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अध्याय 33 में से 54पृष्ठ 390–403

जमा माल के दर्जात

माल जमा करने में तीन दर्जात हैं। एक यह कि सिर्फ़ एक दिन रात के लिए जमा करे, यह सिद्दीक़ीन का दर्जा है। दोम यह कि चालीस दिन के लिए जमा करे क्यों कि जो इस से ज़ाइद है वह तवील उम्मीद में दाखिल है, यह मुत्तक़ी लोगों का दर्जा है। सोम यह कि एक साल के लिए जमा करे, यह सब से आखिरी दर्जा है और यह सालहीन का मक़ाम है। और जो शख्स इस से ज़ाइद जमा करे वह

अवाम एलिनास में दाखिल है और ख़ुसूसी मक़ाम से मुकम्मल तौर पर खारिज है। पस नेक कमजोर शख्स का एक साल के लिए रोज़ी में इतमीनान क़ल्ब इस का गुना और ख़ास लोगों का चालीस दिन में गुना से जब कि ख़ास अलख़ास का गुना एक दिन रात रिज़्क़ जमा करने में है। नबी क्रीम ﷺ ने अपनी अज़्वाज मुतहरात को इसी किस्म की इक़साम पर तकसीम किया। बाज़ को आप एक साल का ख़र्चा इनायत फ़रमाते, बाज़ को चालीस दिन का, और कुछ एक दिन रात का और यह आखिरी तकसीम हज़रत आयशा व हफ़सारज़ि अल्लाह अन्हुमा के लिए थी।’’

मालूम हो कि हज़रत इमाम क़ुद्दिस सिर्रहू ने बड़ी नफीस बहसें ज़िक्र की हैं मसलन बग़ैर सवाल के कोई अतीया मिले तो इस के आदाब, ज़रूरत के बग़ैर सवाल हराम है, मजबूर फ़क़ीर के आदाब, किस क़द्र मालदारी से सवाल हराम होता है और मांगने के हालात आप मज़ेद मालूमात के लिए और मज़कूरा उमूर की तफ़सील के लिए देखें अहया उलउलूम शरीफ़।

ज़हद (सातवां मक़ाम)

ज़हद और इस की फ़ज़ीलत: इरशाद ख़ुदावंदी है:

۱۔ فَخَرَجَ عَلٰی قَوْمِہٖ فِیۡ زِیۡنَتِہٖ ؕ قَالَ الَّذِیۡنَ یُرِیۡدُوۡنَ الْحَیٰوۃَ الدُّنیَا یٰلَیۡتَ لَنَا مِثْلَ مَاۤ اُوۡتِیَ قَارُوۡنُ ۙ اِنَّہٗ لَذُوۡحَظٍّ عَظِیۡمٍ وَ قَالَ الَّذِیۡنَ اُوۡتُوا الْعِلْمَ وَیۡلَکُمْ ثَوَابُ اللہِ خَیۡرٌ لِّمَنْ اٰمَنَ وَعَمِلَ صَالِحًا ۚ وَلَا یُلَقّٰہَاۤ اِلَّا الصّٰبِرُوۡنَ (سورۃ القصص: ۲۸؍۷۹،۸۰)

तर्जुमा: तो (एक दिन क़ारून) अपनी कौम पर निकला अपनी आराइश में बोले वह जो दुनिया की ज़िन्दगी चाहते हैं किसी तरह हम को भी ऐसा मिलता जैसा क़ारून को मिला बेशक इस का बड़ा नसीब है। और बोले वह जिन्हें इल्म दिया गया खराबी हो तुम्हारी अल्लाह का सवाब बेहतर है इस के लिए जो ईमान लाये और अच्छे काम करे और यह उन्हें को मिलता है जो सब्र वाले हैं।’’

इस में ज़हद को उलमा की तरफ़ मंसूब किया और ज़ाहिदीन को इल्म से मौसूफ़ करार दिया, यह इंतिहाई दर्जा की तारीफ़ है।

۲۔ مَنۡ کَانَ یُرِیۡدُ حَرْثَ الْاٰخِرَۃِ نَزِدْ لَہٗ فِیۡ حَرْثِہٖ ۚ وَ مَنۡ کَانَ یُرِیۡدُ حَرْثَ الدُّنْیَا نُؤتِہٖ مِنْہَا ۙوَمَا لَہٗ فِی الْاٰخِرَۃِ مِنۡ نَّصِیۡبٍ (سورۃ الشوریٰ: ۴۲؍۲۰)

तर्जुमा: जो आख़िरत की खेती चाहे हम इस के लिए इस की खेती बढ़ाएं और जो दुनिया की खेती चाहे हम उसे इस में से कुछ दें गे और आख़िरत में इस का कुछ हिस्सा नहीं।’’

3। काफ़िरों का वस्फ़ बयान करते हुए फरमाता है: अलज़ीۡन यस्तहबूۡन उलहयात अलदनिया अली उलۡअआख़िरत (सूरत इब्राहिम: 14/3)

तर्जुमा: जिन्हें आख़िरत से दुनिया की ज़िन्दगी प्यारी है।’’

अहादीस करीमा:

1। हुज़ूर रिसालत मआब ﷺ फ़रमाते हैं: जिस ने सुबह की और इस की फ़िक्र दुनिया है तो अल्लाह तआला इस के मामले को बिखेर देता है और इस के सामान को इस पर मुतफ़र्रिक़ कर देता है और इस का फक्र व मुहताजी इस की निगाहों के सामने कर देता है और इस के पास दुनिया नहीं आयेगी, मगर इसी क़द्र जो इस के लिए लिख दी गई है। और जिस ने सुबह की और इस की फ़िक्र आख़िरत हो तो अल्लाह तआला इस की फ़िक्र व हिम्मत जमा कर देता है और इस के सामान की हिफाज़त करता है और इस के दिल में गुना पैदा कर देता है और इस के पास दुनिया ज़लील हो कर आती है। (इब्न माजा)

2। इब्न माजा ही की रिवायत है: अज़ा रायतम अलाबद व कद आती समतन व ज़हदन फ़ी अलदन्या फ़ाक़तरबुआ मुँह फ़िग़ुना यलक़ी अलहकमत (जब तुम किसी बंदे को देखो कि उसे खामोशी और दुनिया में ज़हद दिया गया तो इस के क़रीब हो कि उसे हिक्मत दी जाती है। और हिक्मत की तारीफ़ में कुरआन फरमाताहै कि जिसे हिक्मत दी गई उसे खैर कसीर यानी

बहुत भलाई दी गई।

3। प्यारे आका ﷺ इरशाद फ़रमाते हैं: उन्न अरुदत्त उन्न यहबुक अल्लाह फ़ाज़ाद फ़ी अलदन्या (अगर तुम चाहते हो कि अल्लाह तआला तुम से मुहब्बत करे तो दुनिया में ज़ाहिद यानी बे रगबत हो जाओ। (इब्न माजा)

4। हुज़ूर ﷺ से अल्लाह तआला के कौल:

فَمَنَ یُّرِدِ اللہُ اَنۡ یَّہۡدِیَہٗ یَشْرَحْ صَدْرَہٗ لِلۡاِسْلَامِ (سورۃ الانعام: ۶؍۱۲۵)

तर्जुमा: और जिसे अल्लाह राह दिखाना चाहे इस का सीना इस्लाम के लिए खोल देता है।’’

की तफसीर पूछी गई तो आप ने फ़रमाया कि नूर जब दिल में दाखिल होता है तो इस का सीना इस के लिए खिल जाता है और कुशादा हो जाता है, अर्ज़ किया गया: इस की अलामत किया है? तो फ़रमाया: इल्तजाफ़ी अन दार उलग़रूर व अलानाब अली दार उलख़लूद व उल्लास्तिदाद ललमौत क़ब्ल नुज़ूला (यानी इस की अलामत धोके वाले घर (दुनिया) से दौर रहना और हमेशज्ञ के घर (आख़िरत) की तरफ़ रुजू करना और मौत के आने से पहले इस के लिए तैयार रहना। (अलमुस्तदरक)

5। हज़रत सहल इब्न सादरज़ि अल्लाह अन्हु से रिवायत है कि एक शख्स आये और अर्ज़ किया: या रसूल अल्ला ﷺ मुझे ऐसा अमल बता दें कि जब में करूँ तो अल्लाह तआला भी मुझ से मुहब्बत करे और लोग भी मुझ से मुहब्बत करें तो आप ने फ़रमाया:अज़हद फ़ी अलदन्या यहबुक अल्लाह व अज़हद फेमा इंद एलिनास यहबुक एलिनास (यानी दुनिया में बे रगबत रहो अल्लाह तुम से मुहब्बत करेगा और जो लोगों के पास है इस से बे रगबत हो जाओ लोग तुम से मुहब्बत करें गे। (तिरमिज़ी व इब्न माजा)

6। हज़रत अबू ज़ररज़ि अल्लाह अन्हु रावी कि रसूल अल्ला ﷺ ने फ़रमाया: कोई बंदा दुनिया में ज़ाहिद न हुआ, मगर अल्लाह तआला ने इस के दिल में हिक्मत उगा दी और हिक्मत के साथ इस की ज़बान को गोया कर दिया और उसे दुनिया के ऐब और इस की बीमारी और दुआ दिखा दी और इस को दुनिया

से जन्नत की तरफ़ सलामत निकालेगा। (बेहक़ी)

मालूम हुआ हिक्मत और इस के साथ गुयाई और दुनिया के उयूब व नक़ाइस की दीद और इस का मर्ज और दुआ और दुनिया से सलामती ज़ाहिदों को नसीब होती है।

7। हज़रत मआज़ इब्न जुबलरज़ि अल्लाह अन्हु को जब यमन भेजा तो फ़रमाया: इयाक व इल्तिनाम इबाद अल्लाह लेसवा बालम्तनामैन (तुम ख़ुद को तनाम (एश व इशरत) से बचाना, अल्लाह के बंदे एश परस्त नहीं होते हैं। (अहमद)

8। हज़रत अब्द अल्लाह इब्न उम्ररज़ि अल्लाह अन्हुमा फ़रमाते हैं कि हुज़ूर अकर्म ﷺ ने मेरे जिसम का बाज़ हिस्सा पकड़ा, पस फ़रमाया: कफ फ़ी अलदन्या कांक गरीब अव आबिर व अद नफ़सिक फ़ी अहल अलक़ुबूर (दुनिया में तुम ऐसे रहो जैसे मुसाफिर या राह गीर और अपने को कब्र वालों में शुमार करू। (बुखारी)

हदीस में गरीब और आबिर के अलफ़ाज़ आये हैं। गरीब से मुराद गरीब अलवतन मुसाफिर है अगरचे वह किसी जगह चंद दिन ठहर जाए,मगर आबिर वह राह गीर है जो किसी जगह दोपहर गुज़ारने के लिए बैठ जाए। मतलब यह है कि जिस तरह यह दोनों सफर और जंगल में दिल नहीं लगाते इसी तरह तुम भी दुनिया में दिल न लगाव।’’

9। बेहक़ी में हज़रत अमरो, वह अपने बाप मुसेब और उन के बाप अमरो के दादा से रिवायत करते हैं कि नबी ﷺ ने फ़रमाया: अववल सलाह हज़ा अलाम अलीक़ीन व अलज़हद व अववल फ़साधा अलब्ख़िल व अलामल (इस उम्मत की पहली सलाह व दुरुस्ती यकीन और ज़हद है और इस का पहला फसाद बुख़ल और दराज़ उम्मीद है।

ज़हद: हज़रत इमाम हज उलइस्लाम क़ुद्दिस सिर्रहू ने हक़ीक़त ज़हद पर बड़ा तफ़सीली कलाम सुपुर्द कलम फ़रमाया। इसी सिलसिला बयान में फ़रमाते हैं: जब ज़हद महबूब चीज़ से फेरनेका नाम है तो इस का तसोर इसी सूरत में होगा जब इस से ज़्यादा महबूब चीज़ की तरफ़ तवज्जो को फेरा जाए वर्ना महज़ महबूब को छोड़ना मुहाल है और जो इंसान मासवाए हक़

तमाम चीजों से मुहब्बत को फेर लेता है हतिया कि उसे जन्नत की रगबत भी न रहे और सिर्फ़ अल्लाह तआला से मुहब्बत करता हो वह ज़ाहिद मुतअल्लिक़ है और जो दुनिया की तमाम चीजों से रगबत को उठा ले और उखरवी नेअमतों में रगबत रखे मसलन हूरों, महलात, नहरों वगैरह से और उन की तमा करे वह भी ज़ाहिद है, लेकिन अव्वल से इस का दर्जा कम है और जो शख्स दुनिया के बाज़ ताल्लुकात और फायदे छोड़े, बाज़ को न छोड़े मसलन कोई शख्स माल में रगबत नहीं रखता, लेकिन इक़तिदार में रखता है इस तरह कि वह खाने पीने वगैरह में तोसे से काम नहीं लेता, लेकिन ज़ेब व जीनत को नहीं छोड़ता ऐसे शख्स को ज़ाहिद मुतअल्लिक़ नहीं कहीं गे। ज़ाहिदीन में इस का दर्जा ऐसा है जैसे तौबा करने वालों में इस शख्स का जो बाज़ गुनाहों से तौबा करता है। यह भी ज़हद सही है।

ख़याल रहे कि तौबा ममनू चीजों को छोड़ने का नाम है और ज़हद उन मुबाह और जायज़ चीजों के छोड़ने का नाम है जिन को नफ़्स चाहता है और मुतलस्सिज़ होता है। यह भी ध्यान रहे कि जो सिर्फ़ ममनूआत को छोड़े उसे ज़ाहिद नहीं कहा जा सकता अगरचे इस ने ममनूआत में ज़हद इख्तियार किया और उन से रुख फेर लिया, लेकिन उर्फ व आदत में मुबाह चीजों के छोड़ने का नाम ज़हद है। पस ज़हद दुनिया से रगबत ख़त्म करके इस को आख़िरत की तरफ़ फेरने का नाम है या गैर ख़ुदा से ख़ुदा की तरफ़ रुजू करे, यह बुलंद दर्जा है। यह भी मालूम रहे कि ज़हद का मतलब यह नहीं कि आदमी सखावत और जवां मर्दी के तौर पर माल खर्च करना छोड़ दे या लोगों के दलों को माइल करने या किसी तमा की बुनियाद पर देने से भी बाज़ रहे क्यों कि यह सब अच्छी आदात हैं। ज़हद तो यह है कि तुम दुनिया को इस लिए तर्क करू कि तुम जानते हो कि आख़िरत की नफासत के मुकाबले में यह हक़ीर है और दुनिया को हर ऐतबार से वही तर्क करता है जो आख़िरत पर ईमान रखता।

दर्जात: मालूम हो कि ज़हद अपनी कुव्वत के ऐतबार से तीन दर्जे रखता है:

1। अव्वल दर्जा, यह सब से अदना दर्जा है यानी दुनिया से बे रगबत रहे हालां कि

वह इस का ख्वाहिश रखता है, इस का दिल दुनिया की तरफ़ माइल और नफ़्स मुतवज्जा है, लेकिन वह मुजाहिदा करता है और उसे दौर करता है। ऐसे शख्स को मुतज़हद कहते हैं। यह खतरे में रहता है क्यों कि बाज़ औकात इस पर नफ़्स ग़ालिब आजाता है और ख्वाहिश उसे खींचती है तो वह दुनिया और राहत व आराम की तरफ़ पलट जाता है कम हो या ज़्यादा।

2। दूसरा दर्जा, यह कि अपनी खुशी से दुनिया छोड़ दे यानी वह जिस चीज़ की तमा कर रहा है इस की निस्बत से दुनिया को हक़ीर जानता है जैसे कोई शख्स दो दरहमों के लिए एक दिरहम को, एक रूपए को दो रूपए की खातिर छोड़ देता है और उसे ग्रां नहीं गुज़रता अगरचे उसे कुछ इंतजार करना पड़े, लेकिन यह ज़ाहिद अपने ज़हद को समझता है और इस की तरफ़ तवज्जो करता है। ऐसे शख्स के बारे में यह अंदेशा रहता है कि वह ख़ुदपसंदी का शिकार हो जाए और ज़हद पर तकबर कर बैठे और ख़याल करे कि जो कुछ इस ने छोड़ा है इस के नज़दीक इस की क़द्र है, लेकिन उसे इस ने ज़्यादा क़द्र वाली चीज़ के लिए तर्क किया है। यह भी नुकसान है।

3। तीसरा दर्जा जो सब से आला है वह यह कि अपनी खुशी से ज़हद इख्तियार करे और अपने ज़हद में भी ज़ाहिद हो यानी अपने ज़हद की तरफ़ मुतवज्जा न हो क्यों कि इस ने अपने ख़याल में कोई चीज़ नहीं छोड़ी इस लिए कि वह जानता है कि दुनिया कोई चीज़ नहीं है, इस की मिसाल इस शख्स की तरह है जो एक जौहर लेने केलिये ठीकरी को छोड़ देता है। पस वह इस जौहर को इस का मुआवजा नहीं जानता और ख़ुद को किसी चीज़ को छोड़ने वाला तसोर नहीं करता और अल्लाह तआला और आख़िरत की नेअमतों के मुकाबले में दुनिया इस से भी ज़्यादा हक़ीर है जिस क़द्र जौहर (मोती) के मुकाबले में ठीकरी हक़ीर है। यह ज़हद कामिल है और इस का सबब मार्फत का कामिल होना है। इस किस्म का ज़ाहिद दुनिया की तरफ़ मेलान और तवज्जो के खतरे से महफूज़ रहता है जैसे जौहर ले कर ठीकरी की वापसी से बे ख़ौफ़ है।

जिस चीज़ में रगबत होती है इस के ऐतबार से भी ज़हद के तीन दर्जे हैं:

1।जिस की रगबत है इस में जहनम और दीगर तमाम तकालीफ़ से निजात हो जैसे अज़ाब कब्र, हिसाब किताब, पल का खतरा, और दीगर खतरनाक मराहिल से निजात हो।

2। अल्लाह तआला की तरफ़ से मिलने वाले सवाब और इस की नेअमतों में रगबत रखने की वजह से ज़हद इख्तियार करे और उन लज़्ज़तों की रगबत हो जिन का वादा किया गया है जैसे जन्नत में हूर और महलात वगैरह। यह उम्मीद रखने वालों का ज़हद है।

3। अल्लाह तआला की ज़ात और इस की लिक़ा की वजह से ज़हद इख्तियार करे, न तकालीफ़ से निजात मतलूब न लज़्ज़तों की ख्वाहिश। यह सब से आला दर्जा है, यह हक़ीक़ी मउहद और सच्चा आशिक है।

यहाँ चंद उमूर मलहूज़ खातिर रहीं:

1। जो शख्स दुनिया को आख़िरत के लिए छोड़ता है वह उन अहले मार्फत और अर्बाब क़ुलूब के नज़दीक जिन के दिल मुशाहदात व मकाशफ़ात से मामूर हैं, इस शख्स की तरह है जो बादशाह के दरबार में जाना चाहता है तो दरवाजे पर मौजूद कुत्ता उसे रोक देता है, वह इस के सामने रोटी का एक लुक़मा डाल देता है और उसे अपने काम में मशगूल करके ख़ुद दरवाजे से अंदर दाखिल हो जाता है और बादशाह का क़ुर्ब हासिल करता है हतिया कि इस का हुक्म तमाम ममलकत पर नाफ़िज़ होने लगता है तो तुम्हारा किया ख़याल है कि इस ने बादशाह के क़ुर्ब से जो कुछ हासिल किया है इस के मुक़ाबिल इस लुक़्मे की कोई हैसियत है जो इस ने कुत्ते के लिए डाला है। पस शैतान अल्लाह तआला के दरवाजे पर एक कुत्ता है जो लोगों को दाखिल होने से रोकता है हालां कि दरवाजा खुला है और पर्दा भी उठा हुआहैऔर दुनिया एक लुक़्मे की तरह है, मगर तुम उसे खाओ तो इस की लज़्ज़त सिर्फ़ चबाने की हद तक है, निगलते ही लज़्ज़त ख़त्म हो जाती है, फिर इस का असर (भूक) मादे में बाक़ी रहता है। फिर वह बदबू और गंदगी की शक्ल इख्तियार करता है। फिर इस

के बाद उसे निकालने की ज़रूरत होती है तो जो शख्स बादशाह के तक़र्ब का तालिब होगा इस की तवज्जो दुनिया की तरफ़ कैसे होगी।

2। दुनिया जो किसी शख्स को सही सालम हासिल होती है अगरचे इस की उम्र सौ साल हो आख़िरत की नेअमतों के मुकाबले में इस की वह निस्बत भी नहीं जो एक लुक़्मे को दुनयवी मुल्क के मुकाबले में हासिल है क्यों कि मुतनाही को गैर मुतनाही से कोई निस्बत नहीं। दुनिया फ़ानी है, आख़िरत अब्दी है। दुनिया अगरचे एक लाख साल चल जाए और इस में कोई मेल व गंदगी भी न हो तब भी आख़िरत की अब्दी नेअमतों से उसे कोई मुनासबत नहीं। बल्कि हाल यह है कि उम्र भी कम है और इस की लज़्ज़तें गुदली और मेली कुचैली हैं।

यह भी मालूम हो कि जिस चीज़ से रगबत और ख्वाहिश को फेरा जाए इस की निस्बत से तकसीम दर्जात में बहुत अक़्वाल हैं, इजमालन आप यह समझ लें कि पहला दर्जा यह है कि जो कुछ अल्लाह तआला के सिवा है इस से बे रगबत हो हतिया कि ख़ुद अपने आप से भी। दूसरा दर्जा यह कि अपनी तमाम सिफ़ात से तवज्जो हटा दे जिन में नफा हो, इस में तबीअत के तमाम तक़ाज़े दाखिल हैं जैसे शहवत, गुस्सा, तकबर, इक़तिदार, माल और जाह व मर्तबा वगैरह। तीसरे दर्जे में माल व जाह और उन के असबाब से ज़हद इख्तियार करे क्यों कि तमाम नफ़सानी फ़वाइद उन दोनों की तरफ़ लौटते हैं। चौथे दर्जे में इल्म, ताकत, देनार व दिरहम और जाह व मर्तबा आताहै कि उन से ज़हद और बे रग़बती इख्तियार करे क्यों कि माल की इक़साम ज़्यादा हैं, मगर वह सब दिरहम व देनार में जमा हैं और जाह व मर्तबा के असबाब अगरचे बहुत ज़्यादा हैं, लेकिन उन का रुजू इल्म व कुदरत की तरफ़ होता है क्यों कि इस से मुराद वह इल्म व कुदरत है जिस से दलों का मालिक बनना मकसूद हो क्यों कि जाह व मर्तबा का मानी दलों का मालिक बनना और उन पर कादर होना है जिस तरह माल का मफ़हूम असबाब का मालिक बनना और उन पर कादर होना है। इस तफ़सील व इजमाल को हज़रत इमाम क़ुद्दिस सिर्रहू ने

यों समझाया कि अल्लाह तआला ने एक आयत में सात चीजों का ज़िक्र किया है, इरशाद ख़ुदावंदी है:

زُیِّنَ لِلنَّاسِ حُبُّ الشَّہَوٰتِ مِنَ النِّسَآءِ وَالْبَنِیۡنَ وَالْقَنَاطِیۡرِ الْمُقَنۡطَرَۃِ مِنَ الذَّہَبِ وَالْفِضَّۃِ وَالْخَیۡلِ الْمُسَوَّمَۃِ وَالۡاَنْعَامِ وَالْحَرْثِ (سورۃ آل عمران: ۳؍۱۴)

तर्जुमा: लोगों के लिए आरास्ता की गई उन ख्वाहिशों की मुहब्बत अव्रतें और बेटे और तले उपर सोने चांदी के ढेर और निशान किए हुए घोड़े और चौपाए और खेती।’’

फिर दूसरी आयत में पांच का ज़िक्र फ़रमाया:

اِعْلَمُوۡۤا اَنَّمَا الْحَیٰوۃُ الدُّنْیَا لَعِبٌ وَّ لَہۡوٌ وَّ زِیۡنَۃٌ وَّ تَفَاخُرٌۢ بَیۡنَکُمْ وَ تَکَاثُرٌ فِی الْاَمْوَالِ وَالْاَوْلَادِ (سورۃ الحدید: ۵۷؍۲۰)

तर्जुमा: जान लो कि दुनिया की ज़िन्दगी तो नहीं मगर खेल कूद और आराइश और तुम्हारा आपस में बड़ाई मारना और माल और औलाद में एक दूसरे पर ज्यादती चाहना।’’

फिर उन सब को दो बातों की तरफ़ लौटाया और फ़रमाया:

اِنَّمَا الۡحَیٰوۃُ الدُّنْیَا لَعِبٌ وَّ لَہۡوٌ (سورۃ محمد: ۴۷؍۳۶)

तर्जुमा: दुनिया की ज़िन्दगी तो यही खेल कूद है।’’

फिर उन सब को एक बात में जमा फ़रमा दिया, इरशाद हुआ:

व नही इलिन्नफ़स अन अलहोआ फ़ान्न अलजन्न ही उल्माۡवा (सूरत अलनाज़आत: 7940,41)

तर्जुमा: और नफ़्स को ख्वाहिश से रोका, तो बे शक जन्नत ही ठिकाना है।’’

लफ़्ज़ तक़्वा एक ऐसा लफ़्ज़ है जो नफ़्स की तमाम दुनयवी लज़्ज़तों को जमा करता है, लिहाज़ा इस से ज़हद होना चाहिए। हासिल यह हुआ कि ज़हद का मतलब तमाम दुनयवी लज़्ज़तों से बे रगबत हो जाना है और जब इंसान नफ़्स की ख़ाहिशात से बे रगबत हो जाए

तोउसे दुनिया में बाक़ी रहने की रगबत भी नहीं रहती। लामुहाला इस की उम्मीदें कम हूँ गी क्यों कि बका तो इस लिए चाहता है कि नफा हासिल करे और बका के ज़रिया दाइमी नफा का इरादा करता है और दुनयवी ज़िन्दगी से मुहब्बत का मतलब यही है कि जो कुछ इस में मौजूद है या जिस का इमकान है वह हमेशा रहे और इस से बे रगबत हो जाएगा तो दवाम का इरादा नहीं करेगा।

3। दुनिया से हिकारत और इस से बुग़ज़ व नफरत और इस की ज़िन्दगी पर एतिमाद और इस से मुहब्बत व लगाव के ताल्लुक से जो आयात व अहादीस और आसार व अखबार वगैरह हैं नीज़ ज़हद व फक्र के फ़ज़ाइल पर भी नज़र रखें तो ज़हद की अहमियत व अज़मत और इस से पैदा होने वाले नताइज व समरात का काफ़ी हद तक अंदाजा हो जाएगा और यह भी पता चल जाएगा कि अगर सूफ़िया कराम ज़ाहिदाना ज़िन्दगी न गुज़ारते और इस में बुलंद मिसालें क़ायम न करते तो ना मालूम दीन का किया हाल होता और दुनिया के गर्वीदा होकर लोग ना मालूम दीन, अल्लाह तआला और इस के रसूल ﷺ को कैसा फ़रामोश कर देते और रूहानियत और अख़लाक़ आलीया की राहें ना मालूम कब से मस्दूद और बंद हो गई होतीं। यह ज़हद ही था जिस ने काफ़ी हद तक लोगों को अख़लाक़ रज़ीला से पाक व साफ रखा जो दुनिया व मा फ़ीहा की मुहब्बत से पैदा होते हैं।

4। हुज़ूर अनवर ﷺ का यह इरशाद ग्रामी भी नज़र में रखें ख़ास कर वह लोग जो सूफ़िया कराम के ज़हद व फक्र कोंशाना बनाते हैं, आका ﷺ फ़रमाते हैं:

मा अही मक्ली उन्न अजमा अलमाल व इकोन मिन अलताजरीन व लिकन ओही मक्ली उन्न इसबाह बहमद रब्तक व कण मिन अलसाजिद्दीन व आबद रब्तक हतिया यातेक अलीक़ीन

मुझे माल जमा करने और ताजिरों से हो जाने की वही नहीं की गई, लेकिन वही की गई कि तुम अपने रब की तस्बीह करू हमद के साथ और सजदा करने वालों से हो जाओ और अपने रब की इबादत करते रहो यहाँ तक कि मौत आजाए। (शरह सिंह)

दुनिया के दीवाने और बसीरत से महरूम लोग कैसी कैसी बातें करते हैं, बड़ी

हैरत होती है। होना तो यह चाहिए था कि सूफ़िया कराम ने जिस बालिग नज़री और कुर्बानी से लोगों को अल्लाह तआला के क़रीब किया और क़ुर्ब की राहें हमवार कीं, उन्हें सराहते और उन्हें मशाल राह बनाते। अगर वह कुरआन व हदीस का सही मिजाज परखते और हुब्ब दुनिया वगैरह के मुफ़ासद पर नज़र रखते नीज़ देखते कि उन फ़ानी लज़्ज़तों का शिकार होकर अब्दी लाज़वाल नेअमतों से कैसे महरूमी होती है तो कभी भी सूफ़िया के ज़हद व फक्र पर एतरज़ न करते।

इस बात पर भी नज़र रहे कि दुनिया से मुहब्बत और इस की तरफ़ रगबत या जमा माल वगैरह का कहीं हुक्म नहीं आया जैसा कि अभी हदीस पेश की, हुक्म आया है तो आख़िरत को इख्तियार करने, इस की तरफ़ रगबत करने, और इस से मुहब्बत करने का। अगर बिलफ़र्ज़ यह न भी होता तो सूफ़िया का अमल खिलाफ़ कुरआन व सुन्नत न होता क्यों कि वह इस के मामूर न थे। वह करते जो भी करते अपने लिए करते जब कि यहाँ इस के ब्रअक्स है, कुरआन व सुन्नत में जिस का हुक्म दिया गया, हुज़ूर ﷺ ने जिसे इख्तियार फ़रमाया और इस की तरग़ीब दी सूफ़िया ने उसे अपनाया और जिस से मना फ़रमाया उसे छोड़ा और इस से बे रगबत हुए तो वह काबिल तारीफ़ हैं न कि काबिल मज़ मत।

यह हम पहले बयान कर चुके हैं कि दुनिया व मा फ़ीहा की मुहब्बत व रगबत नफ़्स की तिब्बी ख़सलत है वह तो एश परस्ती वगैरह चाहता ही है। लिहाज़ा इस की तरग़ीब वगैरह की ज़रूरत नहीं, न दुनिया की फ़ज़ीलत बयान करने की ज़रूरत है। आज मुशाहिदा है कि लोग ख़ुद बखुद दुनिया की तरफ़ माइल और इस के दीवाने हैं और इस की तहसील में क़ल्ब व जेहन की सारी तवानाइयां सिर्फ़ किए हुए हैं और इस क़द्र मुहब्बत में अंधे हो गए हैं कि इस की वजह से हलाल व हराम की तमीज़ उठ गई है, ख़ुदा व रसूल ﷺ को भूल बैठे, फ़राइज़ व वाजिबात को छोड़ दिया, इस की खातिर आपस में दस्त व गिरेबां हैं।

5। आप पढ़ चुके कि ज़हद दर असल बे रग़बती का नाम है। यह मानी ख़ुद कुरआन व

सुन्नत से मुतअद्दिद तरह से साबित हैं। इस के बहुत से दर्जात हैं और यह भी कुरआन व सुन्नत से माख़ूज़ हैं। अब जो शख्स दुनिया और इस की तमाम चीजों से ख़ुद को बे रगबत करे वह ज़ाहिद है अगरचे वह किसी दर्जा का हो। लिहाज़ा ऐसा हो सकता है कि बजाहिर माल व मता भी रखता हो और बबातिन ज़ाहिद हो। आप फक्र के बयान में पढ़ चुके कि बाज़ अनबीए करामअलैहिम अस्सलाम और औलीए अजाम रहिमहुम अल्लाह भी बजाहिर काफ़ी माल व मता और दौलत व स्रोत रखते थे, लेकिन उन के दिल मुकम्मल तौर पर अल्लाह तआला और इस के रसूल ﷺ के हवाले थे। आरिफ रोमी जैसा मुजद्दिद इश्क व मुहब्बत फरमाता है؎

चीस्त दुनिया अज़ ख़ुदा गाफिल बदन

ने क़ुमाश व नुकरा व फ़रज़न्द व ज़िन

याद ख़ुदा से गफलत का नाम दुनिया है माल व मता, सोना चांदी और फ़रज़न्द व ज़िन का होना दुनिया नहीं है।’’

मुश्कात शरीफ़ में हज़रत सफ़ियान सौरीरज़ि अल्लाह अन्हु से मर्वी है कि उन्हों ने फ़रमाया कि दुनिया में ज़हद मोटा पहनना और मामूली खाना नहीं है, ज़हद तो उम्मीदों को कम करने का नाम है। इसी मुश्कात में बेहक़ी के हवाले से है कि हज़रत इमाम मालिकरज़ि अल्लाह अन्हु से पूछा गया: दुनिया में ज़हद कौन सी चीज़ है, फ़रमाया: पाकीज़ा कमाई और उम्मीद को कम करना। हज़रत इमाम अबूतालिब मक्की क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं: ज़हद के दो मानी हैं अगर कोई चीज़ मौजूद है तो इस में ज़हद इस का निकालना और दिल का इस से खाली रहना है। अगर नफ़्स के लिए बाक़ी रखना है तो ज़हद दुरुस्त नहीं क्यों कि यह इस की रगबत की दलील है, यह अग़न्या का ज़हद है और अगर कोई चीज़ मौजूद नहीं है और अदम ही इस का हाल है तो ज़हद इस का रषिक और मादूम पर राजी रहना है और यह फ़िक़रा का ज़हद है।

हज़रत इमाम ग़ज़ाली क़ुद्दिस सिर्रहू ज़हद की अलामतों के बयान में फ़रमाते हैं: बाज़ औकात गुमान किया जाता है कि माल का तारक ज़ाहिद है हालां कि यह ज़हद नहीं, माल को छोड़ना और शिद्दत व तकलीफ़ का इज़हार इस के लिए आसान है जो ज़हद के साथ अपनी

तारीफ़ चाहता है, कितने ही राहब (तारक दुनिया) हैं जो मामूली खाते हैं और बंद इबादत ख़ानों में रहते हैं । लेकिन वह इस बात पर खुश होते हैं कि लोगों को उन की हालत का इल्म हो, लोग उन्हें देखें और उन की तारीफ़ करें। मालूम हुआ तर्क दुनिया ज़हद की क़तई अलामत नहीं, बल्कि माल और जाह दोनों से बे रग़बती ज़हद है।