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अध्याय 48 में से 54पृष्ठ 579–591

इक़साम ग़ीबत

फ़िक़्ह हनफ़ी की मशहूर विमारूफ़ किताब ‘बिहारशरीअत’ में भी मज़कूरा बाला सूरतों में अक्सर बयान हुई हैं और उन की हुरमत भी बयान हुई है, मज़कूरा किताब से चंदमिसाइल दर्ज जेल हैं (1)फ़क़ीह अबवाललीस ने फ़रमाया कि ग़ीबत चार किस्म की है एक कुफ्र इस की सूरत यह हैकि एक शख्स ग़ीबत कररहा है इस से कहा गया ग़ीबत न करू, कहने लगा कि यह ग़ीबत नहीं में सच्चा हूँ,इस शख्स ने एक

हराम क़तई को हलाल बताया,दूसरी सूरत नफ़ाक़ है कि एक शख्स की बुराई करता है और इस का नाम नहीं लेता है मगर जिस के सामने बुराई करता है वह इस को जानता पहचानता है लिहाज़ा यह ग़ीबत करता है और अपने को पर हेज़गारजाहिर करता है यह एक किस्म का नफ़ाक़ है,तीसरी सूरत मासियत है वह यह कि ग़ीबत करता है मगर यह जानता है कि हराम काम कररहाहै ऐसा शख्स तौबा करे,चौथी सूरत मुबाह है वह यह कि फ़ासिक़ मालन या बदमजहब की बुराई बयान करे जब कि लोगों को इस के शर से बचाना मकसूद हो तो सवाब की उम्मीद है।

(2)जो शख्स अलानिया बुरा काम करता है और इस को इस की कोई प्रवाह नहीं कि लोग उसे किया कहीं गे तो इस की बुरी हरकत को बयान करना ग़ीबत नहीं मगर इस की दूसरी बातें जो ज़ाहिर नहीं हैं उन को बयान करना ग़ीबत है,हदीस शरीफ़ में है कि जिस ने रिया का हिजाब अपने चेहरे से हटादिया इस की ग़ीबत नहीं।

(3)जिस से किसी बात का मश्वरा लिया गया है वह अगर इस शख्स काएब वबराई ज़ाहिर करे जिस के मुताल्लिक़ मश्वरा है यह ग़ीबत नहीं,हदीस शरीफ़ में है जिस से मश्वरा लिया जाए वह अमीन है लहज़ा इस की बुराई ज़ाहिर न करना खयानत है मसलन किसी के यहाँ अपना या अपनी औलाद वगैरह का निकाह करना चाहताहै,दूसरे से इस के मुताल्लिक़ तज़किरा किया कि मेरा इरादा ऐसाहे तुम्हारी किया राय है,इस शख्स को जो कुछ मालूमात हैं बयान करदेना ग़ीबत नहीं,इसी तरह किसी के साथ तिजारत वगैरह में शिरकत करना चाहता है या इस के पास कोई चीज़ अमानत रखना चाहता हैया किसी के पड़ोस में सुकूनत करना चाहता है इस के मुताल्लिक़ दूसरे से मश्वरा लेता है,यह शख्स इस की बुराई बयान करे ग़ीबत नहीं।

(4)एक सूरत जवाज़ की यह भी है कि इस के ज़िक्र से मकसूद इस की बुराई नहीं बल्कि इस शख्स की मार्फत विष्णाख्त मकसूद है मसला जो शख्स उन उयूब के साथ

मुलकब है तो मकसूद मार्फत है न बयान ऐब जैसे आमा,आमश,आर्ज,अहौल।सहाबा कराम में हज़रत अबदुल्लाह इब्न उम मुक्तूम नाबीना थे और रिवायतों में उन के नाम के साथ आमा आता है,मुहद्दिसीन में बड़े जबरदस्त पाया के सुलेमान आमश हैं ‘आमश’ के माना चुंधे के हैं यह लफ़्ज़ उन के नाम के साथ ज़िक्र किया जाता है,इसी तरह यहाँ भी बाज़ मर्तबा महज़ पहचानने के लिए किसी को अंधा या काना या ठगना या लंबा कहा जाता है यह ग़ीबत में दाखिल नहीं।

(5)हदीस के रावियों और मुकदमा के गवाहों और मुसन्निफ़ीन पर जिरह करना और उन के उयूब बयान करना जायज़ है अगर रावियों की खराबियां बयान न की जाएँ तो हदीस सही और गैर सही में इमतियाज़ न हो सके गा इसी तरह मुसन्निफ़ीन के हालात न बयान किए जाएँ तो कुतुब मोतमिदा और गैर मोतमिदा में फ़र्क़ न रहे गा,गवाहों पर जिरह न की जाए तौहुक़ूक़ मुसलमीन की निगाहदाशत न हो सके गी।

(6)किसी की बुराई इस के सामने करना अगर ग़ीबत में दाखिल न हो जब कि ग़ीबत में पीठ पीछे बुराई करना मोतबर हो मगर यह इस से बढ़ कर हराम है क्यों कि ग़ीबत में जो वजह है वह यह है कि ईज़ाए मुस्लिम है वह यहाँ बदरजा औला पाई जाती है,ग़ीबत में तो यह एहतिमाल है कि उसे इत्तिला मिले या न मिले अगर उसे इत्तिला न हुई तो यह ईज़ा भी न हुई,मगर एहतिमाल ईज़ा को यहाँ ईज़ा करार दे कर शरा मुतहर ने हराम किया और मुँह पर तो इस की ख़िदमत करना हक़ीक़ी ईज़ा है फिर क्यों न यह हराम हो।

(7)जिस की ग़ीबत की अगर इस को खबर होगई तो इस से माफी मांगनी ज़रूरी है और यह भी ज़रूरी है कि इस के सामने कहे कि में ने तुम्हारी इस तरह ग़ीबत या बुराई की है तुम माफ़ कर्दो ,इस से माफ़ किराये और तौबा करे तब इस से बुरी उलज़िम्मा होगा,और अगर उसे खबर न हुई तो तौबा विंदामत काफ़ी है।मज़ेद तफ़सील के लिए किताब मज़कूर देखें।

असबाब ग़ीबत

हज़रत इमाम ग़ज़ाली क़ुद्दिस सिर्रहू ने समेट कर ग्यारह इसबा ब ग़ीबत बयान फ़रमाए हैं,जिन में आठ आम लोगों में और तीन अहले दीन और ख़वास के साथ मख़सूस हैं।

(1)गुस्सा निकालना क्यों कि गुस्सा आने पर इस की बुराइयों का ज़िक्र करके इंसान अपने गुस्सा को ठंडा करता है(2)दोस्त अहबाब की मुआफ़िक़त होती है कि उन की हां में हाँमलाई जाए(3)ग़ीबत करने वाला समझता है कि वह आदमी अन्क़रीब इस के पीछे पड़े गा और किसी बड़े इज्जत दार अदमी के सामने इस की बुराई बयान करके उसे ज़लील करेगा या इस के खिलाफ़ गवाही दे गा तो यह इस से पहले ही इस की बुराई शुरू करदेता है ताकि इस की गवाही बे असर हो जाऐया शुरू में इस के बारे में सच्ची बात कहता है और फिर झूट बोलना शुरू करदेता है तो इस तरह इब्तिदा सच बोल कर झूट के लिए रास्ता हमवार करता है और कहता है कि झूट बोलना मेरी आदत नहीं है में तो फलां शख्स के हालात से तुम लोगों को आगाह कर रहा हूँ,वह इसी तरह है जिस तरह में कहता हूँ।

(4)जब कोई इस की तरफ़ झूट मंसूब करता है तो वह अपनी ब्रायत ज़ाहिर करने के लिए कहता है कि फलां ने भी यह काम किया हालाँकि उसे तो सिर्फ़ अपनी ब्रायत बताना चाहिए दूसरे का अमल ज़िक्र करने की ज़रूरत न थी और न ही इस की तरफ़ निस्बत करनी चाहिए थी या वह यों कहता कि फलां शख्स भी इस काम में मेरे शरीक था ताकि अपनी तरफ़ से उज़्र पेश करसकता।

(5)तसना और दूसरों पर फख्र करना है,वह दूसरों का ऐब बयान करके अपने आप को बुलंदी की तरफ़ ले जाना चाहता है,वह कहता है फलां शख्स जाहिल है इस की समझ नाक़िस है और कलाम कमजोर है इस का मक़सद यह होता है कि वह इस के ज़िमन में अपनी बड़ाई बयान करे और दिखाए कि वह सब से ज़्यादा इल्म रखता है या इस को डर होता

है कि कहीं इस दूसरे शख्स की ताज़ीम भी इसी तरह न की जाए जिस तरह इस की होती है इस लिए वह नुक्ता चीनी करता है।(6)छटा सबब हसद है(7)सातवां सबब खेल,मजाक,खुश मिज़ाजी और हँसी मजाक में वक़्त गुज़ारना होता है पस यह दूसरे के ऐब ज़िक्र करता है और नकल उतारता है ताकि लोग हँसीं और यह तकबर और ख़ुद पसंदी के लिए होता है।(8)आठवां सबब तमसख़र और मजाक करना और इस को हक़ीर जानना है।

वह तीन असबाब जिन का ताल्लुक अहले दीन और ख़वास से है वह यह हैं(9)दीन के बाइस किसी की बुराई और खता पर इस का रद्द करके ख़ुद पसंदी का इज़हार करते हुए कहता है में नेफलां आदमी में बहुत अजीब बात देखी है, बाज़ औकात वह इस बात में सच पर होता है और बुराई पर इस का ताजब करना सही है लेकिन उसे चाहिए था कि वह किसी का नाम न लेता ताकि ग़ीबत का मुर्तक़िब न होता।(10)रहमत है यह यों कि कोई शख़्स किसी बात में मुबतला हो तो यह इस पर ग़मगीन होता है और कहता है कि फलां बे चारे के मामले और आज़माइश ने मुझे ग़मगीन करदियाहै वह इस दावा में सच्चा होता है लेकिन वह इस का नाम लेने से परहेज़ नहीं करस्का इस लियोह ग़ीबत का मुर्तक़िब हुआ।(11)यह कि अल्लाह तआला के लिए गुस्सा आये क्यों कि बाज़ औकात जब किसी को बुराई करते देखता है या संता है तो उसे गुस्सा आता है और वह इज़हार गुस्सा के वक़्त इस का नाम लेता है उसे चाहिए था कि वह इस का नाम न लेता और बुराई के साथ इस का ज़िक्र न करता।

ग़ीबत से बचने का तरीका

तमाम बुरी आदतों का इलाज इल्म वामल के माजून से किया जाता है और हर बीमारी का इलाज इस के सबब की ज़िद से होता है लिहाज़ा सबब तलाश करना चाहिए,ग़ीबत से रोकने के दोतरीक़े हैं एक इजमाली और दूसरे तफ़सीली अव्वल यह कि वह सोचे कि किसी शख्स की इज्जत के पीछे पड़ने से अल्लाह तआला नाराज हो जाता है और इस सिलसिले में वह रवायात बार बार पढ़े जिन का ताल्लुक ग़ीबत से

है नीज़ यह भी याद रखे कि ग़ीबत की वजह से बरोज़ कयामत इस की नेकियां ज़ाए हूँ गी क्यों कि नेकियां इस को दिलवा दी जाएँ गी जिस की इस ने ग़ीबत की है और यह इस बात का बदला है जो इस ने इस की इज्जत पर हमला किया है,अगर नेकियां न होतीं तो दूसरे के गुनाह इस पर डाल दीये जाएँ गे,अल्लाह तआला की नाराजगी फिर भी बरकरार रहे गी।

ग़ीबत से बचने का तफ़सीली इलाज यह है कि वह इस सबब को तलाश करे जो ग़ीबत का बाइस बना है,क्यों कि बीमारी के इलाज के लिए ज़रूरी है कि इस के सबब को ख़त्म करना पड़ता है,असबाब का ज़िक्र यहाँ हो चुका है मज़ेद तफ़सील के लिए अहया उलउलूम शरीफ़ जिल्द सोम का मुताला करें।

हज़रत ख़्वाजा बाक़ी बिल्लाह क़ुद्दिस सिर्रहू का तरीका हसना: हज़रत ख़्वाजा बाक़ी बिल्लाह क़ुद्दिस सिर्रहू का तरीका हसना यह था कि जब कोई आप के सामने ग़ीबत करता तो आप इस की तारीफ़ शुरू करदेते इस तरह ग़ीबत करने वाला शर्मिंदा हो जाता और आइंदा इस की ग़ीबत की हिम्मत न पड़ती,आप का यह अमल ग़ीबत से बचने के लिए निहायत लायक तक़लीद है, इस से अपनी भी हिफाज़त होती है और अपने मुस्लिम भाई की इज्जत वाबरू की हिफाज़त होती है,और ग़ीबत करने वाले की नसीहत भी होजाति है और उसे फेअल हराम से बचाना भी हो जाता है।

चुग़ुल ख़ोरी

ग़ीबत की तरह चुग़ुल ख़ोरी भी हराम है और कुरआन वसंत में इस की मुज़म्मत आई है,चंद आयात वाहादीस मुलाहिजा हूँ।

आयात:

ہَمَّازٍ مَّشَّآءٍۭ بِنَمِیۡمٍ (سورۃ القلم: ۶۸؍۱۱))

बहुत नुक्ता चेन चुगलियां खाने वाला।’’

इसी मैन है:

अतـलۭ बाद ज़ालिक ज़नीۡـम (सूरत उलक़लम: 68/13)

अकड़ मिजाज है और इस के अलावा बद असल भी है।’’

हज़रत अब्द अल्लाह बिन मुबारक रज़ि अल्लाह तआला अन्हु फ़रमाते हैं ज़नीम से मुराद वह शख्स है जो अपने बाप का न हो और बात को न छिपाए इस में इस तरफ़ इशारा है कि जो बात को नहीं छुपाता और चुगली खाता है तो यह इस के वल्द अल्ज़िना होने की दलील है।

(2) وَیۡلٌ لِّکُلِّ ہُمَزَۃٍ لُّمَزَۃِ (سورۃ الہمزہ: ۱۰۴؍۱)

हर इस शख्स के किए हलाकत है जो ताने देने वाला और पीठ पीछे ऐब जोई करने वाला है।’’

कहा जाता है कि हमज़ा से बहुत ज़्यादा चुगली खाने वाला मुराद है।

अहादीस: हदीस शरीफ़ में है:

(1)ला यद्खल अलजन नमाम यानी चुग़ुल ख़ौर जन्नत में नहीं जाए गा(मसंदाहमद)

(2)ला यद्खल अलजन क़ितात चुग़ुल ख़ौर जन्नत में नहीं जाए गा।

(3)हज़रत अबू हुरीरा रज़ि अल्लाह अन्हु रावी हुज़ूर सर्वर कोनेन ﷺ फ़रमाते हैं: तुम में अल्लाह तआला के सब से ज़्यादा पसंदीदा वह लोग हैं जिन के अख़लाक़ अच्छे हैं,दूसरों के लिए अपने बाजू बिछाने वाले वह दूसरों से और दूसरे उन से उलफ़त रखते हैं और बे शक तुम में सब से ज़्यादा बुरे और मबगौज़ अल्लाह तआला के नज़दीक वह हैं जो चुग़ुल ख़ोरी करते हैं,मुसलमान भाइयों के दरमियान इख़तिलाफ़ डालते हैं और बे गुनाह लोगों के लिए इल्ज़ामात तलाश करते हैं"।(कंज़ उलअमाल)

(4)आप अलैहि अस्सलात वस्सलाम ने फ़रमाया: और किया में तुम्हें तुम में से बुरे लोगों के बारे में न बताओं?अर्ज़ किया गया हां या रसूल अल्लाह! ( ﷺ) फ़रमाया वह लोग जो चुगली खाते हैं,दोस्तों में फसाद डालते हैं और बे ऐब लोगों में ऐब तलाश करते हैं।(मसंद इमाम अहमद)

(5)हुज़ूर ﷺदूकब्रों के पास से गुज़रे,फ़रमाया: उन दोनों कब्रों

वालों को अज़ाब हो रहा है और किसी मुश्किल चीज़ में अज़ाब नहीं हो रहा है बल्कि उन में से एक चुगली खाता था और दूसरा पेशाब से नहीं बचता था,फिर आप ने खजूर की टहनी ली और इस के दो हिस्से किए एक को एक पर और दूसरे को दूसरी कब्र पर डाल दिया औरफ़रमाया जब तक यह खुश्क नहीं हो M गी अज़ाब में तख़फ़ीफ़ रहे गी।(बुखारी वगैरह)

चुगली की तारीफ़: जिस बात को ज़ाहिर करना नापसंदीदा हो उसे ज़ाहिर करना चुगली हैचाहे वह जिस से मनक़ूल हैया जिस की तरफ़ नकल की गई हो वह उसे पसंद न करे या कोई तीसरा आदमी ना पसंद करे फिर वह इज़हार ऐब या कौल वफाल विगुफ्तगू के ज़रिया हो या किताबत के ज़रिया या इशारे के तौर पर हो,जो कुछ नकल किया गया है वह अमल हो या बात जिस से नकल की गई वह इस में पाया जाने वाला ऐब या नुक़्स हो या न हो, ख़याल रहे अगर वाक़्यता वह ऐब इस में है तो सिर्फ़ चुगली का गुनाह होगा और अगर वह इस में न हो या कुछ है और इस ने अपनी तरफ़ से कुछ मिलावट करदी है या गलत अंदाज़ और बुरे तरीके से नकल किया गया तो यह इफ़्तिरा वबोहतान भी है जो ख़ुद कबीरा गुनाह है और जिस की तरफ़ से नकल किया है अगर इस का इज़हार मकसूद है तो ग़ीबत भी है।

चुगली का बाइस

हज़रत इमाम क़ुद्दिस सिर्रहू फ़रमाते हैं चुगली का बाइस या तो इस के बारे में बुरा इरादा होता है जिस की चुगली करता है या इस शख्स से इज़हार मुहब्बत मक़सद है जिस से चुगली कररहा है,या चुगली करने वाला फिजूल और बातिल में मशगूल हो कर खुश होता है,जिस के सामने चुगली की जाए इस के लिए चंद बातें लाज़िम हैं(1)वह चुग़ुल ख़ौर की तस्दीक न करे क्यों कि चुग़ुल ख़ौर फ़ासिक़ होता है और इस की गवाही मर्दूद है,इरशाद बारी तआला है:

یٰۤاَیُّہَا الَّذِیۡنَ اٰمَنُوۡۤا اِنۡ جَآءَکُمْ فَاسِقٌۢ بِنَبَاٍ فَتَبَیَّنُوۡۤا اَنۡ تُصِیۡبُوۡا قَوْمًۢا بِجَہَالَۃٍ فَتُصْبِحُوۡا عَلٰی مَا فَعَلْتُمْ نٰدِمِیۡنَ (سورۃ الحجرات: ۴۹؍۶)

ए ईमान वालो ! अगर तुम्हारे पास फ़ासिक़ कोई खबर लाये तो इस की तस्दीक करलिया करू कहीं जहालत की वजह से तुम किसी कौम को नुकसान न पहुँचाओ।

(2)उसे इस बात से मना करदे,नसीहत करे और इस के सामने इस अमल की बुराई बयान करे। इरशाद ख़ुदावंदी है:

وَاۡمُرْ بِالْمَعْرُوۡفِ وَانْہَ عَنِ الْمُنۡکَرِ (سورۃ لقمان: ۳۱؍۱۷)

नेकी का हुक्म दो और बुराई से रोको।’’

(3) अल्लाह तआला की रज़ा जोई के लिए इस से बुग़ज़ रखे और अल्लाह तआला के लिए जिस से बुग़ज़ होना चाहिए इस से बुग़ज़ को पसंद करे।

(4)अपने गायब भाई के बारे में बद गुमानी न करे,इरशाद रब्बानी है:

اجْتَنِبُوۡا کَثِیۡرًا مِّنَ الظَّنِّ ۫ اِنَّ بَعْضَ الظَّنِّ اِثْمٌ (سورۃ الحجرات: ۴۹؍۱۲)

बहुत से गुमानों से बच्चो! बेशक बाज़ गुमान गुनाह हैं।’’

ख़याल रहे बद गुमानी इसी तरह हराम है जिस तरह ज़बान से बुराई करना हराम है,इस के हराम होने की वजह यह है कि दिल के भेदों को सिर्फ़ अल्लाह तआला जानता है और जब तक किसी शख्स की बुराई तुम इसी तरह ज़ाहिर न देखो कि इस में तावेल की गुंजाइश न रहे इस वक़्त तक इस के बारे में बुराई का अक़ीदा न रखो,क्योंकि जिस बात को न तुम ने आंखों से देखा ,न कानों से सुना फिर वह तुम्हारे दिल में आगई तो यह शैतान ने डाली हैलिहाजा उसे झुठलाना चाहिए,आज कल यह मर्ज बहुत आम है और अवाम वख़वास सभी इस का शिकार हैं,बड़ी कमी यह है कि कहने वाला कैसा ही हो कितना ही बड़ा झोटा ,इफ़्तिरा बाज़,निहायत ही गैर जिम्मा दार हो वह कैसी ही बात नकल करदे बुला चवन विचरा आदमी कबूल करलेता है,ख़ास कर जिन से बुग़ज़ विकीना हो।

आज कल तावीज़ गुंडे वाले भी बहुत बद गुमानियों का सबब बने हुए हैं,तहसील माल वुज़र की खातिर बुला तहक़ीक़ बल्कि जान बोझ कर झूट बोलते रहते हैं और

लोगों को यह बताते रहते हैं कि तुम्हारे उपर जादू किराया है या यह किराया है वह किराया है और आदमी इस को बहुत जिल्द कबूल करलेता है और उन को दुश्मन समझने लगता है जिन के बारे में यह तावीज़ वाले निशानदेही करते हैं कि फलां ने करादिया है।

ख़याल रहे सोये ज़न या बद गुमानी की अलामत यह है कि इस के बारे में तुम्हारी कलबी हालत बदल जाए और तुम्हें इस से कुछ नफरत हो जाए,अब तुम इस को एक बोझ समझो,इस की रियायत और इकराम वगैरह में सस्ती पैदा होजाए,हदीस शरीफ़ में है कि मोमिन में तीन बातें ऐसी हैं कि उन से निकलने का रास्ता मौजूद है,बदगुमानी से निकलने का रास्ता यह है कि उसे पक्का न होने दे यानी अपने दिल में उसे जगह न दे न किसी अमल के ज़रिया इस का इज़हार करे और न आज़ा को इस के साथ पक्का करे।

(5)जो कुछ तुम्हारे सामने बयान हो अ इस की तहक़ीक़ विजस्तजू में न पड़ो इरशाद ख़ुदावंदी है:

व ला तजस्तुसोۡअ (सूरत उलहजुरात: 49/12)

और दूसरे के हालात की तलाश न करू।’’

(6)जिस चुगली से तुम्हें रोका गया है उसे अपने लिए पसंद न करू और इस की चुगली को आगे न बढ़ाव मसला यों न कहू कि फलां ने मुझ से यह बयान किया है,इस सूरत में तुम ख़ुद चुग़ुल ख़ौर और ग़ीबत करने वाले बिन जाओगे।

दौरख़ी:ऐसा शख्स जो ऐसे दुआदमियों के पास जाता है जो एक दूसरे के दुश्मन हैं औरहर एक से इस के माफ़िक़ बात करता है,ऐसा बहुत कम होता है कि कोई शख्स दो अदावत रखने वालों से मिले और इस किस्म की गुफ़्तगू न करे हर एक के माफ़िक़ बात करना ही दो रुख़ी है और यह बईना मुनाफ़क़त है,हज़रत अम्मार बिन यासुर रावी नबी अकर्म ﷺने फ़रमाया:

(1)दुनिया में जो शख्स दो चेहरों वाला होता है कयामत के दिन इस की दोजबानें आग की हूँ गी।(अब्बूदाऊद)

(2)कयामत के दिन तुम इस शख्स को सब से बुरा आदमी पाओगे जिस के दौचहरे हैं उन लोगों से और बात करता है और उन लोगों से दूसरी बात(बुखारी)

मदह सराई

अपनी तारीफ़ पसंद करना और इस का ख़ाहां रहना यह मर्ज भी बहुत आम है और बहुत फसाद का सबब बना हुआहे,जरा भी इल्म वाज़त हासिल है और किसी बात में किसी ख़ास रसाई का हामिल है तो वह हरवक्त अपनी मदह की ख्वाहिश करता है और अगर हसब ख्वाहिश मदह न की जाए तो नाराज औरबुग़ज़ विकीना का शिकार होता है,मदह न करने वालों की बुराइयां करता है।वाइजीन विमक़ररीन और उलमा विमशाइख़ में यह वबा बहुत आम है,आम जलसों में निज़ामत करने वालों ने हरेक की तारीफ़ वितौसीफ़ में इस क़द्र मुबालग़ा शुरू करदिया है कि बयान से बाहर है,अब ऐसे नाज़िम तो नज़र ही नहीं आते जो किसी कासहीह तआरुफ़ क्रास कीं और वाक़ई औसाफ़ विकमालात और खूबियों से लोगों को आगाह करसकें,उलमा विमक़ररीन और मशाइख़ जो मनबरों पर होते हैं उन का हाल यह है कि अगर अलक़ाब में जरा कमी होगई या बहुत ज़्यादा मुबालग़ा से काम न लिया गया तो फोरा दिल में नाराज होजाते हैं और पीछे शिकायतें करते हैं,यह आम रोष हो गई है कि जो इल्म वामल से कोरे हैं उन्हें अल्लामा वगैरह कहा जाता है और हर पीर ताजदार विलायत,सोफी बासफ़ा,कुतुब ज़माँ,उमद अलसल्फ़ और हज उलख़लफ़ वगैरह है, हर एक चाहता है कि हमारा तआरुफ़ बहुत ,मुबालग़े के साथ हो,हैं जमीन मगर चाहते हैं कि उन्हें आसमान और अर्श बताया जाए,हसब मंशा तारीफ़ न हुई या इस्तिकबाल और नारों में कोई कमी रह गई तो पता नहीं किस फ़ित्ने का शोशा छोड़दें।

अल्लाह अकबर एक ज़माना था कि शरह जामी में हज़रत इब्न हाजिब को अल्लामा कह दिया तो

मिला असाम रहमत अल्लाह अलैहि ने एतराज करदिया कि अल्लामा तो वह है जो उलूम मनक़ूल और माकूल दोनों का जामा और दोनों में माहरहो और इब्न हाजिब दोनों में इस तरह की महारत और हज़ाक़त नहीं रखते थे और अब हाल यह है कि जाहिल और दीन से नावाकिफ़ भी अल्लामा से कम पर राजी नहीं, बल्कि अब तो अल्लामा भी उन के लिए कोई अहम नहीं रहा,हैरत की बात यह कि जो तारीफ़ करते हैं वह भी जानते हैं कि उन में वह औसाफ़ नहीं जिन के साथ तारीफ़ की जारही है और जिन की तारीफ़ की जारही है वह भी जानते हैं कि हम में यह औसाफ़ नहीं,हुज़ूर कोनेन ﷺ ने तो कभी यह पसंद नहीं किया कि महज़ गुमान की बुनियाद पर किसी वस्फ़ के साथ तारीफ़ हो,बल्कि आप ﷺ हमेशा यह चाहते हैं कि इस के उन्हें औसाफ़ का ज़िक्र हो जिन को ज़िक्र करने वाला यकीन से जानता हो बल्कि किसी शख्स में वाक़्यतन वह खूबियां होतीं जिन को तारीफ़ करने वाला बयान कर रहा है तब भी इस तारीफ़ को भी पसंद नहीं फ़रमाते,क्योंकि मुँह पर तारीफ़ अक्सर इंसान को खुश फ़हमियों और अजब में मुबतला करती है।बुखारी वगैरह में है कि एक बार हुज़ूर ﷺने कुछ माल तकसीम किया औरएक साहिब को नहीं दिया रावी कहते हैं कि में जानता था कि जिन को नहीं दिया वह मोमिन हैं उन्हें गुमान हुआ कि शायद नबी अकर्म ﷺउन्हें मोमिन नहीं जानते,उन्हों ने किस्म खा कर कहा कि में उन को मोमिन जानता हूँ,हुज़ूर अकर्म ﷺने फ़रमाया:बल्कि मुस्लिम कहू,तीन बार ऐसा ही हुआ मतलब यह था कि ईमान का ताल्लुक क़ल्ब से है और क़ल्ब की कैफियत को तुम यकीन से नहीं जानते हो तुम ने ज़ाहिरी इताअत देखी लिहाज़ा तुम मुस्लिम होने का हुक्म लगाव। आप ﷺका मक़सद ईमान की नफ़ी नहीं थी बल्कि बताना यह था कि तुम जितना यकीन से जानते हो इतना ही कहू,ख़याल रहे कि पूरी हदीस बुखारी वगैरह में है हम ने सिर्फ़ इतना हिस्सा ज़िक्र करदिया जो इस मक़ाम से ताल्लुक रखता था, इस तरह की और बहुत सी रवायात हैं।

मुज़म्मत: मुबालग़ा के साथ मदह के बारे में नबी अकर्म ﷺ फ़रमाते

हैं(1)और जब तुम मुबालग़ा के साथ तारीफ़ करने वालों को देखो तो उन के मुँह में खाक डाल दो।(तबरानी)

(2)हज़रत अबूमूसा अशेअरी रज़ि अल्लाह अन्हु रावी कि नबी क्रीम ﷺने एक शख्स को सुना कि दूसरे की तारीफ़ करता है और तारीफ़ में मुबालग़ा करता है,इरशाद फ़रमाया: तुम ने उसे हलाक करदिया या इस की पीठ तोड़दी।(बुखारी)

(3)हज़रत अबू बकरह रज़ि अल्लाह अन्हु रावी कि नबी क्रीम ﷺके सामने एक शख्स ने एक शख्स की तारीफ़ की,हुज़ूर ﷺने फ़रमाया तुझे हलाकत हो तो ने अपने भाई की गर्दन काट दी,इस को तीन मर्तबा फ़रमाया,जिस शख्स को किसी की तारीफ़ करनी ज़रूरी ही हो तो यह कहे कि मेरे गुमान में फलां ऐसा है अगर इस के इल्म में हो कि फलां ऐसा है और अल्लाह इस को खूब जानता है और अल्लाह पर किसी का तज़किया न करे यानी जज़्म वीक़ीन के साथ किसी की तारीफ़ न करे।(बुखारी विमुस्लिम)

(4)हज़रत इंस रज़ि अल्लाह अन्हु रावी कि रसूल क्रीम ﷺ ने फ़रमा या जैसे फ़ासिक़ की मदह की जाती है,रब तआला गजब फरमाता है और अर्श इलाही हिलने लगता है।(बेहक़ी)