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अध्याय 12 में से 54पृष्ठ 155–164

असल तसव्वुफ़

ख़याल रहे कि असल तसव्वुफ़ के बारे में हम कि सकते हैं, एक वह हिस्सा है जो शुरुआती उमूर है जैसे वह अहकाम जिन का ताल्लुक क़ल्ब व क़ालिब से बजा लाने से ताल्लुक रखता है, इस में यह मज़कूरा बाला तफ़सील शामिल है। खुलासा यह है कि यह वह अख़लाक़ व औसाफ़ हैं जिन के साथ आरास्तगी का कुरआन व सुन्नत और अइम्मा सल्फ ने हमें हुक्म दिया है। दूसरा हिस्सा असल का वह है जिन का ताल्लुक मुंहयात से है। बाज़ अख़लाक़ ज़मीमा और अख़लाक़ रज़ीला और औसाफ़ रज़ीला इस से क़ब्ल बयान कर चुके, बाज़ यह हैं: रिया, अजब, हसद, कीना, तकबर , हुब्ब मदह, हुब्ब जाह, मुहब्बत रिया, हुब्ब शहरत, ताज़ीम उमरा, तहक़ीर मसाकेन, इत्तिबा शहवात, मदाहंत, कुफ़रान नोम, हिर्स, तूल अमल, सौ ज़न, इनाद हक़, इसरार बातिल, मुकर, गदर, खयानत, गफलत, किसूत, तमा, तमिलक, एतिमाद ख़ल्क़, निस्यान ख़ालिक़, निस्यान मौत, जुरात अली अल्लाह, नफ़ाक़, इत्तिबा शैतान, बंदगी नफ़्स, रगबत बतालित, कराहट अमल, किल्लत ख़शीयत, जज़ा, अदम ख़ुशू, गजब ललनफ़स और तसाहुल फ़ी अल्लाह वगैरह मुहलकात व आफ़ात।

अजज़ाए तसव्वुफ़

यह ख़ास कर ध्यान रहे कि सूफ़िया कराम का असल मक़सद उन्हें अख़लाक़ व औसाफ़ से आरास्ता करना और अख़लाक़ रज़ीला व औसाफ़ ज़मीमा से क़ल्ब व क़ालिब को पाक करना है और ज़ाहिर व बातिन में पूरे तौर पर शरीअत को नाफ़िज़ करना है। इस के लिए उन्हों ने सारी जिद व जहद की और मुकम्मल निजाम तैयार किया, खानक़ाहों को बनाया और शब् व रोज़ का निजाम अलावकात तैयार किया। सूफ़िया कराम ने क़ल्ब व क़ालिब की ततहीर और पाकीज़ा अख़लाक़ के साथ आरास्तगी के लिए ख़्वाह इलहाम व कश्फ़ से या तजरबा से उसूल व ज़वाबत मुक़रर किए और पता लगाया कि उन सब का सरचश्मा क़ल्ब व नफ़्स हैं। लिहाज़ा उन के तसफ़ीया व तज़किया के ज़रिया उन के कश्फ़ व शहूद में उन पर एक निया आलम खुला और कश्फ़ व

शहूद और इलहाम की एक दौलत उन के हाथ आई जिस के ज़रिया अपने रब तआला की ज़ात व सिफ़ात और असमा व अफ़आल और इस के मकबूल व प्यारे बंदों के मुरातिब व मुक़ामात और कायनात की वसातों में मख़फ़ी और पोशीदा राज़ हाए कुदरत उन पर मुनकशिफ़ हुए। इस तरह मआरिफ़ व हक़ायक़ और मिआ मिलात और मक्शफ़ात का बड़ा हिस्सा तसव्वुफ़ इल्मी का जुज़ बिन गया वर्ना असल तसव्वुफ़ वही है जो हम ने बयान किया।

इस मुजाहिदा व मेहनत के दरमियान उन पर और भी मख़फ़ी लताइफ़ और इंसानी जिसम में वदीअत रखी हुई अमानतें और क़ुव्वतें उन के मुशाहिदा में आएं। उन की तहजीब व तादीब के तरीके भी उन पर वा हुए और उन की तहजीब के ज़रिया उन केकमालात भी उन पर मुनकशिफ़ हुए। चनां चह उन्हों नेतफ़सील से आलिमों और उन के लताइफ़ को जाना और उन के कमालात से आगाह हुए और उन्हें तफ़सील से बयान किया। इस तरह तसव्वुफ़ में लतायफ़ और उन की तहजीब के उसूल व ज़वाबत और उन से वाबस्ता कमालात भी तसव्वुफ़ का अहम हिस्सा करार पाए। फिर अल्लाह तआला ने अपने कर्म से उन पर अपने क़ुर्ब के तरीके और राहें वसीअ कीं, वह इस सफर में मुख़तलिफ़ राहों से गुज़रे, उन में ख़ास ख़ास नये नये कमालात से मालामाल हुए, राहों की ख़ुसुसीआत से वाकिफ़ हुए। रास्ते के मनाज़िल व मराहिल और उन के कमालात और कैफियात से बाख़बर हुए। उन्हों ने उन मराहिल व मनाज़िल और कमालात और कैफियात व वारदात को जिन अलफ़ाज़ के सहारे से बयान किया वह अलफ़ाज़ व इस्तिलाहात भी तसव्वुफ़ का बड़ा हिस्सा करार पाए।

अस्नए सुलूक वह जिन मंजिलों और मुक़ामों से गुज़रे हर मक़ाम के तफ़सीली कमालात और वहाँ की खासियात और इस मक़ाम के लायक ज़िक्र व फ़िक्र भी उन के रब तआला ने उन्हें इलहाम फ़रमाए। नीज़ उन मुक़ामात व मनाज़िल के मुआविन अज़कार व अशग़ाल भी उन के इल्म में आये। इसी तरह मुजाहिदात व रियाज़ात के नतीजे में तसर्फ़ात

विकरामात पर बड़ी जबरदस्त दस्तरस हासिल हुई। इस तरह के उमूर भी तसव्वुफ़ का एक हिस्सा बिन गए। औलीए कराम अलैहिम इलरिज़्वान की बाबरकत सोहबत के ज़रिया जब अहले सुलूक पर बातिनी मामलात खिलने लगते हैं तो इस क़द्र जाज़िब और पर कशिश होते हैं कि उन की तहसील का शौक बढ़ता चला जाता है, उन को मज़ेद कवी करने के लिए बहुत से अहले सुलूक ने बड़े बड़े दुश्वार मुजाहिदात व रियाज़ात शाक़ा इख्तियार कीं और बाज़ ऐसे उमूर जो कुरआन व सुन्नत में वारद नहीं थे अपनाए हत्ता कि बाज़ ने बाज़ गैरों से अख़ज़ किए, लेकिन ऐसे निहायत नादिर और नायाब हैं। ग़रज़कि बहुत से दावत असमा वगैरह के तरीके और आमाल तसरीफिया इख़्तिया रुकिये जो अगरचे किताब व सुन्नत में वारद न थे, मगर वह असल शरा के मुख़ालिफ़ भी न थे और उन उमूर को किसी आम इंसान ने नहीं, बल्कि इल्म व अमल और करामत व तसर्फ़ के जो बतल जलील कहलाते हैं, जिन के इर्षादत हुज्जत हैं उन्हों ने इख्तियार किए। इस तरह यह उमूर भी तसव्वुफ़ में शामिल हो गए।

औलीए करामत ने किताब व सुन्नत का सच्चा पाबंद बनाने के लिए और सर्वर कोनेन ﷺ के तुफ़ैल उन के कमालात ज़ाहिरी व बातिनी से फ़ैज़ याब और उन की हिफाज़त और क़ुर्ब ख़ुदावंदी की तहसील के लिए ख़ास ख़ास हज़रात ने अपने अपने ज़ौक़ के मुताबिक मुख़तलिफ़ तरीके अपनाए। मसलन इसलाह व इरशाद के लिए सब से मुफीद तरीका सूफ़िया कराम ने बीअत का अपनाया। इस से एक सुन्नत का अहया भी हुआ और जो ग़रज थी वह भी हासिल हुई, लेकिन इस बीअत को अहम बनाने के लिए और साहिब इरादत को यह बताने के लिए कि बीअत करने से वह ज़िन्दगी के एक नये दौर से आशना होरहा है और इस माहौल में क़दम रख रहा है जो सरासर दीनी और खालिस यक़ीनी है और इसी पर दुनिया व आख़िरत की हक़ीक़ी कामयाबी और दाइमी व अब्दी नेअमतों का इन्हिसार है और उसे यह बावर कराने के लिए कि अब साबिक़ा ज़िन्दगी छोड़ कर कौन सी ज़िन्दगी इख्तियार करनी है। इस के लिए

उन्हों ने बवक़्त बीअत मुतअद्दिद तरीके अपनाए। यह तरीके अगरचे कुरआन व सुन्नत में वारद नहीं थे, मगर उन के खिलाफ़ भी न थे कि जिस से उन पर बिद्दत का इल्जाम लगता, सूफ़िया मौरिद तान व तशनीअ बनते। इसी तरह उन्हों ने उसूल व ज़वाबत मुक़रर किए। यह सब कुछ रफ़्ता रफ़्ता तसव्वुफ़ में भी शामिल होता चला गया, मगर यह सब चीजें असल तसव्वुफ़ या मक़ासिद में शामिल न थीं; इस लिए मुख़तलिफ़ सलासल में मुख़तलिफ़ सूरतों और आमाल व अशग़ाल वगैरह मामूल रहे। सूफ़िया कराम में बड़े बड़े अहले इल्म व फन हुए जो बैक वक़्त उलूम ज़ाहिर व बातिन की आला चोटी पर फ़ाइज़ थे, उन्हों ने अपने तमाम मामलात को कुरआन वसंत की ही रोशनी में परखा और उन्हें साबित किया और मुख़तलिफ़ आयात व अहादीस और मुतअद्दिद सहाबा करामरज़ि अल्लाह अन्हुम की सीरत और उन की रोष से इस्तिनाद किया। चनां चह अहया उलउलूम, कुव्वत उलक़ुलूब, किताब अललमा, रिसाला कशीर्य, कश्फ़ अलमहजोब और हज़रत ग़ौस आज़म व मुजद्दिद अल्फ़ सानी क़ुदसित इसरारहम की तसानीफ़ से यह सारे उमूर बिलकुल वाज़िह और रोशन हैं। उन के अलावा हर दौर में जिम्मा दार सूफ़िया कराम की कुतुब व मक्तोबात का एक ज़ख़ीरा मौजूद है जिन में आज असल किताब मक्तोबात या उन के तराजुम मंज़र आम पर भी आगये हैं, कोई भी उन का मुताला कर सकता है।

इमाम अबू अलक़ासम कशीरी ने रिसाला कशीर्य में और हज़रत दाता हजवीरी लाहौरी क़ुद्दिस इसरारह्मा नेकशफ़ अलमहजोब में सहाबा व ताबईन और तबा ताबईन और दीगर मताख़रीन व अइम्मा सूफ़िया की एक तवील फिहरिस्त दर्ज की है और जिन के नाम लिए हैं वह अइम्मा तरीक़त व तसव्वुफ़ हैं जिन का फजल व इरफान, तक़्वा व तहारत और ख़ुदा रसीदगी की अज़्मतों के आगेबड़े बड़े अइम्मा शरीअत ने सर झुकाए हैं और उन की अज़्मतों का एतराफ़ किया है। बह्र हाल तसव्वुफ़ में यह उमूर भी दाखिल हो गए। इसी तरह परवरदिगार जल व अला ने अपने हबीब लबीब ﷺ के सदक़ा व तुफ़ैल ख़ास ख़ास औलीए उम्मत को हर दौर के मुनासिब कमालात से आरास्ता किया और उन पर कमालात जदीदा फ़ाइज़ किए इस

को हम तफ़सील से एक अलाहदा तहरीर में ज़िक्र कर चुके हैं। यह सब चीजें भी तसव्वुफ़ का एक हिस्सा बिन गईं।

तसव्वुफ़ का एक हिस्सा अर्बाब कश्फ़ सूफ़िया के वह मक्शफ़ात व अहवाल हैं जो मुख़तलिफ़ तजल्लियात के वरूद के सिलसिले में उन से सरज़द हुए और उन की ताबीर में अलफ़ाज़ व इबारात की तंग दामानी रुकावट रही और जिस क़द्र वह अलफ़ाज़ का सहारा ले कर ज़ाहिर कर पाए ज़ाहिर किए। उन की नाजुक ताबीरात से बाज़ कम इल्म और क़लील अलफ़हम लोग सही मुतालिब व मक़ासिद तक न पहुँच सके और उन्हें कुछ और ही रूप दे दिया जैसे वहदत वाल्वजूद वगैरह की ताबीरात। इसी तरह वह अक़्वाल व अफ़आल जो तसव्वुफ़ में शतहयात के नाम से जाने गए मुख़ालिफ़ीन को और कुछ तो हाथ नहीं आया बस इसी तरह की चीजों को ले कर उछल पड़े और उन बाइज़मत इंसानों की अज़मत पर हमले शुरू कर दिए। हम आगे चल कर तमाम मुआनदीन की अब तक की तमाम लाहासिल कोशिशों को ज़िक्र करें गे जिस से आप समझ लें गे कि उन की बिसात किया है, यह कितने पानी में हैं और शैतान ने उन की कैसी राह मारी है। वैसे हम शतहयात के ताल्लुक से अपनी किताब ‘‘शतहयात और इस के असबाब’’ में क़दरे तफ़सील से ज़िक्र कर चुके हैं।

आज के उर्फ में जो तसव्वुफ़ मशहूर है इस में वह हिस्सा भी दाखिल मानते जिस का ताल्लुक बुजुर्गों के तज़किरों और सवानिह व सैर से है और उन में उन के मुख़तलिफ़ अक़्वाल व इर्शादात और ज़ौक़ी व वजदानी उमूर मज़कूर हैं। यह जितने हिस्से हम ने बयान किए शायद अब कोई इस से खारिज हो, लेकिन असल तसव्वुफ़ वही है जो हम शुरू में बयान कर चुके हैं। यह बात हम फिर कहीं गे कोई शख्स आज भी कुरआन व सुन्नत के बयान करदा मामूरात मुंहयात ख़्वाह उन का ताल्लुक अहकाम व अक़ाइद से हो या अख़लाक़ व औसाफ़ आलीया या रिज़ाइल व सिफ़ात ज़मीमा से अमल व इजतिनाब में जो आला नमूने और कसरत व एहतियात जो इस तबका सूफ़िया में आप पाएं गे वह कहीं नहीं पाएं गे।

हम ने तसव्वुफ़ के मराहिल बयान कर दिए। अब इस की रोशनी में अहले इल्म अलाहम फालाहम के उसूल के मुताबिक तसव्वुफ़ को बहीसत इल्म व फन सिखाने का काम कर सकते हैं, इस से एक राह मिलेगी। हम पहले यह बयान कर चुके हैं कि असल तसव्वुफ़ की तहसील का ताल्लुक ज़्यादा तर तसफ़ीया क़ल्ब व तज़किया नफ़्स से है जिस की ताकीद कुरआन व सुन्नत जगह जगह हमें करते हैं। तसव्वुफ़ इल्मी समझने के लिए ज़रूरी है कि हम सूफ़िया कराम की बोली और ताबीरात समझें। तसव्वुफ़ के इस हिस्सा को एक मुस्तक़िल तहरीर में बड़ी जामईयत के साथ जमा कर दिया गया जिस से तसव्वुफ़ समझने में बड़ी आसानी होगी और मदद मिलेगी और तक़रीबन मुतक़द्दिमीन व मताख़रीन की ज़्यादा तर इस्तिलाहात इस किताब में जमा हो गई हैं। उन इस्तिलाहात से आप समझ सकते हैं कि सूफ़िया कराम अस्नए सुलूक कण कण मराहिल व मनाज़िल से गुज़रते हैं और उन पर किया किया कैफियात वारद होती हैं। नीज़ इंसानी फ़लाह व बहबूद और शरीअत की हिफाज़त के लिए उन बुजुर्गों ने किस क़द्र मेहनत की और तामीर ज़ाहिर व बातिन के लिए एक बाज़ाबता इल्म मदुन किया।

क़ुर्ब व विलायत और इस के इक़साम व अहकाम और कमालात में एक जुदा किताब तहरीर में आचुकी है। इसी तरह सूफ़िया कराम ने इंसानी जिसम में जो लताइफ़ दरयाफ्त किए और उन की तहजीब के तरीके मुक़रर किए और उन की तहजीब से मुरत्तिब होने वाले समरात व नताइज यह भी एक किताब में तहरीर कर दिए गए हैं।

सलासल तसव्वुफ़ दुनिया में बड़ी तादाद में राइज हुए, उन में बाहम जुज़वी इख़तिलाफ़ात हैं, अज़कार व अशग़ाल जुदा जुदा हैं। अस्नए राह पेश आने वाले कमालात भी अलग अलग। यह भी अल्लाह तआला की ख़ास रहमत और मदनी आका ﷺ की ख़ास इनायत थी। तबीअतें मुख़तलिफ़ होती हैं, ज़ौक़ मुख़तलिफ़ हैं, हिम्मतें मुख़तलिफ़ हैं, इस्तिदादों में तफ़ावुत है। किसी के मुनासिब कोई राह आई, किसी के लायक कोई तरीका हुआ। बह्र हाल उन मुख़तलिफ़ राहों से ना मालूम किस क़द्र लोग वस्ल की दौलत से मालामाल हुए।

हम ने अ न सलासल के बाहमी इख़तिलाफ़ात और तरीके भी एक किताब में बहसब फ़हम जमा कर दिए हैं। मुख़तलिफ़ सलासल में रूहानी मदारिज व मनाज़िल तै कराने के लिए जो अज़कार व अशग़ाल हैं और अस्नए सुलूक जो मुक़ामात पेश आते हैं उन को भी जमा कर लिया है। उन के अलावा भी कुछ तहरीर हैं जिन का ताल्लुक भी तसव्वुफ़ के ही किसी हिस्से से है। ग़ुन शा उलमौला उलक्रीम जिस दिन यह सब छिप जाएँ गी अक्सर तसव्वुफ़ मालूम हो जाएगा। जीर नज़र किताब में हम तसव्वुफ़ का वह हिस्सा जो असल तसव्वुफ़ और इस के फ़वाइद से ताल्लुक रखता है बयान करना चाहते हैं। चों कि अइम्मा तसव्वुफ़ की अहम अहम किताबें और उन के तराजुम छिप गए हैं और उन में तसव्वुफ़ के मज़कूरा बाला हिस्से काफ़ी तफ़सील से बयान कर दिए गए हैं। इस लिए हम ने हल्की सी निशान दही कर दी है ताकि आम तसव्वुफ़ का मुतलाशी तसव्वुफ़ जान सके और असल इल्म तसव्वुफ़ सिखा सके।

यहाँ यह भी ध्यान रहे कि अर्बाब कश्फ़ के वह मक्शफ़ात व मुशाहदात जिन का ताल्लुक अल्लाह तआला की ज़ात व सिफ़ात व असमा व अफ़आल से है। नीज़ औलीए कराम की इक़साम वगैरह से है इस सिलसिले में सब से ज़्यादा सही और वाज़िह और शरीअत व सुन्नत के साँचे में ढले हुए मुशाहदात हमारी नज़र में वह हैं जो हज़रत इमाम रब्बानी मुजद्दिद अल्फ़ सानी क़ुद्दिस सिर्रहू ने बयान फ़रमाए हैं उन को हम नेकाफी हद तक मआरिफ़ मुजद्दिद में जमा कर दियाहै। अब हम तसव्वुफ़ का वह हिस्सा ज़िक्र करें गेजस का ताल्लुक बातिनी तरबीयत वगैरह से है।

अव्वल वाजिब

यह ध्यान रहे कि उलमा ने बितफ़ाक़ फ़रमाया है कि अव्वल वाजिब इरफान व मार्फत ख़ुदावंदी है।

इक़साम मार्फत

यह मार्फत चार किस्म की बयान की गई है:

(1)हक़ीकया: यह सिर्फ़ अल्लाह तआला को है अपनी ज़ात की।

(2)मार्फत अयान्य यानी दीदार ख़ुदावंदी, हमारे नबी ﷺ के अलावा गैर के

लिए दुनिया में मुमकिन नहीं, आख़िरत में अहले ईमान को बहसब मुरातिब हासिल होगी।

(3)मार्फत बुरहानिय जो नज़र व इस्तिदलाल के ज़रिया हासिल होती है, मुतकल्लिमैन ने इस को फर्ज़ उएन करार दिया है।

(4)मार्फत कशफ़्या: यह अर्बाब कश्फ़ व शहूद का हिस्सा है। सूफ़िया कराम की सब से अहम कोशिश इसी मार्फत की तहसील है और वह उन्हों ने दरयाफ्त किया है कि हर इंसान में इस की इस्तिदाद मौजूद है।

फ़वाइद बीअत

बीअत के फ़वाइद आप ने पढ़े कि इस के ज़रिया इसलाह व इरशाद का किस क़द्र जबरदस्त काम हो सकता है। शर्त यह है कि उन्ही मक़ासिद के तहत हो जिन ए लिए वह मशरू हुई। बीअत करने वाले और बीअत लेने वाले दोनों ही में हसन नियत व इख़लास शर्त है और मक़सद सिर्फ़ इसलाह व इरशाद हो। इस से सिर्फ़ अवाम ही की इसलाह वाबस्ता नहीं, बल्कि ख़वास के लिए भी बे हद ज़रूरी है। तामीर ज़ाहिर का भी बड़ा काम हो सकता है और तामीर बातिन तो इस के बग़ैर निहायत मुश्किल जैसा कि इमाम अहले सुन्नत क़ुद्दिस सिर्रहू के मुबारक कलाम से पढ़ा कि बग़ैर शैख़ ईसाल के फ़लाह ज़ाहिर व फ़लाह बातिन नामुमकिन। इसी बीअत पर तमाम तजल्लियात व अनिवार का इन्हिसार है। इसी लिए सैर व सुलूक के जुमला मुक़ामात का हुसूल व अबस्ता और क़ुर्ब वारफान की दौलत भी इसी से मरबूत। ख़याल रहे कि उन के फ़वाइद के अलावा जो बीअत व इरादत से मुताल्लिक़ हैं वह फायदे भी बहुत मुबारक हैं जो बीअत तबरक से हासिल होते हैं।

इमाम अहले सुन्नत अलैहि अलरहम व इलरिज़्वान बीअत तबरक के फ़वाइद बयान करते हुए फ़रमाते हैं:

इक़साम बीअत: बीअत भी दो किस्म पर है;बीअत बरकत, बीअत इरादत।

(1)बीअत बरकत: यानी सिर्फ़ तबरक के लिए दाखिल सिलसिला हो जाना। आज कल आम बीअतें यही हैं वह भी नेक नीयतों की वर्ना बहुतों की बीअत अग़राज़ फ़ासदा के लिए

होती हैवो खारिज अज़ बहस हैं। इस बीअत के लिए शैख़ इत्तिसाल कि शराइत अर्बा का जामा हो, बस है, बेकार यह भी नहीं, मुफीद और बहुत मुफीद और दुनिया व आख़िरत में कार आमद है। महबूबान ख़ुदा के गुलामों के दफ्तर में नाम लिखा जाना, उन से सिलसिला मुत्तसिल हो जानाही फ़ी नफिसा सआदत अव्वल, उन ख़ास ख़ास गुलामों सालिकां (1) से इस अम्र में मुशाबहत और रसूल अल्ला ﷺ फ़रमाते हैं: मन तश्बा बकौम फहू मुंहम (जो जिस कौम से मुशाबहत पैदा करे वह उन्ही में से है) सानिय्न उन गुलामों के साथ एक सिल्क में मुंसलिक होना। सालसन महबूबान ख़ुदा आया रहमत हैं, वह अपना नाम लेने वाले को अपना कर लेते हैं और इस पर नज़र रहमत रखते हैं।बीअत इरादत: कि अपने इरादा व इख्तियार से यकसर बाहर हो कर अपने आप को शैख़, मुर्शद, बादी बरहक़, वासल बहक के हाथ में बिलकुल सुपुर्द कर दे, उसे मुतल्लिक़न अपना हाकिम व मालिक व मुतसिर्रिफ़ जाने, इस के चलाने पर राह सुलूक चले, कोई क़दम बे इस की मर्जी के न रखे, इस के लिए इस के लदनी अहकाम या अपनी ज़ात में ख़ुद इस के कुछ काम अगर इस के नज़दीक सही न मालूम हूँ उन्हें अफ़आल ख़िज़रअलैहि अस्सलाम समझे, अपनी अक्ल का कसूर जाने, इस की बात पर दिल में भी एतराज न लाये, अपनी हर मुश्किल इस हर पेश करे। ग़रज इस के हाथ में मुर्दा बदस्त ज़िंदा हो कररहे। यही बीअत सालकेन है और मकसूद मशाइख़ मुर्शिदीन है यानी अल्लाह इज़ विजल तक पहुँचाती है। यही हुज़ूर अक़्दस ﷺ ने सहाबा कराम से ली है जैसे सय्यदना इबादा इब्न सामतरज़ि अल्लाह अन्हु फ़रमाते हैं: हम रसूल अल्ला ﷺ से से इस पर बीअत की कि हर आसानी व दुश्वार, हर खुशी व नागवारी में हुक्म सुनें गे और इताअत करें गयावर साहिब हुक्म के किसी हुक्म में चवन व चुरा नहीं करें गे।’’शैख़ हादी का हुक्म रसूल अल्ला ﷺ का हुक्म है और रसूल ﷺ का हुक्म अल्लाह का हुक्म और अल्लाह के हुक्म में मजाल दम ज़दन नहीं। मज़ेद तफ़सील के लिए मुलाहिजा हो फतावा अफ्रीका।

बहुजत अलासरार शरीफ़ में है: हुज़ूर पवनोर सय्यदना ग़ौस आज़मरज़ि अल्लाह अन्हु से अर्ज़ की गई: अगर कोई शख्स हुज़ूर का नाम लेवा हो और इस ने न हुज़ूर के दस्त मुबारक पर बीअत की हो न हुज़ूर का ख़िरक़ा पहना हो, किया वह हुज़ूर के मुरीदों में शुमार होगा? फ़रमाया: जो अपने आप को मेरी तरफ़ मंसूब करे और अपना नाम मेरे दफ्तर में शामिल करे अल्लाह उसे कबूल फरमाएगा और अगर वह किसी नापसंदीदा राह पर हो तो उसे तौबा की तौफ़ीक़ देगा, वह मेरे मुरीदों के ज़ुमरे में है और बेशक अल्लाह ने मुझ से वादा फ़रमाया है कि मेरे मुरीदों और हम मज़हबों और मेरे हर चाहने वालों को जन्नत में दाखिल फरमाएगा।’’

मालूम हो कि इस तरह की बुजुर्गों से खुश ख़बरियां तक़रीबन हर सिलसिले में मौजूद हैं और हर एक में कोई न कोई वली या बुजुर्ग को इस तरह की बशारत दी गई। हज़रत मुजद्दिद अल्फ़ सानी क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं कि अल्लाह तआला ने मुझे इलहाम फ़रमाया कि में ने तुम्हें बख्शा और उन लोगों को बख्शा जो बुला वास्ता या बालवासता तुम्हें वसीला बनाएं यानी तुम्हारे सिलसिले में दाखिल हूँ। इसी तरह सिलसिला आलीया चिश्तिया में भी मुतअद्दिद बुजुर्गों को इस तरह की बशारत दी गई। यह बड़ी मुबारक चीज़ है और बड़ी उम्मीदें गुनाह गारों के लिए वाबस्ता हैं और रहमत आलिम ﷺ की रहमतों का सदक़ा है।

यह उन बुजुर्गों के साथ निस्बत जोड़ने का फ़ैज़ान है वर्ना रिवायतों से साबित है कि अल्लाह तआला के महबूबों से मुहब्बत करने वाले, उन की ख़िदमत करने वाले, मुसाफ़ा करने वाले, बल्कि उन की ज़ियारत करने वाले भी ना मालूम किस क़द्र बख़्शे जाएँ गे।