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Allama Afaque Ahmad Mujaddidiतसव्वुफ़ और इस के फ़वाइदसूफ़िया की ख़ुसुसीआत

अध्याय 8 में से 54पृष्ठ 112–122

सूफ़िया की ख़ुसुसीआत

किताब अललमा में मुतअद्दिद ख़ुसुसीआत पर रोशनी डाली गई है, हम इख़तिसार के साथ बयान करते हैं ताकि आप मज़ेद उन्हें पहचान सकें और उन की अज़मत का पता लगा सकें:

1। सूफ़िया कराम के तमाम तबके मुहद्दिसीन व फ़िक़हा के मोतक़िदात से कामिल इत्तफाक़ रखते हैं। नीज़ उन के उलूम व फ़नून, मुतालिब व मफ़ाहीम वगैरह से कोई इख़तिलाफ़ नहीं रखते।

2।जो सूफ़िया इल्मी ऐतबार से मुहद्दिसीन व फ़िक़हाके बराबर नहीं हैं वह क़वानीन हदूद शरीअत के मुश्किल मिसाइल के हल के सिलसिले में उन्ही की तरफ़ रुजू करते हैं। जिस पर उन का इत्तफाक़ होता है उसे कबूल कर लेते हैं और जहां उन में बाहम इख़तिलाफ़ होता है वहाँ सूफ़िया अहसन, औला और मुकम्मल तरिन सूरत अपनाते हैं ताकि

इंतिहाई हज़म व एहतियात के साथ अमल हो सके। उमूर दीन के मामले में किसी किस्म की छूट, तावेल। आसाइश ढूँढने और शुबहात को राह देने की कोई गुंजाइश नहीं। उन सब के अलावा सूफ़िया के अमल का एक और दर्जा है वह है मुरातिब बुलंद की जानिब बढ़ना। उलग़र्ज़ सूफ़िया अख़लाक़ जमेला और इबादात व हक़ायक़ इबादत वताअत के जिन बुलंद तरिन अहवाल व मनाज़िल पर फ़ाइज़ हुए और जिन इसरार व रमूज़ से वह मुख़तस ठहरे वह किसी को नसीब न हुए। यह दोनों चीजें उन के अमल व एतिक़ाद से मुताल्लिक़ हैं।

3।फ़राइज़ की अदाइगी और अफ़आल ममनूआ से इजतिनाब के वक़्त अपने से गैर मुताल्लिक़ चीजों को अला हदा कर देते हैं और हर इस ताल्लुक को ख़त्म कर देते हैं जो उन के और मतलूब व मकसूद के दरमियान हाइल हो।

4।उन के आदाब से ज़्यादा के मुकाबले थोडी पर क़नाअत, कुव्वत लायमवत, ज़रूरी लिबास, बिछौना और दीगर इंतिहाई ज़रूरी चीजों पर गुज़ारा, अमेरी पर फ़कीरी को तरजीह, कसरत के मुक़ाबिल किल्लत पर क़नाअत, शिकम सीरी पर भूक को इख्तियार करना, गुरूरो फख्र और इलो मर्तबत से किनारा कशी, छोटों पर शफकत और हर एक से तवाज़ा से पेश आना, ख़ल्क़ ख़ुदा के लिए बवक़्त ज़रूरत कुर्बानी देने की जुरात, दुनिया हासिल करने वालों पर रषिक न करना, अल्लाह से हसन ज़न, ताअत में सबक़त, तमाम अच्छाइयों की तरफ़ क़दम बढ़ाना, तवज्जो अली अल्लाह, फ़क़त अल्लाह से लो लगाना, आज़माईशों पर सब्र इख्तियार करना, अल्लाह तआला के हर फैसले पर इज़हार रज़ा मंदी, मुसलसल मुजाहिदा नफ़्स, मुखालफत ख़ाहिशात और नफ़्स इमारा से दुश्मनी जिसे अल्लाह तआला ने अम्मारत बालसौ के नाम से पुकारा।

पोशीदा हिक़मतों पर गौर व ख़ौज़, ख़ौफ़ इलाही, बुरे खयालात और गाफिल कर देने वाले ऐसे अफ़्क़ार जिन्हें बजुज़ ज़ात अलीम व ख़बीर के कोई नहीं जानता, को ज़हनों में जगह न देना। गोया वह इस हालत में अपने माबूद हक़ीक़ी के हुज़ूर सजदा रेज़ होते हैं कि उन के दिल हाजिर, इरादे मुजतमा, और नीतें सीधी होती हैं। बुला शुबह अल्लाह जल शाना अपने

बंदों की वही इबादत कबूल फरमाता है जो खालिसतन इसी के लिए हो जैसा कि इरशाद फ़रमाया:

उला लिल्लाह अलद्दीۡन अलखालिस ( ) (हां खालिस अल्लाह ही की बंदगी है)

5।सूफ़िया के ख़साइल में से यह भी है कि वह औलिया अल्लाह के रास्तों पर चलते हैं, इस के बंदगान ख़ास की मंजिलों को पाने की सई करते हैं और हुक़ूक़ की असलियत जानने के लिए कोशां रहते हैं और यह सब कुछ वह रूह की मुकम्मल तवज्जो, नफ़्स कशी, अल्लाह की राह में ज़िन्दगी को मौत पर तरजीह देने, इज्जत की बजाए अल्लाह के लिए जिल्लत कबूल करने का ईसार, गोहर मुराद पाने के लिए आसाइश की जगह तंगी और इरादा हक़ को अपना इरादा तसोर करने के साथ हासिल करते हैं।

कुरआन क्रीम में मुख़तलिफ़ असमा

कुरआन क्रीम में बुलंद व बाला और अल्लाह के मकबूल बंदों को मुख़तलिफ़ नामों और असमा से ज़िक्र किया गया है, चंद यह हैं: अलस्सादक़ीۡन (सच्चे) अलस्सादक़ात (सच्ची अव्रतें) अलक़ानतीۡन (अदब वाले फ़रमां बरदार) अलक़ांतव्वत (अदब वाली फ़रमां बरदार अव्रतें) अलख़आशईۡन (आजिज़ी करने वाले) उल्मोۡकनीۡन (यकीन करने वाले) अलमख़लिसीۡन (सिर्फ़ अल्लाह की बंदगी करने वाले) अलमहसिनीۡन (नेकी करने वाले) अलख़आइफ़ीन (अल्लाह का ख़ौफ़ रखने वाले) अलर्राजीۡन (उम्मीद रखने वाले) अलोजिलीۡन (डरने वाले) उलआबदीۡन (इबादत करने वाले) अलस्साइहीۡन (रोजा रखने वाले) अलस्राबरीۡन (सब्र वाले) अलर्राजीन (राजी रहने वाले) अलमतुकेलीۡन (तोकल वाले) अलमुखबतीۡन (तवाज़ा वाले) उलावलीआ (अल्लाह के वली) अलमत्तक़ीۡन (तक़्वा वाले) अलमुस्तफ़ाۡन (मुंतख़ब चुने हुए) उलमुज्तबान (चुने हुए) अलाबरार (नेको कार) उलमुक़राबीۡन (क़ुर्ब वाले) और एक असम मुशाहिदीन का ज़िक्र इस आयत में यों फ़रमाया:

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। सूरत अलज़मर: 39/3

: अव उलक़ी अलस्समा व हो शहीۡदٌ( ) (या कान लगाये और मुतवज्जा हो) और सूफ़िया के लिए एक असम अलमुतमइन्नीन का ज़िक्र यों फ़रमाया: उला बज़कर अल्ला तुतमइन् उलक़ुलोۡब ( ) (सन लो अल्लाह की याद ही में दलों का चेन है)

मालूम रहे कि उन असमा में से अक्सर कुरआन क्रीम में बईना मौजूद हैं, मगर चंद एक बईना मौजूद नहीं, ताहम मुख़तलिफ़ आयात से यह साबित जरूर होते हैं जैसे अलर्राजीۡन कि यह असम जों का तों किसी आयत में मज़कूर नहीं, लेकिन आयत ओलाٓक यरजोۡन रहमत अल्ला ( ) (वह रहमत इलाही के उम्मीदावर हैं) से साबित है। हज़रत इमाम अबू नस्र सिराज कद स सिर्रहू फ़रमाते हैं कि मुंदरजा बाला असमा के ज़रिया कुरआन में सूफ़िया का ज़िक्र आया है। मालूम हो कि इस में कोई शक नहीं कि मज़कूरा असमा जिन औसाफ़ पर दलालत करते हैं वह औसाफ़ जिस कसरत के साथ सूफ़िया में पाए जाते हैं इस कसरत के साथ औरों में नहीं पाए जाते हैं , वह यक़ीनन उन औसाफ़ के मिस्दाक़ हैं । यह बात हर इस शख्स पर रोशन व अयाँ है जिस ने उन के अहवाल व मुक़ामात और ख़साइल व आदात और रियाज़ात व मुजाहिदात को पढ़ा है। यह चीज़ जहां उन की अज़मत व मनक़बत पर दलालत करती है वहीं इंद अल्लाह उन की मक़बूलियत की वाज़िह दलील हैं।

यह बात हमेशा जेहन नशीन रहना चाहिए कि अल्लाह तआला ने हमारे आका व मौला सय्यद एल्मरसिलीन सिल्ली अल्लाह तआला अलैहि व अलैहिम अजमईन को मख़लूक़ में सब से ज़्यादा कमालात अता फ़रमाए, बल्कि सब के कमालात आप के मुक़ाबिल बहुत थोड़े हैं । उलमा फ़रमाते हैं: सारी मख़लूक़ के इल्म को आका ﷺ के इल्म से वही निस्बत है जो एक क़तरा को

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। सूरत क़: 50/37

। सूरत अलराद: 13/28

। सूरत अलबकर: 2/218

दरिया से है; इसी लिए हज़रत मुजद्दिद अल्फ़ सानी क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि कमालात में बे मिसाल और हर वस्फ़ में बे मिसाल हैं। यह आका ﷺ का फ़ैज़ान है कि औलीए उम्मत में यह औसाफ़ व कमालात जिस कसरत के साथ पाए जाते हैं औरों में नहीं। नीज़ आप दीगर अफराद का मुताला करें तो किसी में एक, किसी में दो या कुछ ज़्यादा थोडी बहुत कसरत के साथ पाएं गे, मगर औलीए कराम व सूफ़िया अजाम में हर वस्फ़ कमाल उमूमन आप कसरत के साथ पाएं गे। यह चीज़ इस बात की वाज़िह दलील है।

क़ुर्ब व नियाबत रसूल ﷺ में जो मक़ाम उन अल्लाह वालों को हासिल है वह औरों को नहीं। इसी तरह ख़ौफ़ व ख़शीयत, तौबा व अनाबत, नदामत व पशेमानी वगैरह , आह व बिका, इंस व मुहब्बत ईसार व कुर्बानी, रहमत व शफकत वगैरह औसाफ़ व अख़लाक़ नबवी ﷺ से आरास्तगी जिस कसरत व शिद्दत के साथ इस मुबारक जमात में मिलेगी वह औरों में नहीं। यह सब उन की अज़मत व शान की दलील है।

क़ुलूब सूफ़िया: बड़ी मशहूर हदीस है, बुखारी वगैरह ने रिवायत की जिस का खुलासा यह है कि आका ﷺ फ़रमाते हैं: जिस इल्म व हिदायत के साथ में भेजा गया इस की मिसाल मूसलाधार बारिश की है जो जमीन पर बरसी, इस के एक क़ता ने जो कि काबिल ज़राअत था पानी को अपने अंदर जज़्ब कर लिया और इस में खूब घास पैदा हुई, सब्ज़ा उगा, इस का एक क़ता तालाब और झेल की तरह था जब इस में बारिश का यह पानी रुका और जमा हुआ तविल्लाह तआला ने मख़लूक़ को नफा पहुँचाया, लोगों ने वह पानी ख़ुद भी पिया, दूसरों को भी पिलाया, खेती बाड़ी में भी काम लिया। और एक क़ता इस जमीन का बिलकुल बंजर था, न इस में सब्ज़ा उगा और न ही पानी इस में पड़ सिक्का।

पस यह मिसाल इस की है जो दीन में फ़क़ीह हुआ और इस को इस क्षे ने नफा बख्शाजिस

के साथ अल्लाह तआला ने मुझे मबऊस फ़रमाया। पस वह ख़ुद साहिब इल्म हुआ तो इस ने दूसरों को भी इल्म सिखाया। और बंजर क़ता की मिसाल इस शख्स की है जो इस से मुतनब्बा और बेदार न हुआ और न इस ने अल्लाह तआला की इस हिदायत को कबूल कियाजिस के साथ मुझे मबऊस फ़रमाया।

हज़रत शैख़ उलशयूख़ क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं: पस सूफ़िया कराम के क़ुलूब हाफ़िज़ हैं (इसरार इलाही के) इस लिए कि उन्हों ने दुनिया की तरफ़ रगबत बहुत कम की और इस के बाद जब तक़्वा की जुड़ और बुनियाद उन के अंदर उस्तिवार और मुस्तहकम हो गई तो परहेज़गारी व तक़्वा से उन के पाकीज़ा नफ़ूस और पाकीज़ा ज़हद की बदौलत उन के दिल साफ व शफ़्फ़ाफ़ होगए और जब उन्हों ने दुनिया के इलायक को ज़हद की हक़ीक़त से नेस्त व नाबूद कर दिया तो इस वक़्त उन के बतून के मुसामात खिल गए और वह गोश् दिल से सुनने लगे और ज़हद दुनिया उन का मुआविन व मददगार हुआ।’’

फिर मुफ़स्सिरीन व मुहद्दिसीन व फ़िक़हा की ख़िदमात वगैरह ज़िक्र करके फ़रमाते हैं: चों कि क़ुलूब सूफ़िया मुनासबत क़रीब रखते थे इस लिए उन्हों ने इस इल्म व हिदायत का हिस्सा वाफ़र हासिल किया और उन के बातिन भी झेल और तालाब बिन गए। फिर उन्हों ने इल्म सीखा और इस पर अमल भी किया जिस तरह तालाब कि उन का पानी पीते भी हैं और इस से आब रसानी का काम भी लिया जाता है (खेतियां सेराब की जाती हैं) पस उन्हों ने तक़्वा के बुनियादी अहकाम से इल्म दरास्त (दानाई) और इल्म विरासत दोनों को यकजा कर दिया। जब इस तरह उन के नफ़ूस पाक और मज़का हो गए तो अल्लाह तआला ने उन के क़ुलूब के आईनों को सीक़ल (मार्फत से जगमगा दिया) जब यह आईने मस्क़ूल हो गए, उन में जिला पैदा हो गई और कबूल इनाकास की भरपूर सलाहीयत उन में आगई तो उन पर सूर अश्या अपनी तमाम माहेतों और हैयतों के साथ ज़ाहिर हो गईं । दुनिया की हैयत व माहेत चों कि

क़बीह थी; इस लिए वह कपनी तमाम क़बाहतों के साथ उन पर ज़ाहिर हुई और उन्हों ने इस की यह क़बाहतें देख कर इस को छोड़ दिया। और आख़िरत अपनी तमाम रानाइयों के साथ उन के आईना हाए क़ुलूब पर मुनाकिस हुई, इस को उन्हों ने कबूल कर लिया और इस की तलब में मशगूल हो गए। अदम कबूल दुनिया से जब उन की बे रग़बती व बे ताल्लुक़ी ज़ाहिर हुई तो उन के बतून पर अन्वा व क़साम के उलूम अपनी तमाम कैफियत व कमीत के साथ वारद हो गए। इस तरह इल्म दरास्त के साथ साथ इल्म विरासत भी उन को मुकम्मल तौर पर हासिल हो गया।

हज़रत शैख़ उलशयूख़ क़ुद्दिस सिर्रहू ने बड़ी तफ़सील सेइस मक़ाम पर फ़िक़्ह व फ़िक़हाकी ख़िदमात वगैरह ज़िक्र की और उलूम सूफ़िया के क़ुलूब ने जो कबूल किया और अल्लाह तआला ने उन पर कैसे उलूम के दरवाजे खोलेबहुत अहम नुक्ता की तरफ़ इशारा, बल्कि सराहत की है। आप तजरबा से देखें कि सूफ़िया ने अपने क़ुलूब व अज़हान को हर ख़याल गैर से पाक किया और इस को पूरे तौर पर अल्लाह तआला के हवाले और हर चीज़ मुतहर व मज़का कर लिया तो अल्लाह तआला ने मआरिफ़ व हक़ायक़ के दरवाजे खोल दिए और वह उलूम जिन का ताल्लुक ज़ात व सिफ़ात वगैरह से था, उन पर अयाँ कर दिए, दर असल ग़ैरत इलाही का तक़ाज़ा यही है कि जिस दिल में गैर की गंदगी होती है, वह जलवों से दौर रहते हैं और सब से पाक व साफ हो जाते हैं, उन पर तजल्लियात की बारिश होती है।

अहले बहिश्त की सिफ़त

इरशाद रब्बानी है:

وَنَزَعْنَا مَا فِیۡ صُدُوۡرِہِمۡ مِّنْ غِلٍّ اِخْوَانًا عَلٰی سُرُرٍ مُّتَقٰبِلِیۡنَ ( )

तर्जुमा: और हम ने उन के सीनों में जो कुछ केने थे सब खींच लियापस में भाई हैं तख्तों पर रूबरू बैठे।

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। सूरत उलहज्जर: 15/47

हज़रत अबू हफ़स क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि जो क़ुलूब अल्लाह तआला की मुहब्बत से मालूफ़ और इस की मुहब्बत पर मुत्तफ़िक़ और इस की मोद्दत में मुजतमा और इस के ज़िक्र से मानूस हो गए हैं। उन में कीना व हसद की तरह बाक़ी रह सकता है। बेशक यह दिल नफ़सानी वस्वसों और कदूरतों (तारीकियों) से पाक व साफ हैं, बल्कि तौफ़ीक़ के नूर से सुरमगें हैं तो फिर वह सब आपस में भाई हो गए।’’ हक़ीक़त है कि एक दिल को साफ करके सूफ़िया बड़ी अज़्मतों के मालिक हो गए।

इल्म ज़ाहिर और इल्म बातिन: सूफ़िया कराम को अल्लाह तआला इल्म ज़ाहिर के साथ इल्म बातिन की दौलत अता फरमाता है। इल्म बातिन से किया मुराद है? हज़रत इमाम अबू नस्र सिराज क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं: जब हम इल्म बातिन का नाम लेते हैं तो हमारी मुराद उन आमाल बातिनी का इल्म होता है जो क़ल्ब पर जारी होते हैं और इल्म ज़ाहिर का मफ़हूम उन आमाल ज़ाहिरी का इल्म है जो इंसान के ज़ाहिरी आज़ा अंजाम देते हैं। आमाल बातिनी का ताल्लुक क़ल्ब से है जैसे मुक़ामात, अहवाल यानी तस्दीक, ईमान, यकीन, सिदक़, इख़लास, मार्फत, तोकल, मुहब्बत, रज़ा ज़िक्र, शकर, तौबा , ख़शीयत, तक़्वा , मुराक़बा, फ़िक्र, ऐतबार, ख़ौफ़, उम्मीद, सब्र, क़नाअत, तसलीम, तफ़वीज़,क़ुर्ब, शौक, वज्द, हज़न, नदामत, हया, ताज़ीम और हैबत।’’

खुलासा यह कि उलमा-ए ज़ाहिर को नज़र व इस्तिदलाल से इल्म होता है, वह इल्म ज़ाहिर है और अर्बाब मार्फत को कश्फ़ व शहूद और इलहाम के ज़रिया यह इल्म बातिन है, कश्फ़ व इलहाम के ज़रिया किस किस का इल्म हासिल हो सकता है। इस को हम क़दरे तफ़सील से अपनी किताब ‘‘कश्फ़ व इलहाम’’ में बयान कर चुके हैं।

यह भी ध्यान रहे कि इल्म बातिन कुरआन व हदीस और सल्फ सालहीन के इजमा से साबित है, इस का इंकार या तो जाहिल करेगा या मुआनद। आज ऐसे भी लोग पैदा हो रहे हैं जो इल्म बातिन के मुनकर हैं। हम इस के सबूत और पर कुछ तफ़सील पर अलाहदा तहरीर

में कलाम कर चुके हैं। तौफ़ीक़ इलाही हुई तो एक रिसाला इल्म बातिन के सबूत में तहरीर होगा। सूफ़िया कराम का बड़ा एहसान है कि उन्हों ने तज़किया नफ़्स व तसफ़ीया क़ल्ब के ज़रिया उलूम बातिना का बेश बहा खजाना उम्मत को अता कर दिया और वह हक़ायक़ तौहीद और सिफ़ात वगैरह बयान कर दिए कि जिस से ख़ुदावंद क़ुद्दूस और इस के मुक़र्रब बंदों की अज़मतें रफातें मालूम हुईं और उन के मुरातिब का पता चला। हमें चों कि इस किताब में तसव्वुफ़ के ज़रूरी मिसाइल बयान करना है ताक कम इल्म इंसान असल तसव्वुफ़ को जान ले और उसूल तसव्वुफ़ से आगाही हासिल कर ले; इस लिए हम ने कैल क़ाल और तवील बहसूँ से आराज़ किया।

चार पीर चौदह ख़ानवादे

तसव्वुफ़ में चार पीर और चौदह ख़ानवादे बहुत मशहूर हैं। ध्यान रहे कि अक्सर सलासल तसव्वुफ़ इमाम उलावलिया हज़रत अली मुर्तज़ारज़ि अल्लाह अन्हु से मंसूब हैं। इस की वजह हम हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू के हवाले से दूसरी तहरीर में तफ़सील से बयान कर चुके हैं ख़ास कर‘‘सलासल और उन के असबाब इख़तिलाफ़’’ में सूफ़िया कराम का कहना है कि ख़िरक़ा तसव्वुफ़ हज़रत अलीरज़ि अल्लाह अन्हु से मुंदरजा जेल चार हज़रात को मिला है:

(1)हज़रत इमाम हसन मुज्तबा (2)हज़रत इमाम हसीन (3)हज़रत कमेल इब्न ज़ियाद (4)हज़रत इमाम हसन बस्रीरज़ि अल्लाह अन्हुम। यह चारों हज़रात चहार पीर कहलाये और चौदह ख़ानवादों से मुराद यह हैं:

1। ख़ानवादा ज़ैदियां

हज़रत इमाम हसन बस्री के मुरीद व ख़लीफ़ा हज़रत अब्द अलवाहिद इब्न ज़ैद(म177ह793) जब आप मसंद इरशाद पर मुतमकन हुए तो अबनए अब्द अल्लाह इब्न ऊफ़ में से पांच शख्स उन के मुरीद हुए उन्हों ने हसब व नसब और वतनी निस्बत को तर्क किया और ज़ैदियां कहलाये। ख़ानवादा ज़ैदियां से वाबस्ता सोफी हमेशा बियाबान में रहते हैं। शहर और आबादी में नहीं जाते, किसी से फ़तूह मिले तो वह

भी कबूल नहीं करते, तीन या चार रोज़ के बाद मेवा या घास खाकर इफ्तार करते हैं, किसी जान दार को नहीं मारते, हज़रत अब्द अलवाहिद इब्न ज़ैद को हज़रत हसन बस्री और हज़रत कमेल इब्न ज़ियाद से ख़िरक़ा खिलाफत मिला था, आखिरी वक़्त आन पहुँचा तो उन्हों ने हज़रत हसन बस्री की तरफ़ से मिला ख़िरक़ा खिलाफत हज़रत फिजील इब्न य्याज़ (105।187ह 723।812) को और हज़रत कमेल इब्न ज़ियाद का ख़िरक़ा खिलाफत शैख़ अबू याकूब अलसूसी को अता किया। उन दोनों से मज़ेद दो ख़ानवादे जारी हुए।

2।ख़ानवादा अय्याज़ीयां

हज़रत फिजील इब्न य्याज़ से मंसूब अय्याज़ीयां कहलाते हैं। यह हमेशा सफर में रहते हैं,निकाह नहीं करते हैं घरेलू ज़िन्दगी से आजाद हैं, निया लिबास नहीं पहनते हैं , बल्कि चुथड़े उठा कर ख़िरक़ा पर पैवंद करते हैं, बे तलब जो मयस्सर आये खर्च करते हैं, मेहमानों के साथ खाना खाते हैं, मख़लूक़ से किनारा कशी और ब्रहना पा सफर करना उन का शेवा है।

3।ख़ानवादा अधमियां

हज़रत इब्राहिम बिन उधमरज़ि अल्लाह अन्हु को हज़रत ख़िज़रअलैहि अस्सलाम और इमाम मुहम्मद बाक़िर (57।114ह676।732) से निस्बत इरादत थी जो सूफ़िया अपना नाम व नसब और वतन तर्क करके हज़रत इब्राहिम बिन उधमरज़ि अल्लाह अन्हु से वाबस्ता हैं वह अधमियां कहलाते हैं। यह लोग हमेशा सफर में रहते हैं। मुजर्रिद ज़िन्दगी गुजारना, ज़िक्र जली कसरत से करना, अहले दुनिया से किनारा कशी करनाआन का तरीका है, बे तलब दस्त ग़ैब से जो मिल जाए इसी पर गुज़ारा कर लेते हैं, हमेशा मुजाहिदा व रियाज़त में मसरूफ़ रहते हैं।

4।ख़ानवादा हबेरियां

हज़रत हबीरा बस्री (167।287/289ह) से मंसूब हैं। हज़रत हबीरा बस्री शैख़ हुज़ैफ़ा मराशीरज़ि अल्लाह अन्हु (202ह) के मुरीद व ख़लीफ़ा थे। हबेरियां हमेशा बावुज़ू रहते हैं, शहर और बस्ती में क़याम नहीं करते, तजरिअद की ज़िन्दगी गुज़ारते हैं, पासबानी दिल का ख़ास ख़याल रखते हैं, किसी से फ़तूह कबूल नहीं करते, तीन चार दिन बाद मेवा या जंगली घास से इफ्तार करते हैं।

5।ख़ानवादा चिश्तियां

चिश्तियां हज़रत ख़्वाजा इलो देनोरीरज़ि अल्लाह अन्हु (298ह 910)से वाबस्ता हैं। ख़्वाजा मौसूफ़ हज़रत हबीरारज़ि अल्लाह अन्हु के मुरीद थे। ख़्वाजा इलो देनोरी के मुरीद ख़्वाजा अबू इसहाक़ चिश्ती (329ह 940) हैं जो शाम के रहने वाले थे। जब आप ख़्वाजा इलो देनोरी की ख़िदमत में आये तो ख़्वाजा ने पूछा: कहां से आये हो? ख़्वाजा अबू इसहाक़ ने जवाब दिया: शाम से’’ ख़्वाजा इलो देनोरी ने यह सन कर कहा: आज से तुम चिश्ती कहलाओगे’’ चनां चह ख़्वाजा इलो देनोरी ने उन्हें इजाजत नामा दे कर चश्त (खुरासान) रवाना की।

ख़्वाजा अबू इसहाक़ जब चश्त पहुँचे तो वहाँ के एक रईस ख़्वाजा अहमद चिश्ती (260।355ह 872।965) उन के मुरीद हो गए। ख़्वाजा अबू इसहाक़ से उन्हों ने ख़िरक़ा खिलाफत हासिल किया और अपने बाद अपने फ़रज़न्द ख़्वाजा मुहम्मद चिश्ती (331।411ह 942।1020) को खिलाफत अता की । ख़्वाजा मुहम्मद चिश्ती से यह खिलाफत उन के ख़्वाहिर ज़ादा ख़्वाजा नासिर उद्दीन अबू यूसुफ चिश्ती (374।459ह 984।1066) और उन से उन के फ़रज़न्द ख़्वाजा कुतुब उद्दीन मौदूद चिश्ती (430।537ह 1038।1132) को पहुँची। यह पुंज ख़्वाजगान चश्त कहलाते हैं। बुर सग़ीर में इस ख़ानवादे के बड़े बुजुर्गों को खोजगान चश्त कहा जाता है। यह ख़ानवादा हज़रत ख़्वाजा गरीब नवाज़ (536।633ह 1141।1236) के तवस्सुत से बुर सग़ीर में पहुँचा। चिश्ती हज़रात शहर व आबादी में क़याम करके मख़लूक़ इलाही को दावत देते हैं, फक्र व फ़ाक़ा की ज़िन्दगी बसर करना और फ़िक़रा व मसाकेन से मुहब्बत रखना उन का शेवा है, समाव को पसंद करते हैं और पैरों का उर्स मनाते हैं।