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Allama Afaque Ahmad Mujaddidiबह्र उल-इरफ़ान: समात व जहातऐसा कहां से लाएं कि तुझ साकहीं जिसे

अध्याय 57 में से 65पृष्ठ 384–389

ऐसा कहां से लाएं कि तुझ साकहीं जिसे

आलिमा सालहा सिद्दीक़ा दुख़तरहुज़ूर बहरालारफान*

नहमदा विंसली विंसलम अला हबीबा उलक्रीम

13जुलाई बरोज़ सनेचर का सूरज एक कयामत ख़ेज़,दर्दनाक और तार तनफ़स को झनझुना ने देने वाली खबर ले कर तलूअ हुआ जिस की खूनी किरणों ने जाने कितनी आंखों को न सिर्फ़ अशकबार बल्कि खों बार बनादिया, इस जानकाह खबर को सन कर कलेजे मुँह को आने लगे,साँसों की लड़ियां बिखरने लगीं,ग़शी व बेहोशी अपने पंजे गाड़ने लगी औरनाला वफ़रियाद,आह व बिका,चीखें और सिसकियाँ कयामत का मंज़र पेश करने लगीं क्योंकि यह खबर मेरे अब्बा हुज़ूर,मेरे शैख़ व मुरब्बी,मेरे मावा व मिलजा, मेरे हादी व रहनुमा,सफ़ीना हयात के किश्तेबां,चमनिस्तान ज़ीस्त के बाग़बाँ के अ स दार फना से दार बका की तरफ़ कोच करने की थी।

इस हादसा उज़्मा ने हमारे सुरों पर हमारेप्यारे अब्बा जान की शफक़तों औरमुहब्बतों की तनी हुई चादर के टुकड़े टुकड़े कर दिए,हमें किया पता था कि आज का तलूअ होने वाला सूरज हमारी सारी खुशियाँ ले डूबे गा,हमारे अरमानों का चिराग गुल और ख़िरमन आरज़ूको खास्त्र करदे गा।

हमारे प्यारे अब्बा जान हम बहनों से तसल्ली के ऐसे जुमले बोलते थे कि हमें हमारे प्यारे नबी ﷺ की अपनी प्यारी शहजादी ख़ातून जन्नत रज़ि अल्लाह अनहासे मुहब्बत की याद ताजे होजाया करती थी,में ने होश संभालने से ले कर अब तक अपने वालिद को कोई काम खिलाफ़ सुन्नत करते हुए नहीं देखा,क़ुर्ब कयामत के इस दौरमें जबकि लोग बेटियों के वजूद ही से मुतनफ़र हैं हमारे अब्बा जान ने अपनी बेटियों से टूट कर मुहब्बत करने की सुन्नत को भी अदा किया,आप कभी हम लोगों का नाम ले कर नहीं बुलाते बल्कि जब भी बुलाते लफ़्ज़ बिटिया के ज़रिया बुलाते जब आप की ज़बान हक़ तर्जुमान से यह शीरीं लफ़्ज़ निकलता तो हमें ऐसा लगता कि न सिर्फ़ हमारे कानों में रस घुल गया बल्कि यों भी महसूस होता कि जैसे मुहब्बतों और शफक़तों की पैहम लहरें हमारी तरफ़ आ रही हैं जिस में हम बहनें ग़ोता ज़िन हो कर हम व हज़न से परे किसी ऐसी दुनिया में पहुँच गए कि जहां बस लाड़ ही लाड़ है,शफकत ही शफकत है और मामता ही मामता है।

अज़ान फ़ज्र से क़ब्ल जबकि मुर्ग़ भी खामोश होताहै इस वक़्त हमारे कानों में इस ताइर लाहूती की

सदा आती‘‘बिटिया उठो’’ यह सदाए दिलनवाज़ सुनते ही ऐसा लगता जैसे हमारे दिल व दिमाग ज़मज़म से वुज़ू करके मेहराब हरम में सजदा रेज़ हो गए हूँ,चंद मिनट की चहल पहल के बाद पूरा घर बेदारहो कर वह सारे का म करने लग जाता जिस की तरबीयत हमारे अब्बा हुज़ूर ने की थी।

मुझे मेरे बचपन का वह दिन आज भी याद है कि जब में सौ कर उठी तो कुछ खाने का जी चाहा में ने प्यारी अम्मी जान से हाल दिल कह सुनाया,भला हमारी अम्मी ना कब करतें बजाहिर कोई सामान न होने के बा वजूद भी उन्हों ने कहा कि जाओ और जो कुछ मिले उसे खा लो,मगर अब्बा जान को तो दौरे पर गए हुए काफ़ी दिन हो गए थे इस लिएमन चाहा कोई सामान नहीं मिल सिक्का,आखिर में मायूस हो कर अम्मी जान से अर्ज़ किया:‘‘अम्मी! बाबू से कहीं कि वह ज़्यादा दिनों के लिए बाहर न जाया करें,घर खाली होजाता है’’ इसी बेच अम्मी के फोन की घंटी बिजी और जब उन्हों ने रेस्यू किया तो अब्बा हुज़ूर का फोन था,अम्मी ने एक लम्हा तवक़्क़्फ़ किए बग़ैर कह दिया कि सुनें! तुम्हारी बिटिया सालहा किया कहती है? वह कहती है कि बा बो ज़्यादा दिनों के लिए न जाया करें घर खाली होजाता है, अब्बा जान ने अम्मी से फ़रमायाकि बिटिया से कहू कि वह फ़िक्र मंद न हूँ अभी उन की ख्वाहिश का सामान करता हूँ।

मुझे याद आरहा है कि इस वक़्त मेरे अब्बा हुज़ूर विशाखा पट्टनम(हैदराबाद) थे वहाँ से उन्हों ने अपने किसी वफादार के पास फोन करके ढेर सारी खाने पीने की चीजें घर भिजवा दें।

अभी इसी साल शाबान(2019) की बात है कि मुझे अली गढ़ जाना था और एक माह पहले ही मेरा ए,सी में टिकट किराया जा चुका था,जब इजाजत की ग़रज से अम्मी ने अब्बा जान से बताया तो उन्हों ने सब से पहले यही कहा कि बिटिया से कहूका टिकट कैंसल करादें और हमारी गाड़ी से चली जाएँ इस लिए कि ट्रेन में धक्के वगैरह लगते हैं।

आप की इस किस्म की मुहब्बतें तो उन गणित हैं जिन्हें अलफ़ाज़ में समेटा नहीं जा सकता कोई दिन ऐसा नहीं गुजरता जिस दिन उन की शफकतें याद आएं और आंखें सावन भादों का नमूना पेश न करें मगर अभी सिर्फ़ उन्हें बे जोड़ व बे रब्त चंद अलफ़ाज़ पर इकतिफ़ा करती हूँ,दुआ है कि अल्लाह हमें सब्र जमील की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए और हमारी वालिदा मुशफ़िक़ा को लंबी उम्र अता फ़रमाए, आमीन! बजाह हबीबा सय्यद एल्मरसिलीन अलैहि वाला आला अस्सलात व इलतसलैम

*मुअल्लिमा जामा अलमहसनात शाख अल-जामिआ अल-अहमदिया अस्सुन्निया

शफक़तों का एक जहान हुज़ूर बह्रुल-इरफ़ान

आलिमा आयशा सिद्दीक़ा दुख़तर बह्र उलारफान*

हामिदा विमसलिया मुसलमाली रसोलह उलक्रीम

मुझ को छाओं में रखा और ख़ुद जलता रहा धूप मेंमें ने देखा इक फरिश्ता बाप के रूप में

बाप दुनिया की वह अज़ीम हस्ती है जो कि अपने बच्चों की परवरिश के लिए अपनी जान तक लड़ा देता है हर बाप का यह ख्वाब होता है कि वह अपने बच्चों को आली से आली तालीम और मेआर ज़िन्दगी फ़राहम करे ताकि वह मुआशरे में बाइज़्ज़त ज़िन्दगी बसर करसके और मुआशरती तरक्की में अपनाकरदार अदा कर सके बाप दुनियाकी सब से बड़ी नेमत है।

लेकिन मेरे वालिद ,मेरे मुरब्बी,मेरे,मेरे मुर्शद सिर्फ़ एक बाप ही नहीं वह तो मेरी दुनिया व आख़िरत के सरमाया थे मेरे वालिद बुज़ुर्गवार हुज़ूर बह्र उल-इरफ़ान अलैहि अलरहम वालरिज़्वान अल्लाह के वली, उसके प्यारे महबूब ﷺ के सच्चे जानशीन थे।उनकी हर अदा निराली थी उन्हें जिस हैसियत से देखा जुदा पा या इल्म वफ़ज़ल, ज़हद वितक़्वा इबादत व रियाज़त।कमाल इतबा अ सुन्नत में अपने मशाइख़ बिलख़सूस हज़रत इमाम रब्बानी मुजददालफ़ सानी क़ुद्दिस सिर्रहू की यादगार्थे।में किया किया उनके औसाफ़ बयान करू M मुख़्तसर यह कि बाप के सीने में औलाद के लिए मोजज़िन पदराना शफकत, औलाद के बेहतर मुस्तक़बिल के लिए उम्र भर की रियाज़त, उन की बेहतरीन तरबीयत और बहैसीयत बाप औलाद की तमाम जिम्मा दारियों को पूरा करने की सई यह वह अवामिल हैं जो एक बाप को बेहतरीन और मिसाली बाप के ओहदे पर फ़ाइज़ करते हैं। मेरे अब्बा जान उन से भी ज़्यादा खूबियों के मालिक थे।

में अपने दिल का दर्द कैसे लिखों किस से बयान करूँ ,जब यह दिल को दहला देने वाली खबर मीरेकानों में पहुँची तो ऐसा लग रहा था कि बिजली सी गुर्गई, कयामत सी बरपा होगई हो, सारी दुनिया अंधेरी सी होगई हो सोचती थी कोई कह दे यह खबर गलत है इस लिए कि में ने अपनी ज़िन्दगी में कभी सोचा भी नहीं था कि मेरी ज़िन्दगी में मेरेसरसे अब्बा जान का साया उठ जाए गा उन की मुहब्बत व शफकत का सिलसिला ख़त्म हो जाए गा इस लिए मेरे अब्बा जान ने कभी ऐसा जुमला नहीं बोला जैसाकि आम तौरपर वालदैन अपनी औलाद को बोल देते हैं। न

हम सब को को ई एहसास होने दिया हमेशा हम सब को इतनी मुहब्बत दी कि कोई भी यह न कह सिक्का कि अब्बा जान मुझे ज़्यादा चाहते हैं। बल्कि हम सब हमेशा यही कहते थे कि अब्बा जान जैसी मुहब्बत तो अम्मी जान भी कभी नहीं दे पाएं गी। मेरे अब्बा जान को जब यह मालूम हो जाए कि मेरी फलां बेटी को फलां चीज़ ज़्यादा महबूब है तो हमेशा आप का तरीका रहा कि इसी को बुलाकर वह चीज़ इस के हाथ में दे देते।

मेरे प्यारे अब्बा जान अक्सर फ़रमाया करते थे कि बेटी! मेरी ज़िन्दगी में कभी मायूस न होना अपनी हर ख्वाहिश को पूरा करना उन की यह बातें हमें वह वक़्त याद दिलातें हैं जब आप खाली हाथ थे आस पास कुछ न था । हम सब की खातिर हर्तकलीफ़ बर्दाश्त की लेकिन किसी के सामने कुछ बयान नहीं किया।

मेरे वालिद हमेशा हम सब से फ़रमाते थे कि बेटा दीन का काम करू , अल्लाह व रसूल का काम करू ,दीन की ख़िदमत करू,फजल मौला से दुनिया की किसी भी चीज़ से महरूम नहीं रहोगी।

आप ऊरतों में दीन की तरवेज वाशाअत के लिए हमेशा फिक्रमंद रहते इस के लिए जामा अलमहसनात क़ायम फ़रमा या जिस में हम सब पढ़ाते हैं। लड़कियों की दीनी तालीम से बहुत खुश होते और हम सारी बहनों को बहुत दुआओं से नवाजते जब घर पर तशरीफ़ रखते तोहम सब बहनों को अखटा करते और बुजुर्गों के वाक़ियात और अक़्वाल और उनकी दीनी ख़िदमात बयान फ़रमाते और हमें दीन की ख़िदमात के लिए निया हौसला देते। ऊरतों में दीन की तबलीग़ के लिए फ़रमाते और उनके अंदर इस्लामी तालीमात को आम करना अपना मक़सद फ़रमाते क्योंकि इस्लामी मुआशरे की तकमील के लिए ऊरतों की देनदारी को बहुत बड़ा दखल है और यह बग़ैर उन में तालीम व तरबीयत के नामुमकिन है इस लिए ऊरतों के दीनी प्रोग्राम और घर घर इस्लामी तबलीग़ के फ़रोग़ के कोशां रहते ।सीरत नबवी ﷺ की तरग़ीब व तालीम देते,फ़रमाते कि हुज़ूर मुजद्दिद अल्फ़ सानी क़ुद्दिस सिर्रहू का फरमान है कि हर कमाल व खूबी का हुसूल इत्तिबा सुन्नत में है।और इत्तिबा सुन्नत के लिए सीरत रसूल ﷺकी तालीम ज़रूरी है।

आज यह सारी बातें याद आती हैं तो बहुत रुलाती हैं।कि ऐसे दौर में जहां सब दुनिया ही का सबक देते हैं मेरा बाप वह था जो हमें सिर्फ़ दीन की दावत वख़दमत का सबक पढ़ाता और ज़िन्दगी जीने का मक़सद ही सिर्फ़ ख़िदमत सुन्नत वसनीयत बताता आज हम इस मुर्शद विमुरबी वालिद से महरूम होगए इस आसमान के साया तले सब कुछ है पर मेरा साइबान नहीं रहा । मेरे अब्बा जान का एसआसाया जिस ने कभी हम लोगों को अपने

से दौर नहीं किया।

में ने पढ़ा था कि वालदैन की ज़ियारत पर हज का सवाब मिलता है जैसा कि हदीस में है हज़रत इब्न अब्बास रज़ि अल्लाह अन्हु रिवायत करते हैं कि रसूल अल्लाह ﷺ ने फ़रमाया, ’’जो नेक औलाद अपने मां बाप के चेहरे की तरफ़ रहमत (औरमुहब्बत) से एक नज़र देख ले तो अल्लाह तआला (इस के नामा आमाल में ) एक हज मकबूल का सवाब लिख देता है ।सहाबा कराम रिज़वान अल्लाह अलैहिम अजमईन ने अर्ज़ किया ,अगर वह हर रोज़ सौ बार देखेतो? आप ﷺ ने फ़रमाया , अल्लाह सब से बड़ा है और(इस की ज़ात ) बहुत पाक है ,(यानी इस के खजानों में कोई कमी नहीं,वह सोहज कासवाब भी अताफ़रमाए गा।‘‘(मशकात ,अलबेहक़ी फ़ी अलशाब )

जब मेरे वालिद घर पर तशरीफ़ लाते तोहम सब लोग अपने वालिद की ज़ियारत से मुशर्रफ़ होते और हज की इस सआदत से बार बार मुशर्रफ़ होते लेकिन आज हम इस अज़ीम शरफ़ से महरूम होगए अपने प्यारे अब्बा जान की प्यारी मीठी आवाज़ सन कर दिल को स्को न मिलता था अपनी किस्मत पर नाज़ करते थेमग्राफ़सोस अब बे शरफ़ हो गए।

अब्बाजान वालिदा माजिदा से कहा करते थे कि में ने अपनी बेटियों की शादी अपने से जुदा करने के लिए नहीं बल्कि सुन्नत रसूल अदा करने के लिए की है। हमें दुनिया की हर तकलीफ़ ग्वारा है लेकिन अपने बच्चों की तकलीफ़ ग्वारा नहीं हमेशा हम सब को अच्छा खिलाया हम सब का यह तरीका रहता कि जब मदरसे से घर पहुँचते तो अम्मी जान से पहला सवाल यही करते कि अब्बा जान के पास से कुछ आया हैकि नहीं।अक्सरआप सफर पा चले जातियान के सफर पा जाने से ऐसा लगता था कि घर वीरान है, आह एक घर किया अब तो सारी दुनिया वीरान नज़र आती हैक्योंकि अब्बा जान नज़र नहीं आते आप जब सफर पर जाते थे तो आसरा देकर जाते थे हम सब इंतजार करते थे अब्बा जान आएं गे हम सब बहनें इकट्ठा होजाया करतें थीं।

लेकिन अब्बा जान! अब आप ने तो ऐसा सफर किया कि कोई यह नहीं कहता कि आप लौट कर आएं गे।

अब्बा जान! हर इंसान नज़र आता है मगर आप दुनिया के किसी कोने में नज़र नहीं आते

अब्बा जान! आप ने कभी हमें ग़मज़दा न होने दिया अब हम बे सहारा होगए।

हमारे आँसुवों को पूछने वाला कोई न रहा हम सब को तसल्ली देने वालान्हें रहा आप थे तो ज़िन्दगी थी क्योंकि आप का वजूद मसाऊद ही हमारे लिए सब से बड़ी नेमत था।अब दुनिया की हर नेमत मिल सकती है लेकिन आप

की मुहब्बत विशफ़क़त तो नहीं मिल सकती आप ने हमेशा हर ख्वाहिश को पूरा किया गरीबी के वक़्त में भी हमारी हर तमन्ना, हर आरज़ू की तकमील फ़रमाई ,कभी बुलंद आवाज़ से बात नहीं की हमेशा मुस्कुरा करहँसते हुए हम सब से बातें कीं। आप का वह मुस्कराता दिलकश चेहरा कहां कहां तलाश करूँ।

एक दिन ऐसा भी आया कि अब्बा जान ने हम सब की तरफ़ नज़रें नहीं उठाएं हम सब बहनें अब्बा जान के दरवाजे पर खड़ी रहीं लेकिन मेरे अब्बा जान ने आंखें खोल कर नहीं देखा, आंखों में आँसू आ गए एक मर्तबा भी बेटी कह कर नहीं बुलाया, जो कभी नाम ले कर नहीं हमेशा बेटी कहकर बुला या करते थे।

आह! आखिरी लम्हा में बेटी का लफ़्ज़ भी नहीं बोला शायद इस लिए कि बेटी को देख कर बाप का प्यार और ज़्यादा न हो जाए और बर्दाश्त की ताकत ख़त्म न हो जाए क्योंकि आप अपने रब अलाज़त की आवाज़ पर लब्बैक कह चुके थे इसी तरह अपने आ नस्वों को पूछते रहे अब्बा जान! अब आप जैसा कहां तलाश करने जाएँ आप से सब कुछ था अब तो दुनिया खाली नज़र आती है हर इंसान यही कहता है जब आप इस दार फ़ानी में न रहे, तो हम सब की ज़िन्दगी से किया फायदा।

हमें नाज़ था तो आप पर, फख्र था तो आप पर। आज हम सब का गुरूर टूट गया साया पदरी सर से उठ गया अब्बा जान की मुहब्बत से महरूम हो गए फख्र किस पर करूँ नाज़ किस पर करूँ हमेशा आप की मुहब्बत और हौसला अफ़्ज़ाई ने हमारी आवाजों को बुलंद रखा आज हम सब की जुबानें खामोश हैं फ़क़त इस लिए कि अब्बा जान तो हमें छोड़ कर चले गए हमें यतीम कर गए हमें अपनी मुहब्बत विशफ़क़त से हमेशा के लिए महरूम कर गए। आह मेरे अब्बा जान! आप की शफकतें इनायतें ,मुहब्बतें बे शुमार हैं जिन को बयान करना बस से बाहर है।

मेरे वालिद के मक़ाम व मर्तबा को ख़ुदा वरसौल ही बेहतर जानते हैं उनकी दीनी ख़िदमात का ज़माना मोतरिफ़ है लिखने वाले उनकी हयात व ख़िदमात पर लिख रहे हैं । में ने यहाँ एक बेटी का दर्द और उसके बाप के जाने पर किया कैफियत होती है भीगी पलकों के साथ सफ़ा क़िरतास पर कलमबंद कर ने कोशिश की है अल्लाह तआला मुझे और मेरी प्यारी अम्मी जान और प्यारे भाइयों और मेरी सआदत मंद बहनों कौसब्र की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए और अब्बा जान के नक़्श क़दम पर चलने की तौफ़ीक़ अता फ़रमा ए । आमीन बजाह सय्यद एल्मरसिलीन

*मुअल्लिमा जामा अलमहसनात शाख अल-जामिआ अल-अहमदिया अस्सुन्निया