अध्याय 36 में से 54पृष्ठ 422–433
अयाल दार का तोकल
जो इंसान तजर्द की ज़िन्दगी गुज़ार रहा हो और इस पर दूसरों की परवरिश और कफ़ालत की जिम्मा दारी न हो जिसे मुनफ़रद कहते हैं वह तोकल की दौलत कैसे हासिल कर सकता है या किस वक़्त वह मुतविकल हो सकता है या कहा जा सकता है, लेकिन जिन के
कंधों पर अहले व अयाल वगैरह का बोझ हो तो इस का तोकल किया है?
हज़रत इमाम ग़ज़ाली क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि अयाल दार का हुक्म अकेले आदमी के हुक्म से जुदा है क्यों कि जो तन्हा और अकेला होता है इस का तोकल दो बातों से सही होता है। एक यह कि वह किसी तंगदिली और लोगों की ताक के बग़ैर एक हफ्ते तक भूका रह सकता है, दोम यह कि ईमान की वह इक़साम इस में पाई जाएँ जो पहले मज़कूर हुईं। उन में से एक यह है कि उसे रिज़्क़ न मिले तो वह मौत को खुशी से कबूल कर ले और इसी को सवाब जाने।
लेकिन बाल बच्चों और अहले व अयाल को भूक पर सब्र करने की तकलीफ़ देना जायज़ नहीं और न यह कि उन के सामने तौहीद की तकरीर की जाए और यह कहा जाए कि भूका मरना काबिल रषिक है अगरचे शाज़ व नादिर ऐसा हो भी सकता है। इसी तरह ईमान व एतिक़ाद का मसला है कि वह उन पर जबर करे। लिहाज़ा उन के हक़ में माल कमाने का तोकल मुमकिन है और यह तीसरा मक़ाम है जैसे हज़रत अबू बुकर का तोकल जब आप कसब मआश के लिए बाजार तशरीफ़ ले गए। औलाद के हक़ में तोकल इख्तियार करते हुए जंगलों में निकल जाना या उन के मामलात का एहतिमाम न करना और उसे उन हक़ में तोकल समझना हराम है। और बाज़ औकात यह बात उन की हलाकत तक का बाइस बिन जाती है और इस का मुवाख़िज़ा होगा।
बल्कि तहक़ीक़ यह है कि ख़ुद इस की ज़ात और अहले व अयाल में कोई फ़र्क़ नहीं, अगर वह कुछ मुद्दत भूक पर सब्र करें और भूक के सबब मरने को उखरवी रिज़्क़ और गनीमत समझें तो उन के हक़ में तोकल जायज़ है और इस का नफ़्स भी तो अयाल में शामिल है, उसे हलाक करना भी जायज़ नहीं, हां अगर एक मुद्दत तक भूक बर्दाश्त करने पर आमादा हो जाता है तो ठीक है और अगर वह इस की ताकत नहीं रखता और इस के द ल में इस से इज़तिराब और इबादत में खलल पैदा होता है तो इस के लिए तोकल जायज़
हज़रत इमाम क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि वाज़िह हो गया कि असबाब से क़ता ताल्लुक का नाम तोकल नहीं, बल्कि एक मुद्दत तक भूक बर्दाश्त करने और कभी रिज़्क़ में ताख़ीर हो जाए तो मौत पर राजी होने, शहरों या देहातों में रहने या ऐसे जंगलों में रहने का नाम तोकल है जिन में कोई सब्जी वगैरह मिल जाए। यह तमाम चीजें बका के असबाब हैं। अलबत्ता उन में कुछ न कुछ अज़ीयत भी है इस लिए कि सब्र के बग़ैर उन पर बरकरार रहना मुश्किल है और शहरों में तोकल इख्तियार करना, जंगलों में तोकल की बनिस्बत असबाब बका के हुसूल के ज़्यादा क़रीब है और यह सब असबाब हैं, लेकिन उन से ज़्यादा, ज़ाहिर असबाब की तरफ़ झुक गए और मज़कूरा चीजों को असबाब शुमार इस का सबब ईमान की कमज़ोरी और हिर्स की ज्यादती है।
नीज़ वह आख़िरत की खातिर दुनिया में अज़ीयतों पर सब्रनहीं करते और सोये ज़न और तवील उम्मीद की वजह से उन के दलों पर बुज़दिली का ग़लबा है। इसी सिलसिला बयान में हज़रत इमाम क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि जो शख्स कमाने पर कादर है और बेकार पड़ा है तो इस पर कमाना लाज़िम है, इस के हक़ में तोकल का कोई मानी नहीं है क्यों कि तोकल तो एक दीनी मक़ाम है जिस के ज़रिया अल्लाह तआला के लिए फ़ारिग़ रहने पर मदद हासिल की जाती है। लिहाज़ा बेकार आदमी का तोकल से कोई ताल्लुक नहीं है और अगर अल्लाह तआला के लिए मशगूल है, मस्जिद में या घर में बैठा इल्म विषग़ल इख्तियार किया हुआ है तो लोग उसे तर्क कसब पर मलामत नहीं करते और न ही उसे कमाने की जहमत देते हैं, बल्कि अल्लाह तआला के लिए इस की मशगूलियत की वजह सेलोगों के दलों में इस की अकीदत मजबूत होती है हतिया कि इस के पास ज़रूरत से ज़्यादा ले जाते हैं। इस पर लाज़िम है कि वह दरवाजा न बंद करे, लेकिन भाग कर पहाड़ों में न चला जाए। आज तक कोई आलम या आबिद ऐसा नहीं देखा गया कि वह शहर में रह कर अपना वक़्त अल्लाह तआला के लिए
(इल्म विबादत) में गुज़ारे और वह भूका मर जाए और आइंदा के लिए भी यह सूरत नज़र न आये, बल्कि अगर वह किसी एक जमात को खाना खिलाना चाहे तो महज़ अपने कलाम से ऐसा कर सकता है क्यों कि जो शख्स अल्लाह तआला का हो जाता है अल्लाह तआला इस का हो जाता है और जो शख्स ख़ुद को अल्लाह तआला के लिए वक्फ करदेता है अल्लाह तआला लोगों के दलों में इस की मुहब्बत डाल देता है और इस के लिए दलों को मसख़र कर देता है जिस तरह बचे के लिए इस की मां के दिल को मसख़र कर दिया जाता है।
अल्लाह तआला ने मुल्क विमलकोत की ऐसी तदबीर फ़रमाई है जो तमाम अहले मुल्क विमलकोत को काफ़ी है। जो शख्स इस तदबीर पर नज़र करता है वह मदबर पर एतिमाद और यकीन रखता है और इस के साथ मशगूल हो जाता है। नीज़ इस पर ईमान रखने वाला असबाब को नहीं इस के मदबर को देखता है। ऐसे लोग अगर तोकल को तर्क करते हैं तो इस का सबब यह है कि नफ़्स को हमेशा नाज़ व नेमत में पलने, उम्दा कपड़े पहनने और लतीफ़ गुजाएं खाने की रगबत होती हैऔर यह आख़िरत का तरीका नहीं। यह चीजें मेहनत व हरकत से भी शाज़ व नादिर ही हासिल होती हैं और कभी बुला मेहनत मिल जाती हैं। लिहाज़ा जिस शख्स की बसीरत की आंख खुली हो इस के नज़दीक हरकत व मेहनत का असर कमजोर होता है, वह मेहनत व हरकत पर नहीं, बल्कि मुल्क व मलकूत के मदबर से मुतमइन होता है।
अहम तंबीया
आज के उलमा व मशाइख़ और शोअरा व वाइजीन व मुक़ररीन और तावीज़ गुंडा करने वालों हज़रत इमाम का यह इरशाद बार बार तवज्जो से पढ़ना चाहिए अगर वह इल्मी खिदमतें और वाज़ व तकरीर और नात ख़वानियां और तावीज़ गुंडे झाड़ फूँक और इमामतें और इबादतें इख़लास व ललाहीत और हसन नियत के साथ करते, अपने ख़ालिक़ व राज़िक़ जल व अला पर तोकल व एतिमाद करके इल्म व इबादत और हक़ की हिफाज़त का काम करते तो उन्हें आज जो मिल रहा है वह भी मिलता ,बल्कि और ज़्यादा मिलता साथ ही क़ल्ब व जिगर के नज़राने और अक़ीद तों के फूल निछावर होते , लोगों के दिल खिंचते, इज़्ज़तें मिलतीं और आख़िरत में बड़े अज्र व
सवाब के मुस्तहिक़ होते। जिस तबके को तोकल व क़नाअत का सबक देना चाहिए था जब वह ख़ुद हुब्ब दुनिया और हिर्स व हवस का शिकार हो गए और अमलन वह मोमिनाना ख़सलतों से दौर हो गए तो अवाम को किया दर्स दें गे, दुनिया दारों से अपनी टूटी फूटी खिदमतों के मुआवजे और उन से इज़्ज़तों के तालिब हो करज़लील भी हुए, वक़ार गया और दर दर की ठोकरें नसीब हुईं हैं, अवाम के दलों से मुहब्बत व अकीदत मिट्टी है और मजहब की ख़िदमत करके सवाब कमाने के बजाए कौम व मिलित के लिए बदनुमा दाग और दीन की बर्बादी का बाइस बिन गए और ख़ास बात यह कि आख़िरत के सवाब से महरूम हो गए।
आज हर हस्सास और ज़ी शऊर जिस ने मज़कूरा बाला तबके को क़रीब से देखा है और उन के अक़्वाल व आमाल मुलाहिजा किया है वह उन हक़ायक़ से अच्छी तरह वाकिफ़ है। दुनिया तलबी और कसरत माल की हिर्स में यह दुनियादारों से कहीं पीछे नहीं, बस फ़र्क़ यह है कि दुनियादार दुनयवी असबाब व ज़राए के ज़रिया दिन रात हुसूल माल के लिए कोशां हैं, वह फिर एक हद तक भिखारियों की तरह मांगते नहीं और दीनी रहबरी का दम भरने वाला तबका दीन को ज़रिया बना कर और हर दीनी रूप इख्तियार करके माल व ज़र केलिये कोशां विपरेशां है। अब तो पानी सर से ऊँचा होता जा रहा है कि शोअरा व ख़ुतबा हाथ फैला फैला कर मांगते हैं, जो तै करते हैं वह अलग है यह लोग आज भी मुशाहिदा कर सकते हैं कि अगर कहीं कहीं कोई ख़ाल ख़ाल दीन का काम कर रहा है तो कौम सिर्फ़ दिल के नज़राने नहीं माल व ज़र भी उन पर निछाव रकर रही है जब कि वह तोकल और इख़लास नहीं।
ख़याल रहे कि आज कल आम हाल यही है अल्लाह तआला के कुछ ख़ास ख़ास बंदे जो भी इस से मुस्तसनी हैं उन को उन का रब ही जानता है। मिलित की बर्बादी देख कर आंखों से खून के आँसू बहते हैं , दीन काकाम जिन से वाबस्ता था वही दीन को मिटाने लगे जब कि हमारा मुख़ालिफ़ हर महाज़ पर हक़ को मिटानेकेलिये उतरा हुआ है फिर भी हमारी आंखें नहीं खिल रही हैं।
आखिर में ऐसे लोग हज़रत इमाम का यह इरशाद सन लें, फ़रमाते हैं: जो इल्म व इबादत के साथ मशहूर हो वह रात व दिन में एक मर्तबा खाने पर क़नाअत करे वह खाना जैसा भी हो अगरचे लजीज खानों से न हो और मोटा कपड़ा जो देनदारों के लायक है। तो उसे यह खाना हमेशा मिलेगा वहाँ से भी जिस जगह का उसे गुमान है और वहाँ से भी जहां का गुमान नहीं,बल्कि कई गुना ज़्यादा आएगा तो ऐसे शख्स का तोकल छोड़ना और रिज़्क़ का एहतिमाम करना इंतिहाई कमज़ोरी और कोताही है क्यों कि जो शख्स किसी शहर में गुमनाम है वह कमाने के बावजूद इस क़द्र रिज़्क़ हासिल नहीं कर सकता जिस क़द्र इस शख्स की शहरत हुसूल रिज़्क़ का मजबूत सबब है। पस देनदार लोगों के लिए रिज़्क़ का एहतिमाम क़बीह है और उलमा के लिए तो ज़्यादा बुरा है क्यों कि उन के लिए क़नाअत शर्त है और क़नाअत वाले आलम के पास ख़ुद उन का रिज़्क़ और बहुत बड़ी जमात अगर इस के साथ हो आता है और अगर वह लोगों के हाथों से न ले कि अपनी कमाई खाने का इरादा रखता हो तो वह इस बाअमल आलम के लायक है जो ज़ाहिरी इल्म व अमल पर चलता है और बातिनी सैर नहीं करता क्यों कि माल कमाना बातिनी फ़िक्र के रास्ते में रुकावट है। लिहाज़ा ऐसा आम सुलूक अली अल्लाह में मशगूल हो और ऐसे इंसान से रोज़ी हासिल करे जो फ़ी सबील अल्लाह खर्च करके क़ुर्ब ख़ुदावंदी का तालिब है क्यों कि इस सूरत में अल्लाह तआला के लिए फ़राग़त है और देने वाले के सवाब में मदद है।
अयाल दार कब तक मुतविकल रहता है
आप क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं: जहां तक अयाल दार का ताल्लुक है तो बाल बच्चों के लिए एक साल का रिज़्क़ जमा करने से तोकल की तारीफ़ से खारिज नहीं होगा, इस से ज़्यादा जमा करना तोकल को बातिल कर देता है क्यों कि वह दिल की कमज़ोरी का नतीजा है जो कुव्वत तोकल के खिलाफ़ है। आका ﷺ ने भी अहले व अयाल के लिए एक साल का रिज़्क़ जमा फ़रमाया। इस से ज़्यादा जमा करना तोकल को बातिल कर देता है क्यों कि सालों के बदलने से असबाब बदलते हैं । मुतविकल
उसे कहते हैं जो तौहीद पर ईमान रखता हो, इस का दिल मजबूत हो, नफ़्स अल्लाह तआला के फजल पर मुतमइन हो और इस की तदबीर पर एतिमाद हो असबाब ज़ाहिर पर नहीं।
अम्र दोम
माल जमा करने के असबाब के दरपे होना जिस शख्स को माल हासिल हो ख़्वाह विरासत के तौर पर या कमाने के ज़रिया या मांग कर या दीगर असबाब से किसी सबब के ज़रिया तो ऐसे शख्स की जमा माल में तीन हालतें हैं:
1। वक़्ती ज़रूरत के मुताबिक माल हासिल करे। पस अगर भूका हो तो खाये, नंगा हो तो कपड़ा पहने, अगर मकान का मुहताज है तो मुख़्तसर (बक़दर ज़रूरत) मकान खरीद ले और बाक़ी इसी वक़्त तकसीम कर दे जमा न करे। हां इतनी मिक़दार जमा कर सकता है जिस की किसी दूसरे को हाजित हो और तो वह इसी नियत पर जमा करे। ऐसा शख्स तोकल के तक़ाज़े को पूरा करता है और यह सब से बुलंद दर्जा है।
2। दूसरी हालत पहली के मुक़ाबिल जो तोकल के हदों से निकाल देती है यानी साल भर या इस से ज़्यादा के लिए माल जमा करे।
3। तीसरी हालत यह कि चालीस दिन या इस से कम के लिए जमा करे। इस शख्स के लिए माल का जमा करना किया उसे इस मक़ाम महमूद से महरूम कर सकता है जिस का आख़िरत अहले तोकल के लिए में वादा है , अइम्मा तरीक़त का इस में इख़तिलाफ़ है।
हज़रत इमाम ग़ज़ाली क़ुद्दिस सिर्रहू का ख़याल है कि जब माल जमा करने की इजाजत है तो इस इख़तिलाफ़ का कोई मतलब नहीं, बल्कि हक़ीक़त यह है कि माल जमा न करने की सूरत में तोकल की तकमील इस वक़्त होगी जब उम्मीद कम हो, हां यह ज़रुरहे कि जो शख्स एक साल से ज़्यादा के लिए जमा करता है तो वह कलबी कमज़ोरी का शिकार है, इस का झुकाव ज़ाहिरी असबाब की तरफ़ है, वह मक़ाम तोकल से खारिज है, ऐसा शख्स सच्चे वकील यानी अल्लाह तआला के साथ खुफिया तदबीर पर यकीन नहीं रखता।
यह भी ख़याल रहे कि जिस शख्स का दिल तर्क ज़ख़ीरा से मुज़्तरिब और परेशान हो
और वह लोगों के हाथों और इस का दिल अल्लाह की तरफ़ मुतवज्जा रहे और अगर इज़तिराब हो जो उसे इबादत और ज़िक्र व फ़िक्र से गाफिल करे तो ऐसे शख्स को माल जमा करनाज्यादा बेहतर है, बल्कि अगर वह ऐसा सामान रखे जिस की आमदनी उसे बक़दर किफायत हासिल हो और इसी की वजह से दिल को फ़राग़त भी हासिल होती है तो ऐसा करना बेहतर है क्यों कि मकसूद तो यह है कि दिल की इसलाह की जाए ताकि वह ज़िक्र इलाही के लिए फ़ारिग़ हो जाए।
मालूम हो कि कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन के पास माल होना उन्हें गाफिल करता है और बाज़ को ना होना गाफिल करता है और ममनू वह है जो ज़िक्र इलाही से गाफिल करे वर्ना ज़ाती तौर पर दुनिया ममनू नहीं है न इस का वजूद न अदम इसी लिए नबी अकर्म ﷺ को मुख़तलिफ़ किस्म के लोगों की तरफ़ भेजा गया जिन में ताजिर भी हैं और सनात व हर्फ़त वाले भी, ताजिर को तिजारत छोड़ने और किसी पेशे वाले को पेशा छोड़ने का हुक्म नहीं दिया गया और जो लोग तिजारत व पेशे वगैरह से ताल्लुक नहीं रखते थे उन को यह काम करने का हुक्म नहीं दिया गया, बल्कि सब को अल्लाह तआला की तरफ़ बुलाया और बताया कि उन की निजात व कामयाबी सिर्फ़ इसी में है कि वह अपने दलों को दुनिया से अल्लाह तआला की तरफ़ फेर दें और दिल का बेहतरीन शगल अल्लाह तआला के साथ ताल्लुक है। पस कमजोर आदमी का हाजित के मुताबिक जमा करना बेहतर है जैसे मजबूत के लिए न जमा करना बेहतर है और यह हुक्म मुनफ़रद का है, अयाल दार का हुक्म पहले गुज़र चुका है।
ख़याल रहे कि सय्यद अलमतोकलीन सर्वर कोनेन ﷺ का यह हाल था और आप को इस क़द्र उम्मीद कम थी कि हदीस शरीफ़ में है, आप ने पेशाब फ़रमाया और फ़ौरन तैमुम करने लगे, एक साहिब ने अर्ज़ किया कि पानी क़रीब है, फ़रमाया: मायदरेनी लाली ला अबलग़ा (मुझे मालूम नहीं, शायद इस (पानी) तक न पहुँचों)
आप अगर माल जमा करते तो तोकल में कोई फ़र्क़ न आता क्यों कि आप का भरोसा इस चीज़ पर न था जिसे आप जमा फ़रमाते फिर आप ने फतेह ख़ैबर के बाद एक साल का नफ़क़ा
अपने अहले के लिए जमा फ़रमाया और कुछ लोगों के लिए आप का इरशाद है मसलन हज़रत एम एमन के लिए फ़रमाया कि दूसरे दिन के लिए जमा न करना। हज़रत बुलालरज़ि अल्लाह अन्हु ने रोटी का एक टुकड़ा इफ्तारी के लिए रखा तो मना करते हुए फ़रमाया: ए बुलाल! उसे खर्च कर दो और मालिक अर्श जल व अला से मुफलिसी का डर न रखो। उन्ही से आप ने यह भी फ़रमाया: जब तुम से मांगा जाए तो न रोको और जब तुम्हें दिया जाए तो न छुपाओ।
यह सब रिवायतें मजमा अल्ज़वाइद और तारीख इब्न असाकिर में मौजूद हैं। यह सब कुछ इस वजह से है कि उम्मत के लोग मुख़तलिफ़ थे, आप जानते थे। लिहाज़ा मजबूत दिल वालों की तालीम के लिए यह रास्ता इख्तियार फ़रमाया क्यों कि आप के मजबूत दिल उम्मती भी आप के ब निस्बत कमजोर हैं। अपने घर वालों के लिए साल भर का खर्च जमा करना इस वजह से न था कि आप का या आप के अहले ख़ाना का दिल कमजोर था, बल्कि इस से तालीम दीनी मकसूद थी कि अल्लाह तआला इस बात को पसंद करता है कि जिस तरह अज़ीमत (हुक्म असली) पर अमल किया जाता है इसी तरह कमजोरों की दिल जोई के लिए रुखसत पर भी अमल किया जाए ताकि उन की कमज़ोरी मायूसी तक न ले जाए और इंतिहाई दर्जा तक न पहुँच पाने की वजह से आसान नेकी भी छोड़ दें।
उन तमाम बातों से आप ने समझ लिया होगा कि माल का जमा करना बाज़ के लिए नुकसान दह है, बाज़ के लिए नहीं। यही वजह है कि हदीस शरीफ़ में है कि अस्हाब सफ़ा में से एक का इंतकाल हुआ और उन के कपड़ों में देनार निकले तो आप ﷺ ने फ़रमाया: दो दाग हैं। और बाज़ सहाबा करामरज़ि अल्लाह अन्हुम ने बहुत बहुत माल छोड़ा तो आप ने कुछ न फ़रमाया। बात दर असल यह है कि जब किसी की हालत से ज़हद, फक्र और तोकल का इज़हार हो हालां कि वह उन उमूर से खाली हो तो यह एक किस्म का धोका है। दूसरी सूरत यह कि धोका की वजह न हो तो मतलब यह होगा कि दर्जा कमाल में नुकसान वाक़्य हो जैसे चेहरे पर दो दाग हूँ तो चेहरे के जमाल में कमी आजाती है, यह किसी
धोका की वजह से नहीं होता है क्यों कि इंसान को दुनिया में जिस क़द्र हिस्सा मिलता है इसी क़द्र आख़िरत में कम हो जाता है। यह ख़याल रहे कि माल जमा करने की सूरत में अगर जमा शुदा माल से दिल फ़ारिग़ हो तो इस से तोकल का बातिल होना लाज़िम नहीं आता।
अम्र सोम
वह असबाब इख्तियार करना जो जरुर को दफा करते हैं। मालूम हो कि बाज़ औकात नफ़्स या माल में ख़ौफ़ की वजह से भी जरुर होता है। तोकल के शराइत में यह नहीं है कि जरुर को दौर करने वाले असबाब बिलकुल छोड़ दिए जाएँ मसलन नफ़्स के ऐतबार से यों कि इस जमीन पर सोये जहां दरिंदे हूँ या वादी में सैलाब के रास्ते में सौ जाना या गिरने वाली दीवार और टूटी हुई छत के नीचे सोना। यह सब बातें ममनू हैं और ऐसा शख्स बाज़ औकात किसी फायदे के बग़ैर ख़ुद को हलाकत में डालता है। हां यह असबाब क़तई भी होते हैं , ज़नी भी और मौहूम भी। मौहूम को छोड़ना तोकल की शर्त है। यह वह हैं जिन की दफा जरुर की तरफ़ निस्बत ऐसी है जैसे दग़वाने और झाड़ फूँक करवाने की निस्बत क्यों कि यह उमूर कभी मुतवक़्क़े जरुर के पेश आने से क़ब्ल ही इख्तियार कर लिए जाते हैं और कभी आने पर इस के अज़ाले के लिए इख्तियार किए जाते हैं।
हुज़ूर अकर्म ﷺ ने अहले तोकल का यह वस्फ़ बयान फ़रमाया कि वह यह काम दग्वाना वगैरह नहीं करते, आप ने यह नहीं फ़रमाया कि जब वह ठंडी जगह जाते हैं तो जुब्बा नहीं पहनते, जबह तो मुतवक़्क़े सर्दी के लिए पहना जाता है। इसी तरह दूसरे असबाब जो इस के हम मानी हैं।
ख़याल रहे कि दफा जरुर के असबाब अगरचे क़तई हूँ इस के तर्क की एक वजह यह है कि जब उसे इंसानों से जरुर पहुँचे और वह सब्र कर सकता हो और उन कोदूर कर केतशफ़ी हासिल कर सकता हो तो शर्त तोकल है कि सब्र करे और बर्दाश्त से काम ले, इरशाद ख़ुदावंदी है:
فَاتَّخِذْہُ وَکِیۡلًا وَاصْبِرْ عَلٰی مَا یَقُوۡلُوۡنَ (سورۃ المزمل: ۷۳؍۸،۹)
तर्जुमा: तो तुम इसी को अपना कारसाज़ बनाओ और काफ़िरों की बातों पर सब्र फ़रमाओ।’’
और इरशाद है:
وَ لَنَصْبِرَنَّ عَلٰی مَاۤ اٰذَیۡتُمُوۡنَا ؕ وَعَلَی اللہِ فَلْیَتَوَکَّلِ الْمُتَوَکِّلُوۡنَ(سورۃ ابراہیم: ۱۴؍۱۲)
तर्जुमा: और तुम जो हमें सत्ता रहे हो हम जरूर इस पर सब्र करें गे और भरोसा करने वालों को अल्लाह ही पर भरोसा चाहिए।’’
उन के अलावा बहुत आयात हैं।
यह ध्यान रहे कि साँपों, दरिंदों और बिच्छुओं की अज़ीयत पर सब्र करना और उन को दौर न करना तोकल नहीं क्यों कि इस में कोई फायदा नहीं, उन में कोशिश या तर्क ज़ाती तौर पर मकसूद नहीं, बल्कि मकसूद दीन पर मदद हासिल करना है। इसी तरह माल की हिफाज़त के असबाब मसलन बाहर जाते वक़्त ताला लगा देना या ऊंट (वगैरह जानवर) को बांध देना इस से तोकल में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता क्यों कि यह असबाब अल्लाह तआला की आदत जारीया से क़तई या ज़नी तौर पर मालूम हुए हैं। यही वजह है कि नबी अकर्म ﷺ ने इस आराबी से जिस ने अपना ऊंट खुला छोड़ कर कहा कि में ने अल्लाह तआला पर तोकल किया, फ़रमाया: बांध कर तोकल करू।(हलीत उलावलिया)
इरशाद ख़ुदावंदी है:
ख़ुज़ूۡअ हज़रकम (सूरत अलनिसा: 4/71)
तर्जुमा: होशियारी से काम लो।’’
नीज़ नमाज़ ख़ौफ़ की कैफियत के ज़िमन में फ़रमाया:
विलियाۡख़ुज़ूۡۤअ असलहतहम (सूरत अलनिसा: 4/102)
तर्जुमा: और वह अपने हथियारलिये रहीं।’’
وَ اَعِدُّوۡا لَہُمۡ مَّا اسْتَطَعْتُمۡ مِّنۡ قُوَّۃٍ وَّمِنۡ رِّبَاطِ الْخَیۡلِ (سورۃ الانفال: ۸؍۶۰)
तर्जुमा: और उन के लिए तैयार रखो जो क़ोवत तुम्हें बिन पड़े और जितने घोड़े बांध स्को।’’
और हज़रत मूसाअलैहि अस्सलाम से फ़रमाया:
फ़ासर बाबादीۡ लीۡलट्टा (सूरत अलदखान: 44/23)
तर्जुमा: हम ने हुक्म फ़रमाया कि मेरे बंदों को रातों रात ले निकल।’’
देखिए रात के वक़्त निकलना दुश्मनों से छपना और अज़ीयत से बचना है और हुज़ूर ﷺ का ग़ार में छपना दुश्मनों की आंखों से छिप कर जरुर से बचना था और नमाज़ में हथियार उठाये रखना, साँप और बिच्छू को क़त्ल करना क़तई तौर पर जरुर को दफा करना नहीं था, लेकिन हथियार उठाये रखना ज़नी सबब तो है और ज़नी क़तई की तरह होता है, सिर्फ़ मौहूम वह है कि इस का तर्क तोकल का तक़ाज़ा है। यहाँ बड़े अहम मालूमाती मुबाहिस हैं, उन के लिए अहया उलउलूम मुताला करें।