत (नदामत तौबा है) यानी वही सच्ची सादक़ा नदामत कि बक़ीया अरकान तौबा को ख़ुद मुस्तलिज़्म है, इसी का नाम तौबत अलसर्र है। दूसरा जानिब ख़ल्क़ कि जिस तरह उन पर गुनाह ज़ाहिर हुआ उन के क़ुलूब में इस की तरफ़ से कशीदगी पैदा हुई और मामलात में इस के साथ गुनाह के लायक उन्हें अहकाम दिए गए। इसी तरह इस तौबा व रुजू

ज़ाहिर हो कि उन के दिल इस से साफ हूँ और अहकाम हालत ब्रायत की तरफ़ मुराजयत करें, यह तौबा अलानिया है। तौबा सर सेतो कोई गुनाह खाली नहीं हो सकता और गुनाह अलानिया के लिए शरा ने तौबा अलानिया का हुक्म दिया है।

अलानिया तौबा की हिकमतें

पहली हिक्मत यह है कि हमें आपस में सुलह व सफ़ाई के साथ रहने का हुक्म है। यह गुनाह अलानिया तौबा अलानिया पर मौक़ूफ़ कि जब मुसलमान इस के गुनाह से आगाह हुए, अगर तौबा से वाकिफ़ न हूँ तो उन के दिल इस से वैसे ही रहीं गे जैसेतौबा से पहले थे। दोम जब लोग उसे बुरा समझे हुए हैं तो इस के साथ वही मामलात बाद व तनफ़र रखें गे जो इस के बग़ैर के साथ दरकार हैं, अली अलख़सूस बदमजहब लोग। सोम जब यह वाक़ा साबित हो गया और नबी ﷺ ने फ़रमाया: जिस ने गुनाह से तौबा कर ली तो वह इस की तरह है जिस ने गुनाह नहीं किया। तो मुसलमानों के वह मामलात वाक़्य की तरफ़ नज़र करते हुए बेजा हूँ गे और इस बेजा पर ख़ुद यह शख्स आमिल हुआ कि अगर अपनी तौबा का ऐलान कर देता तो क्यों वह मामलात रहते। चहारम ऐसे गुनाहों में जो बदमजहबी बददेनी है एक सख्त आफत का अंदेशा है कि अगर यह मर गया और मुसलमानों पर इस की तौबा ज़ाहिर नहीं और बदमजहब की मुज़म्मत इस के मरने पर भी जायज़, बल्कि कभी शरण वाजिब है तो अहले सुन्नत उसे बुरा और बददीन और गुमराह कहीं गे और आका ﷺ ने अहले हक़ मुसलमानों को जमीन में अल्लाह इज़ व जल का गवाह बनाया है, आसमान में इस के गवाह मलाइका और जमीन में अहले सुन्नत तो उन की गवाही से इस पर सख्त जरुर का ख़ौफ़ है और इस में वह ख़ुद कसूर वार है कि तौबा का ऐलान कर देता तो उन के दिल साफ हो जाते।

पंजिम यह कि गुनाह अलानिया दोहरा गुनाह है इस लिए कि ऐलान गुनाह दूसरा गुनाह है, बल्कि इस गुनाह से भी बदतर गुनाह है। ऐलान गुनाह पर बाइस नफ़्स कि जुरात व जसारत व सुरक्षी व बे हयाई है और मर्ज का इलाज ज़िद से होता है। जब मुसलमानों के मजमा

में अपनी नदामत व पशेमानी ज़ाहिर करेगा और अपने कौल या फेअल या अक़ीदा की बदी व शनाअत पर इकरार लाएगा तो इस से जो इन्किसार पैदा हो इस सुरक्षी की दुआ होगा।’’ (माख़ूज़ अज़ फतावा रिज़वीह, जिल्द सोम)

फ़क़ीर मुअल्लफ़ कहता है कि उन हिक़मतों के साथ साथ यह भी जेहन में रहे कि बदकीदगी वगैरह ऐसे गुनाह होते हैं जिन का गुनाह होना हर एक नहीं समझ पाता है, बल्कि बहुत से लोग धोका खाकर इस के फरेब में आजाते हैं और इस की बदकीदगी को कबूल कर लेते हैं, बल्कि बहुत से वह लोग जो ख़ुद को अहले सुन्नत ही कहते हैं, मगर ऐसे लोगों की क़ुरबत व सोहबत या उन की बिद्दतों की इशाअत व शहरत से हक़ मुश्तबा हो जाता है। अब अगर ऐसा शख्स बालऐलान तौबा करता है तो उन्हें भी हिदायत नसीब होगी जो उन के कहने वगैरह से बदक़ीदा हो गए नीज़ जिन पर हक़ मुश्तबा हो रहा था उन पर भी हक़ वाज़िह हो जाएगा और अहले हक़ को मज़ेद ताईद व तक़वियत और उन के दलों को खुशी हासिल होगी।

ख़याल रहे कि तौबा के ताल्लुक से रफ़्ता रफ़्ता बात काफ़ी तवील हो गई हालां कि लोगों के हालात चाहते हैं कि मज़ेद इस पर तफ़सील हो। तौबा बड़ी अहम चीज़ है, अहले सुलूक को महज़ गुनाहों ही से तौबा की ज़रूरत नहीं पड़ती है, वह जिस नूर और सफ़े क़ल्ब व क़ुर्ब के तालिब होते हैं इस के लिए उन उमूर से तौबा की ज़रूरत पड़ती है जिन्हें उलमा ने गुनाह नहीं कहा मसलन दिल का याद ख़ुदा से गफलत बरतना। सूफ़िया के यहाँ हर वक़्त ज़िक्र व याद की ज़रूरत है, मामूली गफलत भी वह जरुर तसोर करते हैं। इसी तरह फिसाक़ व फ़िजार वगैरह के साथ इख़तिलात व मुलाक़ात और उन की सहबतें दलों को मुकदर और आलूदा करती हैं ,हलावत और ज़ौक़ को ख़त्म करती हैं। बातिन में उन के आने से वह कैफीतें नहीं रहतीं जो होनी चाहिए। यही सालिक जों जों नीचे से उपर की तरफ़ जाता है और इस के यकीन व इख़लास में इजाफा होता है तो वह साबिक़ा

मंजिलों की इबादात व अज़कार को हिकारत और कसूर की सूरत में देखता है और वह अपनी साबिक़ा इबादतों से तौबा करता है, बड़ा मशहूर शेअर है؎

आसीयां अज़ गुनह तौबा कनंदआरिफ़ाँ अज़ इबादत इस्तिग़फ़ार

गुनहगार गुनाहों से तौबा करते हैं और अहले मार्फत इबादत से। इस का मतलब वही है जो मज़कूर हुआ। इसी तरह कभी खिलाफ़ औला और तर्क मुस्तहब व संन गैर मउकदा के तर्क पर बातिन में ऐसी कदूरत और ज़ुल्मत महसूस होती हैकि बयान से बाहर है। कभी कब्ज की कैफियत पैदा हो जाती है और कई कई दिन तक रहती है, उन सब की दुआ तौबा है और रब जल व अला की बारगाह में तज़रा व ज़ारी।

यह चंद मिसालें अर्ज़ कर दें। शैख़ को चाहिए कि मुरीदों में तौबा का एहसास बड़ी कसरत से पैदा करे और हर गुनाह वगैरह की तौबा इसी तरह किराये जैसा कि उलमा ने बयान किया है और मशाइख़ के वाक़ियात तौबा वगैरह सुनाए। तौबा अलानिया में नफ़्स पर बहुत जबर करना पड़ता है जो ख़ास कर आज के जमाने में बड़ा मुश्किल है। अहले हक़ से कोताहियों की सूरत में माफी माँगना और सब के सामने रुजू करना और उन के अम्वाल वापस करना यह सब के बस की बात नहीं, इस काम के लिए बहुत कुछ तैयार करना पड़ता है।

गुनाहों के असरात बद

बुजुर्गों के कलाम से अख़ज़ करके गुनाहों की चंद नहूसतें लिखता हूँ, गौर करें कि गुनाह दुनिया व आख़िरत में किस क़द्र ख़सारा का सबब है:

(1)मामूली गुनाह की नहूसत ताअत से महरूमी और हलावत इबादत का फ़ौत होना है, बल्कि जो गुनाह का इरादा करता हैवो भी महरूम होता है। अल्लाह तआला ने अपने नबी यहाअलैहि अस्सलाम को कुरआन शरीफ़ में ‘‘सय्यद’’ (सरदार) बनाया इसी लिए कि उन्हों ने कभी गुनाह का रादा भी नहीं किया।

(2)आदमी बराबर गुनाह करे और बजाहिर कोई नहूसत न मालूम हो तो फिर यह होता है

बंदा पर जो हालत भी आती वह इस की सज़ा होती है। अगर ज़िन्दगी में कुशादगी है तो वही इस की सज़ा है और इस्तिदराज से महफूज़ नहीं रहता और अगर ज़िन्दगी में तंगी है तो वही इस की सज़ा है। एक रिवायत में है कि बंदा गुनाह की वजह से रिज़्क़ से महरूम हो जाता है और कहते हैं कि रिज़्क़ हराम नेक आमाल की तौफ़ीक़ की कमी की वजह से आता है।

हज़रत अब्द अल्लाह इब्न मसाऊदरज़ि अल्लाह अन्हु फ़रमाया करते थेकि मेरा गुमान यह है कि बंदा गुनाह की वजह सेइल्म भूल जाता है और अगर तौबा, इल्म और इस्तिक़ामत अली अलता की कोई और बरकत न हो तो कम से कम यह होता है कि बंदा की जो हालत भी होती है वह इस से बेहतर होती है, अगर कुशादगी है तो वह अल्लाह तआला की मेहरबानी और लुत्फ़ व कर्म है, और अगर तंगी है तो वह इम्तहान और बंदा के लिए इस का इंतखाब है और वह इस की हलावत व लज़्ज़त पाता है क्यों कि वह इसी के रास्ते में है।

उलमा का यह भी इरशाद है कि गुनाह की नहूसत यह भी है कि वह उलमा की मजलिसों और अहले खैर की मुहब्बतों से महरूम हो जाता है और सालिह और अहले इल्म इस से बुग़ज़ रखते हैं और आराज़ करते हैं । यह भी फ़रमाया गया है कि वह ऐसे इल्म से महरूम हो जाता है जिस के बग़ैर अमल की इसलाह नहीं हो सकती।

(3)अहले शाम के एक सोफी फ़रमाते हैं कि एक खूबसूरत नसरानी लड़के पर मेरी नज़र पड़ी तो रुक कर में उसे देखने लगा, मेरे पास से इब्न जिला दमिश्क़ी गुज़रे और मेरा हाथ पकड़ लिया, मुझे उन से श्रम आई, में ने कहा: ‘‘सुबहान अल्लाह! मुझे इस खूब सूरत चेहरेऔर इतनी उम्दा ख़लक़त पर ताजब हो रहा है, उसे आग के लिए कैसे पैदा किया गया है, उन्हों ने मेरा हाथ दबाते हुए कहा कि कुछ अरसा बाद तुम जरूर इस की सज़ा पाओगे। फ़रमाते हैं : इस के बाद तीस साल तक में ने सज़ा पाई।

बाज़ इस्लाफ़ फ़रमाते हैं कि में अपने गधे की सुरक्षी में अपने गुनाह की

सज़ा पहचान लेता हूँ। किसी ने फ़रमाया कि में अपनी सज़ा पहचान लेता हूँ यहाँ तक कि अपने घर की आग में।

हज़रत मंसूर फ़क़ीह से मर्वी है, फ़रमाते हैं: में ने अबदुल्लाह अलसकरी को ख्वाब में देखा, पूछा कि किया मामला हुआ तो फ़रमाया कि मुझे अपने सामने खड़ा किया कि में पसीने में डूब गया यहाँ तक कि मेरे रुखसार का गोश्त गिरपड़ा, में ने पूछा: वह क्यों? फ़रमाया कि में ने एक लड़के को आते हुए और जाते हुए देखा था।

सजाएं

सज़ा दरअसल शिद्दत व मशक्कत का नाम है। लिहाज़ा हर बंदे की सज़ा इस पर होने वाली शिद्दत है। चनां चह अहले दुनिया की सज़ा रिज़्क़ दुनिया से महरूमी कि कमाना दुश्वार हो जाए और अम्वाल ज़ाए होने लगीं और अहले आख़िरत की सज़ा रिज़्क़ आख़िरत से महरूमी है कि आमाल सालहा की तौफ़ीक़ कम हो जाए और उलूम सादक़ा का इन्किशाफ़ दुश्वार हो जाए।

हज़रत अबू सुलेमान दारानीरहमत अल्लाह अलैहि फ़रमाया करते थेकि एहतिलाम एक सज़ा है और फ़रमाया कि किसी की जमात स्वाए गुनाह के किसी और वजह से फ़ौत नहीं होगी।ग़रज़कि सज़ाओं की बारीकियां रफा दर्जात के बक़दर हैं।

एक रिवायत में है कि अल्लाह तआला फरमाता है कि जब कोई बंदा मेरी इताअत पर अपनी ख्वाहिश को तरजीह देता है तो सब से कमतर सुलूक यह करता हूँ कि मुनाजात की लज़्ज़त से महरूम कर देता हूँ।

उलग़र्ज़ गुनाह एक ऐसी मनहूस क्षे है जिस की नहूसतें और सजाएं मुख़तलिफ़ सूरतों में ज़ाहिर होती हैं, गुनाह का असर ताअत व इबादत पर, जिसम पर, दिल पर, सब पर पड़ता है।

दुनिया के फ़ौत होने का ग़म, हिर्स की फ़िक्र भी सज़ाओं से है। इसी दुनिया पाने की खुशी व मुसर्रत कि दीन जाने की कोई प्रवाह न हो सज़ा है और दाइमी आफ़ियत और वसात माल भी गुनाहों की सज़ा होती है जब कि यह दोनों मुआसी के असबाब बिन जाएँ और

कभी एक गुनाह की सज़ा इसी जैसे दूसरे गुनाह और इस से बड़े गुनाह में होती है जिस तरह नेकी की जज़ा इसी जैसी या इस से बड़ी नेकी में होती है। (माख़ूज़ अज़ कुव्वत उलक़ुलूब)

तौबा के ताल्लुक से मुख़तलिफ़ बुजुर्गों के यह मुख़तलिफ़ इर्शादात बड़ी रहनुमाई का सबब हो सकते हैं और इंसान हिम्मत बांध ले तो रफ़्ता रफ़्ता सारे ही गुनाहों को छोड़ सकता है, मगर इस के लिए ज़रूरी है कि गुनाह ख़्वाह सगीरा हूँ या कबीरा उन की तफ़सीलात से वाकिफ़ हो, गुनाहों के वबाल और उन की सजाएं जाने ताकि ख़ौफ़ पैदा हो और तौबा पर आमादा हो। तौबा के फ़ज़ाइल से वाक़फ़ीयत भी तरग़ीब के लिए ज़रूरी है। मुख़्तसर यह कि हुक़ूक़ अल्लाह और हुक़ूक़ उलईबाद की तफ़सील से वाक़फ़ीयत काफ़ी हद तक गुनाहों की तफ़सीलात से आगाह कर सकती है क्यों कि अल्लाह तआला और इस के रसूल ﷺ की नाफ़रमानी ही गुनाह है। हुक़ूक़ इलाहीह का इतलाफ़ भी नाफ़रमानी है और हुक़ूक़ उलईबाद का भी इस के साथ साथ तौबा के अरकान और मुरातिब की जानकारी ज़रूरी है कि इस मामले में सालकेन व वासलेन की ख़सलतीं अपने अंदर पैदा कर सके। मज़ेद मालूमात के लिए हज़रत इमाम अबू अलक़ासम कशीरी क़ुद्दिस सिर्रहू के चंद इर्षादत मुलाहिजा फरमाएं:

(1)अरबी ज़बान में ‘तौबा’ के हक़ीक़ी मानी रुजू करने के हैं। चनां चह जब कोई शख्स किसी बात से रुजू करता है तो कहते हैं ‘ताब’ लिहाज़ा तौबा के मानी हुए कि शरीअत में जो कुछ मज़मूम है इस से लौट कर काबिल तारीफ़ क्षे की तरफ़ आजाए।

(2)अहले सुन्नत के वासलेन कहते हैं कि तौबा के सही होने की तीन शर्तें हैं:

(अल्फ़)जिन उमूर में शरीअत की मुखालफत की है, उन पर नदामत का इज़हार करना।

(ब)अपनी लग़्ज़िश और गलती को ख़ुद तर्क करदेना।

(ज)इरादा करना कि जो गुनाह इस ने किए हैं उन्हें दुबारा नहीं करेगा।

(3)तौबा का पहला दर्जा यह है कि बंदा ख्वाब गफलत से बेदार हो और अपनी बुरी हालत को महसूस करे। जब इंसान दिल में बुरे आमाल व अफ़आल पर गौर व फ़िक्र करता हैतो तौबा का इरादा पैदा होता हैऔर बुरे आमाल व अफ़आल से बाज़ रहने का ख़याल आता है। जब बंदे की तरफ़ से यह होता हैतो अल्लाह तआला मदद फरमाता है। इस तरह तौबा के असबाब की तैयारी शुरू कर देता है।

(4)तौबा के असबाब पर अमल की इबतिदा बुरे दोस्तों की मजलिस से अलग रहने से होती है क्यों कि वही उसे इस इरादा तौबा के तर्क पर उकसाते हैं और इरादा की मुहब्बत में शकूक पैदा करते हैं, इस की तकमील इसी वक़्त हो सकती हैजब वह इस मुशाहिदा पर मदावमत करे जो तौबा की रगबत में अज़ा फ़ा करता है और जिस बात का इस ने अज़म किया है इस के पूरा करने के लिए ऐसे असबाब पैदा कर देताहै जिन से इस के ख़ौफ़ और रजा को कुव्वत हासिल होती है तब कहीं इस के दिल से बुरे आमाल पर इसरार करने की गृह खुलती है, ममनू उमूर को करने से रुक जाता है और इत्तिबा शहवात से अपने नफ़्स के लगाम को खींच लेता है। वह ख़ुद अपनी गलती को तर्क कर देता है।

(5)हज़रत उस्ताज़ अबू अली दक़ाक़रज़ि अल्लाह अन्हु को फ़रमाते सुना कि तौबा की तीन किस्में हैं: अव्वल तौबा, दोम अनाबत, सोम ऊबा। इस तकसीम में तौबा को इबतिदाई मक़ाम हासिल हैऔर ऊबा को आखिरी औरानाबत को दरमियानी। जिस शख्स ने सज़ा के ख़ौफ़ से रुजू किया तो इस को तौबा कहते हैं, जिस ने सवाब की लालच की वजह से तौबा की इस को अनाबत कहते हैं और जिस ने हुक्म की पाबंदी के ख़याल से तौबा की न तो सवाब की ख्वाहिश है न सज़ा से ख़ाइफ़ हुआ तो इस को ऊबा कहते हैं। यों भी कहा जाता है कि तौबा मोमिनीन की सिफ़त है, फरमान बारी तआला है:

व तोۡबोۡۤअ अली अल्ला जमीۡअब्बा ईया अलममनोۡन (सूरत उलनूर: 24/31)

तर्जुमा: और अल्लाह की तरफ़ तौबा करू ए मुसलमानो सब के सब।’’

अनाबत ओलिया और मुक़रबीन की सिफ़त है, कुरआन में है:

وَ جَآءَ بِقَلْبٍ مُّنِیۡبِ (سورۃ ق: ۵۰؍۳۳)

तर्जुमा: और रुजू करता हुआ दिल लाया।’’

और ऊबा नबियों और रसूलों की सिफ़त है, इरशाद बारी तआला है:

نِعْمَ الْعَبْدُ ؕ اِنَّہٗۤ اَوَّابٌ (سورۃ ص: ۳۸؍۴۴)

तर्जुमा: अच्छा बंदा बेशक वह बहुत रुजू लाने वाला है।’’

हज़रत शाह वली अल्लाह मुहद्दिस देहलवी क़ुद्दिस सिर्रहू ने मुरीद की तरबीयत का मुख़्तसर खाका तहरीर फ़रमाया कि पहले उसे अक़ाइद अहले सुन्नत सिखाए जाएँ, अल्लाह तआला की ज़ात व सिफ़ात व असमा व अफ़आल, फिर अंबिया अलैहिम अस्सलवात व इलतसलीमात ख़ास कर हमारे आका व मौला ﷺ से मुताल्लिक़ ज़रूरी उमूर और हुक़ूक़ बताये जाएँ, फिर गुनाहों से तौबा, कबीरा और सगीरा गुनाह, उन की तारीफ़ात और कुछ कबीरा गुनाह की मुंदरजा जेल तफ़सील व तारीफ़ बयान फ़रमाई है।

कबीरा गुनाह: ‘‘और हक़ यह है कि कबीरा हर वह गुनाह है जिस पर दोज़ख या अज़ाब शदीद की वईद बयान की गई हो, कुरआन में या हदीस सही में जो मुहद्दिसीन के नज़दीक मारूफ़ हो या इस के मुर्तक़िब को काफ़िर कहा गया हो जैसा कि हदीस में फ़रमाया:

जिस ने (क़सदन) नमाज़ छोड़ी इस ने कुफ्र किया।

और दूसरी हदीस में है कि मुसलमानों और मुशरिकीन के दरमियान फ़र्क़ नुमा ज़ हैतो जिस ने नमाज़ छोड़ी इस ने कुफ्र किया या कबीरा वह है जिस के मुर्तक़िब पर शरीअत में हद मुक़रर हो। चनां चह ज़िना, चोरी, राहजनी और शराब पीना या वह गुनाह जो मज़कूरा कबायर के बराबर या बुराई में ज़्यादा हो सरीह अक्ल के हुक्म में।