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अध्याय 40 में से 54पृष्ठ 474–487

मशाइख़ के एहसानात

मालूम हो कि इस मुहब्बत व उलफ़त का सिलसिला सर्वर महबू बेन ﷺ पर ही ख़त्म नहीं हो जाता है बल्कि तमाम मशाइख़ सिलसिला ख़ास कर और तमाम बुज़ुर्गान दीन जो नुज़ूल रहमत वबरकत,दफा बुला औरक्षाइश रोज़ी का सबब और ज़रिया हैं सब के एहसानात हैं और सब ही किसी न किसी सबब से मुहब्बत के मुस्तहिक़ हैं,ख़ास कर मशाइख़ सिलसिला जो रूहानी फ़्यूज़ात वबरकात और बातिनी रशद व्हिदायत और कमालात के हुसूल का ज़रिया हैं ख़्वाह अहले सुलूक उन के तवस्सुल वितवस्सुत को देख पाएं या न ,बारीक बीनों का मुशाहिदा है कि तमाम मशाइख़ की अर्वाह आमद फ़ैज़ में हाइल हैं सब से होकर ही फ़ैज़ आता है जैसा की इमाम अर्बाब कश्फ़ वोलायत हज़रत मुजद्दिद अल्फ़ सानी सरहंदी क़ुद्दिस सिर्रहू ने ज़िक्रफ़रमाया है:

उन के यह फ़्यूज़ात सिर्फ़ बातिनी सफ़ाई का काम नहीं देते हैं बल्कि जहां तज़किया नफ़्स वितसफ़िया क़ल्ब और बातिनी मदारिज की बुलंदियां नसीब होती हैं वहीं शरीअत

वसंत की इत्तिबा में रसूख,आमाल सालहा में इस्तिक़ामत, ज़िक्र विबादत में कसरत,तक़्वा वतहारत,ख़ौफ़ वख़शीयत औरउलफत विमहबत वगैरह की बरकतें फिर उन पर मुरत्तिब होने वाली उखरवी नेअमतें बे शुमार हैं इसी लिए कई ऐतबार से मां बाप से बढ़ कर उस्ताज़ और उस्ताज़ से बढ़ कर शैख़ कामिल का एहसान हो ता है जो मुहब्बत विगर्वीदगी और ईसार वक़्रबानी का तक़ाज़ा करता है,यह ज़बर दस्त रहमत ख़ुदावंदी है कि शैख़ कामिल से मुरीद को मुनासबत हो जाए, शैख़ से मुहब्बत और इस की इत्तिबा इस में फिनाईयत का सबब बनती है और यही फिनाईयत वफ़दाईयत फना फ़ी अलरसोल तक पहुँचाती है और वह फना फ़ी अल्लाह तक,जब माथे की आंखों के सामने शैख़ कामिल होता है तो इस से मुनासबत हिस्सी भी होती है जो जिल्द मुहब्बत का सबब बनती है और फिर वही आगे चल कर वसीला हो जाती है,जिन्हों ने इस राज़ को समझा वह बा मुराद और कामरान हुए और जो महरूम रहे वह महरूम रहे।

इक़साम मुहब्बत

मालूम हो कि मुहब्बत की दो किस्में हैं(1)मुहब्बत तिब्बी यानी इंसान का अपनी ज़ात,औलादावर मां बाप वगैरह से तबीअत की हैसियत से मुहब्बत करना, यह मुहब्बत किसी शख्स के इख़्तिया र से बाहर होती हैबल्कि कुव्वत इस्तिताअत से भी खारिज होती है,यह मुहब्बत आम तौर से ख्वाहिश नफ़्स के ताबे होती है,इस परमुवाख़िज़ा नहीं।(2)मुहब्बत अकली इख्तियारी यानी इस चीज़ का इख्तियार करना कि अक्ल जिस का रुजहान चाहती हैगरचे तबीअत इस के खिलाफ़ हो,इस का फ़र्क़ आप इस बात से समझ सकते हैं कि मरीज तबीअत के ऐतबार से दुआ को ना पसंद करता है उसके बावजूद अपने इख्तियार से दुआ की तरफ़ माइल होता है और उसके तनावल का क़सद करता है अपनी अक्ल की चाहत की वजह से क्यों कि उसे इल्म या गुमान ग़ालिब है कि इस की सलाह वंफा इसी में है,इसी तरह मोमिन जब जान लेता है कि हुज़ूरेअकरम ﷺइसी चीज़ का हुक्म देते हैं या इसी से मना करते हैं जिस में दीन वदुनिया और इस की आख़िरत वाक़्बा का नफा होता है और उसे यकीन होता है कि हुज़ूर अकर्म ﷺइस पर सब से ज़्यादा शफ़ीक़ विमेहरबान हैं तो

तो इस सूरत में आप के अम्र विमामला की जानिब अपनी अक्ल के तक़ाज़े के एतबारसे आप ﷺके गैर के अम्र पर राजह और ग़ालिब हो जाता है।

ईमान के दर्जात में यह पहला दर्जा है। रहा कमाल ईमान तो वह यह है कि इंसान की तबीअत आप ﷺकी मुहब्बत में इस की अक्ल के ताबे हो जाए,यहाँ यह भी ध्यान रहे कि हदीस शरीफ़ में जो आया है कि‘‘लायोमिन अहदकम हत्ता इकोन अहब इलिया मिन वालिदा वोल्दा वालिनास अजमईन’’ तुम में कोई शख्स मोमिन नहीं होता यहाँ तक कि में उसे इस की औलाद,बाप और तमाम लोगों से ज़्यादा महबूब न हो जाऊं यहाँ उलमा ने कैद लगायी कि मुराद यह है कि मोमिन कामिल नहीं होगा यह हुब्ब तिब्बी के ऐतबार से हैवर्ना अग्रमहब्बत से अकली इख्तियारी मुराद ली जाए तो मुहक़्क़ीन फ़रमाते हैं कि फिर यहाँ कामिल की कैद नहीं लगे गी बल्कि मतलब यह होगा कि वह हक़ीक़ी मोमिन ही नहीं होगा।

अलामात मुहब्बत

(1)हुज़ूरेअकरम ﷺको अपनी ज़ात पर इख्तियार करनाऔर आप की मुखालफत हर आप की मुआफ़िक़त को इख्तियार करनाऔरआप की इक़तिदा करना और आप की सुन्नत पर अमल करना,आप के अक़्वाल वाफ़आल की पैरवी और अवामिर वनवाही को बजा लाना,सख्ती व आसानी,खुशी और ग़म में आप के आदाब इख्तियार किए रहना जो शख्स जमी सिफ़ात के साथ मौसूफ़ हो वह कामिल अलमहब है और जो बाज़ से मौसूफ़ और बाज़ से न हो वह नाक़िस अलमुहब्बत है लेकिन मुहब् वह भी कहलाये गाजैसा कि हदीस शरीफ़ में है कि एक शख्स को शराब के सिलसिले में चार पांच बार हद लगायी गई जिस प्रबाज़ सहाबा ने लानत की तो आप ﷺने फ़रमाया लानत न करू वह अल्लाह और उसके रसूल से मुहब्बत करता है।

उलमा फ़रमाते हैं: इस हदीस में गुनहगार मोमिन के लिए अज़ीम खुशखबरी और बशारत है और अहले सुन्नत के लिए मोतज़िला वख़वारज के खिलाफ़ वाज़िह और रोशन दलील है जिन्हों ने कह दिया कि मुर्तक़िब कबीरा काफ़िर या ईमान से खारिज है जो हमेशा दोज़ख

में रहे गा।

(2)दूसरी अलामत यह कि आप ﷺका कसरत से ज़िक्र करे क्यों कि मशहूर है‘‘मिन अहब शेया अक्सर जिक्रा’’जो जिस से मुहब्बत करता है वह अक्सर इस का ज़िक्र करता है,रिवायत है कि हज़रत अबदुल्लाह इब्न उम्र रज़ि अल्लाह अन्हुमा का पीर सन पड़ गया ,आप से कहा गयाकि उसे बुलाइये जिस से आप को सब से ज़्यादा मुहब्बत होतो यह सही हो जाएगा,आप ने जोर से पुकारा ‘‘या मुहम्मदाह’’ गोया आप ने इस्तग़ासा में इज़हार मुहब्बत का क़सद किया, आप का पीर फ़ी उलफ़ौर सही होगया।

(3)तीसरी अलामत यह कि आप ﷺकी मुलाक़ात का बहुत शौक हो क्यों कि हरमहब् अपने महबूब की लिक़ा पसंद करता है।

(4)जब आप का ज़िक्र पाक हो तो आप की तौक़ीर वित्ताजीम और ख़ुशू व ख़ुज़ू का इज़हार करे,नाम मुबारक सन कर तवाज़ा वाणिकसार करे।

(5)उन से मुहब्बत करे जिन से नबी अकर्म सिल्ली अल्लाह अलैहि वसल्लम ने मुहब्बत की और उन से जो आप से निस्बत रखते हैं जैसे अहले बीत और मुहाजिरीन व अंसार सहाबा करामरज़ि अल्लाह अन्हुम और उन से अदावत रखे जो उन हज़रात से दुश्मनी रखें और उन से बुग़ज़ रखेजवान बुजुर्गों से बुग़ज़ रखे क्यों कि यह उसूल है कि जो जिस से मुहब्बत रखता है वह उन से भी मुहब्बत रखता है जिन से उन का महबूब मुहब्बत रखता है।

(6)उन से बुग़ज़ रखे जो आप ﷺके मबगौज़ थे और उन से दुश्मनी रखे जो आप के दुश्मन थे,उन से भी दौर रहे जो आप की संतों की मुखालफत करें और आप के दीन में बिद्दतें ईजाद करें।

(7)कामिल मुहब्बत की अलामतों में एक यह भी है कि ज़हदुफ़क़र इख्तियारकरे और ग़नाए क़ल्ब के साथ फक्र को सिफ़त बनाए।

(मुहब्बत की यह चंद अलामतें‘उलमातक़िद अलमुंतक़िद’से बयान की गई हैं)

ख़याल रहे कि जैसे आप की मुहब्बत वाजिब हैवैसे ही आप की ताज़ीम वितौक़ीर भी वाजिब है जैसा की उलमा-ए कराम ने शिफा शरीफ़ वगैरह में तफ़सीला बयान किया है।आज के दौर में बे अदबी विगुस्ताखी आम हैजिस की वजह से लोग रूहानी बरकतों से महरूम होते जा रहे हैं।

मुहब्बत के चंदफ़ायदे

हज़रत ख़्वाजा मुहम्मद मासूम रहमत अल्लाह अलैहि मक्तूब21 दफ्तर अव्वल में फ़रमाते हैं: इस गिरोह सेमुहब्बत करने वाला इस गिरोह के साथ है। एक बुजुर्ग ने फ़रमाया या अल्लाह मुझ को इस कौम से बनादे या इस कौम के देखने वालों में करदे क्यों कि में किसी दूसरी कौम से ताल्लुक की ताकत नहीं रखता,हक़ सुब्हानहू व तआला इस आली मर्तबा गिरोह के साथ कामिल मुहब्बत इनायत फ़रमाकर उन के फ़्यूज़ व बरकात से कामिल हिस्सा अता फ़रमाए और उन के पोशीदा इसरार विमआनी से सेराब विषादाब करे,मुहब्बत का ताल्लुक ही है जो कि मुहब्बत करने वाले को हमेशा महबूब के साथ रखता है,इस की सिफ़ात कामला के साथ मुत्तसिफ़ करता है और तालिब को मतलूब के रंग में रंग देता है,और इश्क काजोश ही है जो सालिक को बशरियत के वजूद से हलकाकर देता,अनानीयत और सर कशी के तंग कूचा से रिहाई देता और इस को अपने आप से बे ख़ुद करता है और अज़ ख़ुद रफ़्ता को इस मुक़द्दस बारगाह में जगह देता है और क़ुर्ब की मंजिलों तक पहुँचा ता है,बेशक पहले (अज़ल)से यही होता आया है ,मुहब्बत ही है जो कि वजूद का सबब बनी हैऔर जिस ने सिलसिला ईजाद को हरकत दी है,मुहब्बत ही ज़ुहूर इज़हार का बाइस बनी है और पोशीदा ख़ज़ाने को मैदान ज़ुहूर में लाई है,अव्वल चीज़ जिस ने यकीन को कबूल कियावह मुहब्बत ही है जो सर्वर कायनात ﷺ की हक़ीक़त है,इस मुहब्बत ही से हुज़ूर नबी अकर्म ﷺरब उलआलमैन के हबीब बनेहीं और तमाम कायनात हुब्ब के तक़ाज़े औरमुहब्बत के जोश से वजूद वज़हूर में आई है।

फ़वाइद

मुहब्बत की दो किस्में:

1। हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं: मुहब्बत की दो किस्में हैं:(1)एक वह जिस का ताल्लुक ज़ात मुहब् से होता है(2)औरएक वह जिस का ताल्लुक गैरजात से होता है,पहली किस्म का नाम मुहब्बत ज़ातीय है यह इक़साम मुहब्बत में सब से आला अवर्बरतर है क्यों कि हर इंसान जिस क़द्र अपनी ज़ात को चाहता हैइस क़द्र किसी को नहीं चाहता हैनीज़ मुहब्बत की यह किस्म सब से ज़्यादा मुस्तहकम और मजबूत है कि किसी आ रज़ की वजह सेज़ाइल नहीं होती नीज़ इस मुहब्बत का ताल्लुक जिस से हो ता है वह खालिस महबूब होता हैएसा मुहबीत का शाइबा नहीं रखता है।और दूसरी किस्म की मुहब्बत अर्जी और ज़वाल पज़ीर है,इस का मुताल्लिक़ अगर चह एक जिहत से महबूब हैलेकिन मुतअद्दिद वजूह के ऐतबार सेमहबीत रखता है,रसूल कोनेन महबूब आज़म ﷺका हसन वजमाल हज़रत ज़ात तआला की तरफ़ मंसूब हैइस लिए ला मुहाला किस्म अव्वल की मुहब्बत जो कि ज़ात जल शाना से मुताल्लिक़ हैवही हुज़ूर अक़्दस ﷺसे मुताल्लिक़ होगी और ज़ात सुब्हानहू की तरह इस ताल्लुक मुहब्बत की वजह सेआप ﷺभी खालिस महबूब होंगे और आप अलैहि अस्सलात वस्सलाम के अलावा दूसरों को यह दौलत मयस्सर नहीं हैऔर हसन ज़ात से कम हिस्सा रखते हैं लिहाज़ा उन लोगों से दूसरी किस्म की मुहब्बत मुताल्लिक़ होगी और एक जिहत से उन को महबूब बनाए गी।

महबूब मुतअल्लिक़ आप ﷺही हैं कि ज़ात मुहब् की तरह हमेशा महबूब हैं,महसूस होता है कि हज़रत मूसा अलैहि अस्सलात वस्सलाम को जो ज़ात इलाही सुब्हानहू के साथ ग़लबा मुहब्बत है और जिस मुहब्बत की वजह से अहले मुहब्बत के रईस विसरदार हुए इसी क़द्र ज्यादती मुहब्बत अल्लाह तआला को हज़रत सय्यद अलबशर ﷺकेसाथ हैये

फ़क़ीर(मुजद्दिद)उन दोनों मुहब्बतो M केदरम्यान जिस क़द्र गवासी करता है कि कुव्वत वज़ाफ़ के ऐतबार से फ़र्क़ पैदाकरे और वह मुहब्बत कि ख़ालिक़ जल वाला को है मुहब्बत मख़लूक़ से शदीदत्तर पायमगर कोई फ़र्क़ नहीं पाता है गोया उन दोनों मुहब्बतों कोमिजान अदालत में बराबरबराबरतोला है और बाल बराबर कमी ज्यादती तजवीज़ नहीं करता है।(माख़ूज़ मक्तूब 100दफ्तर सोम)

2।आप क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं: मुहब्बत ज़ातीय कि अल्लाह तआला जल शाना जिस की वजह से अपनी ज़ात कोमहबूब रखता है इस के तीन ऐतबार हैं (1)महबूबीयत (2)मुहबीत (2)मुहब्बत।

महबू बीत ज़ातीय के कमालात का ज़हूरख़ातम अलर्सल अलैहि वाला अआला अस्सलवात वालतसलीमात के लिए मुस्लिम हैं ज़्यादा से ज़्यादा यह कि जानिब महबूबीयत में दो कमाल हैं(1)फ़ाली यानी तासीर(2)इन्फ़आली यानी तास्सुर(असर कबूल करना) फेअल असल है औरिंफ़आल इस के ताबे है लेकिन इन्फ़आल फेअल की इल्लत ग़ाईया होताहै अगरचे वजूद में मताख़र होता है मगर तस्वरमें मुतक़द्दिम और कमालात मुहबीत का ज़ुहूर हज़रत मूसा क्लेम अल्लाह अला नबीना वालैय अस्सलात वस्सलाम का हिस्सा है और तीसरा ऐतबार कि नफ़्स मुहब्बत है ओला इस मक़ाम में हज़रत अबू अलबशर आदिम अला नबीना वालैय अस्सलात वस्सलाम मशहूद हुए सानिया हज़रत इब्राहिम खलील अल्लाह अलैहि अस्सलात वस्सलाम और सालस्सा हज़रत नूह अलैहि अस्सलाम भी इसी ऐतबार में नज़र आये।

हज़रत ज़ात तआला वितक़दस जिस तरह अपनी ज़ात से मुहब्बत करता है इसी तरह कमालात इस्माई व सिफ़ाती से भी मुहब्बत करता है और इस मुहब्बत अस्मा वस्फ़ात वगैरह का ज़ुहूर हज़रत इब्राहिम अला नबीना वालैय अस्सलात वस्सलाम में ज़िया दह ताम है और महबूबीयत इस्माई वस्फ़ाती और अफ़आली का ज़ुहूर दीगर अनबया अला नबीना वालैहिम अस्सलात वस्सलाम में मुतहक़्क़ वसाबत है,असमा वस्फ़ात की मुहब्बत के ज़ुहूर की तरह असमा ,सिफ़ात और अफ़आल के ज़लाल की

महबूबीयत का ज़ुहूर उन कियासूल के वास्ते से उन औलीए कराम का हिस्सा है जो मुराद विमहबूब होते हैं और उन ज़लाल की मुहबीत का ज़हूरान औलियाए कराम का नसीब है जो मुरीद विमहब होते हैं।

3।मक़ाम मुहब्बत ज़ातीय के उपर मक़ाम हुब्ब हैजो कि मज़कूरा तीनों एतबारात का जामा और इजमाल है ,मक़ाम रज़ा मक़ाम मुहब्बत वहब के उपर है इस लिए कि यह मर्तबा मर्तबा मुहब्बत केउपर हैकियों कि मुहब्बत में इजमाला वितफ़सीला निस्बत मौजूद हैऔर मक़ाम रज़ा में निस्बत महज़ूफ़ हैजो कि ज़ात तआला के मुनासिब है और मक़ाम रज़ा के उपर किसी के लिए क़दम नहीं मगर हुज़ूर ﷺके लिए हो सकता है,इस इरशाद में जो आप ﷺ ने फ़रमाया: ली मा अल्ला वक़्त ला यसानी फिया मुल्क मुक़र्रब विला नबी मुर्सल

मेरे और अल्ला के दरमियान एक वक़्त ऐसा भी आता है जिस मैन न मुक़र्रब फरिश्ते की गुंजाइश है और न नबी मुर्सल की।’’

इस हदीस क़ुदसी में इसी ख़ुसूसीयत की तरफ़ इशारा है: ए रसूल!में हूँ और तुम हो और तुम्हारे सिवा जो कुछ है सब को तेरी खातिर छोड़ दिया।

मुहम्मदरसूल अल्ला ﷺको आज के दिन किया जान पाएं गे औरआप की अज़मत विबुज़ुर्गी को इस दुनिया में किया समझ पाएं गे इस लिए कि यहाँ हक़ बातिल के साथ मख़लूत है कयामत के दिन आप की बुज़ुर्गी मालूम होगी कि पैगंबरों के इमाम विपेशवा हूँ गे और हज़रत आदिम और उन के मासवा आप के झंडे के नीचे होंगे सलवात अल्लाह वस्सलामा अलैहिम अजमईन(माख़ूज़ अज़ मक्तूब 7दफ्तरसूम)

अरकान मुजाहिदात

1।तक़लील तआम

अइम्मा तरीक़त और मुज्तहिदयन सूफ़िया ने निहायत बालिग नज़री से

कुरआन वसंत की रोशनी में तज़किया नफ़्स वितसफ़िया क़ल्ब केतरीक़े मुक़रर कियावर तफ़सील से बता दिया कि नफ़्स इमारा जैसी सुरक्ष चीज़ को कैसे राम किया जा सकता है? सूफ़िया के मुक़रर करदा उसूलों में एक कम खाना भी है,नफ़्स की अमार्गी किस तरह बढती है और उसके तुग़्यान वसरक्षी में इजाफा कैसे हो सकता है इस को रोकने के लिए ज़रूरी है कि खाने पर सुन्नत की रोशनी में काबू पाया जाए,आज मुशाहिदा है कि माकूलात विमशरूबात लज़्ज़तों औरोसातों का शिकार होकर लोग फ़िस्क़ वफ़जोर में कहां तक पहुँच ग्ये , किस क़द्र बुराइयों में मुबतला होगएहैं और अख़लाक़ी तौर पर कितने बिगड़ ग्ये हैं और इस के साथ साथ किस क़द्र माली परेशानियों में मुबतला हो ग्ये हैं।

यह हर हस्सास जानता है कि खाने में किस क़द्र बे एतिदालियां पैदा हो गई हैं एक मिक़दार में इस क़द्र इजाफा हो गया है कि जब तक उपर तक मादा भर नहीं जा ता खा ना बंद नहीं करते,दूसरे भूक का एहसास न होते भी अगर दावतें हैं तो जबरदस्ती खाना खाते हैं जिस से मादा खराब होजाता है,इस क़द्र खाना कि जिस से मादा खराब हो जाएआलमा ने नाजायज़ लिखा है,तीसरे ख़ाहिशात पर कोई काबू नहीं जो चाहते हैं जिस वक़्त चाहते हैं खाते हैं,चौथे एक साथ कई कई किस्म के खाते हैं,पाँचवीं खाने में हलाल का लिहाज उठता जारहा है मुश्तबा तो मुश्तबा हराम से भी इजतिनाब नहीं करते,दावतों का शौक इस क़द्र ग़ालिब है कि बहुत से बग़ैर दावत के ही चले जाते हैं,आज कल आम शादियों और विलेमों की दावतें निहायत पर तकल्लुफ़ खा नों पर मुश्तमिल हो ती हैं जो अक्सर फख्र वरिया और नाम वनमूद या मजबूरी पर मबनी होती हैं, उन में खाने वाले बड़ी बे एतिदालयों से खाते हैं,सालन और रोटियां बर्बाद करते हैं ,अक्सरदावतों में मुहरमात होते हैं और अब तो इस मामले में इस क़द्र ज्यादती होती जा रही है कि अलएअमान वालहफ़ीज़।

छुट्टी ख़ास बात यह कि उन आदाब का भी लिहाज नहीं करते जो उलमा वफ़क़हा ने कुरआन

वहदेस की रोशनी में बयान फ़रमाए हैं मसला अक्सरबगैर हाथ धोए खाते हैं,खाने के आगाज़ में अक्सर बिस्म अल्लाह नहीं पढ़ते,सुन्नत के मुताबिक बैठ कर नहीं खाते,अक्सर मेज़ और कुर्सी प्रबल्कि अब तोजियादा तर खडे खडे खाते हैं,इसी तरह की बे एतिदालियां और खिलाफ़ सुन्नत काम मशरूबात में भी अपना रखे हैं,जो चीज़ चाहि जब चाहि ख़्वाह वह किसी के हाथ की बनी हुई हो पी लेते हैं,फिर हरवक्त मुँह में कहीं पान मसाला,कहीं तम्बाकू तो कहीं सिगरेट रहती है,बुज़ुर्गान दीन ने अपनी बातिनी कैफ़ीयतों केतहफ़्ज़ औररूहानी तरक्की के लिए कई तरह से एहतियात बरती एक तोग़ज़ा की मिक़दार में सुन्नत का पूरा पूरा लिहाज करते इतनी ही मिक़दार में खाते जितनी सुन्नत ने इजाजत दी है।

हदीस शरीफ़ में है:एक तिहाई पेट में खाना ,एक तिहाई में पानी और एक तिहाई सांस लेने के लिए छुड़दू।’’

दूसरे कई कई खाने एक साथ न खाये क्यों कि यह भी सुन्नत के खिलाफ़ है(हज़रत ख़्वाजा सय्यद नोरमुहम्मद बदायूनी क़ुद्दिस सिर्रहू तो सालन और सिरका भी एक साथ जमा न करते और उसे भी दो सालन का इजतिमा तसोर करते)तीसरे खाने के सामान निहायत हलाल ज़रिया से मुहैया करे लकड़ी और सामान ख़ुर्द वनोश में इस क़द्र एहतियात से काम ले कि इस से उपर मुतस्व्वर न हो,चौथे खाना पकानेमें इस क़द्र एहतियात कि हज़रत ख़्वाजा बाक़ी बिल्लाह देहलवी क़ुद्दिस सिर्रहू के यहाँ सख्त पाबंदी थी कि खाना बनाने वाला जब तक खाना बनाए बावुज़ू रहे और ज़िक्र हक़ से गाफिल न हो,पाँचवीं खाने में सुन्नत का पूरा लिहाज बरता जाता,छुटे बा वुज़ू खाना खाते,सातवें काफ़िरों और फ़ासिकों के हाथ की बनी हुई चीज़ खाने से परहेज़ करतेखास कर उन त्योहारों से मंसूब चीजें जैसे दिवाली की मिठाई वगैरह से पर हेज़ करते।

उन एहतियातों की वजह से उन के क़ुलूब तकदर,गंदगी और बातिनी ज़ुल्मतों से

महफूज़ रहते इसी लिए वह दावत आम को भी कबूल न करते अगर किसी मामला में उन से ज़र्रा बराबर बे एहतियाती हो जाती तो इस का असर उन के बातिन पर महसूस हो जाता,आम बाजारी खानों से भी वह परहेज़ करते क्यों कि इस से बातिन में ज़ुल्मत पैदा होती है और निस्बत कमजोर पड़ती है ,हम फक्र के बयान में क़दरे तफ़सील से अर्ज़ कर चुकेकि सय्यद आलम सिल्ली अ लिल्लाह अलैहि वसल्लम ने कभी भी ज़्यादा पेट भर कर खाना किसी के लिए पसंद नहीं फ़रमाया और न आप नेकभी खाया,तक़लील तआम ख़ुद रसूल अल्ला ﷺका पसंदीदा अमल है,सूफ़िया कराम रिज़वान अल्लाह अलैहिम अजमईन ज़्यादा खाने के नुक़्सानात से अच्छी तरह वाकिफ़ थे वह अपने सफ़ाए क़ल्ब की बुनियाद पर मामूली बे एतिदालयों की ज़ुल्मतों का भी इदराक कर लेते थे हज़रत मुजद्दिद क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाया करते थे कि ज़्यादा खाने की ज़ुल्मतें तहजद के वक़्त महसूस होती हैं।

हज़रत ख़्वाजा बुजुर्ग नक़्शबंद क़ुद्दिस सिर्रहू अक्सर औकात खाना पकाते और दस्तर ख़वान की ख़िदमत ख़ुद किया करतेथे और दरवेशों को बिलख़सूस वक़ूफ़ वहज़ूर का हुक्म देते ताकीदन,अगरचे दस्तर ख़वान पर बड़ा इजतिमा होता मगर जब उन में कोई गफलत से लुक़मा उठाता तो आप ब्राह शफकत आगाह फ़रमाते और लुक़मा खा ने न देते अगर खाना गुस्सा और कराहट से पक्का होता तो आप उसे न खाते और दरवेशों में से भी किसी को खाने न देते,एक दफ़ा का ज़िक्र है कि हज़रत ख़्वाजा, ग़द्योत में तशरीफ़ फ़रमा थे कि एक दरवेश ने आप की ख़िदमत में खा ना पेश किया,आप ने फ़रमाया: हमें यह खाना नहीं खाना चाहिए क्यों कि गुस्सा की हालत में पक्का या गया है,आटा छानने,खमीर करने और पकाने के वक़्त किसी में गुस्सा आया है,

अगर कोई शख्स गुस्से या कराहट की हालत में देग में मारता तो आप इस खाने को नहीं खाते और फ़रमाते कि जो काम गजब वग़फ़लत या कराहट विदुश्वारी में किया जाए इस में खैर वबरकत नहीं क्यों कि इस में नफ़्स विशैतान का दखल हो जा

ता है,इस से अच्छा नतीजा कैसे पैदा हो सकता है,आमाल सालहा और अफ़आल हसना के सदूर की बना हलाल तआम पर है और जो वक़ूफ़ व आगाही से खाया जाए तमाम औकात बिलख़सूस नमाज़ में हुज़ूर इसी से हासिल होता है।

हज़रत ख़्वाजा बाक़ी बिल्लाह रहमत अल्लाह अलैहि के एहतियात का हाल यह था की आप के पास जो भी ह्दय आता अगरचे बहकम हदीस‘‘नहन ला निर्द अलहदे’’(हम ह्दय रद्द नहीं करते) उसे रद्द न करते मगर उसे बिजनिसा अपने मसारिफ़ में न ला ते बल्कि किसी पाक मद से कर्ज हसना ले कर इस के इव्ज़ इस ह्दय को उसे दे देते।क्यों कि बहकम फ़िक़हा वह हलत में एक और दर्जा पैदा कर देता आप निहायत ताकीद फ़रमाया करते थे कि खा ना पकाने वाला बावुज़ू बल्कि साहिब हुज़ूर वस्फा हो और पक्का ते वक़्त दुनयवी बात ज़बान पर न लाये,आप फ़रमाया करते कि जो लुक़मा बग़ैर हुज़ूर वाहतियात के खा या जाए इस से एक धुआँ पैदा होता है जो फ़ैज़ के रास्तों को बंद करदेता है और अर्वाह तैबा जो फ़ैज़ का वसीला हैं ऐसे क़ल्ब के मुक़ाबिल नहीं होतीं।आप अपने मुरीदों को इस(मज़कूरा)एहतियात की तर ग़ैब देतेथे,जो लोग इस एहतियात में तसाहुली से काम लेते आप अपनी निस्बत की नज़ाकत व सफ़ाई की वजह से इस का नुकसान उन के हालात में मुआइना फ़रमा लेते।

चुनांचे एक रोज़ एक साहिब हाल विक्षफ़ दरवेश आप की ख़िदमत में आया,इस ने अर्ज़ किया कि में अपने का म में बस्तगी और बातिन में कदूरत पाताहों,मुझे मालूम नहीं कि मुझ से किया तक़सीर सरज़द हुई है,आप ने मुतवज्जा होकर फ़रमाया कि लुक़मा में बे एहतियाती हो गई है,इस ने अर्ज़ किया कि लुक़मा तो वही है जो में हररोज़ खायाकर्ता हूँ,आप ने फ़रमाया कि जा कर खूब दरयाफ्त करू हमें तो बजुज़ इस के कुछ नज़र नहीं आता लुक़मा के किसी जुज़ में जरूर फ़ुतूर आया होगा,जब इस दरवेश ने अच्छी तरह तफ्तीश की तो मालूम हुआ कि जिन लकड़ियों से खाना पकाया जाता था इस में से दोतीन

लकड़ियाँ ऐसी शामिल कर दी गई थीं जिस में एहतियात से काम न लिया गया था।

इसी तरह हज़रत ख़्वाजा सय्यद नूर मुहम्मद बदायूनी क़ुद्दिस सिर्रहू लुक़मा में निहायत एहतियात से काम लेते थे,अपने हाथ से कई दिन का खाना पक्का लियाकर्ते थे और भूक की शिद्दत के वक़्त इसी में से खा लिया करते,फ़रमाते थे कि तीन साल से तबीअत का ताल्लुक कैफियत ग़ज़ा से नहीं रहा ज़रूरत के वक़्त जो मिल जाता है खा लेते हैं,कमाल इत्तिबा सुन्नत के सबब आप दो सालन के इजतिमा को बिद्दत समझ किरएक साहबज़ादे को घी और दूसरे कुष्कर दिया करते थे,अमीरों के घर का खाना कभी न खाते क्यों कि यह अक्सर शुबह की ज़ुल्मत से खाली नहीं होता,एक दफ़ा किसी दुनियादार के घर से खाना आया तो आह ने फ़रमायाकि इस में ज़ुल्मत मालूम होती हैऔर ब्राह नवाजिश अपने ख़लीफ़ा मिर्जामज़हर जान जानां से फ़रमाया तुम भी इस खाने में गौर करू ,मिर्ज़ा ममदूह ने मुतवज्जा होकर अर्ज़ किया कि खाना वजह हलाल से है मगर रिया की नियत के सबब इस में कुछ ज़ुल्मत पैदाहोगई है।

नवाब मुकर्रम ख़ाँ जो हज़रत ख़्वाजा नक़्शबंद की औलाद से थे और हज़रत उरू अलौसका के मुरीद थे उन के खाने में बहुत तकल्लुफ़ात हुआ करते थे और हिदासराफ़ तक पहुँच जाया करते थे मगर हज़रत ख़्वाजा सय्यदनोरमुहम्मद बदायूनी क़ुद्दिस सिर्रहू बावजूद एहतियात और कमाल तक़्वा कियान का खाना कभी कभी बतौर तबरक खा लियाकर्ते और फ़रमाते कि उन के खा ने की बरकतों से इस क़द्र नूर बा तनी ज़िया दह होता है कि गोया हम ने खाया नहीं दौरकात नमाज़िपढ़ी है।अपने पीर की मुहब्बत के ग़लबा और अनिवार निस्बत के ज़ुहूर के सबब से नवाब मौसूफ़ की तमाम चीजें नूर हो गई थीं।

अगर आप(ख़्वाजा सय्यद नोरमुहम्मद बदायूनी) दुनिया दारों के घर से कोई किताब बतौर आरियत मंगवाते तो तीन दिन तक इस का मुताला न करते और फ़रमाते थे कि उन की सोहबत की ज़ुल्मत मसल ग़लाफ़ के इस पर लेटी रहती है,फिर जब आप की सोहबत

मुबारक की बरकत की वजह से वह ज़ुल्मत दौर हो जाती तो मुताला फ़रमाते,इसी तरह आप के मुरीद वख़लीफ़ा वजानशीन हज़रत मिर्ज़ा मज़हर जान जानां शहीद देहलवी क़ुद्दिस सिर्रहू भी अमीरों के घर का खाना नहीं खाते और फ़रमाते थे कि उन लोगों के खाने की ज़ुल्मत बातिनी निस्बत को मुकदर कर देती है इसी वजह से कहा गया है‘‘शर अलतआम तआम अलाग़निया’’(सब से बुरा खाना अमीरों का खाना है) बल्कि गरीबों की ज़याफ़त कबूल करने में भी तामिल किया करते थे बदें ख़याल कि लोग बोजह बे सर्वसामानी सौदी कर्ज़ा ले कर ज़याफ़त करते हैं।(तज़किरा मशाइख़ नक़्शबंदिया)।