अध्याय 19 में से 54पृष्ठ 232–245
उयूब पहचानने के तरीके
उयूब की मार्फत के चार तरीके हैं: (1)ऐसा मुर्शद हो जो नफ़्स के उयूब को देख सकता हो और पोशीदा आफ़ात को मालूम कर सकता हो तो मुरीद को चाहिए कि ऐसे मुर्शद की हिदायत के मुताबिक मुजाहिदा करे क्यों कि मुर्शद
के साथ मुरीद की और उस्ताज़ के साथ शागिर्द की यही हालत होती है और उस्ताज़ा वर मुर्शद उसे इस के ज़ाती उयूब की पहचान कराते हैं और इस के इलाज का तरीका भी बताते हैं, लेकिन इस जमाने में यह सूरत नादिर उलवजूद है।’’
आप देख रहे हैं हज़रत इमाम क़ुद्दिस सिर्रहू अपने जमाने के हालात के ऐतबार से फ़रमा रहे हैं कि यह सूरत नादिर उलवजूद है, आप का ज़माना आज से तक़रीबन आठ सौ साल क़ब्ल का ज़माना है। जब इस वक़्त का यह हाल था तो आज के इस दौर इन्पतात के बारे में किया कहा जाए। हक़ीक़त यह है कि आज उलमा व मशाइख़ अगर अपनी जिम्मा दारियों का एहसास कर लें और तरबीयत व इरशाद के उसूल व ज़वाबत से बाकायदा आगाही हासिल करकेतरबियत का काम करें तो भी इसलाह व इरशाद का बहुत बड़ा काम हो सकता है। आज भी मुशाहिदा है कि जो लोग होश मंदी के साथ यह काम लग्न के साथ कर रहे हैं इस के नताइज सब के सामने हैं। ख़ास कर उलमा चाहें तो मदारिस के ज़रिया और मशाइख़ बीअत के ज़रिया बहुत बड़ा काम अंजाम दे सकते हैं।
(2)कोई सच्चा दोस्त तलाश करे जो साहिब बसीरत और दीन दार हो उसे अपने नफ़्स का निगरां बनाए ताकि वह इस के अहवाल व अफ़आल को देखता रहे तो जो कुछ इस के अख़लाक़ व अफ़आल से नापसंद करे नीज़ ज़ाहिरी व बातिनी ऐब देखे उसे इस से आगाह करे। दाना लोग और अकाबिर अइम्मा दीन इसी तरह किया करते थे। फिर हज़रत इमाम क़ुद्दिस सिर्रहू इस सिलसिले में हज़रत उम्र फ़ारूक़रज़ि अल्लाह अन्हु की रोष ज़िक्र करके फ़रमाते हैं। जब इस क़द्र बुलंद मर्तबा शख्सियत और अज़ीम मन्सब पर फ़ाइज़ होने के बावजूद आप अपने नफ़्स को इस क़द्र तोहमत लगाते थे तो जिस शख्स की अक्ल ज़्यादा और मन्सब बुलंद हो वह ख़ुद पसंदी कम करेगा और अपने आप पर तोहमत ज़्यादा बांधेगा, लेकिन यह सूरत भी नापैद हो गई क्यों कि बहुत कम दोस्त ऐसे हैं जो मदाहंत छोड़ दें और ऐब बताएं या हसद को नहीं छोड़ते और ज़रूरी बात से ज़्यादा नहीं बताते।
दोस्तों में हसद करने वाले या ग़रज मंद लोग होते हैं, वह इस बात को भी ऐब जानते हैं जो ऐब नहीं या ख़ा मोशी इख्तियार करते हैं और यों तुम्हें अपने ऐबों का पता नहीं चलता ; इसी लिए हज़रत दाऊद ताईरहमत अल्लाह अलैहि ने लोगों से अलाहिदगी इख्तियार कर ली, उन से पूछा गया कि आप लोगों के साथ मिल जल कर क्यों नहीं रहते? तो उन्हों ने फ़रमाया: में ऐसे लोगों को किया करूँ जो मुझ से मेरे ऐब छिपाते हैं।’’ दीन दार लोगों की ख्वाहिश होती थी कि दूसरे लोगों के बताने से वह अपने ऐबों पर मतला हूँ, लेकिन अब ऐसा ज़माना आज्ञा है कि हम इस शख्स को नापसंद करते हैं जो हमारी खैर ख़्वाही करते हुए हमें हमारे ऐबों पर मतला करे और यह ईमान की कमज़ोरी की अलामत है।
(3)अपने दुश्मनों की ज़बान से अपने ऐबों की पहचान हासिल करे क्यों कि वह तो ऐबों की तलाश में ही रहते हैं और आम तौर पर इंसान इस दुश्मन से ज़्यादा फायदा उठाता है जो इस के ऐब तलाश करता है जब कि दोस्त खुशामद का रास्ता अपनाता है और इस की तारीफ़ व तौसीफ़ में रहता है। लिहाज़ा इस पर ऐब मख़फ़ी रहते हैं, लेकिन इंसान फ़ित्रतन दुश्मन को झोटा करार देता है और इस की बात को हसद पर महमूल करता है जब कि साहिब बसीरत शख्स दुश्मनों की बात सेज़रूरी फायदा उठाता है क्यों कि बुराइयां लाज़िमन इस की ज़बान पर आती हैं।
(4)लोगों में मिल जल कर रहे और दूसरों में जो नापसंदीदा बात देखे अपने नफ़्स में भी उसे ख़याल करे और इस की तरफ़ उसे मंसूब करे क्यों कि एक मोमिन दूसरे मोमिन के लिए आईना है। लिहाज़ा उन के ऐबों को अपने ऐब समझे और यह बात जान ले कि तबीअतें ख्वाहिश की इत्तिबा में एक दूसरे के क़रीब हैं तो जो बात एक में दूसरे से जुदा नहीं हो सकती या तो इस से ज़्यादा होगी या कुछ न कुछ होगी। मज़ेद तफ़सील के लिए देखिए अहया उलउलूम शरीफ़ जिल्द सोम।
रूहानियत व तसव्वुफ़ के मुख़तलिफ़ उद्वार
रूहानियत व तसव्वुफ़ के मुख़तलिफ़ उद्वार का इजमाली बयान: हज़रत शाह मुहम्मद मज़हर मुजद्दिदी मुहाजिर मदनी क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं: ‘‘जान लो इंसान की पैदाइश का मक़सद ख़ालिक़ जल जलाला व अम निवाला की मार्फत , क़ुर्ब व इख़लास के आला मुरातिब तक पहुँचना और शहूद व एहसान के के आखिरी मुरातिब से फ़ाइज़ होना है। हज़रात अंबिया अला नबीना व अलैहिम अस्सलवात व इलतसलीमात की बिअसत इसी के वास्ते हुई है। पस सहाबा कबार व अहले बीत इतहार रसूल ख़ुदा ﷺ के शरफ़ सोहबत पाने की वजह से मुक़ामात इरफान तक पहुँचे और असमा व सिफ़ात की तजल्लियात से गुज़र कर तजल्लियात ज़ातीय से कामयाब और फ़ाइज़ हुए और सरकार ﷺ की सोहबत मुक़द्दसा की बरकत से तसफ़ीया क़ल्ब व तज़किया नफ़्स और तहजीब अख़लाक़ उन के नकद हाल था और आमाल व अहवाल में हुज़ूर सय्यद एल्मरसिलीन ﷺ की कमाल इत्तिबा रखते थे, लेकिन नफ़ली इबादात की कसरत और मालवफात (लजीज माकूलात व मशरूबात व मलबूसात) का तर्क और रियाज़त शदीदा व आमाल शाक़ा को इख्तियार करना उन अकाबिर से मर्वी नहीं है, मगर बितरीक़ नादिर और दर्जात क़ुर्ब ख़ुदा की इस बुलंदी के बावजूद ख़वारिक़ आदात के कुछ भी महल सदूर न बने क्यों कि ख़वारिक़ आदात की कसरत बुलंदी दर्जात का तक़ाज़ा नहीं, दीगर वजूह से ज़ुहूर में आते हैं, उन के हालात व मुक़ामात की ताबीर सिर्फ़ सकीना व तमानीयत व मुबरद यकीन के सिवा से नहीं की जासकती है कि कमालात के लताइफ़ व बुलंदी से दस्त इदराक कोताह है। इस्तिग़राक़ व बेखुदी और फना व बका व दीगर मुक़ामात जो कि सूफ़िया की किताबों में मज़कूर हैं उन पेशवाओं सेमशहूर नहीं हैं और ताबईन ने दर्जात आलीया को उन्हें सहाबा कबार के फ़ैज़ सोहबत से पाया और तबा ताबईन ने इस बुलंद मर्तबा को ताबईन की बरकत सोहबत से ढूँढा।
यहाँ तक कि ज़माना नुबुव्वत बईद हो गया और लोग मुख़तलिफ़ हो गए। बिद्दत ज़ाहिर हुई तो लोगों में अहले सुन्नत व जमात इत्तिबा सुन्नत और इजतिनाब अज़ बिद्दत में मुनफ़रद हुए, लेकिन जो उन में अकाबिर सूफ़िया थे उन्हों ने मुक़ामात आलीया तौबा व अनाबत,ज़हद ,
क़नाअत, तोकल, वगैरह की तहसील के लिए मुजाहिदात शाक़ा किए और हर मक़ाम में कमाल तमकीन और इंतिहाई रसूख हासिल किया और तरीका की बुनियाद कम खाने कम सोने कम बोलने और मख़लूक़ से कम मिलने जलने , नफ़्स कशी दर दवाम इबादत व दवाम ज़िक्र पर रखी, रियाज़ात कसीरा इख्तियार किए। बाज़ का हजार रकात नमाज़ और बाज़ पांच सौ रकात वज़ीफ़ा थी, कोई रोजाना दो कलाम अल्लाह ख़त्म करता, कोई एक ख़त्म करता तो कोई चालीस साल नहीं सोया, किसी ने सत्र साल तक जमीन पर पुश्त नहीं रखी, किसी ने दौर दराज़ से एहराम बांध कर सत्र हज और किसी ने पचास हज नंगे सर व नंगे पीर बे तोशा और बग़ैर सवारी के किए और किसी ने सौम विसाल दस दिन के, तो किसी ने चालीस दिन के इख्तियार किए और वतन छोड़े, जंगल और पहाड़ में दरख्तों के पते और घासों की जड़ें और पड़े पुराने कपड़े पैवंद लगाकर बनाए, एक ही टोपी पचास साल तक सर पर और तीस साल तक एक ही गुदड़ी बगल में रखी।
ग़लबा हालात और इस कमाल की चाहत की वजह से जो उन को अता हुआ था कठिन मुजाहिदात उन पर आसान हो गए थे। पस हक़ तआला ने उन सब मुजाहिदात की बरकत से उन अकाबिर को अपने क़ुर्ब से मुमताज़ फ़रमा कर जहां का पेशवा बना दिया और मार्फत व तौहीद के इसरार से इमतियाज़ बख्शा और आलम का मुक़तदा बना दिया। कसरत में वहदत और रफा असनैनीत (दोई का उठ जाना) इस का वस्फ़ हाल हुआ। जज़्बात मुहब्बत की वजह से शौक की चीख और नारे ज़ौक़ होश अफ़्ज़ा उन सरमस्तान बादा तौहीद को हुआ और ग़ैबी उमूर का इन्किशाफ़ और इक्वान (मख़लूकात) में तसर्फ़ और ख़र्क़ आदात मसलन आसमान पर उड़ना और तै अर्ज (थोड़े वक़्त में दौर दराज़ इलाक़े में पहुँच जाना) और पानी पर चलना और इंकलाब हक़ायक़ (मसलन मिट्टी को सोना बना देना) और दौर व नज़दीक की ख़लाइक़ की फरियाद रसी वगैरह उन कुदरत इलाही के मुज़ाहिर का शहरा फ़रमा हुआ’’
जब भी दुनिया नुबुव्वत के अहद मुबारक से जिस क़द्र दौर होती चली गई, हक़्क़ानियत
रुपोश हुई और हिम्मतें पस्त हुईं तो अल्लाह तआला ने उम्मत पर फजल व कर्म फ़रमाया और उन की तरक्की के असबाब मुहैया फ़रमाए और अपने फ़ैज़ को आसान से आसान तर कर दिया और अपने ख़ास बंदों पर जदीद तरीके अल्का व इलहाम किए मसलन हज़रत ख़्वाजा सय्यद मुहम्मद बहा उद्दीन नक़्श बंद बुखारी क़ुद्दिस सिर्रहू।
मशाइख़ के दो तरीके
शैख़ या पीर कई किस्म के होते हैं: (1)सालिक महज़ (2)मजज़ूब महज़ (3)मजज़ूब सालिक (4)सालिक मजज़ूब। पहली दो किस्म के इंसान पेरी के लायक नहीं इस लिए कि अव्वल अभी राह में है, मंज़िल तक नहीं पहुँचा है और दोम तरीक़ तरबीयत से नावाकिफ़, बल्कि ज़रूरी है कि मजज़ूब सालिक हो या सालिक मजज़ूब अव्वल औला है।
मालूम रहे कि मनाज़िल तै कराने में मुतक़द्दिमीन मशाइख़ का अमल अक्सर यह रहा कि वह सुलूक को जज़्ब पर मुक़द्दम करते थे और हज़रत ख़्वाजा नक़्श बंद क़ुद्दिस सिर्रहू के उलहाह व ज़ारी पर अल्लाह तआला ने उन्हें जो तरीका इलहाम फ़रमाया इस में सुलूक पर जज़्ब का तक़दम है। हज़रत अल्लामा तोकलीरहमत अल्लाह अलैहि फ़रमाते हैं: दूसरे तरीकों में सुलूक को जज़्ब पर मुक़द्दम करते हैं यानी पीर कामिल अपने मुरीद को पहले रियाज़ात (अर्बईन व ग्रसंगी वगैरह) का हुक्म देता है और उन रियाज़तों से मुरीद के अनासिर व नफ़्स को मुसफ़ई करता है, जब मुरीद अपने नफ़्स व अनासिर की तहारत अपने से बाहर आलम मिसाल में देखता है मसलन सितारा या हलाल या माह नाक़िस या बदर कामिल या आफताब तो इस वक़्त शैख़ इस मुरीद को फना व तसफ़ीया नफ़्स व अनासिर की बशारत देता है उसे सुलूक कहते हैं और इस सैर को सैर आफ़ाक़ी कहते हैं क्यों कि तालिब अपने से खारिज आलम मिसाल में जो मिनजुमला आफ़ाक़ है अपने अहवाल व अनिवार देखता है इस के बाद शैख़ महज़ अपनी तवज्जो से मुरीद के लताइफ़ आलम अम्र के तज़किया में मशगूल होता है यहाँ तक कि वह फना व बका हासिल करते हैं उसे जज़्ब कहते हैं और इस सैर को सैर इंफ्सी कहते हैं क्यों कि इस सैर में तालिब जो कुछ
(इस्तिनारत व तरक्की व वसूल ब असल व फना) देखता है, अपने अंदर देखता है बनाबर तवज्जीया हज़रत मुजद्दिदरज़ि अल्लाह अन्हु इस सैर को सैर इंफ्सी इस वास्ते कहते हैं कि इनफ्स, असमा व सिफ़ात बारी तआला के ज़लाल व अकूस के आईने हो जाते हैं न यह कि सालिक की सैर नफ़्स में होती है। यहाँ हक़ीक़त में ज़लाल असमा की सैर है, इनफ्स के आईनों में तरीका नक़्श बंदेह में जज़्ब को सुलूक पर मुक़द्दम करते हैं और इबतिदा लताइफ़ आलम अम्र से करते हैं, सुलूक जज़्ब के ज़िमन में और सैर आफ़ाक़ी सैर इंफ्सी के ज़िमन में तै हो जाती है।
तख़लिया और तहलिया
तख़लिया के मानी लुग़त में खाली करना है और सूफ़िया के यहाँ सालिक का ख़ुद को अख़लाक़ रज़ीला से पाक करने और गैर अल्लाह से ताल्लुक मुनक़ते कर लेने का नाम तख़लिया है। तहलिया के मानी हैं आरास्ता करना और इस्तिलाह सूफ़िया में यह है कि सालिक अपने को अख़लाक़ हमीदा और ताल्लुक मा अल्लाह से आरास्ता करे जिस का तरीका यह है कि ताआत व इबादात और अज़कार व अशग़ाल में मशगूल हो। ख़याल रहे कि तख़लिया ही को तजलीय कहते हैं।
सूफ़िया के यहाँ तख़लिया व तजलीय दोनों ही ज़रूरी हैं, उन का तरीका व मतलब क़रीब क़रीब वही है जो अभी हम अल्लामा तोकली के हवाले से बयान कर चुके हैं। ख़याल रहे कि हज़रत ख़्वाजा नक़्श बंद क़ुद्दिस सिर्रहू का तरीका क़रीब तर और आसान तर है जैसा कि मुख़्तसर बयान से आप ने समझानक़श बंदी तफ़सीली सुलूक तै नहीं कराते हैं। सुलूक के मुक़ामात अशरा को तफ़सील के साथ तै कराने में बहुत वक़्त दरकार है नीज़ इस के लिए जिन मुजाहिदात व रियाज़ात की ज़रूरत है आज के दौर में आम तौर पर उन से हिम्मतें ही पस्त हैं और इस क़द्र इस्तिदादें भी नहीं। फिर ऐसा भी हो सकता है कि अस्नए सुलूक में मौत भी आजाए और वह क़ुर्ब से महरूम दुनिया से चला जाए इस लिए नक़्श बंदी बुजुर्ग सुलूक की तफ़सील में जाने के बजाए उसे
इजमाली तौर पर जज़्ब के ज़िमन में तै कर लेते हैं; इसी लिए हज़रत ख़्वाजा नक़्श बंद क़ुद्दिस सिर्रहू ने फ़रमाया कि हमारे तरीके में महरूमी नहीं। बाज़ लोगों ने समझ लिया कि नक़्श बंदियों के यहाँ तहलिया मुक़द्दम है और तहलिया के बाद तख़लिया कराते हैं जब कि ऐसा नहीं है, नक़्श बंदियों के यहाँ तहलिया व तख़लिया एक साथ होता है।
सुलूक और जज़्ब
हज़रत अल्लामा सय्यद अहमद मुजद्दिदीरहमत अल्लाह अलैहि फ़रमाते हैं: ‘‘सुलूक ‘बज़मतीन’ राह रफ़्तन, नेक रवी इख्तियार करदिन, यानी लुग़त में सुलूक रास्ता चलने और नेक रवी इख्तियार करने का नाम है। इस्तिदलाली तरीके के बजाए सैर कशफ़ी अयानी के तरीक़ पर ख़ुदा तक पहुँचना सुलूक कहलाता है। सूफ़िया की इस्तिलाह में सैर आशिक बजानिब माशूक़, इंतकाल हस्सी व माअनवी, जिहाद बालनफ़स और सैर अली अल्लाह भी सुलूक ही को कहते हैं।
1।यह वह इल्म है जिस का तालिब दिल है न कि ज़बान, यह वह रास्ता कि जिस पर दिल चलता है न कि पावं।
2।इसी इल्म के मुक़ामात का नाम शरीअत, तरीक़त, हक़ीक़त और मार्फत है।
3।यह इल्म नादिर उलवजूद है, इस के फ़ाज़िल को सालिक, सोफी, फ़क़ीर, आरिफ और इंसान कामिल कहते हैं।
4।इस इल्म से मकसूद तज़किया नफ़्स, मक्कारम अख़लाक़ और तकमील इख़लास है।
5।इमाम अलतरीका हज़रत ख़्वाजा नक़्श बंद बुखारी क़ुद्दिस सिर्रहू से पूछा गया कि सुलूक से किया मकसूद है? आप ने फ़रमाया: ताकि इजमाली मार्फत तफ़सीली औरइस्तिदलाली मार्फत कशफ़ी हो जाए।’’
एक दूसरे मक़ाम पर फ़रमाते हैं: सालिक वह है जो क़ुर्ब हक़ के रास्तों और तरीक़त की मंजिलों को मुजाहिदात व रियाज़ात और इत्तिबा सुन्नत व शरीअत के ज़रिया तै करके मकसूद तक पहुँचे। सालकेन को कभी वसूल अली अल्लाह पहले हासिल हो जाता है। फिर शौक इबादत और ज़ौक़ रियाज़त इस के बाद पैदा होता है, इस को तरीक़ जज़्ब
कहते हैं और कभी मुजाहिदा व रियाज़त का शौक पहले पैदा हो जाता है और वसूल अली अल्लाह बाद में मयस्सर होता है, इस को तरीक़ सुलूक कहते हैं। सूफ़िया के नज़दीक आयत क़ुरानीय :
اَللہُ یَجْتَبِیۡۤ اِلَیۡہِ مَنۡ یَّشَآءُ وَ یَہۡدِیۡۤ اِلَیۡہِ مَنۡ یُّنِیۡبُ (سورۃ الشوریٰ: ۴۲؍۱۳)
तर्जुमा: अल्लाह अपने क़रीब के लिए चुन लेता है जिसे चाहे और अपनी तरफ़ राह देता है उसे जो रुजू लाये।’’
में इजतिहाद से मुराद जज़्ब है और अहतदा से मुराद सुलूक हैनीज़ सुलूक पर जज़्ब की तक़दीम भी साबित हुई; इसी लिए मशाइख़ नक़्श बंदेह जज़्ब को सुलूक पर मुक़द्दम रखते हैं और मजज़ूब सालिक कहलाते हैं। इसी तरह आयत करीमा:
وَ اجْتَبَیۡنٰہُمْ وَ ہَدَیۡنٰہُمْ اِلٰی صِرَاطٍ مُّسْتَقِیۡمٍ (سورۃ الانعام: ۶؍۸۷)
तर्जुमा: और हम ने उन्हें चुन लिया और सीधी राह दिखाई।’’
में अव्वल का हासिल जज़्ब है और सानी का हासिल सुलूक है।
जज़ ब का मानी है कशिश यानी अल्लाह तआला का बंदे को अपनी तरफ़ खींच लेना। मजज़ूब वह है जिस पर अल्लाह की तरफ़ से ऐसा जज़्ब तारी हो जाए कि बुला कसब व मुजाहिदा महज़ अल्लाह के फजल से इस के बातिनी मुक़ामात तै हो जाएँ और वासल बिल्लाह हो जाए, लेकिन बका बाद उलफ़ना, सहव बाद अलमहव और जमा अलजमा के मर्तबे तक न पहुँच सके।
इक़साम जज़्ब
जज़्ब की दो किस्में हैं: (1)जज़्ब सूरी और (2)जज़्ब हक़ीक़ी। वह जज़्ब जो सैर फ़ी अल्लाह से क़ब्ल इबतिदाए सुलूक में तसफ़ीया लताइफ़ से पहले हासिल होता है और सिर्फ़ तस्हील मनाज़िल सुलूक के लिए अता किया जाता है इस को जज़्ब सूरी कहते हैं, इस को जज़्ब हिदायत या जज़्ब औला भी कहा जाता है। जज़्ब हक़ीक़ी वह जज़्ब जो सैर फ़ी अल्लाह के दौरान इंतिहाए सुलूक में हासिल होता है, इस को जज़्ब हक़ीक़ी
कहते हैं, इस को जज़्ब निहायत या जज़्ब सानिया भी कहा जाता है। जज़्ब हक़ीक़ी बुला इमतियाज़ तमाम सलासल तरीक़त में मौजूद है, लेकिन जज़्ब सूरी तरीका नक़्श बंदेह का खासा और यह नेमत हज़रत ख़्वाजा बुजुर्ग शाह नक़्श बंद बुखारीरहमत अल्लाह अलैहि ने अपने मुख़लिसीन को बतौर खैरात व सदक़ा जारीया अता फ़रमाई है। (अलबेनात, जिल्द अव्वल)
ख़याल रहे कि सिलसिला नक़्श बंदेह के अकाबिर ने हुसूल जज़्ब सूरी का एक मख़सूस तरीका वज़ा किया है। वह तकरार असम ज़ात व नफ़ी व इस्बात, हब्स दम और रियायत व कौफ़ अददी है जब कि दूसरे सलासल में इस जज़्ब इबतिदाई के हुसूल का कोई मुईन तरीका और मख़सूस ज़ाबता नहीं। अलबत्ता अगर अली सबील अलित्तिफ़ाक़ उन को यह जज़्ब हासिल हो जाए तो कोई अम्र माने भी नहीं।
तसव्वुफ़
और
इस के फ़वाइद
(दोम)
तालीफ़
बह्र उल-इरफ़ान हज़रत अल्लामा मुफ्ती आफ़ाक़ अहमद मुजद्दिदी नक़्श बंदी दाम ज़ला
नाशिर
फ़रोग़ तसव्वुफ़ फ़ाउंडेशन, अल-जामिआ अल-अहमदिया, क़न्नौज
सुलूक के मुक़ामात अशरा
तौबा, ख़ौफ़, ज़हद, क़नाअत, वरा, सब्र, शकर, तोकल, तसलीम, रज़ा।
तौबा (पहला मक़ाम)
उन मुक़ामात के हुसूल के बग़ैर मक़ाम विलायत तक पहुँचना मुतस्व्वर नहीं, यह मुक़ामात तै होना चाहियेख़ाह बितरीक़ इजमाल चनां चह सिलसिला नक़्श बंदेह मुजद्दिदय क़ुद्दिस अल्लाह इसरारहा में निस्बत इजमाली विजहबी है या तफ़सील के साथ तै हूँ जैसा कि दीगर सलासल में कि उन में सैर तफ़सीली व सलूकी है। तौबा के ताल्लुक से अगर क़ुरआनी आयात जमा की जाएँ तो सैंकड़ों तक पहुँच जाएँ गी। इसी तरह तौबा की अहमियत और इस के वजूब व फ़ज़ीलत पर अहादीस करीमा जमा की जाएँ तो मज़मून बहुत तवील हो जाएगा। अइम्मा दीन जैसे इमाम शैख़ अबू तालिब मक्की ने कुव्वत उलक़ुलूब और हज उलइस्लाम इमाम मुहम्मद ग़ज़ाली ने अहया उलउलूम और इमाम अबू अलक़ासम कशीरी व गैरहम क़ुद्दिस अल्लाह तआला इसरारहम अलालिया ने बड़ी तफ़सील सेतौबा और इस के मुताल्लिक़ात पर बहस की है। अहयाआलउलूम में तोउस दर्जा बयान है कि शायद इस से ज़ाइद का तसोर नहीं किया जा सकता है। हम चंद आयात व कुछ अहादीस और बाज़ बुजुर्गों के अक़्वाल नकल करते हैं। इसी तरह हम सारे ही मुक़ामात को इख़तिसार के साथ बयान करें गे इस लिए कि अब आम तौर पर उन बुजुर्गों की कुतुब के तराजुम भी उर्दू वगैरह ज़बान में पाए जाते हैं, मगर फिर उन से इस्तिफ़ादा कमा हुक्का हर ख़ास व आम की बात नहीं। यह मुख़्तसर तहरीर उम्मीद है कि कसरत से लोगों तक ख़ास कर मुताल्लिक़ीन व मुंतस्बीन और मोतक़िदीन तक पहुँच सकती है और उन में जो अहले इल्म हैं वह इस का दूसरों को दर्स दे सकते हैं।
आयात क़ुरानीय:
۱۔ وَ تُوۡبُوۡۤا اِلَی اللہِ جَمِیۡعًا اَیُّہَ الْمُؤْمِنُوۡنَ لَعَلَّکُمْ تُفْلِحُوۡنَ (سورۃ النور:
तर्जुमा: और अल्लाह की तरफ़ तौबा करू ए मुसलमानो सब के सब इस उम्मीद पर कि तुम फ़लाह पाओ।
۲۔ اِنَّ اللہَ یُحِبُّ التَّوَّابِیۡنَ وَیُحِبُّ الْمُتَطَہِّرِیۡنَ (سورۃ البقرۃ: ۲؍۲۲۲)
तर्जुमा: बेशक अल्लाह पसंद करता है बहुत तौबा करने वालों को और पसंद रखता है सुथरों को।
۳۔ وَلَیۡسَتِ التَّوْبَۃُ لِلَّذِیۡنَ یَعْمَلُوۡنَ السَّیِّاٰتِ حَتّٰۤی اِذَا حَضَرَ اَحَدَہُمُ الْمَوْتُ قَالَ اِنِّی تُبْتُ الۡئٰنَ (سورۃ النساء: ۴؍۱۸)
तर्जुमा: और वह तौबा उन की नहीं जो गुनाहों में लगे रहते हैं यहाँ तक कि जब उन में किसी को मौत आये तो कहे अब में ने तौबा की।
۴۔ اِنَّمَا التَّوْبَۃُ عَلَی اللہِ لِلَّذِیۡنَ یَعْمَلُوۡنَ السُّوۡٓءَ بِجَہَالَۃٍ ثُمَّ یَتُوۡبُوۡنَ مِنۡ قَرِیۡبٍ (سورۃ النساء: ۴؍۱۷)
तर्जुमा: वह तौबा जिस का कबूल करना अल्लाह ने अपने फजल से लाज़िम करलिया है वह उन्हें की है जो नादानी से बुराई कर बैठें फिर थोडी ही देर में तौबा करलें।
۵۔ یٰۤاَیُّہَا الَّذِیۡنَ اٰمَنُوۡا تُوۡبُوۡۤا اِلَی اللہِ تَوْبَۃً نَّصُوۡحًا عَسٰی رَبُّکُمْ اَنۡ یُّکَفِّرَ عَنۡکُمْ سَیِّاٰتِکُمْ وَ یُدْخِلَکُمْ جَنّٰتٍ تَجْرِیۡ مِنۡ تَحْتِہَا الْاَنْہٰرُ (سورۃ التحریم: ۶۶؍۸)
तर्जुमा: ए ईमान वालो अल्लाह की तरफ़ ऐसी तौबा करू जो आ गे को नसीहत होजाए क़रीब है कि तुम्हारा रब तुम्हारी बुराइयां तुम से उतार दे और तुम्हें बागों में ले जाए जिन के नीचे नहरें बहें।’’
हज़रत इमाम अबू तालिब मक्की क़ुद्दिस सिर्रहू पाँचवीं आयत के जेल में फ़रमाते हैं: ‘‘लफ़्ज़ नसूह फाइल के वजन पर मुबालग़ा के लिए है और उसे नून के ज़िमा के साथ नसूह भी पढ़ा गया है। इस वक़्त यह मक़सद होगा कि तौबा खालिस अल्लाह के लिए हो।
यह भी कहा गया है यह लफ़्ज़ नसाह से मुश्तक़ है जिस के मानी धागे के हैं यानी यह तौबा बिलकुल खाली हो न इस का किसी चीज़ से ताल्लुक हो और न कोई दूसरी चीज़ इस से मुताल्लिक़ हो और वह इस तरह कि नेकी पर इस्तिक़ामत हो और गुनाह और नाफ़रमानी के लिए तौबा के ज़रिया हीले बहाने न करे और न यह सोचे कि कुदरत होने पर दुबारा गुनाह कर लूँ गा ,बल्कि गुनाह को खालिस अल्लाह तआला के लिए छोड़ दो जिस तरह कि इस ने गुनाह का इर्तिकाब खालिस अपने नफ़्स की पैरवी में किया जो इस के दिल व दिमाग पर ग़ालिब आज्ञा था।
6। वज़रोۡअ जाहिर उलۡअसम वबातिना (सूरत अलानाम: 6/120)
तर्जुमा: और छोड़ दो खुला और छिपा गुनाह।